भारतकोश
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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

११२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८४- 'क्षुद्रशत्रुर्भवेद्यस्तु विक्रमान्नैव लभ्यते । तमाहन्तुं पुरस्कार्यः सदृशस्तस्य सैनिकः' ॥ ८४ ॥ 'जो छोटा शत्रु हो और पराक्रमसेभी न मिले तो उसको मारनेके लिये उसके (चाल और बलसे) समान घातक उसके आगे कर देना चाहिये' ॥८४॥ इत्यालोच्य तेन ग्रामं गत्वा विश्वासं कृत्वा दधिकर्णनामा बिडा- लो यत्नेनानीय मांसाहारं दत्त्वा स्वकन्दरे स्थापितः । अनन्तरं तद्भयान्मूषिकोऽपि बिलान्न निःसरति । तेनासौ सिंहोऽक्षत- केसरः सुखं स्वपिति । मूषिकशब्दं यदा यदा शृणोति तदा तदा मांसाहारदानेन तं बिडालं संवर्धयति । यह विचार कर उसने गांवमें जा और भरोसा दे कर दधिकर्ण नाम बिलावको यत्नसे ला मांसका आहार दे कर अपनी गुहामें रख लिया । पीछे उसके भयसे चूहाभी बिलसे नहीं निकलने लगा—कि जिससे यह सिंह बालोंके नहीं कटनेके कारण सुखसे सोने लगा । जब जब चूहेका शब्द सुनता था तब तब मांसके आहारसे उस बिलावको तृप्त करता था ॥ अथैकदा स मूषिकः क्षुधापीडितो बहिः संचरन्बिडालेन प्राप्तो व्यापादितश्च । अनन्तरं स सिंहोऽनेककालं यावन्मूषिकं न पश्यति तत्कृतरावमपि न शृणोति तदा तस्यानुपयोगाद्विडाल- स्याप्याहारदाने मन्दादरो बभूव । ततोऽसावाहारविहारविरहा- दुर्बलो दधिकर्णोऽवसन्नो बभूव । अतोऽहं ब्रवीमि—“निरपेक्षी न कर्तव्यः” इत्यादि' ॥ ततो दमनककरटकौ संजीवकसमीपं गतौ । तत्र करटकस्तरुतले साटोपमुपविष्टः । फिर एक दिन भूखके मारे बाहर फिरते हुए उस चूहेको बिलावने पकड़ लिया और मार डाला । पीछे उस सिंहने बहुत काल तक जब चूहेको न देखा और उसका शब्दभी न सुना तब उसके उपयोगी न होनेसे बिलावके भोजन देनेमेंभी कम आदर करने लगा । फिर, वह दधिकर्ण आहारविहारसे दुर्बल हो कर मर गया । इसलिये मैं कहता हूं-“अपेक्षा रहित नहीं करना चाहिये” इत्यादि'. इसके अनन्तर दमनक और करटक दोनों संजीवकके पास गये । वहां करटक पेड़के नीचे बड़े अहंकारसे बैठ गया ।

-८६] प्रधानकी चालसे राजा और बेलकी तत्परता ११३ दमनकः संजीवकसमीपं गत्वाऽब्रवीत्—'अरे वृषभ ! एषोऽहं राज्ञा पिङ्गलकेनारण्यरक्षार्थं नियुक्तः । सेनापतिः करटकः समाज्ञापयति-‘‘सत्वरमागच्छ । न चेदस्मादरण्याद्दूरमपसर; अन्यथा ते विरुद्धं फलं भविष्यति ।” न जाने क्रुद्धः स्वामी किं विधास्यति ।' तच्छ्रुत्वा संजीवकश्चायात् । दमनक संजीवकके पास जा कर बोला—‘अरे बेल ! ये मैं वह हूं कि जिसको राजा पिंगलकने वनकी रखवालीके लिये नियुक्त किया है. सेनापति करटक तुझे आज्ञा करता है कि “शीघ्र आ; जो न आवे तो हमारे बनसे दूर चला जा । नहीं तो तेरेलिये बुरा फल होगा”, न जाने क्रोधी स्वामी क्या कर डाले’. यह सुन कर संजीवकभी साथ आया. आज्ञाभङ्गो नरेन्द्राणां ब्राह्मणानामनादरः । पृथक्शय्या च नारीणामशस्त्रविहितो वधः ॥ ८५ ॥ राजाकी आज्ञाका भंग, ब्राह्मणोंका अनादर, स्त्रियोंकी अलग शय्या रखना, इनको विना शस्त्रसे वध ( मृत्यु ) कहते हैं ॥ ८५ ॥ ततो देशव्यवहारानभिज्ञः संजीवकः सभयमुपसृत्य साष्टाङ्गपातं करटकं प्रणतवान् । फिर, देशकी रीतिको नहीं जानने वाले संजीवकने डरते डरते पास जा कर करटकको साष्टांग प्रणाम किया; तथा चोक्तम्,— मतिरेव बलाद्गरीयसी यदभावे करिणामियं दशा । इति घोषयतीव डिण्डिमः करिणो हस्तिपकाहतः क्वणन् ॥ ८६ ॥ जैसा कहा है—बलसे बुद्धि अधिक बड़ी है कि जिस बुद्धिके न होनेसे हाथियोंकी ऐसी दशा होती है, अर्थात् बली होने पर भी मतिहीन होनेसे पराधीन हो जाते हैं; यही बात मानों हाथीवान्‌से बजाया गया हाथीका नगाड़ा शब्द करके कहता है ॥ ८६ ॥ हि० ८

११४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८७- अथ संजीवकः साशङ्कमाह—'सेनापते ! किं मया कर्तव्यम् ? तदभिधीयताम् ।' करटको ब्रूते—'वृषभ ! अत्र कानने तिष्ठसि । अस्मद्देवपादारविन्दं प्रणम ।' संजीवको ब्रूते—'तदभयवाचं मे यच्छ, गच्छामि ।' करटको ब्रूते—'शृणु रे बलीवर्द ! अलमनया शङ्कया । फिर संजीवक शंकासे बोला—'हे सेनापति ! मुझे क्या करना चाहिये ? सो कहिये ।' करटक ने कहा—'हे बैल ! इस बनमें ठहरते हो, सो हमारे महाराजके चरणकमलोंको प्रणाम करो'। संजीवक बोला—'मुझे अभय वचन दो; मैं चलूं ।' यह सुन करटक बोला—'सुन रे बैल ! ऐसी दुबिधा मत कर; यतः,— प्रतिवाचमदत्त केशवः शपमानाय न चेदिभूभुजे । अनुहुंकुरुते घनध्वनिं न हि गोमायुरुतानि केसरी ॥ ८७ ॥ श्रीकृष्णने गाली देते हुए चंदेरीके राजा शिशुपालको दुहराके उत्तर नहीं दिया, क्योंकि सिंह मेघकी गर्जनाको सुन कर हुंकार कर गर्जता है, न कि सियारके चिल्लानेको सुनके ॥ ८७ ॥ अन्यच्च,— तृणानि नोन्मूलयति प्रभञ्जनो मृदूनि नीचैः प्रणतानि सर्वतः । समुच्छ्रितानेव तरून्प्रबाधते महान् महत्येव करोति विक्रमम्' ॥ ८८ ॥ और भी देख-आंधी चारों ओरसे झुके हुए तथा कोमल और छोटे छोटे पौदोंको नहीं उखाड़ती है, पर बड़े बड़े जुग्गादी पेड़ोंको जड़से गिरा देती है, क्योंकि बड़ा बड़ेही पर विक्रम करता ( दिखाता ) है' ॥ ८८ ॥ ततस्तौ संजीवकं कियद्दूरे संस्थाप्य पिङ्गलकसमीपं गतौ । फिर वे दोनों संजीवकको थोड़ी दूर पर ठहरा कर पिंगलकके पास गये ॥

