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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ८२ )

बोधसागर

कामिनि कनक कलाकी फंदा । अरपै दुनौ शीश मनमंदा ॥
कामिनि अरपै कनक चुरावै । इहि विधि हंसलोकनहिंआवै ॥
कनक अरपि कुलभावदिसावै । वाजी दिखाइके कलाछिपावै ॥
कामिनि कनक करै सम तूला । पावै शब्द मुक्तिकर मूला ॥
चाल विना लागै बडि वारा । तामैं नहि है दोष हमारा ॥
चाल चलै कुलदशा मिटावै । भक्तिसार धरि लोक सिधावै ॥
कथनी कथै करनी नहिं जाने । ताते अवगुण सबै बखानै ॥
कथनी कथै लोक नहिं जाई । भात कहै नहिं भूख बुझाई ॥
पानी कहै प्यास नहिं जाई । कथनी कथै पाछे पछताई ॥
कथनी थोथर करनी सारा । कथनी कथि कथि हुये गँवारा ॥
कथनी कथि जो करनी करै । कहैं कबीर सो प्राणी तरे ॥

समय-करनी बोलै पारकी, करपै ले व्यवहार ।

करनी कर शब्दै गहै, उतरे भवजल पार ॥

चौपाई

महा शून्यके भीतर रहई । सत्यलोक की बातें कहई ॥
कहै अर्थ कथ करै विचारा । कहै कबीर सो शिष्य हमारा ॥
कथै आन करै जो आना । सो अब जानहु पशू समाना ॥
जैसा कहै करै पुनि तैसा । हैं हमहीं हमहीं सो ऐसा ॥
करनी करै कहै तब बाता । ताहि मिलै गुरु समरथदाता ॥
कथनी कथै गर्भ होय भारी । बिनु करनी सब यमकीबारी ॥

समय-करनी गर्भ निवारनी, मुक्ति सारथी सोय ।

कथनी कथि करनी करै, तो मुक्ताहल होय ॥

चौपाई

इहि विधि गहै शब्दकी आसा । निश वासर हम ताके पास ॥
अति अधीन करनी कर शूरा । करनी किये मिले गुरुपूग ॥
शूर होय करनी मन लावै । भक्ति करै जगबहुरि न आवै ॥

शवासयुञ्जार

( ८३ )

करनी शूरा कथनी सार । करनी केवल उत्तरे पार ॥
करनी करै शूरमा होई । कादर करनी करै न कोई ॥
शूरा होय तो करनी आवै । कादर होई सो बार लजावै ॥

समय-शूरा सोई सराहिये, अंग ना पहिरे लोह ।

लरै सकल वँद खोलिकै, मेटै तनकर मोह ॥

चौपाई

सदा अधीन रहै तनमाहीं । परिचे शब्द विचारे नाहीं ॥
रहे अधीन सतगुरुके आगे । निश्वासर सेवा चित लागे ॥
जो लगि नहीं अधीनता आवै । तब लगि सत्य शब्द ना पावै ॥

समय-नहीं दीन नहिं दीनता, नहीं सन्त सन्मान ।

ताधर यम डेरा किये, जीवतै भया मसान ॥

चौपाई

सदा अधीन रहै जो प्रानी । दीनेहु ताहि शब्द सहिदानी ॥
कुल अभिमान महानद भारी । भक्ति पन्थगहि ताहि सुधारी ॥
शब्द लेह कुलदशा न तोरे । तेहि यम विषम सरोवर बोरे ॥
भक्ति करै कुल कानि न खोवै । आवागोन गर्भ सुख गोवै ॥
जननी बेटी भैनी बाला । बहिन भयए ततक्षण काला ॥
इन्हते होइहि भक्तिकी हानी । लाज नदी महाँ बोरे आनी ॥
कुलकी राह बहारै लोही । कुलना तयारी छुती बिगोई ॥

समय-कुलकरनीके कारणे, हंसा गये बिगोय ।

तब काको कुल लाज है, जब चला चलाको होय ॥

चौपाई

कामिनि कनक कालकी खानी । काल कला धरि बोलै बानी ॥
इनते होय भक्ति कर नाशा । ताते बहुरि गर्भ महाँ बासा ॥
परदा प्रकट जबै ना होई । बोलै वचन मधुर धुन सोई ॥

( ८४ )

बोधसागर

परदै रहै लाजकी बैधी । परदा साथ कालकी सँधी ॥
गुरुसों कपट करी धन लीनी । सुरति निरति विनुकाल अधीनी ॥
कामिनी परदा सति सो ठानै । लाज लिये मुख बात न आनै ॥
गुरुके परदा बांचै नाही । बूढै विषम सरोवर माहीं ॥
गुरुसम मात पिता सो नाही । गुरु विन बूढि सरोवर माहीं ॥
गुरुसम मात पिता नहिं होई । मात पिता गुरु जानहु सोई ॥
समय-जे कामिनि परदै रहै, गुरुमुख सुनै न बात ।
ते कामिनि कुतिया भई, फिरै उधारै गात ॥

चौपाई

लोकलाज पति सबै बिचारा । लक्षण लक्ष्य सबै निरधारा ॥
जाको होई भक्तिकी आसा । सतगुरु चरण करै विसवासा ॥
तजै गर्भ जो निकसी आसा । पावै सतगुरु चरण निवासा ॥
यमको अन्त जानि जो पावै । भवसागर तब साधु कहावै ॥
सतगुरु चरण गहै चित जानी । मेट कुटिल कर्मकी खानी ॥
सन्त कहावै अन्त सम्झारी । चौदह काल चरण चित धारी ॥
चौदह यमकर सकल पसारा । सतगुरु शरण होई निरुयोरा ॥
चौरासी कर करम अपारा । विनु सतगुरु का करै उबारा ॥
गुरु करता गुरुदेव नरेशा । विनु गुरुगम सब भेद अनेशा ॥
गुरुसे दूसर और न कोई । जाते मुक्ति पदार्थ होई ॥

