भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

-५६] भेदी कौएका राजाके पास आना १७९ तदाहूयतां सारसः ।' तथानुष्ठिते सत्यागतं सारसमालोक्य राजोवाच—'भोः सारस ! त्वं सत्वरं दुर्गमनुसंधेहि ।' सारसः प्रणम्योवाच—'देव ! दुर्गे तावदिदमेव चिरात्सुनिरूपितमास्ते महत्सरः । किंत्वत्र मध्यवर्तिद्वीपे द्रव्यसंग्रहः क्रियताम् । इसलिये सारसको बुलाओ ।' ऐसा करने पर सारसको आया देख राजा बोला—'सारस ! तू शीघ्र गढ़को बना ।' सारसने प्रणाम करके कहा—'महाराज ! गढ़ तो बहुत कालसे देखाभाला यही बड़ा सरोवर ठीक है । परन्तु इस बीचके द्वीपमें सामग्री इकट्ठी कर दी जावे; यतः,— धान्यानां संग्रहो राजन्नुत्तमः सर्वसंग्रहात् । निक्षिप्तं हि मुखे रत्नं न कुर्यात्प्राणधारणम् ॥ ५५ ॥ क्योंकि—हे राजा ! सब तरहके संग्रहसे अन्नका संग्रह श्रेष्ठ है, क्योंकि मुखमें रक्खा हुआ रत्न अर्थात् धन प्राणोंकी रक्षा नहीं कर सकता है ॥ ५५ ॥ किंच,— ख्यातः सर्वरसानां हि लवणो रस उत्तमः । गृहीतं च विना तेन व्यञ्जनं गोमयायते ॥ ५६ ॥ और—सब रसोंमें प्रसिद्ध नोन रस सचमुच उत्तम है कि जिसके विना ग्रहण ( भक्षण ) भोजनका किया हुआ पदार्थ गोबर-सा (स्वादरहित) लगता है ॥ ५६ ॥ राजाह—'सत्वरं गत्वा सर्वमनुतिष्ठ ।' पुनः प्रविश्य प्रतीहारो ब्रूते—'देव ! सिंहलद्वीपादागतो मेघवर्णो नाम वायसः सपरिवारो द्वारि तिष्ठति । देवपादं द्रष्टुमिच्छति ।' राजाह—'काकाः पुनः सर्वज्ञा बहुद्रष्टारश्च । तद्भवति संग्राह्य इत्यनुवर्तते ।' चक्रो ब्रूते— 'देव ! अस्त्येवम् । किंतु काकः स्थलचरः । तेनास्मद्विपक्षे नियुक्तः कथं संग्राह्यः ? राजा बोला—'शीघ्र जा कर सब तयारी कर ।' फिर द्वारपाल आ कर बोला— 'महाराज ! सिंहलद्वीपसे आया हुआ मेघवर्ण नाम कौवा कुटुम्बसमेत द्वार पर बैठा है । महाराजका दर्शन करना चाहता है ।' राजा बोला—'क्या कहना है ! काक तो सब जानने वाले और ऊँच नीच विचार कर काम करने वाले होते हैं । इसलिये उनको ( अपने पक्षमें ) रखना ऐसा ( ठीक ) जान पड़ता है ।' चक्रवा

१८० हितोपदेशः [ विग्रहः ५७-

बोला-'महाराज ! यह ठीक है । परन्तु कौवा पृथ्वी पर घूमने वाला है। इसलिये हमारे शत्रुपक्षमें मिला हुआ है, और कैसे ( अपने पक्षमें ) रखने योग्य होगा ? तथा चोक्तम्,— आत्मपक्षं परित्यज्य परपक्षेषु यो रतः । स परैर्हन्यते मूढो नीलवर्णशृगालवत् ॥ ५७ ॥ जैसा कहा है—जो अपने साथियोंको छोड़ कर शत्रुके पक्ष पर स्नेह करता है वह मूर्ख नीलवर्ण सियारके समान शत्रुओंसे मारा जाता है' ॥ ५७ ॥ राजोवाच—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति— राजा बोला-'यह कहानी कैसी है?' मंत्री कहने लगा ।— कथा ८ [ नीलमें रंगे हुए एक गीदड़की मृत्युकी कहानी ८ ] 'अस्त्यरण्ये कश्चिच्छृगालः स्वेच्छया नगरोपान्ते भ्राम्य- न्नीलीभाण्डे पतितः । पश्चात्तत उत्थातुमसमर्थः प्रातरात्मानं मृतवत्संदर्श्य स्थितः । अथ नीलीभाण्डस्वामिना मृत इति ज्ञात्वा तस्मात्समुत्थाप्य दूरे नीत्वापसारितस्तत्सात्पलायितः । ततोऽसौ वनं गत्वा स्वकीयमात्मानं नीलवर्णमवलोक्याचि- न्तयत्—'अहमिदानीमुत्तमवर्णः। तदाऽहं स्वकीयोत्कर्षं किं न साधयामि ?' इत्यालोच्य शृगालानाहूय तेनोक्तम्—'अहं भग- वत्या वनदेवतया स्वहस्तेनारण्यराज्ये सर्वोषधिरसेनाभिषिक्तः । तदद्यारभ्यारण्येऽस्मदाज्ञया व्यवहारः कार्यः ।' शृगालाश्च तं विशिष्टवर्णमवलोक्य साष्टाङ्गपातं प्रणम्योचुः—'यथाज्ञा- पयति देवः ।' इत्यनेनैव क्रमेण सर्वेष्वरण्यवासिष्वाधिपत्यं तस्य बभूव । ततस्तेन स्वज्ञातिभिरावृतेनाधिक्यं साधितम् । ततस्तेन व्याघ्रसिंहादीनुत्तमपरिजनान्प्राप्य सदसि शृगाला- नवलोक्य लज्जमानेनावज्ञया स्वज्ञातयः सर्वे दूरीकृताः । ततो विषण्णाञ्शृगालानवलोक्य केनचिद्वृद्धशृगालेनैतत्प्रतिज्ञातम्— 'मा विषीदत । यदनेनानभिज्ञेन नीतिविदो मर्मज्ञा वयं स्वसमी- पात्परिभूतास्तद्यथाऽयं नश्यति तथा विधेयम् । यतोऽमी व्याघ्रा- दयो वर्णमात्रविप्रलब्धाः शृगालमज्ञात्वा राजानमिमं मन्यन्ते ।

