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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

मासिक धर्म से चौथे दिन एक प्लास (ढाक) का हरा पत्ता जीवित बछड़े वाली गाय के दूध के साथ घोटकर स्त्री को देने से, उस मास में गर्भ रहने पर पुत्र उत्पन्न होगा।

गर्भिणी स्त्री को दूसरे मास के प्रारम्भ से ही प्रतिदिन प्लास (ढाक) के छाया में सुखाये हुए पत्तों का चूर्ण समान भाग मिश्री मिलाकर ३ माशा जीवित बछड़े वाली गाय के दूध के साथ निरन्तर सेवन कराने से पुत्र लाभ हो सकता है।

जिनके कन्या ही कन्या होती हैं और वह उपरोक्त उपायों को या तो समझ न सके हैं या क्रियात्मक रूप में न ला सके हैं, तो वह इस बात का ध्यान रखें कि गर्भस्थित हो जाने के ८१ से ८५ दिन के अन्दर यदि स्त्री को 'सूर्य गुणी' औषधि का प्रयोग कराया जाय तो पुत्र उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि स्त्रियों में चन्द्र गुण की अधिकता होती है और पुरुषों में सूर्य गुण की। 'सूर्य गुणी' औषधि वेद-कृति १३, राम विहार कालोनी, जिला सहकारी बैंक के पीछे, मुरादाबाद से प्राप्त हो सकती है।

श्रांति निवारण

अधिकतर व्यक्ति युगम अयुगम रात्रियों के निकालने में भ्रम में पड़ जाते हैं कोई तो श्रुतु स्नान के पश्चात् से तिथि की गिनती करने लगते हैं। इसका सही रूप इस प्रकार है कि मासिक धर्म जिस समय आरम्भ होता है उसी समय के पश्चात् जो पहली रात्रि आयेगी वही पहली रात्रि है और २४ घण्टे बाद दूसरा दिन या दूसरी रात्रि मानी जायगी जैसे मासिक धर्म रात्रि को आठ बजे आरम्भ हुआ तो वही रात्रि पहली है और उसी से २४ घण्टे पश्चात् अगले दिन रात्रि को पाँनेआठ बजे तो पहली रात्रि है और सवाआठ बजे दूसरी रात्रि मानी जायगी। जिस दिन से मासिक धर्म आरम्भ होता है वही पहला दिन कहलाता है। उसी दिन से १६ रात्रि तक गर्भाधान होता है उसके पश्चात् नहीं।

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वारन्द्ध गुप्तः

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एक और भ्रान्ति है, कोई इन तिथियों को पत्रे से जोड़ते हैं, कोई कलेंडर से यह दोनों ही गलत हैं। वास्तव में जिस दिन स्त्री को मासिक धर्म होता है, वही दिन उसका पहला दिन होता है अर्थात् पहली तारीख होती है।


चेतावनी

१- ४,७,११,१३ रात्रियों दोष युक्त कलंक को प्रदान करने वाली सन्तान को जन्म देती हैं। इन रात्रियों में कभी भूल कर भी गर्भ स्थापित न करें।

२- परदेश में अथवा दूसरे के गृह पर कभी भी गर्भाधान न करें।

३- ५,६,८,९,१०,१२,१४ रात्रियाँ दोष रहित हैं, इनमें गर्भ स्थापित करना उचित है।

४- मेरा जन्म सम्बत् १९८४ अर्थात् १९२७ ई० का है। १९५६ में इच्छानुसार सन्तान पुस्तक लिखने लगा। उसी बीच व्यास ग्रन्थ देखने को मिला, उसका आदि अन्त कुछ नहीं था। बीच के हो पुच्छ थें उसी में सोलह कला की चर्चा को देखा, जो पुस्तक में आंकित है। तब से अब तक मैं बराबर इसी विचार में लगा रहा कि सन्तानों में इस प्रकार का दोष युक्त अन्तर क्यों कर होता है। आज सम्बत् २०६४ प्रथम ज्येष्ठ की अमावस्या के दिन यज्ञ समय पर गायत्री जाप के पश्चात् अनायास नेत्रों के सामने तेज प्रकाश की चमक, चमकी और उसी क्षण परमात्म कृपा से ५१ वर्ष पूर्व इस उलझे हुये प्रश्न का समाधान मिला। वह समाधान था 'यह सब आतंक के कारण ही होता है' अर्थात् स्त्री के मासिक धर्म का 'रेजः'।

अब आपके सामने हर दिन की रात्रि के स्त्री के आतंक की

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वीरेन्द्र गुप्तः

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पुरुष और नारी का अन्तर

स्थिति को रखते हैं।

प्रथम तीन दिन पूर्व मास का सञ्चित आर्तव प्रवाहित होने लगता है।

चौथे दिन से नया आर्तव बनने लगता है। आर्तव के अति न्यून होने के कारण उस दिन की रात्रि में गर्भ स्थित होने पर इससे पुत्र का जन्म तो होगा, परन्तु वह आर्तव न्यून होने के कारण अल्पायु हो सकता है।

पाँचवें दिन की रात्रि में कन्या, छठे दिन की रात्रि में मध्यम आयु का पुत्र जन्म लेता है।

सातवें दिन की रात्रि में स्त्री के आर्तव में प्रजनन क्षमता के तत्व कम होते हैं। इस प्रकार के आर्तव से उत्पन्न कन्या में बन्ध्या दोष बन जाता है।

आठवें दिन की रात्रि में पुत्र, नवें दिन की रात्रि में कन्या, दसवें दिन की रात्रि में चतुर पुत्र उत्पन्न होता है।