समय-गुरुकरता कर मानिये, रहिए शब्द सभाय ।

दर्शन कीजे बन्दगी, सुनै सुरति लगाय ॥

चौपाई

आगे मिलै बन्दगी कीजै । पाछे चरण कमल चित दीजै ॥
शब्द सुरति मिलि रहे समाई । ताप तपै नहिं सुरति समाई ॥
एकै देह एक अस्थूला । एकै भाव भक्ति कर मूला ॥

शवासुखार

( ८५ )

शिष्यके हिरदैं गुरुके वासा । शिष्य रहैं गुरुचरण निवासा ॥
गुरु शिष्यसों अन्तर नाहीं । मन है एक देह दुइ ताहीं ॥
शब्द स्वरूप गुरुकर वासा । सुरति स्वरूपशिष्यकीआसा ॥
समय-गुरु समाना शिष्य महँ, शिष्य लियाकरि नेह ।
विलगाये विलगैं नहीं, एक प्राण दुइ देह ॥

चौपाई

ताहिं गुरुसों सत्य जो कीजे । बाहर अंतैं चित्त ना दीजै ॥
जो गुरु शिष्य हृदय नहिं होई । तासों सत्य करै नहिं कोई ॥
गुरु बाहर शिष्य भीतर आवै । दुविधा धोखा काल तेहि लावै ॥
सत्य होय सो सत्यहिं जानै । गुरुकहँ राखि हृदयमहँ आने ॥
गुरु हृदये सो बसै निनारा । सत्य करत जाईं यमद्वारा ॥
गुरु शिष्यसों बाहर बसई । सत्य करत काल तेहि डसई ॥
गुरुकी मति अंतैं रहैं वासा । शिष्यकी मती गुरुके पास ॥
ऐसे गुरुसों सत्यजो करहीं । सेवा करत काल तेहि धरहीं ॥
शिष्य सयान गुरु अज्ञानी । धोखैं होइ दुनोंकी हानी ॥
गुरु शिष्यकी मति एकैं होई । सत्य करै तारै कुल दोई ॥
गुरुकी मति जो शिष्य न पावै । काज विसार चिंता मन लावै ॥
गुरुको भेद लखैं नहिं बानी । सत्य करै कुमती अज्ञानी ॥
नवका ऊपर बहुजीव चढावै । खेवा बिना पार नहिं पावै ॥
खेवनहार चीन्हि जब लेही । पाछै पाँव नउका पर देही ॥
खेवन हार चीन्हि नहिं पावै । नउका चढै सो मूर्ख कहावै ॥
सागर सुमति मुक्तिकी धारा । ममती न्याव ज्ञान कडहारा ॥
करै विवेक चोर औ साहू । बिना विवेक घाटलागुनकाहू ॥
चोर जानिके पाँव न देई । साधु जानिके पारहु जेई ॥
चोर साहूकर भाव बतावा । सागर नाव धार दिखलावा ॥

( ८६ )

बोधसागर

चोरके नाव चढ़ै जो कोई । सागर पार कबहुँ नहिं होई ॥
साहुकी नाव होइ असवारा । सागर उतरत लाग न वारा ॥
सागर पार मुक्ति कर वासा । जो गुरु मिलैतो करै निवासा ॥
घर घर गुरु घरहि घर चेला । लालच बाँचै फिरै अकेला ॥
जैसे श्वान कामबश धावै । तृष्णा बाँधै अंग लगावै ॥
तृष्णा मिटै गांठि जुरि जाई । पाछै शीश धुनि पछितार्ई ॥
एहि बिधि होइ दुवोजग भूटा । काल कलाधरि गहै न खूटा ॥
ऐसी सत्य करै जो कोई । धोखे जाय काल बसि होई ॥
गुरुकी करनी शिष्य जो पावै । तब सत्य करै सत्यलोक सिधवै ॥
समय-सत्य तो तासों कीजिये, जहवां मन पतियाय ।
ठाँव ठाँवकी सतीसों, कुलकलंक चढ़ि जाय ॥

चौपाई

अंकके मिटत कलंक मिटि जाई । अंकके रहत अकलंक न जाई ॥
अंक लिखा यम एहतन माहा । अंक मिटाइ देहु तेहि माहा ॥
नख शिख अंक लिखा यमराई । चौदह कला थाना बैठाई ॥
गुरुगमि शब्द जानि जो पावै । तब चौदह यमफन्द मिटावै ॥
एहि फन्दै सुर नर मुनि भूलै । देह धरी धरि सब जग झूलै ॥
चौदह काल विकार अन्याई । नर नारी घट रहै समाई ॥
भिन्न भिन्नके न्याय विलोवै । पारस निहार अन्तमुख गोवै ॥
प्रथम काल कामके अंगा । नख शिर व्यापै विषै भुजंगा ॥
चित्तभंग औ कुल व्यवहारा । लाज सनेह सकुच बटपारा ॥
आलस निद्रा रूप बरियारा । लालच लोभ मोह कर धारा ॥
विषय वास बसै बेकारा । इन्द्र चौदह मिलि भक्ति उजारा ॥
भक्ति प्रतीत शितल इन्हनासी । प्रेम बिगारि लगावहि फासी ॥
दया धीरज संतोष न आवै । सुमति सहज लै दूरि बहावै ॥

शवासगुञ्जार

( ८७ )

