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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

गरुड़ बोधका संक्षेपसार

बोधसागर

( १०५ )

गरुडबोधका संक्षेप सार

★

प्रायः कबीरपन्थी लोग ऐसे गरुडबोधादि ग्रंथोंके भावको न समझ कर अन्य वैष्णव आदि सम्प्रदाइयोंसे इन्हीं ग्रन्थोंके प्रमाण द्वारा वाद करके परस्पर रागद्वेषमें फँसकर निन्दाके पात्र बनकर, नास्तिकादि नामों के लक्ष्य बने हैं। और जिस प्रकार से इनमें अविद्याका विशेष प्रताप फला है उसी प्रकारसे अन्य सम्प्रदाय वालोंमें भी अज्ञान देवने अपना राज्य जमा रखा है। जिस कारणसे विद्या और ज्ञानका तो उनमें प्रवेश भी होने नहीं पाता। यही कारण है कि, वे भी अपने इष्ट देवके स्वरूपको न समझकर कबीरपंथियों के तर्कको सुनकर उन्हें समझाने या उत्तर देकर उनका समाधान करनेमें असमर्थ होनेके कारण उन्हें नास्तिक और निन्दक आदि नामोंसे पुकारते और उनसे द्वेष करते हैं। किन्तु दोनों दलोंमें जो ज्ञानी और समझदार हैं, आत्मतत्त्वमें जिनका प्रवेश हुआ है जिन्होंने शास्त्र और ग्रन्थों का मनन करके उनके भेदको समझा है, वे न तो किसीके ऊपर बहिरदृष्टि और द्वेष अथवा निन्दा के भाव से तर्कही कर सकते हैं न उनके वाक्यको सुननेवाले ज्ञाता लोग उनमें नास्तिकता ही का अनुमान कर सकते हैं।

कबीर पंथमें जितने ग्रन्थ वर्तमान हैं वे सब अध्यात्म विद्या की पुस्तक हैं। जो कुछ उन ग्रन्थोंमें लिखा है सबका आध्यात्मिक अर्थही ग्रहण करने योग्य है। यदि आध्यात्मिक अर्थको छोड़कर साधारण अर्थ और शब्दार्थको ही ग्रहण किया जाय तो न जाने असम्भावता आदि कितने दोष आकर उपस्थित

( १०६ )

गुरुडबोध

हो जावेंगे । और स्वयम् कबीर साहिबमें ऐसे २ अनर्थका दोष लग सकेगा कि, जिस कलंकको मिटाना कठिन ही नहीं बरन् असम्भव है । इतना ही नहीं ग्रन्थोंमें बात बातमें आध्यात्मिक अर्थ भी बतलाया गया है और जिस ग्रंथकी जैसी प्रक्रिया चली है वैसेही उसका निर्वाह भी किया गया है जो लोग मनन और विचार किये विना केवल शब्दों और पदोंको लेकर लड़ते झगड़ते हैं उन्हें कबीर साहिबके इस मसले पर ध्यान देना चाहिये कि—“कबीरका गाया गावेगा । तीन लोकमें धक्का खावेगा ॥ कबीरका गाया बूझेगा । तीन लोक वहि सूझेगा”—जैसे इसी ग्रन्थमें यदि गुरुडका वही साधारण अर्थ लिया जावे जैसा सर्वसाधारण समझते हैं, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि विष्णु उपासकोंके समक्ष इस पुस्तकको बाँचनेवाला मार खाये विना नहीं रहेगा—किन्तु जब उसी का आध्यात्मिक अर्थ समझेगा और दूसरोंको समझावेगा कि, गुरुड नाम है जीवका, विष्णु नाम है सतोगुणका अर्थात् सतोगुणभावों करके सम्पन्न जो मुमुक्षु है उसको जब ज्ञानी गुरु मिलता है तब उसे त्रिगुण ( रजोगुण ) ( ब्रह्मा ) सतोगुण ( विष्णु ) तमोगुण ( शंकर ) के जाल से निकाल कर त्रिगुणातीत कर देता है—अर्थात् सतपुरुष रूप उसके प्रत्येक आत्माके स्वरूपका ज्ञान करा देता है । तब गुरुड रूप मुमुक्षु तीनों गुणोंको जीत कर शरीर निर्वाह अथवा प्रारब्ध बलसे यावज्जीवन सतोगुणके दिव्य गुणोंको सम्मुख रख कर आनन्दपूर्वक विचरता और दूसरोंको भी अधिकार पूर्वक उपदेश देकर सत्यपदकी पारख बतलाता है । इसी प्रकारसे कबीर पंथके सर्व ग्रन्थोंका आशय आध्यात्मिक है ।