-८९ ] धैर्यशील बननेके विषयमें कुटनीकी कहानी ११५-

-८९ ] धैर्यशील बननेके विषयमें कुटनीकी कहानी ११५- ततो राज्ञा सादरमवलोकितौ प्रणम्योपविष्टौ । राजाह-'त्वया स दृष्टः ?' । दमनको ब्रूते—'देव ! दृष्टः । किंतु यद्देवेन ज्ञातं तत्तथा । महानेवासौ देवं द्रष्टुमिच्छति । किंतु महाबलोऽसौ, ततः सजीभूयोपविश्य दृश्यताम् । शब्दमात्रादेव न भेतव्यम् । राजाने उन दोनोंको आदरसे देखा और वे दोनों प्रणाम करके बैठ गये । फिर राजा बोला—'तुमने उसे देखा ? दमनकने कहा-'महाराज ! देखा; परन्तु जैसा महाराजने समझा था वैसाही है । बड़ा है, महाराजके दर्शन करना चाहता है । परन्तु वह बड़ा बलवान् है । इसलिये सावधान हो बैठ कर देखिये । केवल शब्दसेही नहीं डरना चाहिये । तथा चोक्तम्, — शब्दमात्रान्न भेतव्यमज्ञात्वा शब्दकारणम् । शब्दहेतुं परिज्ञाय कुट्टनी गौरवं गता' ॥ ८९ ॥ जैसा कहा है—शब्दका कारण बिना जाने केवल शब्दसेही नहीं डरना चाहिये । जैसे शब्दका कारण जानकर कुटनीने आदर पाया' ॥ ८९ ॥ राजाह—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' दमनक कहने लगा ।— कथा ५ [ बन्दर, घंटा और कराला नामक कुटनीकी कहानी ५ ] 'अस्ति श्रीपर्वतमध्ये ब्रह्मपुराख्यं नगरम् । तच्छिखरप्रदेशे घण्टाकर्णो नाम राक्षसः प्रतिवसतीति जनप्रवादः श्रूयते । एकदा घण्टामादाय पलायमानः कश्चिच्चौरो व्याघ्रेण व्यापादितः । तत्पाणिपतिता घण्टा वानरैः प्राप्ता । वानरास्तां घण्टामनुक्षणं वादयन्ति । ततो नगरजनैः स मनुष्यः खादितो दृष्टः। प्रतिक्षणं घण्टारवश्च श्रूयते । अनन्तरं 'घण्टाकर्णः कुपितो मनुष्यान्खादति घण्टां च वादयती'त्युक्त्वा सर्वे जना नगरात्पलायिताः । ततः करालया नाम कुट्टन्या विमृश्यानवसरोऽयं घण्टानादः । तत्किं मर्कटा घण्टां वादयन्तीति स्वयं विज्ञाय राजा विज्ञापितः—'देव ! यदि कियद्धनोपक्षयः क्रियते, तदाहमेनं घण्टाकर्णं साधयामि ।'

११६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८९- ततो राज्ञा तस्यै धनं दत्तम्। कुट्टन्या च मण्डलं कृत्वा तत्र गणेशादिपूजागौरवं दर्शयित्वा स्वयं वानरप्रियफलान्यादाय वनं प्रविश्य फलान्याकीर्णानि। ततो घण्टां परित्यज्य वानराः फलासक्ता बभूवुः। कुट्टनी च घण्टां गृहीत्वा नगरमागता सर्वजनपूज्याऽभवत्। अतोऽहं ब्रवीमि- "शब्दमात्रान्न भेत- व्यम्" इत्यादि ॥' ततः संजीवक आनीय दर्शनं कारितः। पश्चात्त- त्रैव परमप्रीत्या निवसति। श्रीपर्वतके बीचमें एक ब्रह्मपुर नाम नगर था। उसके शिखर पर एक घंटाकर्ण नाम राक्षस रहता था, यह मनुष्योंसे उड़ती हुई खबर सुनी जाती है। एक दिन घंटेको ले कर भागते हुये किसी चोरको व्याघ्रने मार डाला, और उसके हाथसे गिरा हुआ घंटा बंदरोंको मिला। बंदर उस घंटेको वार वार बजाते थे, तब नगरवासियोंने देखा कि वह मनुष्य खा लिया गया और प्रतिक्षणमें घंटेका बजना सुनाई देता है। तब सब नागरिक लोग "घंटाकर्ण क्रोधसे मनुष्योंको खाता है और घंटेको बजाता है-" यह कह कर नगरसे भाग चले। बाद कराला नाम कुटनीने विचार किया कि यह घंटेका शब्द विना अवसरका है; इसलिये क्या बन्दर घंटेको बजाते हैं? इस बातको अपने आप जान कर राजासे कहा-'जो कुछ धन खर्च करो तो मैं इस घंटाकर्ण राक्षसको वशमें कर लूं।' फिर राजाने उसे धन दिया, और कुटनीने मंडल बनाया और उसमें गणेश आदिकी पूजाका चमत्कार दिखला कर और बन्दरोंको अच्छे लगने वाले फल ला कर वनमें उनको फैला दिया। फिर बन्दर घंटेको छोड़ कर फल खाने लग गये। और कुटनी घंटेको ले कर नगरमें आई और सब जनोंने उसका आदर किया। इसलिये मैं कहता हूं "केवल शब्दसेही नहीं डरना चाहिये" इत्यादि'। फिर संजीवकको ला कर दर्शन कराया। पीछे वह वहांही बड़ी प्रीतिसे रहने लगा ॥ अथ कदाचित्तस्य सिंहस्य भ्राता स्तब्धकर्णनामा सिंहः समा- गतः। तस्यातिथ्यं कृत्वा समुपवेश्य पिङ्गलकस्तदाहाराय पशुं हन्तुं चलितः। अत्रान्तरे संजीवको वदति-'देव ! अद्य हतमृगाणां मांसानि क्व?'। राजाह-'दमनक-करटकौ जानीतः'। संजीवको ब्रूते-'ज्ञायतां किमस्ति नास्ति वा।' सिंहो विमृश्याह-'नास्त्येव

