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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

कबीरकृष्णगीता ।

११५

जव जिव डेह निरंजन राई । तवै जीव रोवे चिल्लाई ॥ जाकर जीव ताहि दुख न्यापे । कबोर कहाय प्रगट प्रभु आपे ॥ जीव जरत उबारैउ कबीरा । करे भक्त जब धरे शरीरा ॥ जीवहिं धोखे परे खुलाई । सार असार चीन्ह नहिं पाई ॥ देह धरे विसरे सब ज्ञाना । देहसे न्यारा भये सब जाना ॥ जगको वेद शास्त्र अरुझावे । कबीरके भक्त नहिं विप्र हटावे ॥ कुसहा ब्राह्मण अगुवा काला । कर्मवश्य जिवपरे बिहाला ॥ दे विश्वास जो पुण्य करावे । मृतक आस जो पूर्व फल पावे ॥ जियत कर्मफल नेक न दृष्टा । पूर्वल आस मरे सो मिष्टा ॥ सौदा सोई जो दीखे दृष्टा । फल औ फूल दृष्टि सुख चिष्टा ॥

दोहा--उपजन विनसनको मता, ब्राह्मण काजी भाष । स्थिर घर जो पहुँचे जो, सत्यकबीर व्रत राख ॥ षोडश रवि शशि भाल छवि, अग्र अमी रस चाख अस सुख सत्य पुर मई, शब्द भेद मत भाष ॥

रजगुण तमगुण जोत सतंगी । सतगुण विष्णु कबीर प्रसंगी ॥ सत्य कबीरके पारस सेती । सतोषुण राम कृष्ण विष्णु केती । फिर २ जीव भ्रमें चौरासी । निरगुणको निंदक त्रिगुण उपासी धन्य एक जासो भय तीनी । माय बाप गुरुते सब चीन्ही ॥

दोहा--माय बाप गुरु सद्गुरु, साध संत द्विज एक । पवन एक बाजा बहुत, कहैं कृष्ण सत देक ।

११६

कबीरकृष्णगीता ।

विनय विष्णु जो परम सुहाई । आज्ञा करहिं कबीर गोसाईं ॥ आज्ञा सब जिव दियोसुत्काई । ऐसी करब हमसों किम भाई ॥ तात मातते गुरु अधिकार्ई । सद्गुरु शरण बिना जिव खाई ॥ बिना कबीर न वांचे भाई । कबीर साहेब सद्गुरु साईं ॥ कोटि माहिं कोई जीवमुनीता । संत साध संग पाठ कृत गीता ॥ गीतामाहिं बहु संघ कबीरा । मिले ताहि जो मथे अर्थ क्षीरा ॥ मथे क्षीर ले याखन तावे । तब घृत वास सुवास बसावे ॥ तिम कबीर सतघृत कुल वासा । और पंथ विन आसतिक आसा ॥ दोहा-वेद मथके गीता कीन्हा, गीता मथके सार ।

सार सो सार कबीर बखानहि, भाषे कृष्ण सुरार ॥

जिमि सब तनमें चक्षु नाका । तस तनमें स्वासा जिव ताका ॥ सबे कबीर कहि २ गोहरावा । तत्क्षण सत्यकबीर चलि आवा ॥ सबे कबीर घ्राणमें होतहि पहुँचै । परे सवनमें दृष्टि कबीरके ॥ थरहर उठे सबे भहराई । चरण परवार सिंघासन बैठाई ॥ चरणोदक ले विनती कीन्हा । कहँ गयउ साहेब दरश विन दीन्हा ॥

कबीरवचन ।

कहँ कबीर गये जिवके खोजा । दयावंत मिले सुनीई इन सोझा ॥ दया सत् जहाँ वास हमारा । राम कबीर एक चटसारा ॥ का हिंदूका तुरक सब जाती । तारों नाम भक्त मिल पाती ॥ जात पात है त्रिगुण पसारा । विष्णु अवरण चौथे निसतारा ॥ चौथे कबीर तिनते श्रेष्ठा । सद्गुरु भक्त बिना जिव नष्टा ॥

व्यास और कृष्ण सम्वाद

कबीरकृष्णगीता ।

११७

दोहा- विष्णु देह धर खेले, अलख निरंजन कृष्ण । सब लहुरे हैं कबीरते, राम कृष्ण शिव विष्णु ॥ गुप्त प्रगट निरगुण वो सरगुण । व्यास उक्ति मति श्रेष्ठ सो निरगुण ॥

कहैं कबीर व्यासकी बाणी । गीता मता सार सब ठानी ॥ करहु प्रकाश भागवत गीता । सुने ज्ञान जिव मिटे मन चीता ॥ हम कबीर जिव दाया ददावे । जहां सत् ताके हिं अावे ॥ सत्यकबीर हमारो नाऊं । दया सत्यके निकट रहाऊं ॥ तुम पूछेहु कव गवनेहु स्वामी । मक्का पहुँचेउ सुन नभगाभी ॥ रायअमोलिक कहैंशिष्यकीन्हा । नाम पानदे सुक कर लीन्हा ॥ जम्बुदीप धर्मदास कंडहारा । ताके अगुवा जीवन कंडहारा ॥ जागु प्रगटके जगत जगैहैं । कबीर धर्मदासके भक्त दैहैं ॥ जागू कहायब सत्यकबीरा । लहुरा कबीर जागु गंभीरा ॥ कहैं कबीर हम जगमें नासक । दासातन धर दास हो दासक ॥ सो सुनिये त्रिभुवनपति राई । कबीरधर्मदासजीवजीवतरजाई ॥

