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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

राजाका कबीर साहबकी आज्ञासे चौका आरती करना

बोधसागर

(८९)

ज्ञानी बचन-चौपाई

भलमत बुझे राय ते मोही । निज गत कहूं बचन हट तोही ॥
तब हम दीन सिखापन राजा । जाते होय जीवका काजा ॥

साखी-चौदा कदली खंभ ले, उत्तम ठौर गडाय ॥

मध्य चैंदवा बांधिये, सिंहासन कनक बनाय ॥

चौपाई

गजमुक्ताहल थाल भराई । चन्दन चूनको चौक पुराई ॥
कंचनके पनवारा करहू । कंचन झारी जल भर धरहू ॥
तीन हजार मँगाये पाना । कंद पसेरी सात प्रमाना ॥
सात पसेरी मिष्टान्न मँगाओ । छतिस नारियल संगहि लाओ ॥
डुइसै एकतिस आनु सुपारी । तितनी खारक कहूं संभारी ॥
एतिक लौंग इलायची धारी । मेवा अष्ट लाओ यहि वारी ॥
मिर्च जायफल आनो भाई । द्राख जावत्री बेगि मँगाई ॥
शकर बदाम कपूर बखाना । सात हाथ बस्तर परवाना ॥
कंचनथाल गजमोती भराओ । मध्य आ ती मानिक धराओ ॥
कंचन कलस धरो बहु भांती । तापर बारो पाँचो बाती ॥
फूल चमेली अगर मगाई । परिमल और सुगंध धराई ॥
नाना पुष्प बताये माला । सब कछु आनि धरे ततकाला ॥
तब हम बैठे सिंहासन जाई । सकल समाज शब्द धुनि गाई ॥
अर्चित नामका चौका कीन्हा । ततक्षण थार हाथमें लीन्हा ॥
ठाढे सकल लोग अनुरागा । शब्द विरह सबहिन मिलि पागा ॥
दिवस कोकिला जिमि आनंदा । सकल हंस तिमि आनैंदकंदा ॥
तब हम बैठे थार धराई । अति आधीन परे सब पाई ॥
जब हम नारियल लीन्हा हाथा । सकल जीव तब भये सनाथा ॥
नरियल मोरि अंसगहि लीना । तितुका तोर परवाना दीना ॥
भय छूटे जप निरभे नामा । सतगुरु नाम भए विशरामा ॥

राजारानीका सत्यलोक जाना

(१०)

अमरसिंह बोध

कालजालते हंस छुडाये । राजा रानी भक्ति मन लाये ॥
सारखी-राजा रानी प्रेमसे, और सकल जिव साथ ॥
नाम पान सबहिन दिये, मस्तक धरिके हाथ ॥

चौपाई

कीन्हा दंडवत् सब बहु भांती । राजा रानि पुत्र औ नाती ॥
पुरेथभाणसा लीनो पाना । रंभा नाम पुरेथनी जाना ॥
तबही दिवान खेमसिंह आये । नर नारी परे गुरुके पाये ॥
आये बखशी लीन्हा पाना । भाव भक्ति मनमाहि समाना ॥
नाम रतनचंद्र कहे कर जोरी । दया करो मम बंधन छोरी ॥
आये चौधरी प्रेमचंद नामा । तन मन अरपी कीन्ह प्रनामा ॥
तबहीं शेष शामजा आये । प्रेमभावसे शीश नवाये ॥
और जीव बहु लीन्हा पाना । सबको चित्त गुरुचरण समाना ॥

छन्द-राजा खडा करे विनती प्रभु दीनबंधु दयाल हो ॥
हंस नायक प्रभू लायक शब्द दीन्हा रसाल हो ॥
जेहि खोज ऋषि मुनि नारद ब्रह्मा हरि हर थक रहे ॥
नहि पार पावत शारदा सोह नाम सतगुरु मोहिं दिये ॥