निर्भय ज्ञान विवेक गरासै । सुरति निरतिलै उपजत फाँसे ॥
सो सतगुरु जो होय सयाना । निर्भय लगन देह तिहि पाना ॥
निर्भय दशा सूर समुझावै । कूर कपट और भर्म बहावै ॥
निर्भय होइ भय तिलुका टूटा । नरनारी गुरु यमसों छूटा ॥
लगन सनेह गहै सहिदानी । उत्पति प्रलय विचारै खानी ॥
आदि अन्तकी लगन विचारै । सत्य दिशा धरि हंस उबारे ॥
चन्द सूर्य की गहै निशानी । आदि अन्त गुरुभेद बखानी ॥
चंद सनेह लेह औतारा । सोइ लगन गहि उत्तरै पारा ॥
ताहि चन्दकी नाकी पावै । सौ पाँजी गहि लोक सिधावै ॥
सूर सनेह विषम जम जोरी । प्रलय काल चौरासी डोरी ॥
सूर्य सनेह होइ सन्धारा । मारिके बहुरि लेह औतारा ॥
जत उपजै तत विनशै प्रानी । सूर्य सनेह सबनकी हानी ॥
चाँद सूर्य दोय गढके राजा । पौरि पगार बनौ दरवाजा ॥
अहुँठ हाथ गढ भीतर साजा । कपटभाव माया उपराजा ॥
दुइ दरवाजै बानो किवारा । एकपट रहै एक खुलै किवारा ॥
दोइ लगनकी राह संवारी । आवत जात लखै वैपारी ॥
आवत एक राह चलि आवै । फिर तेहि राह जान नहि पावै ॥
जौनी राह महलमहँ आवै । तहाँ स्वाति मुक्ता बरषावै ॥
तहाँ स्वाति मुक्ता बरषावै । फिर तेहि राय जाय जो खावै ॥
मुक्ता होय जग बहुरि न आवै । देवरूप होय जय जय पावै ॥
जब आवै तब खुलै किवारी । जात समय फिर मारत तारी ॥
जब वह द्वार जान नहि पावै । तारी मारि बहुरि तहाँ धावै ॥
जाने बिना होय मतिहीना । भूलि परै होय काल अधीना ॥
आवत जौन तुरे चढि आवै । सोइ तुरे यम फेरि छिपावै ॥
आने तुरे आन सो द्वारा । ताते पैर कालके धारा ॥

( ८८ )

बोधसागर

भूलै आदि तुरौ अस्थाना । ताते काल देहि बँधि खाना ॥
जौं वह तुरौ अन्त जीव पावै । खोलि कपाट बाहरको धावै ॥
आदि तुरौ चटि बाहर जाई । पाछै काल रहै खिसि आई ॥
आदि तुरौ विनु द्वार न पावै । बहुरि बहुरि चौरासी आवै ॥
धर्मदास बिनती अनुसारी । सतगुरु हो मैं तुम बलिहारी ॥
आदि अन्त प्रभु कहौ बुझाई । पकर न पावै काल कसाई ॥
अन्त करै पुनि गर्भमें बासा । काया धरे करें रहि बासा ॥
कायाते जब बाहेर जाई । ताकर भेद कहो समुझाई ॥
मैं आधीन हा मतिके थोरा । चरण टेकि प्रभुकरौ निहोरा ॥
आदि अन्त प्रभु कहौ बुझाई । सो सब जानौ चरण समाई ॥
वर्तमान भाषेहु उत्पानी । जानेहु आदि भेद सहिदानी ॥
अन्त अवस्था कहौ बखानी । जाते आगे होय न हानी ॥
जाहि द्वार प्रथमें चलि आवै । तुम प्रसाद शब्द लखि पावै ॥
कर्म अकर्म वरण कुल जाती । कहेउ बुझाय दिवस औराती ॥
कर्म अकर्म भाषहु बहु भावा । थमकर अन्त नजरि सब आवा ॥
कर्मरेख काल लखि राखा । गुरुप्रताप जानी सब शाखा ॥
गुणअवगुण सब कहि समुझायहु । गुरु शिष्यकर भाव बतायहु ॥
सो सब जानि गही सहिदानी । आदिभेद गुरु नाम निशानी ॥
नखशिख काल लिखा सहिदानी । सो सब जानिपरी मोहि बानी ॥
करम रेख काल लिखि दीन्हां । सो हम जानि दृष्टिमहँ लीन्हां ॥
गुण अवगुण दोऊकर भाऊ । परिखे काल करमकर भाऊ ॥
जहाँ २ काल लिखी सहिदानी । तू अदया है सब पहिचानी ॥
नखशिख रेखा काल बनावा । सो जो रेख जानि सब पावा ॥
आदि मध्य भाषहु सहिदानी । सो निशान जानी सब वानी ॥
जो भरि कहेउ सिखावन आनी । सो सब जानिकरौ दिलछानी ॥

श्रासगुप्कार

( ८९ )

कहेहु बुझाय मुक्तिके नाहा । रेखा परखि देहु ताहि वाहा ॥
गुणअवगुणसबमोहिलखिआवा । रेखा परखि तब पंथ चलावा ॥
भाषेहु आदि लक्षकी खानी । सो सब जानि गहो सहिदानी ॥
गुणअवगुणसबमोहिलखिआवा । परखौ लक्ष हंसकर भावा ॥
लक्ष्य अलक्ष्य दोऊ लखि लेहु । पाछै बाँह हंस कहि देहु ॥
नर नारी लक्षण देखि शरीरा । पाछै देहो मुक्तिके बीरा ॥
करपर रेखा लखौ सुभाऊ । शीश हृदय नाभी कर दाऊ ॥
कच्छ जंग औ मीन निशानी । लक्षण परखि चेतावो जानी ॥
चौदह काल विषमंकर दाऊ । शरण सनेह हंस मुक्ताऊ ॥
चौरासी कर बीज अंकुरा । संशय मेटि देहु मतिपूरा ॥
करमी जीवहि सूम पठायहु । निःकर्मा कह लोक पठायहु ॥
यह सब भेद विचारेहु जोरा । दगा देह नहि पावै चोरा ॥
उत्पति भेद सबै मैं पाया । वर्तमान हृदये महाँ आया ॥
चरण टेककी करौ निहोरा । अंत अवस्था भाषहु थोरा ॥
जादिन अंत अवस्था होई । तादिनकी गति कहौ बिलोई ॥
जादिन अंत अवस्था आवै । पाँजी भेद कहौ समुझावै ॥
जाते हंसहि काल न खाई । मुक्ति होइ सतलोकें जाई ॥
जैसे आवा गमन बतायहु । आदिमध्यसबकहि समुझायहु ॥
तैसे कहो अंतकी बानी । जाते न होय जीवकी हानी ॥
धर्मदास मैं तुम्हैं बुझाई । अंत दशाकर भेद बताई ॥
जा दिन हंस देह तजि जाई । ता दिनकी गति कहो बुझाई ॥
सोरह खाई दश दरवाजा । रविशशि संग जीव तहां गाजा ॥
आवा गौन करै दिन राती । गहौ निशान छोडि कुलजाती ॥
धर्मदास कुल जाति गँवावहु । तब तुम शुब्दहि पारख पावहु ॥
शशिके संग गर्भ जीव आवै । जलरंगतत्त्व चढि आनि समावै ॥