व्यासबचन ।

कहैं कृष्णसों व्यास सुजाना । जब भगवान कहो कछु ज्ञाना ॥ अगले जीवन शब्द सहाई । परख शब्द पंथ ज्ञान चलाई ॥ ऊंच नीच तन सब जिव तरई । बहुरिन योनी संकट पाई ॥ बेर अनंत पूछहु मोहिं भाई । सुकदाता कबीर ठहराई ॥ कबीरके भक्त बडे तप पावे । त्रिगुण कर्म भर्म अरुझावे ॥

साधुके लक्षण - रमता और बैठाका भाव

११८

कबीरकृष्णगीता ।

जहँ कबीर समर्थ गुरु आपे । सुखपे पान नाक किम थापे ॥ पूछहु सत्यकबीरसे जाई । कबीर कहै सोइ बीज ठहराई ॥ कहै व्यास तुम करता स्वाधी । कबीर समर्थ करता सुखखानी ॥

कृष्णवचन ।

कहै कृष्ण व्यास निज दासा । गुरुके एक रोम प्रति आसा ॥ करता हरता दाता भुगता । गूह बैरागी योगी जुगता ॥ कौनहु पंथ गुरु सम नहीं कोई । सबपर श्रेष्ठ कबीर गुरु सोई ॥ सुन सतनाम कबीर गोसाई । गूही विरक्त गत देहैं चिन्हाई ॥

गरुडव्यासवचन ।

गरुड व्यास हरि चरण लपटाने । कबीर चरण गहि विनती ठाने ॥ कबीरसे पूछहिं व्यास निरुवारा । रमता बैठे भाव विचारा ॥ स्थिर रमता भेद बताऊं । ग्रेही औ बैराग सुनाऊं ॥ तुम कहैं प्रिय रमताकी बैठे । बैरागी प्रिय औ गूह गूढा ॥ धर्मदास तुम्हरे कंडहारा । नाम बोहित तुव नाम अधारा ॥ और सबके तुम हो सुखदाई । सुक्त पंथ मोहि कहो समुझाई ॥

कबीरवचन ।

कहै कबीर गरुड सुख व्यासा । कृष्ण सभेत सुनहु सब दासा ॥ कहै कबीर सुनो सुनि व्यासा । भो मोहि प्रीत भजे मोहि दासा ॥ ग्रेही भक्त सो उत्तम आहि । बैरागी उत्तम गूह माही ॥ ग्रेही भक्त आपन कुल तारे । बैरागी औरन निस्तारे ॥ ग्रेही भक्तसो ना कर भाऊ । बैरागी पारस निरभाऊं ॥ साकट आमिष अहारी प्रेता । खोवे हीरा जन्म अचेता ॥ धन्य भाग जो राधेव नामा । नाम भक्त प्रीत सुखधामा ॥

कवीरकृष्णगीता ।

११९

बिन सतनाम तरे नहिं कोई । क्रीतम नाम ते काज न होई ॥ सत्यनाम सदुरु लख पावे । यम फंद काट सुकतावे ॥ अगरलोक ले राखें हंसा । छूटे जन्म मरणकी संसा ॥ सदुरुकी आसा चित राखे । सोई करे शिष्य जो गुरु भाषे ॥ केते शिष्य गुरुको तज भागे । तीर्थ व्रतकी आसा लागे ॥ तीर्थ व्रत कोइ तारे नाही । सबे सुकत गुरुसेवा भाहीं ॥ एक लाभ दिसंतर होई । साध दरश गुरु लाभ है सोई ॥ औ तन मन दृढ रहे गुरुसेवा । ते फल सब घर बैठे लेवा ॥ अथवा जो मन होय उदासा । देखिय संतनकेर विलासा ॥ तो गुरु सेवा महँ कोइ राखी। करहु दिसंतर दानेहं साखी ॥ गुरुकहैं अकेला तजे न भाई । कल्पे गुरु तेहि दोष बहु भाई ॥ गुरु आज्ञा जो करे दिसंतर । नाम सुरत गुरु ध्यान निरंतर ॥

दोहा—सात पांच संमत भरी, गुरु सेवा चित राख ।

तब गुरु आज्ञा लेयके, करे दिसंतर जाय ॥

करे दिसंतर देखे देश । देखे राजा रंक नरेशा ॥ ज्ञानीके दशा विचारे लेखे । काम क्रोधका सुरचा पेखे ॥ मनकी दशा चीन्हु विसरावे । मन मायाका रंग न भावे ॥ जहँलग कुपंथ धोखा भ्रमा । तहँलग आय मन माया कर्मा ॥ नागिन नारका चौंट बचावे । नाम ध्यानसो दशा जुगावे ॥ आपा त्यागे रहे दीनता । शब्द प्रकाशे नाम लीनता ॥