सोरठा-मोहि अनुग्रह कीन्ह, दास जानि दाया करी ॥
भक्तिदान मोहिं दीन्ह, लेह चलो समरापुरी ॥

ज्ञानी बचन-चौपाई

ज्ञानी कहे सुनो हो राऊ । तुमरी अवध सो सबै रहाऊ ॥
एते दिवस रहो भवसागर । पीछे चलो लोक कहैं नागर ॥

राजा रानी बचन

राजा रानि कहे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥
कठिन दुःख भवसागर मांही । क्षण भर इमपै रहौ न जाही ॥
इकइस लाख जीव तुव शरना । बहुत बरसमें होइ निज मरना ॥

बोधसागर

(११)

जो तुम सतगुरु हंस सहायक । होहु दयाल हंस सुखदायक ॥
अधम उधारन नाम तुम्हारा । अवगुन मोर न करहु विचारा ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी वचन कहे गोहराई । राजा सकल हंसा बुलवाई ॥
सकल हंस सतगुरु संग लागा । इकइस लाख हंस तन त्यागा ॥
पावत पान गये एक ठारा । पहुँचे जाय पुरुष दरबारा ॥
भाव भक्ति भल कीन्ह बनाई । सर्वस अरपि चग्नामृत पाई ॥
काल जालको चिह्न जो पावे । सार शब्दमें सुरति लगावे ॥
मन निरंजन तेज ओंकारा । ये सब चीन्हे काल पसारा ॥
नाभि कमलते सुरति लगावे । मकरतार चढ़ि शब्द समावे ॥
पुरुष दरश पावे जब हंसा । जनम मरणको मेटै संसा ॥
षोडश भानु हंस तेहि रूपा । समझ न परे रंक औ भूपा ॥
एक बरन राजा औ रानी । ताकी भेद सब जाने जानी ॥
पुरुष सज्या हंस तहाँ आये । अमृत भोजन करत अघाये ॥
काया अमर अमरवर पाई । दुःख और द्वंद सबै मिट जाई ॥
एही विधि सकल जीव तहाँ आवा । सबही हंस एक नाम समावा ॥

सोरठा-कहा जीव करनी करे, कहा चलेगा चाल ॥

सतगुरु नाम प्रतापते, कबहुँ न खावे काल ॥

कहन सुननकी है नहीं, देखा देखी नाय ॥

सार सबद जो चिन्ही, सोइ मिलेगा आय ॥

चौपाई

पुरुष हुकुमसे जीव बुलाये । राजा रानी हंस तहाँ आये ॥

हंसन कह तब वचन सुनाये । भाग बडे तुव दर्शन पाये ॥

पुरुष वचन

अहो जीव कस कीन्ह कमाई । हंस सज्जन मोहि कहो सुनाई ॥

(९२)

अमरसिंह बोध

राजा रानी वचन

माथ नवाय कह राजा रानी । बार बार विनती बहु ठानी ॥
करनी चाल हम नहि जाना । परे ते कूपमें अति अज्ञाना ॥
आय जगाये अंध अचेता । सतगुरु शब्दते बांधे हेता ॥
पुरुष हुकुमते ज्ञानी चलि आये । कहो जीव कस करहि कमाये ॥
ज्ञानी वचन कहैं परमाना । इन सम हंस और नहि आना ॥
इनकी डोरी जीव सब आवा । पुरुष सुनी यह आनंद पावा ॥
अंक मिलाई हंस तब लीना । अरध सिंहासन बैठक दीना ॥
सेत छत्र शिर दीन्ह तनाई । सूरज कोटि छबि राजा पाइ ॥
यहिविधि राजा लोक सिधाये । सुनत बोध धर्मनि मन भाये ॥
एक वचनको संशय आई । सो मोहि नाथ कहौं समुझाई ॥
षोडश रवि सब हंस सराई । कैसे रायको दइ अधिकार्ई ॥

