ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
( ५३० )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तमशनायापिपासे | ऐत० | १ | ... | ... | २ | ... | ... | ५ | ३०७ |
| तस्मादिन्द्रो नाम | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | १४ | ३१७ |
| तस्यैष एव शारीरः | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | २ | ३८७ |
| तस्माद्वा एतस्मात् | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | १ | ३ | ३७३ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | २ | २ | ३७६ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | २ | ३७८ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | २ | ३८१ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ५ | २ | ३८४ |
| तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ३ | ४२५ |
| तमीश्वराणां परमं महेश्वरम् | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ५०८ |
| तद् वेदगुह्योपनिषत्सु गूढम् | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४९४ |
| तदेवाग्निस्तदादित्यः | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४७४ |
| ततो यदुत्तरतरं तदरूपम् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ४६६ |
| ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तम् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ४६४ |
| तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तम् | ,, | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४३५ |
| तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयः | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ५०४ |
| तपःप्रभावाद् देवप्रसादाच्च | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २१ | ५१९ |
| तां योगमिति मन्यन्ते | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ११ | १६५ |
| तान् वरिष्ठः प्राणः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ३ | १८७ |
| तान् ह स ऋषिः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | २ | १७३ |
| तान् होवाचैतावत् | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ७ | २२५ |
| ता एता देवताः सृष्टाः | ऐत० | १ | ... | ... | २ | ... | ... | १ | ३०४ |
| ताभ्यः पुरुषमानयत्ताः | ,, | १ | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | ३०५ |
| ताभ्यो गामानयत्ताः | ,, | १ | ... | ... | २ | ... | ... | २ | ३०५ |
| तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीः | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ९ | ८२ |
( ५३१ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ६ | २१८ |
| तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिः | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ४४६ |
| तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेदः | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ३ | ६० |
| तेजो ह वा उदानः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ९ | २०० |
| ते तमर्चन्तः | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ८ | २२६ |
| तेषामसौ विरजः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १६ | १८५ |
| ते ये शतम् | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ३ | ३९५ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ४ | ३९६ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ५ | ३९६ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ६ | ३९७ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ७ | ३९८ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ८ | ३९८ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ९ | ३९९ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | १० | ३९९ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ११ | ४०० |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | १२ | ४०० |
| ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४३४ |
| तं दुर्दर्शं गूढम् | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १२ | १०९ |
| त्वं स्त्री त्वं पुमानसि | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४७४ |
| दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | २ | २४९ |
| दूरमेते विपरीते | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ४ | १०१ |
| देवैरत्रापि विचिकित्सितम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २१ | ९१ |
| ,, ,, | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २२ | ९१ |
| देवानामति वह्नितमः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ८ | १९० |
| द्वा सुपर्णा सयुजा | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | १ | २६५ |
( ५३२ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४७७ |
| द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १ | ४९० |
| धनुर्गृहीत्वौपनिषदम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ३ | २५८ |
| न तत्र चक्षुर्गच्छति | केन० | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ५० |
| न जायते म्रियते वा | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १८ | ११३ |
| न तत्र सूर्यो भाति | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १५ | १५६ |
| न नरेणावरेण | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ८ | १०५ |
| न प्राणेन नापानेन | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ५ | १४९ |
| न वित्तेन तर्पणीयः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २७ | ९६ |
| न संदृशे तिष्ठति | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ९ | १६३ |
| न साम्परायः प्रतिभाति | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ६ | १०३ |
| न चक्षुषा गृह्यते | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ८ | २७१ |
| न तत्र सूर्यो भाति | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | १० | २६३ |
