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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

आरतीका योगरूपसे वर्णन

ज्ञानसागर

( ११ )

चौपाई

उघरै संपुट गुरु की दाय़ा । नरिअर को देखै परभाया ॥
तत्त मूल नरिअर मो जाना । ज्ञानवंत भजि हो निर्वाना ॥
अनहद बाजै त्रिकुटी ताला । तातैं भक्ति जो होय रिशाला ॥
बिन करताल पखावज बाजे । अनहद धुन निस दिन तहैं गाजै ॥
अष्ट दल कमल फूल जो फूला । तातैं सुमिरन किये समतूला ॥
सुन अति जोग छतीसौ रागा । तातैं भांति भांति पद जागा ॥
जोग करत मैं देह बिसारै । या संसार मैं काज सम्झारै ॥
जोग समाधि छूटत नहिं देखा । आरत से मिटै कर्म विशेषा ॥
प्रतिदिन जो समाधि मन लावै । तातैं सदा आरति गावै ॥
जोग हीन तत्त नहिं लहई । तातैं पान पढोता चहई ॥
देखो मन बहुरंग अपारा । तातैं पुहुप सेत विस्तारा ॥
देह समाधि गंध बहु होई । साथै अग्र प्रबल है सोई ॥
चौका सेत हंस भल छाजै । सेत सिंहासन छत्र विराजै ॥

साखी-परचै मैं मन बांधै, करे जोग मन बास ॥
संतन आरत जोग मन, दीपक करे प्रकाश ॥

चौपाई

मन औ पवन आहिं दो धारा । तातैं पवन अनिल घूत जारा ॥
जोग जुगत बिन संग न होई । पालै पवन पाहन है सोई ॥
गगन बाव गरजै जो जाई । दीप शिखर द्वारै ठहराई ॥
ह्यावै जोग अमीरस चाखा । तातैं महाप्रसाद जो भाखा ॥
धन्य अंकुर जीव है सोई । परिचय जोग करै तन जोई ॥
जोग न होय आरती करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥
मूल नाम और सब शाखा । पुहुप जोग महातम राखा ॥
जोगी दृष्टि भाव बहु करई । घट घटमें सुमिरन अनुसरई ॥

पुनोकी बड़ाई

( ९२ )

ज्ञानसागर

मूल नाम मुक्ति फल जोगा । ताते नरिअर मिष्ठानका भोगा ॥
देह बिसार जोग फल चाखा । मन वच कर्म नरिअर सत भाखा ॥
उज्ज्वल मंदिर सेत सम्हारा । तेहि रूप साज्यो पनवारा ॥
मुक्ति पदारथ अबेधा हीरा । तेहि पाये कोई गहिर गंभीरा ॥
चंदन काष्ठ सिंहासन चाही । सुमिरण नाम इकोतर आही ॥

साखी-उत्तम पान बडो ना, टूटा भंग न होय ॥
नरिअर चहिये निर्मल, महा मुक्ति फल होय ॥

चौपाई

और कछू बात संपत्ति आही । काचा जीव सुन बिचलेताही ॥
ताते सहज बताओ भाऊ । परचै जीवको परम स्वभाऊ ॥
अथवा जो इतना नहिं होई । सहज आरती थापो सोई ॥
सवा सेर आनो मिष्ठाना । सत्त सवासो आनो पाना ॥
प्रति पूनौ जो आरति करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु पूनौ कह अधिकारा । दया करौ दुख भंजन हारा ॥

साहिब कबीर वचन

तुम कह दोन्ह यही दिन पाना । तासौँ पूनौ आरति ठाना ॥
अथवा सबई अर्थ नहि जाना । दोई आरति थाप प्रमाना ॥
छठे मास साजौ निज बीरा । ताते दोई आरती मत धीरा ॥

साखी-जोग आरती फल बड़ा, सत्त वचन परकाश ॥

दुविधा मेटो निश्चय, सत्तलोक होय वास ॥

चौपाई

सत्तभाव देखहु मति धीरां । लगन साखि देख निज बीरा ॥
बिना लगन करो मत शिक्षा । जोती खेती जो भल दिशा ॥
ऊसरू बीज डारही कोई । निःफल खेती किसान की होई ॥

गुरुवाके लक्षण

ज्ञानसागर

( १३ )