कबीर वचन

धर्मदास तोहैं कहि समुझाऊँ । तुमरे मनको धोख मिटाऊँ ॥
राज गुमान उन दिये विसारा । और जीवकी मुक्ति सुधारी ॥
पुरुष रायको पूछ न कीना । निज करनी कर नाम न लीना ॥
अपने मन तजि मान बढाई । ताते पुरुष दया उर आई ॥
धर्मदास सुनो चित लाई । यहिते राजा बढती पाई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कहे युग कर जोरी । दया करी तुम बंदीछोरी ॥
दीनदयाल दयाके सागर । अच्छी कथा सुनाये आगर ॥
साखी-धर्मदास आधीन होइ, विनती करै कर जोर ॥
कथा कही अमरसिंहकी, संशय मिटायो मोर ॥

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे राजा अमरसिंहबोध कथा वर्णनो
नाम द्वितीयस्तरंगः ॥ श्री अमरसिंहबोधः समाप्तः

श्री-बीरसिंहबोध

★

भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्द ( विहारी ) द्वारा संशोधित

हेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन,
बम्बई

1947-1948

1947-1948

1947-1948

1947-1948

1947-1948

1947-1948

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

शिवलिंग

A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Shiva, wearing a crown and holding a trident (trishula). The figure is surrounded by a decorative border.

शिवलिंग

अथ बोधसागर

तृतीयस्तरंगः

बीरसिंहबोध

✽

धर्मदास वचन-चोपाई

धर्मदास पूछे चित लायी । साहब मोहि कहो समझायी ॥
बीरसिंहराय किमि कीनी सेवा । करिके दया कहो गुरुदेवा ॥
बीरसिंहदेव बडा अभिमानी । कैसे साहिब सेवा ठानी ॥
सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करि कहिये बहु नामी ॥

कबीर वचन

धर्मदास भल पूछहु बाता । तुमसे बरनि कहूँ विरुयाता ॥
तन मन धन अरु मोहन लावे । जो जिव हमरे संग सिधावे ॥
आदि अन्त सुरति हम कीना । तबही पग धरतीपर दीना ॥
और दिशा देख्यो हम जायी । पूरब पश्चिम दृष्टि फैलायी ॥
बीरसिंह देव काशीकर राऊ । हम पहुँचि तहाँ कीन गोहराऊ ॥
प्रथमहिं चले भक्तपर गयऊ । सकल संत जहाँ भक्ति करयऊ ॥
नामदेव भक्ति करन मन लावा । सेना धनाजाट तहाँ आवा ॥
राँका बाँक सदन कसाई । पद्मावती दीपक ले आई ॥
चौहटे तान चँदेवा दीना । ठाडे भक्त सब गायन लीना ॥
नामदेव लोटन करे भाई । हाथ ताल रेदास बजाई ॥

नं. ४ कबीरसागर - ४

कबीर साहबका काशीमें जाना और भक्तोंके साथ वार्तालाप करना

(९८)

बीरसिंह बोध

धना मृदंग पट्ट उजियारा । जुरे भक्त सब संत अपारा ॥
धर्मदास तहँवा हम गयऊ । राम राम सबही मिलि कियऊ ॥
तब हम वचन एक कहि लीना । सकल भक्तके हिये मन दीना ॥
नामदेव केहि पुरुषहि ध्याओ । भक्त करतका कर्म तुम लाओ ॥

नामदेव वचन

नामदेव कहे सन्त भुलाओ । दोसर पुरुष कौन ठहराओ ॥
हरि हर ब्रह्म हैं बड देवा । तिनकी करै सकल जग सेवा ॥
वे जगकर्ता सब कछु अहहीं । वेद शास्त्र सब तिनकहँ कहहीं ॥
है प्रभु आदि मध्य अरु अंता । शीश सुडाय जपो केहि संता ॥