| न कञ्चन वसतौ | तैत्ति० | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | १ | ४२१ |
| नवद्वारे पुरे देही | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १८ | ४७० |
| न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २० | ४८८ |
| न तस्य कार्यं करणं च | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | ५०९ |
| न तत्र सूर्यो भाति न | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ५१३ |
| न तस्य कश्चित् पतिरस्ति | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ५०९ |
| नाहं मन्ये सुवेदेति | केन० | ... | ... | ... | २ | ... | ... | २ | ५५ |
| नाचिकेतमुपाख्यानम् | कठ० | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १६ | १३३ |
| नायमात्मा प्रवचनेन | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २३ | ११७ |
| नाविरतो दुश्चरितात् | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २४ | ११८ |
| नायमात्मा प्रवचनेन | मुण्डक० | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ३ | २७५ |
| नायमात्मा बलहीनेन | ,, | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ४ | २७६ |
( ५३३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नान्तःप्रज्ञम् | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | २९० |
| नित्यो नित्यानाम् | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १३ | १५५ |
| ,, ,, | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ५१२ |
| निष्कलं निष्क्रियम् | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १९ | ५१८ |
| नीलः पतङ्गो हरितः | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४७५ |
| नीहारधूमाकानिलानलानाम् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | ४५४ |
| नैव वाचा न मनसा | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १२ | १६५ |
| नैषा तर्केण मतिः | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ९ | १०६ |
| नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चम् | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १९ | ४८७ |
| नैव स्त्री न पुमानेष | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ४९८ |
| पराचः कामाननुयन्ति | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | २ | १३६ |
| पराञ्चि खानि व्यतृणत् | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १ | १३५ |
| पञ्चपादं पितरम् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ११ | १८१ |
| परमेवाक्षरम् | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | १० | २१२ |
| परीक्ष्य लोकान् | मुण्डक० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | १२ | २४६ |
| पञ्चस्रोतोऽम्बुम् | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४३७ |
| पायूपस्थेऽपानम् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ५ | १९६ |
| पीतोदका जग्धतृणाः | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ३ | ७७ |
| पुरमेकादशद्वारम् | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १ | १४६ |
| पुरुष एवेदं विश्वम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | १० | २५६ |
| पुरुषे ह वा अयम् | ऐत० | २ | ... | ... | १ | ... | ... | १ | ३१८ |
| पुरुष एवेदं सर्वम् | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ४६८ |
| पूषन्नेकर्षे यम सूर्य | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १६ | ४२ |
| पृथिवी च पृथिवीमात्रा | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ८ | २०९ |
| पृथिव्यन्तरिक्षम् | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ७ | १ | ३५४ |
( ५३४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे | श्वे० | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ४५५ |
| प्रतिबोधविदितम् | केन० | ... | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | ५७ |
| प्र ते ब्रवीमि तदु | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १४ | ८५ |
| प्रजापतिश्चरसि | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ७ | १९० |
| प्रणवो धनुः शरः | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ४ | २५९ |
| प्राणस्येदं वशे | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | १३ | १९२ |
| प्राणाग्नय एवैतस्मिन् | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ३ | २०५ |
| प्राणो ह्येष यः | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ४ | २६७ |
| प्राणं देवा अनुप्राणन्ति | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | १ | ३७७ |
| प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ३ | १ | ४०८ |
| प्राणान् प्रपीड्येह | श्वे० | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ४५२ |
| प्लवा ह्येते अदृढाः | मुण्डक० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ७ | २४२ |
| बहूनामेमि प्रथमः | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ५ | ७९ |
| बृहच्च तद् दिव्यम् | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ७ | २७० |
| ब्रह्म ह देवेभ्यः | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | १ | ५९ |
| ब्रह्मविदाप्नोति परम् | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | १ | १ | ३७१ |
| ब्रह्मैवेदममृतम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ११ | २६४ |
| भयादस्याग्निस्तपति | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ३ | १५९ |
| भावग्राह्यमनीडाख्यम् | श्वे० | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ५०२ |
| भिद्यते हृदयग्रन्थिः | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ८ | २६२ |
| भीषास्माद् वातः | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | १ | ३९४ |
| भूर्भुवः सुवरिति | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | १ | ३४६ |
| भूरिति वा अग्निः | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | २ | ३४८ |