११वीं १३वीं रात्रि में स्त्री का आर्तव अत्यन्त उत्तेजक होता है। इन रात्रियों में स्थापित गर्भ से उत्पन्न कन्या का शरीर अत्यन्त उत्तेजक आर्तव से निर्मित होता है। इसी कारण वह उत्पन्न कन्या अत्यन्त कामुक और विषयी हो जाती है। उसे इस प्रकार के पाप कर्म करने से कोई रोक नहीं सकता। ११वीं १३वीं रात्रि में अधिक उत्तेजक आर्तव के कारण स्त्रियों, उस दिन विषय वासना की अधिक इच्छुक होती हैं। इस होने वाली भयंकर हानि को ध्यान में रखते हुये इस दिन सहवास नहीं करना चाहिये।

बारहवीं और चौदहवीं रात्रि में स्त्री का उत्तेजक और उग्र आर्तव बिलकुल शान्त हो जाता है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। बारहवीं और चौदहवीं रात्रि में उत्तम पुत्र होता है।

१५-१६ रात्रियों में स्थापित गर्भ से संसार को चकित करने वाली दिव्य विभूतियों जन्म लेती हैं। इन दोनों दिनों में स्त्री का आर्तव परिपूर्ण, शुद्ध पवित्र और दोष रहित होता है, इसी कारण

हठयोगप्रकरण, संस्कृत, शिवान Varanasi Collection, Digitized by eGangotri

सन्तान में दिव्यता प्रवेश करती है।

पुत्र की तिथियों में कोई विकार युक्त तिथि नहीं है। वह युवा होकर तामस पूर्ण, उत्तेजक भोजन, साहित्य, संगत आदि के अधिक सेवन से ही अधिक विषयी बन जाता है। उसे केवल भोजन साहित्य और संगत के त्याग से ही नियन्त्रित किया जाता है।

५- यदि अधिक कामुक अथवा विषयी हो तो वर्जित तिथियों में कण्डोम का प्रयोग कर सकते हो। अधिक विषयी होना अच्छा नहीं, इसका दुष्परिणाम ५०वर्ष की आयु के पश्चात् अवश्य ही भुगतना पड़ेगा। शरीर अधिक जरजरित हो जाता है।

६- किसी भी प्रकार के नशे की अवस्था में गर्भ स्थिति हो जाने पर, उससे उत्पन्न सन्तान, किसी भी प्रकार की मानसिक विकृति का किसी भी अवस्था अथवा आयु में शिकार बन सकती है, इसे कोई रोक नहीं सकता। पौरुष शक्ति-वर्धक औषधियों में नशा ही प्रधान होता है।

७- गर्भावस्था में मैथुन और कामुक अथवा उत्तेजक साहित्य का अवलोकन करने से गर्भित सन्तान अधिक कामुक और विषयी हो जाती है। अथवा अच्छा साहित्य पढ़ने से अच्छी सन्तान होती है।

८- महिलाओं के मासिक धर्म के समय पर प्रयोग में आने वाला 'पैड' उत्तम है, स्वच्छ है। यह अवस्था एक अत्यन्त सम्बेदनशील, कोमल, प्रक्रिया की है। इसमें संचित आर्तव का प्रवाह होता है। ऐसी अवस्था में खेलना, कूदना, दौड़ना, साइकिल चलाना आदि कार्य अत्यन्त हानिप्रद हैं। ऐसा करने से आर्तव का साव तीव्र हो जाता है, जो भविष्य में गर्भपात और बन्ध्या दोष का कारण बन सकता है। इस अवस्था में जीन्स या कसी पैंट अथवा कच्चा पहरना भी हानिकारक है। ढीली सलवार, धोती, पेट्टीकोट पहरना ही हितकर है।

९- एक ट्रक ड्राइवर के घर में बच्चे ने जन्म लिया। बच्चे इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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सोलाह कला

के शरीर की त्वचा पर अजगर सर्प की त्वचा के समान चिन्ह थे। वह सोचने लगा बच्चे की त्वचा पर यह चिन्ह क्यों बने? कई से चर्चा की, परन्तु कोई समाधान नहीं मिला। चर्चा होने पर पता चला कि टूक डाइवर एक बार टूक लिये जा रहा था, रास्ते में सड़क पर एक अजगर सर्प निकला जा रहा था, बहुत लम्बा था, उसकी चाल भी बहुत मन्द थी, देरी हो जाने के कारण उसे टूक से कुचलता हुआ चला गया। उससे जानकारी मिली कि उसने एक दिन रतिक्रिया समय पत्नी को यह घटना सुनाई थी, और उसी समय गर्भ भी स्थापित हो गया था। समाधान स्पष्ट है, रतिक्रिया समय की भावना के अनुरूप बच्चे की त्वचा पर अजगर सर्प की त्वचा के चिन्ह बन गये।

रति समय पर जो भावना, विचार मुख पर अथवा मन में होते हैं और उसक समय गर्भ स्थित हो जाये तो वह भावना और विचार बच्चे में प्रवेश हो जाते हैं। इसलिये गर्भावस्था के समय विचारों का शुद्ध और संयत होना अतिआवश्यक है।

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पुरुष और नारी का अन्तर

परमात्मा ने पुरुष और नारी के समस्त अवयव समान रूप से ही बनाये हैं। किसी में कोई अन्तर नहीं। जिस प्रकार पुरुष के पास अण्डकोष और शिश्न होते हैं, उसी प्रकार नारी के पास भी अण्डकोष और शिश्न होते हैं। केवल अन्तर इतना ही है कि पुरुष के अण्डकोष और शिश्न बाहर होते हैं और नारी के अण्डकोष और शिश्न अन्दर होते हैं। उनके बाहर और अन्दर होने से ही लिंग भेद बनता है। इसी अन्तर के कारण दोनों के स्वभाव, क्रिया, उत्तरदायित्व और कार्यक्षेत्र भी बदल जाते हैं। यहाँ तक ही नहीं स्वरूप में भी अन्तर आ जाता है।