-५८] जातिफूटसे नीलवर्ण सियारकी मृत्यु १८१

तद्यथायं परिचितो भवति तथा कुरुत । तत्र चैवमनुष्ठेयम्- यतः सर्वे संध्यासमये संनिधाने महारावमेकदैव करिष्यथ । ततस्तं शब्दमाकर्ण्य जातिस्वभावात्तेनापि शब्दः कर्तव्यः ।' ततस्तथानुष्ठिते सति तद्वृत्तम् । एक समय वनमें कोई गीदड़ अपनी इच्छासे नगरके पास घूमते घूमते नीलके हौदमें गिर गया । पीछे उसमेंसे निकल नहीं सका; प्रातःकाल अपनेको मरेके समान दिखला कर बैठ गया । फिर नीलके हौदके स्वामीने उसे मरा हुआ जान कर और उसमेंसे निकाल कर दूर ले जा कर फेंक दिया और वहाँसे वह भाग गया । तब उसने वनमें जा कर और अपनी देहको नीले रंगकी देख कर विचार किया—'मैं अब उत्तम वर्ण हो गया हूं, तो मैं अपनी प्रभुता क्यों न करूं ? यह सोच कर सियारोंको बुला कर, उसने कहा—'श्रीभगवती वनकी देवीजीने अपने हाथसे वनके राज्य पर सब ओषधियोंके रससे मेरा राजतिलक किया है, इसलिये आजसे ले कर मेरी आज्ञासे काम करना चाहिये।' अन्य सियार भी उसको अच्छा वर्ण देख कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करके बोले-'जो महाराजकी आज्ञा।' इसी प्रकारसे क्रम क्रमसे सब वनवासियोंमें उसका राज्य फैल गया । फिर उसने अपनी जातसे चारों ओर बैठा कर अपना अधिकार फैलाया, पीछे उसने व्याघ्र सिंह आदि उत्तम मंत्रियोंको पा कर सभामें सियारोंको देख कर लाजके मारे अनादरसे सब अपने जातभाइयोंको दूर कर दिया । फिर सियारोंको विकल देख कर किसी बूढ़े सियारने यह प्रतिज्ञा की कि 'तुम खेद मत करो । जैसे इस मूर्खने नीति तथा भेदके जानने वाले हम सभीका अपने पाससे अनादर किया है वैसेही जिस प्रकार यह नष्ट हो सो करना चाहिये । क्योंकि ये बाघ आदि, केवल रंगसे धोखेमें आ गये हैं और सियार न जान कर इसको राजा मान रहे हैं । जिससे इसका भेद खुल जाय सो करो । और ऐसा करना चाहिये कि संध्याके समय उसके पास सभी एक साथ चिल्लाओ । फिर उस शब्दको सुन कर अपने जातिके स्वभावसे वहभी चिल्लाते उठेगा।' फिर वैसा करने पर वही हुआ अर्थात् उसकी पोल खुल गई; यतः,— यः स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रमः । श्वा यदि क्रियते राजा स किं नाश्नात्युपानहम् ? ॥ ५८ ॥

१८४ हितोपदेशः [ विग्रहः ५९- क्योंकि—जिसका जैसा स्वभाव है वह सर्वदा छूटना कठिन है, जैसे यदि कुत्तेको राजा कर दिया जाय तो क्या वह जूतेको नहीं चबावेगा ? ॥ ५८ ॥ ततः शब्दादभिज्ञाय स व्याघ्रेण हतः । तब शब्दसे पहिचान कर उसे बाघने मार डाला; तथा चोक्तम्,— छिद्रं मर्म च वीर्यं च सर्वं वेत्ति निजो रिपुः । दहत्यन्तर्गतश्चैव शुष्कं वृक्षमिवानलः ॥ ५९ ॥ जैसा कहा है—जिस प्रकार भीतर घुसके अग्नि सूखे पेड़को भस्म कर देती है वैसेही अपना दुश्मन अर्थात् भेदी, छिद्र ( कचावट ), मर्म (भेद ) और पराक्रम ( बल ) को जानता है और नाश कर देता है ॥ ५९ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि-“आत्मपक्षं परित्यज्य” इत्यादि ॥' राजाह— ‘यद्येवं तथापि दृश्यतां तावदयं दूरादागतः । तत्संग्रहे विचारः कार्यः' । चक्रो ब्रूते—'देव ! प्रणिधिः प्रहितो दुर्गश्च सज्जीकृतः । अतः शुकोऽप्यानीय प्रस्थाप्यताम् । इसलिये मैं कहता हूँ—“अपने पक्षको त्याग कर” इत्यादि ।' राजा बोला-‘जो यह बातभी है तोभी इतने दूरसे आये हुएको देखना चाहिये, और उसके ठहरानेका विचार करना चाहिये ।' चकवा बोला-‘महाराज ! भेदियौकोभी बिदा कर दिया और गढ़भी सज गया इसलिये तोतेको भी ला कर बैठाना चाहिये; यतः,— नन्दं जघान चाणक्यस्तीक्ष्णदूतप्रयोगतः । तद्दूरान्तरितं दूतं पश्येद्धीरसन्वितः' ॥ ६० ॥ क्योंकि—बड़े भीतरे, दूतके उपायसे चाणक्यने नन्द राजाको मारा इसलिये राजाको बुद्धिमान् मंत्रियोंसहित दूतको दूरहीसे देखना चाहिये' ॥ ६० ॥ ततः सभां कृत्वाहूतः शुकः काकश्च । शुकः किंचिदुन्नतशिरा दत्तासन उपविश्य ब्रूते—'भो हिरण्यगर्भ ! महाराजाधिराजः श्रीमच्चित्रवर्णस्त्वां समाज्ञापयति—'यदि जीवितेन श्रिया वा प्रयोजनमस्ति तदा सत्वरमागत्यास्मच्चरणौ प्रणम । न चेदवस्थातुं स्थानान्तरं चिन्तय ।' राजा सकोपमाह—'आः ! कोऽप्यस्माकं पुरतो नास्ति य एनं गलहस्तयति ?' । उत्थाय मेघवर्णो ब्रूते—

-६३ ] दूतका कर्तव्य और प्रशंसा १८३ 'देव ! आज्ञापय । हन्मि दुष्टं शुकम् ।' सर्वज्ञो राजानं काकं च सान्त्वयन्ब्रूते—'शृणु तावत् । तब सभा करके तोते और कागको बुलाया । तोता कुछ ऊँचा शिर करके दिये हुए आसन पर बैठ कर बोला-'हे हिरण्यगर्भ ! महाराजाधिराज श्रीमान् चित्रवर्णने आपको अच्छी भाँति आज्ञा दी है—'जो तुम्हें अपने प्राणोंसे या लक्ष्मीसे प्रयोजन है, तो शीघ्र आ कर हमारे चरणोंको प्रणाम करो । नहीं तो दूसरे स्थानमें रहनेके लिये विचार करो ।' राजाने झुँझला कर कहा-'अरे ! कोई हमारे सामने नहीं है जो इसको गला पकड़ कर निकाले ?' मेघवर्ण (कौवा) उठ कर बोला-'महाराज ! आज्ञा कीजिये-दुष्ट तोतेको मार डालूँ । सर्वज्ञ (चकवा) राजा और कौएको शांत करता हुआ बोला-'पहले सुन लीजिये- न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् । धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥ ६१ ॥ जिसमें वृद्ध पुरुष नहीं हैं वह सभा नहीं कहलाती है, जो धर्मको न कहे वे वृद्ध नहीं हैं, जिसमें सत्य नहीं है वह धर्म नहीं है, और वह सत्य नहीं है जो छलसे युक्त है ॥ ६१ ॥ यतो धर्मश्चैषः,— क्योंकि (सच्चा) धर्म यह है— दूतो म्लेच्छोऽप्यवध्यः स्याद्राजा दूतमुखो यतः । उद्यतेष्वपि शस्त्रेषु दूतो वदति नान्यथा ॥ ६२ ॥ दूत हीनजातिका भी हो पर मारनेके योग्य नहीं होता है, क्योंकि राजाका दूतही मुख है कि जो शस्त्रोंके उठाने परभी विपरीत नहीं कहता है ॥ ६२ ॥ किं च,— स्वापकर्षं परोत्कर्षं दूतोक्तैर्मन्यते तु कः ? । सदैवावध्यभावेन दूतः सर्वं हि जल्पति' ॥ ६३ ॥ और दूतकी बातोंसे अपनी लघुता और शत्रुको अधिकता कौन मानता है ? दूत तो सदा 'मैं नहीं मारा जाऊंगा' इस भावनासे सभी कुछ कहता है ॥ ६३॥