ऊसर बीज का ऐसा भाऊ । बोवहि बीज अवृथा जाऊ ॥
काचे जीवकहैं सुमिरत देई । परिचय जीव तात गहि लेई ॥
ता कहैं कैसी करहि जमराजा । देह धरै तो गुरु कहैं लाजा ॥
बिना लगन मगन भयो जानी । ऐसो अहे शिष्य सहिदानी ॥
पूरा जब शिष्य जो होई । गुरु देव भेद बतावै सोई ॥
अथवा जो गुरु अन्तर राख्यौ । गुरुमें धोख सन्त में भाखौ ॥
लीक करी औ पंथ बतावै । शोभा अधिक गुरु सो पावै ॥
जस बाना तस होवै करनी । ता गुरु सम औरन बरनी ॥
सदा लीन नाम जो भाखै । पांच आत्मा अनुरुचि राखै ॥
पांचमें करे पच्चीसों नारी । ते बस किये जोग अधिकारी ॥
मरत तजो जस कांचरी सांपा । तातें सब को मेटव दापा ॥
करो शिष्य जो यहि विधिकोई । पुरइन पान रहैं जनु सोई ॥
साखी-जो ऐसी बनि आवै, और बान है सार ॥
तातें ग्रेही थापो, कडिहारी संसार ॥

गुरुवाके लक्षण चौपाई

आप स्वारथी भेष बनावै । मन की दशा ताहि चित लावै ॥
तृष्णा जुक्त करे गुरुवाई । जम सो बाचै कौन उपाई ॥
निश्चय मानो शब्द हमारा । पर द्रोही कैसा कडिहारा ॥
आप अबूझ औरन समझावै । साखी रमैनी झगरो लावै ॥
जातें साधु सेवा नहिं आवै । तृष्णा कारण भेष बनावै ॥
सिंह न चाहै स्वान सियारा । पैरच बिना कैसे कडिहारा ॥
पर नारी औ मन्मथ कर्मा । यह तो भेद काल को मर्मा ॥
मारहि मनसा होइ सो होई । नातर नारि करे पुनि लोई ॥
ग्रेही माहि भक्ति को भेवा । नाम जपै औ साधू सेवा ॥
जोपै सहज भाव कडिहारा । शिष्य कियेका क्या अधिकारा ॥

( १४ )

ज्ञानसागर

ग्रेही माहि मुक्त फल बासा । सो सब वचन कहौं परकाशा ॥
नाम गहै राखै सत करमा । सब जीव तजै एक पुनि भरमा ॥
साखी-मद रु मांस को त्यागै, और न करै जीव घात ॥
अथवा जो कछु चूकि है, साधु सेव चित राख ॥

चौपाई

करे आरती मन विच करमा । पर घर तजै जान निज भरमा ॥
गृह में जो रहे उदासा । निश्चय सत् लोक में वासा ॥
जो कोई यहै अवज्ञा करई । कछु दिन रूपहीन अनुसरई ॥
जो को चूके साधु की सेवा । ताकर फल भारवों कछु भेवा ॥
जाई सो लोक नाम परतापा । तजै देह जिमि कांचरी सांपा ॥
देखै जाइ हंसन की पांती । ता मध्ये अस बैठ अजाती ॥
जातें चूक परैं सेवकाई । तातें शोभा हीन लजाई ॥
जो कोई याकी करे उछेदा । तातें मैं समझाऊं भेदा ॥
गृही तरे सो कौन विशेषा । गुरु को अचरज यौ बड़ देखा ॥
गुरु नहीं कोई यहि भवसागर । सतगुरु आप अजर मनि आगर ॥
जाप आहि जो नाम हमारा । तातें नाम धरा कडिहारा ॥
कडिहार लेवै जीवका भारा । तेहि न सूझ किमि उतरे पारा ॥
साखी-जैसे महिमा प्रकट है, तैसे सिन्धु का नीर ॥
सरिता सब कडिहार भये, सतगुरु सिन्धु कबीर ॥

चौपाई

सरिता माहि बारि जो होई । जीव जन्तु सुख पावै सोई ॥
सरिता लहै पुण्य परमारथ । सत कडिहारी जोग स्वारथ ॥
अथवा नीर अथाह न होई । सहज जोग भारवों पुनि सोई ॥
भदी में सोह सदा जो बारी । ऐसी उत्पति आहि हमारी ॥
प्यासा जाय नदी के पास । बिन पानी सो जाय पियासा ॥

ज्ञानसागर

( १५ )

