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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

१२२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ११०-

भाई ! सब प्रकारसे मेरा कहना करो और व्यवहार तो हमने करही लिया है । इस घास चरनेवाले संजीवकको धनके अधिकार पर रख दो । इस बातके ऐसा करने पर उसी दिनसे पिंगलक और संजीवकका सब बांधवोंको छोड़ कर बड़े स्नेहसे समय बीतने लगा । फिर सेवकोंको आहार देनेमें शिथिलता देख दमनक और करटक आपसमें चिंता करने लगे । तब दमनक करटकसे बोला—'मित्र ! अब क्या करना चाहिये ? यह अपनाही किया हुआ दोष है, स्वयंही दोष करने पर पछताना भी उचित नहीं है । तथा चोक्तम्— स्वर्णरेखामहं स्पृष्ट्वा बद्धात्मानं च दूतिका । आदित्सुश्च मणिं साधुः स्वदोषाद्दुःखिता इमे' ॥ ११० ॥ जैसा कहा है—मैं स्वर्णरेखाको छू कर, और कुटनी अपनेको बांध कर तथा साधु मणि लेनेकी इच्छासे—ये तीनों अपने दोषसे दुःखी हुए' ॥ ११० ॥ करटको ब्रूते—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति— करटक पूछने लगा—'यह कथा कैसे है ? दमनक कहने लगा । — कथा ६ [ संन्यासी, बनिया, ग्वाला, ग्वालिन और नायनकी कहानी ६ ] अस्ति काञ्चनपुरनाम्नि नगरे वीरविक्रमो राजा । तस्य धर्मा- धिकारिणा कश्चिन्नापितो वध्यभूमिं नीयमानः कंदर्पकेतुनाम्ना परिव्राजकेन साधुद्वितीयेकेन 'नायं हन्तव्यः' इत्युक्त्वा वस्त्राञ्चले धृतः । राजपुरुषा ऊचुः—'किमिति नायं वध्यः ?' । स आह—'श्रू- यताम् ।' “स्वर्णरेखामहं स्पृष्ट्वा” इत्यादि पठति । त आहुः—'कथ- मेतत् ?' । परिव्राजकः कथयति—'अहं सिंहलद्वीपे भूपतेर्जीमूत- केतोः पुत्रः कंदर्पकेतुर्नाम । एकदा केलिकाननात्स्थितेन मया पोतवणिङ्मुखाच्छ्रुतं—'यदत्र समुद्रमध्ये चतुर्दश्यामाविर्भूतकल्प- तरुतले रत्नावलीकिरणकर्बुरपर्यङ्के स्थिता सर्वांलंकारभूषिता लक्ष्मीरिव वीणां वादयन्ती कन्या काचिद्दृश्यते' इति । ततोऽहं पोतवणिजमादाय पोतमारुह्य तत्र गतः । अनन्तरं तत्र गत्वा पर्यङ्केऽर्धमग्ना तथैव साऽवलोकिता । ततस्तल्लावण्यगुणाकृष्टेन

-११० ] राजसेवकोंको संन्यासीका आत्मवृत्त कहना १२३ मयापि तत्पश्चाज्झम्पो दत्तः । तदनन्तरं कनकपत्तनं प्राप्य सुवर्णप्रासादे तथैव पर्यङ्के स्थिता विद्याधरीभिरुपास्यमाना मया- लोकिता । तयाप्यहं दूरादेव दृष्ट्वा सखीं प्रस्थाप्य सादरं संभा- षितः । तत्सख्या च मया पृष्टया समाख्यातम्—'एषा कंदर्प- केलिनाम्नो विद्याधरचक्रवर्तिनः पुत्री रत्नमञ्जरी नाम प्रतिज्ञा- पिता विद्यते । ‘-“यः कनकपत्तनं स्वचक्षुषागत्य पश्यति स एव पितुरगोचरोऽपि मां परिणेष्यति” इति मनसः संकल्पः । तदेनां गान्धर्वविवाहेन परिणयतु भवान् ।' अथ तत्र वृत्ते गान्धर्ववि- वाहे तया सह रममाणस्तत्राहं तिष्ठामि । तत एकदा रहसि तयोक्तम्—'स्वामिन् ! स्वेच्छया सर्वमिदमुपभोक्तव्यम् । एषा चित्रगता स्वर्णरेखा नाम विद्याधरी न कदाचित् स्प्रष्टव्या । पश्चा- दुपजातकौतुकेन मया स्वर्णरेखा स्वहस्तेन स्पृष्टा । तया चित्र- गतयाप्यहं चरणपद्मेन ताडित आगत्य स्वराष्ट्रे पतितः । अथ दुःखार्तोऽहं परिव्राजितः पृथिवीं परिभ्राम्यन्निमां नगरीमनुप्राप्तः। अत्र चातिक्रान्ते दिवसे गोपगृहे सुप्तः सन्नपश्यम् । प्रदोषसमये सुहृदां पालनं कृत्वा स्वगेहमागतो गोपः स्ववधूं दूत्या सह किमपि मन्त्रयन्तीमपश्यत् । ततस्तां गोपीं ताडयित्वा स्तम्भे बद्धा सुप्तः ततोऽर्धरात्र एतस्य नापितस्य वधूर्दूती पुनस्तां गोपीमुपेत्यावदत्— तव विरहानलदग्धोऽसौ स्मरशरर्जरितो मुमूर्षुरिव वर्तते । कांचनपुर नाम नगरमें वीरविक्रम नाम एक राजा था । उसका धर्माधिकारी किसी नाईको वधस्थानमें ले जा रहा था, उस समय कंदर्पकेतु नाम कोई संन्यासी जिसका साथी एक बनिया था उसने 'यह मारनेके योग्य नहीं है' यह कह कर अपने वस्त्रके पल्लेसे उसे छिपा लिया । राजाके सेवक बोले-‘यह मारनेके योग्य क्यों नहीं है ?' वह बोला-‘सुनिये, “मैं स्वर्णरेखाको छू कर” इत्यादि पढ़ता है ।' वे बोले-‘यह कथा कैसी है ?’ । संन्यासी कहने लगा-‘मैं : सिंहलद्वीपके जीमूतकेतु नाम राजाका कन्दर्पकेतु नामक पुत्र हूं । एक समय मैंने क्रीडाविहारके उपवनमें बैठे बैठे एक नावके व्यापारीके मुखसे यह सुना कि यहां समुद्रके बीचोबीचमें चौदसके दिन कल्पवृक्ष निकलता है; उसके नीचे रत्नोंकी किरणोंका बाढ़की झलकसे झलकते