कबीर वचन

हरि ब्रह्मा शिव शक्ति उपायी । इनकी उत्पन्न कहहुँ बुझायी ॥
विना भेद सब फूले ज्ञानी । ताते काल बांधि जिव तानी ॥
अजर अमर है देश सुहेला । सो वे कहहिं पंथ हुहेला ॥
ताका मरम भक्त नहि जाना । किरतम कर्तासे मन माना ॥
हम तो अगम देशसे आये । सत्यनाम सौदा हम लाये ॥

साखी-किरतम रस रंग भेदिया, वह तो पुरुष न्यार ॥
तीन लोकके बाहिरें, पुरुष सो रहत निनार ॥

चौपाई

बीरसिंहदेव बचेला राजा । बैठे आय महलके छाजा ॥
राजा नजर सबन पर कीना । सबकी भाव भक्ति चित दीना ॥
गावै भक्त आनन्द व्यवहारा । एक भक्त बेटा सो न्यारा ॥
टोपी एक अनूपम दीने । माथा तिलक कूबरी लीने ॥
स्वेत स्वरूप भगतकी काया । महा आनन्द पुरुष छबि छाया ॥

राजाबीरसिंह वचन

छरीदार राजा हँकरायी । नामदेवको आजु बुलायी ॥

कबीर साहबका वेष स्वरूप देखकर वीरसिंहका कबीर साहबके पास आना

बोधसागर

(११)

छड़ीदार वचन

बेगहिं छड़ीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥

नामदेव वचन

नामदेव पूछे चित लायी । राव संग को और रहायी ॥
छड़ीदार तब वचन सुनावा । कोउ नहिं साथ रायके भावा ॥
नामदेव छड़ी हाथमें लयऊ । चले चले राजापहैं गयऊ ॥
राजा देखि ठाढ उठि भयऊ । कर गहिके आसन बैठयऊ ॥

राजा वचन

राजा कहै सुनौ हो देवा । कहौ कौनकी करत हो सेवा ॥

नामदेव वचन

सांखी-भक्ति करौं गोविंदकी, एक चित ध्यान लगाय ॥

राजावीरसिंह वचन

श्वेत रूप जो भक्त है, सो कस न्यार रहाय ॥

नामदेव वचन

राजा सुनो वचन यक मोरा । हम तुम हरि हर ब्रह्मा दोरा ॥
ताकर भक्ति करे वह हांसी । कहै पुरुष यक और अविनासी ॥
माला मेखली श्याम शरीरा । मिली जुलाहा सत्य कबीरा ॥
किरतन कहे सकल सब देवा । कहे साँछु देख नहिं सेवा ॥
मूर्ति कूटि पाथर का लाई । कारीगर छाती दे पाई ॥
काँसा ताँबा मूर्ति बनावा । तामें कैसे ब्रह्म समावा ॥
ऐसे कहे कबीर जुलाहा । झूठे देवन हमैं मनाहा ॥
वह तो कहे हम पुरुष अभेवा । नहिं कोइ जाने हमरो भेवा ॥
आप अपनपौ बहु विधि थापै । आपै देव सेवक पुनि आपै ॥
भक्ति ज्ञान योग को भेवा । तीरथ व्रत तप अरु सब देवा ॥
सबको काल जाल बतलावे । एकोको नहिं मनमें लावे ॥
हम सन बहु विधि वाद विवादा । नहि माने वह अनहद नादा ॥

राजा वीरसिंह और कबीर साहबकी वार्तालाप

(१००)

बोरसिंह बोध

साखी-जोलहा निंदत सबनको, बन्दत काहू नाहिं ॥
झूठ कहत हरि ब्रह्महीं, कहे निर्गुण एकै आहिं ॥

राजाबीरसिंह वचन

राजा नामदेव कह बानी । अगम ज्ञान वह करत बखानी ॥

नामदेव वचन

कह नामदेव सुनो हो राजा । बहु विधि कहै शब्द को साजा ॥
जो को निर्गुण नामहिं धावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥
राजा छरीदार पठवाई । जाय कबीरहिं आनु बुलाई ॥

