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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

धर्मदाससाहबकी सद्गुरुसे शिष्य करने के लिये प्रार्थना और उत्तर

बोधसागर

(२९)

काल रूप धरि गुरु कहावै । करि पारख तासो हरिजावै ॥ अन्धविश्वास जगतसो सोवै । जाय नरक पुनि मूलहु खोवै ॥ निरखि परखिकै शरणै जावै । अगम निगम सब सोई जनावै॥ रहै अजाचक नामलौ लाई । जीव दया सन्तन सेवकाई ॥ निजआतमसम सबही जानौ । प्रेम प्रीतिसे सेवा ठानौ ॥ परमारथकी भिक्षा करिये । गुरु साधुन आज्ञा अनुसरिये॥ अभ्यागत आतम सम जाने । साधुनाम सद्गुरु सहिदाने ॥ छंद-गुरुसाधु महिमा अमित अगम अपार पारनहिं कोऊ लहै॥ त्रीदेव दश औतार हरि गुरु साधु पद रज तेऊ चहैं ॥ सनकादिक सुरनरमुनि सिद्धि ज्ञानीसाधु गुरु आतित रहै॥ हरि आपु मुख महिमा प्रकाशें निगम अस्तुति नित कहै ॥ सारखी-अस नर पाँवर अन्धमति, हृदय न करहिं विचार ॥ गुरु सन्तन्ह पद सारतजि, विष वेली प्रतिपार ॥ सोरठा-सुत नारी हित प्रान, गुरु सन्तन्ह सो चातुरी ॥ जब यम बाँधै तान, तब पछितावहि सुगुध नर ॥

धर्मदासवचन-चौपाई

धन सतगुरु धन तुमरी बानी । मोहिअसअधमदीन्हगतिजानी अब साहब मोहि आपन करहु । मम शिरचरणसरोरुह धरहु ॥ मैं आपन दिन शुभकरि जाना । तोहरे दरश मोक्ष परमाना ॥ अब अस दया करहु दुखभञ्जन । कबहुँमोहिनधरिपाव निरञ्जन॥

जिन्दा वचन

अहो धर्मदास दरश तुम पावो । शब्द गहे होय जिवमुक्तावो ॥ यमफन्दा तब निश्चै छूटै । जब यमरासो तिनका टूटै ॥ अमीअंक परवाना पावै । सुमिरण नामध्यान चितलावै॥ हियते और आस सब छोडे । सद्गुरु चरण नेह चित माडे ॥

(३०)

ज्ञानप्रकाश

नाम कबीर जपो दिनराती । तजहुकर्म भ्रमअरु कुलजाती ॥ प्रतिमा धोखा दूरि बहावो । आतम पूजा नाम चितलाओ॥ पीतर पाथर दूरि बहाऊ । सद्गुरु सन्त सेवा चित लाऊ॥ तब जमरा तोहीं नहिं पाई । नाम प्रताप काल सुरझाई ॥ होइहैं जीव काज तब तोरा । निश्चै वचन मानु दिठ मोरा ॥

धर्मदास वचन

हे साहब मैं तब पग धरऊँ । तुम्हते कछु दुबिया नहिं करऊँ॥ अब मोहि चिन्हि परायम बाजाँ । तुम्हते भयउ मोर मन राजी ॥ मोरे हृदय प्रीति अस आई । तुम्हते होइहै जिव मुक्ताई ॥ तुमहीं सत्यकबीर हो स्वामी । कृपा करहु तुम अन्तर््यामी ॥ हे प्रभु देहु प्रवाना मोहीं । यम तृण तोरि भजौ मैं तोहीं॥ मोरे नहीं अवर सो कामा । निसिदिन सुमिरों सद्गुरु नामा ॥ पीतर पाथर देव बहायी । सद्गुरु भक्ति करब चितलायी ॥ अरपौं शीस सर्वस सब तोहीं । हे प्रभु यमते छोडावहु मोहीं॥ सन्तन्ह सेवा प्रीति सों करिहैं । वचन शिक्षापन निश्चय धरिहैं॥ जो तुम्ह करहु करब हम सोई । हे प्रभु दुतिया कबहुँ नहिं होई॥

