जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
५४६ सटीकजातकपारिजाते- श. रा.—सर्वाङ्गरोगसन्तापं चोरारिनृपपीडनम् । धनच्छेदम्वाप्नोति राहौ मन्ददशान्तरे ॥ १२६ ॥ श. वृ.—देवभूदेवभक्तिं च राजप्रीतिं महत्सुखम् । स्थानलाभमवाप्नोति गुरौ मन्ददशान्तरे ॥ १३० ॥ विशेषः—स्वोच्चे नीचनवांशगो रविसुतः कुर्यात् सौख्यं फलं पाकादौ तु दशावसानसमये कष्टं फलं प्राणिनाम् । तुङ्गांशोपगते स्वनीचभवने पाकावसाने सुखं दायादौ रिपुचोरभीतिमधिकं दुःखं विदेशाटनम् ॥ १३१ ॥ अधुना शनिदशायां सर्वेषामन्तर्दशाफलान्याह । तत्र ग्रहाणां स्थितिवैशिष्ट्ये तेषां फलेष्वपि वैशिष्ट्यं तर्केण वाच्यमिति । अथ च शनिर्यद्युच्चराशौ (तुलायां) नीच- (मेष) राशिनवांशगतः स्यात्तदा दशादौ सौख्यं फलं, तथा दशावसाने कष्टं फलं कुर्यात् । तथा च नीच-(मेष) राशौ स्वकीयोच्च-(तुला) राशेर्नवांशगतः शनिः दशावसाने सुखं, दशा- रम्ये च रिपु-चोरभीतिमधिकं दुःखं कुरुते ॥ १२१-१३१ ॥ अथ शनिदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् ।
| श. श. | श. बु. | श. के. | श. शु. | श. सू. | श. चं. | श. मं. | श. रा. | श. वृ. | योगः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | २ | १ | ३ | ० | १ | १ | २ | २ | १९ |
| ० | ८ | ९ | २ | ११ | ७ | ९ | १० | ६ | ० |
| ३ | ९ | ९ | ० | १२ | ० | ३ | ६ | १२ | ० |
शनिकी दशामें शनिकी अन्तर्दशा हो तो बहुत दुःख व्याधि निर्पीड़न, मात्सर्य, मानसे बहुत शोक, ताप, राजा और चोरसे धनधान्यका नाश होता है ॥ १२१ ॥ शनिकी दशामें अपनी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर विरोध, राजाका कोप, दूतत्व, वृद्धा स्त्रीकी प्राप्ति, पशुगणका तथा विषका भय, पुत्र स्त्री आदिकी पीडा, ज्वर, वात कफका दुःख, शूलरोग होना कहते हैं ॥ १२२ ॥ शनिकी दशामें बुधकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर सुख-धन-यशकी वृद्धि, सत्कर्मकी बुद्धि, सम्पदा, कृषि वाणिज्यसे लाभ होता है ॥ १२३ ॥ शनिकी दशामें केतुकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर वातपित्त कृत रोग, नीच और दुर्जनसे कलह, दुःस्वप्न तथा भय प्राप्त होता है ॥ १२४ ॥ शनिकी दशामें शुक्रकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर बन्धु प्रीति, जनप्रीति, स्त्री-धन-प्राप्ति कृषि आदिका सुख प्राप्त होता है ॥ १२५ ॥ शनिकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर पुत्र स्त्रीका विनाश, नृप चोर आदिसे पीडा, अनलसे भय प्राप्त होता है ॥ १२६ ॥ शनिकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर गुरु तथा स्त्रीकी मृत्यु, दुःख, बन्धु- वैर, धनप्राप्ति और वातरोग होता है ॥ १२७ ॥ शनिकी दशामें मङ्गलकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर स्थानच्युति, महारोग, नानाविधका मानसिक भय, सहोदर भाईकी और मित्रकी पीडा हो ॥ १२८ ॥ शनिकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा प्राप्त होनेपर सर्वाङ्गरोग, सन्ताप, चोर, शत्रु और राजासे पीडा और धनका क्षय होता है ॥ १२९ ॥ शनिकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो देव-ब्राह्मणमें भक्ति, राजप्रीति, महत्सुख और स्थानका लाभ होता है ॥ १३० ॥
दशाफलाध्यायः ॥ १८ ॥ ५४७ शनि स्वोच्चमें नीच नवांशमें स्थित हो तो दशाकी आदिमें सुखफलको करता है। दशाके अन्त्य समयमें प्राणियोंको कष्ट फल देता है। नीच राशिमें उच्चांशमें हो तो दशाके अन्त्यमें सुख, दशाकी आदिमें शत्रु चोरका अधिक भय, दुःख और परदेशकी यात्रा हो॥ १३१॥ अथ बुधदशाफलम् । स्वकीयदाये गुरुबन्धुमित्रैरर्थार्जनं कीर्तिसुखं करोति । दौत्यं च सत्कर्महिरण्यपुण्यैर्धनायतिं वातरुजं कुमारः ॥ १३२ ॥ इदानीं बुधदशाफलमाह । सामान्येन कुमारस्य (बुधस्य) शुभफलमेवोक्तं, परञ्च यदि बुधो दुःस्थानादिगतो भवेत्तदा तद्दशायामशुभफलमपि भवति । अत्र विशेषः (१४२-१४३ श्लो.) द्रष्टव्यः ॥ १३२ ॥ बुध अपनी दशामें गुरु बन्धु मित्रसे धनप्राप्ति, कीर्ति, सुख करता है। दूत, सत्कर्म, सोनाके रोजगारसे धनलाभ और वातरोग करता है ॥ १३२ ॥ अथ बुधदशायामन्तर्दशाफलानि । बु. बु.—विचित्रगृहवित्ताप्तिं राजप्रीतिं महत्सुखम् । सर्वकार्यार्थसंसिद्धिं बुधे सौम्यदशान्तरे ॥ १३३ ॥ बु. के.—बन्धुपीडां मनस्तापं सौख्यहानिमरेर्भयम् । कार्यनाशमवाप्नोति केतौ सौम्यदशान्तरे ॥ १३४ ॥ बु. शु.—गुरुदेवाग्निविप्रेषु दानं धर्मप्रियं तपः । धनवस्त्राविभूषाप्तिं शुक्रे सौम्यदशान्तरे ॥ १३५ ॥ बु. सू.—वस्त्रभूषणवित्ताप्तिं राजप्रीतिं महत्सुखम् । धर्मश्रवणमाप्नोति रवौ बुधदशान्तरे ॥ १३६ ॥ बु. चं.—रोगारातिजनद्वेषं सर्वकार्यार्थनाशनम् । चतुष्पाद्भयमाप्नोति चन्द्रे सौम्यदशान्तरे ॥ १३७ ॥ बु. मं.—रोगादिभयनाशं च पुण्यकर्मफलं यशः । राजप्रीतिमवाप्नोति कुजे सौम्यदशान्तरे ॥ १३८ ॥ बु. रा.—मित्रबन्धुधनप्राप्तिं सुखविद्याविभूषणम् । राजप्रीतिमवाप्नोति राहौ सौम्यदशान्तरे ॥ १३६ ॥ बु. वृ.—इष्टबन्धुगुरुद्वेषं धनलाभं सुतार्तिम् । रोगादिभयमाप्नोति गुरौ सौम्यदशान्तरे ॥ १४० ॥ बु. श.—धर्मसत्कर्मवित्ताप्तिं सुखमल्पजनाधिपैः कृष्यादिनाशमाप्नोति शनौ सौम्यदशान्तरे ॥ १४१ ॥ विशेषः—उच्चराशिगतः सौम्यो नीचांशकसमन्वितः । करोति कर्मवैकल्यं निजदाये च वर्धनम् ॥ १४२ ॥ नीचस्थानगतश्चान्द्रिस्तुङ्गांशकसमन्वितः । पाकादौ विफलं सर्वं शुभमन्ते प्रयच्छति ॥ १४३ ॥ अधुना बुधदशायां सर्वेषामन्तर्दशाफलान्याह । तत्र श्लोकाः सरलार्था इति न व्याख्याताः ॥ १३३-१४३ ॥ बुधकी दशामें बुधकी अन्तर्दशा हो तो विचित्र गृह-वित्तकी प्राप्ति, राजाकी प्रसन्नता, भारी सुख, सब कार्य-अर्थकी सिद्धि होती है ॥ १३३ ॥ बुधकी दशामें केतुकी अन्तर्दशा हो तो बन्धुपीडा, मनमें ताप, सौख्यहानि, शत्रु भय और कार्यका नाश होता है १३४ ॥
५४८ सटीकजातकापारिजाते- बुधकी दशामें शुक्रकी अन्तर्दशा हो तो गुरु देवता अग्नि ब्राह्मणमें दान, धर्मप्रिय, तप, धन, वस्त्र, विभूषणकी प्राप्ति होती है ॥ १३५ ॥ बुधकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा हो तो वस्त्र, भूषण, धनकी प्राप्ति, राजप्रीति, महत् सुख और धर्मकथा प्राप्ति होती है ॥ १३६ ॥ बुधकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा हो तो रोग, शत्रुजनसे वैर, सर्व-काम-धनका नाश, चतुष्पदसे भय प्राप्त होता है ॥ १३७ ॥ बुधकी दशामें मंगलकी अन्तर्दशा हो तो रोग-शत्रु-भयका नाश, पुण्य, कर्मफल, यश, और राजप्रीति प्राप्त होती है ॥ १३८ ॥ बुधकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो मित्र-बन्धु-धनकी प्राप्ति, सुख, विद्या, विभूषण और राजप्रीति होती है ॥ १३९ ॥ बुधकी दशामें बृहस्पतिकी अन्तर्दशा हो तो इष्ट-बन्धु-गुरुसे द्वेष, धनलाभ, पुत्र प्राप्ति और रोगादिका भय होता है ॥ १४० ॥ बुधकी दशामें शनिकी अन्तर्दशा हो तो धर्म-सत्कर्म-वित्तकी प्राप्ति, थोड़े जनाधी- शोंसे सुख, कृषी आदिका नाश होता है ॥ १४१ ॥ यदि बुध उच्चराशिका नीचांशकमें हो तो अपनी दशामें कर्ममें विकलता करता है ॥१४२॥ नीच स्थानमें बुध उच्चांशकमें हो तो दशाके आदिमें सब निष्फल हो । और अन्त्यमें शुभ देता है ॥ १४३ ॥ अथ बुधदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् ।
| बु. बु. | बु. के. | बु. शु. | बु. सू. | बु. चं. | बु. मं. | बु. रा. | बु. बृ. | बु. श. | योगः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | ० | २ | ० | १ | ० | २ | २ | २ | १७ |
| ४ | ११ | १० | १० | ५ | ११ | ६ | ३ | ८ | ० |
| २७ | २७ | ० | ६ | ० | २७ | १८ | ६ | ९ | ० |
| अथ केतुदशाफलम् । | |||||||||
| दीनो नरो भवति बुद्धिविवेकनष्टो (१) नानाऽऽमयाकुलविवर्द्धितदेहतापः । | |||||||||
| पापादिदृष्टिरतिकष्टचरित्रयुक्तः किञ्चित्सुखी च शिखिनः परिपाककाले ॥ १४४ ॥ | |||||||||
| श्लोकेनानेन केतुदशाफलमाह । तत्र सामान्यतः केतुदशाफलमशुभमेवोक्तम् । अथ | |||||||||
| यदि केतुः शुभग्रहयुतः शुभदृष्टश्च भवेत्तदा तद्दशा शुभफलदाऽपि भवति । एवं पापयुतः | |||||||||
| पापद्दष्टश्च केतुरशुभमेव फलं करोति । अस्य केतोर्दशाफलं त्रिधा, 'दशादौ गुरुबन्ध्वार्त्ति, | |||||||||
| दशामध्ये धनायतिम्, दशान्ते सुखमिति वाच्यम् । तत्र विशेषः (श्लो. १४४-१५६) द्रष्टव्यः ॥ | |||||||||
| केतुकी दशामें मनुष्य दीन होता है । बुद्धि विवेकसे हीन होता है । नाना प्रकारके रोगसे | |||||||||
| व्याकुल हो देहमें ताप बढ़ता है । पापादिको वृद्धि, अति कष्ट चरित्रसे युक्त और दशाके | |||||||||
| परिपाक कालमें थोड़ा सुखी होता है ॥ १४४ ॥ | |||||||||
| अथ केतुदशायामन्तर्दशाफलानि । | |||||||||
| के. के. - कलत्रपुत्रमरणं सुखवित्तविनाशनम् । | |||||||||
| रिपुभीतिमवाप्नोति केतौ केतुदशान्तरे ॥ १४५ ॥ | |||||||||
| के. शु. - स्त्रीपुत्ररोगकलहं बन्धुमित्रादिनाशनम् । | |||||||||
| ज्वरातिसारमाप्नोति शुक्रे केतुदशान्तरे ॥ १४६ ॥ | |||||||||
| के. सू. - मनोभङ्गं शरीरातिं विदेशगमनं भयम् । | |||||||||