प्यासा पानी नदी न पावै । जहैं पानी तहैं तृपा बुझावै ॥
इक जीव ग्रेही आप उवारा । वार नदी नहि सत कडिहारा ॥
बांधे अस्त्र करे शुग्माई । तिन के त्रास सौ दुर्जन डराई ॥
काछे रहै शूर का साजा । आयो समय कादर हो भाजा ॥
यहि विश्वास रहै जो कोई । स्वारथ पिंड परै जन सोई ॥
परै पिंड तब होवै हांसी । दै विश्वास जीव जो फांसी ॥
चतुरा पहिले करै उपाई । द्रव्य न मिले अनते नहि जाई ॥
धन मिले का यही उपाई । ग्रेही भाव रचो जो भाई ॥
क्षुधावंत जाके गृह आवै । भले बुगैके असन न जावै ॥
क्षुधावंत जो करही त्रासा । सन्तुष्ट होय तुरते हो पास ॥
औ जहां देखे सत् का वाना । ता कहैं बहुत करे सन्माना ॥
करै साधु सेवा मनराता । ता कहैं मैं बणों विख्याता ॥
जस जासूस द्रव्य नहि पावै । ताके नग्र सैध दै आवै ॥
चतुरा करै तामु सन्माना । जो पुन ताको करै वखना ॥
ताके पुर का मता बतावै । विवेककी महिमा द्रसावै ॥
ताके गेह दरब न चले जबही । ताकी महिमा दूत करे तबही ॥
बहुविधि महिमा करे जमदूता । तासौ कोई न करे अजगूता ॥
भाजै कादर नगर बधाई । ताके निकट जान नहि पाई ॥
धन्य सोई जो गेही करई । भल मन्दा को उदर भरई ॥
ता कहैं होई पुन्य परमारथ । नाम गहैं जन्मैं होय स्वारथ ॥
कडिहार सोइ जो शूरा होई । भाखों ताहि आपसम सोई ॥
सारखी-कडिहारा औ गृही को, कोई न जाने अन्त ॥
बिन परचै विसमाद है, हरषत परचै सन्त ॥

चौपाई

भाषो संयम सत के राऊ । अस गेही जो करै उपाऊ ॥
प्रात नेम जो करै अस्त्राना । प्रथम प्रफुल्लित कमल बिगसाना ॥

गुरुलक्षण

( १६ )

ज्ञानसागर

मद रु मांस कहैं त्यागै दोऊ । मिथ्या जीव घात पुनि सोऊ॥
सत आमन पर निद्रा त्यागी । भली बुरी सैं रहत बिरागी ॥
जाइ जहाँ बर जहैं हितकारी । ऊचट न परई अन्तर भारी ॥
शुध्दावन्त हित कारी होई । अति प्रिय जानसमोवहि सोई॥
यहि सम दूसर व्रत नहि जाना । ते जन पूनौ आरत ठाना ॥
कहौ जान दासा तन जोई । भागी जीव पावहि निजसोई॥
शिष्य होय जो तन मन वारे । गुरु आज्ञा कबहुँ नहि टारे ॥
गुरु दे शब्द मुक्ति जे होई । तेहि समान दूसर नहि कोई ॥

साखी-तन मन गुरु को दीजिये, मुक्ति पदार्थ जान ॥

गुरु की सेवा मुक्ति फल, यह गेही सहिदान ॥

गुरु लक्षण-चोपाई

गुरु सोई जो सब ते न्यारा । सो सब मैं भाखौ उपचारा ॥
जल तैं पुरइन का है मूला । पानी पत्र न लागै फूला ॥
जातैं देह धरा कडिहारा । तातैं चाहिये सब उपचारा ॥
जैसे मूल पुरइन को पानी । ऐसेहि दुनियाँ की सहिदानी ॥
काया धरे सब न कडिहारा । पुरइन भेद तैं उतरे पारा ॥
केतो शिष्य करे सनमाना । ते पानी पुरइन सम जाना ॥
इतना सुनै रहै लपटाई । तो वह जग समान है भाई ॥
पुरइन मुक्ति लोक में बासा । गुरुबिनपरहि कालकी फांसा ॥
काल बस जीव नहि तरई । तेहि विश्वास जन्म सोइ धरई ॥
कहा सन्त सबहि में भेदा । आप स्वारथी करहि उच्छेदा ॥

साखी-नहीं सहज सत गुरु वचन, करम कुटिलता ठान ॥

चले लोक गति नरकहुँ, सरिता सिंधु समान ॥

लोक गर्व गति राखे भाऊ । ताको देख मास पुनि खाऊ ॥
बहुत यत्न मैं भाव बताया । जो नहि बूझ अन्त पछिताया ॥

परलोकका मार्ग । सत्यलोक और हंसका वर्णन

ज्ञानसागर

( १७ )

धर्मदास बचन

हे स्वामी तुम सुनो सत भाऊ । जो पूछौं सो मोहि बताऊ ॥
जब तन तजे बोलता ब्रह्मा । किहि विधि जाइ कहो सो मर्मा ॥
सो मोहि स्वामी भेद बताऊ । धर्मदास टेके गहि पाऊ ॥

