गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
शित कर दिया है। मैंने भी पुराने भाष्य और अनुवाद के लिये बहुत खोज किया, परन्तु कोई न मिला। जब मेरा अथर्ववेद भाष्य हिन्दी अनुवाद सहित पूरा होकर संवत् १६७८ विक्रमीय (सन् १६२१ ईस्वी) में छपकर प्रकाशित हो गया, बहुत से विद्वान् महा- शयों ने अनेक पुस्तकों के भाष्य करने की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया, उनमें गोपथ के लिये बहु सम्मति थी, और मैंने विचार कर कि यह प्राचीन वैदिक ग्रन्थ भी महान् उपयोगी है, इसीके लिये प्रयत्न किया। अपनी वृद्धावस्था के कारण मुझे ग्रन्थ के पूरे हो जाने की आशा न थी, परन्तु सर्वशक्तिमान् परमात्मा की महती कृपा से अब यह ग्रन्थ भाषानुवाद, टिप्पणियों, व्याकरण प्रक्रियाओं और विनियोगीय वेद मन्त्रों आदि सहित सर्वसाधारण के सामने छपकर उपस्थित है। सब विचारशील स्त्री पुरुष आत्मोन्नति करने और वेदार्थ जानने में उससे लाभ उठावें। संस्कृत कोषों में वैदिक शब्द और ब्राह्मण शब्द बहुधा नहीं मिलते विद्वान् लोग इस ओर भी ध्यान देवें॥ ४—गोपथब्राह्मण का विषय॥ गोपथब्राह्मण अथर्ववेद का ब्राह्मण कहा जाता है, परन्तु उसमें यज्ञ करने के लिये चारों वेदों के मन्त्रों का विनियोग है। इससे विदित है कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चार वेद संहिताओं के अलग अलग नाम हैं और चारों नाम एक दूसरे के भी बोधक हैं। और यह भी प्रकट है कि चारों वेदों का नाम अलग अलग करके तथा मिलाकर त्रयी वा त्रयी विद्या [कर्म, उपासना और ज्ञान] है। गोपथ पू० २।१८ में वर्णन है—(एष ह वै विद्वांत्सर्ववित् ब्रह्मा यद् भृग्वङ्गिरोवित्) यही विद्वान् सब जानने वाला ब्रह्मा [प्रधान ऋत्विज्] है जो भृगु-अङ्गिराओं [प्रकाशमान ज्ञानों, चारों वेदों] का जानने वाला पुरुष है। भगवान् यास्क मुनि निरुक्त १।८ में लिखते हैं—(ब्रह्माणौ जाते जाते विद्यां वदति ब्रह्मा सर्वविद्यः सर्वं वेदितुमर्हति, ब्रह्मा परिवृढः श्रुतः) एक ब्रह्मा उत्पन्न हुये हुये कर्म में विद्या बताता है, ब्रह्मा सब विद्याओं वाला, और सब जानने योग्य होता है, ब्रह्मा वेदविद्या के कारण बढ़ा हुआ होता है। यह भी प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा चतुर्मुखी अर्थात् चतुर्वेदी होता है। इन कथनों से स्पष्ट है कि भृग्वङ्गिरस्, अथर्ववेद, ब्रह्मवेद आदि शब्द वेद की संहिता विशेष [अथर्ववेद] के और चारों संहिताओं के नाम हैं, प्रकरण के अनु- सार अर्थ कर लेना चाहिये॥ गोपथ में यज्ञ विषय [अर्थात् आहवनीय आदि अग्नियों द्वारा वेद मन्त्रों से अग्नि प्रज्वलन] दीख पड़ता है, परन्तु वस्तुतः आत्मिक यज्ञ अर्थात् आत्मा की उन्नति से पुरुषार्थ बढ़ाकर अन्न, प्रजा, पशु और स्वर्ग [सुख] की प्राप्ति का विधान वेद मन्त्रों द्वारा वर्णित है। (या वाक् सोऽग्निः, यः प्राणः स वरुणः, यन्मनः स इन्द्रः, यच्चक्षुः स बृहस्पतिः, यच्छ्रोत्रं स विष्णुः—गो० उ० ४।११) जो वाणी है वह अग्नि [तापक पदार्थ] है, जो प्राण [श्वास] है, वह वरुण [स्वीकार करने योग्य पदार्थ]
( २१ ) है, जो मन है वह इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला पदार्थ ] है, जो आंख है वह बृहस्पति [ बड़े बड़ों का पालने वाला पदार्थ ] है, जो कान है वह विष्णु [ व्यापक पदार्थ ] है [ यह यज्ञ के देवता हैं ] । (पुरुषो वै यज्ञः, तस्य शिर एव हविर्धानं, मुखमाहवनीयः, उदरं सदः इत्यादि-गो० उ० ५ । ४ ) पुरुष ही यज्ञ है, उसका शिर ही हविर्धान [हवि का स्थान ], मुख आहवनीय [ यज्ञाग्नि ] और उदर सद [ सभा शाला ] है, इत्यादि । ( प्रतितिष्ठति प्रजया पशुभिः य एवं वेद—गो० उ० ६ । १२ ) वह पुरुष प्रजा और पशुओं से प्रतिष्ठा पाता है, जो ऐसा जानता है। इसी प्रकार के अनेक वाक्य आत्मिक यज्ञ के प्रतिपादक हैं । इसके अतिरिक्त विशेष करके सृष्टिविद्या, ओम् शब्द व्याख्या, गायत्री मन्त्र व्याख्या, ब्रह्मचर्यसेवन, शरीरविद्या, सत्य- भाषण आदि विषय मनोरोचक, उन्नतिकारक और पुरुषार्थवर्धक हैं—विषय सूची देखो ॥ ५–गोपथब्राह्मण का विस्तार ॥ गोपथब्राह्मण ( ओं ब्रह्म ह वा इदमग्र आसीत् ) इन पदों से आरम्भ होकर (यत्रैवंविदं शंसति यत्रैवंविदं शंसतीति ब्राह्मणम्) इन पदों पर समाप्त होता है । इसके दो भाग हैं, पूर्वभाग और उत्तरभाग । दोनों भागों में ग्यारह (११) प्रपाठक और दो सौ अट्ठावन (२५८) कण्डिकायें निम्न प्रकार से हैं ॥ गोपथब्राह्मण के प्रपाठक और कण्डिकायें ॥
| प्रपाठक | कण्डिका | प्रपाठक | कण्डिका |
|---|---|---|---|
| पूर्व भाग | उत्तर भाग | ||
| १ | ३६ | १ | २६ |
| २ | २४ | २ | २४ |
| ३ | २३ | ३ | २३ |
| ४ | २४ | ४ | १६ |
| ५ | २५ | ५ | १५ |
| ६ | १६ | ||
| योग | १३५ | योग | १२३ |
| विवरण | पूर्व भाग | उत्तर भाग | महायोग |
|---|---|---|---|
| प्रपाठक | ५ | ६ | ११ |
| कण्डिका | १३५ | १२३ | २५८ |
( १२ ) ६-धन्यवाद ॥ उस सर्वशक्तिमान् परमपिता जगदीश्वर को अत्यन्त धन्यवाद है जिसकी महती कृपा से अथर्व वेद भाष्य के पीछे यह गोपथब्राह्मण का भाष्य मेरे हाथ से पूरा होकर सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत है । वृद्धावस्था के कारण शरीर तो कुछ ढीला पड़ गया है, और मृत्युदेव कान में यह कहता रहता है । काल करे सो आज कर आज करे सो अब । पल में परलय होइगी फेर करेगा कब ॥ इस प्रेरणा से परमेश्वर पर भरोसा करके अन्य आवश्यकताओं से बचे समय को लगातार लगाये रहने से धीरे-धीरे यह भाष्य पूरा हो गया ॥ मैं यहाँ पर बदायूं निवासी श्रीमान् स्वामी रामभिक्षु जी महाराज को हार्दिक धन्यवाद देता हूं । उनकी प्रेरणा और विचारशीलता आदि सहायता से मेरे चित्त में उत्साह बढ़ता रहा । उक्त स्वामी जी मेरे पास वेदों का स्वाध्याय करने आये थे । जब तक वे रहे, इस भाष्य के और वेद मन्त्रों के देखने, विचारने, लिखने और मुद्रणपत्र ( Proof sheet ) शोधने तथा सूचीपत्र और अनुक्रमणिका आदि बनाने में प्रेम से मेरे सहायक हुये ॥ ७-उपसंहार प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु । प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये—अथ० १६ । ६२ । १ ॥ [ हे सर्वशक्तिमान् परमात्मन् ! ] ( मा ) मुझे ( देवेषु ) विद्वानों में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( मा ) मुझे ( राजसु ) राजाओं में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( उत ) और ( अर्ये ) वैश्यों में ( उत ) और ( शूद्रे ) शूद्रों में, और ( सर्वस्य ) प्रत्येक ( पश्यतः ) दृष्टि वाले का ( प्रियम् ) प्रिय [ बना ] ॥ हे परम पिता ! हमें पुरुषार्थ दीजिये जिससे हम वेदों के पठन-पाठन, विचार और अभ्यास से सब संसार के उपकार करने में उद्यत रहें ॥ ओ३म् । शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः ॥ हे जगदीश्वर ! हमें एक आत्मिक शान्ति, दूसरी शारीरिक शान्ति और तीसरी सामाजिक शान्ति दीजिये ॥ क्षेमकरणदास त्रिवेदी । ५२ लूकरगंज, प्रयाग, जन्म, कार्त्तिक शुक्ला ७ संवत् १६०५ [ इलाहाबाद ] विक्रमीय [ता० ३ नवम्बर १८४८ ईस्वी] कार्त्तिकशुक्ला ७ संवत् १९८१ वि०, जन्मस्थान, ग्राम शाहपुर–मडराक, ता० ३ नवम्बर १९२४ ई०। जिला अलीगढ़ ॥
प्रपाठक १ ॥
गोपथब्राह्मण का विषय सूचीपत्र ॥ पूर्वभाग ॥ प्रपाठक १ ॥ कण्डिका विषय पृष्ठ १—ब्रह्मा और सृष्टि की इच्छा ... ... ... १ २—ब्रह्म के रोमों से पसीने की धारायें और सृष्टि की इच्छा ... ३ ३—ब्रह्म के बीज का जल में गिरना, समुद्र और भृगु की उत्पत्ति ... ५ ४—अथर्वा और प्रजापति ... ... ... ... ७ ५—दस अथर्वा ऋषि, दस आथर्वण, वेद और ओम् ... ... ९ ६—तीन लोक, तीन देवता, तीन वेद और तीन महाव्याहृति ... १३ ७—समुद्र, वरुण, मृत्यु और अङ्गिरा ... ... ... १५ ८—बीस अङ्गिरा, दश आङ्गिरस, वेद और जनत् महाव्याहृति .... १७ ६—ब्रह्म और वेद की सर्वोत्तमता ... ... १६ १०—सर्पवेदादि ५ वेद, वृधत् आदि ५ महाव्याहृति ... ... २१ ११—महाव्याहृति शम् ... ... ... ... २३ १२—चन्द्रमा, नक्षत्र आदि पदार्थ ... ... ... २४ १३—ब्रह्मयज्ञ और उसकी त्रुटि में अनिष्ट फल ... ... २६ १४—यज्ञ के दोष निवारण से इष्ट फल की प्राप्ति ... ... २८ १५—यज्ञ की सफलता का लाभ ... ... ... ३० १६—ब्रह्मा का ब्रह्मचर्य, ओम्, जगत् की सृष्टि ... ... ३१ १७—ओम् की पहली स्वर मात्रा से पृथिवी आदि की उत्पत्ति ::: ३२ १८—ओम् की दूसरी स्वर मात्रा से वायु आदि की उत्पत्ति ... ३३ १६—ओम् की तीसरी स्वर मात्रा से सूर्य आदि की रचना ... ३४ २०—ओम् की वकार मात्रा से जल आदि की रचना ... ... ३५ २१—ओम् से इतिहास पुराण आदि का ज्ञान ... ... ३५ २२—ओम् को सहस्र बार जपने की महिमा ... ... ३७ २३—आख्यायिका—ओम् द्वारा असुरों से देवताओं की रक्षा ... ४० २४—ओङ्कार के विषय में ३६ प्रश्न ... ... ... ४१ २५—आख्यायिका—ओङ्कार के विषय में इन्द्र के प्रश्न और प्रजापति के उत्तर ... ... ... ::: ४२ २६—कण्डिका २४ के ओम् विषयक प्रश्नों के उत्तर -- ::: ४४ २७—कण्डिका २४ के ओम् विषयक शेष प्रश्नों के उत्तर ... ४६ २८—ओम् को आदि में बोलने का वर्णन ... ... -- ४८ २६—चारों वेद और देवता आदि ... -- -- ५०
( २४ ) कण्डिका विषय पृष्ठ ३०-ओङ्कार का चिन्तन और उसका फल -- ... ५३ ३१-मौद्गल्य और मैत्रेय की कथा ... ... ... ५४ ३२-मौद्गल्य और मैत्रेय का गायत्री मन्त्र पर वार्तालाप ... ५७ ३३--सावित्री वा गायत्री मन्त्र के चौबीस उत्पत्ति स्थान और बारह जोड़ा ६० ३४-सावित्री वा गायत्री मन्त्र के प्रथम पाद की व्याख्या ... ६२ ३५- सावित्री वा गायत्री मन्त्र के दूसरे पाद की व्याख्या ... ६४ ३६--सावित्री वा गायत्री मन्त्र के तीसरे पाद की व्याख्या --- ६५ ३७- बारह महातत्त्वों की परम्परा ... - ... ६६ ३८--दूसरे प्रकार से पूर्वोक्त बारह तत्त्वों का विचार ... ... ६७ ३६-आचमन के विधान और लाभ ... ... ... ६६ प्रपाठक २ ॥ १-ब्रह्मचारी की महिमा ... ... ... ७५ २-ब्रह्मचारी का सात मनोरागों का दमन आदि कर्तव्य --- ७८ ३-ब्रह्मचारी के कर्तव्य, आचार्य की सेवा आदि कर्म -- ८० ४-ब्रह्मचारी का अनेक पांच अग्नियों का वशीकरण और दूसरा विनीत कर्तव्य ... ... ... ... ८१ ५-जनमेजय का दो हंसों और दन्तावल से ब्रह्मचर्य की महिमा और अड़तालीस वर्ष आदि समय पर वार्तालाप -- --- ८४ ६-ब्रह्मा ने ब्रह्मचारी और उसे भिक्षा देने वाले गृहपति को छोड़कर सब प्रजाओं को मृत्यु को दिया ... ... ८६ ७-ब्रह्मचारी के दोषों का प्रायश्चित्त विधान -- ... ८८ ८-ब्रह्मचारी के आश्रम वा तपोवन ... -- ... ६० ६- होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा का वर्णन ... ... ६४ १०--काबन्धि की मान्धाता के यज्ञ में यज्ञ विषयक वार्ता ... ६८ ११-काबन्धि के देवयजन और ऋत्विजों के विषय में प्रश्नोत्तर -- १०० १२-काबन्धि का अधिक यज्ञ विषयक विचार ... ... १०२ १३-काबन्धि का आगे यज्ञ विषयक विचार ... ... १०२ १४--काबन्धि का देव यजनों के विषय में वर्णन ... ... १०४ १५-अदिति की सृष्टि रचना के दृष्टान्त से भौतिक यज्ञ की रचना ... १०५ १६--ब्रह्मज्ञानियों को चार चार प्रकार से ब्रह्मप्राप्ति -- ... १०८ १७-ईश्वर मानने वाले की महिमा ... ... ... ११० १८ विघ्नों को हटाकर अश्वनामक अग्नि की स्थापना ... ११२ १६-आख्यायिका-असुरों से इन्द्र द्वारा देवताओं की रक्षा और अग्न्याधान ... -- ... ... ११५
( २५ ) कण्डिका विषय पृष्ठ २०—वैश्वानर जातवेदा और अश्व नामक अग्नि ... ... ११७ २१—वैश्वानर, जातवेदा और अश्व नामक अग्नि का वही विषय ... १२२ २२—सान्तपन अग्नि में प्राजापत्य हवि के साथ ब्राह्म्य हवि की आवश्यकता ... ... ... ... १२६ २३—विना यज्ञ अग्नि वाला ब्राह्मण स्वर्ग नहीं पाता ... ... १२८ २४· ऋत्विजों के चुनाव में ऋग्वेदी होता, यजुर्वेदी अध्वर्यु, सामवेदी उद्गाता, चतुर्वेदी ब्रह्मा होवे ... ... ... १३० प्रपाठक ३ ॥ १—ऋत्विज् चुने हुये वेदवेत्ता पुरुष होवें ... ... १३३ २--चतुर्वेदी चार ऋत्विजों के बिना यज्ञ गिर जाता है ... १३५ ३—यज्ञ में त्रुटि होने पर प्रायश्चित्त ... ... ... १३६ ४—ऋत्विजों के कर्म जिनमें वे दक्षिणा पाते हैं ... ... १३८ ५--तीन ऋत्विजों से यज्ञ करना ... ... ... १४० ६—उद्दालक ऋषि का उत्तर वालों से शास्त्रार्थ करने का प्रयत्न ... १४१ ७—अमावस्या और पौर्णमासी के यज्ञ के सम्बन्ध से उद्दालक के शरीरसम्बन्धी प्रश्न ... ... ... १४३ ८—पूर्वोक्त प्रश्नों के विषय में उद्दालक और स्वैदायण वा शौनक का.