| भूरिति वै प्राणः | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | ३ | ३४९ |
| भृगुर्वै वारुणिः | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | १ | १ | ४०५ |
( ५३५ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मनसैवेदमाप्तव्यम् | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ११ | १४३ |
| महतः परमव्यक्तम् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ११ | १२९ |
| मनो ब्रह्मेति व्यजानात् | तैत्ति० | ... | ... | ३ | ... | ... | ४ | १ | ४१० |
| महान् प्रभुर्वै पुरुषः | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ४६७ |
| मासो वै प्रजापतिः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १२ | १८२ |
| मायां तु प्रकृतिम् | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ४८१ |
| मा नस्तोके तनये | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २२ | ४८९ |
| मातृदेवो भव | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ११ | २ | ३६४ |
| मृत्युप्रोक्तां नचिकेतः | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १८ | १६९ |
| यस्तु सर्वाणि भूतानि | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ३२ |
| यस्मिन् सर्वाणि भूतानि | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ३२ |
| यच्चक्षुषा न पश्यति | केन० | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | ५२ |
| यच्छ्रोत्रेण न शृणोति | ,, | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ७ | ५३ |
| यत् प्राणेन न प्राणिति | ,, | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ८ | ५३ |
| यदि मन्यसे सुवेदेति | ,, | ... | ... | ... | २ | ... | ... | १ | ५४ |
| यद् वाचानभ्युदितम् | ,, | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ५१ |
| यन्मनसा न मनुते | ,, | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | ५१ |
| यस्यामतं तस्य मतम् | ,, | ... | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | ५६ |
| य इमं परमम् | कठ० | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १७ | १३४ |
| य इमं मध्वदम् | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ५ | १३८ |
| य एष सुप्तेषु जागर्ति | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ८ | १५१ |
| यच्छेद् वाङ्मनसी | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १३ | १३१ |
| यतश्चोदेति सूर्यः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ९ | १४१ |
| यथाऽऽदर्शे तथा | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ५ | १६० |
| यथा पुरस्ताद् भविता | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ११ | ८३ |
( ५३६ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यथोदकं दुर्गे वृष्टम् | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १४ | १४५ |
| यथोदकं शुद्धे शुद्धम् | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १५ | १४६ |
| यदा पञ्चावतिष्ठन्ते | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १० | १६४ |
| यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १४ | १६६ |
| यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १५ | १६७ |
| यदिदं किं च जगत्सर्वम् | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | २ | १५८ |
| यदेवेह तदमुत्र | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १० | १४२ |
| यस्तु विज्ञानवान् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ६ | १२५ |
| ,, ,, | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ८ | १२६ |
| यस्त्वविज्ञानवान् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ५ | १२४ |
| ,, ,, | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ७ | १२६ |
| यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २९ | ९७ |
| यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २५ | ११९ |
| यः पूर्वं तपसः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ६ | १३९ |
| यः सेतुरीजानानाम् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | २ | १२२ |
| य एवं विद्वान् प्राणम् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ११ | २०१ |
| यच्चित्तस्तेनैष प्राणम् | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | १० | २०१ |
| यथा सम्राडेव | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ४ | १९६ |
| यदा त्वमभिवर्षसि | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | १० | १९१ |
| यदुच्छ्वासनिःश्वासौ | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ४ | २०६ |
| यः पुनरेतं त्रिमात्रेण | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ५ | २१६ |
| यत्तदद्रेश्यमग्राह्यम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ६ | २३३ |
| यथा नद्यः स्यन्दमानाः | ,, | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ८ | २७९ |
| यथोर्णनाभिः सृजते | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ७ | २३४ |
| यदर्चिमद्यदणुभ्यः | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | २ | २५७ |
| यदा पश्यः पश्यते | ,, | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ३ | २६६ |
( ५३७ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यदा लेलायते ह्यर्चिः | मुण्डक० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | २ | २३८ |
| यं यं लोकं मनसा | ,, | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | १० | २७२ |
| यः सर्वज्ञः सर्ववित् | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ९ | २३६ |
| ,, ,, | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ७ | २६१ |
| यस्मिन् द्यौः पृथिवी | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ५ | २५९ |
| यस्याग्निहोत्रमदर्शम् | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ३ | २३८ |
| यत्र सुप्तः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | २८८ |
| यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् | ऐत० | ३ | ... | ... | १ | ... | ... | २ | ३२६ |
| यतो वाचो निवर्तन्ते | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ९ | १ | ४०३ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | १ | ३८१ |
| यथाऽऽपः प्रवता | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ५ | ३४५ |
| यद् वै तत्सुकृतम् | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ७ | २ | ३९१ |
| यदा ह्येवैष | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ७ | ३ | ३९२ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ७ | ४ | ३९२ |
| यशो जनेऽसानि स्वाहा | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ४ | ३४४ |
| यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | १ | ३४१ |
| यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वम् | श्वे० | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ४५७ |
| य एको जालवानीशत ईशनीभिः | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १ | ४५९ |
| यस्मात्परं नापरमस्ति | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ४६५ |
| य एकोऽवर्णो बहुधा | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १ | ४७३ |
| यदातमस्तन्न दिवा | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १८ | ४८६ |
| यच्च स्वभावं पचति | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४९३ |
| यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ५१० |
| यदा चर्मवदाकाशं | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २० | ५१८ |
| यस्य देवे पराभक्तिः | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २३ | ५२० |
( ५३८ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तम् | श्वे० | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ४५६ |
| या प्राणेन सम्भवति | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ७ | १४० |
| या ते तनूर्वाचि | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | १२ | १९२ |
| या ते रुद्र शिवा | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४६२ |
| यामिषुं गिरिशन्त हस्ते | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४६३ |
| युञ्जते मन उत युञ्जते | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४४९ |
| युजे वां ब्रह्म पूर्व्यम् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४४९ |
| युञ्जानः प्रथमं मनः | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १ | ४४७ |
| युक्तेन मनसा वयम् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४४८ |
| युक्त्वाय मनसा देवान् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४४८ |
| येन रूपं रसम् | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ३ | १३७ |
| येयं प्रेते विचिकित्सा | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २० | ८९ |
| ये ये कामा दुर्लभाः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २५ | ९४ |
| येनावृतं नित्यमिदं | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ५०४ |
| यो वा एतामेवम् | केन० | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ९ | ७३ |
| योनिमन्ये प्रपद्यन्ते | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ७ | १५० |
| यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४६२ |
| ,, ,, | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ४८२ |
| यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | ४८१ |
| ,, ,, | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४९१ |
| यो देवानामधियः | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ४८३ |
| यो ब्रह्माणं विदधाति | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १८ | ५१७ |
| यो देवो अग्नौ यो अप्सु | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १७ | ४५९ |
| लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वम् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ४५६ |
| लोकादिमग्निम् | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १५ | ८६ |
( ५३९ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वह्नेर्यथा योनिगतस्य | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ४४४ |
| वायुरनिलममृतमथेदम् | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १७ | ४३ |
| वायुर्यथैको भुवनम् | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १० | १५३ |
| वालाग्रशतभागस्य | श्वे० | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ४९७ |
| विद्यां चाविद्यां च | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | ३६ |
| विज्ञानसारथिर्यस्तु | कठ० | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ९ | १२७ |
| विज्ञानात्मा सह | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ११ | २१२ |
| विश्वरूपं हरिणम् | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ८ | १७८ |
| विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् | तैत्ति० | ... | ... | ३ | ... | ... | ५ | १ | ४११ |
| विज्ञानं यज्ञं तनुते | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ५ | १ | ३८३ |
| विश्वतश्चक्षुरुत | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४६१ |
| वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः | मुण्डक० | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ६ | २७७ |
| वेदमनूच्याचार्यः | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ११ | १ | ३६२ |
| वेदाहमेतं पुरुषम् | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | ४६४ |
| वेदाहमेतमजरम् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | २१ | ४७२ |
| वेदान्ते परमं गुह्यम् | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २२ | ५२० |
| वैश्वानरः प्रविशति | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ७ | ८० |
| व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ११ | १९१ |