| सर्वकार्यविरोधं च रवौ केतुदशान्तरे ॥ १४७ ॥ | |||||||||
| (१) 'नष्टविवेकबुद्धिः' इति साधुपाठः । |
दशाफलाध्यायः ॥१८॥ ५४५ के. चं.—दारपुत्रजनालस्यं धानधान्यविनाशनम् । मनस्तापमवाप्नोति चन्द्रे केतुदशान्तरे ॥ १४८ ॥ के. मं.—पुत्रदारानुजद्वेषं रोगारिनृपपीडनम् । बन्धुनाशमवाप्नोति कुजे केतुदशान्तरे ॥ १४६.॥ के. रा.—राजचोरभयं दुःखं सर्वकार्यविनाशनम् । दुष्टमानवसंवादं राहौ केतुदशान्तरे ॥ १५० ॥ के. बृ.—देवद्विजगुरुप्रीतिं राजस्नेहं निरामयम् । भूपुत्रलाभमाप्नोति गुरौ केतुदशान्तरे ॥ १५१ ॥ के. श.—मनोभयं मनस्तापं स्वबन्धुजनविग्रहम् । देशत्यागमवाप्नोति शनौ केतुदशान्तरे ॥ १५२ ॥ के. बु.—बन्धुमित्रादिसंयोगं पुत्रदारधनागमम् । विद्यासुखमवाप्नोति बुधे केतुदशान्तरे ॥ १५३ ॥ विशेषः—शुभग्रहयुतः केतुः स्वदशायां सुखप्रदः । यदि शोभनसन्दृष्टः करोति विपुलं धनम् ॥ १५४ ॥ सपापः कुरुते केतुः श्वपाकै दुष्टमानवैः । भीतिं कृत्रिमरोगाद्यैर्व्यसनं धननाशनम् ॥ १५५ ॥ दशादौ गुरुबन्ध्वार्ति दशामध्ये धनायतिम् । दशान्ते सुखमाप्नोति केतोर्दायफलं त्रिधा ॥ १५६ ॥ अधुना केतुदशायां सर्वेषामन्तर्दशाफलान्याह । तत्र ग्रहाणां स्थितिविशेषे फलेष्वपि तारतम्येन वैशिष्ट्यं विचिन्त्यमिति । श्लोकाः स्पष्टार्थका एवेति ॥ १४५–१५६ ॥ केतुकी दशामें केतुकी अन्तर्दशा हो तो स्त्री-पुत्रका मरण, सुख-वित्तका नाश हो और शत्रु का भय होता है ॥ १४५ ॥ केतुकी दशामें शुक्रकी अन्तर्दशा हो तो स्त्री और पुत्रको रोग, कलह, बन्धु तथा मित्र- का नाश, ज्वर और अतिसार होता है ॥ १४६ ॥ केतुकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा हो तो मनमें भंग, शरीरमें दुःख, विदेश यात्रा, भय और सब कार्यों में विरोध होता है ॥ १४७ ॥ केतुकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा हो तो स्त्री-पुत्र-जनोंसे आलसी हो, धन-धान्य का विनाश हो और मनमें ताप होता है ॥ १४८ ॥ केतुकी दशामें मंगलकी अन्तर्दशा हो तो पुत्र-स्त्री आदिसे वैर, रोग-शत्रु-राजासे पीड़ा और कुटुम्बोंका संहार करता है ॥ १४९ ॥ केतुकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो राजा और चोरका भय, दुःख, सर्व कार्यका विनाश होता है तथा दुष्ट मनुष्योंसे संवाद होता है ॥ १५० ॥ केतुकी दशामें गुरुकी अन्तर्दशा हो तो ब्राह्मण-गुरु-देवतामें प्रीति हो, राजा के स्नेह की प्राप्ति, रोगसे रहित और भूमि-पुत्रका लाभ होता है ॥ १५१ ॥ केतुकी दशामें शनिकी अन्तर्दशा हो तो भय, मनमें ताप, अपने परिवारसे वैर और देशका त्याग होता है ॥ १५२ ॥ केतुकी दशामें बुधकी अन्तर्दशा हो तो बन्धु-मित्रादिका संयोग, पुत्र-स्त्री-धनका आगमन और विद्या सम्बन्धि सुख होता है ॥ १५३ ॥ केतु शुभ ग्रहसे युक्त हो तो अपनी दशामें सुख देता है। यदि शुभ ग्रह देखते भी हों तो बहुत धन होता है ॥ १५४ ॥
५५० सटीकजातकपारिजाते- केतु पापग्रहसे युक्त हो तो अपनी दशामें दुष्ट मनुष्यों द्वारा भय, कृत्रिम रोगादि तथा व्यसन और धर्मनाश होता है ॥ १५५ ॥ केतु अपनी दशाके आदिमें गुरु बन्धुको कष्ट देता है, दशाके मध्यमें धन व्यय। दशाके अन्त्यमें सुख देता है। इस प्रकार केतुकी दशाका तीन प्रकार फल है ॥ १५६ ॥ अथ केतुदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् ।
| के. के. | के. शु. | के. सू. | के. चं. | के. मं. | के. रा. | के. बृ. | के. श. | के. बु. | योगः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | १ | ० | ० | ० | १ | ० | १ | ० | ७ |
| ४ | २ | ४ | ७ | ४ | ० | ११ | १ | ११ | ० |
| २७ | ० | ६ | ० | २७ | १८ | ६ | ९ | २७ | ० |
| अथ शुक्रदशाफलम् । | |||||||||
| स्त्रीपुत्रवित्ताप्तिमतीव सौख्यं सुगन्धमाल्याम्बरभूषणाप्तिम् । | |||||||||
| यानादिभाग्यं नरपालतुल्यं यशः स्वपाके भृगुजः करोति ॥१५७॥ | |||||||||
| इदानीं शुक्रदशाफलमाह । सामान्यतः शुक्रदशायां शुभमेव फलमुक्तम् । विशेषार्थं | |||||||||
| ( १५७-१७१ ) श्लोका विचिन्त्याः ॥ १५७ ॥ | |||||||||
| शुक्र अपनी दशामें स्त्री-पुत्र प्राप्ति, अत्यन्त सौख्य, सुगन्ध-माल्य-भूषणकी प्राप्ति | |||||||||
| सवारी आदिका भाग्य, राजाके सदृश और यश वृद्धि करता है ॥ १५७ ॥ | |||||||||
| अथ शुक्रदशायामन्तर्दशाफलानि । | |||||||||
| शु. शु. — शय्यास्त्रीधनवस्त्राप्तिं धर्मादिसुखसम्पदः । | |||||||||
| रिपुनाशं यशोलाभं शुक्रे शुक्रदशान्तरे ॥ १५८ ॥ | |||||||||
| शु. सू. — मूर्धोदराक्षिरोगं च कृषिगोवित्तनाशनम् । | |||||||||