१८४ हितोपदेशः [ विग्रहः ६४- ततो राजा काकश्च स्वां प्रकृतिमापन्नौ । शुकोऽप्युत्थाय चलितः । पश्चाच्चक्रवाकेणानीय प्रबोध्य कनकालंकारादिकं दत्त्वा संप्रेषितो ययौ । शुकोऽपि विन्ध्याचलराजानं प्रणतवान् । राजोवाच—'शुक ! का वार्ता ? कीदृशोऽसौ देशः ?'। शुको ब्रूते— 'देव ! संक्षेपादियं वार्ता । संप्रति युद्धोद्योगः क्रियताम् । देश- श्वासौ कर्पूरद्वीपः स्वर्गैकदेशो राजा च द्वितीयः स्वर्गपतिः कथं वर्णयितुं शक्यते ?'। ततः सर्वाञ्छिष्टानाहूय राजा मन्त्रयितुमप- विष्टः । आह च—'संप्रति कर्तव्यविग्रहे यथा कर्तव्यमुपदेशं ब्रूत । विग्रहः पुनरवश्यं कर्तव्यः । फिर राजा और काग अपने आपेमें आये । तोताभी उठ कर चला । तो चकवेने बुला कर और समझा कर और सुवर्णके आभूषण आदि दे कर बिदा किया और वह गया । फिर तोतेने विंध्याचलके राजाको दंडवत किया । राजा बोला-'हे तोते ! क्या समाचार है ? वह कैसा देश है ?' तोतेने कहा-'महाराज ! संक्षेपसे यह बात है, अब लड़ाईका ठाठ करिये । यह कर्पूरद्वीप देश एक स्वर्गका टुकड़ा है और राजा दूसरा इन्द्र है । कैसे वर्णन किया जा सकता है ?' फिर सब शिष्टोंको बुला कर एकान्तमें विचारकरनेके लिये बैठ गया और बोला-'अब जो लड़ाई करनी है उसमें जो कुछ करना है सो कहो । फिर लड़ाई तो अवश्य करनीही है । तथा चोक्तम्— असंतुष्टा द्विजा नष्टाः संतुष्टाश्च महीभुजः । सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलस्त्रियः' ॥ ६४ ॥ जैसा कहा है—असंतोषी ब्राह्मण, संतोषी राजा, लज्जावती वेश्या और निर्लज्जा कुलकी स्त्री ये चारों नष्ट होते हैं, अत एव निन्दा करनेके योग्य हैं' ॥ दूरदर्शी नाम गृध्रो ब्रूते—'देव ! व्यसनितया विग्रहो न विधिः । दूरदर्शी नाम गिद्ध बोला-'महाराज ! विना अवसरके संग्राम करनेकी रीति नहीं है ।

-६७ ] युद्धके लिये समय, साधन और राजाका उत्साह १८५ यतः,— मित्रामात्यसुहृद्वर्गा यदा स्युर्दृढभक्तयः । शत्रूणां विपरीताश्च कर्तव्यो विग्रहस्तदा ॥ ६५ ॥ क्योंकि— मित्र, मंत्री और आपसके लोग जब दृढ़ शुभचिन्तक हों और शत्रुओंके विपरीत हों तब लड़ाई करनी चाहिये ॥ ६५ ॥ अन्यच्च,— भूमिर्मित्रं हिरण्यं च विग्रहस्य फलं त्रयम् । यदैतन्निश्चितं भावि कर्तव्यो विग्रहस्तदा' ॥ ६६ ॥ और दूसरे-राज्य, मित्र, और सुवर्ण यह तीन लड़ाईके बीज हैं, जब यह तीनों निश्चय हो जाय तब लड़ाई करनी चाहिये' ॥ ६६ ॥ राजाह—‘मद्वलं तावदवलोकयतु मन्त्री । तदैतेषामुपयोगो ज्ञायताम् । एवमाहूयतां मौहूर्तिकः । निर्णीय च शुभलग्नं ददातु ।' मन्त्री ब्रूते—'तथा हि सहसा यात्राकरणमनुचितम् । राजा बोला-‘मंत्री, पहिले मेरी सेनाको देखें । फिर इनकी कार्यमें योग्यता जानें । और एक ज्योतिषीजीकोभी बुलावा भेजो । अच्छा लग्न निश्चय कर दें । मंत्री बोला-‘तोभी अचानक ( विना सोचे ) यात्रा करना उचित नहीं है । यतः,— विशन्ति सहसा मूढा येऽविचार्य द्विषद्द्बलम् । खङ्गधारापरिष्वङ्गं लभन्ते ते सुनिश्चितम्' ॥ ६७ ॥ क्योंकि— जो मूर्ख एकाएकी शत्रुके बलको विना विचारे लड़ाई ठान लेते हैं वे अवश्य ही खड्गकी धारसे घावको पाते हैं, अर्थात् मरते हैं' ॥ ६७ ॥ राजाह—‘मन्त्रिन् ! ममोत्साहभङ्गः सर्वथा मा कृथाः । विजि- गीषुर्यथा परभूमिमाक्रामति तथा कथय ।' गृध्रो ब्रूते—‘तत्कथ- यामि । किंतु तदनुष्ठितमेव फलप्रदम् । राजा बोला-‘हे मंत्री ! तुम मेरे उत्साहका भंग सब प्रकारसे मत करो । जिस प्रकार जयकी चाहने वाला शत्रुके राज्यको चढ़ कर घेर लेता है सो कह ।' गिद्ध बोला-‘वह कहता हूँ । परन्तु उस प्रकारसे करनाही लाभदायक है;

१८६ हितोपदेशः [ विग्रहः ६८- तथा चोक्तम्,— किं मन्त्रेणाननुष्ठानाच्छास्त्रवित्पृथिवीपतेः । न ह्यौषधपरिज्ञानाद्व्याधेः शान्तिः क्वचिद्भवेत् ॥ ६८ ॥ जैसा कहा है—बिना किये, शास्त्रके जानने वाला राजाके परामर्शसे क्या फल होता है ? जैसे औषधमात्रके जान लेनेसे कभी रोगकी शांति नहीं होती है ॥ ६८ ॥ राजादेशश्चानतिक्रमणीयः । यथाश्रुतं तन्निवेदयामि । और राजाकी आज्ञा भंग नहीं करनी चाहिये । जैसा सुना है सो निवेदन करता हूँ । शृणु,— नद्यद्रिवनदुर्गेषु यत्र यत्र भयं नृप ! । तत्र तत्र च सेनानीर्यायाद्व्यूहीकृतैर्बलैः ॥ ६९ ॥ सुनिये—हे राजा ! नदी, पहाड़, वन तथा कठिन स्थानोंमें जहाँ जहाँ भय होय जहाँ वहाँ सेनापति व्यूह बाँध कर ( परेड बना कर ) सेनाके साथ जाय ॥ ६९॥ बलाध्यक्षः पुरो यायात्प्रवीरपुरुषान्वितः । मध्ये कलत्रं स्वामी च कोशः फल्गु च यद्द्बलम् ॥ ७० ॥ सेनापति बड़े बड़े योद्धाओंके साथ अगाड़ी चले, और बीचमें स्त्रियाँ, स्वामी, कोश (खजाना) और निर्बल सेना जाय ॥ ७० ॥ पार्श्वयोरुभयोरश्वा अश्वानां पार्श्वतो रथाः । रथानां पार्श्वयोर्नागा नागानां च पदातयः ॥ ७१ ॥ दोनों ओर आसपास घोड़े, घोड़ोंके पार्श्वमें रथ, रथोंके आसपास हाथी और हाथियोंके आसपास पैदल ॥ ७१ ॥ पश्चात्सेनापतिर्यायात्खिन्नानाश्वासयञ्छनैः । मन्त्रिभिः सुभटैर्युक्तः प्रतिगृह्य बलं नृपः ॥ ७२ ॥ सेनापति पीछे वाले साहसहीन पुरुषोंको धीरे धीरे हिम्मत बँधाता हुआ जाय और राजा मंत्रियोंके तथा बड़े शूरवीरोंके साथ सेना ले कर जाय ॥ ७२ ॥ समेयाद्विषमं नागैर्जलाढ्यं समहीधरम् । सममश्वैर्जलं नौभिः सर्वत्रैव पदातिभिः ॥ ७३ ॥