साहिब कबीर-बचन

आवै अंत होय नर जबही । अंतक आनै पठवै तबही ॥
जो जीव नाम तत्त्व मन लावै । ताको अंतक दूत नहिं पावै ॥
नौ द्वारा लग छेके जाई । दशवों द्वार अब देख बताई ॥
दसों द्वारन केते न्यारा । भौर गुफा में सो है तारा ॥
गुरु प्रताप पंथ तेहि जायौं । आदि पवन तेहि होत सहायी ॥
अरध उरध में पवन का वासा । मूल पवन प्रथम जो भाषा ॥
तेहि पर हंस होय असवारा । पचासी पवन का जो सिरदारा ॥
तिहिं चढ हंसा घरको जाई । मान सरोवर जा ठहराई ॥
अंतक दूत करै पछताई । सो सब भेद कहौं समझाई ॥
भक्षै यहि कारण यम राया । तबहि जीव तोहि समझाया ॥

साखी-काल फांस जेहि बांधै, जो नहिं राधै नाम ॥

तत्त्व हीन जीव व्याकुल, अंतक राखै ग्राम ॥

चौपाई

जो कछु पहिले भेद बताया । सो नहिं करै हतै यमराया ॥
छठै मास बीरा निज होई । सो नहिं होइ करो क्या कोई ॥
किंचित् तत्त्व भाव विधि धारै । गुरु प्रताप ते लोक सिधारै ॥
लोक निकट अंतक जो जाई । होय बलहीन चक्षु ही नाई ॥
तहैंवां आहि पंथ का फेरा । एक हमारे इक यमकेरा ॥
गुरु जो प्रथमहिं भेद बतावै । निज घर बैठ हंस सो आवै ॥
आवै शीश ऊपर दै पाऊ । जाय तहां सो कहौं प्रभाऊ ॥
यहि विधि हारै यम कौ दूता । पाँजी रोक धर्म अवधूता ॥

( ९८ )

ज्ञानसागर

प्रथमहि मान सरोवर जाई । जहवाँ कामिनि राज बनाई ॥
शोभा हीन हिरंमर वारा । तातें अटकै हंस पियारा ॥
हंस द्रौप में पहुँचे जाई । शोभा हीन सो बहुत लजाई ॥

सारखी-ते पुनि करै अधोन्ता, हंस सुजन जन पास ॥

कहा अपराध गुसाई, रूप न होय प्रकाश ॥

चोपाई

जब लग मूल दरश नहि पावै । शोभा तब लग नाहीं आवै ॥
जब लग शोक भगे नहि भाई । शोभा तब लग नाहीं आई ॥
एक हंस नहि शोक भराई । जा नहि जीव इकोतर जाई ॥
पावै सार जान निज बीरा । पलकहि शोक मरे पुन धीरा ॥
प्रथमहि हेत द्रौप पर जाई । शोभा अधिक तहाँ पुन पाई ॥
शोभा तस षोडश जस भाना । रवितैक्षीन हो सलिल समाना ॥
यहवां सूरज कांति प्रकाशा । वहवां जोती स्थिर निवासा ॥
ग्रासे सूरज शशि निम्पाई । वहां न सतावै काल अन्याई ॥
जस कमोदिनि सम्पुट प्रभाऊ । तैसा वहां मैं युक्ति बनाऊ ॥

सारखी-जस रविके परभावते, कमोदिनि सम्पुट लाग ॥

ऐसे रवि है निर्मल, पावत तनही जाग ॥

रविके उदय जस मिले चकेवा । हंसा हंस मिलै जस भेवा ॥
रेन तज तब देही त्यागा । पहुँचे लोक हंस मिल जागा ॥
मिल जस चकई चकवा कम्ही । हंसा हंस भाव तस धरही ॥
रविके उदय कमल जस फूला । हंस कमल सूरज रवि तूला ॥
रविके उदय तिभिर जस भागा । हर्षहि धर्म हंस मन जागा ॥
सरल गरल तें अन्तर जानी । धर्मराय अपने मन आनी ॥
काया शोभा उडुगन बांती । अस बूझै चिकुरन की कांती ॥
सो पुनि चिकुर आहि उजियारा । अस शोभा है हंस पियारा ॥
रजनी मुदित विवस जो भएऊ । ज्योति अटल तस हंसा गएऊ ॥

ज्ञानसागर

( ११ )

साखी-नयन दोई भल छाजै, मानौ शशिकी ज्योति ॥
शशि स्वभाव सो देखिये, ऐसी शोभा होती ॥

चोपाई

वरण तासु चक्षु शोभाई । फूटी चंद दो दिशा समाई ॥
नयन दामिनी होत झलहाला । पाछे नहि अनिल उजियाला ॥
बादल घन विजुली चमकाई । शोभा मानों तेज लजाई ॥
श्रवण सोहैं मनौ रवि के चाका । शोभा अधिक सु जाऊ थाका ॥
शोभा कण्ठ जैसे गिरि देवा । नाक कीन्ह सिष्ट जनु देवा ॥
शोभित कहे मिरनाल सरोजा । मुखजो कमल मिरनार कुरोजा ॥
है मिरनाल जनु सेतहि भाऊ । वदन प्रकाश शोभा बहु पाऊ ॥
विगसत कमल उदित जिमि तरणी । हंस पदम दीपक जस वरणी ॥
काया तासू कदली नेहा । रोम रोम मुक्ता को रेहा ॥