१२०

कबीरकृष्णगीता ।

सत्यनामकी यहिमा भाषे । तृष्णा लोभ न मनयें राखे ॥ रहे असोच सो आपन कामा । पल २ निशि दिन आठहु याभा ॥ पर पोषण भिक्षा नहीं लाजा । निच पिच करहि बल सभाजा ॥ बेगमी रहे भरोसे साहेब । सोई संत सब माहि सुसाहेब ॥ आवे सहज विचार सो पावे । परिहरि आश्रिष अंकुर फल पावे सत्यपुरुष कहैं भोग लगाने । महाप्रसाद संत मिल पावे ॥ कोइ जीव वचन नहीं पावे । सबर्म राम कबीर कहावे ॥ कोई फकीर होय पाले देहा । मकरा तजि गोहसो नेहा ॥ जो साहेब भेजे सो पावे । रुखा सूखा नहीं विलगावे ॥ क्या पाटम्बर क्या टाटम्बर । क्या चिंतामणि क्या पीतांबर ॥ जो साहेब भेजे सो सही । कलपत भिक्षा लेना नहीं ॥ विन मांगे कोइ कोट चढावे । सो लीजे कछु दोष न आवे ॥ सहज अजाची भिक्षा आवे । आप चुगे औ सबहि चुगावे ॥ गुरु पूजा संतन सेवकाई । सबसो भीत सुमत सुचिताई ॥ वह माया कहु कौने काजा । जो नहीं परमारथ पथ साजा ॥ एक जो माया जोगवहि भाई । विलसहि आप औरन डहकाई । यह माया है यमकी फांसी । नाम विना भरणें चौरासी ॥ दोहा-माया है दो भांतिकी, जो कोइ जाने खाय । एक मिलोवे नामको, एक नरक ले जाय ॥ आसुरी माया आपाहि पोवे, गाढे परे न हट । सातकी सो परमारथ, संतन घाले मूठ ॥ माया जुगवे कौन गुण, अंत न आवे काज ।

कबीरकृष्णगीता ।

१२१

सत्यनाम जुगावहु, माया परमारथ साज । संखपछन ले माया, भक्तिहीन जो होय ॥ ता तेहि यम ले आसे, नरक परे पुन रोय ॥ रंक जीव जो सोई, सोई माहि धनवंता । धनवंता तो हरि भजे, तो हरष मिले भगवंता ॥ रंक धनीको नहिं चाहे, चाहे प्रेम प्रतीत । गुरुभक्ता मोहि भावे, कहैं कबीर अतीत ॥ गुरुभक्ता मम भक्ता, साथ भक्त मम दास । हरिभक्ता सोऊ हम, कहैं कबीर हरि व्यास ॥ आत्मपूजा जिव दया, परआत्मको सेव । कहैं कबीर सत्यनाम भज, सहज परम पद लेव ॥

पांचहुको लखे परंपंचा । नाम भजे जिव पावे संचा ॥ पांचों परंपंची तन सुगता । पांच तीन साथे अवधूता ॥ सुर नर अज हरि हर सुनि जेतै । तन घर पांच तीन घर तेतै ॥ विरला गुरु गम परखि भये न्यारा । सो वांचे जिन शब्द विचारा ॥ जो राजामहैं थाको माना । शब्द महंत महातम जाना ॥ शब्द विना जग बाउर अंधा । शब्द विना जग परे यमफंदा ॥ सहुर शब्द परख पंथ चाला । जो जीते जग बरवस काला ॥ मन काल निरंजन अंसा । अज्ञानीको करे विधंसा ॥ ज्ञान प्रवेश होय मन सांचा । नाम बचे जिव यमसों वांचा ॥ भजे नाम जो मन चितलाई । पांच पचीस तीन थक जाई ॥ गगट होय कला सतनामा । शब्द परख चले तेहि शुभ कामा ॥

१२२

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा—नैन नासिक जिभ्या, श्रवण इंद्री स्थान ।

पाचों आने सहज घर, सोई सिद्ध प्रवान ॥

जिभ्या बंका घाट जुगावे । मिथ्या चुगल आमिस न भावे ॥

जो बोले सो अक्षर सूचा । नाम भक्त सतसंगत ऊंचा ॥

जो साहेब देय धार वृत्त मेवा । सहज भाव कर दोनो लेवा ॥

जैसा भीठा दधि घृत खोवा । फिरका साग ताहि संजोवा ॥

जिभ्या अग्रवास रस भीठा । रसना उतर कंठ तर फीका ॥

दोहा—जैसा भीठा घृत पक, तैसा फीका साग ।

सत्यनाम सो राचे, कहैं कबीर वैराग ॥

ग्रेही साध सेवा करे, भाव भक्त आनंद ।

कहैं कबीर वैरागी, निरवानी निरद्वंद्व ॥

शब्द विचारे पंथ चले ज्ञान गली दे पांव ।

क्या रमता क्या बैठे क्या गृह कंदल छांव ॥

सुरत सोहागिल सो सही, जो गुरु आज्ञा माहिं ।

गुरु आज्ञा जो भेटे, ताहि कुशल हो नाहिं ॥

पिय सन्मुख सेवा करे, जो पतिव्रता जान ।

पिय तज जो जित तित रमे, वरत भंग तप मान ॥

गुरुआज्ञा ले आवे, गुरु आज्ञा ले जाय ।

कहैं कबीर सो संत प्यारे, बहुविध अमृत खाय ॥

कहैं कबीर गुरु प्रेमवश, क्या नेरे क्या दूर ।

जाको चित जासों बसे, सो तेहि सदा हजूर ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१२३