१२४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १११- हुए रंगबिरंगे पलंग पर बठी हुई और सब आभूषणोंसे भूषित दूसरी लक्ष्मीके समान बीनको बजाती हुई कोई कन्या दिखाई दिया करती है । फिर मैं नावके व्यापारीको लाकर और नाव पर चढ़ कर वहां गया । पीछे वहां जा कर पलंग पर आधी डूबी हुई जैसी कही वैसीही मैंने देखी । फिर उसके सुन्दरताके गुणोंसे लुभाया गया, मैं भी उसके पीछे झट कूद पड़ा । इसके अनन्तर कनकपुरमें पहुंच कर सुवर्णके भवनमें वैसेही पलंग पर बैठी हुई और विद्याधरियोंसे सेवा की गईको मैंने देखी, उसनेभी मुझे दूरसे देख कर और सहेलीको भेज कर आदरसे “मुझे बुलानेका” संदेसा कहला भेजा । और जब मैंने सखीसे “उसके विषयमें” पूछा, तब उसने सब अच्छे प्रकारसे कह सुनाया कि यह कंदर्पकेलि नामक अप्सराओंके चक्रवर्ती राजाकी रत्नमंजरी नाम बेटी यह प्रतिज्ञा कर बैठी है कि “जो कोई कनकपुरको अपने नेत्रसे देखेगा वह मेरे पिताको विना जाने भी मुझे ब्याह लेगा’ । यह मनका संकल्प है । इसलिये आप इसके साथ गंधर्वविवाह कर लीजिये ।' फिर वहां गंधर्वविवाह होनेके बाद उसके साथ रमण करता हुआ मैं वहां रहने लगा । फिर एक दिन उसने मुझसे एकांतमें कहा-‘हे स्वामी ! अपनी इच्छापूर्वक यह सब पदार्थ भोगो । परंतु इस चित्रलिखित सुवर्णरेखा नाम अप्सराको कभी छूना नहीं । फिर एक दिन कुतूहलसे मैंने स्वर्णरेखाको अपने हाथसे छू लिया और उस चित्रमें लिखी हुई (सुवर्णरेखा) ने अपने चरणकमलसे मुझे ऐसा ठुकराया कि मैं अपने राज्यमें आ पड़ा ! पीछे मैं दुःखसे दुःखी संन्यासी हुआ पृथ्वी पर घूमता घूमता इस नगरीमें आ पहुंचा हूं और यहां दिनके डूबने पर एक ग्वालाके घरमें सोते सोते देखा कि सन्ध्याके समय ग्वाला मित्रोंका सत्कार करके अपने घर आया और अपनी स्त्रीको एक कुट्टनीके साथ कुछ गुह्य भाषण करते हुए देख लिया । फिर उस ग्वालिनको मारपीट कर और खंभेमें बांध कर सो रहा । पीछे आधी रातको इसी नाईकी बहू कुट्टनी फिर उस घोसिनके पास आ कर कहने लगी-‘तेरे विरहकी अग्निसे जला हुआ कामदेवके बाणोंसे घायल वह मरासू-सा हो रहा है । तथा चोक्तम्,— रजनीचरनाथेन खण्डिते तिमिरे निशि । यूनां मनांसि विव्याध दृष्ट्वा दृष्ट्वा मनोभवः ॥ १११ ॥

-१११] ग्वालाने स्त्री समझ कर नायनका नाक काटना १२५

जैसा कहा है—चन्द्रमासे रातमें अंधकार दूर होने पर कामदेवने देख देख कर युवाओंके चित्तोंको व्याकुल किया ॥ १११ ॥ तस्य तादृशीमवस्थामवलोक्य परिक्लिष्टमनास्त्वामनुवर्तितुमा- गता । तदहमत्रात्मानं बद्धा तिष्ठामि । त्वं तत्र गत्वा तं संतोष्य सत्वरमागमिष्यसि । तथाऽनुष्ठिते सति स गोपः प्रबुद्धोऽवदत्- 'इदानीं त्वां पापिष्ठां जारान्तिकं नयामि' । ततो यदासौ न किंचिदपि ब्रूते तदा क्रुद्धो गोपः 'दर्पान्मम वचसि प्रत्युत्तरमपि न ददासि ?' इत्युक्त्वा कोपेन तेन कर्तिकामादायास्या नासिका छिन्ना । तथा कृत्वा पुनः सुप्तो गोपो निद्रामुपगतः । अथागत्य गोपी दूतीमपृच्छत्—'का वार्ता ?' । दूत्योक्तम्—'पश्य माम् । मुखमेव वार्तां कथयति ।' अनन्तरं सा गोपी तथा कृत्वोत्मानं बद्ध्वा स्थिता इयं च दूती तां छिन्ननासिकां गृहीत्वा स्वगृहं प्रविश्य स्थिता । ततः प्रातरेवानेन नापितेन स्ववधूः क्षुरभाण्डं याचिता सती क्षुरमेकं प्रादात् । ततोऽसमग्रभाण्डे प्राप्ते समुपजातको- पोऽयं नापितस्तं क्षुरं दूरादेव गृहे क्षिप्तवान् ॥ अथ कृतार्तरावेयं विनापराधेन मे नासिकाऽनेन छिन्नेत्युक्त्वा धर्माधिकारिसमीप- मेनमानीतवती ॥ सा च गोपी तेन गोपेन पुनः पृष्टोवाच—'अरे पाप ! को मां महासतीं निरूपयितुं समर्थः ? मम व्यवहारम- कल्मषमष्टौ लोकपाला एव जानन्ति । उसकी वैसी दशा देख कर मनमें घबराई हुई तेरी अनुवर्तिनी (एवजी) करने आई हूं । इसलिये मैं यहां अपनेको बांध कर रहती हूं । तू वहां जा कर उसको संतुष्ट कर—शीघ्र लौट आइयो' । ऐसा कहने पर वह ग्वाला जाग कर कहने लगा-'अब तुझ पापिनको तेरे यारके पास ले चलूं।' फिर जब यह कुछ न बोली तब ग्वाला झुंझलाया । 'घमंडसे मेरी बातका उत्तरभी नहीं देती है ?' यह कह कर क्रोधसे उसने छुरी निकाल, उसकी नाक काट डाली । वैसा करके ग्वाला फिर सो गया, और उसे निद्रा आ गई । फिर ग्वालिनने आ कर दूतीसे पूछा— 'क्या बात है ?' दूतीने कहा-'मुझे देख ले, मुखही बात कह देता है।' फिर वह ग्वालिन वैसेही करके आप अपनेको बांध कर ठहरी रही, और वह दूती उस कटी हुई नाकको ले कर अपने घरमें घुस कर बैठी रही । फिर प्रातःकाल होतेही