वार्तालाप ... ... ... ... १४१ ६--अमावस्या और पूर्णमासी के यज्ञ विधान से शरीर की अवस्था का वर्णन ... ... ... ... १४७ १०--कण्डिका ८ के यज्ञ सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर ... ... १५० ११--प्राचीन योग्य मुनि के उद्दालक से अग्निहोत्र विषयक चालीस प्रश्न ... ... ... ... १५२ १२--प्राचीन योग्य के ४० प्रश्नों के उद्दालक के दिये उत्तर ... १५५ १३--तीनों अग्नियों में विघ्न पड़ने पर उपाय और प्रायश्चित्त ... १५६ १४—खान पान के लाभ ... ... ... १६२ १५—क्रियात्मक और मानसिक यज्ञ करना चाहिये ... ... १६४ १६--स्वाहा शब्द के विषय में प्रश्नोत्तर - ... १६६ १७--अग्निष्टोम विषय ... ... ... ... १६७ १८-पशुरूप वेदवाणी की सूक्ष्मता का विचार ... ... १६८ १६--दीक्षित पुरुष के कर्तव्य और अकर्तव्य कर्म ... ... १७१ २०--दीक्षा विषयक प्रश्नोत्तर ... ... ... १७४ २१—दीक्षित के कर्तव्य कर्म और भूल में प्रायश्चित्त ... ... १७६ २२-दीक्षित की भूल के प्रायश्चित्त ... ... ... १७७ २३--पुत्रेष्टि यज्ञ का विधान ... ... - १७६
प्रपाठक ४ ॥
( २६ ) प्रपाठक ४ ॥ कण्डिका विषय पृष्ठ १--गृहपति की दीक्षा -- ... ... ... १८० २--ब्रह्मा की दीक्षा ... ... ... ... १८१ ३--उद्गाता की दीक्षा... ... ... ... १८१ ४--होता की दीक्षा ... ... ... ... १८२ ५--अध्वर्यु की दीक्षा... ... ... ... १८२ ६--सहायक ऋत्विजों की दीक्षा ... ... ... १८३ ७--अग्निष्टोम, और अठारह प्रकार के यज्ञों के देवी देवता ... १८४ ८--अठारह प्रकार के यज्ञ और उनके फल और अग्निष्टोम ... १८७ ९--प्रायणीय अतिरात्रादि पन्द्रह प्रकार के यज्ञ और संवत्सर ... १९१ १०--प्रायणीय अतिरात्रादि पन्द्रह प्रकार के यज्ञ और उनके फल और संवत्सर का जन्म ... ... ... ... १९३ ११-संवत्सर के ज्ञान की महिमा ... ... ... १९५ १२--संवत्सर की बृहती छन्द से उपमा और महिमा ... ... १९६ १३-संवत्सर और महाव्रत ... ... ... १९७ १४--संवत्सर और महाव्रत यज्ञ के विषय में प्रश्नोत्तर ... १९८ १५-- ... तथा ... तथा ... ... १९६ १६-- ... तथा ... तथा ... ... २०० १७-- ... तथा ... तथा ... ... २०१ १८-संवत्सर बड़ा गरुड़, विषुवान् आत्मा और दोनों अर्ध संवत्सर दो पक्ष ... ... ... २०२ १६--विषुवान् से संवत्सर के बारह महीने ... ... २०३ २०-ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों के विषय में प्रश्नोत्तर ... ... २०४ २१-संवत्सर का अतिरात्र आदिकों से सम्बन्ध ... ... २०६ २२-- ... तथा ... तथा ... ... २०७ २३--अभिप्लव और पृष्ठ्य की व्युत्पत्ति और दूसरे यज्ञ .. ... २०८ २४--प्रेदि, कौशाम्बेय, कौसुरबिन्दु, और उद्दालक आरुण से संवत्सर ... और यज्ञीय दिनों के विषय में प्रश्नोत्तर ... ... २१० प्रपाठक ५ ॥ १--संवत्सर से अभिप्लव का सम्बन्ध ... ... ... २१२ २-यज्ञों में गाध प्रतिष्ठा और तीर्थ ... ... ... २१३ ३--मनुष्य शरीर के दृष्टान्त से संवत्सर यज्ञ का वृत्तान्त ... २१५ ४-- ... तथा ... तथा ... ... २१८ ५--मनुष्य शरीर के दृष्टान्त से संवत्सर अर्थात् वर्ष का वृत्तान्त ... २२१ ६-संवत्सर यज्ञ में विषुवान् के दोनों ओर यज्ञ की समता ... २२४
कण्डिका विषय पृष्ठ
( २७ ) कण्डिका विषय पृष्ठ ७—पन्द्रह प्रकार के यज्ञों का क्रम, जिनमें राजसूय, वाजपेय, . ... अश्वमेध, पुरुषमेध आदि सम्मिलित हैं ... ... २२५ ८—प्रजापति की कथा जिसने बहुत यज्ञों को करके आत्मिक यज्ञ से अत्यन्त सुख पाया ... ... ... ... २२६ ६—संवत्सर यज्ञ में आवश्यक कर्मों का विधान ... ... २२६ १०—सहस्र संवत्सर यज्ञ और उसके स्थानापन्न विश्वजित् यज्ञ के विषय में कथा ... ... ... ... २३१ ११—ऋत्विजों की योग्यता के विषय में प्रजापति और नारायण की कथा ... ... ... ... २३४ १२—प्रातःसवन की स्तुति का मन्त्र सोम विषय में ... ... २३६ १३—माध्यन्दिन सवन की स्तुति का मन्त्र सोम विषय में ... २३७ १४—तृतीय सवन की स्तुति का मन्त्र सोम विषय में ... ... २३८ १५—संस्थित सवन में भर्ग आदि चार पदार्थों का दस प्रकार से वर्णन ... ... ... ... २४० १६—भर्गः [ तेज ] का वर्णन ... ... ... २४१ १७—महः वा महत्त्व का वर्णन ... ... ... २४२ १८—यश वा कीर्ति का वर्णन ... ... ... २४३ १६—सर्वं वा सब ज्ञान का वर्णन ... ... ... २४३ २०—दश गुणित चार पदार्थों का विराट् से सम्बन्ध ... ... २४४ २१—यज्ञ के विषय में दध्यङ् और अनर्वा का वार्तालाप ... २४४ २२—मिश्रित यज्ञों का विषय ... ... ... २४६ २३—विविध यज्ञों के विधान और गणना सहित व्याख्यान श्लोकों में ... २४८ २४—तपस्वी वैश्वानर से श्रद्धा में अङ्गिरा ऋषि की उत्पत्ति और वेदों का यज्ञों तथा ऋत्विजों से सम्बन्ध ... ... २५२ २५—ऋग्वेद आदि चारों वेदों के स्थान तथा देवता आदि का वर्णन और यह कि चारों वेद ही त्रयी विद्या हैं ... ... २५६ उत्तर भाग ॥ प्रपाठक १ ॥ १—यज्ञ में ब्रह्मा का आसन, प्रणीता पात्र और परिधियां ... २६० २—प्रजापति का रुद्र को भाग शून्य करना, प्राशित्र का वर्णन, भग सविता आदि का अङ्ग भङ्ग होना और बृहस्पति वा ब्रह्मा का शान्त करना ... ... ... २६३ ३—प्राशित्र [ अन्न ] का विधान - ... २६७