राजाबीरसिंह वचन

परम खुशी हमरे मन आवै । जो कोइ निर्गुण नाम सुनावै ॥
अस्तुति वेद करत है जाको । पार न पावत हरि हर ताको ॥
अहिंपति अस्तुति करै जो ताही । कोउ विधि पार न पावत जाही ॥
तेहिकर भजन करै जो कोई । तब विधिसे पूरा है सोई ॥
नाम देव सुनु संत सुजाना । वह निन्दक नहि संत प्रमाना ॥
छडीदार भेजि तुरत बुलवाऊँ । निर्गुण भेद अबहि खुलवाऊँ ॥
रूप संत हृदय मम भावै । शांत रूप वह भजन प्रभावै ॥
देखो अबहीं आवत सोई । सब कहिहै तेहि भावत जोई ॥
छडीदार तुरते चलि आयऊँ । जहंवा हम वहाँ बैठे रहेऊँ ॥

छडीदार वचन

छडीदार तब विन्ती लावा । अहो कबीर तोहि राय बुलावा ॥
विन्ती राय कीन कर जोरी । लावा कबीर वेगि तैं दोरी ॥

कबीर वचन

कहे कबीर वचन अरथाई । केहि कारण मोहि राय बुलाई ॥
ना हम पण्डित ना परधाना । ना ठाकुर चाकर तेहि जाना ॥
ना हम विराना देश बसावैं । ना हम नाटक चेटक लावैं ॥

बोधसागर

(१०१)

पैसा दमरी नाहिं हमारे । केहि कारणे मोहि राय हंकारे ॥
गरज होय तो यहाँ चलि आवै । हम तो बैठे भजन करावै ॥

साखी—छडीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥
महा प्रचण्ड बघेल है, हम नहिं मानत त्रास ॥

चौपाई

छडीदार अति कोधित भयऊ । तुरतहिं चलि रायपहँ गयऊ ॥

छडीदार वचन

छडीदार कहै कर जोरी । महाराज एक विनती मोरी ॥
भक्त न आवै मोर हँकारे । कुछ भयभीरन राखु तुम्हारे ॥
कहैं हमारे कौन है काजा । तृणहि समान गिनत हौं राजा ॥
एता वचन राय सुनि लीन्हा । अगम बात कछु घटमो चीन्हा ॥
वह तो परमपुरुष है सोई । और होय तो आवै कोई ॥
सत्य भाव जाके उर आवे । मान बढाई लोभ सब जावे ॥
निर्गुण भक्ति जोई लवलीना । ताहि न उपजे भाव मलीना ॥
आशा तृष्णा जेहि घट व्यापै । धनवन्ता सो चाह मिलापै ॥
यहतो संत अविकल अविकारी । केहि कारण आवै केहु दुआरी ॥
शोचत राजा मनमें गूने । नामदेव मन रहे अलूने ॥
मान बढाई जो नर पागे । करत खुशामद नृपती आगे ॥
साखी—नामदेव राजा कहे, जुलहा यहाँ न आव ॥
है अभिमानी बहुत सो, बहु अहँकार जनाव ॥

चौपाई

कीन विवेक राय दिल माहीं । नहिं आये कवीर हम जाहीं ॥
वह तो सत्य भक्ति चित दीन्हा । कारण कौन त्रास मम कीन्हा ॥
यहि विधि कीन विवेक विचारा । तबहीं राजा आप सिधारा ॥

१ नामदेवजीने राजाके विचारका भाव नहीं समझा ॥

(१०२)