जो इन ग्रंथोंको पढ़कर अपने आत्माके कल्याणार्थ सत्य अर्थको ग्रहण न करके केवल शारीरिक सुख और

बोवसागर

( १०७ )

मनकी तुच्छ तुच्छ वासनाओंको पूर्ण करनेके लिये अपने समझे विना दूसरे जीवों को मिथ्या भ्रम में डालते हैं वे मिथ्या भ्रम को उठाकर पाप के भागी बनते हैं । सद्गुरु की कृपा होगी तो ग्रन्थों को छपवा लेने के पश्चात् सब ग्रन्थों के सारको प्रदर्शित करानेवाला एक स्वतंत्र पुस्तक प्रकाशित करके मिथ्या प्रचलित भ्रम को दूर करनेका प्रयत्न करूँगा ।

इसके प्रथम भोपालबोध आदि ग्रन्थ जो छपे हैं उनका भी भाव आध्यात्मिक समझना चाहिये ।

इति

इति

श्रीबोधसागरान्तर्गत

ग्रन्थ गुरुडबोध

समाप्त

भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-हनुमानबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

श्रीराम

A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Rama, holding a bow and arrow, with a small umbrella-like structure above his head.

श्रीराम

धर्मदास साहबका प्रश्न - हनुमान शब्दका अर्थ और हनुमान बोधका भाव

श्रीमुनीन्दाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

सप्तमस्तरंगः

ग्रन्थ हनुमानबोध

★

अजर ज्ञान करणा यतन, सत्य कबीर जगत्तार ।
तामु चरण बन्दन किये, होवे जगत उधार ।

धर्मदास बचन—चौपाई

धरम दास विनवे करजोरी । तुम समरथ हौ बन्दी छोरी ॥
युगन युगन में तुम चलि आये । आदिअंत की खबर लगाये ॥
एक अनुराग मोरे मन आया । सो प्रभु कटु करि मो पे दाय।॥
हनुमतको कब मिल्यो गुसाई । सो प्रभु मोहि कहिये ससुझाई॥

१ ह इति प्रसिद्धे नु इति वितर्के इस व्युत्पत्तिसे जो मान्य के योग्य होवे, अथवा—“मैं माया तत्कार्य नहीं और वह मेरा नहीं किन्तु मैं तिसका ब्रह्मा हूँ” इस निरव्ययवानका नाम हनुमान है । सो मन इन्द्रियादिक जट परायोंकी अपेक्षा प्रत्येक आत्माही (बैतन्य होनेसे) मान्य करने योग्य है । इससे प्रत्येक आत्माको ही हनुमान कहते हैं, अथवा—

अनादि पक्षके वट वस्तुओंमें जीव ईश्वर दोनों भाई हैं । उनमें राम ईश्वर हैं और लक्ष्मण जीव रूप मुमुक्षु हैं । मानरूप इन्द्रदेवको जीतनेवाला गुप्त ही इन्द्रजीत है । सो गुरुरूप इन्द्रजीतके ज्ञानरूप शक्ति के भारने से मुमुक्षु रूप को मूर्च्छा हुई अर्थात्—आचरण विशिष्ट अज्ञानाशक्त नासाही मूर्च्छा है, तब विशेष विशिष्ट अज्ञानाशक्त रूपमानने शरीररूप पर्यंतसे प्रारम्भ रूप संजीवन बूटी साकर मुमुक्षुरूप लक्ष्मण की मूर्च्छा छुड़ायी अर्थात् निज स्वरूपसे भिन्न सर्व नाम रूप जगत् निष्प्राप्तका नाव निरव्ययरूप बोधिक होना अर्थात् संसारकी प्रतीतिपूर्वक जो जीव मुक्ति सोई मूर्च्छा—

( ११४ )

हनुमानबोध

हनुमत कहिये महा अभिमाना । कैसे लीन साहब सो पाना ॥
कैसे हनुमत सेवा ठानी । कैसे उन बचने सो मानी ॥
यह वृत्तांत कहो तुम ज्ञानी । रामचन्द्र के हनुमत मानी ॥
कैसे तिन हिरदय नाम समाई । सब दया करि तुम कहहु सो साई ॥