१२६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ११२- इस नाईने अपनी बहूसे पेटी माँगी । उसने एक उस्तरा दे दिया । फिर अधूरी पेटीको पा कर इसे बड़ा क्रोध आया और इस नाईने उस उस्तरेको दूरसेही घरमें फेंक दिया । पीछे इसने बड़ा हुर्रा मचाया कि बिना अपराध इसने मेरी नाक काट डाली है; यह कह कर इसे धर्माधिकारीके पास ले आई । और उधर ग्वालाने उस ग्वालिनसे फिर पूछा और वह बोली-‘अरे पापी ! कोन मुझसी महापतिव्रताका निरूपण कर सकता है ? मेरे पापरहित व्यवहारको आठों लोकपालभी जानते हैं । यतः,— आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ ११२ ॥ क्योंकि--सूर्य, चंद्रमा, पवन, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिन, रात, दोनों संध्या और धर्म ये मनुष्यके आचरणको जानते हैं ॥ ११२ ॥ यद्यहं परमसती स्याम्, त्वां विहायान्यं न जाने, पुरुषान्तरं स्वप्नेऽपि न हि भजे, तेन धर्मेण छिन्नापि मम नासिकाऽच्छि- न्नास्तु । मया त्वं भस्म कर्तुं शक्यसे । किंतु स्वामी त्वम् । लोकभयादुपेक्षे । पश्य मन्मुखम् ।' ततो यावदसौ गोपो दीपं प्रज्वाल्य तन्मुखमवलोकते तावदुन्नसं मुखमवलोक्य तच्चरणयोः पतितः—'धन्योऽयं यस्येदृशी भार्या परमसाध्वी' इति । योऽय- मास्ते साधुरेतद्वृत्तान्तमपि कथयामि । अयं स्वगृहान्निर्गतो द्वादशवर्षैर्मलयोपकण्ठादिमां नगरीमनुप्राप्तः । अत्र वेश्यागृहे सुप्तः । तस्याः कुट्टन्या गृहद्वारि स्थापितकाष्ठघटितवेतालस्य मूर्धनि रत्नमेकमुत्कृष्टमास्ते। तत्र लुब्धेनानेन साधुना रात्रावुत्थाय रत्नं ग्रहीतुं यत्नः कृतः । तदा तेन वेतालेन सूत्रसंचारितबाहुभ्यां पीडितः सन्नार्तनादमयं चकार । पश्चादुत्थाय कुट्टन्योक्तम्— ‘पुत्र ! मलयोपकण्ठादागतोऽसि । तत्सर्वरत्नानि प्रयच्छास्मै नो चेदनेन न त्यक्तव्योऽसि ।' इत्थमेवायं चेटकः । ततोऽनेन सर्वरत्नानि समर्पितानि यथाऽयमपहृतसर्वस्वोऽस्मासु समागत्य मिलितः।' एतत्सर्वं श्रुत्वा राजपुरुषैर्न्याये धर्माधिकारी प्रवर्तितः ।

-११३] दूती और ग्वालिनको देशनिकालकी शिक्षा १२७ अनन्तरं तेन सा दूती गोपी च ग्रामाद्बहिर्निःसारिते । नापितश्च गृहं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि–“स्वर्णरेखामहं स्पृष्ट्वा” इत्यादि ॥ अथ स्वयं कृतोऽयं दोषः । अत्र विलापं नोचितम् । (क्षणं विमृश्य ।) मित्र ! यथाऽनयोः सौहार्दं मया कारितं तथा मित्रभेदोऽपि मया कार्यः । जो मैं सच्ची पतिव्रता होऊं, तुझे छोड़ दूसरेको न जानती होऊं, दूसरे पुरुषको खप्नमेंभी न भजती होऊं तो उस पातिव्रत्य धर्मसे मेरी कटी हुई नाकभी बिना कटी हो जाय. मैं तुझे भस्म कर सकती हूं, परन्तु तू पति है, संसारके भयसे डरती हूं। मेरा मुख देख । 'फिर जब उस ग्वालेने दिया जला कर उसका मुख देखा तभी उसका नाकसमेत मुख देख कर उसके चरणोंमें गिर पड़ा–‘मुझे धन्य है कि जिसकी ऐसी पतिव्रता स्त्री है ॥ और यह दूसरा जो बनिया है उसका वृत्तान्तभी कहता हूं। यह अपने घरसे निकल कर बारह बरसमें मलया- चलके पास इस नगरीमें आया, यहां वेश्याके घरमें सोया; उस कुट्टनीके घरके द्वार पर बैठाये गये काठके बने हुए वेतालके सिरमें एक अनमोल रत्न था. वहां इस लोभी बनियेने रातको उठ कर रत्न लेनेका यत्न किया. तब उस पिशाचने सूतसे चलाई गई भुजाओंसे उसे खींचा और वह रो कर चिल्लाया. पीछे उठ कर कुट्टनीने कहा–‘हे पुत्र ! तू मलयके पाससे आया है। इसलिये सब रत्न इसे दे दे. नहीं तो तू इससे नहीं छुटेगा; यह सेवक ऐसाही है’. तब इसने सब रत्न दे दिये. और इस प्रकार यह सर्वस्व खो कर हमारे साथ आ कर मिल गया । यह सब सुन कर राजपुरुषोंने न्याय करनेके लिये धर्माधिकारीको प्रवृत्त कर दिया; फिर उसने उस दूती और ग्वालिनको देसनिकाला दे दिया ॥ और नाईभी घर गया। इसलिये मैं कहता हूं–“स्वर्णरेखाको मैंने छू कर” इत्यादि ॥ और यह अपनाही किया दोष है। इसमें विलाप करना उचित नहीं है । (क्षणभर जीमें विचार कर) हे मित्र ! जैसे मैंने इन दोनोंकी मित्रता कराई थी वैसेही मित्रोंमें फूट भी कराऊंगा. यतः,— अतथ्यान्यपि तथ्यानि दर्शयन्त्यतिपेशलाः । समे निम्नोन्नतानीव चित्रकर्मविदो जनाः ॥ ११३ ॥

१२८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ११४- क्योंकि—अति चतुर मनुष्य झूठी बातोंकोभी सच्ची कर दिखाते हैं; जैसे चित्रके कामको जानने वाले मनुष्य, एकसे स्थान पर पहाड़, घर इत्यादि खींच कर नीचा ऊंचा दिखाते हैं ॥ ११३ ॥ अपरं च,— उत्पन्नेष्वपि कार्येषु मतिर्यस्य न हीयते । स निस्तरति दुर्गाणि गोपी जारद्वयं यथा ॥ ११४ ॥ और दूसरे—जिसकी बुद्धि कार्योंके उपस्थित होने परभी नहीं घटती है वह मनुष्य संकटोंसे ऐसे बच जाता है, जैसे एक ग्वालिनने दो यारोंका निस्तारा किया ॥ ११४ ॥ करटकः पृच्छति—‘कथमेतत् ?’। दमनकः कथयति— करटक पूछने लगा—‘यह कथा कैसे है ?’ दमनक कहने लगा।— कथा ७ [ ग्वाला, व्यभिचारिणी ग्वालिन, कोतवाल और उसके पुत्रकी कहानी ७ ] अस्ति द्वारवत्यां पुर्यां कस्यचिद्गोपस्य वधूर्बन्धकी। सा ग्रामस्य दण्डनायकेन तत्पुत्रेण च समं रमते । द्वारावती नाम नगरीमें किसी ग्वालेकी बहू व्यभिचारिणी थी। वह गांवके दंडनायक और उसके पुत्रके साथ रमण किया करती थी. तथा चोक्तम्,— नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥ ११५ ॥ और वैसा कहा भी है कि-अग्नि काष्ठोंसे, समुद्र नदियोंसे, मृत्यु सब प्राणि- योंसे, और स्त्री पुरुषोंसे तृप्त नहीं होती है ॥ ११५ ॥ अन्यच्च,— न दानेन न मानेन नार्जवेन न सेवया । न शस्त्रेण न शास्त्रेण सर्वथा विषमाः स्त्रियः ॥ ११६ ॥ और स्त्रियोंका (धन आदिके) दानसे, सन्मानसे, (मिष्ट भाषण आदि) सीधेपनसे, सेवासे, शस्त्रसे और शास्त्रसे “वशमें होना” सब प्रकारसे कठिन है ॥ ११६ ॥