-९२] आय-व्यय जाननेवाले प्रधानकी प्रशंसा ११७ तत्' । संजीवको ब्रूते—'कथमेतावन्मांसं ताभ्यां खादितम् ?' राजाह—'खादितं व्ययितमवधीरितां च । प्रत्यहमेष क्रमः । संजीवको ब्रूते—'कथं श्रीमद्देवपादानामगोचरेणैवं क्रियते ?' । राजाह—'मदीयागोचरेणैव क्रियते ।' अथ संजीवको ब्रूते—'नैत- दुचितम् । इसके अनन्तर एक दिन उस सिंहका भाई स्तब्धकर्ण नामक सिंह आया । उसका आदर-सत्कार करके और अच्छी तरह बैठा कर पिंगलक उसके भोजनके लिये पशु मारने चला । इतनेमें संजीवक बोला कि—'महाराज ! आज मारे हुए मृगोंका मांस कहां है ?' राजाने कहा-'दमनक करटक जाने ।' संजीवकने कहा- 'तो जान लीजिये कि है या नहीं' सिंहने सोच कर कहा-'अब वह नहीं है।' संजीवक बोला-'इतना सारा मांस उन दोनोंने कैसे खा लिया ?' राजा बोला- 'खाया, बांटा और फेंक फांक दिया। नित्य यही डौल रहता है।' तब संजीवकने कहा-'महाराजके पीठ पीछे इस प्रकार क्यों करते हैं ?' राजा बोला-'मेरे पीठ पीछे ऐसाही किया करते हैं ।' फिर संजीवकने कहा-'यह बात उचित नहीं है । तथा चोक्तम्,— नानिवेद्य प्रकुर्वीत भर्तुः किंचिदपि स्वयम् । कार्यमापत्प्रतीकारादन्यत्र जगतीपते ! ॥ ९० ॥ जैसा कहा है—हे राजा ! स्वामिके बिना बताये आपत्तिके उपायको छोड़ और कुछ काम अपने आप नहीं करना चाहिये ॥ ९० ॥ अन्यच्च,— कमण्डलूपमोऽमात्यस्तनुत्यागो बहुग्रहः । नृपते ! किंक्षणो मूर्खो दरिद्रः किंवराटकः ॥ ९१ ॥ और हे राजा ! मंत्री कमंडलुके समान है, क्योंकि थोड़ा खर्च करता है और बहुत संग्रह करता है, और मूर्ख समयको अनमोल नहीं समझता है, अर्थात् इस थोड़ेसे समयमें क्या होगा ? और दरिद्री कौड़ीको अनमोल नहीं जानता है ॥ ९१ ॥ स ह्यमात्यः सदा श्रेयान् काकिनीं यः प्रवर्धयेत् । कोशः कोशवतः प्राणाः प्राणाः प्राणा न भूपतेः ॥ ९२ ॥

११८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ९३- निश्चय करके वही मंत्री श्रेष्ठ है जो दमड़ी दमड़ी करके कोषको बढ़ावे, क्योंकि कोषयुक्त राजाका कोषही प्राण है, केवल जीवनही प्राण नहीं है, अत एव कोषको प्राणोंसेभी अधिक रक्खे ॥ ९२ ॥ किं चान्यैर्न कुलाचारैः सेव्यतामेति पूरुषः । धनहीनः स्वपत्न्यापि त्यज्यते किं पुनः परैः ? ॥ ९३ ॥ और धन आदिके विना अन्य अच्छे कुल और आचारसे पुरुष आदर नहीं पाता है, क्यों कि धनहीन मनुष्यको उसकी स्त्री भी छोड़ देती है फिर दूसरोंकी बातही क्या है ? ॥ ९३ ॥ एतच्च राज्ञः प्रधानं दूषणम्— और यह राजाका मुख्य दोष है— अतिव्ययोऽनपेक्षा च तथाऽर्जनमधर्मतः । मोषणं दूरसंस्थानं कोशव्यसनमुच्यते ॥ ९४ ॥ बहुत खर्च करना, धनकी इच्छा न रखना, अन्यायसे धन इकट्ठा करना, अन्यायसे किसीका धन छीन लेना, और धनको ( अपनेसे ) दूर रखना यह कोषका व्यसन याने दोष कहा गया है ॥ ९४ ॥ यतः,— क्षिप्रमायमनालोच्य व्ययमानः स्ववाञ्छया । परिक्षीयत एवासौ धनी वैश्रवणोपमः' ॥ ९५ ॥ क्योंकि धनके लाभको बिना विचारे अपनी इच्छासे शीघ्र व्यय करनेवाला कुबेरके समान धनवान् होने पर भी वह धनी अवश्य दरिद्री हो जाता है' ९५ स्तब्धकर्णो ब्रूते—'शृणु भ्रातः! चिराश्रितावेतौ दमनक- करटकौ संधिविग्रहकार्याधिकारिणौ च कदाचिदर्थाधिकारे न नियोक्तव्यौ । स्तब्धकर्ण बोला—'सुनो भाई ! ये दमनक करटक बहुत दिनोंसे अपने आश्रयमें पड़े हुये हैं और लड़ाई तथा मेल करानेके अधिकारी हैं, धनके अधिकार पर उनको कभी नहीं लगाने चाहिये । अपरं च नियोगप्रस्तावे यन्मया श्रुतं तत्कथ्यते— और दूसरे, ऐसे कामके विषयमें जो मैंने सुना है सो कहता हूं—

-१०१] अनुचित और उचित मंत्रिका लक्षण ११९ ब्राह्मणः क्षत्रियो बन्धुर्नाधिकारे प्रशस्यते । ब्राह्मणः सिद्धमप्यर्थं कृच्छ्रेणापि न यच्छति ॥ ९६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, और भाई (या आप) इनको अधिकार पर लगाना अच्छा नहीं । क्योंकि ब्राह्मण शीघ्र सिद्ध होनेवाले प्रयोजनको राजाके आग्रहको जान कर कठिनतासे भी नहीं करता है ॥ ९६ ॥ नियुक्तः क्षत्रियो द्रव्ये खड्गं दर्शयते ध्रुवम् । सर्वस्वं ग्रसते बन्धुराक्रम्य ज्ञातिभावतः ॥ ९७ ॥ जो क्षत्रियको धनके काम पर रक्खे तो निश्चय करके राज्य छिन लेनेकी इच्छासे तरवार दिखलाने लगता है, और बान्धव ज्ञातिके कारण घेर कर सब धन हर लेता है ॥ ९७ ॥ अपराधेऽपि निःशङ्को नियोगी चिरसेवकः । स स्वामिनमवज्ञाय चरेच्च निरवग्रहः ॥ ९८ ॥ पुराना सेवक अपराध करने पर भी निर्भय रहता है और स्वामीकी अवज्ञा करके बिना रोकटोक काम करता है ॥ ९८ ॥ उपकर्ताऽधिकारस्थः स्वापराधं न मन्यते । उपकारं ध्वजीकृत्य सर्वमेवावलुम्पति ॥ ९९ ॥ उपकार करनेवाला अधिकार पर बैठ कर अपने अपराधको नहीं मानता है और उपकारको आगे करके सब दोषोंको छुपा देता है ॥ ९९ ॥ उपांशुक्रीडितोऽमात्यः स्वयं राजायते यतः । अवज्ञा क्रियते तेन सदा परिचयाद्ध्रुवम् ॥ १०० ॥ मंत्री सब गुप्त बातोंको जाननेवाला होता है कि जिससे आप राजा कैसे आचरण करता है और वह पास रहनेसे निश्चय स्वामीका अनादर करता है ॥ १०० ॥ अन्तर्दुष्टः क्षमायुक्तः सर्वानर्थकरः किल । शकुनिः शकटारश्च दृष्टान्तावत्र भूपते ! ॥ १०१ ॥ हे राजा ! भीतरका दुष्ट अर्थात् पीठ पीछे काम बिगाडनेवाला और सहनशील अर्थात् सामने हित दिखानेवाला मंत्री निश्चय करके सब अनर्थोंका करनेवाला होता है। इस विषयमें शकुनि और शंकटार ये दो दृष्टान्त हैं ॥ १०१ ॥ १ दुर्योधनका मामा जो मंत्रीके पद पर काम करता था, २ राजा महानंदका मंत्री.