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अण्डकोष और शिशन बाहर होने पर इसकी संज्ञा पुरुष बन जाती है और पुरुष में पुरुषार्थ, उद्यमी, कठोर परिश्रम में भी लग जाना, आवाज में भी कड़कपन और दाड़ी-मूछों का निकलना आदि लक्षण पुरुष के बन जाते हैं।

अण्डकोष और शिशन अन्दर होने पर इसकी संज्ञा नारी बन जाती है और नारी में सौन्दर्य, कोमलता, आकर्षण, शीलता, लज्जा, मधुर कण्ठ और दाड़ी-मूछ का न होना, कमर का पतलापन और सीने पर उधार आदि लक्षण नारी के बन जाते हैं।

सूर्य गुण की प्रधानता होने पर ही अण्डकोष और शिशन बाहर होते हैं और चन्द्रगुण की प्रधानता होने पर ही अण्डकोष और शिशन अन्दर रहते हैं।

गर्भावस्था में ही समस्त अंगों का निर्माण होता है। यह निर्माण कार्य ६५-७० दिन में पूर्ण हो जाता है। सबसे अन्त में लिंग अर्थात् अण्डकोष और शिशन का निर्माण होता है। यह निर्माण १० दिन में आकर परिपूर्ण होकर परिपक्व भी हो जाता है। अर्थात् उस अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। इसका प्रयोजन स्पष्ट है कि यदि ८० दिन के पास गर्भणी को सूर्य गुण की अधिकता से परिपूर्ण कर दिया जाये तो अण्डकोष और शिशन अन्दर ही न रुककर बाहर आ जाते हैं।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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सोलह कला

रात्री चतुर्थ्यां पुत्रभ्यात् अल्पायुर्धन वंजिताः। पंचम्यां पुत्रिणी नारी बाढ्यां पुत्रस्तु मध्यमः॥ सप्तम्याम् प्रजायोषिदष्टम्यां मीश्वरः सुतः। नवम्यां शुभगानारी दशम्यां चतुरः पुमान्॥ एकादश्यामधर्मास्त्री द्वादश्यां पुरुषोत्तमः। त्रयोदश्यां सुतातस्यवर्ण संकर करिणी॥ धर्माश्वचकृतशश्च आत्मवेदीदृढाव्रतः। प्रजापतये चतुर्दश्यां गुणी वैजंगतीपतिः॥ रजपत्नीमहाभागराजवंशगता तथा। जायते पंचदश्यात् बहुपुत्रापतिव्रता॥ विद्यालक्षण सम्पूर्ण सत्यवादी जितेन्द्रियः। आश्रायः सर्वभूतानां षोडश्यां जायते पुमान्॥

व्यासः

अर्थ- चौथी रात्रि का गर्भ अल्पायु और दरिद्री पुत्र का देने वाला है।

पौर्चर्यां रात्रि में कन्या पुत्र वाली।

छठी रात्रि में पुत्र मध्यमायु वाला।

सातवीं रात्रि में कन्या बन्ध्या।

आठवीं रात्रि में पुत्र ऐश्वर्यशाली।

नवमीं रात्रि में कन्या ऐश्वर्यशालिनी।

दसवीं रात्रि में चतुर बालक।

ग्यारहवीं रात्रि में दुश्चरित्र कन्या।

बारहवीं रात्रि में पुरुषोत्तम पुत्र।

तेरहवीं रात्रि में वर्णसंकर सन्तान उत्पन्न करने वाली कन्या।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गर्भाधान

चांदहवीं रात्रि में उत्तम गुणवाला विद्या युक्त बालक।

पन्द्रहवीं रात्रि की कन्या राजपत्नी, सौभाग्यवती।

सोलहवीं रात्रि का पुत्र सम्पूर्ण विद्याओं और गुणों से युक्त राज्य करने हारा होता है।

मासिक धर्म से लेकर १६ रात्रि तक स्त्री का रजः दिन प्रतिदिन शुद्ध होता जाता है। रजः जितना शुद्ध होता है उतनी ही सन्तान उत्तम होती है।

देश की उन्नति चाहने वाले, दुराचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचार और वर्णसंकर सन्तान न चाहने वाले पुरुषों यह सारे दोष तभी दूर हो सकते हैं। जब गर्भाधान के समय ४, ७, ११ और १३ रात्रियों को छोड़कर ५, ६, ८, ९, १०, १२, १४, १५ और १६ रात्रियों में ही गर्भाधान करें। फिर आप देखोगे कि २० वर्ष में जब ऐसा सन्तति प्रौढ़ होकर आगे बढ़ेगी तो वह सारे देश को ही नहीं संसार को पलट देगी। तब आप अनुभव करेंगे कि कलियुग में सत्युग जैसी सुख और शांति। परन्तु यह तभी सम्भव हो सकेगा जब आप इसे क्रियात्मक रूप दें।

श्री रामचन्द्र जी १२ कला के अवतार कहे जाते हैं और साथ में पुरुषोत्तम भी। श्री कृष्ण जी पूर्ण १६ कला के अवतार कहे जाते हैं। वह कलायें क्या हैं? क्या अब १२, १६ कला के पुरुष नहीं हो सकते? यह कलायें पुरुष को कैसे मिल सकती हैं, वह तो भगवान थे, हमारे बच्चे या हम वैसे कैसे बन सकते हैं?