कबीर बचन

कहै कबीर सुनु धर्मनि आयी । त्रेता युग महीं हनुमत चित्ताई ॥
सेतुबन्ध रामेश्वर हम गयऊ । तहवाँ पड़ँच हम सुनीन्द्र कहयऊ ॥

साखी-सेतु बन्द में जायके, देखा हनुमत वीर ।

बहुत कला है तासुकी, सबही बजर शरीर ॥

कहत सुनीन्द्र सुनो हनुमाना । तुमको अंगम सुनाऊ ज्ञाना ॥

तुम्हरे मनमें जो अभिमाना । तजि अभिमान सुनहु तुम ज्ञाना ॥

सत्य पुरुष की कथा सुनाऊँ । अगम अपार भेद बतलाऊँ ॥

सत्यसुकृत की कथा यह भाई । जाकर तुम मर्म नहीं पाई ॥

सत्यपुरुष की कथा अपारा । ताकर तुमही करहु विचारा ॥

ताकी गति तुम जानत नाहीं । जो पुरुष पूरण सब माहीं ॥

काहि की सेवा करहु भाई । सो सब मोहि कहो समझाई ॥

रामचन्द्र कहिये औतारा । परलय जाय सो बारम्बारा ॥

साखी-सेवत है तुम कौन को, करो कौन को जाप ।

सो मोको बतलावहु, कौन तुम्हारो बाप ॥

—खुलना है । आशय है कि, हनुमान नाम अज्ञान विशिष्ट किन्तु विवेकको धारण करनेवाले जीव का है ।

अथवा इसी प्रकार से गुरुमुखद्वारा प्रयत्न आशय जाननेके प्रयत्न करनेवाले को ज्ञान पारखी गुप्त उत्तम रीतिसे समझावेगा तब इन प्रश्नों का आशय समझमें आसक्तता है नहीं तो स्वयम् अभिमानमें मरनेवालोंको सत्यका पथ कदापि नहीं मिलता ।

दोहा—बेद उदीध विन गुरु मुख लखे, सागत लीन समान ।

बाबर गुरुमुख द्वार होय, अमृत सो अधिकान ॥

त्रेतामें कबीरसाहबका हनुमानसे मिलना - हनुमानका अपनी बड़ाई करना और मुनीन्द्रजीका समझाना

बोधसागर

( ११५ )

हनुमान वचन-चौपाई

सुनो सुनीन्द्र दृढकरिके बानी । तुम जग महाँ हो बड सुझानी॥
मेरी कला न जगदि छिपानी । तुम मेरी गति नाही जानी ॥
पौरुष पराक्रम बल है मोरा । मोसम और नहीं कोइ जोरा ॥
बावन बीर वसौं जग माहीं । मो सम प्राक्रम कोइ को नाही॥
सब बीरन में मैं सरदारा । मेरी कला सब में अधिकारा ॥
सब जग जाने सब मोहि पूजे । मो सम इष्ट और नहि दूजे ॥
जो चाहो सों कारज सारों । इष्ट करे तो तुरत उबारों ॥
ऐसो प्रसिद्ध जग हम आहीं । सब कोइ जाने तुम जानत नाहीं॥
साखी-सुनो सुनीन्द्र मोरी गति, मोसम और न देव ।
चाहै सो कारज करूँ, दृढ कै साथै सेव ॥

सुनीन्द्र वचन

सुनु हनुमान वीर ते बंका । आपै थापै बजावै डंका ॥
आपा थापे भला न होयी । आपा थापी सब गये विलोयी ॥
समरथ की गति तुम ना पाये । आपा थापि तुम रहे झुलाये ॥
समरथ पुरुष और है कोई । ताकी गति जानै नहि लोई ॥
हनुमान तुम छोड़ों अभिमाना । तो समरथ को भाषों ज्ञाना ॥
समरथ हुकुम चले जग माहीं । तुम उनकी गति जानत नाहीं ॥
बावन वीर कहै हम जानी । कालपुरुष की सब अगुवानी ॥
सब बैरिन को काल धरि खावे । जो सत्यपुरुष को गम नहि पावे ॥
चौसठ योगिन बावन बीरा । काल पुरुष के बसे शरीरा ॥
काल पुरुष सब रचना कीना । बीरन को सरदारी दीना ॥
मारहि मार सबन को करई । यह अपराध कौन शिर परई ॥
काल पुरुष को करम अपारा । कैसे धौं करिहौ निरवारा ॥
सो अब मोहि बताओ भाई । बल पौरुष कछु काम न आई ॥