गुरुआज्ञाते जो रमे, रमतें तजे शरीर । ताके सुक्त हजूर हैं, सदुरु कहें कबीर ॥ गुरुके सन्मुख जो रहे, सहे कसौटी दुःख । कहें कबीर वा दुःख पर, वारों कोटिन सुख ॥ सदुरु अधम उधारन, दयासिंधु गुरु नाम । गुरु विन कोई न तर सके, क्या जप अल्लह राम ॥ गुरु सुक्तावे जीव कहें, चौरासी बंद छोर । सुक्त प्रवाना देहिं जो, यमसो तिनका तोड़ ॥ वेद पुराण साधु गुरु, सवन कहा निज बात । गुरुते अधिक न दूसर, क्या हरि क्या पितु मात ॥ ताते शब्द विवेक कर, कीजिये सो साज ॥ जोहि विध गुरुसो प्रीत रह, कजि सोई काज ॥ गुरुसो प्रीत निवाहिये, जेहि तत निवहे संत । प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रीत निकट गुरु कंथ ॥ सोइ नाचना नाचिये, जेहि निवहे गुरुप्रेम । कहें कबीर गुरु प्रेम विन, कितहु कुशलना क्षेम ॥ तन मन सीस निछावर, दजि सरबस प्राण । कहें कबीर दुख सुख हरे, सदा रहे गलतान ॥ तब जो गुरु प्रिय बैन कहि, शिष्यहि चितवे दीठ । तो रहिये गुरु सन्मुख, कबहुं न दजि पीठ ॥ गुरु मारे झटकारे, गुरु बोरे गुरु तात । गुरुसों प्रीत निवाहिये, गुरु भौ निधि काडिहार ॥

ज्ञान दशा और मनकी दशाका वर्णन (गुरुमुखी और मनमुखी)

१२४

कबीरकृष्णगीता ।

सनेह प्रेम गुरु चरणमें, जेहि प्रकार सो होय । क्या नरे क्या दूर बस, प्रेम भक्त सुख सोय ॥ जेहि विधि शिष्यके मन बसे, गुरुपद परमसनेह । कहैं कबीर काफर ठिग, क्या पर्वत बन ग्रेह ॥ सोई साधपतिव्रता जो, सदा जरे पिय आग । लाभ हानि बिसराइके, रहे चरण गुरु लाग ॥ जो गुरु पूरा होय तो, शिष्यहिं लेय निवाह । शिष्यभाव सुत जानिये, सुतते श्रेष्ठ शिष्य आय ॥ अबुध सुबुध सुत मात पितृ, सबहिं करे प्रतिपाल । अपनी और निवाह गुरु, शिष्य सुख लहे निज चाल जैसे सती संग जरे, आस पतीकी त्याग । सुघर कूर सोचे नहीं, शिष्य पतिव्रत सोहाग ॥ सरबस सीस चढाइके, तन कृत सेवा सार । शुभ पियास सहि ताड़ना, गुरुकी सुरति निहार ॥ गुरुको दोष रतिक नहीं, शिष्य न साथे आप । शिष्य ना छोड़े मनमता, गुरुहिं दोष दे पाप ॥ जैसी सेवा शिष्य करे, तस फल प्राप्त होय । जो बोवे सो लुवे, कहैं कबीर विलोय ॥ कहैं कबीर गुरु सो मिले, नाम होय प्रकाश । गुरु मिलिशिष्य भौनिधि तरे, सुनहुकृष्ण मुनिव्यास सुनियो संतन साध मिल, कहैं कबीर समुझाय । जेहि विधि गुरुसो प्रीत होय, कीजे सोइ उपाय ॥

कविरत्नमणिगीता ।

१२५

व्यासवचन ।

चिनती व्यास कीन्ह पंग देकी । तुमसन काहु न देख विवेकी ॥ ज्ञान दसा औ मनकी दसा । सत्यकवीर करो प्रकाशा ॥