१२० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १०२- सदामात्यो न साध्यः स्यात्समृद्धः सर्व एव हि । सिद्धानामयमादेश ऋद्धिश्चत्तविकारिणी ॥ १०२ ॥ धनसे बढ़े हुए सब मंत्री लोग निश्चय करके अंतमें असाध्य अर्थात् स्वतंत्र हो जाते हैं, क्योंकि ऐश्वर्य चित्तको विकृत करनेवाला (दानतको बिगाड़नेवाला) है, यह महात्माओंका वाक्य है ॥ १०२ ॥ प्राप्तार्थग्रहणं द्रव्यपरीवर्त्तोऽनुरोधनम् । उपेक्षा बुद्धिहीनत्वं भोगोऽमात्यस्य दूषणम् ॥ १०३ ॥ मिले हुए धनका भार लेना, द्रव्यका अदलबदल करना, अनुरोध (वार २ द्रव्य मांगना ) सब कामोंमें उदासीन (आलकस), बुद्धिहीन होना और परस्त्रियोंके साथ भोगमें लगा रहना यह मंत्रीके दूषण हैं ॥ १०३ ॥ नियोग्यर्थग्रहापायो राज्ञां नित्यपरीक्षणम् । प्रतिपत्तिप्रदानं च तथा कर्मविपर्ययः ॥ १०४ ॥ और राजाके संचय किये हुए धनका नाश, राजाओंकी नित्य परीक्षा, अर्थात् प्रसन्न है या अप्रसन्न है, यह जानना और प्रिय वस्तुका दे देना, और करनेके योग्य काममें आलस्य करना येभी मंत्रीके दूषण हैं ॥ १०४ ॥ निपीडिता वमन्त्युच्चैरन्तःसारं महीपतेः । दुष्टव्रणा इव प्रायो भवन्ति हि नियोगिनः ॥ १०५ ॥ अधिकारी लोग अधिक दबानेसे राजाके भीतरके भेदको सर्वत्र ऐसे उगलते फिरते हैं कि जैसे फोड़ा अधिक दबानेसे भीतरकी राद इत्यादि उगल देता है ॥ १०५ ॥ मुहुर्नियोगिनो बाध्या वसुधारा महीपते ! । सकृत्किं पीडितं स्नानवस्त्रं मुञ्चेद्रुतं पयः ? ॥ १०६ ॥ और हे राजा ! अधिकारीके जोड़े हुए धनकी वार वार परीक्षा करनी चाहिये । क्योंकि एकवार निचोड़ा हुआ नहानेका वस्त्र क्या शीघ्र जलको छोड़ देता है ? अर्थात् कभी नहीं छोड़ता है ॥ १०६ ॥ एतत्सर्वं यथावसरं ज्ञात्वा व्यवहर्त्तव्यम् ।' सिंहो ब्रूते-'अस्ति तावदेवम्, किंन्त्वेतौ सर्वथा न मम वचनकारिणौ ।' स्तब्धकर्णो ब्रूते-'एतत्सर्वमनुचितं सर्वथा ।

-१०९ ] अप्रतिहत राजनीतिकी जरूरी १२१ यह सब जैसा अवसर हो वैसा जान कर काम करना चाहिये।' सिंह बोला-'यह तो है ही, पर ये सर्वथा मेरी बातको नहीं माननेवाले हैं।' स्तब्धकर्ण बोला-'यह सब प्रकारसे अनुचित है। यतः,— आज्ञाभङ्गकरान् राजा न क्षमेत् स्वसुतानपि । विशेषः को नु राज्ञश्च राज्ञश्चित्रगतस्य च ॥ १०७ ॥ क्योंकि—राजा आज्ञाभंग करनेवाले अपने पुत्रोंकोभी क्षमा न करें, क्योकि ऐसा न करनेसे पराक्रमी राजामें और चित्रमें लिखे हुए राजामें क्या भेद है ? अर्थात् ऐसा राजा किसी कामका नहीं होता है ॥ १०७ ॥ स्तब्धस्य नश्यति यशो विषमस्य मैत्री नष्टेन्द्रियस्य कुलमर्थपरस्य धर्मः । विद्याफलं व्यसनिनः कृपणस्य सौख्यं राज्यं प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य ॥ १०८ ॥ निष्क्रिय मनुष्यका यश, चंचल चित्तवालेकी मित्रता, दुष्ट इन्द्रियवालेका कुल, धनके लोभीका धर्म, द्यूत आदि व्यसनमें आसक्तका विद्याफल, कृपणका सुख, और विवेकहीन मंत्रीवाले राजाका राज्य नष्ट हो जाता है ॥ १०८ ॥ अपरं च,— तस्करेभ्यो नियुक्तेभ्यः शत्रुभ्यो नृपवल्लभात् । नृपतिर्निजलोभाच्च प्रजा रक्षेत्पितेव हि ॥ १०९ ॥ और दूसरे-राजाको चोरोंसे, सेवकोंसे, शत्रुओंसे अपने प्रिय मंत्री आदिसे और अपने लोभसे, पिताके समान प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १०९ ॥ भ्रातः ! सर्वथाऽस्सद्वचनं क्रियताम् । व्यवहारोऽप्यस्माभिः कृत एव । अयं संजीवकः सस्यभक्षकोऽर्थाधिकारे नियुज्यताम् ।' एतद्वचनात्तथानुष्ठिते सति तदारभ्य पिङ्गलक-संजीवकयोः सर्व- बन्धुपरित्यागेन महता स्नेहेन कालोऽतिवर्तते । ततोऽनुजीविना- मप्याहारदाने शैथिल्यदर्शनाद्दमनक-करटकावन्योन्यं चिन्तयतः । तदाह दमनकः करटकम्—'मित्र किं कर्तव्यम् ? आत्मकृतोऽयं दोषः । स्वयं कृतेऽपि दोषे परिदेवनमप्यनुचितम् ।