हनुमानका रामचन्द्रजीको सबके ऊपर मानना (रामनामकी बड़ाई)

( ११६ )

हनुमानबोध

तुम हनुमंत सांच हो बीरा । तुमरे इष्ट अहै रघुवीरा ॥
ताको तुम जो करो बड़ाई । तुम समरथ को गम्य नहिं पाईं ॥
राम काज तुम भले सुधारा । ताके हुकुम लंका तुम जारा ॥
वह जग में कहिये अवतारा । अगम भेद तुम नाहिं विचारा ॥
उनकी लागि रहै सब कोई । जो जस सुमिरें पावे तस सोई ॥
तुम भूले प्रभुता की माहीं । प्रभुता जग में अस्थिर नाहीं ॥
स्थिर घर कोई नहिं जाने । प्रभुता बड़ाई सब मन जाने ॥
जो तुम मानों कहा हमारा । तो तुम पाओ समरथ दर्बारा ॥
सारखी-समरथ गति अति निर्मल, प्रभुता अहै मलीन ।
जिनकी तुम सेवा करो, सोउ न पावैं चीन ॥

हनुमान बचन चौपाई

सुनो सुनीन्द्र बचन हमारा । रघुपति हैं सबके सरदारा ॥
इनही समान कोउ दूसर नाहीं । तीन लोक के साहिब आहीं ॥
उन प्रताप हम जग सत जाना । हमसों कहा कथौ तुम ज्ञाना ॥
रघुपति को हम जानै परचा । हमसों कहा कथौ तुम चरचा ॥
सागर ऊपर पथर तिराया । ऐसा नाम अहै रघुराया ॥
मैं पौरुष बल आपन जातूँ । कहा कोई का नाहीं मानूँ ॥
यती नाम जानै जग मोहीं । सो मैं भाव सुनाऊँ तोहीं ॥
तुम जो पूछी पिता की बात । पिता कहत हूँ औ फिर माता ॥
महादेव देवन सरदारा । जिनको पूजे सकल संसारा ॥
नाहिं बीज की काया मोरी । बजर अंग पायो सब जोरी ॥
गौतम ऋषि की पत्नी नारी । नाम अहिल्या राम उबारी ॥
नाम अंजनी पुत्री ताकी । जनम लियो कूरव में जाकी ॥
साधु रूप धरि शिव बन आये । जहाँ अंजनी को मंडप छाये ॥
प्यास प्यास कहि बोले बानी । शिवकी गति माता नहिं जानी ॥

मुनीन्द्रजीका हनुमानके वचनका खण्डन कर देना

बोधसागर

( ११७ )

कह अंजनी तुम पीयहु पानी । तब शिव बोले और हि बानी ॥
तैं निगुरी हम साधु विचारा । तेरा जल नहिं करौं अहारा ॥
कहै अंजनी गुरु कहैं पाऊँ । जँगल ते मैं उठि कहैं जाऊँ ॥
तब शिव कहै साधु हैं हमही । दीक्षा लेओ देत हम तुम्हही ॥
सिंगी नाद रहैं शिव पासा । फूकयों कान रही तब आशा ॥
छल करि बीज दीन्ह तब डारी । तासों उपजी देह हमारी ॥
कान रहा लीन्हा अवतारा । षत्रन पुत्र जाने संसारा ॥
पिता मात की सब विधि भाकी । कहौ तो और सुनाऊँ साखी ॥
सत्य बात मोरी है भाई । सेवा करौं सदा रघुराई ॥
समरथ और नहीं है कोई । रामचन्द्र बड समरथ होई ॥
समरथ समरथ कहा बखानो । मैं तो समरथ रामको जानो ॥
बहुत कहत हौं बात बनायी । राम नाम तुमहुँ नहिं पायी ॥
जाकी थाप तीन पुर माही । राम समान और को आही ॥
बुद्धि ज्ञान तबही बनि आवे । जो कोइ राम पदार्थ पावे ॥
ज्ञान भक्ति सब लगै नीका । विना राम सब जानो फीका ॥
सुनो सुनीन्दर बात हमारी । सेवो राम सदा सुख कारी ॥
राम विना नाहीं कहुँ जागा । राम नाम मेरा मन लागा ॥
दशरथ घर लीन्हा अवतारा । उनकी गति है अगम अपारा ॥
बडे बडे उन कारज कीन्हा । तुम सुनीन्द्र भेद नहिं चीन्हा ॥