| शतं चैका च हृदयस्य | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १६ | १६७ |
| शतायुषः पुत्रपौत्रान् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २३ | ९२ |
| शान्तसंकल्पः सुमनाः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १० | ८३ |
| शीक्षां व्याख्यास्यामः | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | २ | १ | ३३३ |
| शौनको ह वै महाशालः | मुण्डक० | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ३ | २३१ |
| शं नो मित्रः | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | १२ | १ | ३६८ |
| श्रवणायापि बहुभिः | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ७ | १०४ |
( ५४० )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्रेयश्च प्रेयश्च | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २ | ९९ |
| श्रोत्रस्य श्रोत्रम् | केन० | ... | ... | ... | १ | ... | ... | २ | ४९ |
| श्वोभावा मर्त्यस्य | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २६ | ९५ |
| स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | ३३ |
| सम्भूतिं च विनाशं च | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ४० |
| स तस्मिन्नेवाकाशे | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | १२ | ६६ |
| स त्वमग्निꣳस्वर्ग्यम् | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १३ | ८४ |
| स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ३ | १०० |
| सर्वे वेदा यत्पदम् | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १५ | १११ |
| स होवाच पितरम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ४ | ७८ |
| स ईक्षांचक्रे | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ३ | २२२ |
| स एष वैश्वानरः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ७ | १७७ |
| स प्राणमसृजत | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ४ | २२२ |
| स यथेमा नद्यः | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ५ | २२३ |
| स यदा तेजसा | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ६ | २०८ |
| स यथा सोम्य | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ७ | २०९ |
| स यद्येकमात्रम् | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ३ | २१५ |
| सत्यमेव जयति | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ६ | २६९ |
| सत्येन लभ्यस्तपसा | ,, | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ५ | २६८ |
| सप्त प्राणाः प्रभवन्ति | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ८ | २५४ |
| समाने वृक्षे पुरुषः | ,, | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | २ | २६६ |
| स यो ह वै तत्परमम् | ,, | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ९ | २७९ |
| स वेदैतत् परमम् | ,, | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | १ | २७३ |
| सम्प्राप्यैनमृषयः | ,, | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ५ | २७७ |
| सर्वꣳह्येतत् | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | २ | २८४ |
( ५४१ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स इमाँल्लोकानसृजत | ऐत० | १ | ... | ... | १ | ... | ... | २ | ३०० |
| स ईक्षत कथं न्विदम् | ” | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ११ | ३१४ |
| स ईक्षतेमे नु लोकाः | ” | १ | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ३०१ |
| स ईक्षतेमे नु लोकाश्च | ” | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | १ | ३०९ |
| स एतमेव सीमानम् | ” | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | १२ | ३१५ |
| स एतेन प्रज्ञेनात्मना | ” | ३ | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ३२८ |
| स एवं विद्वानस्मात् | ” | २ | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | ३२३ |
| स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् | ” | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | १३ | ३१६ |
| स य एषोऽन्तर्हृदये | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | १ | ३५१ |
| सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म | ” | ... | ... | २ | ... | ... | १ | २ | ३७२ |
| स यश्चायं पुरुषे | ” | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | १३ | ४०१ |
| ” ” | ” | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ४ | ४२७ |
| सह नौ यशः | ” | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | १ | ३३५ |
| स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थः | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १७ | ५१६ |
| स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिः | ” | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १६ | ५१५ |
| स वृक्षकालाकृतिभिः | ” | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ५०७ |
| सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च | ” | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४९३ |
| स एव काले भुवनस्य | ” | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ४८४ |
| सर्वेन्द्रियगुणाभासम् | ” | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १७ | ४७० |
| सर्वतः पाणिपादं तत् | ” | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १६ | ४६९ |
| सहस्रशीर्षा पुरुषः | ” | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ४६८ |
| समे शुचौ शर्करावह्नि० | ” | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ४५३ |
| सवित्रा प्रसवेन जुषेत | ” | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ४५१ |
| सर्वाननशिरोग्रीवः | ” | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | ४६६ |
| समाने वृक्षे पुरुषः | ” | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ४७८ |
(५४२)