( ९० )

बोधसागर

ताहि संग रहै ठहराई । देह सनेह गहै यमराई ॥
काया परचै गहै निशानी । अंतकाल जीव करै न हानी ॥
जादिन अमल कालकी आवै । आगम भेद हंस जो पावै ॥
पावै भेद चित होय सयाना । गुरुते लेह सुधारस पाना ॥
काया परिचय आगम जानै । आदि अंत कह भेद बखानै ॥
प्रथमहि देह हमारी जो देखै । सो परिचय अवधी घट लेखै ॥
अंत देह हम यमकहैं दीन्हों । जानि गहै जीव ताकर चीन्हों ॥
देह हमारी निश दिन देखै । पूरण अटल सुफल तन लेखै ॥
जब देखै विनु शीशकी काया । तब जाने घट काल समाया ॥
छटए मास अवधि नियरावै । हमरि देह यम अछप छिपावै ॥
अपनी देह दिखावै काला । तब जीव जाने काल जंजाला ॥
हमरी देह लै शून्य समावै । अपनी देह प्रकट दिखलावै ॥
यमकी देह शीश विनु होई । तेहि देखत जीव जाइ विगोई ॥
हमरी देह बिमल बिस्तारा । काल देह बहुरंग अपारा ॥
जर्द श्याह औ नील सुरंगा । और रंग बहु कला तरंगा ॥
हमरी देह रंग विनु होई । नखशिख निर्मल देखै सोई ॥
जादिन आदि पुरुष निर्माया । तादिन देह वरण हम पाया ॥
सोइ देह धरि इहवों आए । कला अनंत जीव समुझाए ॥
देह धरे बहु लीला कीन्हों । ताते देह कालकर चीन्हों ॥
कालकला विष बान बनाया । सोइ विष नीर विषै दिखलाया ॥
जब हम चले पुरुषके पास । काया रही अघरही बासा ॥
काया त्यजी हम भए निनारा । सोई काया रही संसारा ॥
कायाकाल लीन्ह सहिदानी । अपने देश बसायसि आनी ॥
सो काया सबही दिखलाया । जो देखे सो थीर रहाया ॥
सो काया जो अघरहि देखै । शशि संपति सुखबिभौबिशेखै ॥

श्वसगुआर

( ९१ )

ता काया की यह सहिदानी । सो काया मम हाथ विकानी ॥
ऐसा काल भया अज्ञानी । हमसे लीन्हि सन्देह निसानी ॥
नरकी देह कालके हाथा । झाँई चले ताहिके साथा ॥
काया सरी गली इहाँ जाई । झाँई जानि गहै यमराई ॥
गहै काल औ लेखा लेई । धोखा लाइ नरक मई देई ॥
तेकाया कर करै विचारा । तीन लोक तजिहोए निन्यारा ॥
सहज सुन मह पकरै काला । झाँई साथ करै जझाला ॥
काया धरिके लज्जित कीन्हों । तेहि कायाकर माँगै चीन्हों ॥
देह धरे कीहिसि अति चारा । झाँई साथ जाए नहिं पारा ॥
सो झाँई जो इहइ बिबेखे । कंठ ध्यान धरिहम कह देखे ॥
अखंड मंडील मह काया रहई । ताकर भेद जानके गहई ॥
एह काया तजि ईहई वासा । झाँई तजी होयलोक निवासा ॥
सत्य शब्द जानै जो कोई । ताको आवा गौन न होई ॥
शब्द शब्द जो जीव न पावै । झाँइ साथ गर्भ फिरि आवै ॥
आवा गौन लखै सहिदानी । आदि अंतकी बूझे बानी ॥
गुण अवगुण झाँईके संगा । ताते काल करै मतिभंगा ॥
झाँई झमकि दिखावै गाता । आदि अंतकी बूझे वाता ॥
हमरी कयोंकर ध्यान लगावै । देखत ताहि परम सुख पावै ॥
जब वह काया काल चुरावै । काया परिचय आगम पावै ॥
काया परिचय भेद विचारै । नाम सुमिरिके हंस उबारै ॥
अंग अंगकी परिचय देखै । आगम जानि हरषितमन लेखै ॥
हर्षित रहै सदा दिलमाहीं । शोक मोह कछु व्यापै नाहीं ॥
कर औ शीश जानिके भावा । मास बरष कर आगमपावा ॥
आगम जानि गहै सहिदानी । बोलै सत्य शब्दकी बानी ॥
आगम जानि रहे लौ लाई । छूटत देह लोक तब जाई ॥

( ९२ )