कवीर वचन ।

कहैं कवीर निरनै टकसारा । मनमत ज्ञानमता निरुवारा ॥ ज्ञान अंग प्रथम गुरु करई । गुरुको शब्द हृदय गह धरई ॥ गुरु तो ऐसा कीजे भाई । पूर्ण ज्ञान सत चाल ददाई ॥ सचलोकले जीव पहुँचावे । दया क्षमा सुखसिंधु समावे ॥ पूछे गुरुसे होय गलताना । जो गुरु कहे सोई सतमाना ॥ गुरुसुख ज्ञान विचारे लीन्हा । मन औ ज्ञान भिन्न तब कीन्हा ॥ दया क्षमा औ शील संतोषा । ज्ञान दया औ जीवपंथ मोषा ॥ विष्णो ज्ञान साकट अज्ञानी । शीतल ज्ञान क्रोध मन जानी ॥ असंत औ आतुर ज्ञाना । शील ज्ञान बेशील अज्ञाना ॥ निरगुण ज्ञान औ ज्ञान अतीला । धीरज ज्ञान अज्ञान हडीला ॥ आप खाय औरहिं देय ज्ञाना । गुरु साधू तज खाय अज्ञाना ॥ सेवा ज्ञान न उस अज्ञाना । कामी मन निहकामी ज्ञाना ॥ तीर्थ व्रत तप मनको भाऊ । नाम भक्त पुन ज्ञान लखाऊ ॥ चंचल मन स्थिर गुरु ज्ञाना । चंद भान ज्ञान अगनित भाना ॥ दिवस ज्ञान अज्ञान भौ राती । अवरण ज्ञान अभै नाजाती ॥ आतम पूजा ज्ञान बखाना । मनमत सिला धात व्रत ठाना ॥ दुबल सुपद ज्ञान प्राति ठाना । डिम धार को पूजे अज्ञाना ॥

१२६

कवीरक्षणगीता ।

मात पिता सेवे शुभ ज्ञाना । तात जननी तज त्रिय मन माना ॥ डिंभ अहंकार दुर्ता मन छाया । अछत दीन लघु ज्ञान सुभाया ॥ पालक ज्ञान घालक यम बाजी । जैसे जग मनमत दिज काजी ॥ बोलता ज्ञान तन मन अंकारा । जाग्रित ज्ञान स्वप्न मन चारा ॥ ज्ञान परमार्थ स्वार्थ मन मूढ़ । जुवा मनुज ज्ञान पद बूढ़ ॥ अपन पराया एक सम जाना । और तोर मन बुध विगराना ॥ मात पिता सिर देय सो ज्ञाना । अहिब नारी विष खोट अज्ञाना ॥ भीस अजाची ज्ञानको अंगा । धूमधाम जांचक मनरंगा ॥ देह दाग मनमता कहावा । मन दागे जो ज्ञान सुभावा ॥ नाच छाछ विश्वा नट ठाढी । यह मनमता यम चौकी गाढी ॥ भीन नास मद क्षण मन बाजी । कसतुरी मिमयाय असत बन खाजी ॥ चाहे बैराग तजे नहिं रानी । सन्यासी संग्रह मन चारी ॥ झंसे मन पुलकित होय आना । सरगुन गुरु मन सट्टुर ज्ञाना ॥ चाहे भिस्त तजे नहिं मोहा । मोह अज्ञान ज्ञान निरमोहा ॥ सतगुण ज्ञान रज तम मन दीसा । मन मलेश गुण पांच पचीसा ॥ जागे ज्ञान सोय अज्ञाना । सो जागा जिन राम पहिचाना ॥ सोइ अज्ञान गुरु सेवा नहिं कीन्ह ॥ गुरुको सार असार नहिं चीन्ह ॥ ज्ञान अमर मन मरे नसाई । ज्ञान पारस मन सुरत होय जाई ॥ ज्ञान अमर पद सार सो बाहर । सट्टुर भिल आवे शिष्य ठाहर ॥ बाहरसे घट ब्रह्म समाना । सो जिवलोक ते न्यारा निरवाना ॥ अभी ज्ञान सो सत्य कवीर । बिबै निरंजन नीर सरिर ॥ जीव अभी सो नाम कवीरा । देह निरंजन बिबै शरीरा ॥

कलियुगमें कबीर साहब क्यों प्रकट हुए ?

कवीरकृष्णगीता ।

१२७

आवत स्वास सो सत्य कबीरा । निकसत मरे निरंजन कीरा ॥ गौर हथीर मन माया जानो । अजर पीर कबीर बखानो ॥ व्यास कहैं कस पीर कबीरा । सत्य कबीर भलदास गंभीरा ॥

कवीरवचन ।

कहैं कबीर कलमुगके आदी । मीन मांस भाखिहैं नर वादी ॥ होय मलेश महदेव ऐहैं । गौ द्विज वधि सिरिया नैगी ऐहै ॥ महादेवहिं महम्मद कहिये । हिंदू केर धर्म नहिं रहिये ॥ तब हम पीर कबीर कहाउव । साथि मलेश गौ द्विजहिं बुचाउव ॥ विष्णु पक्षका भयो प्रकाश । हमरे विष्णुसों कस दुइ भासा ॥