जिन्दा वचन

सुनु धर्मनि अब तोहीं मुक्ताओ । निश्चै यमसों तोहिं बचाओ ॥ देइ परवाना हंस उबारो । जनम मरण दुख दारुण टारो ॥ ले प्रवाना जो करै प्रतीती । जिन्दा कहै चले यम जीती ॥ अब मोहि आज्ञा देहु धर्मदासा । हम गवनहि सद्गुरुके पास ॥ सद्गुरु संग आइब तव पाहीं । तब परवाना तोहि मिलाहीं ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु अब तोहिं जाने न देहौं । नहिं आवो तो मैं पछितैहौं ॥ पछताइ पछताइ बहु दुख पैहौं । नहिं आवहुतो प्राण गवैहौं ॥ हाथके रतन खोइ कोइ डारे । सो मूरख निजकाज विगारे ॥

कबीर साहबका तीसरी बार गुप्त हो जाना और धर्मदास साहबका व्याकुल होना तथा धर्मदास साहबका सद्गुरुसे मिलनेके लिये भंडारा करना और चौथीबार सद्गुरुका मिलना

बोधसागर

(३१)

मोरे प्रान पियारे तुम्ह हौ । केहि कारण अनत लेजे हौ ॥

कबीर साहबका तीसरी बार गुप्त हो जाना और धर्मदास साहबकी व्याकुलता

यह कहि धर्मदास पल लाऊँ । जिन्दा गुप्त भये तेहि ठाऊँ ॥ धर्मदास पुढुमी परु हारी । सद्गुरु कहैं बहु कीन्ह गोहारी ॥ मोहिं समको जग आहि अभाग । छुटे नदेह ठगौरी लागा ॥ जिमीभुअँग मणि जाइ हेराई । विकल फिरहिं जित तित बिललाई ॥ उहै हाल सद्गुरु विनु मोरा । कत पल दियेउ मन्द मति मोरा ॥ काह करौं कित दर्शन पाऊँ । बिनु दर्शन मैं प्रान गवाऊँ ॥ कीन्ह विवेक मन धीरज दीन्हा । मन महाँ पकर एक पुनिकीन्हा ॥ करौं महोत्सव संत अवराधौ । तब दर्शन देहिं पुरुष अनादी ॥ साहेब सन्त सनेही आहीं । सन्तन तजि वह अंत न जाहीं ॥ असहिय ठानि भवन चलि गयऊ । सन्त प्रसादको चितवन कियऊ ॥ संत धाम जहाँ लगि गम पावा । तहां तहां विनती नेवति पठावा ॥ छन्द-दिन अवधि वाही जुरन लागे बहु भेष पहुँचे आयहो ॥ दीहुँ जुथथि सेज आश्रम कीन्ह विनती जाइ हो ॥ दे भाव भोजन गमनिरश्वहिं सकल भेष अलेखही ॥ सबहिं निरखहिं सुरति परखहिं हृदय समाह विवेकही ॥ दोहा-पान सुपारी हाथलै, करहिं दण्डवत जाय ॥ भेषन सो चित विलखिके, पूछहिं मन परिचाय ॥ सोरठा-तुम्ह हो सन्त सुजान, निजदासन्ह सुख देतुहौ ॥ सत्य पुरुष सहिदान, सत्य लोक महिमा कहो ॥

बेष मता वर्णन

जोपाई

कोई कहै त्रिदेव अवराधौ । कोई कहै व्रत करि तन साधौ ॥ कोई कहै करु प्रतिमा सेवा । कोई तीरथ कोई जपत प भेवा ॥

(३२)

ज्ञानप्रकाश

कृत्रिमभक्ति जो सबै दृढावै । सत्य सारपद नाहि बतावै ॥ तब अकुलायसंसाथरि जोये । प्रगट नहीं गुप्तहिं हिय रोये ॥ प्रति आश्रमगम्यउठी निरासा । जिततितचितवहिं धर्मनिदासा ॥ पुनि चितवनउत्तरदिशिकीन्हा । मूरति एक भिन्न तहैं चीन्हा ॥ धमदास तहैं बेगि सिधाये । प्रथम रूपको दरशन पाये ॥ धायचरणगहि अति अदरागा । बुन्दपाय चात्रिक जिमि पागा ॥ गुरु पद पायप्रीति चित जागा । होसतगुरु मोहिं कीन्ह सुभागा ॥ धाये चरणनगहिअति अनुरागा । युगपदगहेउ प्रीति चित लागा ॥ करगहि दास उठायेउ स्वामी । सुधा वचन कह अन्तर्यामी ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तुम्ह हंस सुहेला । मोहिं दरश कह कीन्हेउ मेला ॥ इच्छा सफल भइ सुन तोरा । अब तुम्ह दरशन पायउ मोरा ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु जौ दर्शन नहिं पावत । तौ हम निश्चै प्राण गवाँवत ॥ अब प्रभु कीजे कृपा तुरंता । दीजे बीरा अविचल संता ॥ यमसे तितुका बेगि तोराओ । वन्दी छोरि मोहिं सुकताओ ॥