बोधसागर

समाधान होइ आगम पावै । ता घट चोर न मूसन आवै ॥
लगन जानि जो पाँजी पावै । तत्त्व सनेह विलोक सिधायै ॥
आगमकी गति काया देखै । पर्वत नाम मंडल हित लेखै ॥
पर्वत पांच नाम अनुमाना । कहौ भेद सुन संत सुजाना ॥
पाँचौ पर्वत नजरि समावै । काया भेद नजरि तब आवै ॥
रवि लीला एक पर्वत भारी । चंद उनेह दूसर अधिकारी ॥
दुइके बीच सुमेर अनुमाना । देखत ताहि हंस निर्बाना ॥
चौथे मलय गिरि कैलासा । गोमत नाम पँचए परकासा ॥
पाँचौ पर्वत देखै सोई । गुरुगमि बुद्धि जाहि तन होई ॥
जब देखै तब कुशल शरीरा । विन देखै जानै तन पीरा ॥
रवि गिरि जादिन नजरेनआवै । तेजहि तन ना कष्ट जनावै ॥
चन्द्र शिखर जादिन नहि देखै । द्रव्यशोक कछु हानि विवेखै ॥
जादिन कैलास नजरेनहि आवै । मित्र हानि दुख खबरिजनावै ॥
गोमत पहार नजरि नहि आवै । काया कष्ट देश दुख पावै ॥
गिरि सुमेर जादिनहीं देखै । अन्तकाल तन घाव विशेषै ॥
रसना कान नजरि नहि आवै । मास सातमहँ काल चलावै ॥
जाकी रसना चूमक वासा । सो नहि देखै सदा निवासा ॥
पर्वत धवला नजरि नहि आवै । मास एक महँ मृत्यु जनावै ॥
तादिन काल चौकीअग आवै । ध्रुवमंडल नजरै नहि आवै ॥
सो सतगुरु जो होय सयाना । जैमुन जानि देह तेहि पाना ॥
जबतै काया आगम नहि पावै । तबतै अमी बीज नहि पावै ॥
काम बसी पावे जो ताही । बोरे विषम सरोवर माहीं ॥
काया श्वास चलै पर मेहा । काल वश्य होय छाँडे देहा ॥
पश्चिम लहरी जो गावै जानी । पांजी द्वार लखै सहिदानी ॥
चंद उगे सूर्य अथवै जबही । हंस सुजन तन यागै तबही ॥

शवासगुप्कार

( ९३ )

पूरी तत्त्व होय असवारा । पहुँचे सत्य लोक दरबारा ॥
सिंधु तेज होय तजै शरीरा । चले तेज चौराशी हीरा ॥
उत्पनि लगन देह तजि जाई । संकट गर्भ धरे नहीं आई ॥
अपनी काया आपु बिचारे । आपन आगम आपु सुधारे ॥
औरो आगम कहो बुझाई । जातें अवधि आनकी पाई ॥
गुरु आपु घट परखै जानी । तब पावै शिष्यकी सहिदानी ॥
तन परि आस परै जो प्राणी । तब निरखै ताकी सहिदानी ॥
झाँई झमकि जोत नहीं दरशै । काया कष्ट काल नहीं परशै ॥
गगन अवाज सुने नहीं बानी । कर पल्लवकी लखै निशानी ॥
मधीक जल्लौ दूना करई । पल्लौ सब पुहुमीमें धरई ॥
जेठा पल्लव ऊपर उठावै । तासु लहुरा उठि देखलावै ॥
निपल सहुरा पल्लौ उठि आवै । तासु जेठ वह अटल रहावै ॥
अटल रहै की यह सहिदानी । काया कष्ट होय नहीं हानी ॥
सो पल्लौ पुहुमीते डोले । देह तजै अस आगम बोले ॥
दरश भयावन वदन मलीना । लंपट बोलै काल अधीना ॥
ताही भूत ताहि दिखलावै । महा भयंकर मोट दरसावै ॥
कर पग शीतल सबै शरीरा । माथ तपै औ पायर बीरा ॥
औषध का गुण व्यापै नाही । निश्चय अन्तकाल है ताहीं ॥
नासिका नेह बासा नहीं आवै । थोथरी जिह्वा स्वाद न भावै ॥
हाथ पाँव पुहुमी मँहें मेलै । काँपे मेरु काल सँग खेलै ॥
छिन छिन माथ डुलावे सोई । जानहु अन्त काल पेहि होई ॥
आपन भाव दिखावै जबही । विषम कालाघट व्यापै तबही ॥
स्वपने शीश काटि कोई लेई । श्यामवरण कामिनि रति देई ॥
भइसा गदहा हाथी देखे । नाग श्वान औ भालु विशेषे ॥
झूरी बींद परै निशि सोई । चलै देह तजि सर्वस खोई ॥

नं. १० बोधसागर - ६

( ९४ )

बोधसागर

समय-गगन गरजै बिखुरी ना चमकैँ, तहां दुनो बन्द देईं।
कहैं कबीर दिन पांच सातमें, हंस पयाना लेई ॥

चौपाई

काया परिचय भेद विचारैं । आपु तरे औरन कहैं तारैं ॥
सो सतगुरु जो होय सयाना । श्वासा नेह करै बन्धाना ॥
परिखै लगन तत्त्व निर्वाना । गुण अगुण सब करै बखाना ॥
निश्वासर चले सुरकी धारा । कायाकष्ट होइ अधिकारा ॥
तिथि अनुमान लखै सहिदानी । श्वासा सूर चले बलहानी ॥
बधिकके पहरे आपु उबारैं । चन्द सनेह भेद निरुवारैं ॥
श्वाशा सार गहै सहिदानी । शशिके घर महाँ सूर्य उगानी ॥
जेतिक श्वासा सूर्य उगाई । चन्दाके घर पीवे अघाई ॥
काया कष्टताप मिटि जाई । शील हंस होवै सुखदाई ॥
कालकी अवधि मिटावै जानी । समाधान होइ गहै निशानी ॥
तेज सुनरकी खा अतिचारा । ताते चले चन्द्रकी धारा ॥
महा अनन्द सफल तन होई । काल कला नहिं व्यापै सोई ॥
जब जब काल सतावे आनी । तब तब भेद करे बिल छानी ॥
साधैं लहरि समुद्र सनेही । तबसुख पावै यह जग देही ॥
साधन करै कहैं लौलीना । तत्त्व स्नेह होय नहिं छीना ॥
प्राण आत्माके गुण पावै । जो सतगुरु निज भेद बतावै ॥
परिचय तत्त्व साधना करई । धोखै प्राण न कबहुँ परई ॥
रूखा रूखा करै अहारा । सोई गहिहै भेद विस्तारा ॥
काम क्रोध तजि करै फकीरी । ज्ञान बुधि धारै तत्त्व धीरी ॥
वाद विवाद सबै विसरावे । दुविधा दूसर निकर न आवै ॥
श्वासा सार गहै गुंजारा । जाप जपै सतनाम पियारा ॥
अजपा जाप जपै सुखदाई । आवै न जाय रहै ठहराई ॥