एक बार महात्मा गांधी ने कहा था। हे मेरे भक्तों मेरी इच्छा है कि तुम मुझे भगवान मत बना देना। देखो आर्यों ने जिस प्रकार स्वामी दयानन्द को रखा है। तुम भी मुझे उसी प्रकार रखना।

कोन ऐसा व्यक्ति है जो पुरुष से भगवान की पदवी न चाहता हो। परन्तु महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता, शान्ति के देवता ज्ञान के भण्डारी यह नहीं चाहते थे कि मुझे पुरुष की अपेक्षा भगवान की पदवी मिले। क्यों? वह ज्ञानी महात्मा गांधी पुरुषों की प्रवृत्ति इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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को जानते थे। उन्होंने जिसे भगवान मान लिया। बस वहीं उसे तथा उसके गुणों को ताला लगा दिया। जिस प्रकार हम यह कभी नहीं विचार सकते कि हमारे पुत्र भी १२, १६ कला के राम और कृष्ण हो सकते हैं। उसी प्रकार महात्मा गांधी को भी भगवान बनाने पर यह नहीं विचार कर सकते कि महात्मा गांधी जैसे और भी महान पुरुष हो सकते हैं। महात्मा गांधी चाहते थे, कि उन जैसे अनेक महान पुरुष भारत में जन्म लें।

प्रिय पाठको! यह कलायें आप अपने बच्चों में ला सकते हैं, इन कलाओं का बच्चों को प्रदान करना आपके हाथों में है। आप जिस कला के बच्चे चाहें बना सकते हैं, चौथी रात्रि से १६ रात्रि तक जो गर्भाधान का समय है यही चौथी कला से १६ कला तक का विज्ञान है। आप जिस रात्रि में गर्भाधान करेंगे उतनी ही कलायें बच्चे में आ जायेंगी। यदि आप चाहते हैं कि हमारा बच्चा १६ कला का पूर्ण और श्रीकृष्ण जैसा हो तो आप १६वीं रात्रि में ही गर्भाधान करें, तो आप निश्चय ही १६ कला का पुत्र प्राप्त करेंगे।

वसुदेव देवकी इस कला के विज्ञान को भली प्रकार जानते थे। जब कंस की कारागार में पड़े-पड़े अत्यन्त दुःखी हो गए और उनके कई बालकों को पंचतत्त्व में कंस ने लय कर दिए थे। तब उनके मन में कंस से प्रतिशोध लेने की ज्वाला अधिक तीव्रता से धधक उठी। तभी उन्होंने १६वीं रात्रि को समागम द्वारा श्री कृष्ण को जन्म दिया, जिसने अत्याचारी कंस को सदैव के लिए सुख की नींद सुला दिया।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गर्भाधान

ऋतु समय से १६ दिन तक गर्भाशय का मुख खुला रहता है और उसी समय में गर्भधारण करने की शक्ति उत्पन्न रहती है। इसके पश्चात् गर्भाशय का मुख बन्द हो जाता है जिसके पश्चात् गर्भधारण नहीं हो सकता।

स्थान- कमरा एकांत हो, सुन्दर चित्रों से या जिस विचार का पुत्र या पुत्री के लिए गर्भाधान करना हो, उसी प्रकार के चित्रों से सुसज्जित हो, साफ- सुथरा और सुगन्धित हो, सेज मुलायम गद्देदार हो, कमरे में हल्का प्रकाश हो।

समय- एक प्रहर रात्रि बीते समय से एक प्रहर रात्रि रहे समय तक, अर्थात् रात्रि को १० से १२, १ बजे तक का समय गर्भाधान के लिए उपयुक्त और उत्तम है।

आसन- स्त्री को चारपाई पर सीधे ही लेटकर टांगे घुटने के स्थान से मोड़ कर सीने के पास लगाना चाहिए और पैरों की एड़ियाँ नितम्ब से लगी रहें। इस प्रकार वीर्य ग्रहण करना चाहिए और अपनी कमर के नीचे तकिया भी लगा लेना चाहिये। किसी भी करवट, बैठकर या स्त्री पुरुष के ऊपर लेट कर वीर्य ग्रहण करेगी तो बालक कुछड़ा अंग बिहंग होगा। रजः और वीर्य के पात होते समय स्त्री ऊपर को संकोचन द्वारा वीर्य को खींचे और उस समय स्त्री पुरुष दोनों के मुख के सामने मुख, नासिका के सामने नासिका, नेत्रों के सामने नेत्र, हृदय के साने हृदय, नाभि के सामने नाभि अर्थात् दोनों शरीरों के अंग आम्ने-सामने हों ताकि वीर्य गर्भाशय में सुमन्ता से सीधा ही प्रविष्ट हो जावे। जब दोनों के शरीर तथा भीतरी नाड़ी की चेष्टा शिथिल हो जावे तब दोनों पृथक-पृथक हो जावें। अर्थात् वीर्य स्वलन के कुछ देर पश्चात् पृथक होवें। यदि वीर्य गर्भाशय में प्रविष्ट होते समय जिरह से टेढ़ा इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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आदि हो जायगा वही अंग बच्चे का विकृत हो जायगा। पुरुष का समागम के पश्चात् लघुशक्ति (मूत्र त्याग) के लिए अवश्य जाना चाहिए और इन्द्र की त्वचा को भी सीधा कर लें।

भोजन-जिस विचार की तथा जितनी विद्वान सन्तान को जन्म देना हो, उसी प्रकार का भोजन पूर्व लिखे अनुसार १॥ मास तक स्त्री पुरुष दोनों ब्रह्मचर्य के साथ सेवन करें। भोजन पाने के कम से कम २ घण्टे पश्चात् समागम करना चाहिए। रति के पश्चात् शतावर ६ माशा, छुहारा २ नग, १॥ पाव दूध १॥ पाव जल इन वस्तुओं को मिलाकर पकायें जब दूध मात्र रह जाये तो उसको ठण्डा करके समागम से पूर्व तैयार करके रख लें और रति से निवृत्त होकर इस दूध का पान करें या मिष्ठान खायें या २॥ तोला बहिया गुड़ भी खा सकते हैं। ऐसा करने से समागम से जा शक्ति क्षय होती है वह पुनः वापिस आ जाती है और कुछ न खाने से आँतों में रूक्षता आ जाती है जिस कारण पेट में विवन्ध हो जाता है।

