कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
महादेव और कबीर सम्वाद - योगका वर्णन
१४०
कबीररुणगीता ।
कहैं अज सत्यकबीर संवादी । हम सब शिशु क्रीतमलघुवादी ॥ अन चीन्है हम बाद बहु कीन्हा । बरुसहु सत्यकबीर प्रवीना ॥ अब तो शरण तुम्हारी आये । यम अवगुण क्षमा प्रभु लाये ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो अज वाणी । मात पिता शिशु घट नहिं यानी ॥ जो हम क्रोध करो तुव सबपर । को तोहिराख सके अज हरिहर ॥ तुन तीनोंके पितु महकाला । निराकार सब करे विहाला ॥ हम तुम सबको प्रथम चेतावा । गहो शरण होय जिव सुत्कावा ॥ तब तुम गर्भवासमहैं भूले । ताते फिर २ योनी झूले ॥ जब सिर टेकेउ ऋषिदेव कारा । तब कबीरके शरण पवैरा ॥ कबीरके नाम शरण प्रतापा । उलटहिं जाय कालहिं चांपा ॥ कहैं कबीर सुनहु तुम चित दे । हृदय कबीर नाम जप हितकै ॥ जो जेहि नाम सुमरे चितलाई । हृदय कबीर नाम लौलाई ॥ दोहा-निशि दिन सुमरहु नाम मम, यमते रहहु निसंक ।
शब्द निरख पंथ गवनहु, गुरु पितु जेहि न कलंक ॥
चरण चूम अज सीस चढाये । तत्क्षण रुद्र जो गमन लाये ॥ कहैं महादेव विनय बहूता । कहहु कबीर योग सतमता ॥ केतिक स्वास चले दिन राती । किम घर बरे तेल विन वाती ॥ केते हांथ धरती आकाशा । कौन देवको कहां निवासा ॥ केतिक नदी केतिक गिरवरतन । कौन सिंधुको गाय कहावन ॥ कौन अमावस कौन परीवा । कौन पुत्रवा कौन ग्रह धरिवा ॥ केतिक रुधिर कायाभैं आही । वगन ओंकार फेर कित आही ॥ पांच तचहैं काहे नामा । और पचीस नाम पंच बाभा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
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काया माहिं कै अंस हैं ताता । सोकहु कै अंस आहिं तन माता ॥ कौन तत्त केहि जोनी साजा । योग भलाके भोगे राजा ॥ श्रुतुक मरे जरे तन क्षारा । परम पुरुष होय तनते न्यारा ॥ कौन देह धरि नरक भोगाई । को है सेवक लेय भिलाई ॥ चौदह सुवन कायामहैं काही । कहिये तन प्रचे मोहि पाही ॥ पांच सत्तका रंग कौन है । विन मंदिरका है सो कौन है ॥ कौन योगीको सिंगी बजावे । कौन आसन कौन विभूत रमावे ॥ काहेकी डिब्बी काहेका ढकना । कौन बेगाना को है अपना ॥ कौनसो चावल कौनसो दाली । कौनसी अगिन जात कहिवाली ॥ कौन कपिल को देवता आही । केतिक अनपा कहाँ जपाही ॥ विनती कर शिव पूछहिं भेऊ । कहैं कबीर सुनहु सब कोऊ ॥ योग यज्ञ तप तीर्थ कर्म काटा । यह मत चलि जिव बारह वाटा ॥ सार भक्त विन तरे न कोई । चहुं युग भक्ति श्रेष्ठ गुरु सोई ॥ कहैं कबीर सुन प्रेतके ईशा । गहहु देव पथ तारहु सीसा ॥ तुम सब लीन्ह पान परवाना । भक्ति चावल चित तज मम कामा ॥ एक २ अंश देहते काढहु । तेहि पितु सेव राख पितु बाढहु ॥ दोहा—अपनी अकित दुतिअन, सिरजा तीनो देव । बनिजा तीनो छट्टुर मिले, क्रीतम देव पितु सेव ॥ छै सौ बीस सहस्र इकईसा । येतिक स्वास दिवस निशि ईसा ॥ मनु पवनाको धायियो तारी । विना तेल औ दीपक वारी ॥ साठे तीन कर क्षीनीजहैंथा । आंगुर चार अकाशको माथा ॥ मल निकास बछ गनपत राजा । रिद्ध सिद्ध समसावत्री विराजा ॥ सकल सिद्ध मिल गुरुपद सेवा । गुरु विन गनपति भक्ति बहेवा ॥
१४२
कबीरकृष्णगीता ।
पृथ्वी तत्त्व तिष्ठत तेहि बारिज । पृथ्वी समान साध तेह कारिज ॥ सोह चतुरदल विधु सूरंगा । नाम बीच अजपा सोहंगा ॥ सोहंगका विन डोर कमला । जपे सो अमृत नाम दयाला ॥ षट्पत्रपद इंदी अस्थाना । बला सावित्री तहँवा जाना ॥ रजगुण पीत वरण सो पंकज । षट्सहस्र अजपातहँआपअज ॥ आप तच तहँ कीन्ह निवासा । विषै निरंजन काम यम फांसा ॥ केवल सो अष्टदल नील सुरंगा । विष्णु देवता लक्ष्मीसंगा ॥ सबगुण षट्सहस्र अजपा जप । सत्यनाम सम नहिँ कोइ तप ॥ वायु तत तहँ गांठ वंधानी । नाभचक पवना घर जानी ॥ कीतम घर तन पवन सोहंगा । आद अमर घर सदुरु संगा ॥ जाके बस सोहंग है भाई । सोई सत्यकबीर गोसाई ॥
दोहा--आद पवन सोहंग है, क्रीतम वायु तत पांच ।
जहांते सोहंग ऊपजा, कहैं कबीर सो सांच ॥
शिव शारदा दस हियकमला । स्फटिक वर्णअतिसोहेपदअमला तेज तत वडवानल चितंगी । हृदय दरश गुरु सदुरु संगी ॥ षट्सहस्र अजपा तहँ होई । शिव सक्ती गुरु शिष्यधरसोई ॥ द्वादसदल पंकज कंठ अथर । तत अकाश त्रिगुण मनस धर ॥ अय परम शिव दस द्वादसी । स्वांतकीलक्ष्मीमहाविष्णुसंगवसी एक सहस्र अजपा तहँ होई । सञ्ज रंग बरते पद सोई ॥ सञ्ज स्याम जेठ लघु भाई । सञ्ज रिस्वाम लखि जाई ॥ कंठ केवल दल षोडश पूरा । तहां वस्तु जिवसकलरंगसूरा ॥ अजपा छै सो नाम विहंगा । सुरत निरत सो सदुरु संगा ॥ भंवर गुफा दोय दल पद सोहा । परमहंस बसे नृप निरमोहा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४३
एक निरमोह सुरत सतनामा । दुतिय निरमोह कबीरशिष्यराभा स्याम लालभी रंग सोहाई । अजपा सहस्र कबीर लखाई ॥ सहस्रकमलदलाझलमिलझलके । मन पवन झीर मानसरोवरसे ॥ सुरत कमलपर सट्टुर वासा । एक सहस्र अजपा प्रकाशा ॥ गुन गुहिंज निरगुण सरबादी । शब्दसरूप सुरत संग स्वादी ॥ वतिस पट्टम पत्र गुण गाना । सुखा कंबल गुरु दरश पयाना ॥ दलअसंख्यकोकरवलसो भूला । जेहि २विन शून्य २ अस्थूला ॥ असंख्यदलकंबलकेदेखहुआगे । सतसाहेब दसमे बढभागे ॥ सतसाहेब सतनाम कबीरा । कहै कबीर हम सकल शरीरा ॥ हंस हमार सकल भत ताते । जीवधातके निकट न जाते ॥ कहै कबीर सुनो वृषवासन । काया लखहु देवन जहँ आसन ॥ अट्ट कोट पर्वत तहँहाडा । नौ सौ नदी समानीजेहिभांडा ॥ ज्ञानहीन जिव रात अमावस । पूनम चाँद गहुजगतगुरुआवस ॥ गुरु सट्टुर कबीर मिल तरना । कलश सवांरहु रतन सुवरणा ॥ सवा हाथ नभको गगन घर । वरणहु एक २ सुन संकर ॥ पृथ्वी आप तेज वायु अकाशा । यही नाम पंच तत्व प्रकाशा ॥ और सुनहु पांचहुके भाजा । ताते जीवन पोत दो मरजा ॥ पृथ्वीतत्वकी सुनहु प्रकृती । गुरु प्रताप कहैं संतन जीती ॥ असत भेद नारि तुच रोमा । बंधु पंच यह पृथ्वी तत भोमा ॥ लाल भसेव सुकल सोभ सुनं । पंच बंधु वह आपकी सुनं ॥ वायु तत्तकी भारजा बोली । लिये पवन फिरे उठन खटोली ॥ गावन धावन बोलन अगोचर । अटवा नतसी प्राणन दूसर ॥ क्रीतम वायु पंचतत्त संग तेहि बंधु।तेहि मुख बैन बोले भज नंद ॥
१४४
कबीरकृष्णगीता ।
नासिका वाट आवे जाई । रमता राम स्थिर न रहाई ॥ स्थिर पुरुष सत्यनाम कबीरा । मरे न जरे न धरे शरीरा ॥ तेज तत्तकी बंधु कहाई । तृषा क्षुधा आलस जमुहाई ॥ निद्रा मिल पांचो तजे दासी । नाम भक्त विन यमकी फांसी ॥ लज्जा शंका हर्ष शोक मोहा । यह अकाश बंधु संदोहा ॥ कहे कबीर सांचा मोहि भावे । सांचा सो जो सद्गुरु गुण गावे ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर हम नाम लखाई । सद्गुरु विन कोइ सुक्ति न पाई ॥ मम भये शिव नाचन लागे । कर गहि हरको दुलारन लागे ॥ सुनहु शंभु पूछहु प्रचारई । इतना सुन नाचत हो भाई ॥ जो पूछेहु तेहि महाँ कछु बाकी । सो सुन लेहु मह पंथ ताकी ॥ दूत तुम्हार फिरहि संसारा । पुण्यहि पापी दोनो लै जारा ॥
महादेववचन ।
कहे महादेव सुन सतनामा । तुव सेवक जो हम तेहि कामा ॥ पाप पुण्य है त्रिगुण बाजी । बेद ठेल त्रिपतात्रिक साजी ॥ पाप पुण्य है यमके खेती । दया सत् प्रधारथ सुनेती ॥ हमहु चले कुपंथ ढर ताता । तापर प्रबल अष्टंगीमाता ॥ अपने पुत्रहि जो धर खाई । आनहिं कस छोडे भाई ॥ पितु आज्ञा हम बहु जिव चांपा । परे आन हमरे सिरपापा ॥ ताते शरण तुम्हारी आये । काल पितारे आप बचाये ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर भल होय सब केश । जरा मरण सतनाम निबेरा ॥ अब तुम जात भातु तन बूझहु । तन स्वासा स्वासा गम सुझहु ॥
कबीरकृष्णगीता ।
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एकको लोहु एकको पानी । दौय मिल सिरजा विदेहनिस्सानी ॥ निहअक्षर निहतत्तसो निरगुण । अमी नीर विन कुंभक सरगुण ॥ सट्टुर शब्दसे खागी धरनी । उर्ध्व सुरत सोहंग परवनी ॥ पितुके बुंदसो हाड औ गूदा । मांस रक्त औ येद औजूदा ॥ पुन पितु अंस रुधिर तन तबलों । तबलहि तन श्रोनित जिव जबलों ॥ चार अंस तनमहँ पितुकेरा । पांच अंस माता वन घेरा ॥ एक अधिक माता गुण भयऊ। चित देखो पन सतगुण कियऊ ॥ पौन आगे परा चल पाछे । धरिया माहिँ तन कछनी कांछे ॥ पिता पौन ले सांचहि दारी । तब जिव परा परातम नारी ॥ आतम परमातप जिव संग। नांद बिंदु मिलना मत रंगा ॥ अब जो अंस सुनहु शिव आही। जे जननी सो जो इन होय खाही ॥ जेहि जननी तन पांच प्रकृती । रोम चाम नख दंत भगोती ॥ जत द्वार तन तत भग जानी । आद लिंग सोहंग बखानी ॥ आठो पहर करे रति सोई । आवागवन महा दुख होई ॥ जबलग अमरलोक नहि पहुँचे । आवागौन भग भोगि विगूचे ॥ भक्त करे तो बारहि नीकी । भक्त बिहून सकल जग फीकी ॥ कीतम निरंजन पितु मम आही। तनके मात पिता यह साही ॥ जीव सब सत्यनामके आही । सत्यकबीर सतनाम लखाही ॥
महादेववचन ।
कहैं शंखु संसे गढ़ मोरी । तुम दयाल मम बंदीछोरी ॥ अब साहेब कहु जीवत लेखा । कौन तत्त कोहि जोनि परेखा ॥
योगियोंके तत्त्वोंका वर्णन व मुक्तिका मार्ग
१४६
कबीरकृष्णगीता ।
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन उमापति ईशा । नरतन त्रिगुण पांच पचीसा ॥ चार खान महैं नर तन ईशा । सकल भेद जानहु जगदीशा ॥ नरपिंडज चौरासी नारा । नाम भक्त बिन यमके चारा ॥ पिंडज गौ गज चौपग पहिषा । अरना बाध सिंह बनगोहिषा ॥ श्वान मंजार अजिया सुत बीगा । पृथ्वी आप वाय तेज अंगा ॥ त्रिगुण भेराय सकल जिव दीन्हा । सतगुण रज तम भासे चीन्हा ॥ रजगुण बहु छल झूद परबंदा । रोग वियोग भोग यमदंडा ॥ मिथ्या बोल सोग संतापा । छुतहिँ छूत जिव छूतहिँ थापा ॥ वैष्णवसे नहिं नवीहिं अभागे । वैष्णवन असंखहिं द्विज नागे ॥ तिनहु भागह बड वैष्णो बखाना । जीव दया कथि जग पतिथाना ॥ बहुर युद्ध महाभारथ करावा । तब करता हरि धका दियावा ॥ कृष्ण सीस जब वसे कबीरा । तबलग्ण राम कृष्ण मत धीरा ॥ निरंजन अधा परवेसा । तब से कृष्ण कालकर भेसा ॥
दोहा—जबलग्ण जाकर नाम लिख्य, तब लहि तेह यह सोय कहैं कबीर मोहिं सुमेर, एकमत सब सुख लोय ॥ पांच तीनकी काया कांची । अमरपुरी अमर तन सांची ॥ सतगुण सत्यकबीरके आसा । निरंजन अवा रज तम फांसा ॥ जैसे तुलसी भांमे राई । औ गुर राम तुलसी सार लाई ॥ रज तम गुंभा भांग बखाना । भांग महादेव अज गुमा जाना ॥ तुलसी विष्णु अंस विनाशी । औ अविनाशी कबीर सुखराशी ॥
दोहा—कहैं महादेव विष्णु अज, सुन सतनाम कबीर। निराकार डहनसे, राख लेहु गुरु पीर ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४७
कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुनहु त्रिय देवा । सब मिल करहु साधुकी सेवा ॥ जगमहैं वैष्णव भेष मम दासा । प्रेमवस भये ताके पास ॥ सत रज तम जिव सबहैं मेरा । अभष पंथ राक्षस जिव चेरा ॥ वीज वंस तेहि रहे न कोई । मीन गऊ वध जत जिव खोई ॥ सतगुणको सो भाव बखानी । रज तम तज सतपंथ चल्लानी ॥ सत्य दया पर आतम पूजा । सदुरु साथ चरण मन बूझा ॥ सकल देव मिल निरगुण नामा । कबीर अंस तन रमता रामा ॥ सबसे प्रेम क्षमा धीरज तन । अपने जानत न दुखवैं काहु मन ॥ कौनहु जीव जंतु न दुखवैं । समष्टी निज सबपर भावे ॥ काहूके तन मांस न खाई । मीन मास मद निकट न जाई ॥ वृत्त मिष्टान्न पान फुलवारी । यह सब सात्वकी भक्ष विचारी ॥ अभ्यागत आवे कोइ बरणा । सबकर पोषन सब मिल करना ॥ सात्वकी चाल मुक्त नर नारी । रज तम भौ सब भ्रम संसारी ॥ भक्षित भाव गलतान लिय नामा । परनारी द्रव्य अपंथ कर कामा ॥ कच्छ मच्छ सकलो जिवजंता । सब जिव परा क्षमा शुभ संता ॥ तीर्थ व्रत तप त्रिगुण जोगा । बनोवास अधर्म तज भोगा ॥ भोग सात्वकी भजन सतनामा । इच्छा दशा समर्थ निहकामा ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण पुलकित होय वाणी । सत्य कबीर तुमहिं सुख खानी ॥ हम सब कहैं तुम दीन्ह बढाई । आप दास होय सेवा लाई ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर बडेकी रीती । सब जिव पोषव सबसे प्रीती ॥
त्रिगुणका प्रभाववर्णन
१४८
कबीरकृष्णगीता ।
बमन दीनता लघुता माती । पतिव्रता सब लाब तेहि क्रांती ॥ सद्गुरु नाम कबीर अटोटा । कबीर कंथ भज कछु नहिं टोटा ॥ विष्णुवचन ।
कहे कृष्ण अज हर शुक्र व्यासा । अब सद्गुरु कहिय तथासा ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर तमगुणके लक्षण । दरिद्री भिखारी क्रोध यत तिक्ष्ण मारन मरन राते षट् उरमा । सत्य नाम भजे सो जिवघरमा ॥ सत्यनाम सो अम्बर काया । जगमग जीत सो अंस सुहाया ॥ अमरलोक सो अटल रहाहीं । जीव दया वद जग प्रगटाहीं ॥ असुरहिं साथ चतुर सुख साखा । रज तम भक्त असुर जग लाखा सुगुप्त मोह बस तक्षक भासा । राक्षसी भोजन पेत पिशाचा ॥ विष्णु भक्तके दोह कराहीं । शिव जोगी सिष साथे नाहीं ॥ और कहे शिव जोगी सिध्या । कलयुगद्विज मिल शिव शिष्यगिधा मीन मास मद भष गिद्ध भाना । मीन मास मद है अब खाना ॥ चोरी और करहिं बटपारी । झूठा लंपट चुगल जुवारी ॥ षट् उर मास रसके संगी । रज तम शिष कुपंथ अभंगी ॥ छीन सतगुण रज तम बहुताई । यहि जीवको ढर विचल न जाई । नहिं विचलहिं सतगुरुजेहिमाहीं । सच चीन्ह रज तम मिन डाहीं ॥ सचहिं दिन २ बाढ सवाई । गुरु साथ विमुख यम खाई ॥ दिना चार कलि श्रेष्ठ मलेच्छा । झष भखहिं गौ भखहिं अभक्षा ॥ जहँ लग अवगुण रज तम जानो । सतगुण रज तम चाल बखानो ॥ रज तम आधार ते वैष्णव नाहीं । वैष्णव सतकबीर सतगुणमाहीं हमरे दासहिं जो कोइ मनिहै । तेहि सुख होय यम नहिं दहिहै ॥
सत्य भक्ति तथा योग भोगका वर्णन
कबीरकृष्णगीता ।
१४९