दोहा—दास कबीर कहाउव, रजव गुरु करव संसार ।

सत्यकबीर कहाउव, संतनके निस्तार ॥

जन कबीर भये नरतन धारा । कबीर कहाये जिव तन सारा ॥ हंस कबीर होय भजव सतनामा । अम्बर कबीर अमर सो जाभा ॥ गैनी नाम कबीर कहाउव । बहु बंधनते जीव मुक्ताउव ॥ अविगत कबीर कहाउव तबहीं । स्वयं च अधम उवारव जवहीं ॥ अकह कबीर केह को लीला । अविनाशी नहिं विनस शरीरा ॥ नाम कबीर वास सब देहा । रमैं कबीर रामतन खेहा ॥ रमैं कबीर होय रमता रामा । रमता स्वास जिव तन विश्रामा ॥ दीन दयाल कबीर कहाये । दीन दुखित जिव पालन आये ॥ खसम कबीर कहाये तबहीं । जीव सोहंगदे व्याहेउ जवहीं ॥ काल भरदन कबीर कहाये । यमहिं जीत जिवलोक पठाये ॥

१२८

कबीरकृष्णगीता ।

जोगजीत तब नाम हमारा । जब जीते योग माया निराकारा ॥ सतसुक्ति तब नाम हमारा । जब सत् प्रकाश कीन्ह संसारा ॥ बंदीछोर तबहिं कहलावा । जब यम बंदिछोर सुकावा ॥ मनकहैं जीत सुनीन्द्र कहाये । करुणामय होय दया ददाये ॥ सब फुलवा बेलि हमारी । निरंजन कहैं सौंपा वारी ॥ निरंजन पुत्र पुत्री अष्टंगी । मम द्रोही जो ताको संगी ॥ हमरे दुष्ट मित्र नहीं कोई । सर्वहिं व्यापक न्यारा सोई ॥ साधु द्रोह सोई मम द्रोहा । साधुसेवक मम सेवक बोहा ॥ जो मम संतकी सेवा करई । हमहिं जानके गुरुको धरई ॥ ताहि सुकिका संशय नहीं । गुरु साध भक्ता मम आहीं ॥ गुरुदोही सो साधुको द्रोही । अपने राम न भेटेउ बोही ॥ जगमहैं चहुंयुग गुरुऔ रामा । राजा राम गुरु सुखधामा ॥ गुरु राम दोय नाम हमारा । राम असोच गुरु भौकंडहारा ॥ अगम ज्ञान मन पूछहिं बाला । बहुहरहिं पूछेऊं पीर व्याला ॥ पीर परा ईसब दिन मेरा । सोई पीर जेहिपीर जिव केरा ॥ कहौकहां लग विकृत कलाजग । निरंजन एक मम रोम तनलग ॥

व्यासवचन ।

व्यास चरण गहि पुलकितभयऊं । सत्य कबीर मोहिं मानद दियऊं बडे भाग मम सुखदेवकेरा । और गडुरके भाग बधेरा ॥ व्यासदेव कृष्णहिं सिर नाये । धन्य तुम कृष्ण कबीर चिन्हाये ॥ कबीर बिना को राखे जिवको । गुरु बिन कौन चिन्हावे पिवको ॥ गुरु विष्णु सत सतको अंशा । सोई सत्यकबीर कुलवंशा ॥

सब देवताओंका कबीरसाहबका शिष्य होना

कवीरकृष्णगीता ।

१२९

सबके मूल कवीर ठहराने । कवीरके डर यमराज डराने ॥ कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन व्यास मत धीरा । सब सट्टुणके गुरु कवीरा ॥ लेहु पान सबही मम दीक्षा । सत्यकवीर कहैं अर्णहु सीसा ॥ सट्टुर कवीर गुरु करहु रे भाई । श्रीकृष्ण सबको ससुझाई ॥ जहैलग सट्टुण देवता रहऊ । सबन धाय सट्टुर पद गहऊ ॥ उभै कहे विष चक्षु नीरा । देहु प्रवाना सत्य कवीरा ॥ कवीरवचन ।

कहैं कवीर सुनो सब देवा । कृष्णसो पूछहु हमरी भेवा ॥ हम हैं अजर भुक्तके दाता । हमरे शरण यम त्रास निपाता ॥ जो हम कहा शब्द सहिदानी । शब्दकी चाल चले सो ज्ञानी ॥ सबन कहा अपौं शिर तोही । देहु पान आपन कर मोही ॥ सत्यकवीर तब आरती कीन्हा । अभी अंक सो वीरा दीन्हा ॥ चरणोदकदे तिलक कर दीन्हा । तुलसि माल दे सिखवनकीन्हा ॥ सब जिव जानहु एक समाना । जीवघात तज ब्रह्म अभिमाना ॥ साधु गुरु सम सेवा मानी । सुख स्थिर सट्टुरकी वाणी ॥ गुरु कर्ता गुरु सम नहीं कोई । गुरु कर्ता ते भेछ है सोई ॥ करता देही धर गुरु करही । तो करता करता होय परही ॥ सब महाँ करता नाम कवीरा । रमें राम होय सकल शरीरा ॥ सर्व यई सो राय लखाहीं । राम सो अंश कवीरके आहीं ॥ जग महाँ उलटी भाव दिखाये । जो स्वामी सो दास कहाये ॥ करता आद कवीर भये दासा । राम कृष्णकी महिमा प्रकाशा ॥