भावना- समागम के समय स्त्री और पुरुष के जैसे भाव होते हैं, वही भाव सन्तान में अवश्य ही आ जाते हैं। देखा गया है कि माता-पिता तो धर्मात्मा हैं परन्तु उनका लड़का चोर डाकू। ऐसा क्यों? समागम समय में किसी डाकू की घटना याद आ गई और उसे सुनाना आरम्भ कर दिया। इसमें स्त्री के विचारों की अधिक प्रधानता है। इसलिये समागम समय निर्भयता, धार्मिक चित्र, योद्धाओं का ध्यान, शांति, प्रसन्नता, सात्विक विचार होते हैं तो सन्तान उत्तम, विद्वान, निर्भय, बलवान और धर्मात्मा होंगे। इसके विपरीत भावों से दुष्ट, दुराचारी, कुरूप, दरिद्री, पापी और हीन सन्तान होंगे।

एतत्कामफलं लोके यद्व्यापक चिन्तना।

अन्य चित्त कृते कामं शववौरिक संगमः॥

शृंगार शतक २९

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गर्भ स्थित न होने के कारण और उसका उपचार

अर्थ- मंथुन के समय स्त्री पुरुष का चित्त एकाग्रित हो जाना ही काम की सफलता है, यदि उस समय दोनों का चित्त दो स्थानों पर रहा तो समागम में आनन्द नहीं आता।

महाभारत आदिपर्व की गाथा- जिस समय राजा शान्तनु के दोनों पुत्र चित्रवीर्य युवाकाल में और विचित्रवीर्य युद्ध में मारे गये। उस समय रानी सत्यवती को चिन्ता हुई कि वंश वृद्ध कैसे हो, तब उसने नियोग के लिए व्यास जी को बुला कर सन्तान लाभ के लिये प्रार्थना की जिस व्यास जी ने स्वीकार कर लिया। सत्यवती ने सुसज्जित कमरे में घृत का दीपक जलाकर उस कमरे को अम्बिका के लिये नियुक्त किया। जब उस कमरे में व्यास जी ने प्रवेश किया तो अम्बिका ने डर कर ओँखें बन्द कर लीं, व्यास जी ने माता का प्रिय साधने के लिये उसके साथ समागम किया परन्तु काशीराज की कन्या ने भय से उनकी ओर न देखा, अन्तः व्यास जी के घर से निकलने पर उनकी माता ने उनसे पूछा कि बेटा क्या इस वधु से गुणवान पुत्र उत्पन्न होगा? इन्द्रियों के अतीत ज्ञानी सत्यवती के पुत्र व्यास जी ने माता की यह बात सुनकर कहा कि विधि पूर्वक जन्म लिया हुआ गर्भ में यह बालक सहस्र हाथियों के समान बलवान, विद्वान, राजर्षियों में श्रेष्ठ महाभाग, महावीर्यवान अति बुद्धिमान होगा, और वह महात्मा पुत्र उत्पन्न करेगा परन्तु माता दोष के कारण अन्धा होगा। पुत्र की यह बात सुनकर माता ने कहा कि हे तपोवन! अन्धा पुरुष कुल के योग्य भूषण नहीं हो सकता, इसलिए जाति कुल का रक्षक पितरों का वंश रखने वाला और कुरुवंश का राजा होने योग्य एक पुत्र और उत्पन्न करो। महायशस्वी व्यास जी इसे स्वीकार करके चले गये। समय आने पर अम्बिका ने ऋषि के वचनानुसार एक अन्धा पुत्र उत्पन्न हुआ देवी सत्यवती ने पहले की तरह पुत्र वधु की आज्ञा लेकर फिर ऋषि को बुलाया। महर्षि विधि के अनुसार अम्बालिका के पास आये। अम्बालिका उस ऋषि को देख कर पीली पड़ गई।

इच्छानुसार सन्तान १३९ वीरेन्द्र गुप्तः

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सत्यवती को पुत्र व्यास ने उसको डरी हुई दुःखित और पीली देखकर कहा कि तुम मुझ को कुरूप देखकर पीली हो गयीं इसलिए तुम्हारा पुत्र भी पीला होगा वह पीला अर्थात् पांडु नाम से प्रसिद्ध होगा। ऋषि यह बात कहकर घर से निकलने पर सत्यवती ने उनसे सन्तान की बात पूछी और व्यास जी ने माता से कहा कि पुत्र पीला होगा। सत्यवती ने यह सुन कर फिर उनसे एक पुत्र की और प्रार्थना की, महर्षि ने वह भी स्वीकार करली। समय आने पर देवी अम्बालिक ने सुन्दर पांडु वर्ण एक कुमार उत्पन्न किया। फिर बड़ी वधु का ऋतुकाल आने पर सत्यवती ने उसको राजर्षि के लिए नियुक्त किया। परन्तु उसने ऋषि शरीर की दुर्गन्ध स्मरण कर उसका कहना नहीं माना और देव कन्या रूपी उस काशीराज पुत्री ने अप्सरा समान एक दासी को अपने आभूषणों से अलंकृत कर व्यास जी के पास भेज दिया। ऋषि के आने पर दासी ने उठकर उनको नमस्ते की और ऋषि की आज्ञानुसार काम किया। व्रतशील महर्षि उसके पास रहकर अति प्रसन्न हुए और ज्ञाते हुए कहा कि तुम्हारा दासीपन जाता रहेगा। तुम्हारे गर्भ में स्थित सन्तान धर्मात्मा और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होगी, व्यास जी के वीर्य से और उसके गर्भ से धृतराष्ट्र और पांडु के भाई विदुर ने जन्म लिया।