सतगुरु वचन

सुनुधर्मनि जो कहो सो मानो । तजि संशय धीरज चित आनो ॥ करहु जाय सन्तनसनमाना । ता पीछे दैहों परवाना ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु कहो सोई हम माने । करब जाइ सन्तन्ह सनमाने ॥ हे प्रभु जौ कतहुँ अब जाहू । तौ जीवित नहिं पइहौ साहू ॥

सतगुरु वचन

हे धर्मनि सुनहु मम बानी । कतहुँ न जाब सत्य हियजानी ॥ करि प्रमान चितवत चलु पाछे । जौ नटनिरत सुघरता काछे ॥ जाय कीन्ह सन्तन सनमाना । यथा शक्ति पूजा परधाना ॥

धर्मदासजीका सद्गुरुसे दीक्षा देनेकी प्रार्थना करना तथा रतनासे मिलना

बोधसागर

(३३)

विदा कीन्ह सन्तन्ह करजोरी । वरुशाहु जो हमरी भइ खोरी ॥ सब सन्तन निज धाम सिधाये । धर्मदास सद्गुरु पहाँ आये ॥

धर्मदास वचन

कहे धर्मनि सुनु दीनदयाला । आतुर छोड़हु बन्ध कृपाला ॥

सतगुरु वचन

धर्मनि जो चाहहु परवाना । आनहु आरति साज मुजाना ॥

धर्मदास वचन

अहो साहब कस आरतिसाजा । सो भाषहु आतुर जिवकाजा ॥

सतगुरु वचन

धर्मनि चहिये नारियर पाना । मेवा सो अष्ट कह मिष्ठाना ॥ चन्दन चौकसुगन्धि कराओ । कलशा पछौ पञ्च धराओ ॥ गोघृत वसन सकल शुभ चाहू । साजि थार पुनि आरतिबारू ॥ सिंघासन पुनि सेत बनाओ । झारी दल कपूर मेराओ ॥ श्वेत पुहुष केदली पनवारा । आनि वेगि जनि लावहुवारा ॥ रतना कंदइननगर महाँ आहीं । गुड़ मिष्ठान्न तिनहिं कर चाहैं ॥ धावहु वेगि तुरति ले आवहु । आनहु वेगि वार जनि लावहु ॥

धर्मदासजीका रतनासे मिलना

छन्द-पदकंज टेकयो चले विचारत कहाँधौँ रतना अहे ॥ कहँ पूँछि लीजे भवन उनकै निज हिये गुनता रहै ॥ तहँ आय रतना ठाढ़ि भयी मिष्ठान्न ले कर जोरि कै ॥ भो साहु येहु प्रसाद लीजै नाम रतना मोर है ॥ दोहा-धर्मदास रह सकुचि चित, यह तो अचरज बात ॥ हो माता किमि जानेउ, कहहु सोइ विरुयात ॥

रतना वचन

सोरठा-सुनु धर्मनि हम नाहिं, यह लीला सद्गुरु कियो ॥ हम उन सेवक आहि, जिन्ह तोहि शब्द चेताइया ॥

नं. ४ कबीर सागर - ५

धर्मदाससाहबका चौका आरती कराके गुरुमंत्र लेना

(३४)

ज्ञानप्रकाश

धर्मदास वचन-चौपाई

लेहु दाम धन्य हो तुम माता । एक प्रान देखिये दुइ गाता ॥

रतना वचन

अहौ धर्मदास कसमोल बताओ । उन्हको तन मनवेगि सिधाओ ॥ ओरौ बस्तु लेहु अतुराई । गवनहु वेगि सुनहु गुरु भाई ॥ चलिभै धर्मदास पुनि तबहीं । रतना आकर भाष्यो जबहीं ॥ लीन्हवस्तु पुनि सकल सम्हारी । धनी पहाँ सब जाय सवाँरी ॥ लै साहबके सनमुख राखे । साजुथार अस आयसु भाखे ॥