( २८ ) कण्डिका विषय पृष्ठ ४—यज्ञ के विघ्नों का नाश और यज्ञ के आरम्भ का विधान ... २६६ ५—पौर्णमासी और अमावस को दक्षिणा के स्थान में ओदन का दान ... ... ... ... २७१ ६—यज्ञ में दो प्रकार के देवता आते हैं एक सोमपा दूसरे असोमपा अथवा एक हुताद और दूसरे अहुताद, उनका वर्णन ... २७२ ७—देवासुर संग्राम में प्रजापति द्वारा ओदन के विभाग से देवों की जीत ... ... ... ... २७४ ८--दर्श पौर्णमास यज्ञ के साथ ही सोम यज्ञ करने और यज्ञ करनै वालों की उच्चदशा का वर्णन ... ... " २७५ ६—चन्द्रमा के उदय होने के पीछे हवि देने का विधान ... २७६ १०– पूर्व और उत्तर पूर्णमासी और अमावास्या का विचार ... २७७ ११–दोनों पौर्णमासी और अमावस में से एक-एक ही यज्ञ के आरम्भ और समाप्ति के लिये रहे ... " २७६ १२--दर्श पूर्णमास यज्ञ पर अग्नि और विष्णु तथा सरस्वती और सरस्वान् को चरु ... ... ... २८० १३–मार्गकर्त्ता अग्नि के लिये अष्टाकपाल चरु ... ... २८१ १४--व्रतपालक अग्नि के लिये अष्टाकपाल चरु, और व्रत में स्त्रीगमन और मांसभक्षण का निषेध ... ... ... २८१ १५--व्रतपोषक अग्नि के लिये अष्टाकपाल चरु ... ... २८२ १६--जिसके पिता, पितामह ने सोमपान नहीं किया, वह सोमयाग करे ... ... ' ... ... २८३ १७—ओषधियों [अन्न आदि पदार्थों] के पकने पर इन्द्र-अग्नि विश्वे- देवा और सोम के लिये चरु के विषय में कथा ... ... २८४ १८--अप्रतिरथ नाम सूक्त [युद्ध यात्रा के राग] के प्रयोग की कथा ... २८६ १६–चातुर्मास यज्ञ फाल्गुनी पूर्णमासी से करने होते हैं ... २८८ २०--अग्नि और सोम के साथ दूसरे देवताओं के यज्ञ ... २६० २१--प्रजापति के प्रजायें उत्पन्न और वरुण को प्रसन्न करने की कथा ... २६२ २२-इन्द्र-अग्नि, वरुण आदि के लिये हवि ... ... २६३ २३–इन्द्र, अग्नि और मरुत् देवताओं के लिये हवि ... ... २६५ २४--पितरों के लिये हवि .. ... ... ... २६७ २५--पितृयज्ञ के साथ देवयज्ञ आदि का विधान ... ... २९६ २६—तेरहवें महीने और शुनासीर यज्ञ के साथ अग्नि, वायु, सूर्य, संवत्सर और चातुर्मास्यों का वर्णन ... ... ३०२
( २१ ) कण्डिका विषय पृष्ठ प्रपाठक २ ॥ १--इन्द्र-अग्नि अर्थात् प्राण और अपान के लिये यज्ञ के लाभ ... ३०५ २--देवताओं ने पाँच प्रकार से चढ़ाई करके असुरों को जीता ... ३०७ ३--यजुर्वेद के मन्त्र के आश्रय से यज्ञ कर्म ... ३०६ ४--सोम यज्ञ में त्रुटि की यजुर्वेद मन्त्र से पूर्ति ... ३११ ५--यज्ञ में दोषों को ब्रह्मा ठीक कर सकता है ... ३१४ ६--यज्ञ, धर्म और प्रवर्ग्य का वर्णन ... ... ३१७ ७--देवासुर सङ्ग्राम में उपसद् यज्ञ द्वारा देवताओं का विजय - ३२१ ८--उपसद् यज्ञों का अधिक वर्णन ... ... ३२४ ९--आग्नीध्र द्वारा देवपत्नियों का वर्णन .. ... ३२५ १०--यज्ञ में सोमपान की महिमा ... ... ३२८ ११--देवताओं ने यज्ञ द्वारा असुरों पर विजय पाया ... ... ३३० १२ सोम यज्ञ का वर्णन .. ... ... ३३२ १३--आख्यायिका-वसिष्ठ ने इन्द्र को देखा और इन्द्र ने उसे स्तोम- भागों द्वारा ब्रह्मज्ञान बताया ... ... ... ३३६ १४--आगे और स्तोमभागों और व्याहृतियों का वर्णन ... - ३३६ १५ स्तोमभागों से शत्रुओं का नाश ... ... ३४२ १६--आग्नीध्र द्वारा यज्ञ की सिद्धि ... ... ३४३ १७--प्रवृत्त आहुतियों का वर्णन ... ... ३४५ १८ प्रजापति को नमस्कार ... - ३४६ १६--सदस्य गन्धर्वों को नमस्कार ... ... ३४७ २०--प्रातःसवन में इन्द्र आदि के लिये हवि का निर्णय ... ... ३४६ २१ माध्यन्दिन सवन में इन्द्र को हवि ... ... ३५२ २२--तृतीय सवन में इन्द्र और ऋभुओं को हवि ... ... ३५५ २३--सत्य ही बोलना चाहिये ... ... ... ३५६ २४- दर्शपूर्णमास यज्ञ में देवताओं को एक दिन पहिले निमन्त्रण करे ... ३६० प्रपाठक ३ ॥ १-वषट्कार और अनुवषट्कार का वर्णन ... ... ३६१ २-वषट्कार वज्र, छह ऋतु और छह आकाश आदि हैं ... ३६३ ३-तीन वषट्कार वज्र, धामच्छत् और रिक्त का वर्णन ... ३६५ ४-वषट्कार के साथ हवि के लिये देवता का निर्णय ... ३६७ ५-वषट्कार को उपयोगी बनाने का उपाय ... ३६७ ६-वाक् और प्राण और अपान ही वषट्कार हैं ... ३६६ ७-प्राण ही ऋतुयाज हैं, ऋतुयाजों में अनुवषट् न करे ... ३७१
( ३० ) कण्डिका विषय पृष्ठ ८—होता यक्षत् होता यक्षत्-इन मन्त्रों के उच्चारण का विषय ... ३७४ ६--हिङ्कार [ प्रतिध्वनि ] के उच्चारण की महिमा और प्रमाण ... ३७७ १०--प्रातःसवन, माध्यन्दिन और तृतीय सवन में विशेषता से मन्त्रों का प्रयोग ... ... ... ३८० ११--छन्दों के साथ प्रणव का सम्बन्ध और व्याख्यान ... ... ३८३ १२--एकाह यज्ञ के प्रातःसवन में प्रजापति मृत्यु को स्तोत्रों द्वारा भगांता है : ... ... ... ... ३८५ १३--प्रातःसवन में मैत्रावरुण द्वारा मित्र और वरुण की स्तुति .. ३८७ १४-प्रातःसवन में ब्राह्मणाच्छंसी द्वारा इन्द्र और सूर्य की स्तुति ... ३८६ १५--प्रातःसवन में अच्छावाक द्वारा इन्द्र और अग्नि की स्तुति ... ३६२ १६--प्रातःसवन में ( शंसावोम् ) मन्त्र को चार-चार बार बोलें : ३६४ १७ माध्यन्दिन सवन में दक्षिणा दातव्य है ... ... ३६६ १८--दक्षिणापात्र लोगों का क्रम ... ... ... ३६८ १६--दक्षिणा में दातव्य पदार्थ और उनके गुण ... ... ३६६ २०--आख्यायिका के रूप में ऋक् और साम के सम्बन्ध का वर्णन ... ४०१ २१- स्तोत्रिय आदि यज्ञाङ्गों की आत्मा आदि से सामान्यता ... ४०४ २२-स्तोत्र इत्यादि यज्ञाङ्गों की आत्मा आदि से सदृशता का अधिक विवरण ... ... ... ... ४०५ २३--माध्यन्दिन सवन के देवता इन्द्र की महिमा ... ... ४०८ प्रपाठक ४ ॥ १--एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में मैत्रावरुण के मन्त्र प्रयोग ... ४१२ २-एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के मन्त्र प्रयोग ... ४१३ ३-एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में अच्छावाक के मन्त्र प्रयोग ... ४१६ ४-एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में ( शंसावोम् ) मन्त्र को पांच बार बोलें ... ... ... ... ४१६ ५-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में पत्नीवत स्तोत्र को आग्नीध्र का चुपके चुपके जपने का कारण ... ... ... ४२१ ६-तृतीयसवन में शाकला इष्टि ... ... ... ४२२ ७-अध्वर्युं और यजमान की शुद्धि और अवभृथ स्नान ... ... ४२४ ८-वेदी पर ओषधि स्थापन और सक्तुओं से होम ... ... ४२५ ६-एकाष्टका इष्टि और दो अरणियों से अग्नि समारोपण ... ४२७ १०-अग्निष्टोम सूर्य समान है, तीनों सवनों में मन्त्र बोलने का विधान सूर्य न कभी उदय और न अस्त होता है इसका विचार - ४३०