समागम समय आँखें मीचने पर धृतराष्ट्र अन्धे का जन्म हुआ। भय के कारण शरीर पीला पड़ जाने से पांडु (पीलिया रोगी) पुत्र जन्मा और निर्भय, प्रीतियुक्त, प्रसन्न चित्त और शान्ति पूर्वक विचारों से धर्मात्मा, नीतिज्ञ दूरदर्शी विद्वान विदुर ने जन्म लिया।

इसलिए समागम समय उत्तम सन्तान की इच्छा के लिए दम्पति को प्रसन्न चित्त, आनन्दमय, प्रीतियुक्त वातावरण में ही समागम करना उपयुक्त है, विपरीत दशा में नहीं। ऋतु काल में धर्म से गमन करने से सन्तान सौ और इससे भी अधिक वर्ष की आयुँ मोगती है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गर्भ स्थित न होने पर

गर्भ स्थित न होने के कारण और उसका उपचार

गर्भ स्थित न होने के अनेक कारण हैं। जिनमें से मुख्य यह हैं—

  1. १- गर्भाशय में मेध (चर्बी) का बढ़ जाना।
  2. २- गर्भाशय में शोथ (सूजन) का होना।
  3. ३- गर्भाशय में केशाद नाम के कीटों का प्रविष्ट हो जाना।
  4. ४- रजः और वीर्य का दूषित हो जाना।
  5. ५- वन्ध्यापन।
  6. ६- जनित इन्द्रियों का लघु या दीर्घ होना।
  7. ७- वीर्य में सन्तानोत्पादक कौट के अभाव का होना।

उपरोक्त व्याधियों का निराकरण इस प्रकार, करें—

१- गर्भाशय में मेध के बढ़ जाने से गर्भ द्वारा का मुख छोटा हो जाता है जिस कारण गर्भाशय में वीर्य नहीं पहुँच पाता ऐसी दशा में नारी रत्न चूर्ण का दो-तीन मास तक सेवन कराने से लाभ होगा (कुछ अनुभव में देखें प्रयोग नं. २५)।

२- गर्भाशय में शोथ का होना गर्भस्थित होने में बाधक है। ऐसी दशा में भपके से खींचा हुआ मकोय का जल १ तोला और अशोकारिष्ट एक तोला या पुनर्नवासव भोजन के पश्चात् दोनों समय तथा प्रातः गौ दूध के साथ चन्द्रप्रभा वटी की २ गोली। लगभग २-३ मास तक देने से रोग दूर होकर गर्भ स्थित हो जायगा।

३- केशाद नाम के कीटाणु सर के बालों को खा जाते हैं। ऐसी दशा में सर पर गंज नामक रोग हो जाता है। किसी भी

इच्छानुसार सन्तान

१३३

वीरेन्द्र गुप्तः

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असावधानी के कारण यह केशाद कीटाणु स्त्री के गर्भाशय में प्रविष्ट हो जायें तो यह गर्भ में गर्भित रजः वीर्य और भ्रूण को खा जाते हैं। इसी कारण गर्भ स्थित नहीं हो पाता। ऐसी दशा में रात्रि को सोते समय एक ताजा हरी मूली को भली प्रकार चाकू तथा जल से स्वच्छ करके स्त्री अपनी योनि में रखे। प्रातः निकालने पर आप देखेंगे कि मूली पर अनेक काले रंग के बारीक-बारीक कीटाणु लगे हुए हैं। यही केशाद नाम के कीटाणु हैं जो गर्भ में भ्रूण को खा जाते हैं। उस मूली को सावधानी के साथ दूर कहीं फेंक दें। इसी प्रकार मूली का निरन्तर प्रयोग करें। जब तक कीटाणु निकलने बन्द न हो जायें। जब इन कीटाणुओं से गर्भाशय स्वच्छ हो जायेगा तो निश्चय ही गर्भ स्थित हो जायेगा।

४- रजः वीर्य के दूषित हो जाने पर स्त्रियों के लिए सुपारीपाक और पुरुषों के लिए बानरी गुटका प्रयोग करना और ३ मास तक ब्रह्मचर्य से रहना उत्तम रहेगा। यह योग 'कुष्ठ अनुभव' में देखें।

५- बन्ध्यापन तो एक प्रकार से असाधारण अवस्था है जो सातवीं रात्रि में गर्भाधान करने का फल होता है। फिर भी प्रभु से याचना करते हुए स्त्री को नारी रत्न चूर्ण का (कुष्ठ अनुभव का प्रयोग नं. २५) ४-४ माशा प्रातः सायं जीवित बछड़े वाली गाय के दूध से ६ मास तक निरन्तर प्रयोग कराने से लाभ हो सकता है। यदि प्रभु की कृपा हुई तो अवश्य ही गर्भ स्थित होगा।

६- जनित इन्द्रियों की लघुता-दीर्घता का तो विवाह से पूर्व ही जान लेना उचित है। क्योंकि यदि स्त्री की योनि गहरी और पुरुष की इन्द्रिय छोटी होगी तो ना तो स्त्री ही सन्तुष्ट होगी और न ही वीर्य गर्भाशय तक पहुँचेगा और यदि स्त्री की योनि कम गहरी और पुरुष की इन्द्रिय लम्बी होगी तो स्त्री को अधिक कष्ट होने के कारण वीर्य अपने स्थान पर नहीं पहुँच सकेगा। इसलिए इसकी जानकारी विवाह से पूर्व करा लेना उचित रहता है। इसको भली प्रकार समझने और परीक्षा करने के लिए वात्सायन काम सूत्र

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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आदि में स्त्री और पुरुषों की आकृतियों के चिन्ह दिये हैं। उनसे ही जनित इन्द्रियों के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करें।