एक २ रोम वैष्णव सतोगुण । रज तम देवी पंथहै दुर्जन ॥ यह सब तन वैष्णव तन दूजा । रज तम देवी पंथ अरुझा ॥ जो नहिं संतहि माने भाई । झूठहिं थाप नरकमें जाई ॥ जन्मे घरे सो क्रीतम झूठा । अजर स्वास जिव संतन दूठा ॥ सत्यकबीर अजर अविनाशी । सत्यकबीर जो करे हुलासी ॥ दुलह कबीर अमर सुखरासी । दुलहिन जीव अमरघरवासी ॥ देह धरे भौ जिव चकलागा । खसम विसार जार मन वागा ॥ धगरा मनमत त्रिगुण निरंजन । खसम कबीर काल सिरभंजन ॥ जै जै स्वामी सत्य कबीर । स्तुति करें त्रिय देव सो धीर ॥ तीनों कहे हम तरे तुव दाय। मुक्त परवाना कबीर सिरवाया ॥ अगले हंसन वाट चिन्हाई । सर्व शास्त्र दाय। फरमाई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण यह निश्चय जानी । मुक्ति कबीर चरण लपटानी ॥ कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । सांची भक्ति विना गत खोई ॥ सांच भक्ति गुरु साध विश्वास। भैरों भूत देवी यमफांसा ॥ कहैं कबीर सुन वृषभ सवारी । प्रच्छेहु प्रथम सो लेहु निरवारी ॥ सब योनिन तत गुण क्रीत विवरण । पांचतीन एक मिलनर जोहतन पिंडज चार तत्त नभ त्यागी । और सकल नभहि ते लागी ॥ अबूज तीनते पृथ्वी वाई । उषमज दोय तत्त तेज औवाई ॥ एक तत्त अंकुर दलको थेका । पांच तत्त नर शब्द विवेका ॥ चार खान रचि त्रिगुण अछंगी । एक जीव तनका चित्रभंगी ॥ जोग भोग दोउ रोग समाना । नाम भक्त चहुँ युग निरवाना ॥
विशदका स्वरूप कथन
१५०
कबीरकृष्णगीता ।
पांच तीन बस तन अघखानी । सट्टरु सेव हंस पिल जानी ॥ तन विदेह विन घरको भवन है । पांच तत्त यन कहांसोरंगहै ॥ यथयम कहेउं पंच सैल ततुरंगा । सुन भूलेहु तुम खाहु बहु भंगा ॥ योगी सोहंग तन सिंगी बजावे । सहज आसन तन विभूत रभावे ॥ हटताई दिब्बी अमीगत ठपना । सबे विगाना सट्टरु अपना ॥ चावल प्रीत चेतन दिल दाला । ब्रह्म अगिन कमल परजाला ॥ निरगुण नाम निमक सो सब रस। तेज पात विश्वास सो अदरख ॥ प्रेम सुचित सो घीव जीवन । काया क्षीर यथे कोई गुरुजन ॥ पारस पान प्रसाद चढाये । अमी नीर कबीर पियाये ॥ दया दही गऊ घृत सुच दूधा । खोवा काम क्रोध घर सोधा ॥ गरस प्रसाद विरान सुरत सेवक । शुभ आशिष देहिं गुरुदेवक ॥ अजर अमर घर वर मिल आशिष । पिया रूपरस जगमें अतिसुन ॥ पिष हिय पैठि सेवककेरा । जन्म मरनका करे नवेरा ॥ भया निवेरा सो कस हूवा । पांच पचीस त्रिगुन तन जूवा ॥ अजर अमर अविचल सो काया । अमर लोक सबे सुख पाया ॥ कहैं कबीर छूटेउ सब संसा । तरे इकोतर पिछले वंसा ॥ सट्टरु शरण हाथिगत पुरुषा । खसम कबीरहिं लखेन न सुरखा ॥ कहैं कबीर तन भुवन चतुर्दश । चौदह संग चालक जीव सर्वसा ॥ चौदह संग जब बाहर होई । सत कहे सट्टरु शरण समोई ॥ अजरलोक पगु अधर बखाना । निज पगु अरध चितल परजाना ॥ तीन लोक उरध तेह ताको । लोक तलातल जंघ अस्थापो ॥ लोक माहिं तल इंदुकी वारी । मलस्थान रसातल खारी ॥ कटि पताललोक विस्तारा । सान दीप नभ अधर उचारा ॥