१२२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ११०-

भाई ! सब प्रकारसे मेरा कहना करो और व्यवहार तो हमने करही लिया है । इस घास चरनेवाले संजीवकको धनके अधिकार पर रख दो । इस बातके ऐसा करने पर उसी दिनसे पिंगलक और संजीवकका सब बांधवोंको छोड़ कर बड़े स्नेहसे समय बीतने लगा । फिर सेवकोंको आहार देनेमें शिथिलता देख दमनक और करटक आपसमें चिंता करने लगे । तब दमनक करटकसे बोला—'मित्र ! अब क्या करना चाहिये ? यह अपनाही किया हुआ दोष है, स्वयंही दोष करने पर पछताना भी उचित नहीं है । तथा चोक्तम्— स्वर्णरेखामहं स्पृष्ट्वा बद्धात्मानं च दूतिका । आदित्सुश्च मणिं साधुः स्वदोषाद्दुःखिता इमे' ॥ ११० ॥ जैसा कहा है—मैं स्वर्णरेखाको छू कर, और कुटनी अपनेको बांध कर तथा साधु मणि लेनेकी इच्छासे—ये तीनों अपने दोषसे दुःखी हुए' ॥ ११० ॥ करटको ब्रूते—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति— करटक पूछने लगा—'यह कथा कैसे है ? दमनक कहने लगा । — कथा ६ [ संन्यासी, बनिया, ग्वाला, ग्वालिन और नायनकी कहानी ६ ] अस्ति काञ्चनपुरनाम्नि नगरे वीरविक्रमो राजा । तस्य धर्मा- धिकारिणा कश्चिन्नापितो वध्यभूमिं नीयमानः कंदर्पकेतुनाम्ना परिव्राजकेन साधुद्वितीयेकेन 'नायं हन्तव्यः' इत्युक्त्वा वस्त्राञ्चले धृतः । राजपुरुषा ऊचुः—'किमिति नायं वध्यः ?' । स आह—'श्रू- यताम् ।' “स्वर्णरेखामहं स्पृष्ट्वा” इत्यादि पठति । त आहुः—'कथ- मेतत् ?' । परिव्राजकः कथयति—'अहं सिंहलद्वीपे भूपतेर्जीमूत- केतोः पुत्रः कंदर्पकेतुर्नाम । एकदा केलिकाननात्स्थितेन मया पोतवणिङ्मुखाच्छ्रुतं—'यदत्र समुद्रमध्ये चतुर्दश्यामाविर्भूतकल्प- तरुतले रत्नावलीकिरणकर्बुरपर्यङ्के स्थिता सर्वांलंकारभूषिता लक्ष्मीरिव वीणां वादयन्ती कन्या काचिद्दृश्यते' इति । ततोऽहं पोतवणिजमादाय पोतमारुह्य तत्र गतः । अनन्तरं तत्र गत्वा पर्यङ्केऽर्धमग्ना तथैव साऽवलोकिता । ततस्तल्लावण्यगुणाकृष्टेन

-११० ] राजसेवकोंको संन्यासीका आत्मवृत्त कहना १२३ मयापि तत्पश्चाज्झम्पो दत्तः । तदनन्तरं कनकपत्तनं प्राप्य सुवर्णप्रासादे तथैव पर्यङ्के स्थिता विद्याधरीभिरुपास्यमाना मया- लोकिता । तयाप्यहं दूरादेव दृष्ट्वा सखीं प्रस्थाप्य सादरं संभा- षितः । तत्सख्या च मया पृष्टया समाख्यातम्—'एषा कंदर्प- केलिनाम्नो विद्याधरचक्रवर्तिनः पुत्री रत्नमञ्जरी नाम प्रतिज्ञा- पिता विद्यते । ‘-“यः कनकपत्तनं स्वचक्षुषागत्य पश्यति स एव पितुरगोचरोऽपि मां परिणेष्यति” इति मनसः संकल्पः । तदेनां गान्धर्वविवाहेन परिणयतु भवान् ।' अथ तत्र वृत्ते गान्धर्ववि- वाहे तया सह रममाणस्तत्राहं तिष्ठामि । तत एकदा रहसि तयोक्तम्—'स्वामिन् ! स्वेच्छया सर्वमिदमुपभोक्तव्यम् । एषा चित्रगता स्वर्णरेखा नाम विद्याधरी न कदाचित् स्प्रष्टव्या । पश्चा- दुपजातकौतुकेन मया स्वर्णरेखा स्वहस्तेन स्पृष्टा । तया चित्र- गतयाप्यहं चरणपद्मेन ताडित आगत्य स्वराष्ट्रे पतितः । अथ दुःखार्तोऽहं परिव्राजितः पृथिवीं परिभ्राम्यन्निमां नगरीमनुप्राप्तः। अत्र चातिक्रान्ते दिवसे गोपगृहे सुप्तः सन्नपश्यम् । प्रदोषसमये सुहृदां पालनं कृत्वा स्वगेहमागतो गोपः स्ववधूं दूत्या सह किमपि मन्त्रयन्तीमपश्यत् । ततस्तां गोपीं ताडयित्वा स्तम्भे बद्धा सुप्तः ततोऽर्धरात्र एतस्य नापितस्य वधूर्दूती पुनस्तां गोपीमुपेत्यावदत्— तव विरहानलदग्धोऽसौ स्मरशरर्जरितो मुमूर्षुरिव वर्तते । कांचनपुर नाम नगरमें वीरविक्रम नाम एक राजा था । उसका धर्माधिकारी किसी नाईको वधस्थानमें ले जा रहा था, उस समय कंदर्पकेतु नाम कोई संन्यासी जिसका साथी एक बनिया था उसने 'यह मारनेके योग्य नहीं है' यह कह कर अपने वस्त्रके पल्लेसे उसे छिपा लिया । राजाके सेवक बोले-‘यह मारनेके योग्य क्यों नहीं है ?' वह बोला-‘सुनिये, “मैं स्वर्णरेखाको छू कर” इत्यादि पढ़ता है ।' वे बोले-‘यह कथा कैसी है ?’ । संन्यासी कहने लगा-‘मैं : सिंहलद्वीपके जीमूतकेतु नाम राजाका कन्दर्पकेतु नामक पुत्र हूं । एक समय मैंने क्रीडाविहारके उपवनमें बैठे बैठे एक नावके व्यापारीके मुखसे यह सुना कि यहां समुद्रके बीचोबीचमें चौदसके दिन कल्पवृक्ष निकलता है; उसके नीचे रत्नोंकी किरणोंका बाढ़की झलकसे झलकते