७- जिस वीर्य में सन्तानोत्पादक कौटुम्ब का अभाव हो तो उस वीर्य से कदापि गर्भ स्थापित नहीं हो सकेगा। इसके लिए पुरुष को उचित है कि निम्न लिखित योग ३ मास तक निरन्तर सेवन करें। साथ में स्त्री सेवन का ३ मास तक परित्याग रखें। ऐसा करने से वीर्य में सन्तानोत्पादक कौटुम्ब बलवान होकर गर्भ स्थापित हो जायेगा।

भुने हुए बिनौलों का आटा ५० ग्राम, सलाव मिश्री पंजे की १० ग्राम, सफेद मूसली १० ग्राम, बीज बन्द १० ग्राम, तालमखाना १० ग्राम, लजवन्ती १० ग्राम, उटंगन १० ग्राम, कौंच बीज छिलका उतार कर १० ग्राम, शतावर १० ग्राम, गोखुर पहाड़ी १० ग्राम, पीपल की दाढ़ी २० ग्राम, सैमल की मूसली १० ग्राम, तोदरी सफेद १० ग्राम, तोदरी लाल १० ग्राम, साँठ १० ग्राम भूसी इसबगोल १०० ग्राम, २५० ग्राम मिश्री। भूसी को छोड़कर सबको बारीक कूट लें। ४ से ६ माशा तक दो समय दूध से लें।

गर्भ स्थित न होने पर

किन्हीं सज्जनों का विचार है कि यह आवश्यक नहीं कि जिस दिन गर्भाधान संस्कार के लिए निश्चय किया है उस दिन गर्भ स्थिति हो ही जाय। तो फिर उत्तम तिथि का निश्चय करके कैसे गर्भ स्थित हो सकता है।

प्रिय बन्धुओं! ऐसा नहीं है, जो निश्चित तिथि के दिन गर्भाधान किया जाय और गर्भ स्थित न हो। मैंने पूर्व की पंक्तियों में महाभारत काल के एक नियोग का दृश्य प्रस्तुत किया है। आप उसे पढ़कर देखें। उस घटना से तीन महत्वपूर्ण विषयों पर आश्चर्यजनक प्रकाश पड़ता है।

डक्छानुसार सन्तान

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प्रथम-पुत्र की कामना के लिए नियोग कराया था। सो तीनों बार पुत्रों का ही जन्म हुआ। दूसरे- गर्भाधान समय अम्बिका अम्बालिका और दासी की जैसी जैसी भावना बनी वैसी- वैसी सन्तान ने जन्म लिया। तीसरे- व्यास जी ने अम्बिका अम्बालिका और दासी के साथ केवल एक ही एक बार गर्भाधान कृत्य किया और उसी समय गर्भ स्थित हो गया।

प्रथम महत्त्वपूर्ण विषय यह सिद्ध हुआ कि पुत्र या पुत्री को अपनी इच्छानुसार जन्म दिया जा सकता है। दूसरे गर्भाधान समय पुरुष की अपेक्षा स्त्री के विचारों का बच्चे पर तत्काल प्रभाव पड़ता है और बच्चा वैसा ही बन जाता है। तीसरे निश्चित तिथि में ही केवल एक ही बार में गर्भाधान क्रिया द्वारा गर्भ स्थित हो सकता है। हाँ यह सम्भव हो सकता है कि अम्बिका अम्बालिका और दासी को पूर्व से ही किसी औषधि का प्रयोग कराया गया हो जिससे गर्भाशय वीर्य को तत्काल ग्रहण कर सके। रोग रहित स्त्री पुरुषों के लिए इसी आशय के प्रयोगों का उल्लेख करते हैं जो परीक्षित भी हैं।

स्वर्ण भस्म २ चावल, नागकेशर का चूर्ण १ माशा (यदि नागकेशर बंगाल की मिल जाय तो अति उत्तम है) दोनों को मिलाकर एक मात्रा बनी। जब स्त्री को मासिक धर्म होकर रक्त विकार गिर जावे और स्नान कर शुद्ध हो, जिस दिन गर्भाधान का विचार हो उस दिन तक जीवित बछड़े वाली गाय के दूध से प्रातःकाल स्त्री को सेवन करायें यह योग तत्काल गर्भ स्थापन होने में उत्तम साधक है।

अथवा

मकरध्वज स्वर्ण सिन्दूर १ माशा, सितोपलादि चूर्ण ३ माशा दोनों को खरल में डालकर भली प्रकार घोटें, एक रस हो जाने पर उसकी १० मात्रा बनालें। जब स्त्री को मासिक धर्म होकर रक्त विकार गिर जावे और स्नान कर शुद्ध हो उसी दिन से १० दिन इच्छानुसार सन्तान

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गर्भ धारण के तात्कालिक लक्षण

तक बिसौटा (अडुसा) सूखा २ तोला को एक पाव जल में रात्रि को भिगो दें और प्रातःकाल को अग्नि पर पकावें जब जल पकते-पकते एक छटीक रह जाय तो उतारकर छान लें ठण्डा हो जाने पर उसमें इच्छानुसार शहद मिलाकर उपरोक्त औषधि की एक मात्रा को लेकर शहद में अलग मिलाकर स्त्री को चटावें बाद में उपरोक्त काढ़े को पिला दें। यह योग गर्भ स्थापन में शीघ्र ही वीर्य को ग्रहण करने में सहायक होता है।

अन्य विधिवत् प्रयोग

जिन स्त्रियों को मासिक धर्म न्यून मात्रा में निरन्तर कई वर्षों से होता रहा है। ऐसी स्थिति में गर्भ स्थित नहीं हो सकता ऐसी स्त्रियों के लिए निम्नलिखित प्रयोग अति उत्तम है।