श्वासगुञ्जार

( १५ )

चारि कमलकी परिचय जानै । गहै भेद निज तत्त्व बखानै ॥
फाहा रोपि करै निरुबारा । आदि अन्त सब करै सुधारा ॥
योजन चार करै बन्धाना । आसन मारि रहै निर्वाना ॥
चारि योजन खूटी विस्तारा । रूई फाहा जो करै सुधारा ॥
सुधा रूई नर नाटक माहीं । खूँटी ऊपर रोपै छाहीं ॥
बैठे आसन भूल सुधारी । देखै परिचय श्वास विचारी ॥
चले श्वास रतना गति नेहा । रवि शशि उदय विचारे देहा ॥
फाहा सनमुख बैठि रहावै । निरखे ताहि तत्त्व जब धावै ॥
पांचौ फाहा रोपै जानी । तत्त्व सनेह करै विलछानी ॥
रविके घर होय श्वासा आवै । योजन एक तीन तहां धावै ॥
एक योजन एक एकै विचारा । प्रलय प्रचंड तेजकी धारा ॥
ताहि लगनकी गहै निशानी । कछु सुखउपजैकछु होयहानी ॥
मूलकमल ताकर रहि बासा । तेजपुंज है बुद्धि प्रकाशा ॥
ताहि कमलकी देखे आशा । मूलकमल तब होय प्रकाशा ॥
तासु लगन लै साजहु बीरा । उपजै बुद्धि ज्ञान गंभीरा ॥
ताहि लगनकी पांजी पावै । तेजपंज मह बहुरि न आवै ॥
दूजै योजन तजि प्रकाशा । ताहि तत्त्व की देखै आशा ॥
निर्वृत कमल महाँ ताकर बासा । काया मध्य सुभर रहि बासा ॥
योजन तीन जो है विस्तारा । पृथ्वी तत्त्व जानकी धारा ॥
ताहां बसै पवन बल वीरा । जाहि पवन संग उपजै छीरा ॥
ताके संघ सँवारहु वीरा । निर्मल हंस होय गंभीरा ॥
श्वासा साथ पारस सहिदानी । विन रसनाकी बोले बानी ॥
दुसरी घडी चन्द्र सनेहा । गहो विचार देखिकै देहा ॥
ताकी श्वासा चल चोचण्डा । कहे कबीर मिटै दुखदण्डा ॥
झीनी श्वास होइ गुञ्जारा । चले प्रचंड बासुकी धारा ॥

( ९६ )

बोधसागर

दुई योजन पैज बिचारा । पौनविजय बल तहाँ सुधारा ॥
पुहुप कमलमहँ ताकर वासा । देहमध्य नाभी रहि वासा ॥
जाते होय क्षीर बंधाना । होइ खटाई स्वाद अमाना ॥
पुहुप कमल होइ लगन विचारै । पौन सनेह पान निरुवारै ॥
ताहि तत्त्व श्वासा चढि धावै । सोइ कमल जानि जो पावै ॥
जौन कमल तत्त्वकी धारा । तौन कमल नेव बिस्तारा ॥
जाहि तत्त्व सँग पान पठावै । ताहि कमलमहँ ले पहुँचावै ॥
आन कमलपर जीवकर बासा । आनते पान करै परकासा ॥
आन कमलमहँ पहुँचे याना । धोखे काल करे पछताना ॥
जाहि कमलपर जिवका बासा । तहाँ बयान कर रहु प्रकासा ॥
बालक की जिह्वा रहि बासा । सुभर कमलमहँ करै निवासा ॥
ताही लगन जीवके गहई । पावत पान काल न दहई ॥
संशय कमल देहु जनि पाना । नहिं तौ हंस होय अज्ञाना ॥
उपरहि पान लेइ यमराजा । संकट शिष्य गुरुकह लाजा ॥
सुरति कमल जीवकर बासा । ताहि कमलपर साथहु श्वासा ॥
पूरी तत्त्व चलै जब धारा । योजन चारि जाय चढिपारा ॥
सुरति कमलपर ताकर बासा । तहँवा पान करै परकासा ॥
पालता पौन ताहिके संगा । परसत ताहि होय नहिं भंगा ॥
पवन सजीवक करै अनुमाना । सो हंसहि लै जाय ठिकाना ॥

समय-चारि कमलमहँ चारि पौनहैं, चारिउ कमल अपीव ।

दाज पान सुधारिके, जाहि कमलपर जीव ॥

चतुरंगीकी लच्छ नहिं, तबहि सुधारहु पान ।

द्रादश कमल बिचारि हो, चौकाके अनुमान ॥

चौका चन्दन कीजियो, मलयागिरिको नाम ।

चारों कमल सुधारिकै, मध्य ताहिके धाम ॥

श्वासगुञ्जार

( १७ )