१२४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १११- हुए रंगबिरंगे पलंग पर बठी हुई और सब आभूषणोंसे भूषित दूसरी लक्ष्मीके समान बीनको बजाती हुई कोई कन्या दिखाई दिया करती है । फिर मैं नावके व्यापारीको लाकर और नाव पर चढ़ कर वहां गया । पीछे वहां जा कर पलंग पर आधी डूबी हुई जैसी कही वैसीही मैंने देखी । फिर उसके सुन्दरताके गुणोंसे लुभाया गया, मैं भी उसके पीछे झट कूद पड़ा । इसके अनन्तर कनकपुरमें पहुंच कर सुवर्णके भवनमें वैसेही पलंग पर बैठी हुई और विद्याधरियोंसे सेवा की गईको मैंने देखी, उसनेभी मुझे दूरसे देख कर और सहेलीको भेज कर आदरसे “मुझे बुलानेका” संदेसा कहला भेजा । और जब मैंने सखीसे “उसके विषयमें” पूछा, तब उसने सब अच्छे प्रकारसे कह सुनाया कि यह कंदर्पकेलि नामक अप्सराओंके चक्रवर्ती राजाकी रत्नमंजरी नाम बेटी यह प्रतिज्ञा कर बैठी है कि “जो कोई कनकपुरको अपने नेत्रसे देखेगा वह मेरे पिताको विना जाने भी मुझे ब्याह लेगा’ । यह मनका संकल्प है । इसलिये आप इसके साथ गंधर्वविवाह कर लीजिये ।' फिर वहां गंधर्वविवाह होनेके बाद उसके साथ रमण करता हुआ मैं वहां रहने लगा । फिर एक दिन उसने मुझसे एकांतमें कहा-‘हे स्वामी ! अपनी इच्छापूर्वक यह सब पदार्थ भोगो । परंतु इस चित्रलिखित सुवर्णरेखा नाम अप्सराको कभी छूना नहीं । फिर एक दिन कुतूहलसे मैंने स्वर्णरेखाको अपने हाथसे छू लिया और उस चित्रमें लिखी हुई (सुवर्णरेखा) ने अपने चरणकमलसे मुझे ऐसा ठुकराया कि मैं अपने राज्यमें आ पड़ा ! पीछे मैं दुःखसे दुःखी संन्यासी हुआ पृथ्वी पर घूमता घूमता इस नगरीमें आ पहुंचा हूं और यहां दिनके डूबने पर एक ग्वालाके घरमें सोते सोते देखा कि सन्ध्याके समय ग्वाला मित्रोंका सत्कार करके अपने घर आया और अपनी स्त्रीको एक कुट्टनीके साथ कुछ गुह्य भाषण करते हुए देख लिया । फिर उस ग्वालिनको मारपीट कर और खंभेमें बांध कर सो रहा । पीछे आधी रातको इसी नाईकी बहू कुट्टनी फिर उस घोसिनके पास आ कर कहने लगी-‘तेरे विरहकी अग्निसे जला हुआ कामदेवके बाणोंसे घायल वह मरासू-सा हो रहा है । तथा चोक्तम्,— रजनीचरनाथेन खण्डिते तिमिरे निशि । यूनां मनांसि विव्याध दृष्ट्वा दृष्ट्वा मनोभवः ॥ १११ ॥

-१११] ग्वालाने स्त्री समझ कर नायनका नाक काटना १२५

जैसा कहा है—चन्द्रमासे रातमें अंधकार दूर होने पर कामदेवने देख देख कर युवाओंके चित्तोंको व्याकुल किया ॥ १११ ॥ तस्य तादृशीमवस्थामवलोक्य परिक्लिष्टमनास्त्वामनुवर्तितुमा- गता । तदहमत्रात्मानं बद्धा तिष्ठामि । त्वं तत्र गत्वा तं संतोष्य सत्वरमागमिष्यसि । तथाऽनुष्ठिते सति स गोपः प्रबुद्धोऽवदत्- 'इदानीं त्वां पापिष्ठां जारान्तिकं नयामि' । ततो यदासौ न किंचिदपि ब्रूते तदा क्रुद्धो गोपः 'दर्पान्मम वचसि प्रत्युत्तरमपि न ददासि ?' इत्युक्त्वा कोपेन तेन कर्तिकामादायास्या नासिका छिन्ना । तथा कृत्वा पुनः सुप्तो गोपो निद्रामुपगतः । अथागत्य गोपी दूतीमपृच्छत्—'का वार्ता ?' । दूत्योक्तम्—'पश्य माम् । मुखमेव वार्तां कथयति ।' अनन्तरं सा गोपी तथा कृत्वोत्मानं बद्ध्वा स्थिता इयं च दूती तां छिन्ननासिकां गृहीत्वा स्वगृहं प्रविश्य स्थिता । ततः प्रातरेवानेन नापितेन स्ववधूः क्षुरभाण्डं याचिता सती क्षुरमेकं प्रादात् । ततोऽसमग्रभाण्डे प्राप्ते समुपजातको- पोऽयं नापितस्तं क्षुरं दूरादेव गृहे क्षिप्तवान् ॥ अथ कृतार्तरावेयं विनापराधेन मे नासिकाऽनेन छिन्नेत्युक्त्वा धर्माधिकारिसमीप- मेनमानीतवती ॥ सा च गोपी तेन गोपेन पुनः पृष्टोवाच—'अरे पाप ! को मां महासतीं निरूपयितुं समर्थः ? मम व्यवहारम- कल्मषमष्टौ लोकपाला एव जानन्ति । उसकी वैसी दशा देख कर मनमें घबराई हुई तेरी अनुवर्तिनी (एवजी) करने आई हूं । इसलिये मैं यहां अपनेको बांध कर रहती हूं । तू वहां जा कर उसको संतुष्ट कर—शीघ्र लौट आइयो' । ऐसा कहने पर वह ग्वाला जाग कर कहने लगा-'अब तुझ पापिनको तेरे यारके पास ले चलूं।' फिर जब यह कुछ न बोली तब ग्वाला झुंझलाया । 'घमंडसे मेरी बातका उत्तरभी नहीं देती है ?' यह कह कर क्रोधसे उसने छुरी निकाल, उसकी नाक काट डाली । वैसा करके ग्वाला फिर सो गया, और उसे निद्रा आ गई । फिर ग्वालिनने आ कर दूतीसे पूछा— 'क्या बात है ?' दूतीने कहा-'मुझे देख ले, मुखही बात कह देता है।' फिर वह ग्वालिन वैसेही करके आप अपनेको बांध कर ठहरी रही, और वह दूती उस कटी हुई नाकको ले कर अपने घरमें घुस कर बैठी रही । फिर प्रातःकाल होतेही

१२६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ११२- इस नाईने अपनी बहूसे पेटी माँगी । उसने एक उस्तरा दे दिया । फिर अधूरी पेटीको पा कर इसे बड़ा क्रोध आया और इस नाईने उस उस्तरेको दूरसेही घरमें फेंक दिया । पीछे इसने बड़ा हुर्रा मचाया कि बिना अपराध इसने मेरी नाक काट डाली है; यह कह कर इसे धर्माधिकारीके पास ले आई । और उधर ग्वालाने उस ग्वालिनसे फिर पूछा और वह बोली-‘अरे पापी ! कोन मुझसी महापतिव्रताका निरूपण कर सकता है ? मेरे पापरहित व्यवहारको आठों लोकपालभी जानते हैं । यतः,— आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ ११२ ॥ क्योंकि--सूर्य, चंद्रमा, पवन, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिन, रात, दोनों संध्या और धर्म ये मनुष्यके आचरणको जानते हैं ॥ ११२ ॥ यद्यहं परमसती स्याम्, त्वां विहायान्यं न जाने, पुरुषान्तरं स्वप्नेऽपि न हि भजे, तेन धर्मेण छिन्नापि मम नासिकाऽच्छि- न्नास्तु । मया त्वं भस्म कर्तुं शक्यसे । किंतु स्वामी त्वम् । लोकभयादुपेक्षे । पश्य मन्मुखम् ।' ततो यावदसौ गोपो दीपं प्रज्वाल्य तन्मुखमवलोकते तावदुन्नसं मुखमवलोक्य तच्चरणयोः पतितः—'धन्योऽयं यस्येदृशी भार्या परमसाध्वी' इति । योऽय- मास्ते साधुरेतद्वृत्तान्तमपि कथयामि । अयं स्वगृहान्निर्गतो द्वादशवर्षैर्मलयोपकण्ठादिमां नगरीमनुप्राप्तः । अत्र वेश्यागृहे सुप्तः । तस्याः कुट्टन्या गृहद्वारि स्थापितकाष्ठघटितवेतालस्य मूर्धनि रत्नमेकमुत्कृष्टमास्ते। तत्र लुब्धेनानेन साधुना रात्रावुत्थाय रत्नं ग्रहीतुं यत्नः कृतः । तदा तेन वेतालेन सूत्रसंचारितबाहुभ्यां पीडितः सन्नार्तनादमयं चकार । पश्चादुत्थाय कुट्टन्योक्तम्— ‘पुत्र ! मलयोपकण्ठादागतोऽसि । तत्सर्वरत्नानि प्रयच्छास्मै नो चेदनेन न त्यक्तव्योऽसि ।' इत्थमेवायं चेटकः । ततोऽनेन सर्वरत्नानि समर्पितानि यथाऽयमपहृतसर्वस्वोऽस्मासु समागत्य मिलितः।' एतत्सर्वं श्रुत्वा राजपुरुषैर्न्याये धर्माधिकारी प्रवर्तितः ।