धर्मदास बचन

हे स्वामी मैं पूछौं भाऊ । जो पूछौं सो मोहि बताऊ ॥
अन बेधा जस देखियत हीरा । रोमत होवे हंस शरीरा ॥

माहिव कवीर बचन

साखी-जँघ पिंडुरी पग अँगुष्ठा, शोभा अधिक अपार ॥
शब्द रूप कारीगर, रवि शशि अनि जन ढार ॥

चोपाई

नख शोभा किमि करौं बखाना । जातैं हंसन कौ उतपाना ॥
नख न होय जैसे नख हीरा । अंगुरी बाद बरन चँद चीरा ॥
हथली सोहैं मनु पूरण चंदा । अँगुरिन पांति शोभा अरबिदा ॥
जस क्रांती शोभा बहु भांती । छाजै तहाँ नखन की पांती ॥
एही सबै है रूप पर भाऊ । सब उजियार पुरुष से आऊ ॥
सो सब शोभा भाव बताऊ । अगम उपेक्षा सबहि बताऊ ॥
जातैं भयो मानो अधिकारा । तातैं कहाँ रूप व्यवहारा ॥
जस अकाश महाँ ऊगहि सूर। हो उजियारा सो तिनहु पूरा ॥

( १०० )

ज्ञानसागर

पाइर द्रीय होई बड़ चोखा । परमारथ सो करत बड़ तोपा ॥
रविगण पुरुष लगन जो लोका । उड़ गये हंस मिटा सब धोखा ॥
दीप सार औ करी सम्हारी । तेज वरना चन्दा अधिकारी ॥

साखी-तीनौं पुर उजियार भयो, ऊगे भातु अकाश ॥
तैसे पुर की ज्योति में, हंस जो करे प्रकाश ॥

चोपाई

एक सूर्य का किंचित भाऊ । जाग उपेक्षा भाव बताऊ ॥
हंस सुजन हंस के राजा । पल पल हंस दंडवत छाजा ॥
एतिक हेत द्रीय उजियारा । बैठे सब जहाँ हंस पियारा ॥
ते पुन हंस दंडवत करही । क्षणक्षण माथ चरन तर धरही ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु हेत द्रीय सुख पाया । अग्र द्रीय ताहि करी दायो ॥

साहिब कबीर वचन

हंस सुसज्जन दंडवत् काहीं । पुरुष सौं फिर विनती अनुसरहीं ॥
जोग सन्तायन हंस लै आवहु । हेत द्रीय तिन को बैठावहु ॥
देखा चाहे चरण जो द्रीय । मंजुल मंगल करी समीपा ॥
आज्ञा पाय चले हैं हंसा । चरणा द्रीय पहुँचे निःशंसा ॥
अभय पक्ष हंस तहाँ आवहि । जोग संतायन भाव बतावहि ॥
जिहितें आहि आदि परवाना । पावै हंस तब करहि पयाना ॥
हंस राज तब मौन होय जाई । आवै हंस बहुत तेहि ठाई ॥

साखी-सहस्र अठासी पालंग, और सहस्र से तीन ॥

इतने हंस तब आवैं, यह अस्थिर कई चीन्ह ॥

पहिले बन्दौं गुरु चरण, सुरति संतायन योग ॥

बन्दौं हंस सुजन जन, तिन प्रसाद यह भोग ॥

चोपाई

धन्य पुरुष जिन परिमल छाया । हंसन सुख बहुते मन भाया ॥
तब हंसा बहुते दर्पाना । प्रथम हंस सुजन जन ज्ञाना ॥

ज्ञानसागर

( १०१ )

सुरति सनेही गुरु की दाय्या । हंस सुख बहुते मन भाया ॥
पुढुप द्रौप ताको विस्तारा । चार करी केता उजियारा ॥
प्रथमहि महिमा जोत विस्तारा । बैठे जिन कहैं जोत अपारा ॥
नौसै संख औ तेरा करोरी । एतिक महिमा द्रौपहि केरी ॥
ता भीतर करी कस देखा । महिमा फल जस रवि को रेखा ॥
अस जनि जानो रवि को भाऊ । उत्तपक्षा सब भाव बताऊ ॥
अम्बू करी बहुते उजियारा । धन्य पुरुष जिन शब्द उचारा ॥