चौका चारि सुधारके, चारि कमल अस्थान ।
चारिउ पौन उरेहिके, देखो सुरति अमान ॥
सुरति सनेही पौन कहैं, सुमिरहु सुरति सुधार ।
चारिउ अंक सुधारिके, जल दल धरेउ सुधार ॥
प्रथमहि चौका कीजिये, चारि खूँट अनुमान ।
चौरासी द्रौप सुधारिहै, सत्य लोक सहिदान ॥
ऊपर पँखुरी द्रौपके, भीतर चौका चारि ।
द्वादशदल निर्वाण है, देखो सुरति बिचारि ॥
माया छत्र विस्तारहु, सती नाम विश्वास ।
द्वादशदल तहाँ सुरचिके, कीएहु प्रेम प्रकाश ॥
जापर बसे निरक्षर, ताहि तत्त्वको नाम ।
शब्दसुधारस खानि है, हम तुम तेहिके धाम ॥
शब्द सुरतिको नाम गहि, सुमिरै शब्द सुधार ।
तब सिंहासन पग धरै, रचै लोक विस्तार ॥

चौपाई

कदली दल आनेहु पनवारा । धरहु नारियर प्रेम सुधारा ॥
सनमुख कलशाले साजेउ जानी । बाती पांच धरेउ तहाँ आनी ॥
आसन लिखेहु लगनको नामा । भर्म्मभूत भाजै तजि धामा ॥
दहिने राखहु दल परवाना । मेटै जहर अभी धरि ध्याना ॥
निर्मल नीरकी देह दुहाई । जहर नीरकी दशा मिटाई ॥
आसन लेई लगनको नामा । लगन सनेह सुधरै धामा ॥
खरचा पांच धरेउ तिहि माहां । प्रकटे सत्य शब्दकी छाहां ॥
बहुबिधि बाससुगन्धमिलायहु । चौकाके दहिने धरवायहु ॥
ताके निकट शिला अस्थाना । रेखा रोपि करेहु बन्धाना ॥
सत्यशब्द ले रखै बनायहु । ताके ऊपर शिला बैठायहु ॥

( १८ )

बोधसागर

शिला ऊपर फिरि अंकसुधारैहु । शुक्तीकी श्वासा तहँ चारेहु ॥
ता ऊपर पुनि धरहु कपूरा । काल अंश होवै सब दूरा ॥
चौकाके बाएँ अस्थाना । आरति थार धरेहु सहिदाना ॥
आद्याके श्वासा सुख मूरी । ताको नाम सुधारहु पूरी ॥
अंक सुधारिके आसन कीन्हैहु । ताके ऊपर थार जु दीन्हैहु ॥
तिसरी श्वास करुणा मैं उचारहु । सुमिरणसारसत्यमुखभाखहु ॥
सुगन्ध सुपारी तापर राखहु ।
चौका कलश मध्य अस्थाना । धरहु मध्य धोती औ पाना ॥
नरियर मिष्ठानमध्यमें राखेहु । धोती पान बचनअभिलाषेहु ॥
इहिविधिकी यह सब विधिपूरा । सुमिरतके हम होव हजूरा ॥
लोक निशान पुरुषजो भाखा । सो हम गुप्त एको नहिं राखा ॥
सब विधि ज्ञान तुम्हें हमदीन्हाँ । अब हम लोक पयाना कीन्हाँ ॥
नारियर है ब्रह्मा कर माथा । सो हम दीन्ह तुम्हारे हाथा ॥
ताके मध्य जीव सहिदानी । मानतताहिकियहु विलछानी ॥
ज्योति कपूर कियेहु प्रसङ्गा । काल अंग परसतहोइ भङ्गा ॥
सतएँ श्वासा ताके सङ्गा । जाते यमकर मिटै तरंगा ॥
जैसी लक्ष्य जीवके पासा । हाथ नारियर नीकसुतासा ॥
कर्मौ जीव कर्मके बांधा । निर्णय भेद न जानहिं अन्धा ॥
अङ्ग छिपाइ करै जिव बोटा । ताकर होय नारियर खोटा ॥
निर्मल हँस होय सुखदाई । मोरत नारियर वास उडाई ॥
निर्मल अंकुर सेतपुर होई । शब्द सनेही प्रीतम सोई ॥
जैसी दशा जीवकी जानी । प्रकट होय जब नरियरभानी ॥
जेते लपट तासुकी काया । सो नरियरमें होय सुभाया ॥
नरियर एक होय जलरंगी । सतगुरु सत्यशब्द परसंगी ॥
पारसते ताकी उत्पानी । हँस दया धीर निकसी खानी ॥

श्वसगुञ्जार

( ११ )

कर्मी एक रोष निर्मावा । निरखत ताहि तत्त्व कर भावा॥
कपट सनेह कर्म सहिदानी । ताकर अङ्गसत्य करै हानी ॥
शब्द विचारि करेहु गुरुआई । पूरी तत्त्व लेहु सङ्ग लाई ॥
जेतिक लक्ष जीवकी काया । तेते पान साथ निर्माया ॥
रेखा गुञ्ज विचारेहु जानी । विषमतिछर करिहैजिम हानी ॥
गुरुकी रेखा जाहि पर होई । छत्र सोहावन पर्शे मिति सोई ॥
गुञ्ज औ छत्र शरन मुक्तायहु । ताहि पानपर अंक चढायहु ॥
सत्य शब्द पारस परसायहु । ॥
पारस मनि है तत्त्व सनेही । तासु लगन लै पान उरेही ॥
पावत पान हंस घर जाही ।
पौन सजीवक जावन नेहा । तत्त्व लगन लै सुरति सनेहा ॥
सत्य नाम मुक्तत सठिहारा । सो सहिदानी पान सुधारा ॥
छत्रके छल होई जेहि पाना । तापर अंक लिखै निर्बाना ॥
जाहि देहु हंसन कह खाहा । पान छत्र मणि दीजै ताहा ॥
निशदिन रहैं जो सुरति समानी । सो दीजै सीखन सहिदानी ॥
धर्मदास तुम जेठे भाई । हम लहुरे कीन्हा अधिकार्ई ॥
तुम्हरी वस्तु तुमहि कहैं दीन्हा । अब हम लोक पयाना कीन्हा ॥
जेते जीव आहि जगमाही । सो सब आवै तुम्हारे बाही ॥
तुम्हरे शिर जीवन कर भारा । आदि अन्तको तुम कडिहारा ॥
तुमरे हाथ जीवकर काजा । काल डसैं तब तुम कहैंलाजा ॥
वंश वयालिस कुलके राजा । ज्ञान गम्य सबै तेहि साजा ॥
उन्हके पास जीव जेते जावैं । सो सब सत्य लोक कह आवैं ॥
बंशके बंश छत्र मनिहारा । सोइ शब्द सुत वंश हमारा ॥
जेहिवां देइ सो लेकर जाई । काल डसैं नहि मोरि दुहाई ॥
बंशके बाँह जीव जत आवैं । यमकी नाक छेदि घर जावैं ॥