-११३] दूती और ग्वालिनको देशनिकालकी शिक्षा १२७ अनन्तरं तेन सा दूती गोपी च ग्रामाद्बहिर्निःसारिते । नापितश्च गृहं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि–“स्वर्णरेखामहं स्पृष्ट्वा” इत्यादि ॥ अथ स्वयं कृतोऽयं दोषः । अत्र विलापं नोचितम् । (क्षणं विमृश्य ।) मित्र ! यथाऽनयोः सौहार्दं मया कारितं तथा मित्रभेदोऽपि मया कार्यः । जो मैं सच्ची पतिव्रता होऊं, तुझे छोड़ दूसरेको न जानती होऊं, दूसरे पुरुषको खप्नमेंभी न भजती होऊं तो उस पातिव्रत्य धर्मसे मेरी कटी हुई नाकभी बिना कटी हो जाय. मैं तुझे भस्म कर सकती हूं, परन्तु तू पति है, संसारके भयसे डरती हूं। मेरा मुख देख । 'फिर जब उस ग्वालेने दिया जला कर उसका मुख देखा तभी उसका नाकसमेत मुख देख कर उसके चरणोंमें गिर पड़ा–‘मुझे धन्य है कि जिसकी ऐसी पतिव्रता स्त्री है ॥ और यह दूसरा जो बनिया है उसका वृत्तान्तभी कहता हूं। यह अपने घरसे निकल कर बारह बरसमें मलया- चलके पास इस नगरीमें आया, यहां वेश्याके घरमें सोया; उस कुट्टनीके घरके द्वार पर बैठाये गये काठके बने हुए वेतालके सिरमें एक अनमोल रत्न था. वहां इस लोभी बनियेने रातको उठ कर रत्न लेनेका यत्न किया. तब उस पिशाचने सूतसे चलाई गई भुजाओंसे उसे खींचा और वह रो कर चिल्लाया. पीछे उठ कर कुट्टनीने कहा–‘हे पुत्र ! तू मलयके पाससे आया है। इसलिये सब रत्न इसे दे दे. नहीं तो तू इससे नहीं छुटेगा; यह सेवक ऐसाही है’. तब इसने सब रत्न दे दिये. और इस प्रकार यह सर्वस्व खो कर हमारे साथ आ कर मिल गया । यह सब सुन कर राजपुरुषोंने न्याय करनेके लिये धर्माधिकारीको प्रवृत्त कर दिया; फिर उसने उस दूती और ग्वालिनको देसनिकाला दे दिया ॥ और नाईभी घर गया। इसलिये मैं कहता हूं–“स्वर्णरेखाको मैंने छू कर” इत्यादि ॥ और यह अपनाही किया दोष है। इसमें विलाप करना उचित नहीं है । (क्षणभर जीमें विचार कर) हे मित्र ! जैसे मैंने इन दोनोंकी मित्रता कराई थी वैसेही मित्रोंमें फूट भी कराऊंगा. यतः,— अतथ्यान्यपि तथ्यानि दर्शयन्त्यतिपेशलाः । समे निम्नोन्नतानीव चित्रकर्मविदो जनाः ॥ ११३ ॥

१२८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ११४- क्योंकि—अति चतुर मनुष्य झूठी बातोंकोभी सच्ची कर दिखाते हैं; जैसे चित्रके कामको जानने वाले मनुष्य, एकसे स्थान पर पहाड़, घर इत्यादि खींच कर नीचा ऊंचा दिखाते हैं ॥ ११३ ॥ अपरं च,— उत्पन्नेष्वपि कार्येषु मतिर्यस्य न हीयते । स निस्तरति दुर्गाणि गोपी जारद्वयं यथा ॥ ११४ ॥ और दूसरे—जिसकी बुद्धि कार्योंके उपस्थित होने परभी नहीं घटती है वह मनुष्य संकटोंसे ऐसे बच जाता है, जैसे एक ग्वालिनने दो यारोंका निस्तारा किया ॥ ११४ ॥ करटकः पृच्छति—‘कथमेतत् ?’। दमनकः कथयति— करटक पूछने लगा—‘यह कथा कैसे है ?’ दमनक कहने लगा।— कथा ७ [ ग्वाला, व्यभिचारिणी ग्वालिन, कोतवाल और उसके पुत्रकी कहानी ७ ] अस्ति द्वारवत्यां पुर्यां कस्यचिद्गोपस्य वधूर्बन्धकी। सा ग्रामस्य दण्डनायकेन तत्पुत्रेण च समं रमते । द्वारावती नाम नगरीमें किसी ग्वालेकी बहू व्यभिचारिणी थी। वह गांवके दंडनायक और उसके पुत्रके साथ रमण किया करती थी. तथा चोक्तम्,— नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥ ११५ ॥ और वैसा कहा भी है कि-अग्नि काष्ठोंसे, समुद्र नदियोंसे, मृत्यु सब प्राणि- योंसे, और स्त्री पुरुषोंसे तृप्त नहीं होती है ॥ ११५ ॥ अन्यच्च,— न दानेन न मानेन नार्जवेन न सेवया । न शस्त्रेण न शास्त्रेण सर्वथा विषमाः स्त्रियः ॥ ११६ ॥ और स्त्रियोंका (धन आदिके) दानसे, सन्मानसे, (मिष्ट भाषण आदि) सीधेपनसे, सेवासे, शस्त्रसे और शास्त्रसे “वशमें होना” सब प्रकारसे कठिन है ॥ ११६ ॥