चौदह यमका वर्णन व ग्रंथसमाप्ति
कबीरकृष्णगीता ।
१५१
इंद्र सप्त दीप भुवलोके नाभी स्थानी । नामके वाम दहिने भै जानी ॥ रवर्गलोक हृदय अस्थापी । अमर लोक तन दोउ सुज दापी ॥ कंठ स्थान आहि जनलोक । हे पतलोक खिलोट विसोका ॥ कीतम सत्यलोक नर माथा । आद सतलोक अमरपुर ताका ॥ कुल अंगुष्ठ बुढ़ा पगु पाहीं । नाडि सकल सेस परवाहीं ॥ निज सुख देखहु तीनों लोका । रसना उर्ध सरम पंथ मोका ॥ रसना मृत्युलोक कोई थिर नाहीं । जिदा जग प्रगट रहाकोइ न माहीं रसना अरध पतालके सो साता । अष्ट घात पिंजरा जिवराता ॥ निराकार प्रबल मंजारा । सत्यनाम विन तेहि दै मारा ॥ अष्टंगी मंजारी खोटी । तीन लोक जिव खायसि घोटी ॥ कहै कबीर जिन सुमरो मोही । यम सिर भंजन बचायेउ बोही ॥ चौदह यम तन जीवहि घेरा । चौदह यमका करो निवेरा ॥ प्रथमहि धर्म करे यम घाता । धर्मराय यम इस मन माता ॥ दुतिय काम त्रितय यम कोधा । चौथे लोभ पंचये भ्रम सोधा ॥ छठयै यम लक्ष बुध विकारा । सतयै परधन हर सत हारा ॥ अठयै अहंकार नौमै मोहा । दसयै दस इंद्दी सुख जोहा ॥ इकादसे आप तन पोषा । अश्यागत तज खाय न मोषा ॥ द्वादसयै लेय विश्वास घाती । त्रियदस तृष्णा लोभ जमाती ॥ चतुर्दश चिंता तन बन आगी । चिंताहि डाह कोई वैरागी ॥ चिंता सोइ जो सट्टर सेवा । सट्टर सब देवनकर देवा ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण निरने निरवारा । सत्यकबीर औ तारनहारा ॥ हम सब मगन कबीरके पाछे । हमार निवाह कबीरकृत आछे ॥
१५२
कबीरकृष्णगीता ।
चारों युग कबीर मोहि रासा । कहैं कृष्ण व्यास सत भाषा ॥ पूछहिं तारा अकाश घर स्वामी । कहैं सदुरु नखत निधायी ॥ केतिक तारा आहिं अकाश । कौन वरण तारागण भाषा ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर तारा यम रोवा । प्रबल निरंजन यम जिव हुवा ॥ उतरो याही यमकी काया । दिये छिटकाय रैन नम याया ॥ होत प्रात फिर सुन्य समाई । सात तबकके पार सो जाई ॥ सुन्य समाय रहा धर ध्याना । दिन गत बहुरि रैन प्रगटना ॥ रैन निरंजन दिवस कबीरं । सूर निरंजन शशि सत धीरं ॥ अनंत कोट उडगण तनवारा । चौदह योजन गोछ निराकार ॥ गोछ वीर जीवहिं दे सूरि । कबीरके भक्त करे भौभूरी ॥
दोहा-श्रीकृष्ण त्रिय देव मिल, स्तुति कराहिं अपार ।
सुखदेव व्यास सब विनवहीं, जै जै कबीर विचार ॥
कबीर काल सिर भंजन, और मुक्त देहिं जीव ।
विष्णु व्यास सत कहत हैं, सत्यकबीर निज पीव ।
इति श्रीकबीरकृष्णगीता समाप्ता ।
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