( १०० )

बोधसागर

बंश बयालिस राज तुम्हारा । जिन्हसों पन्थ चलै संसारा ॥
कोटिन्ह दगा वंशपर पराई । कहै कबीर नाम बल ताई ॥
नाम कबीर पान है सारा । इहै नाम काल हंस उबारा ॥
नाम कबीर कहो गुरुराई । बावन लाख दगा मिटि जाई ॥
जाहि देहु औ नाम निशानी । हंस उबारि करै राजधानी ॥
वंश समाहि हंस हिया माँही । हंस देहि जीवन कह वाही ॥
अहर्निश नाम हमारो लेई । ताको काल दगा नहि देई ॥
भजनी भजन करे सुकहावै । अमर सनेह समाधि लगावै ॥
शाल दशा धरि हंस उबारै । विषम लहरि भवसागर तारै ॥
वैश बयालिस अँश हमारा । करपग शीश छत्र निआरा ॥
कलावन्त शूद्र सुखदाई । हँसके नायक शरण सहाई ॥
वैशके चरण शीश कुरबानी । अङ्ग अङ्ग हमरी सहिदानी ॥
जाके मस्तक दीन्है हाथा । काल करम नहि ताके साथा ॥
चरण छुए रज अमृत लेई । ताकह काल दगा नहि देई ॥
दया प्रीत सब जानत रहई । काल कर्म सब दूरि खँदे रही ॥
जासों कहै सत्य हित बानी । ताकी काल करे नहि हानी ॥
जौन जीव सत्य पारस पावै । छोड़ै देह लोक सो आवै ॥
सुख सनेहसो पारस पावै । सो निश्चय सुखसागर आवै ॥
देह धरि प्रकटे संसारा । शब्द विदेह हंस रखवारा ॥
जाकह देहि सत्यकर भारा । सोई शब्द सुत वंश हमारा ॥
करनी करै वंशकी चाला । ताको नाहि सतावै काला ॥
करहुँ राज औ पन्थ चलावहु । शब्द सनेह हँस सुकतावहु ॥
राज पाट सौंपो अनुमाना । जम्बुद्वीप छत्र करहि अपारा ॥
आगे चलि है पन्थ विस्तारा । कालकला छल करहि अपारा ॥
तुमरे घर प्रकटीहि अन्याई । हँस दशा धरि पन्थ ननाई ॥

श्वसगुआर

( १०१ )

कपटकी भक्ति करहि विचारा । लाजधाज पाखंड पसारा ॥
ज्ञानदशा धरि पंथ चलैहै । ममता बाँधि जीव भरमैहै ॥
तहाँ आपु दृढ़ राखहु ज्ञाना । कालकिकला होय पिंसि माना ॥
बाहर काल चतुराइ भखीही । सदा अमान सुक्ति ते रखीही ॥
सत्य दुहाई फिरिहैं जहाँ । टिकै न कील कलाकी तहाँ ॥
जो जिव शब्द हमार न मानी । सो जाने वो है यमकी खानी ॥
आन मेटि दुविधा फैलइहै । सो जिव सपनेहु मोहि न पड़है ॥
शब्दकी शरण गहहि लौलाई । निर्मल हंस होइ सुखदाई ॥
काल कला धरि प्रकटहि आई । विरलै हंस रहै ठहराई ॥
काल कला मुख भापहि जबही । छुटिहैं चित्त हंसन कर तबही ॥
भापहि ज्ञानदृष्टि व्यवहारा । सुरति डोलाई करै अतिचारा ॥
कालपंथ महाँ प्रकटिहि आई । ज्ञानमेटि भापहि चतुराई ॥
शब्द वंशकी निंदा करि हैं । ममता बाँधि कालमुख परि हैं ॥
आप थापी वंश उठै हैं । शब्द मेटि जीवन भरमै हैं ॥
एक परिपच बाँधि हैं सोई । जो नहि हंस हमारी होई ॥
जब परिपच सुनाइहि काला । शब्दन सुमिरै तेहि करै बेहाला ॥
मन बच आश शब्दकी करि है । कालकी चाल चित्तना धरि है ॥
मन वच जानि शब्द कहैं धरि है । निश्चय सत्यलोक सो जैहै ॥
पाषण्डकी गति देहु बहाई । शब्दकी शरण गहै चितलाई ॥
शब्दकी आप शब्द लौ लाई । शब्द छोड़ि नहि आन चलाई ॥
शब्द पाइ करि है अभ्यासा । सुमिरन भजन शब्द विश्वासा ॥
अमर समाधि शब्द अवराधे । अक्षरमांह निरक्षर साधे ॥
पूरी तत्व लखै जो कोई । पूरण ज्ञानगम्य जेहि होई ॥
वंश सदाहि या तत्व समाई । बंद करै तो मोरि दुहाई ॥
बंश दयाते सब मिटि जाई । सुमिरि बंश बयालिस पाई ॥