साखी-सुनो सुनीन्द्र मोर गति, रामनाम है आदि ।
सो दशरथ घर औतरे, उनका मता अगादि ॥

सुनीन्द्र वचन-चोपाई

कहे सुनीन्द्र सुनो हनुमाना । साधु भाव गति तुमहुँ न जाना ॥
राम नाम सब जग गोहराई । काहे साधु होय नहिं भाई ॥

( ११८ )

हनुमानबोध

राम नाम हम नीके जाना । तुमका मोसों करो बखाना ॥
रमता राम बसे सब माहीं । ताहि राम तुम जानत नाही ॥
ऐसो राम आहि अवतारा । जिन लंकापति रावन मारा ॥
काल रूप सब करे सँघारा । ताको सुमिरन करै संसारा ॥
घट घट बोले कालकी छाहीं । भेद भाव तुम जानत नाही ॥
यह तो राम अहैं अवतारा । विना राम नाही निस्तारा ॥
परलय तर जिव रहै भुलायी । काल गम्य काहूँ नहि पायी ॥
सुनु हनुमत तुम मानत नाही । काल गह्यो है तुम्हरी बाहीं ॥
ताते तोहि बूझि नहि परई । यह औतार काल सब धरई ॥
बार बार धरि यह औतारा । तीनों पुर को करै सँहारा ॥
काल कला कोइ जाने नाही । सूक्ष्म व्यापि रहै सब माहीं ॥
समरथकी गति कालसों न्यारी । ताको कहा जाने संमारी ॥
जो तुम हेतु करि पूछो मोही । तौ सब भाषि सुनाओं तोही ॥
समरथकी गति अगम अपारा । तुम नहि जानो मर्म विचारा ॥
दृढ प्रतीति करौ तो कहिये । साधु होइ साधूगुण लहिये ॥
समुझा विना को करे विवेखा । विना विवेक सत्य को देखा ॥
विना सत्य उतरे नहि पारा । राम राम कहि करौ पुकारा ॥
एसे कारज होय नहि भाई । कौन भांति ते साधु कहाई ॥
यती नाम जो अहै तुम्हारा । षट सो यती बसे संसारा ॥
कार्तिकभाषम शंकर अरु गोरख । लछिमन महाबली बड पौरख ॥
छोटे तुम हनुमान कहाये । षटमिलिके जग नाम चलाये ॥
सो यती षट सब बसे संसारा । विना सतगुरु सब यमके चारा ॥
कालरूप का सकल पसारा । कैसी विधि करिहौ निरुवारा ॥

१ इन षट यतियों के नामोंमें कई प्रस्थोंमें कई प्रकारसे लिखा है जो ठीक जान पड़े रहने दिया है ।

हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई करना

बोधसागर

( ११९ )

सुनो हनुमंत मेरी बात। सत्य पुरुष है समरथ दाता ॥
ताका तुमसों कहौं संदेश। सुमिरण करो तजो यम भेशा ॥
सत्य समरथ है पैले पारा। काल कला उपज्यो संसारा ॥
सोइ समरथ है सिरजन हारा। तीनों देव न पावैं पारा ॥
साखी-समरथकी गति को लखै, शिव विरंचि नहिं जान ।
काल अकाल तहाँ नहीं, पूरण पद निर्वान ॥