-७९ ] युद्धमें धनकी अत्यावश्यकता १८७ ऊँची नीची भूमिमें, कीचड़ खाँदेमें, तथा पर्वत पर हाथियों पर जाय, और एक-सी भूमिमें घोड़ों पर, और पानीमें नावोंके द्वारा, और सब देशोंमें पैदल सेनाको साथ ले कर जाना चाहिये ॥ ७३ ॥ हस्तिनां गमनं प्रोक्तं प्रशस्तं जलदागमे । तदन्यत्र तुरंगाणां पत्तीनां सर्वदैव हि ॥ ७४ ॥ और बरसातमें हाथियोंका जाना, और ऋतुमें अर्थात् गरमी और जाड़ेमें घोड़ोंको और पैदलोंका जाना हमेशा श्रेष्ठ कहा है ॥ ७४ ॥ शैलेषु दुर्गमार्गेषु विधेयं नृप ! रक्षणम् । स्वयोधै रक्षितस्यापि शयनं योगनिद्रया ॥ ७५ ॥ हे राजा ! पर्वतोंमें तथा कठिन कठिन मार्गोंमें अपनी रक्षा अर्थात् सावधान- ता रखनी चाहिये, और अपने योद्धाओंसे रक्षा किये हुए भी राजाको कपटकी नींदसे सोना चाहिये, अर्थात् क्षणक्षणमें अपनी रक्षाकी चिन्ता करनी चाहिये ॥ ७५ ॥ नाशयेत्कर्षयेच्छत्रून् दुर्गकण्टकमर्दनैः । परदेशप्रवेशे च कुर्यादाटविकान्पुरः ॥ ७६ ॥ गढ़को ढाल कर, डेरेको तोड़ कर शत्रु का नाश करे अथवा पकड़ बाँधे और शत्रुके देशमें प्रवेश करनेसे पहले बनके रहने वाले भीलोंको मार्ग शोधन करनेके लिये आगे भेजना चाहिये ॥ ७६ ॥ यत्र राजा तत्र कोशो विना कोशान्न राजता । स्वभृत्येभ्यस्ततो दद्यात् को हि दातुर्न युध्यते ? ॥ ७७ ॥ जहाँ राजा हो वहाँ धनका कोश रहना चाहिये, क्योंकि बिना कोशके राजत्व नहीं है और अपने शूरवीर योद्धाओंको धन देना चाहिये, फिर देने वालेके लिये कौन नहीं लड़ता है ? ॥ ७७ ॥ यतः,— न नरस्य नरो दासो दासस्त्वर्थस्य भूपते ! । गौरवं लाघवं वाऽपि धनाधननिबन्धनम् ॥ ७८ ॥ क्योंकि-हे राजा ! मनुष्य मनुष्यका दास नहीं है किन्तु धनका दास है, और बड़ाई तथा छोटाई भी धन और निर्धनताके संबंधसे होती है ॥ ७८ ॥ अभेदेन च युध्येत रक्षेच्चैव परस्परम् । फल्गु सैन्यं च यत्किंचन्मध्ये व्यूहस्य कारयेत् ॥ ७९ ॥

१८८ हितोपदेशः [ विग्रहः ८०- आपसमें मिल कर लड़ना चाहिये और एकको दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये और जो कुछ बलहीन सेना है उसे सेना(व्यूह)के बीचमें कर देनी चाहिये ॥ पदातींश्च महीपालः पुरोऽनीकस्य योजयेत् । उपरुध्यारिमासीत राष्ट्रं चास्योपपीडयेत् ॥ ८० ॥ राजा, सेनाके आगे पैदल सेनाको रक्खे, जिससे वह वैरीको घेरे रहे और उसके राज्यमें लूट मार करे ॥ ८० ॥ स्यन्दनाश्वैः समे युध्येदनूपे नौद्विपैस्तथा । वृक्षगुल्मावृते चापैरसिचर्मायुधैः स्थले ॥ ८१ ॥ एक-सी भूमिमें रथ और घोड़ोंसे, जलयुक्त स्थानमें नाव और हाथियोंसे, वृक्ष अथवा झाड़ियोंसे ढँके हुए स्थानमें धनुष-बाणोंसे, और पटपड़में खङ्ग आदि आयु- धोंसे लड़ना चाहिये ॥ ८१ ॥ दूषयेच्चास्य सततं यवसान्नोदकेन्धनम् । भिन्द्याच्चैव तडागानि प्राकारान्परिखांस्तथा ॥ ८२ ॥ शत्रुके घास, अन्न, जल, तथा इन्धनका नाश कर दे और सरोवर, परकोटे तथा खाईको तोड़ देना चाहिये ॥ ८२ ॥ बलेषु प्रमुखो हस्ती न तथाऽन्यो महीपतेः । निजैरवयवैरेव मातङ्गोऽष्टायुधः स्मृतः ॥ ८३ ॥ राजाकी सेनामें जैसा हाथी सबसे श्रेष्ठ है वैसे घोड़े आदि नहीं हैं, क्योंकि हाथी अपने (चार पैर, दो दाँत, एक सूंड और एक पूँछ, इन आठ ) अंगोंसे 'अष्टायुध' कहाता है; अर्थात् उन आठही अवयवोंसे काम देनेसे हाथी सबसे श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ८३ ॥ बलमश्वस्य सैन्यानां प्राकारो जङ्गमो यतः । तस्मादश्वाधिको राजा विजयी स्थलविग्रहे ॥ ८४ ॥ और सेनाओंके बीचमें घोड़ेकी सेना चलने वाला परकोटा है इसलिये जिस राजाके पास बहुत घोड़े हैं वह स्थलयुद्ध ( पटपड़ भूमिके युद्ध ) में जीतने वाला होता है ॥ ८४ ॥ तथा चोक्तम्,— युध्यमाना हयारूढा देवानामपि दुर्जयाः । अपि दूरस्थितास्तेषां वैरिणो हस्तवर्तिनः ॥ ८५ ॥