लक्ष्मी आदि देवियोंके गुरुमुख होनेका वृत्तान्त

१३०

कबीरकृष्णगीता ।

सबमो राम सो रमहिं कबीरा । जैसे घृत व्यापक है क्षीरा ॥ बैठा नवर बराबर पोखे । पाप नाचि तबै पुण्य कर चोखे ॥ ना कोइ पाप जिवघातसमाना । साधुसेवासम पुण्य न आना ॥ गुरुके भक्तसमान नहिं दूजा । पतिव्रता जिमि भियपद पूजा ॥ सद्गुरु पिव सो जीवके आहीं । पतिव्रताते गुरुभक्तभेदआहीं ॥ तिन स्वामीके भक्त सुरलोक । गुरु भियभक्त सो जीवनिसोका ॥ भ्रान मंजार देह धर सोई । गुरु साधुको निन्देउ सोई ॥ हरदम नाम कबीरको गावे । तासु हृदय कबीर सयावे ॥ तजे अभक्ष सुभक्ष सो पावे । भीन मास यदार रत नहिं भावे ॥

दोहा--मधुर मम पाय कसतुरी, माक्षी घोंघी चुन ।

मत्स्य मास मद त्यागे, पहुँचे पुरुष सनीप ॥

पान परवाना पावे, सुमरे सत्य कबीर ।

कहे कबीर घर पहुँचे, बहुर न धरे शरीर ॥

ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी । लक्ष्मी गायनि सकुचानी ॥

हम सब गुरुविनकोहिपंथ जायव । ना जानो केहि खान समायव ॥

हमरे स्वामी तेहि सिर दीन्हा । हम तीनों मिल केहि पग लीन्हा ॥

लक्ष्मीवचन ।

लक्ष्मी कहे सुनो ब्रह्माणी । सुन सेवहु कबीर सुखवाणी ॥

चहिये कबीरके दीक्षा लीजे । सत्यकबीर चरण चित दीजे ॥

कह लक्ष्मी मम पति सिरदारा । थो मम पतिके सद्गुरु सारा ॥

यह कह लक्ष्मी विष्णुपहँआई । सीस नाय चरण चित लाई ॥

आज्ञा करिये स्वामी मोरा । तब गुरु करो कबीरबदिछोरा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१ ३१

विष्णुवद्भन ।

हंसके विष्णु तवआयसु दीन्हा । हम जो चहत सोईतुम कीन्हा ॥

दोहा-धन्य भाग तेहि नारको, विष्णव जाको स्वामी ।

बहुर भाग तेहि पुरुषको, जेहि घर विष्णव वामी ।

कहैं कृष्ण नरिअर कर लेहू । सीस निछावर नरियर देहू ॥

दोहा-पान मिष्ठान्न नरियर, पुंगी फल पुष्प श्वेत ।

श्वेत वस्त्र सिंहोसन, साजहु थार समेत ॥

कंचन थार जोत प्रकाश । हीरा माणिक अथ सुवासा ॥

कृष्ण लाय पीछे निज नारी । चले भक्त राधे झझकारी ॥

पुन सत शिवको सिधाई । कबीरके चरण परससवआई ॥

कहैं कृष्ण सुन सत्यकबीर । दीजे शरण नार त्रिय धीर ॥

लक्ष्मीबचन ।

लक्ष्मी कहे विविध कर जोरी । हमको तारहु यमसोबांदिछोरी ॥

कबीरबचन ।

दोहा-कहैं कबीर सुन लक्ष्मी, सोई नार सुलक्ष ।

तन स्वामी जिव पीव कहैं, सेवा करती दक्ष ॥

अपने पति तज आन न जोवे । सोई नार पतिव्रता होवे ॥

पतिव्रता निज प्रियपद पूजा । जग महीं पतितज सृष्टि न दूजा ॥

दोहा-पिय चरणोदक जूठन, पतिव्रताको आधार ।

पियहे अंबू अगिन घसे, सिरदे हने पहार ॥

सवपर सत्यनाम गुरुरूपा । अजर अमर गुरु सत् सख्पा ॥

जीव सबे गुरु समर्थ केरा । जासु प्राण वस जाके चेरा ॥

१३२

कबीरकृष्णगीता ।

तुम तो लक्ष्मी सत्यकी माया । साधु संतपर करिहो दाया ॥ सुनहु कृष्ण स्त्री गुरु स्वामी । तन गुरुपति पति गुरु निज नार्मी। कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण हम दासी दासा । एक मत घर तब संत विलासा ॥ तब कबीर प्रसाद चढावा । सत्यनाम कहैं भोग लगावा ॥ यम त्रिण तोड दीन्ह परवाना । लक्ष्मी पान पाय सुख माना ॥ चरणामृत सीत प्रसादा । लीन्ह लक्ष्मी सचको स्वादा ॥ सात दंडवत कीन्ह स्वसम कहैं । तीन दंडवत संत तनपति कहैं ॥ कहा कृष्ण अब हम गतिपावा । घर साकट वैष्णव करवावा ॥ केते पुरुष आय गुरु शिष्या । नारी साकट घर प्रेत परेखा ॥