| नृपक्रोधमवाप्नोति रवौ शुक्रदशान्तरे ॥ १५९ ॥ | |||||||||
| शु. चं. — शीतोष्णरोगसन्तापं कामादिरिपुपीडनम् । | |||||||||
| किञ्चित् सुखमवाप्नोति चन्द्रे शुक्रदशान्तरे ॥ १६० ॥ | |||||||||
| शु. मं. — पित्तास्रगक्षिरोगं च चित्तोत्साहं धनागमम् । | |||||||||
| दारमूलाभमाप्नोति कुजे शुक्रदशान्तरे ॥ १६१ ॥ | |||||||||
| शु. रा. — नीलवस्तुधनप्राप्तिं बन्धुद्वेषं सुहृद्भयम् । | |||||||||
| अग्निबाधामवाप्नोति राहौ शुक्रदशान्तरे ॥ १६२ ॥ | |||||||||
| शु. बृ. — धनवस्त्रविभूषाप्तिं धर्माचारं सुखावहम् । | |||||||||
| स्त्रीसुतार्तिं च वैषम्यं गुरौ शुक्रदशान्तरे ॥ १६३ ॥ | |||||||||
| शु. श. — वृद्धस्त्रीजनसम्भोगं गृहक्षेत्रधनागमम् । | |||||||||
| शत्रुनाशमवाप्नोति मन्दे शुक्रदशान्तरे ॥ १६४ ॥ | |||||||||
| शु. बु. — सुतमित्रसुखार्थाप्तिं नृपप्रीतिं महत्सुखम् । | |||||||||
| शुभमारोग्यमाप्नोति बुधे शुक्रदशान्तरे ॥ १६५ ॥ | |||||||||
| शु. के. — कलहं बन्धुनाशं च शत्रुपीडां मनोभयम् । | |||||||||
| धनच्छेदमवाप्नोति केतौ शुक्रदशान्तरे ॥ १६६ ॥ | |||||||||
| विशेषः — उच्चराशि गतः शुक्रो नीचांशकसमन्वितः । | |||||||||
| स्वपाके धननाशं च कुर्वीत पदविच्युतिम् ॥ १६७ ॥ |
दशाफलाध्यायः ॥१८॥ ५५१ भार्गवो नीचराशिस्थः स्वोच्चांशकसमन्वितः । स्वदाये कृषिवाणिज्यं धनलाभं प्रयच्छति ॥ १६८ ॥ अधुना शुक्रदशायां सर्वेषामन्तर्दशाफलान्याह । तत्र ग्रहाणां स्थितिवलादपि फले न्यूनाधिक्यं विचार्यमिति । श्लोकास्तु सरलार्थ एव ॥ १५८-१६८ ॥ शुक्रकी दशामें शुक्रकी अन्तर्दशा हो तो शय्या-स्त्री-धन-वस्त्रकी प्राप्ति, धन आदि सुख सम्पदा, शत्रुनाश, यश लाभ होता है ॥ १५८ ॥ शुक्रकी दशामें सूर्यकी अन्तर्दशा हो तो शिर, उदर और नेत्र रोग, कृषि-गो-धनका नाश और राजाका कोप होता है ॥१५९ ॥ शुक्रकी दशामें चन्द्रमाकी अन्तर्दशा हो तो शिरमें गर्मी, सन्ताप, कामचेष्टा शत्रुसे पीड़ा और थोड़ा सुख होता है ॥ १६० ॥ शुक्रकी दशामें मंगलकी अन्तर्दशा हो पित्त-रक्त विकारसे नेत्र रोग, चित्तमें उत्साह, धनका आगम, स्त्री भूमिका लाभ होता है ॥ १६१ ॥ शुक्रकी दशामें राहुकी अन्तर्दशा हो तो नील वस्तु तथा धनकी प्राप्ति, बन्धु वैर, मित्रसे भय और अग्निबाधा होती है ॥ १६२ ॥ शुक्रकी दशामें गुरुकी अन्तर्दशा हो तो धन-वस्त्र-विभूषणकी प्राप्ति, धर्मका आचरण, सुख प्राप्ति, स्त्री पुत्रको कष्ट और विषमता प्राप्त होती है ॥ १६३ ॥ शुक्रकी दशामें शनिकी अन्तर्दशा हो तो वृद्ध स्त्रीसे भोग, क्षेत्र, धन प्राप्त हो और शत्रु का नाश होता है ॥ १६४ ॥ शुक्रकी दशामें बुधकी अन्तर्दशा हो तो पुत्र-मित्र-सुख-धनकी प्राप्ति हो, विशेष सुख हो और शुभ आरोग्यता होती है ॥ १६५ ॥ शुक्रकी दशामें केतुकी अन्तर्दशा हो तो कलह, बन्धुनाश, शत्रु पीडा, मनमें भय और धनका संहार होता है ॥ १६६ ॥ शुक्र उच्च राशिमें नीच नवांशका हो तो अपनी दशामें धनका नाश और पदच्युति करता है ॥ १६७ ॥ नीचराशि में स्थित शुक्र उच्चांशकमें हो तो अपनी दशामें कृषि (खेती) व्यापार और धनका लाभ करता है ॥ १६८ ॥ अथ शुक्रदशायां सर्वेषामन्तर्दशाचक्रम् ।
| शु. शु. | शु. सू. | शु. चं. | शु. मं. | शु. रा. | शु. बृ. | शु. श. | शु. बु. | शु. के. | योगः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | १ | १ | १ | ३ | २ | ३ | २ | १ | २० |
| ४ | ० | ८ | २ | ० | ८ | २ | १० | २ | ० |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| दशाफले विशेषता- | |||||||||
| सम्यग्बलिनः स्वतुङ्गभागे सम्पूर्णा बलवर्जितस्य रिक्ता । | |||||||||
| नीचांशगतस्य शत्रुभागे ज्ञेयाऽनिष्टफला दशा प्रसूतौ ॥ १६६ ॥ | |||||||||
| तत्तद्भावार्थकामेशदशास्वन्तर्दशासु च । | |||||||||
| तत्तद्भावविनाशः स्यात् तद्युतेक्षितकारकैः ॥ १७० ॥ | |||||||||
| त्रिकोणधनलाभस्था बलिनो यदि शोभनाः । | |||||||||
| स्वदशान्तर्दशाकाले कुर्वन्ति विपुलं सुखम् ॥ १७१ ॥ |
५५२ सटीकजातकपारिजाते- उपसंहारः- अष्टादशाध्यायिनि सर्वहोरासमुद्धृते जातकपारिजाते । राशिखरूपारिदशाफलान्तं प्रोक्तं मया भानुमुखप्रसादात् ॥ १७२ ॥ इति श्रीनवग्रहकृपया वैद्यनाथविरचिते जातकपारिजातेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ इदानीं पूर्वोक्तानां दशान्तर्दशानां ग्रहस्थितिवशेन शुभाशुभत्वमाह । प्रसूतो=नराणां जन्मकाले सम्यग्बलिनः = पूर्वोक्तैर्बलैर्युक्तस्य ग्रहस्य, स्वकीयतुङ्गभागे (परमोच्चांशे) व्यवस्थितस्य च ग्रहस्य सम्पूर्णानाम्नी दशा भवति । तत्फलञ्च । धनारोग्यविवर्धिनी सा दशा भवति । तथा भगवान् गर्गः— सर्वैर्बलैरुपेतस्य परमोच्चगतस्य च । सम्पूर्णाख्या दशा ज्ञेया धनारोग्यविवर्धिनी ॥ यश्चोच्चराशिगत एव भवति न परमोच्चांशगतस्तथा यो ग्रहो न पूर्णबलैर्युतः किन्तु किञ्चिदूनबलयुतो