हनुमान वचन-चौपाई

कहत सुनीन्दर अकथ कहानी । काल काल की बोलो बानी ॥
काल काल कहि मोहि डराओ । तुम तो काल कर गति ना पाओ ॥
काल पुरुष आपे वह होई । और काल देखा नहिं कोई ॥
आपुहि करता आपुहि काल। चौदह भुवन आपै रखवाला ॥
कालपुरुष ते और न कोई । निश्चय कै मैं माना सोई ॥
सबका पिता काल है जोई । ताकी गती लखै ना कोई ॥
ज्योति स्वरूप जग उजियाला । ताका नाम धरा तुम काला ॥
जो तुम कहौं सबै हम जानी । सुनो सुनीन्दर मोरी बानी ॥
रचना सकल काल की ठानी । तुम अपने मन हो बड ज्ञानी ॥
काल पुरुष गति परै न जानी । सो हम जानि छानि के पानी ॥
काल पुरुष ते बडा न कोई । उनके ऊपर और न होई ॥
जाको नाम निरञ्जन राया । तीन लोकमें ताकी माया ॥
उनते और नहीं कोई दूजा । तीनलोक में उनकी पूजा ॥
तीनों देव जो उनको ध्यावैं । ते भी उनको पार न पावैं ॥
ताको तुम सूक्ष्म करि जानो । तुम्हरे मन काहे नहिं मानो ॥
इतनी भयी हनुमान मुख बानी । रचना सकल काल की खानी ॥
उनको पार बताओ मोहीं । उठि के शीश नवाऊँ तोहीं ॥
जो तुम आदि अंत सब जानो । तो तुम ज्ञान अब हमसे ठानो ॥

( १२० )

हनुमानबोध

पहिले सुनो हमारी बाता । तुम सुनीन्द्र है बडा ज्ञाता ॥
मोरे पौरुष है बड जोरा । जन्म लेत कीन्हे घनघोरा ॥
जांदिन जन्म भयो महि मोरा । उदय भानु देखि मैं दौरा ॥
सूरज बाहर आवन नहिं दीना । निकसन तुरत लीलि मैं लीन्हा ॥
एक फलांग उर्ध्वचल गयऊँ । सो पौरुष मैं तुमसे कहेऊँ ॥
माता कीन जब बोल अधीना । उनके कहे छाडि हम दीना ॥
सूरज छाडि दीना हम जबहीं । जग प्रकाश भयो पुनि तबहीं ॥
जन्मत की यह कथा सुनाई । कहो तो और सुनाऊँ भाई ॥
राम प्रताप का हम कीन्हा । सो सुनीन्द्र नाहीं तुम चीन्हा ॥
एक समें जो राम बतायी । लंका खबर लाऔ तुम जायी ॥
लंका छोडि पलंका गयऊँ । जाय नगरमें ठाढो भयऊँ ॥
तब तिन कही यह नहिं लंका । पीछे तजि आयेऊ पलंका ॥
कहाँलौ कथा कहौ जो भाई । अपने सुख कहा करौ बडाई ॥
लक्ष्मण मूर्छित गिरे भुई भाई । तब द्रोणागिरि आनि जिवाई ॥
जेहि पै वही सजीवन होती । दैत्यन छली कीन्ही बहु जोती ॥
रातहिं को द्रोणगिरि लाये । रामवीर को तुरत जगाये ॥
यही द्रोणगिरि लेके दौरा । फिरि के धरो जाइ तेहि ठौरा ॥
ऐसे कारज अनेक सर्वाँरे । उनहि प्रताप कार्य उजियारे ॥

साखी-सुनो सुनीन्द्र मोर गति, पौरुष औ बल जोर ।
अपना गुण मैं जानिके, कासों कहां निहोर ॥

१ जब शमदमादिका अन्त्यास करके मुमुक्षु ज्ञान प्राप्त करनेके निकट पहुंचाता है तब यदि प्रारब्ध उसी शरीर तक होती है तब तो आत्मज्ञानको प्राप्त हो जाता है और जीवनमुक्त पद को भोगता है किन्तु यदि वर्तमान शरीरका प्रारब्ध अनेक शरीरका कारण होता है तब वह ज्ञान कुछ समय के लिये छिप जाता है।

२ बीर-भाई । रामवीर अर्थात् लक्ष्मण ।

मुनीन्द्रजीका समरथकी बड़ाई करना और हनुमानका सन्देहमें आकर समरथकी बात पूछना

बोधसागर

( १२१ )

मुनीन्द्र वचन चौपाई

बड हनुमान पौरुष तुव आही । आदि पुरुष तुम जानत नाहीं ॥
समरथ रूप नहीं कोइ जाने । उरली बात सब कोइ बखाने ॥
समरथ गति कोइ नहि जाने । बिनु देखी सो कही को माने ॥
बल पौरुष हम सब विधि जाना । तीन लोकमें सो करत पयाना ॥
तीन लोकमें अमल तुम्हारा । चौथा लोक सतगुरुका न्यारा ॥
तुमतो निरञ्जन निजकर जानी । ताका हुकुम लीन्ह शिर मानी ॥
पुरुष निरञ्जन ते है पारी । समरथ लगी है बास हमारी ॥
तहाँ काहु को बास न होई । वहाँ पहुँचि सकै नहि कोई ॥
यहाँ तुम कार्य करत हो भाई । तुम्हरे इष्ट अहैं रघुराई ॥
सोऊ कला निरञ्जन केरी । सत्य पुरुष गति तुम नहि हेरी ॥
साखी-तीन लोकमें नाम निरञ्जन, जाकी तुम सिफत करी ।
वह कोइ समरथ और है, जिन यह सब मांड धरी ॥