  • ११८ ] समयपर ग्वालिनकी चतुराई १२९ - यतः,— गुणाश्रयं कीर्तियुतं च कान्तं पतिं रतिज्ञं सधनं युवानम् । विहाय शीघ्रं वनिता व्रजन्ति नरान्तरं शीलगुणादिहीनम् ॥ ११७ ॥ क्योंकि-स्त्रियां सब गुणोंसे युक्त, यशस्वी, सुन्दर, कामशील, धनवान्, जवान ऐसे पतिको छोड़ कर शील और गुणसे हीन दूसरे मनुष्यके पास शीघ्र जाती हैं ॥ ११७ ॥ अपरं च,— न तादृशीं प्रीतिमुपैति नारी विचित्रशय्यां शयितापि कामम् । यथा हि दूर्वादिविकीर्णभूमौ प्रयाति सौख्यं परकान्तसङ्गात् ॥ ११८ ॥ और दूसरे-स्त्री जैसी कि तृण आदि बिछी हुई भूमि पर यारके साथ अधिक सुख पाती है वैसा सुख मुलायम शय्या पर पतिके साथभी सो कर नहीं पाती है ॥ ११८ ॥ अथ कदाचित्सा दण्डनायकपुत्रेण सह रममाणा तिष्ठति । अथ दण्डनायकोऽपि रन्तुं तत्रागतः । तमायान्तं दृष्ट्वा तत्पुत्रं कुशूले निक्षिप्य दण्डनायकेन सह तथैव क्रीडति । अनन्तरं तस्या भर्त्ता गोपो गोष्ठात्समागतः । तमालोक्य गोप्योक्तम्-‘दण्डनायक ! त्वं लगुडं गृहीत्वा कोपं दर्शयन्सत्वरं गच्छ । तथा तेनानुष्ठिते गोपेन गृहमागत्य भार्या पृष्टा—‘केन कार्येण दण्डनायकः समा- गत्यात्र स्थितः ?’ । सा ब्रूते—‘अयं केनापि कार्येण पुत्रस्योपरि क्रुद्धः । स च पलायमानोऽत्रागत्य प्रविष्टो मया कुशूले निक्षिप्य रक्षितः । तत्पित्रा चान्विष्यात्र न दृष्टः । अत एवायं दण्डनायकः क्रुद्ध एव गच्छति । ततः सा तत्पुत्रं कुशूला- द्बहिष्कृत्य दर्शितवती । फिर वह किसी दिन दंडनायकके पुत्रके साथ रमण कर रही थी; इतनेमें डंडनायकभी रमण करनेके लिये वहां आ गया । तब उसको आता हुआ देख कर हि० ९

भाग कर यहां आ घुसा था और मैने उसको कुठीलेमें घुसा कर बचा लिया. और

१३० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ११९- उसके पुत्रको कुठीलेमें छुपा कर दंडनायकके साथ वैसेही क्रीड़ा करने लगी. इसके उपरांत उसका भर्त्ता ग्वाला पौहारसे आया. उसको देख कर गोपीने कहा-'हे दंडनायक ! तू लकड़ी ले कर क्रोधको दिखाता हुआ शीघ्र जा. उसके वैसा करने पर ग्वालाने घरमें आ कर स्त्रीसे पूछा-'किस कामसे दंडनायक आ कर यहां बैठा था ?' वह बोली यह किसी कामके कारणसे पुत्रके ऊपर क्रोधित हुवा था. वह भाग कर यहां आ घुसा था और मैने उसको कुठीलेमें घुसा कर बचा लिया. और उसके पिताने यहां ढूंढ कर न देखा इसलिये यह दंडनायक क्रोधित-सा जा रहा है. फिर वह उसके पुत्रको कुठीलेसे बाहर निकाल कर दिखाने लगी. तथा चोक्तम्,— आहारो द्विगुणः स्त्रीणां बुद्धिस्तासां चतुर्गुणा । षड्गुणो व्यवसायश्च कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥ ११९ ॥ जैसा कहा है—स्त्रियोंका आहार दुगुना, बुद्धि चौगुनी, साहस छःगुणा और उनका काम आठगुणा कहा है ॥ ११९ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि—"उत्पन्नेष्वपि कार्येषु" इत्यादि ।' करटको ब्रूते-‘अस्त्वेवम् । किन्त्वनयोर्महानन्योन्यनिसर्गोपजातस्नेहः कथं भेदयितुं शक्यः ?' इसलिये मैं कहता हूं-"कार्यके उत्पन्न होनेमेंभी" इत्यादि !' करटक बोला- 'ऐसाही होय, परन्तु इन दोनोंका आपसमें स्वभावसे बढ़ा हुआ बड़ा स्नेह कैसे छुड़ाया जा सकता है ?' दमनको ब्रूते-‘उपायः क्रियताम् । तथा चोक्तम्,— उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः । काक्या कनकसूत्रेण कृष्णसर्पो निपातितः' ॥ १२० ॥ दमनक बोला-'उपाय करो । जैसा कहा है कि—जो उपायसे हो सकता है वह पराक्रमसे नहीं हो सकता है. जैसे कागलीने सोनेके हारसे काले सांपको मार डाला' ॥ १२० ॥ करटकः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति— करटक पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' दमनक कहने लगा ।—

कथा ८

-१२२ ] बलसे युक्तिके श्रेष्ठत्वमें कौआ-साँपकी १३१ कथा ८ [ कौएका जोडा और काले साँपकी कहानी ८ ] कस्मिंश्चित्तरौ वायसदंपती निवसतः। तयोश्चापत्यानि तत्को- टरावस्थितेन कृष्णसर्पेण खादितानि। ततः पुनर्गर्भवती वायसी वायसमाह—'नाथ ! त्यजतामयं तरुः। अत्रावस्थितकृष्णसर्पेणा- वयोः संततिः सततं भक्ष्यते । किसी वृक्ष पर काग और कागली रहा करते थे. उनके बच्चे उसके खोड़रमें रहने वाला काला सांप खाता था। पीछे फिर गर्भवती कागली कागसे कहने लगी-'हे स्वामी ! इस पेड़को छोड़ो, इसमें रहने वाला काला साँप हमारे बच्चे सर्वदा खा जाया करता है। यतः,— दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः । ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥ १२१ ॥ क्योंकि—दुष्ट स्त्री, धूर्त मित्र, उत्तर देने वाला सेवक, सर्प वाले घरमें रहना, मानो साक्षात् मृत्युही है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १२१ ॥ वायसो ब्रूते-'प्रिये ! न भेतव्यम् । वारंवारं मयैतस्य महापराधः सोढः। इदानीं पुनर्न क्षन्तव्यः' । वायस्याह—'कथमेतेन बलवता सार्धं भवान्विग्रहीतुं समर्थः?'। वायसो ब्रूते— 'अलमनया शङ्कया। काग बोला-'प्यारी ! डरना नहीं चाहिये, वार वार मैंने इसका अपराध सहा है अब फिर क्षमा नहीं करूंगा।' कागली बोली-'किस प्रकार ऐसे बलवान्के साथ तुम लड़ सकते हो?' काग बोला-'यह शंका मत करो । यतः,— बुद्धिर्यस्य बलं तस्य, निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ? । पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः' ॥ १२२ ॥ क्योंकि—जिसको बुद्धि है उसको बल है और जो निर्बुद्धि है उसको बल कहांसे आवे ? देख, मदसे उन्मत्त सिंहको शशकने मार डाला' ॥ १२२ ॥ वायसी विहस्याह—'कथमेतत् ?' । वायसः कथयति— कागली हँस कर बोली-'यह कथा कैसे है?' तब काग कहने लगा ।—