भानुः सूर्यो मुखं प्रधानो येषु ते भानुमुखाः सूर्यादयो नव ग्रहास्तेषां प्रसादात् = कृपाबलात्, मया = श्रीवैद्यनाथेन कर्त्रा, प्रोक्तं = कथितमिति ॥ १६९-१७२ ॥ पारिजाते सुधा टीका कपिलेश्वररचिता। दशाफलेऽस्मिन्नध्याये पूतिमष्टादशे गता ॥ १८ ॥ उच्चभागमें बली सम्पूर्ण फल देता है। बलरहित ग्रहकी दशा रिक्त (खाली) होती है। नीच अंश, शत्रु भागमें प्राप्त ग्रह जातकको अनिष्ट फल देता है ॥ १६९ ॥ उस उस भावसे धनेश और सप्तमेशकी दशा अन्तर्दशामें उससे युक्त दृष्ट कारकोंसे उस २ भावका नाश होता है। त्रिकोण धन और लाभ स्थानमें स्थित शुभग्रह यदि बली हों तो अपनी दशा अन्तर्दशाके समय विपुल सुखको करते हैं ॥ १७०-१७१ ॥ होरासे समुद्धृत जातकपारिजातमें अठारह अध्याय राशि-रूपादिसे दशाफलान्तको सूर्यादि ग्रहोंकी कृपासे निर्माण किया है ॥ १७२ ॥ इति मिरजापुर मण्डलान्तर्गत 'आही' ग्रामवासिसरयूपारीणवंशावतंसपाण्डेयो- पाह्णपण्डितश्रीमच्छत्रधरसूनुना-अखिलभारतीयवर्ण्यासस्कारसमिति-वैदिक कर्मकाण्डाचार्य-दैवज्ञभूषण-पण्डित-श्रीमातृप्रसादशास्त्रिणा विरचिता 'विमला'ख्या हिन्दीटीका-समाप्ता ।
अथ ग्रन्थोपसंहारः । शाखाभिरष्टादशसंख्यकाभिरध्यायरूपाभिरतिप्रकाशः । ज्योतिर्मयः सर्वफलप्रधानः सङ्कीर्तितो जातकपारिजातः ॥ १ ॥ उक्तं राशिगुणालयं ग्रहगतिस्थानस्वभावाकृति- राधानाडुिसमस्तजीवजननं बालाद्यनिष्टाकरम् । आयुर्जातकभङ्गयोगजविधिः श्रीराजयोगादिजो द्वित्र्यादिग्रहयोगजः शुभकरो मान्द्यब्दजं च क्रमात् ॥ २ ॥ पश्चादष्टकवर्गबिन्दुगणितं होराधनस्थानजं दुश्चिक्यावनिभावजं सुतरिपुस्थानप्रयुक्तं फलम् । कन्दर्पाष्टमधर्मराशिनितं व्यापारलाभान्त्यजं नारीजातक लक्षणं निगदितं चक्रं दशान्तर्दशा ॥ ३ ॥ श्रीविद्याधिकवेङ्कटाद्रितनयः श्रीवैद्यनाथः सुधी- रदित्यादिसमस्तखेटकृपया विद्वज्जनप्रीतये । होरासिन्धुसमुद्धृतामृतमयीमष्टादशाध्यायिनीं चक्रे जातकपारिजातसरणिं गीतोत्सुकश्लोकिनीम् ॥ ४ ॥ इति जातकपारिजातः समाप्तः । अधुना चतुर्भिः श्लोकैर्ग्रन्थो पसंहारमाह । अयं जातकपारिजातः = जातकेषु पारिजातः (सुरद्रुमः ) अध्यायरूपाभिरष्टादशशाखाभिर्युतोऽतिप्रकाशो दोषादिरहितः, ज्योतिर्मयः ज्योतींषि ग्रहनक्षत्राद्यस्तन्मयः ग्रहनक्षत्रविषयैरोतप्रोतः, सर्वफलप्रधानः मानवजीवने जन्मादि-निधनान्तं यावत्फलमस्ति तत्प्रकाशने मुख्यतमः अयं ग्रन्थरूपेण सङ्कीर्तितः । अस्मिन् जातकपारिजाते राशिगुणस्वरूपम् १, ग्रहनामस्वरूपगुणभेदकम् २, आधा- नादिजन्माध्यायः ३, बालायरिष्टाध्यायः ४, आयुर्र्दायाध्यायः ५, जातकभङ्गः ६, राजयो- ४६। जा० पा०
५५४ सटीकजातकपारिजात: । गाध्यायः ७, द्वयादिग्रहयोगाध्यायः ८, मान्द्यब्दादिफलम् ९, अष्टकवर्गः १०, लग्नधन- भावफलम् ११, तृतीयचतुर्थभावफलम् १२, पञ्चमषष्ठभावफलम् १३, सप्तमाष्टमनवम-भाव- फलम् १४, दशमैकादशद्वादशभावफलम् १५, स्त्रीजातकम् १६, कालचक्रदशा १७ दशा- न्तर्दशाफलम् १८, एते किलाष्टादशाध्यायाः सङ्कीर्तिताः । अयं श्रीवैद्यनाथः सुधीः प्रकृतग्रन्थकर्त्ता, सर्वार्थचिन्तामणिनाम्नो ग्रन्थस्य ज्योतिर्नि- बन्धस्य कर्तुः श्रीवेङ्कटाद्रिनाम्नो विविधविद्यापारङ्गतस्य विदुषस्तनूजन्मा सूर्यादिनवग्रहाणां प्रसादात् विद्वज्जनानां प्रीतये होराशास्त्ररूपसमुद्रमन्थननिस्सरितामृतकल्पमष्टादशाध्याय- युक्तं गीतोत्सुकश्लोकिनीम् ( यथार्थफलश्रवणात्कर्णेन्द्रियाह्लादिनीम् ) जातकपारिजातसरणिं चक्रे
( चौखम्बा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला १ ) अथर्ववेद-परिशिष्ट सम्पादक—जार्ज मेलवील बोलिंग तथा जुलियस फॉन नेजलीन हिन्दी-टिप्पणियों सहित सम्पादन डॉ० रामकुमार राय हर्ष का विषय है कि चौखम्बा ओरियन्टालिया ( वाराणसी ) द्वारा अथर्ववेद-परिशिष्ट का पुनः प्रकाशन हुआ है। इस प्रकाशन का महत्त्व इसलिए और अधिक हो गया है कि यह संस्करण नागरी लिपि में प्रथम बार प्रकाशित हुआ है। इससे पूर्व प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रकाशन १९०९ ई० में हुआ था। परन्तु वह संस्करण रोमन-लिपि में ही था। पहले अलग-अलग कार्य करते हुए उक्त दोनों विद्वानों ने