  • ११८ ] समयपर ग्वालिनकी चतुराई १२९ - यतः,— गुणाश्रयं कीर्तियुतं च कान्तं पतिं रतिज्ञं सधनं युवानम् । विहाय शीघ्रं वनिता व्रजन्ति नरान्तरं शीलगुणादिहीनम् ॥ ११७ ॥ क्योंकि-स्त्रियां सब गुणोंसे युक्त, यशस्वी, सुन्दर, कामशील, धनवान्, जवान ऐसे पतिको छोड़ कर शील और गुणसे हीन दूसरे मनुष्यके पास शीघ्र जाती हैं ॥ ११७ ॥ अपरं च,— न तादृशीं प्रीतिमुपैति नारी विचित्रशय्यां शयितापि कामम् । यथा हि दूर्वादिविकीर्णभूमौ प्रयाति सौख्यं परकान्तसङ्गात् ॥ ११८ ॥ और दूसरे-स्त्री जैसी कि तृण आदि बिछी हुई भूमि पर यारके साथ अधिक सुख पाती है वैसा सुख मुलायम शय्या पर पतिके साथभी सो कर नहीं पाती है ॥ ११८ ॥ अथ कदाचित्सा दण्डनायकपुत्रेण सह रममाणा तिष्ठति । अथ दण्डनायकोऽपि रन्तुं तत्रागतः । तमायान्तं दृष्ट्वा तत्पुत्रं कुशूले निक्षिप्य दण्डनायकेन सह तथैव क्रीडति । अनन्तरं तस्या भर्त्ता गोपो गोष्ठात्समागतः । तमालोक्य गोप्योक्तम्-‘दण्डनायक ! त्वं लगुडं गृहीत्वा कोपं दर्शयन्सत्वरं गच्छ । तथा तेनानुष्ठिते गोपेन गृहमागत्य भार्या पृष्टा—‘केन कार्येण दण्डनायकः समा- गत्यात्र स्थितः ?’ । सा ब्रूते—‘अयं केनापि कार्येण पुत्रस्योपरि क्रुद्धः । स च पलायमानोऽत्रागत्य प्रविष्टो मया कुशूले निक्षिप्य रक्षितः । तत्पित्रा चान्विष्यात्र न दृष्टः । अत एवायं दण्डनायकः क्रुद्ध एव गच्छति । ततः सा तत्पुत्रं कुशूला- द्बहिष्कृत्य दर्शितवती । फिर वह किसी दिन दंडनायकके पुत्रके साथ रमण कर रही थी; इतनेमें डंडनायकभी रमण करनेके लिये वहां आ गया । तब उसको आता हुआ देख कर हि० ९

भाग कर यहां आ घुसा था और मैने उसको कुठीलेमें घुसा कर बचा लिया. और

१३० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ११९- उसके पुत्रको कुठीलेमें छुपा कर दंडनायकके साथ वैसेही क्रीड़ा करने लगी. इसके उपरांत उसका भर्त्ता ग्वाला पौहारसे आया. उसको देख कर गोपीने कहा-'हे दंडनायक ! तू लकड़ी ले कर क्रोधको दिखाता हुआ शीघ्र जा. उसके वैसा करने पर ग्वालाने घरमें आ कर स्त्रीसे पूछा-'किस कामसे दंडनायक आ कर यहां बैठा था ?' वह बोली यह किसी कामके कारणसे पुत्रके ऊपर क्रोधित हुवा था. वह भाग कर यहां आ घुसा था और मैने उसको कुठीलेमें घुसा कर बचा लिया. और उसके पिताने यहां ढूंढ कर न देखा इसलिये यह दंडनायक क्रोधित-सा जा रहा है. फिर वह उसके पुत्रको कुठीलेसे बाहर निकाल कर दिखाने लगी. तथा चोक्तम्,— आहारो द्विगुणः स्त्रीणां बुद्धिस्तासां चतुर्गुणा । षड्गुणो व्यवसायश्च कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥ ११९ ॥ जैसा कहा है—स्त्रियोंका आहार दुगुना, बुद्धि चौगुनी, साहस छःगुणा और उनका काम आठगुणा कहा है ॥ ११९ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि—"उत्पन्नेष्वपि कार्येषु" इत्यादि ।' करटको ब्रूते-‘अस्त्वेवम् । किन्त्वनयोर्महानन्योन्यनिसर्गोपजातस्नेहः कथं भेदयितुं शक्यः ?' इसलिये मैं कहता हूं-"कार्यके उत्पन्न होनेमेंभी" इत्यादि !' करटक बोला- 'ऐसाही होय, परन्तु इन दोनोंका आपसमें स्वभावसे बढ़ा हुआ बड़ा स्नेह कैसे छुड़ाया जा सकता है ?' दमनको ब्रूते-‘उपायः क्रियताम् । तथा चोक्तम्,— उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः । काक्या कनकसूत्रेण कृष्णसर्पो निपातितः' ॥ १२० ॥ दमनक बोला-'उपाय करो । जैसा कहा है कि—जो उपायसे हो सकता है वह पराक्रमसे नहीं हो सकता है. जैसे कागलीने सोनेके हारसे काले सांपको मार डाला' ॥ १२० ॥ करटकः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति— करटक पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' दमनक कहने लगा ।—

कथा ८

-१२२ ] बलसे युक्तिके श्रेष्ठत्वमें कौआ-साँपकी १३१ कथा ८ [ कौएका जोडा और काले साँपकी कहानी ८ ] कस्मिंश्चित्तरौ वायसदंपती निवसतः। तयोश्चापत्यानि तत्को- टरावस्थितेन कृष्णसर्पेण खादितानि। ततः पुनर्गर्भवती वायसी वायसमाह—'नाथ ! त्यजतामयं तरुः। अत्रावस्थितकृष्णसर्पेणा- वयोः संततिः सततं भक्ष्यते । किसी वृक्ष पर काग और कागली रहा करते थे. उनके बच्चे उसके खोड़रमें रहने वाला काला सांप खाता था। पीछे फिर गर्भवती कागली कागसे कहने लगी-'हे स्वामी ! इस पेड़को छोड़ो, इसमें रहने वाला काला साँप हमारे बच्चे सर्वदा खा जाया करता है। यतः,— दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः । ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥ १२१ ॥ क्योंकि—दुष्ट स्त्री, धूर्त मित्र, उत्तर देने वाला सेवक, सर्प वाले घरमें रहना, मानो साक्षात् मृत्युही है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १२१ ॥ वायसो ब्रूते-'प्रिये ! न भेतव्यम् । वारंवारं मयैतस्य महापराधः सोढः। इदानीं पुनर्न क्षन्तव्यः' । वायस्याह—'कथमेतेन बलवता सार्धं भवान्विग्रहीतुं समर्थः?'। वायसो ब्रूते— 'अलमनया शङ्कया। काग बोला-'प्यारी ! डरना नहीं चाहिये, वार वार मैंने इसका अपराध सहा है अब फिर क्षमा नहीं करूंगा।' कागली बोली-'किस प्रकार ऐसे बलवान्के साथ तुम लड़ सकते हो?' काग बोला-'यह शंका मत करो । यतः,— बुद्धिर्यस्य बलं तस्य, निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ? । पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः' ॥ १२२ ॥ क्योंकि—जिसको बुद्धि है उसको बल है और जो निर्बुद्धि है उसको बल कहांसे आवे ? देख, मदसे उन्मत्त सिंहको शशकने मार डाला' ॥ १२२ ॥ वायसी विहस्याह—'कथमेतत् ?' । वायसः कथयति— कागली हँस कर बोली-'यह कथा कैसे है?' तब काग कहने लगा ।—