हनुमान वचन चौपाई

सुनो सुनीन्दर दृढ करि ज्ञाना । तब तो भेद भया निरबाना ॥
समरथ को अब भेद बताओ । हम सों नहीं कछु भेद दुराओ ॥

मुनीन्द्र वचन

सुनु हनुमत कहों निज ज्ञाना । तोसों भाषों भेद विधाना ॥
समरथ को अब भेद बताऊँ । तुम सों भेद अब नाहि दुराऊँ ॥
आदि अनादि पार के पारा । ताको अगम्य अब सुनो विचारा ॥
जो प्रतीति होय जिव माहीं । सत्य शब्द समरथ की छाहीं ॥
समरथ शरण बडा है भाई । बल पौरुष सुखसागर पाई ॥
तादिन की यह कथा सुनाऊँ । जो मानो तो कहि समझाऊँ ॥
समुझि करो अपने मन माहीं । वह तो अकथ कहनकी नाहीं ॥
जो कहैं तो कौन पतियायी । देखी सुनि नहि वेदन गार्ई ॥

( १२२ )

हनुमानबोध

हंस गति पाये नहिं कोई । मोर सँदेश माने नहिं सोई ॥
ताते गये विगोइ विगोई । नहिं माने दुख पायो सोई ॥
सत्य शब्द मैं कहौं बखाना । बूझ होय तो बूझो ज्ञाना ॥
सारखी-बूझ करो हनुमत तुम, हौ तुम हंस स्वरूप ।
राम राम कह करत हौ, परै तिमिर के कूप ॥
राम राम तुम कहत हौ, नहिं सो अकथ सरूप ।
वह तो आये जगतमें, भये दशरथ घर भूप ॥
अगम अथाह तुमसों कहौं, सुनि लो अगम विचार ।
उत्पति परलय तहैं नहीं, साहब सिरजन हार ॥

चौपाई

सुनो हनुमत यह कथा नियारी । तब नहिं हती सो आदि कुमारी ॥
जाते भयी सकल विस्तारी । सो नहिं होती रचने हारी ॥
आदि भवानी सो महमाया । ताकी रचना हती न काया ॥
नहीं निरञ्जन की उत्पति कीन्हा । समरथ का घर काहु न चीन्हा ॥
तब नहिं ब्रह्मा विष्णु मद्देशा । अगम ठौर समरथ को देशा ॥
तब नहिं चन्द्र सूर्य औ तारा । तब नहिं अंध कूप उजियारा ॥
तब नहिं सात सुमेरु औ पानी । समरथ की गति काहु न जानी ॥
तब नहिं धरणि पवन आकाशा । तब नहिं सात समुद्र प्रकाशा ॥
पांच तत्त्व तीन गुण नाहीं । नाहीं तहाँ और कछु माहीं ॥
दश दिगपाल लखै नहिं लेखा । गम्य अगम्य काहु नहिं देखा ॥
दशों दिशा इन रचना रंची । वेद पुराण गीता इन बांची ॥
मूल डाल वृक्ष नहिं छाया । उत्पति परलय हती नहिं माया ॥
तब समरथ हते आपु अकेला । धरम माया नहिं मनको मेला ॥
विन सतगुरु को ठौर लखावे । भूली राह कौन समुझावे ॥
सारखी-हनुमत यह सब बूझिकै, करो आपनो काज ।
निर्भय पद को पाइके, होय अभय सो राज ॥

हनुमानका मुनीन्द्रजीसे समरथके देशमें लेजानेपर उसको देख लेने पर विश्वास करनेकी बात कहना

बोधसागर

(१२३)