आगे चलकर सम्मिलित प्रयास से इस कार्य को सम्पन्न किया। श्रीवेबर महोदय एवं श्री मॉरिस ब्लूमफील्ड ने इस ग्रन्थ पर कुछ कार्य किया था। उन्हीं दोनों विद्वानों ने अलग-अलग इस विशिष्ट ग्रन्थ के संपादन की संपादकों को प्रेरणा दी थी। १८९८ ई० के आस पास वेबर ने फॉन नेजलीन को तथा ब्लूमफील्ड ने बोलिंग को अथर्ववेद-परिशिष्ट के संपादन की दिशा में संप्रेरित किया। उन दोनों पण्डितों ने कार्यों के विवरण का इस ग्रन्थ के अपने प्राक्कथन में स्वयं उल्लेख किया है। उसे देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि कितने श्रम, मनोयोग और अध्य- वसाय के साथ उक्त संपादन-कार्य संपन्न हुआ था। उस समय तक अथर्ववेद-परिशिष्ट की जितनी सामग्री मिल सकी थी—उन सब के आधार पर श्रमसाध्य निष्ठा द्वारा दोनों विद्वानों ने परिशिष्ट का संपादन किया था। जिस जिस व्यक्ति या संस्था द्वारा सहायता मिल सकती थी, सबको प्राप्त करने की एवं उसके उचित उपयोग की दिशा में उन दो विद्वानों ने कुछ भी उठा नहीं रखा था। चौखम्बा ओरियन्टालिया एवं नागरी लिपि के रूपान्तरकार संपादक श्री रामकुमार राय धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने इस चिर प्रतीक्षित कार्य को संपन्न किया। प्रत्येक परिशिष्ट के आरम्भ में हिन्दी में सम्बद्ध परिशिष्ट का सार संक्षिप्त रूप से देने के कारण एवं अन्त में उद्धरण सूची और शब्दानुक्रमणिका के कारण ग्रन्थ का महत्त्व बढ़ गया है। इस ग्रन्थ में नित्य, नैमित्तिक तथा विभिन्न अवसरों, पर्वों, परिस्थितियों आदि से संबद्ध कर्मों का—आख्यानों, संवादों आदि द्वारा महत्त्वपूर्ण वैदिक-धार्मिक विधि-विधानों सहित वर्णन मिलता है। प्रस्तुत अपूर्ण से भासमान इस कोशात्मक परिशिष्ट-ग्रन्थ के बहत्तर ( ७२ ) परिशिष्टों में न जाने कितने शाखीय विधान, विचार और उपाय आदि वर्णित हैं। अतः दुष्प्राप्य, दुर्लभ, चिरप्रतीक्षित एवं महत्त्वपूर्ण इस 'अथर्ववेदपरिशिष्ट' के प्रस्तुत संस्करण का प्राच्यविद्या के अनुशीलनकर्त्ता पण्डितों में निश्चय ही समादर होगा। इस सत्प्रयास का हम स्वागत करते हैं। हमें विश्वास है कि दूसरा संस्करण शीघ्र ही प्रकाशित होगा और तब हिन्दी अनुवाद-सहित यह हमारे सामने आयेगा। इसी आशा के साथ प्रकाशक तथा 'हिन्दी नोट्स' के साथ वर्त्तमान ग्रन्थ प्रस्तुतकर्त्ता संपादक को बधाई देते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है। करुणापति त्रिपाठी भूतपूर्व वाइसचांसलर, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ७५-००
( चौखम्भा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला २ ) धाराधीश्वर भोजकृतः तत्त्वप्रकाशः तात्पर्यदीपिका-वृत्ति-व्याख्याद्वयः-हिन्दीभाषानुवादसहितः सम्पादक डॉ० कामेश्वरनाथ मिश्र, एम. ए., पी-एच. डी., साहित्याचार्य ( उ० प्र० संस्कृत अकादमी द्वारा पुरस्कृत ) भारतीय जीवन में शैवधर्म एवं दर्शन का विशेष महत्त्व रहा है। उत्तरभारत में काश्मीरीय शैवदर्शन तथा दक्षिण भारत में सिद्धान्त-शैवदर्शन विशेष रूप से प्रचलित रहे। 'तत्त्वप्रकाश' सिद्धान्त-दर्शन के प्रमेयों का स्पष्ट ज्ञान कराने वाला प्रमुख ग्रन्थ है। तत्त्वों का निरूपण इसलिये भी अधिक निभ्रान्त है क्योंकि धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति एवं साहित्य के अद्भुत उन्नायक महाराज भोज ने इसी सम्प्रदाय की दीक्षा ली थी और उन्होंने यहाँ साधना के अनुभवों को उतारा है। उनके विचारों का विशद विवेचन करने के लिये श्रीकुमारदेवरचित 'तात्पर्य- दीपिका' तथा अघोरशिवाचार्यरचित 'वृत्ति' दोनों को साथ में जोड़ दिया गया है। डॉ० मिश्र ने अथक परिश्रम करके जिज्ञासुओं के लाभार्थ कारिकाओं का हिन्दी-अनुवाद करके, विवेकपूर्वक पाठान्तरों का निर्धारण कर ग्रन्थ को प्रामाणिक एवं परिनिष्ठित रूप प्रदान किया है। ग्रन्थ के अन्त में सन्दर्भों का आकारनिर्देश, दोनों टीकाओं में उद्धृत ग्रन्थ एवं ग्रन्थकारों की सूची, पारि- भाषिक शब्दकोश एवं उपयोगी ग्रन्थों का उल्लेख परिशिष्ट के रूप में जोड़ा गया है। अन्त में दिये गये तत्त्वों की उत्पत्ति के रेखाचित्र से सारा विषय स्वतः स्पष्ट हो जाता है। विद्वान् सम्पादक ने भूमिका में शैवदर्शन के प्रकार, सिद्धान्तशैवदर्शन का अभिप्राय, सिद्धान्तसाहित्य, सिद्धान्तदर्शन, भोज, श्रीकुमार तथा अघोरशिवाचार्य के व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर शोधपूर्ण प्रकाश डाला है। भूमिकामात्र