-११] शूर और डरपोक योद्धाओंके लक्षण १८९ वैसा ही कहा है-घोड़ों पर चढ़कर लड़ने वाले देवताओंसे भी नहीं जीते जा सकते हैं, क्योंकि उनको दूरके वैरी भी अपने हाथके पास दीखते हैं ॥८५॥ प्रथमं युद्धकारित्वं समस्तबलपालनम् । दिङ्मार्गाणां विशोधित्वं पत्तिकर्म प्रचक्षते ॥ ८६ ॥ हस्ती आदि सब चतुरंग सेनाकी रक्षा करना, युद्धकी पहली चतुरता है और दिशाओंके आने जानेके मार्गोंको काट कर युद्ध कर देना यह पैदल सेनाका काम कहते हैं ॥ ८६ ॥ स्वभावशूरमस्त्रज्ञमविरक्तं जितश्रमम् । प्रसिद्धक्षत्रियप्रायं बलं श्रेष्ठतमं विदुः ॥ ८७ ॥ स्वभावहीसे शूर वीर, अस्त्रके चलानेमें चतुर, लड़ाईमें पीठ नही देने वाले, परिश्रमको सहने वाले और वीरतामें प्रसिद्ध क्षत्रियोंके समान, ऐसी सेनाको पण्डित लोग सबसे उत्तम कहते हैं ॥ ८७ ॥ यथा प्रभुकृतान्मानाद्युध्यन्ते भुवि मानवाः । न तथा बहुभिर्दत्तैर्द्रविणैरपि भूपते ! ॥ ८८ ॥ हे राजा ! पृथ्वी पर स्वामीके सन्मान करनेसे जैसे मनुष्य लड़ते हैं वैसे बहुत दिये हुए, धनसेभी नहीं लड़ते हैं ॥ ८८ ॥ वरमल्पबलं सारं न कुर्यान्मुण्डमण्डलीम् । कुर्यादसारभङ्गो हि सारभङ्गमपि स्फुटम् ॥ ८९ ॥ बलवान् थोड़ी-सी सेना अच्छी होती है किंतु बहुत-सी मुंडोंकी मंडली अर्थात् बलहीन सेना इकट्ठी न करनी चाहिये, क्योंकि दुर्बलोंका पीठ दे कर संग्रामसे भागना साक्षात् बलवान् सेनाका भी उत्साहभंग कर देता है; याने कायर सेना भाग जाने पर वीरभी उन्हें देख कर कभी कभी भाग उठते हैं ॥ ८९ ॥ अप्रसादोऽनधिष्ठानं देयांशहरणं च यत् । कालयापोऽप्रतीकारस्तद्वैराग्यस्य कारणम् ॥ ९० ॥ अप्रसन्न होना, अधिकारी न करना, लूटे हुए धनको आपही ले लेना, वेतन आदि देनेमें आज-कल कह कर समय बिताना, और सेनाके विरोध आदिमें उपाय न करना ये वैराग्यके अर्थात् स्नेह छूटनेके कारण हैं ॥ ९० ॥ आपीडयन्बलं शत्रोर्जिगीषुरतिशोषयेत् । सुखसाध्यं द्विषां सैन्यं दीर्घयानप्रपीडितम् ॥ ९१ ॥

१९० हितोपदेशः [ विग्रहः ९२- विजय पानेकी इच्छा करने वाला राजा अपनी सेनाको विश्राम देता हुआ शत्रुसे जा भिड़े, क्योंकि लंबे मार्ग चलनेसे थकी थकाई शत्रुओंकी सेना सहजमें जीती जा सकती है ॥ ९१ ॥ दायादादपरो मन्त्रो नास्ति भेदकरो द्विषाम् । तस्मादुत्थापयेद्यत्नाद्दायादं तस्य विद्विषः ॥ ९२ ॥ वैरियाँके भाईबेटोंको छोड़ कर फूट कराने वाला दूसरा मंत्र (उपाय) नहीं है, इसलिये उस शत्रुके नाते-गोतेके पुरुषको प्रयत्नसे उकसावे अर्थात् तोड़ फोड़ कर अपनी ओर मिलावे ॥ ९२ ॥ संधाय युवराजेन यदि वा मुख्यमन्त्रिणा । अन्तःप्रकोपनं कार्यमभियोक्तुः स्थिरात्मनः ॥ ९३ ॥ युवराजके साथ अथवा मुख्य मंत्रीके साथ संधि (मेल) करके निश्चित्ताईसे बैठे-ठाले शत्रुके घरमें फूट करा देनी चाहिये ॥ ९३ ॥ क्रूरं मित्रं रणे चापि भङ्गं दत्त्वा विघातयेत् । अथवा गोग्रहाकृष्ट्या तल्लक्ष्याश्रितबन्धनात् ॥ ९४ ॥ युद्धमें हरा कर भी क्रूर मित्र (राजा) को मार डाले अथवा जैसे गौको खींच कर बाँधते हैं वैसे ही उसके मुख्य सहायक राजाओंको बंधनमें डाल कर उसे मार देना चाहिये ॥ ९४ ॥ स्वराज्यं वासयेद्राजा परदेशावगाहनात् । अथवा दानमानाभ्यां वासितं धनदं हि तत् ॥ ९५ ॥ और राजा शत्रुके राज्यसे मनुष्योंको पकड़ ला कर अपने राज्यमें बसावे, अथवा धन और आदरसे बसाया हुआ वह राज्य ही धन देने वाला होता है' ॥९५॥ राजाह—‘आः ! किं बहुनोदितेन ? राजा बोला—‘अजी ! बहुत बातोंसे क्या है ? आत्मोदयः परग्लानिर्द्वयं नीतिरितीयती । तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतीयते’ ॥ ९६ ॥ अपना लाभ और शत्रुको हानि नीति तो यही है। बुद्धिमान् लोग इसीको स्वीकार करके अपनी चतुरता प्रकट करते हैं ॥ ९६ ॥ मन्त्रिणा विहस्योच्यते—‘सर्वमेतद्विशेषतश्चोच्यते ! मंत्रीने हँस कर कहा-‘यह तो सबमे बढ़ कर बात आप कहते हैं,

-९७ ] चित्रवर्णकी सेनाका डेरा लगा लेना १९१ किंतु,- अन्यदुच्छृङ्खलं सत्त्वमन्यच्छास्त्रनियन्त्रितम् । सामानाधिकरण्यं हि तेजस्तिमिरयोः कुतः ? ॥ ९७ ॥ परन्तु, एक मनुष्य तो निरंकुश याने स्वतंत्र, और दूसरा नियन्त्रित याने नीति पर चलने वाला इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है, जैसे निश्चय करके चाँदनी और अँधेरेका एक जगह पर होना कहाँ संभव है ? अर्थात् नहीं हो सकता है, इसलिये नीतिविरुद्ध नहीं चलना चाहिये ॥ ९७ ॥ तत उत्थाय राजा मौहूर्तिकावेदितलग्ने प्रस्थितः । तब राजा उठ कर ज्योतिषीके बतलाये लग्नमें लड़ाईके लिये बिदा हुआ । अथ प्रहितप्रणिधिर्हिरण्यगर्भमागत्योवाच-'देव ! समागतप्रायो राजा चित्रवर्णः । संप्रति मलयपर्वताधित्यकायां समावासितकट- कोऽनुवर्तते । दुर्गशोधनं प्रतिक्षणमनुसंधातव्यम्, यतोऽसौ गृध्रो महामन्त्री । किंच केनचित्सह तस्य विश्वासकथाप्रसङ्गेनैव तदिङ्गितमवगतं मया यदनेन कोऽप्यस्मद्दुर्गे प्रागेव नियुक्तः ।' चक्रो ब्रूते- 'देव ! काक एवासौ संभवति ।' राजाह - 'न कदा- चिदेतत् । यद्येवं तदा कथं तेन शुकस्याभिभवोद्योगः कृतः ? अपरं च । शुकस्यागमनात्तस्य विग्रहोत्साहः । स चिरादत्रास्ते ।' मन्त्री ब्रूते- 'तथाप्यागन्तुः शङ्कनीयः ।' राजाह- 'आगन्तुका हि कदाचिदुपकारका दृश्यन्ते । फिर भेजे हुए दूतने हिरण्यगर्भसे आ कर कहा- 'महाराज ! राजा चित्रवर्ण आ पहुँचा है । अब मलय पर्वतकी ऊँची भूमि पर डेरा डाल कर अपनी सेनाको बसा कर ठहरा हुआ है । गढकी देखभाल क्षणक्षणमें करनी चाहिये, क्योंकि यह गिद्ध महामंत्री है । और किसीके साथ उसकी विश्वासकी बातचीतसेही उसकी चेष्टा मैंने जान ली कि हमारे गढ़में इसने किसी न किसीको पहलेसेही लगा रक्खा होगा।' चकवा बोला-'महाराज ! वह कौवाही होना संभव दीख पड़ता है।' राजा बोला-'यह बात कभी शक्य नहीं है। जो ऐसा होता तो कैसे उसने तोतेके अनादर करनेका उद्योग किया है ? और दूसरे तोतेके आनेसे उसको लड़ाईका उत्साह हुआ है। वह यहाँ बहुत दिनोंसे रहता है।' मंत्री