हनुमान बवन-चौपाई

सुनो सुनीन्द्र वचन हमारा । हम नहिं जानै भेद तुम्हारा ॥
कहौ प्रतीति कौन विधि आवै । कैसेके यह मन पतियावै ॥
यह प्रतीति कौनो विधि आयी । तब हम जानि करब सेवकारी ॥
जहँ समरथ तहाँ हम जावै । तबही हमरा मन पतियावै ॥
उहाँ जाइ इहाँ फिरि आऊँ । तब मैं मन परतीति लगाऊँ ॥
जो तुम सत्य सत्य कहि भाखी । तो मोको दिखलाओ आँखी ॥
करौ प्रतीति गहौं तुव शरणा । बारम्बार बंदौ तुव चरणा ॥
जो गहि तुम दिखावो मोको । तबही झूठ न जानौं तोको ॥

साखी-सुनो सुनीन्द्र मोरि गति, बिन देखे नहिं पति आवैं ॥
आदि सृष्टिकी तुम कहत हो, तहाँ कौन विधि जावैं ॥

मुनीन्द्र बवन-चौपाई

जब ऐसो कह्यो हनुमाना । उठे मुनीन्द्र मनमाहीं जाना ॥
उठते देखा फिरि नहिं देखा । देह विदेह भये अवरेखा ॥
पवन रूप होइ गये अकासा । बैठे पुरुष विदेही पास ॥
चहुँदिशि देखे हनुमत वीरा । कौन सूरतिको भयो शरीरा ॥
गैल महिं चले पगधारी । परम प्राण तहाँ लगी खुमारी ॥
देखत चन्द्र वरण उजियारा । अमृत फलका करे अहारा ॥
असंख्य भानु पुरुष उजियारा । कोटिन भानु रोम छबि भारा ॥
देखा चारों दिशा सब झारी । पता न पाय रहे जब हारी ॥
तब हनुमत हाकँ तहाँ मारी । तुम मुनीन्द्र अहौ सुखकारी ॥
अब प्रगट होइके दर्शन दीजे । तुम्हरी विरह मम हिरदय भीजे ॥

साखी-भये विदेही देहधरि, आये हनुमत पास ।
और वरन अरु भेषही, सत्य पुरुष परकाश ॥

हनुमानका मुनीन्द्रजीसे अपनेको शिष्य कर लेनेकी प्रार्थना करना

( १२४ )

हनुमानबोध

चौपाई

तब हनुमत सत्य कै मानी । सही सुनीन्द्र सत्य हो ज्ञानी ॥
अब तुम पुरुष मोहि दिखाओ । मेरा मन तुमते पतियाओ ॥
अगली कथा कहौ कछु मोही । कौन नाम तुम्हारा होही ॥
कैसी विधि समरथको जाना । सो कछु मोहि सुनाओ ज्ञाना ॥
वचन तुम्हारो है परमाना । कछु अब समरथ कौन अस्थाना ॥
निज गुरुज्ञान आपन सुहिं दीजै । दास आपनो सुहिं करि लीजै ॥
साखी-समरथको अस्थान अब, मोको देहु बताय ।

कौन जगत वह रहत है, सो सुनि कछु समझाय ॥

सुनीन्द्र वचन-चौपाई

करि परतीति मानो हनुमाना । बल पौरुष मोरा तुम जाना ॥
नहिं जानो तो और जनाऊँ । समरथको अस्थान बताऊँ ॥
योगजीत मोरा है नाऊँ । होय ज्ञानी मैं जगमें आऊँ ॥
दोऊ नाम लोक के भाई । देह धारि जग करौ लखाई ॥
तादिन को अब कहौ सँदेशा । जब मैं हतो समरथके देशा ॥
एक बार करि सुनौ हमारी । समरथकी गति कहौ विचारी ॥
पहिले भये निरञ्जन राया । फिरिके ध्यान पुरुष उपजाया ॥
फिरि तब भयी शक्ति भवानी । मेरो नाम धरचो तब ज्ञानी ॥
यह तो कथा बहुत है भारी । तुम अपने मन लेहु विचारी ॥
कछु संक्षेप सुनाओ तोहौं । निश्चय कै जो मानो मोहौं ॥
महामाया समरथ सो आयी । ताको धरम आस्यो जायी ॥
लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । समरथ मोरा करौ उबारा ॥
तब मोकहैं भयो हंकारा । योगजीत तुम करो उबारा ॥
मारो धर्मराय शिर फोरो । महाशक्ति को बन्धन छोरो ॥
महाशक्ति को बन्धन भारो । धर्मराय शिर काट जो डारो ॥
तबही तुरत तहाँ में आया । काटचो माथ कठी महामाया ॥