को पढ़ लेने से संस्कृत तथा दर्शन के अनुरागियों को 'सिद्धान्त' के साहित्य तथा प्रतिपाद्य विषयों के ज्ञान के लिये अन्य ग्रन्थ देखने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। हिन्दी में इस दर्शन से सम्बद्ध इतनी सामग्री अभी तक प्रकाश में नहीं आयी है। ग्रन्थ का अध्ययन करने से सिद्धान्तशैवदर्शन से सम्बद्ध समस्त विषयों का परिचय मिल जायेगा। हिन्दी माध्यम से सिद्धान्तदर्शन तथा भोज के कृतित्व और साधना पर प्रचुर प्रकाश डालने वाला और दक्षिण भारतीय धर्म तथा साधना को हिन्दीभाषा के द्वारा उत्तर भारत में फैला कर उत्तर और दक्षिण में समन्वय स्थापित करनेवाला यह प्रथम ग्रन्थ होगा। ३०--००
( चौखम्भा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला ४ ) महाराजाधिराजभोजकृतं सरस्वतीकण्ठाभरणम् ( चित्रप्रकरणसहितम् ) प्रथमो भागः रत्नदर्पणाख्यसंस्कृत-स्वरूपानन्दभाष्यनाम हिन्दी व्याख्याद्वयोपेतम् व्याख्याकार- डॉ० कामेश्वरनाथ मिश्र, एम. ए., पी-एच. डी., साहित्याचार्य महाराजाधिराज भोज की साहित्यसेवा जनकथा बन चुकी है। साहित्य, कला, धर्म, दर्शन आदि का संरक्षण ही नहीं, सम्पादन भी उन्होंने किया है। आयुर्वेद से लेकर आध्यात्मिक साधना तक का कोई भी क्षेत्र उनसे अछूता न रहा। अलंकारशास्त्र के क्षेत्र में उनके कीर्तिस्तम्भ 'सरस्वतीकण्ठाभरण' नामक ग्रन्थ को प्रकाशित करते हुए हमें हर्ष हो रहा है। इस ग्रन्थ के प्रथम परिच्छेद में काव्य-लक्षण, गुण तथा दोषों का सूक्ष्म विवेचन है। द्वितीय परिच्छेद में शब्दालङ्कार का निर्णय करते समय चित्रालङ्कार का विवेचन एवं वर्गीकरण जितना वैज्ञानिक, विशद्, पूर्ण एवं व्यवस्थित यहाँ है, वैसा किसी भी अलङ्कार- शास्त्र के ग्रन्थ में नहीं है। यही स्थिति तृतीय परिच्छेद में अर्थालङ्कार के निरूपण में भी है। उभयालङ्कार का भी पृथक् से इतना विस्तृत विवेचन भोज ने ही किया है। पूरा चतुर्थ परिच्छेद इसी के निरूपण पर दिया गया है। पञ्चम परिच्छेद में 'शृङ्गार' को रसराजता सिद्ध करते हुए महाराजाधिराज ने अन्य रसों तथा भावों की समीक्षा तो की ही है, आनुषङ्गिक रूप से सम्बद्ध नायक, नायिका आदि के विषय में भी प्रचुर सामग्री प्रदान की है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि महाराज भोज ने काव्य के प्रत्येक क्षेत्र को छुआ और सोने में सुगन्ध भर दी। साथ में 'रत्नदर्पण' नाम की संस्कृत टीका भी यावदुपलब्ध दी गई है। धन्यवाद है तरुण किन्तु प्रौढ़ समीक्षक डॉ० कामेश्वर नाथ मिश्र को जिन्होंने सरल, सुस्पष्ट एवं भाव- ग्राहिणी हिन्दी भाषा में ग्रन्थ की गूढ़तम ग्रन्थियों तथा रहस्यों को उद्घाटित किया है। डॉ० मिश्र की लेखनी में अद्भुतशक्ति है जिसने गूढ़तम विषय को स्पष्टतम कर दिया है। यथास्थान दिये गये रेखाचित्रों, ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक विवेचनों से ग्रन्थ निखर उठा है। भूमिका में विद्वान् भाष्यकार ने राजा भोज के जीवन, ग्रन्थकर्तृत्व, आध्यात्मिक अभिरुचि तथा उनको सम्मत काव्यलक्षण, चित्रालङ्कार, रस आदि पर शोधपूर्ण दृष्टि डाली है। अन्त में विविध परिशिष्टों से ग्रन्थ की उपयोगिता और भी बढ़ गयी है। विश्वास है कि छात्रों, अध्यापकों तथा काव्यशास्त्र के जिज्ञासुओं को प्रचुर सामग्री मिलेगी और वे लाभान्वित होंगे ! ३५-००
( चौखम्भा प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला ३ ) मन्त्र-योग-संहिता मूल सहित अंग्रेजी अनुवाद डॉ० राम कुमार राय प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी यह एक मात्र उच्च कोटि की मन्त्र योग की पुस्तक है जिसमें क्रमवार कदम- कदम पर मन्त्र योग का स्पष्टीकरण पाया जा सकता है। यह मन्त्र-योग के सभी सोलहों अङ्गों का विवेचन करता है । अर्थात् भक्ति, शुद्धि, आसन, पञ्चाङ्ग सेवन, आचार, धारणा, दिव्य-देश-सेवन, प्राण-क्रिया, मुद्रा, तर्पण, हवन, बलि, याग, जप, ध्यान और समाधि । इस संहिता में सभी तरीकों एवं व्यवहारों की इतनी पूर्ण व्याख्या हुई है कि यह संहिता एक हस्त पुस्तक के रूप में प्रयोग की जा सकती है जो मन्त्र-साधना का प्रायोगिक दिशा प्रदान कर सकती है । इसके अतिरिक्त यह विस्तार से बराबर मन्त्र फलित ज्योतिष ( नक्षत्र विद्या, दैवज्ञ विद्या ) की अवधारणा करता है । जिसकी सहायता से कोई एक उसकी सत्यता का निर्णय कर सकता है। मन्त्र साधना के लिए अपने लिए उचित मन्त्र का चुनाव कर सकता है। साधना के लिए समय और