सारखी-इतना भाव सुख उपजै, अम्बुकरी महाँ जाय ॥
नाम तत्त्व जो राघे, सो अस्थिर बैठे आय ॥

चौपाई

शुभ करी किम करौ प्रवाना । जातै कूर्म काल उत्पाना ॥
पक्षि पालना द्रौप बत्तीसा । तापर रूप सूर्य पञ्चीसा ॥
इक दिन मनो सूर्य की पांती । दुविधा भाव न रूप की कांती ॥
बरणों सूरज ज्योति अपारा । सोहै अटल रूप उजियारा ॥
औ सब शुभ करी को भाऊ । सब उजियार पुरुष से आऊ ॥
सिन्धु मध्य मेघ जस भरई । पुरुष शब्द ज्योति अनुसरई ॥
जस जीव रहै विषय की आशा । शब्द पुरुष सत करे निवासा ॥
प्रथम करी का मर्म न जाना । सो पुनि कैसे जाइ ठिकाना ॥
दूसर द्रौप मम महा सुरंगा । परम हंस बैठे तिन संगा ॥
तीसर द्रौप जोगा जहाँ रहई । ताहि द्रौप का मरम ना लहई ॥
आदि द्रौप पुरुष अस्थाना । तहाँ हिरंमर सुख कर थाना ॥

सारखी-पक्षि पालना द्रौप बड़, जामें ज्योति सुरंग ॥
नाम तत्त्व जो राघे, तो मेटे दुख द्रन्द ॥

चौपाई

मूल द्रौप मूल नाम उचारा । तातें अग्र बीरा निज सारा ॥
मूल अग्र बीरा निज पावै । इकोतरसौ जीव लोक सिधौवै ॥
शोक भरे काया नहि छाजा । शोभा हीन हंस होय लाजा ॥

( १०२ )

ज्ञानसागर

ते पुन करे बहुत पछितावा । सुजन हंस सौं बिन्ती लावा ॥
हंस सुजन जन कहैं अस बानी । शब्द हमार सुनो हो ज्ञानी ॥
जाते जीव काल बस रहई । पुरुष शब्द जो नाहीं गहई ॥
एक निमिष हंसा कर होई । पुरुष सेज तेहि होवै सोई ॥
सोई हंसा तन मन धरई । परम पुरुष सों परिचय करई ॥
परम द्रौप शोभा बहु होई । सब विस्तार कहाँ अब सोई ॥
तहाँ बिराजै जस पुन कमला । उडुगन सूर सनेह जनु जवला ॥
साखी-रत्न पदारथ थाका, पदम अनूप सुरंग ॥
उदित अवास बहुरि जितै, बिगसत सूर औ चंद ॥

चौपाई

जग मग ज्योति हंस शिर सोहै । ललित मौन रतनन जनु मोहै ॥
हंस के सीस छत्र जो धारा । पुरुष बानी तैं होय उजियारा ॥
मिटै तिमिर उदय जनु भाना । हिरामर भांति सब रूप प्रवाना ॥
सबै रूप जस भये चकेवा । हंसा हंस मिलै तस भेवा ॥
प्रथम हंस बैठे तह रहई । सो पुनि भक्ति परम पद करई ॥
बहु दिन रहै नक की खानी । धन्य गुरू हंसा कियो पयानी ॥
बैठे हंस सबै इक पांती । मेटो दुख जब भये अजाती ॥
संशय सबै पिछली गएऊ । रंक महानिधि मानो लहेऊ ॥
पुहुप द्रौप महाँ बैठे जाई । अमृत फलै जहाँ मिल पाई ॥
मंगल करी देख जब जाई । देखत शोभा बहुत लुभाई ॥
मेघ महल सो है ब्रह्मंडा । तहैं तस सँग रहै अरविन्दा ॥
जहैं लग मेघ बुन्द ढरकाई । तैसे कमल तहाँ बिगसाई ॥
साखी-पुरुष आप जस स्वाती, भैरे मेघ शब्द झनकार ॥
जल सब भरो जो पोखरी, सांभा भूमि निनार ॥

चौपाई

बुन्द निरंकार बरषावै । शून्य शिखर तब शोभा पावै ॥
करो स्वाति तहैं अमृत आही । प्रथम हंस देखै पुनि ताही ॥

ज्ञानसागर

( १०३ )