कथा ९

१३२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १२३- कथा ९ [ सिंह और बूढे गीदड़की कहानी ९ ] ‘अस्ति मन्दरनाम्नि पर्वते दुर्दान्तो नाम सिंहः । स च सर्वदा पशूनां वधं कुर्वन्नास्ते । ततः सर्वैः पशुभिर्मिलित्वा स सिंहो विज्ञप्तः—‘मृगेन्द्र ! किमर्थमेकदा बहुपशुघातः क्रियते ? यदि प्रसादो भवति तदा वयमेव भवदाहाराय प्रत्यहमेकैकं पशुमुप- ढौकयामः ।’ ततः सिंहेनोक्तम्—‘यद्येतदभिमतं भवतां तर्हि भवतु तत् । ततः प्रभृत्येकैकं पशुमुपकल्पितं भक्षयन्नास्ते । अथ कदाचिद्वृद्धशशकस्य वारः समायातः । ‘मन्दर नाम पर्वत पर दुर्दान्त नाम एक सिंह रहता था और वह सदा पशुओंका वध करता रहता था. तब सब पशुओंने मिल कर उस सिंहसे बिनति की ‘सिंह ! एकसाथ बहुतसे पशुओंकी क्यों हत्या करते हो ? जो प्रसन्न हो तो हमही तुम्हारे भोजनके लिये नित्य एक एक पशुको भिजवा दिया करेंगे ।’ फिर सिंहने कहा—‘जो यह तुमको इष्ट है तो योंही सही.’ उस दिनसे निश्चित किये हुए एक एक पशुको खाया करता था । फिर एक दिन एक बूढ़े शशक ( खरगोश-) की बारी आई. सोऽचिन्तयत्— ‘त्रासहेतोर्विनीतिस्तु क्रियते जीविताशया । पञ्चत्वं चेद्गमिष्यामि किं सिंहानुनयेन मे ? ॥ १२३ ॥ वह सोचने लगा—‘जीनेकी आशासे भयके कारणकी अर्थात् मारने वालेकी विनय की जाती है और जब मरनाही ठहरा, फिर मुझे सिंहकी बिनतीसे क्या काम है ? ॥ १२३ ॥ तन्मन्दं मन्दं गच्छामि ।' ततः सिंहोऽपि क्षुधापीडितः कोपात्त- मुवाच—‘कुतस्त्वं विलम्ब्य समागतोऽसि ?’ । शशकोऽब्रवीत्— ‘देव ! नाहमपराधी । आगच्छन्पथि सिंहान्तरेण बलाद्धृतः । तस्याग्रे पुनरागमनाय शपथं कृत्वा स्वामिनं निवेदयितु- मत्रागतोऽस्मि ।’ सिंहः सकोपमाह—‘सत्वरं गत्वा दुरात्मानं दर्शय, क्व स दुरात्मा तिष्ठति ? ।’ ततः शशकस्तं गृहीत्वा

-१२३ ] छोटेसे शशककी युक्तिसे बलिष्ठ सिंहकी मृत्यु १३३ गभीरकूपं दर्शयितुं गतः। तत्रागत्य 'स्वयमेव पश्यतु स्वामी' इत्युक्त्वा तस्मिन्कूपजले तस्य सिंहस्यैव प्रतिबिम्बं दर्शितवान् , ततोऽसौ क्रोधाध्मातो दर्पात्तस्योपर्यात्मानं निक्षिप्य पञ्चत्वं गतः। अतोऽहं ब्रवीमि- "बुद्धिर्यस्य" इत्यादि' ॥ वायस्याह- 'श्रुतं मया सर्वम्। संप्रति यथा कर्तव्यं तद्ब्रूहि ।' वायसोऽ- वदत् - 'अत्रासन्ने सरसि राजपुत्रः प्रत्यहमागत्य स्नाति । स्नानसमये तदङ्गादवतारितं तीर्थशिलानिहितं कनकसूत्रं चञ्च्वा विधृत्यानीयास्मिन्कोटरे धारयिष्यसि ।' अथ कदाचित्स्नातुं जलं प्रविष्टे राजपुत्रे वायस्या तदनुष्ठितम् । अथ कनक- सूत्रानुसरणप्रवृत्तै राजपुरुषैस्तत्र तरुकोटरे कृष्णसर्पो दृष्टो व्यापादितश्च । अतोऽहं ब्रवीमि- "उपायेन हि यच्छक्यम्" इत्यादि ॥' करटको ब्रूते-'यद्येवं तर्हि गच्छ । शिवास्ते सन्तु पन्थानः ।' ततो दमनकः पिङ्गलकसमीपं गत्वा प्रणम्योवाच- 'देव ! आत्ययिकं किमपि महाभयकारि कार्यं मन्यमानः समा- गतोऽस्मि। इसलिये धीरे धीरे चलता हूं. पीछे सिंहभी भूखके मारे झुंझला कर उससे बोला-'तू किसलिये देर करके आया है ? शशक बोला-'महाराज ! मैं अपराधी नहीं हूं, मार्गमें आते हुए मुझको दूसरे सिंहने बलसे पकड लिया था । उसके सामने फिर लौट आनेकी सौगन्द खा कर स्वामीको जतानेके लिये यहां आया हूं.' सिंह क्रोधयुक्त हो कर बोला-'शीघ्र चल कर दुष्टको दिखला कि वह दुष्ट कहां बैठा है.' फिर शशक उसे साथ ले कर एक गहरा कुआ दिखलानेको ले गया । वहां पहुंच कर "स्वामी ! आपही देख लीजिये" यह कह कर उस कुएके जलमें उसी सिंहकी परछांही दिखला दी. फिर वह क्रोधसे दहाड़ कर घमंडसे उसके ऊपर अपनेको गिरा कर मर गया । इसलिये मैं कहता हूं-"जिसकी बुद्धि है" इत्यादि ।' कागली बोली-'मैंने सब सुन लिया. अब जो करना है सो कहो ।' फिर काग बोला-'यहां पासही सरोवरमें राजपुत्र नित्य आ कर स्नान करता है । स्नानके समय उसके अंगसे उतार कर घाट पर धरे हुए सोनेके हारको चोंचसे पकड़ इस बिलेमें ला कर धर दीजियो ।' पीछे एक दिन राजपुत्रके नहानेके लिये जलमें उतरने पर कागलीने वही किया. फिर सोनेके हारके पीछे