( ३१ ) कण्डिका विषय पृष्ठ ११-आख्यायिका-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में से सायंकाल में घुसे हुये असुर लोग इन्द्र, अग्नि, वरुण, बृहस्पति और विष्णु पांच देवताओं अथवा वाक् आदि पांच इन्द्रियों करके निकाले गये ... ... ... ... ४३३ १२-आख्यायिका-प्रजापति पांच प्राणों से पांच देवताओं को उत्पन्न करता है और पांच देवता स्तुति किये जाते हैं ... ४३५ १३-उक्थ में दो इन्द्र और अग्नि की स्तुति रहते हुये बहुत देवताओं की स्तुति का विचार ... ... .. ४३६ १४-तीन ऋत्विजों के अलग अलग उक्थ और दो दो देवता वाले उक्थ हैं ... ... ... ४३६ १५-एकाह यज्ञ के तृतीयसवन के उक्थ में मैत्रावरुण ऋत्विज् के मन्त्र ... ४३७ १६-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन के उक्थ में ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज् के मन्त्र ... ... ... ... ... ४४१ १७-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन के उक्थ में अच्छावाक ऋत्विज् के मन्त्र ... ... ... ... ... ४४५ १८-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में ( शंशिसावोम् ) इस मन्त्र को चार चार बार बोलें ... ... ... ... ४४६ १६-एकाह यज्ञ में षोडशी शब्द की व्याख्या ... ... ४५१ प्रपाठक ५ ॥ १-आख्यायिका-अतिरात्र यज्ञ में से इन्द्र और छन्दों ने तीन पर्यायों में असुरों को निकाल दिया ... ... ... ४५३ २-अतिरात्र यज्ञ के तीन पर्यायों में तीन प्रकार से स्तुति ... ४५५ ३-अतिरात्र यज्ञ में पवमान आदि स्तोत्रों का विचार ... ... ४५६ ४-यज्ञ का मनुष्य के अङ्गों और ऋत्विजों का प्राणों आदि के दृष्टान्त से वर्णन ... ... ... ... ४६१ ५-यज्ञ के पर्यायों में स्तोत्रों और शस्त्रों के प्रयोग ... ... ४६३ ६-आख्यायिका-त्वष्टा का इन्द्र से सोमरस छीनना और सौत्रामणी इष्टि ... ... ... ... ४६५ ७-साम सब वेदों का रस है, सौत्रामणी यज्ञ में सामगान ... ४६७ ८-आख्यायिका-वाजपेय यज्ञ का वर्णन ... .. ४६६ ६-आख्यायिका-आप्तोर्याम यज्ञ का वर्णन ... ... ४७३ १०-आप्तोर्याम यज्ञ का अधिक वर्णन ... ... ... ४७५ ११-अनेकाहिक वा अहीन अर्थात् अनेक दिनों में होने वाले यज्ञ का वर्णन ... ... ... ... ४७७ १२-अहीन अहर्गण यज्ञ में आरम्भणीया ऋचाओं का वर्णन ... ४७८
( ३२ ) कण्डिका विषय पृष्ठ १३—अहीन वा अहर्गण यज्ञ में परिधानीया अर्थात् समाप्ति वाली ऋचाओं का वर्णन ... ... ४८१ १४—अहीन और एकाह यज्ञों में होत्रक लोगों की दो प्रकार की परि- धानीया ऋचायें ... ... ४८४ १५—यज्ञों में अच्छावाक ऋत्विज् के विशेष स्तोत्र ... ... ४८६ प्रपाठक ६ ॥ १—अहीन यज्ञ में सम्पात सूक्तों का वर्णन ... ... ४८६ २—अहीन यज्ञ में आवाप सूक्तों का वर्णन और महत्त्व ... ४६५ ३—अहीन यज्ञ में कद्वत् प्रगाथों का उपयोग और महत्त्व ... ४६६ ४—अहीन यज्ञ में विशेष मन्त्रों का प्रयोग ... ... ५०२ ५—अहीन यज्ञ की युक्ति और विमुक्ति... ... ... ५०५ ६—होताओं और होत्रक लोगों के उक्थों का वर्णन और असुरों से यज्ञ की रक्षा ... ... ... ५०७ ७—यज्ञ में उक्थों और शिल्पों का वर्णन ... ... ५११ ८—नाभानेदिष्ठ, नाराशंस, बालखिल्य, प्रगाथ, बृहती, सतोबृहती, वृषाकपि, न्यङ्ख, एवयामरुत् और याज्या विनियोग ... ५१४ ६—नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि और एवयामरुत् सहचरणों का वर्णन तथा बुडिल और गोश्रल के प्रश्नोत्तर ... ... ५१८ १०—षडह यज्ञ में पारुच्छेपी ऋचाओं का प्रयोग ... ... ५२१ ११—देवासुर सङ्ग्राम की आख्यायिका, यज्ञों में छठे दिन के कर्म ... ५२४ १२—षडह यज्ञ में स्तोत्रिय, अनुरूप, सुकीर्ति, वृषाकपि, कुन्ताप [ अथ० २० । १२७-१३६ ], रंभी, पारिक्षिती, कारव्या, दिशां- कॢप्ति और इन्द्र गाथाओं का वर्णन ... ... ... ५२७ १३—कुन्ताप सूक्तों में ऐतश प्रलाप, प्रवह्लिका, प्रतिराध, आजिज्ञा- सेन्या और अतिवाद मन्त्रों का प्रयोग ... ... ५३३ १४—कुन्ताप सूक्तों में आदित्य और आङ्गिरसी ऋचाओं अथवा देव- नीथ सूक्त का प्रयोग, आदित्यों का अङ्गिराओं को पृथिवी दक्षिणा, पृथिवी की विषमता और भूतेच्छन्द का प्रयोग ... ५३८ १५—कुन्ताप सूक्तों में आहनस्या ऋचाओं का प्रयोग ... ५४३ १६—कुन्ताप सूक्तों में दाधिक्री, पवमानी और ऐन्द्राबार्हस्पत्य ऋचाओं का प्रयोग, षडह यज्ञ की समाप्ति ... ... ५४६ क्षेमकरणदास त्रिवेदी ५२ लूकरगंज, प्रयाग मार्गशीर्ष शुक्ला २ सं० १६८१ वि० ता० २८ नवम्बर १६२४ ॥
कण्डिका १
ओ३म् अथर्ववेदस्य गोपथब्राह्मणम् पूर्व-भागः ─::o::─ प्रथमः प्रपाठकः कण्डिका १ ओ३म् ब्रह्म ह वा इदमग्र आसीत्, स्वयन्त्वेकमेव तदैक्षत, महद्वै यक्षं, तदेकमेवास्मि, हन्ताहं मदेव मन्मात्रं द्वितीयं देवं निर्मम इति, तदभ्यश्राम्यदभ्य- तपत् समतपत्, तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य ललाटे स्नेहो यदार्द्रमोजा- यत तेनानन्दत्तमब्रवीत् महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति । तद्यदब्रवीत् महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति, तस्मात् सुवेदोऽभवत्तं वा एतं सुवेदं सन्तं स्वेद इत्या- चक्षते । परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः ॥ १ ॥ कण्डिका १ । ब्रह्म और सृष्टि की इच्छा ।। (ओ३म् ब्रह्म ह वै इदमग्रे आसीत्) ओ३म् [रक्षक परमात्मा है] ब्रह्म [सबसे बड़ा परमात्मा ] ही निश्चय करके इस [ जगत् ] के पहिले था । ( स्वयम् तु एकम् एव तत् ऐक्षत ) और अपने को अकेला ही उसने देखा ( महत् वै यक्षम्, तत् एकम् एव अस्मि ) मैं बड़ा ही पूजनीय हूँ, सो मैं अकेला ही हूं। ( हन्त अहम् मत् एव मन्मात्रं द्वितीयं देवं निर्ममे इति ) अरे ! मैं अपने से ही अपने समान दूसरा देव [दिव्य पदार्थ] बनाऊं । ( तत् अभि अश्राम्यत् अभि अतपत् सम् अतपत् ) उसने सब ओर से श्रम किया, सब ओर से तप किया, भली भांति तप किया। (तस्य श्रान्तस्य सन्तप्तस्य ललाटे स्नेहः यत् आर्द्रम् आ-अजायत ) उस श्रम किये हुए, तपे हुये, भली भांति तपे हुये के ललाट पर चिकना द्रव्य, जो गीलापन है, सब ओर से प्रकट हुआ । ( तेन अनन्दत् ) १- ओ३म्-अवतेष्टिलोपश्च (उ० १ । १४२) अव रक्षणादौ-मन्, टिलोपः । अथवा अः = विराडादिः, उः = हिरण्यगर्भादिः, मकारः = ईश्वरादिः । हे रक्षक ! परमेश्वरस्य सर्वोत्तमनाम । आरम्भः । अनुमतिः । ब्रह्म-वृंहेर्नोऽच्च (उ० ४ । १४६) बृंहि वृद्धौ-मनिन्, नकारस्य अकारः रत्वं च । ब्रह्म परिवृढं सर्वतः (निरु० १ । ८) सर्ववृद्धः परमेश्वरः (ह) निश्चयेन (वै) एव (इदमग्रे) अस्य जगतः पूर्वम्-प्रलयकाले (ऐक्षत) ईक्ष दर्शने-लङ् । अपश्यत् (यक्षम्) यक्ष पूजा-
कण्डिका २