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सर्वव्यापिनमात्मानम् | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | १६ | ४४६ |
| सर्वाजीवे सर्वसंस्थे | ,, | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४३८ |
| सा ब्रह्मेति होवाच | केन० | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | १ | ६७ |
| सा भावयित्री | ऐत० | २ | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ३१९ |
| सुषुप्तस्थानः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | २९५ |
| सूर्यो यथा सर्वलोकस्य | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ११ | १५३ |
| सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ४८३ |
| सैषाऽऽनन्दस्य मीमाꣳसा | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | २ | ३९४ |
| सोऽभिमानादूर्ध्वम् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ४ | १८८ |
| सोऽयमात्मा | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | २९२ |
| सोऽपोऽभ्यतपत् | ऐत० | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | २ | ३०९ |
| सोऽस्यायमात्मा | ,, | २ | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ३२१ |
| सोऽकामयत् | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | ४ | ३८८ |
| संकल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैः | श्वे० | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | ४९९ |
| संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च | ,, | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | ४४० |
| संवत्सरो वै प्रजापतिः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ९ | १७९ |
| स्थूलानि सूक्ष्माणि | श्वे० | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ५०० |
| स्वप्नान्तं जागरितान्तम् | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ४ | १३८ |
| स्वर्गे लोके न भयम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १२ | ८४ |
| स्वप्नस्थानस्तैजसः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १० | २९३ |
| स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | २८६ |
| स्वदेहमरणिं कृत्वा | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ४४५ |
| स्वभावमेके कवयो वदन्ति | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १ | ५०३ |
| हꣳसः शुचिषद्वसुः | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | २ | १४७ |
| हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ६ | १४९ |
( ५४३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हन्ता चेन्मन्यते | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | १९ | ११४ | |
| हरिःॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | १ | ४३१ | |
| हारवु हारवु हारवु | तैत्ति० | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ४२८ | |
| हिरण्मयेन पात्रेण | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ४९ | |
| हिरण्मये परे कोशे | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ९ | २६२ | |
| हृदि ह्येष आत्मा | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ६ १९७ | |
| क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | १० | ४४२ | |
| क्षेम इति वाचि | तैत्ति० | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ४२३ | |
| त्रिणाचिकेतस्त्रयम् | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | १८ | ८८ | |
| त्रिणाचिकेतस्त्रिभिः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | १७ | ८७ | |
| त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम् | श्वे० | २ | ... | ... | ... | ... | ८ | ४५१ | |
| ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः | ,, | १ | ... | ... | ... | ... | ११ | ४४३ | |
| ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशौ | ,, | १ | ... | ... | ... | ... | ९ | ४४९ |
॥ श्रीहरिः ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित
सर्वोपयोगी प्रकाशन
1673 सत्य एवं प्रेरक घटनाएँ 1657 भलेका फल भला 57 मानसिक दक्षता 59 जीवनमें नया प्रकाश 60 आशाकी नयी किरणें 119 अमृतके घूँट 132 स्वर्णपथ 55 महकते जीवनफूल 1461 हम कैसे रहें ? 191 भगवान् कृष्ण 193 भगवान् राम 120 आनन्दमय जीवन 130 तत्त्वविचार 133 विवेक-चूडामणि 131 सुखी जीवन 122 एक लोटा पानी 888 परलोक और पुनर्जन्मकी सत्य घटनाएँ 134 सती द्रौपदी 1624 पौराणिक कथाएँ 1782 प्रेरणाप्रद-कथाएँ 1669 पौराणिक कहानियाँ
137 उपयोगी कहानियाँ 159 आदर्श उपकार— (पढ़ो, समझो और करो) 160 कलेजेके अक्षर ,, 161 हृदयकी आदर्श विशालता (पढ़ो, समझो और करो) 162 उपकारका बदला ,, 163 आदर्श मानव-हृदय ,, 164 भगवान्के सामने सच्चा सो सच्चा ,, 165 मानवताका पुजारी ,, 166 परोपकार और सच्चाईका फल ,, 510 असीम नीचता और असीम साधुता 157 सती सुकला 147 चोखी कहानियाँ 129 एक महात्माका प्रसाद 1688 तीस रोचक कथाएँ 151 सत्संगमाला एवं ज्ञानमणिमाला 1363 शरणागति रहस्य
ફ્રેશાદિ નો ઉપનિષદ
Code 66
॥ श्रीहरिः ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित उपनिषद्
| ईशादि नौ उपनिषद् | अन्वय, हिंदी व्याख्यासहित |
| बृहदारण्यकोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| छान्दोग्योपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| ईशावास्योपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| केनोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| कठोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| माण्डूक्योपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| मुण्डकोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| प्रश्नोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| तैत्तिरीयोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| ऐतरेयोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| श्वेताश्वतरोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| ईशादि नौ उपनिषद् (शांकरभाष्य) | नौ उपनिषदोंके मन्त्र, मन्त्रानुवाद, शांकरभाष्य एवं हिन्दी-भाष्यार्थ |