शरद ऋतु में मासिक धर्म के पश्चात् प्रातःकाल और रात्रि में गाय का दूध १ पाव में ६ माशा फलघृत मिलाकर देना चाहिए और दोनों समय भोजन के पश्चात् १ तोला दशमूलारिष्ट १ तोला मकोय के अर्क के साथ देना चाहिए तथा ग्रीष्म ऋतु में प्रातःकाल और रात्रि में दो-दो गोली चन्द्रप्रभा वटी गाय के दूध से और दोनों समय भोजन के पश्चात् १ तोला पत्रांगासव १ तोला मकोय के अर्क के साथ देना चाहिए। इसके पश्चात् दोनों ऋतुओं में उपरोक्त ऋतु के अनुसार औषधि सेवन कराकर जब अगला मासिक धर्म आये तो उससे ७ दिन पूर्व से १ गोली रजः प्रवर्तनी वटी की रात्रि को गर्भ जल से देनी चाहिए तथा जिस दिन मासिक धर्म आरम्भ हो उस दिन रात्रि को रजः प्रवर्तनी वटी की २ गोली देकर पश्चात् सब औषधियाँ देनी बन्द कर दें। जिन दिनों रात्रि को रजः प्रवर्तनी वटी का प्रयोग करायें उन दिनों रात्रि की और औषधि बन्द कर देनी चाहिए। जब रजः विकार गिर जावे और स्त्री स्नानादि से पवित्र हो जाय तो पूर्व लिखित विधि से स्वर्ण भस्म नागकेशर के योग का प्रयोग करायें या मकरध्वज स्वर्ण सिन्दूर इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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सितोपलादि चूर्ण वाला योग सेवन करायें तथा इस बीच में प्रातःकाल की अन्य औषधि बन्द रखें तथा भोजन के पश्चात् और रात्रि की औषधि चलती रहेगी। तत्पश्चात् निश्चित तिथि के दिन गर्भाधान प्रकरण में लिखित विधि से गर्भाधान करें। ध्यान रहे इस मास के अन्त में रजः प्रवर्तनी वटी का सेवन नहीं कराना चाहिए। अगले मास मासिक धर्म आने के समय तक प्रतीक्षा करें। यदि गर्भ स्थित न हुआ हो तो पुनः पुनः इसी रीति का प्रयोग करें। अवश्य ही गर्भ स्थित होगा। उपरोक्त क्रम के अनुसार स्त्री में रजः की उत्पत्ति में अधिकता हो सकती है, जिस कारण युग्म रात्रि में भी गर्भाधान करने पर कन्या के जन्म लेने की सम्भावना हो सकती है। इस कारण पुरुषों के लिए उचित है कि वे गर्भाधान की तिथि से कम से कम २ मास पूर्व इस वीर्य वर्धक योग का निम्न प्रकार अवश्य ही सेवन करें। प्रातः काल प्रयोग नं० ३३ के साथ स्वर्ण बंग। तीसरे प्रहर बानरीगुटका प्रयोग नं० ३१। रात्रि में चन्द्रप्रभावटी और शीत वीर्य गुटका, दोनों की दो-दो गोली दूध के साथ सेवन करें। इस प्रकार निरन्तर २ या ३ मास तक सेवन करने से वीर्य की मात्रा रजः से अधिक हो जायगी। (देखें कुछ अनुभव में ३१ और ३३)

बंगला अशोक की छाल को दरदरा कट लें, उसमें से ५० ग्राम छाल, २५० ग्राम पानी और २५० ग्राम दूध। सबको मिलाकर मन्द मन्द आग पर पकायें। जब पानी जल जाय तो उतार कर छान लें और रुचि के अनुसार मीठा मिलाकर स्त्री को सेवन करायें। यदि दो समय सेवन करा दें तो अति उत्तम है। इसका प्रयोग ३ मास तक कराने से गर्भाशय सम्बन्धी समस्त दोषों का निवारण हो जाता है, इसके पश्चात् चौथे मास में मासिक धर्म के चौथे दिन प्रातःकाल शिवलिंगों के ७ बीज सांबुत ही बिना दौत लगाये ताजे जल से निगल लें। पाँचवें दिन ९ बीज, छठे दिन ११ बीज, सातवें दिन १३ बीज, आठवें दिन १४ बीज, नवें

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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दिन १५ बीज, दसवें दिन १६ बीज, ग्यारहवें दिन १७ बीज सेवन करायें और रात्रि को इन्हीं ८ दिन नित्य स्वर्ण भस्म नागकेशर के योग का प्रयोग गाय के दूध से करायें तथा ८, १०, १२ रात्रि में गर्भाधान करे निश्चित रूप से सफलता मिलेगी। ध्यान रहे अब अशोक की छाल के दूध का प्रयोग नहीं कराना है। यदि गर्भ धारण न हुआ हो तो शिलिंगी और स्वर्ण भस्म नागकेशर के योग का फिर सेवन करायें। इसी प्रकार २ या ३ मास के प्रयत्न से निश्चित सफलता मिलेगी।


गर्भ धारण के तात्कालिक

लक्षण

योनि में वीर्य का सम्यक रीति से ग्रहण, तृप्ति, कोख में भारीपन, फड़कन, समागम के पश्चात् योनि से वीर्य का बाहर न निकलना, हृदय में प्रसन्नता, नेत्रों में आलस्य, तृष्ण, ग्लानि और रोमांच होना। ये लक्षण गर्भ धारण होने के साथ स्पष्ट अनुभव होते हैं।


गर्भ रक्षा

किसी भी सभ्य देश के स्वास्थ्य स्तर का सर्वोत्तम अनुमान उस देश के निवासियों के जन्म-आयु और मृत्यु सम्बन्धी आँकड़ों से जाना जा सकता है। शिशु-मृत्यु संख्या और मातृ मृत्यु संख्या देश के सामाजिक जीवन के सच्चे दर्पण हैं।

हमारे देश में शिशुओं की मृत्यु संख्या और देशों की अपेक्षा अत्याधिक है। देश का भविष्य इन शिशुओं पर ही अवलम्बित है।

इच्छानुसार सन्तान

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