स्थान का चुनाव पहले से निश्चित करना कि किसको गुरु बनाया जाय और मन्त्र साधना में कैसे आगे बढ़ा जाय । हमारा उद्देश्य है उन सभी आवश्यक तत्त्वों का जो मन्त्र साधना के लिए आवश्यक है और जो समर्थ ( फलोत्पादक ) मन्त्र हैं उनकी विस्तृत जानकारी देना । आचरण की प्रकृति यहाँ तक बढ़ गयी है कि इस वर्गीकृत पुस्तक में हिन्दुओं का प्राचीन विज्ञान भी है और वह इतना वैज्ञानिक है कि यह उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों या शिक्षितों में एवं सभी बातों में सन्देह करने वालों को भी प्रभावित करती है और वे सभी मन्त्रों की सफलता एवं उसके प्रभाव ( गुण ) के विषय में समझने लगते हैं । इसीलिए हमने कार्य क्षेत्र के बाहर जो साधक सारे विश्व में फैले हुए हैं उनके लिए प्रथम बार अंग्रेजी अनुवाद के साथ इसे प्रस्तुत करने का प्रयास किया है तथा इसे उस विस्तृत क्षेत्र में साधकों में प्रवेश पाने के योग्य बनाया है । इसमें बहुत अधिक चार्ट, आकृति ( मानचित्र ) एवं तस्वीरें हैं जो साथ-साथ एक रास्ते का निर्माण करती हैं और जो अधिक ग्राह्य हैं अर्थात् समझ में आने योग्य हैं । ३५-००
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ज्योतिष-ग्रन्थाः जन्मपत्रदीपकः । पं० विन्ध्येश्वरी प्रसाद द्विवेदी कृत हिन्दी टीका नोट्स युक्त ५-०० सूर्यसिद्धान्तः । (भारतीय खगोलविद्या का ग्रंथ) पं० श्री कपिलेश्वर चौधरी कृत 'तत्त्वामृत' संस्कृत टीका, नोट्स आदि सहित ४५-०० मुहूर्तमार्तण्डः । नारायण दैवज्ञ कृत । पं० कपिलेश्वरशास्त्री कृत 'मार्तण्डप्रका- शिका' संस्कृत-हिन्दी टीका सहित १५-०० चापीयत्रिकोणगणितम् । श्री नीलाम्बर झा कृत । पं० श्री अच्युतानन्द झा कृत 'विविध वासना' विशद टीका युक्त ४-०० सिद्धान्तशिरोमणिः । भास्कराचार्य कृत । स्वकृत 'वासना भाष्य'सहित । पं० मुरलीधर ठाकुर कृत 'प्रभा- वासना' टीका, नोट्स, प्रमाण आदि युक्त । प्रथम भाग १०-०० नरपतिजयचर्यास्वरोदयः । श्री नरपति कविकृत । पं० गणेशदत्त पाठक कृत 'सुबोधिनी' सं० हिन्दी टीका सहित ४५-०० गणितकौमुदी । पं० गणपति देव शास्त्री कृत । १-२ भाग । द्वितीय भाग २-५० जातकालंकारः । श्री गणेश दैवज्ञ कृत । श्री हरभानु शुक्ल कृत संस्कृत टीका सहित । श्री दीनानाथ झा कृत 'भावबोधिनी' हिन्दी टीका सहित ४-०० आचार्य भास्कर (भास्कराचार्य-एक अध्ययन) लेखक-पं० रामजन्म मिश्र ५-०० प्रश्नचण्डेश्वरः । दैवज्ञरामकृष्णविर- चितः । सान्वय, हिन्दी भाषा टीका एवं टिप्पणियों से शोभित, व्याख्या- पं० रामजन्म मिश्र ७-५० जातकपारिजातः । श्री वैद्यनाथ कृत । पं० कपिलेश्वर चौधरी कृत 'सुधा शालिनी' संस्कृत टीका तथा पं० मातृप्रसाद पाण्डेय कृत 'विमला' हिन्दी टीका सहित ७५-०० प्राप्तिस्थान :- चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी
( काशी संस्कृत ग्रन्थमाला ४६ ) श्रीमच्छतानन्द विरचिता भास्वती श्रीमातृप्रसाद ( दैवज्ञभूषण ) पाण्डेयेनकृता ‘छात्रबोधिनी' संस्कृतभाषाटीकासहिता आचार्यरामजन्ममिश्रेण संशोध्य टिप्पण्यादिभिरलंकृता श्रीमान् आचार्य शतानन्द द्वारा विरचित भास्वती करण ग्रन्थ है। इसका निर्माण ई० सन् १०९९ में हुआ था। आचार्य वाराह मिहिर के सूर्य-सिद्धान्त के आधार पर जो सम्प्रति पञ्चसिद्धान्तिका में उपलब्ध है, बनी है। पहले इस ग्रन्थ का बहुत अधिक प्रयोग था। उस समय इसकी अनेक संस्कृत टीकायें मिलती थीं किन्तु समय ने विशिष्ट गुणयुक्त अत्युपयोगी इस ग्रन्थ को भी लुप्तप्रायः कर दिया। इसमें ग्रहों का क्षेपक शक १०२१ की स्पष्ट मेष-संक्रान्ति काल (गुरुवार) का है। इसमें अहर्गण के आधारपर ग्रहों को स्पष्ट करने की विधि नहीं है वरन् ग्रहों की वार्षिक गति के अनुसार है जिससे गणना करने में बड़ी सुविधा है। आचार्य ने शतांश प्रणाली से गणित का काम किया है अर्थात् राशि अंश कला विकला लिखने के स्थान पर राशि के सौवें भाग में या नक्षत्र के सौवें भाग में ग्रहस्थिति बतायी है। जैसे चन्द्रमा की एक वर्ष की गति ९७० ५/६ नक्षत्र शतांशों में बतायी गई है जिसका अर्थ है— ९७० ५/६ / १०० नक्षत्र = (९७० ५/६ / १००) x ८०० कला = ७७६६ २/३ कला = ४ राशि १२ अंश ४६ कला ४० विकला इसी प्रकार शनि का क्षेपक ५१४ शतांश राशि है जिसका अर्थ दशमलव भिन्न में ५.१४ राशि हुआ। इस प्रकार आधुनिकतम गणितोपयुक्त यह ग्रन्थ शीघ्र प्रकाश में आ रहा है। ( १९८४ ) ४०-०० प्राप्तिस्थान—चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी-२२१००१