१३४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १२४- ढूंढ खखोल करने वाले राजाके पुरुषोंने उस वृक्षके बिलमें काले सांपको देखा और मार डाला. इसलिये मैं कहता हूं-“उपायसे जो हो सकता है” इत्यादि-’ करटक बोला-‘जो ऐसा है तो चले जाओ, तुम्हारे मार्ग कल्याणकारी हो ।’ पीछे दमनक पिंगलकके पास जा कर प्रणाम करके बोला-‘महाराज ! नाशकारी और बड़े भयके करने वाले किसी कामको जान कर आया हूं. यतः,— आपद्युन्मार्गमने कार्यकालात्ययेषु च । कल्याणवचनं ब्रूयादपृष्टोऽपि हितो नरः ॥ १२४ ॥ क्योंकि—आपत्तिमें, कुमार्गसे जाने पर, कामका समय बीतनेमें हितकारी मनुष्यको बिना पूछेभी कल्याणकारी बात कह देना चाहिये ॥ १२४ ॥ अन्यच्च,— भोगस्य भाजनं राजा, न राजा कार्यभाजनम् । राजकार्यपरिध्वंसी मन्त्री दोषेण लिप्यते ॥ १२५ ॥ और दूसरे-राजा भोगका पात्र है अर्थात् सुख भोगनेके लिये है, कुछ काम करनेके लिये नहीं है, राजाके कार्यको नाश करने ( बिगाडने ) वाला मंत्रीही दोषभागी होता है ॥ १२५ ॥ तथा हि पश्य । अमात्यानामेष क्रमः,— और देखो, मंत्रियोंकी यह रीति है,— वरं प्राणपरित्यागः शिरसो वापि कर्तनम् । न तु स्वामिपदावाप्तिपातकेच्छोरुपेक्षणम्’ ॥ १२६ ॥ प्राणका त्याग और शिरका कट जानाभी अच्छा है परन्तु राजाको राज्य- हरणरूपी पातक करने वालेको दंड न देना अच्छा नहीं है ॥ १२६ ॥ पिङ्गलकः सादरमाह—‘अथ भवान् किं वक्तुमिच्छति ?’। दम- नको ब्रूते—‘देव ! संजीवकस्त्वोपर्यसदृशव्यवहारीव लक्ष्यते । तथा चास्मत्संनिधाने श्रीमद्देवपादानां शक्तित्रयनिन्दां कृत्वा राज्यमेवाभिलषति ।’ एतच्छ्रुत्वा पिङ्गलकः सभयं साश्चर्यं मत्वा तूष्णीं स्थितः । दमनकः पुनराह—‘देव ! सर्वामात्यपरित्यागं कृत्वैक एवायं यत्त्वया सर्वाधिकारी कृतः स एव दोषः ।

-१२९ ] दमनकका धूर्ततायुक्त भाषण १३५ पिंगलकने आदरसे कहा-'तू क्या कहना चाहता है?' दमनकने कहा-'यह संजीवक तुम्हारे ऊपर अयोग्य काम करने वाला-सा दीखता है और मेरे सामने महाराजकी तीनों १शक्तियोंकी निन्दा करके राज्यकोही छीनना चाहता है ॥ यह सुन कर पिंगलक भय और आश्चर्यसे मान कर चुप हो गया ॥ दमनक फिर बोला-'महाराज ! सब मंत्रियोंको छोड़ कर एक इसीको जो तुमने सर्वाधिकारी (सब कामका अधिकारी ) बना रक्खा है वही दोष है ॥ यतः,— अत्युच्छ्रिते मन्त्रिणि पार्थिवे च विष्टभ्य पादावुपतिष्ठते श्रीः । सा स्त्रीस्वभावादसहा भरस्य तयोर्द्वयोरेकतरं जहाति ॥ १२७ ॥ क्योंकि—राजलक्ष्मी राजाके तथा मंत्रीके अधिक उन्नति पाने पर चरणोंमें गिर कर (दोनोंकी) सेवा करती है और फिर स्त्रीके स्वभावसे उन दोनोंके भारको नहीं सहन करती हुई दोनोंमेंसे एकको छोड़ देती है ॥ १२७ ॥ अपरं च,— एकं भूमिपतिः करोति सचिवं राज्ये प्रमाणं यदा तं मोहाच्छ्रयते मदः स च मदालस्येन निर्भिद्यते । निर्भिन्नस्य पदं करोति हृदये तस्य स्वतन्त्रस्पृहा स्वातन्त्र्यस्पृहया ततः स नृपतेः प्राणान्तिकं द्रुह्यति ॥१२८॥ और दूसरे-जब राजा राज्य पर एक मंत्रीको (सब कामका अधिकारी) मुखिया कर देता है तब उसे अभिमानसे मद हो जाता है और मदान्धताके आलस्यसे आपसमें फूट हो जाती है और फिर फूट होनेसे उसके हृदयमें स्वतन्त्रताका अभिलाष होता है, अर्थात् सर्वश्रेष्ठ होना चाहता है, और फिर स्वातन्त्र्यके लाभकी इच्छासे वह मंत्री राजाके प्राण लेने तक की शत्रुता करता है ॥ १२८ ॥ अन्यच्च,— विषदिग्धस्य भक्तस्य दन्तस्य चलितस्य च । अमात्यस्य च दुष्टस्य मूलादुद्धरणं सुखम् ॥ १२९ ॥ १ प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति और उत्साहशक्ति.

१३६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १३०- और-विषयुक्त अन्नको, हिलते हुए दांतको, और दुष्ट मंत्रीको जड़से उखाड डालनाही सुख है ॥ १२९ ॥ किंच,- यः कुर्यात्सचिवायत्तां श्रियं तद्व्यसने सति । सोऽन्धवज्जगतीपालः सीदेत् संचारकैर्विना ॥ १३० ॥ और जो राजा, लक्ष्मीको मंत्रीके आधीन कर देता है वह राजा उस मन्त्रीके मरण आदि विपत्तिमें गिरने पर चलाने वालेके बिना, अंधेके समान दुःख पाता है ॥ १३० ॥ सर्वकार्येषु स्वेच्छातः प्रवर्तते । तदत्र प्रमाणं स्वामी । एतच्च जानाति । और सब कार्योंमें अपनी इच्छापूर्वक करता है, इसलिये इसमें स्वामी प्रमाण हैं अर्थात् रुचे सो कीजिये, और आप यह जानते हैं— न सोऽस्ति पुरुषो लोके यो न कामयते श्रियम् । परस्य युवतीं रम्यां सादरं नेक्षतेऽत्र कः ?' ॥ १३१ ॥ संसारमें ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो लक्ष्मीको न चाहता हो, पराई जवान और सुन्दर स्त्रीको चावसे, कौन नहीं देखता है ? अर्थात् सब देखते हैं॥१३१॥ सिंहो विमृश्याह—'भद्र ! यद्यप्येवं तथापि संजीवक्रेन सह मम महान् स्नेहः । सिंहने विचार कर कहा—'हे शुभचिंतक ! जो ऐसाभी है तोभी संजीवकके साथ मेरा अत्यन्त स्नेह है । पश्य,— कुर्वन्नपि व्यलीकानि यः प्रियः प्रिय एव सः । अशेषदोषदुष्टोऽपि कायः कस्य न वल्लभः ? ॥ १३२ ॥ देख—बुराइयां करता हुआभी जो प्यारा है सो तो प्याराही है, जैसे बहु- तसे दोषोंसे दूषित भी शरीर किसको प्यारा नहीं है ? ॥ १३२ ॥ अन्यच्च,— अप्रियाण्यपि कुर्वाणो यः प्रियः प्रिय एव सः । दग्धमन्दिरसारेऽपि कस्य वह्नावनादरः ?' ॥ १३३ ॥