दोहा-भक्ति करे जो स्त्री, तो वीसिये घर माहिं । साकट स्त्री भुंभनी; नहिं जैये तेहि पाहिं ॥

स्त्री बेटी बेटा भानजी । मात पितु बंधु परिजन काजी ॥ ये सब सरगुण भ्रम पसारा । मोर मोर कर मरे संसारा ॥ मोर मोर का करहु रे भाई । मोर आप पगु देख तवाई ॥ सब गुण शूद्र तासु धराई । भक्ति बिना कछु काम न आई ॥ अपने मन सब भक्त कराहीं । सार भक्त विन नरक भोगाहीं ॥ सार भक्त सतनाम कबीरा । भजै कबीर न घरै शरीरा ॥ चौथा पद सदुरु स्थाना । सदुरु सत्य कबीर निरवाना ॥ निरगुण भक्त पतिव्रत शरीरा । एक स्वसम सो सत्य कबीरा ॥ त्रिगुण भक्त सो आवा जाहीं । चौरासी मई भटका खाहीं ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१३३

दोहा--सतगुण रजगुण तमगुण, तिनके तीन सुभाव ॥ कौन सिरजे कौन पोखे, कोइ संहार कराव ।

रजगुण तमकी उत्पत जाना । सतगुण सोवत जन्म सिराना ॥ तमगुण रुद्र काल संहारे । त्रिगुण निरंजन भसम कर धारे । बांचे विष्णु सतगुण सत ठाई । सत्यके मूलसत्य कबीर सतसोई जेहि जस रुचे तैसो गुरु कीजे । विन गुरुजीव काल वस दीजे ॥

दोहा--सावित्री ओ गौरा, मगन भये हरि बैन ।

कहैं हमहू गुरु करों, सत्य कबीर सुख चैन ॥ कहैं कृष्ण कबीरसे वाणी । शिष्य होन चाहैं त्रिय दाय प्राणी ॥ कबीरवचन ।

कहैं कबीर खीवस स्वामी । पति कहैं पूछ नाम भज नामी ॥ गायत्रीगौरावचन ।

कहैं गायत्री गौरा बहोरी । सबके स्वामी तुम बंदिछोरी ॥ दुतिया माहि कोइ हित नाहीं । दिन दश कच्चा सुख जगमाहीं ॥ अंतकाल जब काल गरासे । तब गुरु विन नहिं कोइ निकसे ॥ अधा अंछंगी तेहमें तानी । लक्ष्मी तुव शरण हम कालअधीनी सत्यकबीर तुम गुरु पितु माता । तुम्हरी दया बने सब वाता ॥ हम चीन्हा तुम साहेब आहूँ । सब बनजिया तुमही गुरु साहूँ ॥ तुम जेहि चितबहु सो तर जाईं । तुम विन जियरा नरक भोगाईं ॥ गौरा कहैं विहसिके वाणी । हमहू लखा कबीर सहिदानी ॥ जबहिं विष्णु हरिनाकुश मारा । शिव गुणसुत छिन असुरहिं मारा हमहू शिवगण आईं हां । बैठे हरिनाकुश सिरमाहा । जब कबीर विष्णुके माथे । तब देखा मैं शिवके साथे ॥

१३४

कवीरुक्षणगीता ।

कवीरवचन ।

कहैं कवीर सही तुम कहा । होहू शिष्य कपिलमुनि पहा ॥

दोहा-कपिला गऊ कपिल मुनि, हो सट्टरु हो तास ।

तास शिष्य मम पुत्री, तुम्हरे होय निवाह ॥

कृष्णवचन ।

कहा कृष्ण गौरा सावित्रिहिं । एके वृक्ष डारभै निवधिहिं ॥

भूल कवीर निरंजन डारा । साखा त्रिगुण पत्र संसारा ॥

पाँच पचीस जीव संग परऊ । हंस चाल तज बक मग गहू ॥

हंस सोई जिन सट्टरु चीन्हा । सट्टरु सत्यकवीर चित दीन्हा ॥

दोहा-सावत्री औ गौरा, भई कपिलमुनि शिष्य ।

विष्णुआदिक कवीर प्रमोधा, भयो सवन मन हर्ष ॥

तेहि छिन मात्र रुद्र अज आये । देश सुल्क सुख हरहि सुनाये ॥

पूछा विष्णु मृत्युलोक कहानी । चतुरावन शिव कहा बखानी ॥

ब्रह्माशिववचन ।

महा आनंद होत सब ठाऊं । भौ मृत्युलोक वैकुंठ सुभाऊं ॥

विष्णव मया सकल जग जाई । सत्यकवीर जपे दुनियाई ॥

राम कवीर करे पंथ जागा । जग सब भक्त भयउ मद त्यागा ॥

विष्णव होय सो गिने न काहू । कहैं के को तुम अज शिव आहू ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण यह भलि है बाता । तुम अंकुल काहे अकुलाता ॥

तुमहु भक्त करहु भल चाहहू । तजहु क्रोध सट्टरु पहिचानहू ॥

महादेववचन ।

कहैं महादेव तमकके बाता । सट्टरु तुमहि विष्णु जगदाता ॥