२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० १ ॥ उससे वह प्रसन्न हुआ, (तम् अब्रवीत्) और उस [चिकने द्रव्य] से बोला--(महत् वै यक्षम् सुवेदम् अविदामहे इति) मैं बड़ा ही पूजनीय हूं, [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] को हमने जाना है (तत् यत् अब्रवीत्) वह जो उसने कहा-(महत् वै यक्षम् सुवेदम् अविदामहे इति) मैं बड़ा ही पूजनीय हूं सुवेद [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] को हमने जाना है-(तस्मात् सुवेदः अभवत्) इसलिये वह सुवेद [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] हुआ। (तम् वै) उस ही (एतम् सुवेदम् सन्तम्) इस सुवेद [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] होते हुये को (स्वेदः इति आचक्षते) स्वेद [पसीना] कहते हैं। (परोक्षेण) परोक्ष [आंख ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि) परोक्षप्रिय [आंख ओट भविष्य के प्रेमी] लोगों के समान ही (देवाः) देवता [विद्वान् लोग] (प्रत्यक्षद्विषः) प्रत्यक्ष [वर्त्तमान अवस्था] के द्वेषी [विरोधी] (भवन्ति) होते हैं [अर्थात् दूरदर्शी लोग ब्रह्म के नियमों को विचार कर, क्षणभङ्गुर वर्त्तमान को छोड़कर आगे को सुधार करके उन्नति करते हैं। योग दर्शन पाद २ सूत्र १६ में कहा है--हेयं दुःखमनागतम्--न आया हुआ अर्थात् आगे का दुःख छोड़ने योग्य है] ॥ १ ॥ भावार्थः-ऋषि लोग विचारते हैं कि प्रलय में भी वर्त्तमान अविनाशी ब्रह्म सृष्टि करने के लिए अपना ज्ञान प्रकट करता है ॥ १ ॥ विशेषः--(सुवेद और अविदामहे) पदों में यह समता मानी है कि दोनों पद एक ही धातु [विद-ज्ञाने] से बने हैं, स्वेद शब्द ष्ष्विदा गात्रप्रसरणे घञ् से पसीना अर्थ में बनता है किन्तु यहां (सुवेद) को ही स्वेद) पसीना माना है ॥ कण्डिका २ स भूयोऽश्राम्यद् भूयोऽतप्यत् भूय आत्मानं समतपत्तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य सर्वेभ्यो रोमगत्तेंभ्यः पृथक् स्वेदधाराः प्रास्यन्दन्त। ताभिरनन्दत्, याम्-घञ् । पूजनीयम् (हन्त) हर्षे, खेदे (मत्) मत्संकाशात् । आत्मनः (मन्मात्रम्) प्रमाणे द्वयसज्दघ्नञ्मात्रचः (पा० ५।२।३७) मत्-मात्रच् । आत्मसदृशम् (निर्ममे) माङ् माने-लडर्थे लिट् । रचयामि । (ललाटे) लल ईप्सायाम्-अच् + अट गतौ-अण् । ललम् = ईप्साम् अटति ज्ञापयतीति ललाटम् । कपाले (स्नेहः) ष्णिह प्रीतो स्नेहने च-घञ् । तैलादिरसः । स्निग्धता (आर्द्रम्) आर्द्र-ण्यञ् । सजलत्वम् (तम्) स्नेहम् (सुवेदम्) विद ज्ञाने-खल् । सुखेन ज्ञेयम् । (अविदामहे) विद ज्ञाने विदॢ लाभे वा-लङ्, छान्दसं रूपम् । वयं ज्ञातवन्तः । वयं लब्धवन्तः (स्वेदः) ष्ष्विदा गात्रप्रसरणे-घञ् । घर्मः, प्रस्रवणम् । अत्र तु सुवेद एव स्वेदः आचक्षते । चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि-लट् । समन्तात् कथ- यन्ति परोक्षेण-परोक्षे लिङ् (पा० ३।२।११५) इति निर्देशाद् परस्योकारः । अप्रत्यक्षेण प्रलये वर्त्तमानेन ब्रह्मणा (परोक्षप्रियाः) परोक्षे भविष्ये रुचिराः (इव) यथा (देवाः) विद्वांसः (प्रत्यक्षद्विषः) वर्त्तमानावस्थाविरोधिनः ॥
कण्डिका २ ।। ब्रह्म के रोमों से पसीने की धारायें और
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २ ।। ३ तदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वं धारयिष्यामि यदिदं किञ्चाभिर्वा अहमिदं सर्वं जनयिष्यामि यदिदं किञ्चाभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किञ्चेति । तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वं धारयिष्यामि यदिदं किञ्चेति, तस्मात् धारा अभवंस्तद् धाराणां धारात्वं यच्चासु ध्रियते । तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वं जनयिष्यामि यदिदं किञ्चेति, तस्माज्जाया अभवंस्तज्जायानां जायात्वं यच्चासु पुरुषो जायते, यच्च पुत्रः पुन्नामनरकमनेकशततारं तस्मात् त्राति पुत्रस्तत् पुत्रस्य पुत्रत्वम् । तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किञ्चेति तस्मादापा अभवंस्तदपामप्त्वामाप्नोति वै स सर्वान् कामान् यान् कामयते ॥ २ ॥ कण्डिका २ ।। ब्रह्म के रोमों से पसीने की धारायें और सृष्टि की इच्छा ॥ ( सः भूयः अश्राम्यत् ) उस [ परमात्मा ] ने फिर श्रम किया, ( भूयः अतप्यत् ) फिर तप किया ( भूयः आत्मानं समतपत् ) और फिर अपने को भली भांति तपाया । ( तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य ) उस श्रम किये हुए, तपे हुए, भली भांति तपे हुये [ परमात्मा ] के ( सर्वेभ्यः रोमगर्तेभ्यः ) सब रोम कूपों से ( पृथक् स्वेदधाराः ) अलग अलग पसीने की धारायें ( प्र अस्यन्दन्त ) बहने लगीं । ( ताभिः अनन्दत् ) उनसे वह प्रसन्न हुआ ( तत् अब्रवीत् ) तब वह बोला— ( आभिः वै अहम् इदं सर्वं धारयिष्यामि यत् इदं किञ्च ) इन [ पसीने की धाराओं ] से ही मैं इस सबको धारण करूँगा, यह जो कुछ भी [ होगा ] ( आभिः वै अहम् इदं सर्वं जनयिष्यामि यत् इदम् किञ्च ) इनसे ही मैं इस सब को उत्पन्न करूँगा, यह जो कुछ भी [ होगा ] ( आभिः वै अहम् इदम् सर्वम् आप्स्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इनसे ही मैं इस सबमें व्यापूंगा यह जो कुछ भी [ होगा ] । ( तत् यत् अब्रवीत् ) वह जो उसने कहा—( आभिः वै अहम् इदं सर्वं धारयिष्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इन [ पसीने की धाराओं ] से ही मैं इस सबको धारण करूंगा, यह जो कुछ भी [ होगा ] ( तस्मात् धाराः अभवन् ) उसी से वे धारायें [धारण शक्तियां] २—सः । परमात्मा । ब्रह्म भूयः । भू+यसु प्रयत्न—विवप्, भुवे भावाय यस्यति यतत इति¹ । पुनः (अस्यन्दन्त) स्यन्दू प्रस्स्रवणे—लङ् । अस्रवन् (आभिः) स्वेदधाराभिः ( धारयिष्यामि ) धृञ् धारणे—लृट् । स्थापयिष्यामि (किंच ) किमपि ( जनयिष्यामि ) जन जनने, जनी प्रादुर्भावे वा—लृट् उत्पादयिष्यामि (आप्स्यामि) आप्लृ व्याप्तौ—लृट् । व्याप्स्यामि । ( इति ) वाक्यसमाप्तौ । धाराः । धृञ् धारणे—णिच् -- अङ् । प्रवाहसन्ततयः । धारणशक्तयः ( धारात्वम् ) १. वस्तुतः व्याकरण के नियमानुसार बहु शब्द से अतिशय में ईयसुन् प्रत्यय होकर बहोलोंपो भू च बहोः (पा० ६ । ४ । १५८ ) सूत्र के अनुसार बहु को भू आदेश तथा प्रत्यय के आदि 'ई' का लोप होकर नपुंसकलिङ्ग में भूय शब्द की सिद्धि समीचीन प्रतीत होती है ।। सम्पा० ।।