१९२ हितोपदेशः [ विग्रहः ९८- बोला-'तो भी आने वाले पर संदेह करना ही चाहिये।' राजा बोला-'आने वाले सचमुच कभी कभी उपकारी दीख पड़ते हैं। शृणु,- परोऽपि हितवान् बन्धुर्बन्धुरप्यहितः परः । अहितो देहजो व्याधिर्हितमारण्यमौषधम् ॥ ९८ ॥ सुन,-हित करने वाला शत्रु भी बन्धु है और अहितकारी बन्धु भी शत्रु होता है; जैसे देहसे उत्पन्न हुआ रोग अहितकारी होता है और वनमें उत्पन्न हुई औषध हितकारी होती है ॥ ९८ ॥ अपरं च,- आसीद्वीरवरो नाम शूद्रकस्य महीभृतः । सेवकः स्वल्पकालेन स ददौ सुतमात्मनः' ॥ ९९ ॥ और दूसरे-शूद्रक नाम राजाका एक वीरवर नाम सेवक था; उसने थोड़े कालमें अपने पुत्रको दे दिया' ॥ ९९ ॥ चक्रः पृच्छति-'कथमेतत् ?' । राजा कथयति- चक्रवा पूछने लगा-'यह कथा कैसे है?' राजा कहने लगा ।- कथा ९ [ राजकुमार और उसके पुत्रको बलिदानकी कहानी ९ ] 'अहं पुरा शूद्रकस्य राज्ञः क्रीडासरसि कर्पूरकेलिनाम्नो राज- हंसस्य पुत्र्या कर्पूरमञ्जर्या सहानुरागवानभवम् । तत्र वीरवरो नाम महाराजपुत्रः कुतश्चिद्देशादागत्य राजद्वारमुपगम्य प्रती- हारमुवाच-'अहं तावद्वेतनार्थी राजपुत्रः । राजदर्शनं कारय ।' ततस्तेनासौ राजदर्शनं कारितो ब्रूते-'देव ! यदि मया सेवकेन प्रयोजनमस्ति तदास्मद्वर्तनं क्रियताम् ।' शूद्रक उवाच-किं ते वर्तनम् ?' । वीरवरो ब्रूते-'प्रत्यहं सुवर्णपञ्चशतानि देहि ।' राजाह-'का ते सामग्री ?' । वीरवरो ब्रूते-'द्वौ बाहू तृतीयश्च खड्गः ।' राजाह-'नैतच्छक्यम् ।' तच्छ्रुत्वा वीरवरश्चलितः । अथ मन्त्रिभिरुक्तम्-'देव ! दिनचतुष्टयस्य वर्तनं दत्त्वा ज्ञायतामस्य स्वरूपं किमुपयुक्तोऽयमेतावद्वर्तनं गृह्णात्यनुपयुक्तो वेति' । ततो

-९९ ] वीरवरको नौकरीमें रखना, रातमें शब्द सुनना १९३ मन्त्रिवचनादाहूय वीरवराय ताम्बूलं दत्त्वा पञ्चशतानि सुवर्णानि दत्तानि । तद्विनियोगश्च राज्ञा सुनिभृतं निरूपितः । तदर्धं वीर- वरेण देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो दत्तम् । स्थितस्यार्धं दुःखितेभ्यः, तद- वशिष्टं भोज्यव्ययविलासव्ययेन । एतत्सर्वं नित्यकृत्यं कृत्वा राज- द्वारमहर्निशं खड्गपाणिः सेवते । यदा च राजा स्वयं समादिशति तदा स्वगृहमपि याति । 'पहले मैं शूद्रक नाम राजाके क्रीड़ा-सरोवरमें कर्पूरकेलि नामक राजहंसकी पुत्री कर्पूरमंजरीके साथ अनुरक्त (प्रेमवश) हो गया था । वहाँ वीरवर नाम महा- राजकुमार किसी देशसे आया और राजाकी ड्योढ़ी पर आ कर द्वारपालसे बोला- 'मैं राजपुत्र हूं, नोकरी चाहता हूँ । राजाका दर्शन कराओ ।' फिर इसने उसे राजाका दर्शन कराया और वह बोला-'महाराज ! जो मुझ सेवकका प्रयोजन हो तो मुझे नौकर रखिये ।' शूद्रक बोला-"तुम कितनी तनखाह चाहते हो ?" वीरवर बोला-'नित्य पाँच सौ मोहरें दीजिये ।' राजा बोला-'तेरे पास क्या क्या सामग्री है ?' वीरवर बोला-'दो बाँहें और तीसरा खड्ग ।' राजा बोला-'यह बात नहीं हो सकती है । यह सुन कर वीरवर चल दिया । फिर मंत्रियोंने कहा- 'हे महाराज ! चार दिनका वेतन दे कर इसका स्वरूप जान लीजिये कि यह क्या उपकारी है, जो इतना धन लेता है या उपयोगी नहीं है ।' फिर मंत्रीके वचनसे बुलवाया और वीरवरको बीड़ा दे कर पाँच सौ मोहरें दे दीं । और उसका काम भी राजाने छुप कर देखा । वीरवरने उस धनका आधा देवताओंको और ब्राह्मणोंको अर्पण कर दिया । बचे हुएका आधा दुखियोंको; उससे बचा हुआ भोजनके तथा विलासादिमें खर्च किया । यह सब नित्य काम करके वह राजाके द्वार पर रातदिन हाथमें खड्ग ले कर सेवा करता था और जब राजा आप आज्ञा देता तब अपने घर जाता था । अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यां रात्रौ राजा सकरुणं क्रन्दनध्वनिं शुश्राव । शूद्रक उवाच—'कः कोऽत्र द्वारि ?' । तेनोक्तम्— 'देव ! अहं वीरवरः ।' राजोवाच—'क्रन्दनानुसरणं क्रियताम् ।' वीरवरो 'यथाज्ञापयति देवः' इत्युक्त्वा चलितः । राज्ञा च चिन्तितम्—'नैतदुचितम् । अयमेकाकी राजपुत्रो मया सूचिभेद्ये तमसि प्रेरितः । तदनु गत्वा किमेतदिति निरूपयामि।' हि० १३