-१३६ ] पुराने सेवकको छोड़ नयेको सत्कार अनुचित १३७ और दूसरे—अप्रिय करने वाला भी जो प्यारा है सो तो प्याराही है, जैसे सुन्दर मन्दिरको जलाने वाली भी अग्निमें किसका आदर नहीं होता है?' १३३ दमनकः पुनरेवाह—'देव ! स एवातिदोषः । दमनक फिरभी कहने लगा—'हे महाराज ! वही अधिक दोष है; यतः,— यस्मिन्नेवाधिकं चक्षुरारोहयति पार्थिवः । सुतेऽमात्येऽप्युदासीने स लक्ष्म्याश्रीयते जनः ॥ १३४ ॥ क्योंकि—पुत्र, मंत्री तथा साधारण मनुष्य इनमेंसे जिसके ऊपर राजा अधिक दृष्टि करता है लक्ष्मी उसी पुरुषकी सेवा करती है ॥ १३४ ॥ शृणु देव !— महाराज ! सुनिये,— अप्रियस्यापि पथ्यस्य परिणामः सुखावहः । वक्ता श्रोता च यत्रास्ति रमन्ते तत्र संपदः ॥ १३५ ॥ अप्रियभी, हितकारी वस्तुका परिणाम अच्छा होता है, और जहां अच्छा उपदेशक और अच्छे उपदेशका सुनने वाला हो वहां सब संपत्तियां रमण करती हैं ॥ १३५ ॥ त्वया च मूलभूत्यानपास्यायमागन्तुकः पुरस्कृतः । एतच्चानु- चितं कृतम् । और आपने पुराने सेवकोंको छोड़ कर इस नये आये हुएका सत्कार किया, यहभी अनुचित किया. यतः,— मूलभूत्यान्परित्यज्य नागन्तून्प्रति मानयेत् । नातः परतरो दोषो राज्यभेदकरो यतः' ॥ १३६ ॥ क्योंकि—पुराने सेवकोंको छोड़ कर नये आये हुओंका सत्कार नहीं करना चाहिये, क्योंकि इससे बढ़ कर कोई दोष राज्यमें फूट करने वाला नहीं है.’ १३६ सिंहो ब्रूते—'महदाश्चर्यम् । मया यदभयवाचं दत्त्वानीतः संव- र्धितश्च । तत्कथं मह्यं द्रुह्यति ? ।' सिंह बोला-'बड़ा आश्चर्य है ! मैं जिसे अभय वाचा दे कर लाया और उसको बढ़ाया सो मुझसे क्यों वैर करता है ?'

१३८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १३७- दमनको ब्रूते—'देव ! दुर्जनो नार्जवं याति सेव्यमानोऽपि नित्यशः । स्वेदनाभ्यञ्जनोपायैः श्वपुच्छमिव नामितम् ॥ १३७ ॥ दमनक बोला-'महाराज ! जैसे मली गई और तैल आदि लगानेसे सीधी करी गई कुत्तेकी पूंछ सीधी नहीं होती है वैसेही दुर्जन नित्य आदर करनेसेभी सीधा नहीं होता है ॥ १३७ ॥ अपरं च,— स्वेदितो मर्दितश्चैव रज्जुभिः परिवेष्टितः । मुक्तो द्वादशभिर्वर्षैः श्वपुच्छः प्रकृतिं गतः ॥ १३८ ॥ और दूसरे—तपाई गई, मली गई, डोरीसे लपेटी गई और बारह बरसके बाद खोली गई कुत्तेकी पूंछ टेढ़ीही रहती है ॥ १३८ ॥ अन्यच्च,— वर्धनं वाथ सन्मानं खलानां प्रीतये कुतः ? । फलन्त्यमृतसेकेऽपि न पथ्यानि विषद्रुमाः ॥ १३९ ॥ ( और धन आदि दे कर ) बढ़ाना अथवा सन्मान करना दुष्टोंकी प्रसन्नताके लिये कहां हो सकता है ? अर्थात् उपकार करने पर भी वे बुराईही करेंगे ! जैसे विषके वृक्ष अमृतसे सीचनेसेभी मीठे फल नहीं देते हैं ॥ १३९ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि— अपृष्टोऽपि हितं ब्रूयाद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् । एष एव सतां धर्मो विपरीतमतोऽन्यथा ॥ १४० ॥ इस लिये मैं कहता हूं कि-जिसके पराजयकी इच्छा न करे उसके बिना पूछेभी हितकारक वचन कहना चाहिये, क्योंकि यही सज्जनोंका धर्म है और इसके विपरीत अधर्म है ॥ १४० ॥ तथा चोक्तम्,— स स्निग्धोऽकुशलान्निवारयति यस्तत्कर्म यन्निर्मलं सा स्त्री याऽनुविधायिनी स मतिमान् यः सद्द्भिरभ्यर्च्यते । सा श्रीर्या न मदं करोति स सुखी यस्तृष्णया मुच्यते तन्मित्रं यदकृत्रिमं स पुरुषो यः खिद्यते नेन्द्रियैः ॥ १४१ ॥