बीरसिंह बोध

हुकम पाय आय असवारा । गज औ तुरंग सु साज सँवारा ॥
आवत देखा जब हम भाई । तब हम लीला एक बनाई ॥
आसन अधर कीन तेहि वारा । सवा हाथ धरतीसे न्यारा ॥
माला तिलक औ टोप विराजै । हाथ स्वेत कुवरी सो छाजै ॥
नृपति देखि अचरज मन कीन्हा । यह तो पुरुष अगम कछु चीन्हा ॥
कीन अवलोकन जग हम सबहीं । ऐसे पुरुष न देखे कबहीं ॥
धन्य धन्य अस्तुति सब गावैं । धन्य कवीर चरण सब ध्यावैं ॥
राजा चरण पकड़ि दोउ भाई । धन्य धन्य नृप करई बडाई ॥
कहे राय धन भाग हमारा । दर्शन दीन्ह आय करतारा ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-अस्तुति करत नृपति भाषेउ तुम ब्रह्म निर्गुण आप हो ॥
अनाथ नाथ सनाथ करि दिये माथ हाथ अनाथ हो ॥
अपनो दास करि जानि साहब दरश दीनेउ आयकै ॥
कीजै कृपा यहि दासपै चलि भवन दरस दिखायकै ॥
सोरठा-कृपा कीन जस मोहिं, तस मन्दिर पग दीजिये ॥
विनय करौं प्रभु तोहिं, वेगि विलम्ब न कीजिये ॥

कवीर वचन-चोपाई

कहैं कवीर तहाँ नहिं काजा । तुम परचण्ड बघेला राजा ॥
काम क्रोध मद लोभ बडाई । रोम रोम अभिमान समाई ॥
तुरी सवा लक्ष सँग तोरे । लक्ष सवा दो प्यादा दोरे ॥
हस्ती चलत सहस तव संगा । निश्चिदिन भूले कामिनि रंगा ॥
कंचन कलसा महल अटारी । कैसे शब्द गहै नर नारी ॥
हम भिक्षुक जाने संसारा । कौन काज है तहाँ हमारा ॥

राजा बीरसिंह वचन

तुम सतगुरु हो दीन दयाला । करमवश्य हम अहैं विहाला ॥
माया तिमिर नैन पट लागी । दर्शन पाय भये अनुरागी ॥

राजाका रानीसे कबीर साहबको गुरु बनानेकी बात चलाना और रानीका राजाको नीति समझाना

बोधसागर

(१०३)

करो दया अपनो करि लीजै । दास जानि आयसु प्रभु दीजै ॥
दीन जानि मन्दिर पगु धारो । भक्तराज तुम वेगि पधारो ॥
हम हैं पापी अधम अजाना । तव विनु कृपा काल धरि ताना ॥
देह उपदेश प्रभु मोहि बचावो । पाप जालते वेगि छुडाओ ॥
तुमरी कृपा सुनहु हो साहब । अंस विश्वास भवहितरि जायब ॥
अब जनि लावहु बार गुसाई । चलहु कृपा करि हंसन राई ॥

साखी-भक्तराज दाता अहो, कीजै मोह सनाथ ॥

मैं आधीन शरण तुव, चलो हमारे साथ ॥

चोपाई

बहुत अधीन तेहि जब देखा । चलन विचार कीन तब लेखा ॥
ततक्षण राजा हस्ति मँगावा । लै हमहीं तब हस्ती बैठावा ॥
गजते आसन अधरहिं धारा । चले राय तब बजे नगारा ॥
जबै राय मन्दिर लै गयऊ । तबै रानि कहैं तुरत बोलेऊ ॥
मानिक देहरानी चलि आयी । तासे राजा बात सुनाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

हम रानी गुरु कीन कबीरा । आदि ब्रह्म हैं मतिके धीरा ॥
चरण धोय चरणाभूत लीजै । सतगुरु दया करम सब छीजै ॥
तब सो रानी कहैं सुनु बाता । ओढे चीर सुभग निज गाता ॥

रानी मानिकदेवी वचन

राजा विन्ती सुनो हमारा । समुझि बूझि गुरु करो भुवारा ॥
तुम राजा हौ बहुतै ज्ञानी । विनय हमार लेहु सुनि मानी ॥