४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २ ॥ हुईं । ( तत् च धाराणां धारात्वं यत् आसु ध्रियते ) और वह धाराओं का धारापन [ धारण सामर्थ्य ] है जो इन सब में धरा गया है ( तत् यत् अब्रवीत् ) वह जो उसने कहा—( आभिः वै अहम् इदं सर्वं जनयिष्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इनसे ही मैं इन सब को उत्पन्न करूंगा यह जो कुछ भी [होगा ] ( तस्मात् जायाः अभवन् ) उससे वे [ पसीने की धारायें ] जायायें [ माताओं समान उत्पन्न करने वाली शक्तियां ] हुईं, ( तत् च जायानां जायात्वं यत् आसु पुरुषः जायते ) और वह जायाओं का जायापन [ उत्पादन सामर्थ्य ] है जो इनमें पुरुष [जीव] उत्पन्न होता है, (यत् च पुत्रः) और जो पुत्र [ संतान वा जीव ] होता है । ( पुत् नाम नरकम् ) पुत् [ जिस अवस्था में पापी लोग जाते हैं ] नाम वाला नरक ( अनेकशततारम् ) अनेक सैकड़ों दबाव वाला है, ( तस्मात् पुत्रः त्राति ) उस [नरक] से पुत्र बचाता है, (तत् पुत्रस्य पुत्रत्वम्) वह पुत्र का पुत्रपन [ नरक से बचाना ] है । ( तत् यत् अब्रवीत् ) वह जो उसने कहा —( आभिः वै अहम् इदं सर्वम् आप्स्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इन [ पसीने की धाराओं ] से ही मैं इस सबमें व्यापूंगा यह जो कुछ भी [ होगा ]--( तस्मात् आपः अभवन् ) उससे वे आप् [ व्यापक जल ] हुये, ( तत् अपाम् अप्त्वम् ) वह जलों का जलपन [ व्यापकपन ] है । ( सः वै सर्वान् कामान् आप्नोति यान् कामयते ) वह अवश्य सब कामनायें पाता है जिन्हें वह चाहता है [जो ऐसा विद्वान् है-देखो कण्डिका ३, ४ ] ॥ २ ॥ भावार्थः- जगत् की उत्पत्ति से ब्रह्म के पसीने की तीन अवस्थायें मानी हैं, एक धारण सामर्थ्य, दूसरी उत्पादन सामर्थ्य और तीसरी ब्यापन सामर्थ्य ॥ २ ॥ विशेषः- १ इस कण्डिका के इन पदों में समता मानी है, धारयिष्यामि तथा धाराः ) दोनों पद धृञ् धारणे से, (जनयिष्यामि तथा जायाः) जन वा जनी जनने से और ( आप्स्यामि तथा आपः ) आप्लृ व्याप्तौ, प्राप्तौ से बने हैं ।। विशेषः-२ यहां कण्डिका १-२ का मिलान करो- "हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम" ।। हिरण्यगर्भ, तेज वाले लोकों का आधार, पहिले ही वर्तमान था, वही प्रकट होकर पृथिवी आदि पंचभूत का एक पति हुआ, उसने पृथिवी और सूर्य को धारण किया, उस सुखदायक प्रजापति की दिव्य गुण के लिए भक्ति के साथ हम सेवा करें--अथर्व० ४ । २ । ७ । ( आपो वत्सं धारणसामर्थ्यम् ( ध्रियते ) स्थाप्यते जायाः- जनेर्यक् ( उ० ४ । १११ ) जन जनने-यक् । मातृसदृश्य उत्पादनशक्तयः । पुरुषः । पुरः कुषन् ( उ० ४ । ७४ ) पुरः- अग्रगमने-कुषन् । जीवः । पुत्रः । पुवो ह्रस्वश्च ( उ० । ४ । १६५ ) पूञ् पवने-क्त्रः, धातोर्ह्रस्वत्वम्, अथवा पुत्+त्रैङ् पालने-कः । पुत्रः पुन्न त्रायते निपरणाद्वा पुन्नरकं ततस्त्रायत इति वा-निरु० २ । ११ । सन्तानः । जीवः (पुत्) पुत पुत्त गतौ-क्विप् । गच्छन्ति पापिनो यत्र नरकम् । नरकम् । कॄनादिभ्यः संज्ञायां बुन् ( उ० ५ । ३५ ) नॄ नये-वुन् । दुःखभोगावस्थाभेदः । ( अनेकशततारम् ) तॄ प्लवनसं तरणयोः स्वार्थे णिच्-घञ् बहुविधाभिभवयुक्तम् । त्राति । त्रायते
कण्डिका ३ ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३ ॥ ५ जनयन्तीर्गर्भमग्रे समैरयन् । तस्योत जायमानस्योल्व आसीद्धिरण्मयः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥) पहिले ही पहिले बालक रूप संसार को उत्पन्न करती हुई जल धाराओं ने गर्भ, बालक रूप संसार को यथावत् प्रकट किया और उस उत्पन्न होते हुए जो [बालक, संसार] का जरायु [ गर्भ की झिल्ली ] तेजोमय परमात्मा था, उस सुखदायक प्रजापति को दिव्य गुण के लिये भक्ति के साथ हम सेवा करें-अथर्व० ४ । २ । ८ ॥ कण्डिका ३ ॥ ता अपः सृष्ट्वाऽन्वक्षत, तासू स्वां छायामपश्यत् तामस्येक्षमाणस्य स्वयं रेतोऽस्कन्दत्तदप्सु प्रत्यतिष्ठत् तास्तत्रैवाभ्यश्राम्यदभ्यतपत्, समतपत्, ताः श्रान्ता- स्तप्ताः सन्तप्ताः सार्द्धमेव रेतसा द्वैधमभवंस्तासामन्या अन्यतरा अतिलवणा अपेया अस्वाद्व्यस्ता अशान्ता रेतः समुद्रं वृत्वाऽतिष्ठन्नथेतराः पेयाः स्वाद्व्यः शान्तास्तास्तत्रैवाभ्यश्राम्यदभ्यतपत्, समतपत्, ताभ्यः श्रान्ताभ्यस्तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यो यद्रेत आसीत्तदभृज्यत, यदभृज्यत तस्माद् भृगुः समभवत्, तद् भृगो- र्भृगुत्वं भृगुरिव वै स सर्वेषु लोकेषु भांति य एवं वेद ॥ ३ ॥ कण्डिका ३ । ब्रह्म के बीज का जल में गिरना, समुद्र और भृगु की उत्पत्ति ॥ ( ताः अपः सृष्ट्वा अनु ऐक्षत ) उन जलों को उत्पन्न करके उसने फिर देखा, ( तासु स्वां छायाम् अपश्यत् ) उनमें अपनी छाया [ कान्ति, तेज ] को देखा । ( ताम् ईक्षमाणस्य अस्य ) उस [ छाया ] को देखते हुये इस [ ब्रह्म ] का ( रेतः स्वयम् अस्कन्दत् ) बीज अपने आप टपका ( तत् अप्सु प्रति अतिष्ठत्) और वह जलों में ठहर गया । ( ताः तत्र एव अभि अश्राम्यत् ) उनको वहां ही उसने सब ओर से श्रम दिया [ दबाया ], ( अभि अतपत् ) सब ओर से तपाया, ( सम् अतपत् ) भली भांति तपाया । ( ताः श्रान्ताः तप्ताः सन्तप्ताः ) वे दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [ जल] ( रेतसा सार्द्धम् एव ) बीज के साथ ही ( द्वैधम् अभवन् ) दो प्रकार से हो गये । ( तासाम् अन्याः अन्यतराः ) उनमें से कोई, दोनों में से कोई एक [ जलधारायें ] ( अतिलवणाः ) अति खारी ( अपेयाः ) न पीने योग्य और ( अस्वाद्व्यः ) अरोचक थीं, ( ताः अशान्ताः रेतः ) वे अशान्त बीज [ होती हुयी ] ( समुद्र वृत्वा ) समुद्र [ परमात्मा] को स्वीकार करके ( अतिष्ठन् ) ठहरीं [ देखो कण्डिका ७] । ( अथ ( आपः ) आप्नोतेर्ह्रस्वश्च ( उ० २ । ५८ ) आप्लृ व्याप्तौ-क्विप्, जसि दीर्घः । व्यापनशक्तयः । जलानि ॥ ३-( अपः ) जलानि ( छायाम् ) माछाशसिभ्यो यः ( उ० । ४ । १०६ ) छो छेदने-यप्रत्ययः । प्रकाशावरणम् । कान्तिम् । प्रतिविम्बम् ( अस्य ) ब्रह्मणः ( ईक्षमाणस्य ) पश्यतः ( रेतः ) बीजम् ( अस्कन्दत् ) अक्षरत ( द्वैधम् ) द्वित्र्योश्च धमुञ् ( पां० ५ । ३ । ४५ ) द्वि-धमुञ् । द्विविधम् ( अस्वाद्व्यः ) अरुचिकराः ( समुद्रम् ) सम् + उत् + दु-डप्रत्ययः । समुद्र आदित्यः, समुद्र आत्मा-