-१४४ ] गुण-दोषको जानकरही दंड देना १३९ जैसा कहा है कि-जो विपत्तिसे बचाता है वही स्नेही है, जो निर्मल अर्थात् दोषरहित है वही कर्म है, जो (पतिकी) आज्ञामें चले वही स्त्री है, जिसका सज्जन आदर करे वही बुद्धिमान् है, जो अहंकारको उत्पन्न न करे वही संपत्ति है, जो तृष्णाके रहित है वही सुखी है, जो निष्कपट है वही मित्र है और जो इन्द्रियोंके वशमें नहीं है वही पुरुष है ॥ १४१ ॥ यदि संजीवकव्यसनार्दितो विज्ञापितोऽपि स्वामी न निवर्तते तदीदृशि भृत्ये न दोषः । और जो संजीवकके स्नेहमें फँसे हुए स्वामी जताने पर भी न मानें तो मुझसे सेवक पर दोष नहीं है ॥ तथा च,— नृपः कामासक्तो गणयति न कार्यं न च हितं यथेष्टं स्वच्छन्दः प्रविचरति मत्तो गज इव । ततो मानध्मातः स पतति यदा शोकगहने तदा भृत्ये दोषान्क्षिपति न निजं वेत्त्यविनयम्' ॥ १४२ ॥ और भी कहा है कि-भोगमें आसक्त राजा कार्यको और हितकारी वचनको नहीं गिनता है और मत वाले हाथीकी तरह अपनी इच्छानुसार जो अच्छा लगता है सो करता है; और फिर घमंडके मारे जब शोकमें अर्थात् भारी आपत्तिमें गिरता है तब सेवक पर दोष पटकता है और अपने बुरे आचरणको नहीं जानता है ॥ १४२ ॥ पिङ्गलकः ( स्वगतम् ),— 'न परस्यापराधेन परेषां दण्डमाचरेत् । आत्मनावगतं कृत्वा बध्नीयात्पूजयेच्च वा ॥ १४३ ॥ पिंगलक ( अपने मनमें सोचने लगा ) कि, 'किसीके बहकानेसे दूसरोंको दंड न देना चाहिये परन्तु अपने आप जान कर उसे मारे या सन्मान करे ॥१४३॥ तथा चोक्तम्,— गुणदोषावनिश्चित्य विधिर्न ग्रहनिग्रहे । स्वनाशाय यथा न्यस्तो दर्पात्सर्पमुखे करः’ ॥ १४४ ॥ जैसा कहा है कि-घमंडसे अपने नाशके लिये सर्पके मुखमें उंगली देनेके समान गुण और दोषको बिना निश्चय करे आदर करनेकी अथवा दंड देनेकी रीति नहीं है' ॥ १४४ ॥

१४० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १४५- प्रकाशं ब्रूते—'तदा संजीवकः किं प्रत्यादिश्यताम् ?'। दमनकः ससंभ्रममाह—'देव ! मा मैवम् । एतावता मन्त्रभेदो जायते । ( प्रकट बोला ) तो संजीवकको क्या उपदेश करना चाहिये ?' दमनकने घबरा कर कहा-'महाराज ! ऐसा नहीं; इससे गुप्त बात खुल जाती है ॥ तथा ह्युक्तम्,— मन्त्रबीजमिदं गुप्तं रक्षणीयं यथा तथा । मनागपि न भिद्येत तद्भिन्नं न प्ररोहति ॥ १४५ ॥ औरभी कहा है—इस गुप्त मंत्ररूपी बीजकी जिस किसी प्रकारसे रक्षा करे और थोड़ाभी न फूटने दे, क्योंकि वह फूटा हुआ नहीं उगता है, अर्थात् रहस्यको गुप्त रक्खे; क्योंकि वह खोलनेसे सफल ( कार्य-साधक ) नहीं होता है ॥१४५॥ किंच,— आदेयस्य प्रदेयस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः । क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥ १४६ ॥ और लेना देना और करनेका काम ये शीघ्र नहीं किये जायँ तो इनका रस समय पी लेता है, अर्थात् समय पर चूक जानेसे काम बिगाड़ जाता है ॥१४६॥ तदवश्यं समारब्धं महता प्रयत्नेन संपादनीयम् । इसलिये अवश्य आरंभ किये हुए कामको बड़े यत्नसे सिद्ध करना चाहिये. किंच,— मन्त्रो योध इवाधीरः सर्वाङ्गैः संवृतैरपि । चिरं न सहते स्थातुं परेभ्यो भेदशङ्कया ॥ १४७ ॥ क्योंकि,—जैसे कवच आदिसे ढंके हुए अंग वाला भी डरपोक योद्धा पराजयके भयसे युद्धमें बहुत देर तक नहीं ठहर सकता है वैसेही उपाय आदि सब अंगोंसे गुप्त विचार भी दूसरे शत्रुओंके भेदकी शंकासे बहुत काल तक गुप्त नहीं रहता है, अर्थात् प्रकट हो जाता है, और रहस्यके खुल जाने पर कार्यहानि होती है ॥ १४७ ॥ यद्यसौ दृष्टदोषोऽपि दोषान्निवर्त्य संधातव्यस्तदतीवानुचितम् । जो इसका दोष देख लेने पर भी दोषको दूर कर फिर मेल करना तो औरभी अनुचित है;

-१४९ ] टिटहरीका जोडा और घमंडी समुद्रकी कहानी १४१

-१४९ ] टिटहरीका जोडा और घमंडी समुद्रकी कहानी १४१ यतः,— सकृद्दुष्टं तु यो मित्रं पुनः संधातुमिच्छति । स मृत्युमेव गृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा' ॥ १४८ ॥ क्योंकि,—जो मनुष्य एक बार दुष्टपना किये हुए मित्रके साथ फिर मेल करना चाहता है वह मृत्युको ऐसे बुलाता है जैसे अश्वतरी गर्भको' ॥ १४८ ॥ सिंहो ब्रूते—'ज्ञायतां तावत्किमस्माकमसौ कर्तुं समर्थः ?' दमनक आह—'देव ! सिंह बोला-‘पहले यह तो समझलो कि वह हमारा क्या कर सकता है ?’ दमनकने कहा-‘महाराज ! अङ्गाङ्गिभावमज्ञात्वा कथं सामर्थ्यनिर्णयः ? । पश्य टिट्टिभमात्रेण समुद्रो व्याकुलीकृतः' ॥ १४९ ॥ शरीरको और शरीरधारीके कामको विना जाने कैसे सामर्थ्यका निर्णय हो सकता है ? देखो, केवल एक टिटहरीने समुद्रको व्याकुल कर दिया' ॥ १४९ ॥ सिंहः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति— सिंह पूछने लगा-‘यह कथा कैसे है ?’ दमनक कहने लगा ।— कथा १० [ टिटहरीका जोडा और समुद्रकी कहानी १० ] 'दक्षिणसमुद्रतीरे टिट्टिभदंपती निवसतः । तत्र चासन्नप्रसवा टिट्टिभी भर्तारमाह—'नाथ ! प्रसवयोग्यस्थानं निभृतमनुसंधीय- ताम् ।' टिट्टिभोऽवदत्—भार्ये ! नन्विदमेव स्थानं प्रसूतियोग्यम् ।' सा ब्रूते—‘समुद्रवेलया व्याप्यते स्थानमेतत् ।' टिट्टिभोऽवदत्— ‘किमंहं निर्बलः समुद्रेण निग्रहीतव्यः ?' । टिट्टिभी विहस्याह— ‘स्वामिन् ! त्वया समुद्रेण च महदन्तरम् । ‘दक्षिण समुद्रके तीर पर टिटहरीका जोड़ा रहता था । और वहाँ पूरे गर्भ वाली टिटहरीने अपने पतिसे कहा-‘स्वामी ! प्रसवके अर्थात् अंडे धरनेके योग्य एकांत स्थान ढूंढ़ना चाहिये ।' टिटहरा बोला—‘प्रिये ! सचमुच यही स्थान अंडे धरनेके लिये अच्छा है ।' वह कहने लगी-‘इस स्थानमें समुद्रकी तरंग १ अश्वतरी एक प्रकारकी खच्चर गधी होती है. उसका बच्चा पेट फाड़ कर निकलता है और वह मर जाती है.