१९४ हितोपदेशः [ विग्रहः १९-

ततो राजापि खङ्गमादाय तदनुसरणक्रमेण नगराद्वहिर्निर्जगाम । गत्वा च वीरवरेण सा रुदती रूपयौवनसंपन्ना सर्वांलंकारभूषिता काचित्स्त्री दृष्टा। पृष्टा च—'का त्वम् ? किमर्थं रोदिषि ?' स्त्रियोक्तम्—'अहमेतस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीः । चिरादेतस्य भुजच्छायायां महता सुखेन विश्रान्ता। इदानीमन्यत्र गमि- ष्यामि।' वीरवरो ब्रूते—'यत्रापायः संभवति तत्रोपायोऽप्यस्ति। तत्कथं स्यात्पुनरिहावलम्बनं भवत्याः ?' । लक्ष्मीरुवाच— 'यदि त्वमात्मनः पुत्रं शक्तिधरं द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतं भगवत्याः सर्वमङ्गलाया उपहारीकरोषि तदाहं पुनरत्र सुचिरं निवसामि' इत्युक्त्वाऽदृश्याऽभवत् ।

फिर एक समय कृष्णपक्षकी चौदसके दिन, रातको राजाने करुणासहित रोनेका शब्द सुना । शूद्रक बोला-'यहाँ द्वार पर कौन कौन है ?' उसने कहा—'महाराज ! मैं वीरवर हूँ।' राजाने कहा-'रोनेकी तो टोह लगाओ ।' 'जो महाराजकी आज्ञा' यह कह कर वीरवर चल दिया । और राजाने सोचा-'यह बात उचित नहीं है कि इस राजकुमारको मैंने घने अँधेरेमें जाने की आज्ञा दी । इसलिये मैं उसके पीछे जा कर यह क्या है इसका निश्चय करूँ ।' फिर राजा भी खङ्ग ले कर उसके पीछे नगरसे बाहर गया । और वीरवरने जा कर उस रोती हुई, रूप तथा यौवनसे सुन्दर और सब आभूषण पहिने हुए किसी स्त्रीको देखा और पूछा-'तू कौन है ? किसलिये रोती है ?' स्त्रीने कहा—'मैं इस शूद्रककी राजलक्ष्मी हूँ । बहुत कालसे इसकी भुजाओंकी छायामें बड़े सुखसे विश्राम करती थी । अब दूसरे स्थानमें जाऊँगी ।' वीरवर बोला— 'जिसमें अपाय(नाश)का संभव है उसमें उपाय भी है । इसलिये कैसे फिर यहाँ आपका रहना होगा ?' लक्ष्मी बोली-'जो तू बत्तीस लक्षणोंसे संपन्न अपने पुत्र शक्तिधरको सर्वमंगला देवीकी भेट करे तो मैं फिर यहाँ बहुत काल तक रहूँ।' यह कह कर वह अंतर्धान हो गई ।

ततो वीरवरण स्वगृहं गत्वा निद्रायमाणा स्ववधूः प्रबोधिता पुत्रश्च । तौ निद्रां परित्यज्योत्थायोपविष्टौ । वीरवरस्तत्सर्वं लक्ष्मीवचनमुक्तवान्। तच्छ्रुत्वा सानन्दः शक्तिधरो ब्रूते—'धन्यो-

ऽहमेवंभूतः स्वामिराज्यरक्षार्थं यन्ममोपयोगः श्लाघ्यः । तत्को- ऽधुना विलम्बस्य हेतुः ? एवंविधे कर्मणि देहस्य विनियोगः श्लाघ्यः । फिर वीरवरने अपने घर जा कर सोती हुई अपनी स्त्रीको और बेटेको जगाया । वे दोनों नींदको छोड़, उठ कर खड़े हो गये । वीरवरने वह सब लक्ष्मीका वचन उनको सुनाया । उसे सुन कर शक्तिधर आनन्दसे बोला-‘मैं धन्य हूँ जो ऐसे, स्वामीके राज्यकी रक्षाके लिये मेरा उपयोग प्रशंसनीय है । इसलिये अब विलम्बका क्या कारण है ? ऐसे काममें देहका त्याग प्रशंसनीय है । यतः,— धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् । सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति’ ॥ १०० ॥ क्योंकि—पण्डितको परोपकारके लिये धन और प्राण छोड़ देने चाहिये, विनाश तो निश्चय होगाही, इसलिये अच्छे कार्यके लिए प्राणोंका त्याग श्रेष्ठ है’ ॥ १०० ॥ शक्तिधरमातोवाच—‘यद्येतन्न कर्तव्यं तत्केनान्येन कर्मणा मुख्यस्य महावर्तनस्य निष्क्रयो भविष्यति ?’ इत्यालोच्य सर्वे सर्वमङ्गलायाः स्थानं गताः। तत्र सर्वमङ्गलां संपूज्य वीरवरो ब्रूते—‘देवि ! प्रसीद । विजयतां विजयतां शूद्रको महाराजः, गृह्य- तामुंपहारः ।’ इत्युक्त्वा पुत्रस्य शिरश्छिच्छेद । ततो वीरवरश्चि- न्तयामास—‘गृहीतराजवर्तनस्य निस्तारः कृतः। अधुना निष्पुत्र- स्य जीवनेनालम् ।’ इत्यालोच्यात्मनः शिरच्छेदः कृतः । ततः स्त्रियापि स्वामिपुत्रशोकार्तया तदनुष्ठितम् । शक्तिधरकी माता बोली-‘जो यह नहीं करोगे तो और किस कामसे इस बड़े वेतनके ऋणसे उनंतर होगे ? ।’ यह विचार कर सब सर्वमंगला देवीके स्थान पर गये । वहाँ सर्वमंगला देवीको पूज कर वीरवरने कहा-‘हे देवी ! प्रसन्न हो; शूद्रक महाराजकी जय हो जय हो ! यह भेंट लो ।’ यह कह कर पुत्रका शिर काट डाला । फिर वीरवर सोचने लगा कि-‘लिये हुए राजाके ऋणको तो चुका दिया। अब बिना पुत्रके जीवित किस कामका ? ।’ यह विचार कर उसने अपना शिर