राजा बीरसिंह वचन

इतना सुनत राय मुसुकाये । रानी ज्ञान कौन बहुराये ॥
तुम हौ नारि भक्ति कहैं मानौ । साहबकी गति नहिं तुम जानौ ॥
कर्ता आप देह धरि लीना । भक्तरूप होय दर्शन दीना ॥

नामदेव आदि भक्तोंका कबीर साहबसे ईर्षा करना और उनका समाधान

(१०४)

बीरसिंह बोध

हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनि सो वार घरे दोय थारा ॥
कंचन थारी झारी पानी । कंचनवटुकी व्यंजन आनी ॥
अधरसु थार भुईं ते न्यारा । महाप्रसाद राय चित धारा ॥
पाय प्रसाद राय जब लीन्हा । हम अरु राय बाहर पगु दीन्हा ॥
एकहि आसन बैठे दोई । नामदेव तब ठाढे होई ॥
नामदेव कह आसन दीन्हा । बहु सन्मान ताहिकर कीना ॥
नामदेव बैठे जब जायी । प्रश्न करन तिन चित तब लाई ॥

नामदेव वचन

कहहु कवीर मोहि समुझाई । कहैं तव गुरु शब्द कित पायी ॥
साहिब कौन सबनके पारा । मोसे कहहु वचन विचारा ॥
साहिब कौन जाहि तुम ध्याओ । कहैवा सुक्ति सुरति कित लाओ ॥
कौन भाँति यमसे जिव बाँचे । भिन्न भिन्न कहहु मोहि साँचे ॥
आप न समझो बोधो राजा । राम विना होय जीव अकाजा ॥
केतो पढे गुने अरु गावै । विनु हरि भक्ति पार नहीं पावै ॥

कवीर वचन

नामदेव भूले तुम जैसे । हमको मति जानहु तुम तैसे ॥
निर्गुण पुरुष आहि यक आना । अस्तुति ताकर वेद बखाना ॥
शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा । और जीव है कौन विचारा ॥
छन्द-नित्य निगम अस्तुति अराघै हारि थके विरंच महेश हो ॥
सबै ऋषिदेव अस्तुति अराधई तेहि गावत सुरपति शेष हो ॥
जेहि गावत नारद शारदादि पार कोई ना लहे ॥
सो भेद सतगुरु गावही कोइ संत ज्ञानी चित गहे ॥
सोरठा-पूजहि हरि हर देव, जड मूर्ति पूजत बहै ॥
निशिदिन लावत सेव, जो रक्षक भक्षक अहै ॥
नामदेव तब सुनत लजाने । नहीं पाये भेद मनहिं पछताने ॥
सुनि लजायके उठि सो गयऊ । राजा तबहिं कहत अस भयऊ ॥

राजाका शिकार खेलने जाना - पानी न मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर साहबका बाग प्रगट करके राजाका सेनासहित प्राण बचाना

बोधसागर

(१०५)

राजा वीरसिंह वचन

तब राजा अस वचन उच्चार । हम सँग साहिब चलो शिकारा ॥
आगे सेना सबही ठाडे । हस्ती घोडा बाहर काटे ॥
आगे चले निशान नगारा । सवा लक्ष सँग चले असवारा ॥
सवा लक्ष द्रव्य प्यादा दौरा । ठाडे भौंट करत बड शोरा ॥
हरनी स्वान लीन सँग चीता । कोइ सचान वाज कर लीता ॥
बहु दल हस्ती लीनी साथा । यहि विधि चले शिकार नरनाथा
भौंतिन भौंति खिलौना लीना । आयसु सकल लोक कहँ दीना ॥
आगे सेन चली सब साजा । हस्ती बैठि चले गुरु राजा ॥

कवीर वचन

जबही राजा चले रिगायी । तब हम तासों बात सुनायी ॥
राजा संग मोहि ले जाओ । जीव एक मारन नहि पाओ ॥
कोटिक यतन करो तुम राजा । जीवन मिलै होय तोहि लाजा ॥