६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३ ॥ इतराः) और दूसरी [ जलधारायें ] ( पेयाः ) पीने योग्य, (स्वाद्व्यः) रोचक और (शान्ताः) शान्त थीं, (ताः तत्र एव अभि अश्राम्यत्) उनको वहाँ ही उसने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से तपाया, (सम् अतपत्) भली भाँति तपाया। (ताभ्यः शान्ताभ्यः तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यः) उन दबाई हुई, तपाई हुई, भली भाँति तपाई हुई [ जल धाराओं ] से ( यत् रेतः आसीत् ) जो बीज हुआ, (तत् अभृज्यत) वह पक गया [ अथवा चमक उठा ] । ( यत् अभृज्यत ) जो वह पक गया [वा चमक उठा], (तस्मात्) उससे (भृगुः) वह भृगु [भर्ग वाला अर्थात् चमकीला तत्त्व विशेष ] ( सम् अभवत् ) उत्पन्न हुआ, (तत्) वह (भृगोः) भृगु का (भृगुत्वम्) भृगुपन [पक्वपन वा चमकीलापन] हैं। (भृगुः इव वै) भृगु के समान ही (सः सर्वेषु लोकेषु भाति) वह सब लोकों [जीवों] में चमकता है, (यः एवं वेद) जो ऐसा विद्वान् है ॥ ३ ॥ भावार्थः-ब्रह्म ने जल रूप तत्त्व के दो रूप किये एक अतिसूक्ष्म परमाणु रूप जिसको हम ग्रहण नहीं कर सकते, और दूसरा स्थूल रूप प्रकाश आदि ॥ विशेषः-१ अभृज्यत तथा भृगुः दोनों पद भ्रस्ज पाके दीप्तौ च इस एक ही धातु से बने हैं यह दोनों में समता है ॥ विशेषः-२ मनु महाराज म० १ श्लोक ८, ६, १२, १३ में ऐसा कहते हैं-सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ ८ ॥ तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ ६ ॥ तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवात्मनो ध्यानादण्डमकरोद् द्विधा ॥ १२ ॥ ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे । मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् ॥ १३ ॥ उस [ परमात्मा ] ने अपने शरीर से अनेक प्रजावें उत्पन्न करने की इच्छा करते हुए सब ओर से ध्यान करके अप् [ जल तत्त्व ] को पहिले उत्पन्न किया और उसमें बीज छोड़ दिया ॥ ८ ॥ वह [ बीज ] सूर्य के समान प्रकाशवाला चमकीला अण्डा हो गया, उस अण्डे में सब लोगों का पितामह ब्रह्मा [ परमात्मा ] अपने आप प्रकट हुआ ॥ ६ ॥ उस अण्डे में उस भगवान् [ ऐश्वर्य्यवान् परमात्मा ] ने वर्ष भर रह कर अपने आप ही अपने ध्यान से उस अण्डे को दो टुकड़े कर दिया ॥ १२ ॥ उस [ परमात्मा ] ने उन दो टुकड़ों से सूर्य और पृथिवी, बीच में आकाश, आठ दिशाओं और जलों के निश्चय स्थायी स्थान को बनाया ॥ १३ ॥ निरु० १४ । १६ । परमात्मानम् । जलौघम् (वृत्वा) स्वीकृत्य (अभृज्यत) भ्रस्ज पाके लङ् । पक्वमभवत् । अदीप्यत (भृगुः) प्रथिम्रदिभ्रस्जो सम्प्रसारणं सलोपश्च (उ० १ । २७) भ्रस्ज पाके च-कुः, सम्प्रसारणं सलोपो न्यङ्क्वादित्वात् कुत्वं च । भृगवः, मध्यस्थानीदेवताः-निरु० ११ । १९ । भर्गयुक्तः । परिपक्वः । तेजस्वी । परमात्मरूपम् (वेद) विद ज्ञाने-लट् । वेत्ति । जानाति ॥
कण्डिका ४
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ४ ॥ ७ कण्डिका ४ स भृगुं सृष्ट्वाऽन्तरधीयत, स भृगुः सृष्टः प्राङेजत् तं वागन्ववदद्वायो वायो इति, स न्यवर्त्तत, स दक्षिणां दिशमेजत् तं वागन्ववदत् मातरिश्वन् मातरिश्वन्निति, स न्यवर्त्तत स प्रतीचीं दिशमेजत् तं वागन्ववदत् पवमानः पवमान इति, स न्यवर्त्तत स उदीचीन्दिशमेजत् तं वागन्ववदद्वात वातेति तमब्रवीन्नन्व- विदामह इति, नहीत्यथार्वाडेनेमेतास्वेवाप्स्वान्विच्छेति तद्यदब्रवोदथार्वाडेनेमेता- स्वेवाप्स्वान्विच्छेति तदथर्वाऽभवत्, तदथर्वणोऽथर्वत्वम्। तस्य ह वा एतस्य भगवतोऽथर्वण ऋषेर्यथैव ब्रह्मणो लोमानि यथाऽङ्गानि यथा प्राण एवमेवास्य सर्वं आत्मा समभवत्तमथर्वाणं ब्रह्माऽब्रवीत् प्रजापतेः प्रजाः सृष्ट्वा पालयस्वेति। तद्यदब्रवीत् प्रजापतेः प्रजाः सृष्ट्वा पालयस्वेति, तस्मात् प्रजापतिरभवत्, तत् प्रजापतेः प्रजापतित्वमथर्वा वै प्रजापतिः, प्रजापतिरिव वै स सर्व्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४ ॥ कण्डिका ४ । अथर्वा और प्रजापति ॥ ( स भृगुं सृष्ट्वा अन्तर् अधीयत ) वह [ परमात्मा ] भृगु [ पकाने वाले वा चमकीले तत्त्व ] को उत्पन्न करके अन्तर्धान हो गया । ( सः भृगुः सृष्टः प्राङ् एजत = ऐजत ) वह भृगु उत्पन्न होकर पूर्व को चला । (तं वाक् अनु अवदत् ) उस से वाणी [ वेद वाणी ] कहने लगी - ( वायो वायो इति ) हे वायु ! वायु ! [ चलनेवाले पवन ] । ( स न्यवर्तत ) वह लोटा । ( स दक्षिणां दिशम् एजत ) वह दक्षिण दिशा को चला । ( तं वाक् अनु अवदत् ) उससे वाणी कहने लगी - ( मातरिश्वन् मातरिश्वन् इति ) हे मातरिश्वन् ! हे मातरिश्वन् ! [ आकाश में बढ़ने वाले पवन ] । ( स न्यवर्तत ) वह लौटा । ( स प्रतीचीं दिशम् एजत ) वह पश्चिम दिशा को चला । (तं वाक् अनु अवदत् ) उससे वाणी कहने लगी-( पवमानः पवमान इति ) हे पवमान ! पवमान [ शोधने वाले पवन ] । ( सः न्यवर्तत ) वह लोटा । ( स उदीचीं दिशम् एजत ) वह उत्तर दिशा को चला । ( तं वाक् अनु अवदत् ) उससे वाणी कहने लगी ( वात वात इति ) हे वात ! वात ! [ सेवनीय पवन ] । ( तम् = ताम् ) उस [ वाणी ] से ( अब्रवीत् ) वह बोला ( ननु अविदामहे इति ) क्या [ उस परमात्मा को ] हमने जाना है ? [ वाणी ने कहा ] ४-( अन्तरधीयत) अन्तर् + डुधाञ् धारणपोषणयोः कर्मणि लङ् । अन्त- हितोऽदृष्टोऽभवत् ( प्राङ् ) प्र + अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन् । पूर्वस्यां दिशि । ( एजत ) एजृ कम्पने-लङ् । बहुलं छन्दस्यमाङ्योगेऽपि ( पा० ६ । ४ । ७५ ) आडभावः । अकम्पत । अगच्छत् । ( वाक् ) वेदवाणी ( अनु ) अनन्तरम् ( वायो ) कृवापाजिमि० ( उ० १ । १ । १) वा गतिगन्धनयोः-उण् युक् च । हे गतिशील पवन ( मातरिश्वन् ) श्वन्नुक्षन्पूषन्० ( उ० १ । १५६ ) मातरि + टुओश्वि गति- वृद्धयोः, श्वस प्राणने, शीङ् स्वप्ने वा-कनिन् । मातरिश्वा वायुर्मातर्यन्तरिक्षे श्वसिति मातर्यश्वनितीति वा - निरु० ७ । २६ । मातरि मानकर्तरि आकाशे हे वृद्धिशील