तिन पुनि ध्यान पुरुषसौ धारा । बिगस्यो पुहुप बाणी उच्चार । ॥
फल अमृत तब टूटे चारी । तिहितें फल अनेक विस्तारी ॥
जेते हंस दर्शन को आये । एक एक सब हंसन पाये ॥
आज्ञा मांगि हंस सब पाया । तबते भई अमर की काया ॥
आस प्यास सब हंस अघाना । निर्वृति सुधा सो शुधा बुझाना ॥
निवृति करी किम करव बखाना । उदित भये जनु अगनित भाना ॥
पालंग कोटि तीन कौ फेरा । निवृति करी इतनौ बिस्तेरा ॥

सारखी हंस आवै बहु व्याकुल, बहुत करै पछिताव ॥

दयावंत प्रभु महिमा, मृतक दरस दिखराव ॥

चोपाई

प्रगत रूप देख्या पुन कैसा । जल विलग गगन तामुर वि जैसा ॥
हंस सबै तब दर्शन पावा । भया हरष मिटा पछितावा ॥
हंस सबै तब भये अधीना । उडुगन माही शशिकौ चीन्हा ॥
अस जिन जाने उशशिका भाऊ । उत पक्षा सबई भाव बताऊ ॥
चातक निस दिन बारि निहारै । पावै जल तब तृपा विसारै ॥
पुरुष दर्श स्वाती कौ पानी । देखि रूप सो तृषा बुझानी ॥
पदमै संपुट लागा जबहीं । हंसा परम रूप भयो तबहीं ॥
निज अस्थाने हंस न तब जाहीं । हंस द्रौप तहवां ठहराहीं ॥
एकहि जात रूप सब माहीं । दुविधा भाव सो देखत नाहीं ॥
ता भीतर पुहुपन की सेजा । पंकज बीज आहि जनु लेजा ॥
अभै दीप ज्ञानी कौ वासा । तहँवां हंस करहिं सुख रासा ॥
पालंग तीन सोहै पुन द्रौपा । तहाँ पुरुष रहै अधर समीपा ॥
पुहुप द्रौप बिगसो पुनि गुंजा । गुंज मनौ शशि भानु अलुंजा ॥
भये पग स्थिर हंस सुखारी । पुहुप द्रौप सिरजै छत्रधारी ॥
हंसा तब पग अस्थिर आये । अमर चौर शोभा बहु पाये ॥
मान सरोवर बहु नौनाई । शोभा रूप राशि बहु ताई ॥

( १०४ )

ज्ञानसागर

सुरति सागर डोर समोई । मुक्ति द्वार तहाँ सौं गोई ॥
सो द्वारा जो गुरु बतावै । मानसरोवर तैं चलि आवै ॥
तहाँ हंस शीलका थाना । माणिक मध्य दीप निर्वाना ॥
चौरासी लक्ष द्वीप को फेरा । आवै हंस तहाँ कोन्हो डेरा ॥
तहाँ है पुनि कामिनि राजा । जगमगज्योति तहाँ पुनिछाजा ॥
बरणो शीश रूप भल आही । चार भानु जानौ तिहि पाही ॥

छन्द-शीश झलक बहु बरणा पांती रूप शोभा राशि हो ।

नौ लाख उडुगन पोह राखै भानु शसिको भासि हो ॥

जग मगा चौकुर अतिहि सोहै राजै जैसे पुर सही ।

अटल जेहि रूप बरनौ शशि बरणा काया कही ॥

सोरठा-शशि औ भानु निचौर, शोभा राखी शीश पर ॥

सेत वरणा अंजोर, मान सरोवर कामिनी ॥

चौपाई

भले नेत्र दूरसन कस देखा । मानहु अर्काहि सुठार विशेष्खा ॥

शब्द कारीगर रूप चम कारा । शशि अनेक ताही जनु ढारा ॥

श्रवण गातु शोभा अधिकाई । जैसे छीर कै काठ मलाई ॥

छीर भरो जनु शशि औ भाना । माखन रूप कामिनी ठाना ॥

मौज अनेक ताके तन चीरा । लागे रवि शशि अगनित हीरा ॥

चमके रूप ज्योति बहु भाऊ । सब उजियार पुरुषसे आऊ ॥

सारखी-शोभा बहुते कामिनी, नख शिख सुन्दर रूप ॥

बैठे माना भाव धरि, चन्द्रभानु बहु यूप ॥

चौपाई

सर शब्द पावै जो ताई । ताके बल हंसा घर जाई ॥

इतना रूप कामिनी अंगा । नहि उपजै तँ भाव अंनंगा ॥

बैठे रहई हंस सुख पावई । दृष्टि भाव परम मन भावई ॥

ऐसी भक्ति नहि महि माहीं । पटतर बने देत नहि ताहीं ॥

जस पाहन मंजुमें डारा । देखौ शोभा अगम अपारा ॥

भविष्यत् कथा । चक्रवर्त्तीका वर्णन

ज्ञानसागर

( १०५ )