१९६ हितोपदेशः [ विग्रहः १०१- काट डाला। फिर पति और पुत्रके शोकसे पीड़ित स्त्रीने भी अपना शिर काट डाला। तत्सर्वं दृष्ट्वा राजा साश्चर्यं चिन्तयामास— ‘जीवन्ति च म्रियन्ते च मद्विधाः क्षुद्रजन्तवः। अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति ॥ १०१ ॥ यह सब देख कर राजा आश्चर्यसे सोचने लगा,—मेरे समान नीच प्राणी संसारमें जीते हैं और मरतेभी हैं, परन्तु संसारमें इसके समान न हुआ और न होगा ॥ १०१ ॥ तदेतेन परित्यक्तेन मम राज्येनाप्यप्रयोजनम् । ततः शूद्रके- णापि स्वशिरश्छेत्तुं खङ्गः समुत्थापितः । अथ भगवत्या सर्व- मङ्गलया राजा हस्ते धृत उक्तश्च—‘पुत्र ! प्रसन्नास्मि ते एता- वता साहसेनालम् । जीवनान्तेऽपि तव राज्यभङ्गो नास्ति ।' राजा च साष्टाङ्गपातं प्रणम्योवाच—‘देवि ! किं मे राज्येन, जीवितेन वा किं प्रयोजनम् ? यद्यहमनुकम्पनीयस्तदा ममायुः- शेषेणायं सदारपुत्रो वीरवरो जीवतु । अन्यथाऽहं यथाप्राप्तां गतिं गच्छामि ।' भगवत्युवाच—‘पुत्र ! अनेन ते सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च तव तुष्टास्मि । गच्छ । विजयी भव । अयमपि सपरिवारो राजपुत्रो जीवतु ।' इत्युक्त्वा देव्यदृश्याभवत् । ततो वीरवरः सपुत्रदारो गृहं गतः । राजापि तैर‌लक्षितः सत्वरमन्तः- पुरं प्रविष्टः । इसलिये ऐसे महापुरुषसे शून्य इस राज्यसे मुझे भी क्या प्रयोजन है ? पीछे शूद्रकने भी अपना शिर काटनेको खङ्ग उठाया । तब सर्वमंगला देवीने राजाका हाथ रोका और कहा—'हे पुत्र ! मैं तेरे ऊपर प्रसन्न हूँ, इतना साहस मत करो । मरनेके बाद भी तेरा राज्य भंग नहीं होगा।' तब राजा साष्टांग दंडवत और प्रणाम करके बोला-'हे देवी ! मुझे राज्यसे क्या है अथवा जीनसे भी क्या प्रयोजन है ? और जो मैं कृपाके योग्य हूँ तो मेरी शेष आयुसे स्त्रीपुत्रसहित वीर- वर जी उठे । नहीं तो मैं अपना शिर काट डालूंगा।' देवी बोली-‘हे पुत्र ! तेरे इस अधिक उत्साहसे और सेवकतासे स्नेहसे मैं तुझ पर प्रसन्न हूं । जाओ, तुम्हारी जय हो । यह राजपुत्र भी परिवारसमेत जी उठे।' यह कह कर देवी

-१०३ ] सर्वस्वदानी वीरवरको कर्नाटकराज्यका अर्पण १९७ अंतर्धान हो गई। पीछे वीरवर अपने स्त्रीपुत्रसमेत घरको गया । राजा भी उनसे छुप कर शीघ्र रनवासमें चला गया । अथ प्रभाते वीरवरो द्वारस्थः पुनर्भूपालेन पृष्टः सन्नाह—‘देव ! सा रुदती मामवलोक्यादृश्याभवत् । न काप्यन्या वार्ता विद्यते ।' तद्वचनमाकर्ण्य राजाऽचिन्तयत्—‘कथमयं श्लाघ्यो महासत्त्वः ? इसके अनन्तर प्रातःकाल राजाने ड्योढ़ी पर बैठे हुए वीरवरसे फिर पूछा और वह बोला—'हे महाराज ! वह रोती हुई स्त्री मुझे देख कर अन्तर्धान हो गई, और कुछ दूसरी बात नहीं थी।' उसका वचन सुन कर राजा सोचने लगा— 'इस महात्माको किस प्रकार बड़ाई करूँ ? यतः,— प्रियं ब्रूयादकृपणः शूरः स्याद्विकत्थनः । दाता नापात्रवर्षी च प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः ॥ १०२ ॥ क्योंकि—उदार पुरुषको मीठा बोलना चाहिये, शूरको अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, दाताको कुपात्रमें दान न करना चाहिये, और उचित कहने वालेको दयारहित नहीं होना चाहिये ॥ १०२ ॥ एतन्महापुरुषलक्षणमेतस्मिन्सर्वमस्ति ।' ततः स..राजा प्रातः शिष्टसभां कृत्वा सर्ववृत्तान्तं प्रस्तुत्य प्रसादात्तस्मै कर्नाटकराज्यं ददौ। तत्किमागन्तुको जातिमात्राद्दुष्टः ? तत्राप्युत्तमाधममध्यमाः सन्ति ।' यह महापुरुषका लक्षण इसमें सब है । पीछे उस राजाने प्रातःकाल शिष्ट लोगोंकी सभा करके और सब वृत्तान्तकी प्रशंसा करके प्रसन्नतासे उसे कर्नाटकका राज्य दे दिया । इसलिये (मैं जानना चाहता हूं) क्या विदेशी केवल जाति मात्रसेही दुष्ट होता है ? उनमें भी उत्तम, निकृष्ट और मध्यम होते हैं । चक्रवाको ब्रूते— ‘योऽकार्यं कार्यवच्छास्ति स किंमन्त्री नृपेच्छया । वरं स्वामिमनोदुःखं तन्नाशो न त्वकार्यतः ॥ १०३ ॥ चकवा बोला—'जो राजाकी इच्छा(के अनुरोध)से, अयोग्य कार्यको योग्य कार्यके समान उपदेश करता है वह नीच मंत्री है। क्योंकि स्वामीके मनको

१९८ हितोपदेशः [ विग्रहः १०४- दुःख होना अच्छा है परन्तु उस अनुचित काम करनेसे उसका नाश होना अच्छा नहीं है ॥ १०३ ॥ वैद्यो गुरुश्च मन्त्री च यस्य राज्ञः प्रियः सदा । शरीरधर्मकोशेभ्यः क्षिप्रं स परिहीयते ॥ १०४ ॥ जिस राजाके पास वैद्य, गुरु और मंत्री सदा हाँमें हाँ मिलाने वाले हों वह राजा शरीर, धर्म और कोशसे शीघ्र रहित ( नष्ट ) हो जाता है ॥ १०४ ॥ शृणु देव !- पुण्याल्लब्धं यदेकेन तन्ममापि भविष्यति । हत्वा भिक्षुं महालोभान्निध्यर्थी नापितो हतः' ॥ १०५ ॥ सुनिये महाराज ! जो वस्तु किसीने पुण्यसे पा ली वह वस्तु मुझे भी मिल जायगी, यह नहीं सोचना चाहिये; अधिक लोभसे भिखारीको मार कर एक धनका अभिलाषी नाई मारा गया ॥ १०५ ॥ राजा पृच्छति - 'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति- राजा पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।- कथा १० [ एक क्षत्रिय, नाई और भिखारीकी कहानी १० ] 'अस्त्ययोध्यायां चूडामणिर्नाम क्षत्रियः । तेन धनार्थिना महता क्लेशेन भगवांश्चन्द्रार्धचूडामणिश्चिरमाराधितः । ततः क्षीणपापो- ऽसौ स्वप्ने दर्शनं दत्वा भगवदादेशाद्यक्षेश्वरेणादिष्टः - 'यत्त्वमद्य प्रातः क्षौरं कृत्वा लगुडं हस्ते कृत्वा गृहे निभृतं स्थास्यसि ततोऽस्मिन्नेवाङ्गणे समागतं भिक्षुं पश्यसि । तं निर्दयं लगुड- प्रहारेण हनिष्यसि । ततः सुवर्णकलशो भविष्यति, तेन त्वया यावज्जीवं सुखिना भवितव्यम् ।' ततस्तथानुष्ठिते तद्वृत्तम् । तत्र क्षौरकरणायानीतेन नापितेनालोक्य चिन्तितम्- 'अये ! निधि- प्राप्तेरयमुपायः । अहमप्येवं किं न करोमि ?' ततःप्रभृति नापितः प्रत्यहं तथाविधो लगुडहस्तः सुनिभृतं भिक्षोरागमनं प्रतीक्षते । एकदा तेन प्राप्तो भिक्षुर्लगुडेन व्यापादितः । तस्मादपराधा- त्सोऽपि नापितो राजपुरुषैर्व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि- 'पुण्याल्लब्धं यदेकेन' इत्यादि ।