राजा वीरसिंह वचन

तत्क्षण राजा वचन सुनावें । मारन कहौ तोहि जाइ चुकावें ॥
तब हम कहा हमका कहहीं । यह नहि धर्म मनुषकर अहहीं ॥
यह सुनि राजा घोड कुदावा । शेर शिकारी रूप बतावा ॥
एको जीव फन्द ना परई । क्रोध अग्नि घट भूपति जरई ॥
खेलेत रमत दूर होय गयऊ । कितहुँ न भेंट जीवसे भयऊ ॥
फिरत अहेरे परे भुलाई । कतहुँ न ठौर नीर कहँ पाई ॥
विना नीर सो तडपे राजा । व्यापी तृषा बने नहि काजा ॥

साखी-बहुत दूर राजा गये, पीछे फिरे भुआर ॥

कटक सकल सबही फिरे, व्याकुल सबै अपार ॥

ग्रंथकर्ता अथवा परचात् के लेखक महाशयकी बलिहारी है, शिकारके लिये इतनी तैयारी
बतलायी है ।

(१०६)

बीरसिंह बोध

पानी पानी सबहीं गोहरावैं । विनु पानी सबहीं मरि जावैं ॥
राजा कहै देखो सब जायी । बडो धूप जिव गयो ढरायी ॥
बहुत लोग जल दूँढन लागे । बहुतक लोग भाग चले आगे ॥
ठावैं ठावैं सब गये झुलाई । हस्ती घोरा सबहिं नशायी ॥
राजा तब कहन अस लागा । संशय बहुत तेहि मन पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

आज अहेर एको नहिं आवा । एको जीव जन्तु नहिं पावा ॥
पाना कतहुँ न पावा भाई । कैसी कर्ता कीन गुसाई ॥
जो जनितों अस होइहैं बाता । करन अहेर न आइत ताता ॥
सेना हमार प्राण सम प्यारी । सोऊ मरत प्यासकी मारी ॥
अब कहाँ जाइ केहि विधि करिहैं । विना नीर सब इतही मरिहैं ॥
व्याकुलता बहुतै मन बाढी । बहुत करौं सकौं नहिं काढी ॥
तेहि अवसर चर बहुतक आये । खोजिथके नहिं जलकतहुँ पाये ॥

साखी-सेना सकल मरत है, पानि पानि गोहराय ॥
छाँह छाँह सब दूँढहीं, राजा रहे शिर नाय ॥

चौपाई

तेहि अवसर हम कीन विचारा । राय प्रतीति देखों यहि वारा ॥
बीरसिंहदेव बघेला राजा । देइ प्रतीति करों यहि काजा ॥
विना प्रतीति भक्ति नहिं होई । विना भक्ति जिव जाय विगोई ॥
विनु भक्ती गुरु नाहीं भेटे । विनु गुरु संशय नाहीं भेटे ॥
विनु भेटे हिय संशय भाई । काल दयाल कहु को विलगाई ॥
मन परतीति होय जेहि प्रानी । होय तुरत चौरासी हानी ॥
करे प्रतीति नर सो पावैं । पाइ श्रद्धा गुरु शरणहिं जावैं ॥
गुरुके वचन जाहि विश्वासा । फिर नहिं होय नरकमें बासा ॥

बोधसागर

(१०७)

गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥
याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥
सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥
नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥
नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥
नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥

छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥

चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥

खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥

कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥

सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥

बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥

चौपाई

ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥
इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥
तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥
उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥
कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥
यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥
बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥
साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥

१ महल

(१०८)

बीरसिंह बोध

दीवान वचन

राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥
कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥
का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥
जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥

कबीर वचन

तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥
सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥
राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥
चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥
दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥
राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥
सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥
अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥
भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥
ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥
हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥
बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥
पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥
सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥
अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