महल पंच भूत तहाँ नाहीं । हँसा बैठे सुख करे ताहीं ॥
अग्र रुचिर छत्र सिर छाजा । हँसा लइत बहुत सुख साजा ॥
जाय दिव्य तहाँ कर्गहि निवासा । विमल अंग शोभा बहु पासा ॥
मिटै अम तव परिचय पाई । जहाँ रहै तहवाँ ठकुराई ॥

सारखी-करहीं हंस सुख अस्थिर, अम्बू करी अस्थान ॥

देखौ द्रौप सो पावन, कमल करी निर्वाण ॥

चौपाई

धन्य जीव पुरुष शब्द उचारा । जातै शोभा अगम अपारा ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु सुन्यो हंस कर भेऊ । जो कछु प्रछौँ सो कहि देऊ ॥
जो कछु होय आगे व्यवहारा । आगे होय सो कहौ विचारा ॥

साहेब कबीर वचन

सुनु धर्मदास मैं कहौ बुझाई । आगे जस करि है अन्याई ॥
वंश व्यालीस अचल तुम्हारा । नाद बहुत है विंद विचारा ॥
तेही पाछे चरित अस होई । कहौँ प्रगट नहिं राखौँ गोई ॥
अग्नि कौन अचिन्तपुर गाऊँ । तहाँ कौ वरणन तुमहि सुनाऊँ ॥
अमृत नयन विकट है काया । नाम चक्ररथी काल स्वभाया ॥
मानै जीव सो कहो विचारा । जस रविकोट है मृत्यु है सारा ॥
ताहि नय की राज कुवारी । सोभा चहै सहित जनु नारी ॥
ताकौ भेद मैं कहौँ बुझाई । घर कुम्हार के जन्मे आई ॥
जनमत तात जननी कहैं खाई । दृष्टि परत हतन होइ जाई ॥
जस पावक महैं तुनै समाई । वहिनी खाय जो देखन आई ॥
अग्नि समान चक्ररथी भाई । तृण समान मलेछ अधिकाई ॥
बत्तिस अंगुल तासु शरीर। कहौ अगम अस दास कबीरा ॥
श्रवण एक नौ अंगुल ताही । डेढ नाक दो जिभ्या जाही ॥
यही स्वरूप विश्व कहैं ढावै । तेहि अन्तर रानी चलि आवै ॥
रानी दृष्टि परे तेहि पाहीं । भाजे गज केहरि की छाहीं ॥

( १०६ )

ज्ञानसागर

तैसई भाजै अंतक दूता । वंश तुम्हार थकै अजगूता ॥
मिटहि पंथ धर्मदास तुम्हारा । काल चरित्रै करै अपारा ॥

धर्मदास वचन

हे सतगुरु सो पुनि बतावहु । चक्ररथी को भाव बुझावहु ॥
जब दिखराय काल कौ भाऊ । धर्मदास मन त्रास जनाऊ ॥
साखी-बहुत त्रास जब कीन्है, भये व्याकुल मति भंग ॥
चक्ररथी को भाव बतायो, कह्यो वचन परसंग ॥

साहित कबीर वचन-चोपाई

अबही भाव दूर है ताही । जनि डरो त्रास वज्र जिव चाही ॥
हदूता जान करौ गुरुवाई । जातैं जीव लोक कहैं जाई ॥
जीवको बन्ध छुड़ावहु यम ते । हंस मुक्तावहु नाम जतन ते ॥
साखी-नाम जतन जो करै, ताकर होइ न हानि ॥

ज्ञान सागर सुख आगर, कहे कबीर बखानि ॥

सत्य विचार-चोपाई

ज्ञान सागर ग्रन्थ को भाऊ । समझि बूझि के पारख लाऊ ॥
अनन्त प्रकार के शब्द पसारा । विनु पारख नहीं होय उबारा ॥
शब्द परख की युगती आही । गुरु सुख कहा रमैनी माही ॥
रमैनी सताईस तेहिको जानू । बूझि विचारके हिरदय आनू ॥
पारख करनकी युक्ति जब जानो । सांच झूठ की परीक्षा आनो ॥
काल दयालको स्वरूप पिछनौ । काल सन्धि झाई मन जानो ॥
सार शब्द का पाओ लेखो । उभय आनंद तबहीं तुम देखो ॥
करु पारख तब बन्धन छूटै । विनु पारख जमै धरि कूटै ॥
इति श्रीज्ञानसागर समाप्त ॥

प्रारंभिक पृष्ठ (अनुराग सागर)

श्रीः

अनुरागसागर

( कबीरदर्शन ग्रन्थमालाकी द्वितीय मणिका )

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

श्रीगणेशाय नमः

श्रीगणेशाय नमः