सतगुरु वचन

चौका सवाँरि थार रचि धरेऊ । सब विधान आज्ञा सम करेऊ ॥ साहेबके पुनि चरण पखारा । चरण पखारि आसन बैठारा ॥ आसन बैठिके सुमिरन कीन्हा । नारियर मोरि अंशगहि लीन्हा ॥ सत्य सुकृत कई मालुम कीन्हा । तब त्रिन तोरिपरवाना दीन्हा ॥ लै नारियर प्रसाद मुख माना । धर्मदास चित हर्ष समाना ॥ प्रेम सहित चरणोदक लीन्हा । मुख महाँ डारि मिठाई दीन्हा ॥ सात दण्डवत तत्क्षण कीन्हा । हृदयमाहिं गुरु रूप गहि लीन्हा ॥ दण्डवत सात धनी कई कीन्हा । शब्दसुरतिपुनिचितगहि लीन्हा ॥ सात दण्डवत कीन्हा जबहीं । माथे हाथ दियौ प्रभु तबहीं ॥ धर्मदास चित हर्ष समाना । उपज्यो हिरदै निरभै ज्ञाना ॥ सद्गुरुकी जब सुरति समानी । विनश्योकरम भरम यमखानी ॥ सद्गुरु पद जबहीं अस्थापा । उदित ज्ञान पद रज परतापा ॥

धर्मदास वचन

हे साहेब जो आज्ञा कीजे । प्रतिमा मूर्ति काहु कई दीजे ॥ गुरुते अधिक कौन है देवा । अब हम करब तुम्हारी सेवा ॥

धर्मदाससाहबका प्रतिमाके विषयमें प्रश्न करना और सद्गुरुका रहनी बतलाना

बोधसागर

(३५)

सद्गुरु सम नहि देखौ आना । पूजि शिला मम जन्म सिराना ॥ कबहुँ न कहेसि मुक्ति उपदेशा । तुम्ह मेटेउ मम काल कलेशा ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास यह चित गहि धरहु । प्रीति सो साधु सेवा अनुसरहु ॥ पीतर पातर पूजहिँ अन्धा । जो गुरु ज्ञानहीन मति मन्दा ॥ प्रभु कहँ शिलारूप करि देखै । ताकर जीवन जन्म अंलेखै ॥ शिला माहि जो सुरति लगावै । तन धन शिलारूप सो पावै ॥ जहाँ आशा तहाँ बासा होई । ताकहँ मेटि सकै नहिँ कोई ॥ चकित वृषभ ज्ञात बिनु ग्रानी । जित जित भेटे नहिँ पहिचानी ॥ ज्यों कन्या रह पिता अवासा । कौतुक करहिँ पूजहिँ मन आशा ॥ भयेउ वर कन्या कर व्याहा । तब सब तजेउ मिलेउ जब नाहा ॥ बिना खसम कस आस बुझाई । अस प्रतिमाकी पूजा भाई ॥ जबलौँ ज्ञान न हिये समायी । तब लगि धोखा भरम रहे छायी ॥ जब गुरु पूरा मिले मतिसारा । उदै ज्ञान रविछपित होय तारा ॥ जब उजियार होय घर भाई । धोखा भरम तब सहज नसाई ॥ ताते गुरुपद सुरति समाओ । सतगुरु ध्यान अभैपद पाओ ॥ गुरु ते अधिक न कोई ठहरायी । मोक्षपथ नहिँ गुरु बिनु पाई ॥ राम कृष्ण बड तिहुँपुर राजा । तिन गुरु बंदि कीन्ह निज काजा ॥ देवैकृष्णी मुनिवर शुंक शेषा । सबही बन्दै गुरु चरण सुरेशा ॥ तन धरि करहु न गुरु कहँ मेटा । गुरु गमि सबै साहुपद भेटा ॥ मूर्ख जीव कर गुरुहिँ अकेला । बिनु गुरु जगत कालको चेला ॥ गुरु बिनु सार ज्ञान नहिँ पायी । ज्ञान विना नहिँ आपु चिन्हायी ॥ जौँ हिय आपु आप गमि नाहीं । तौँ लगि जीव भव भटका खाहीं ॥ सो गुरु सत्य जो सार चिन्हावै । यम बन्धन ते जिव सुकतावै ॥ धर्मनि तुम्ह मम शब्द बिचारो । सरवमई यक ब्रह्म निहारो ॥

१ वृथा किसी लेखामें नहीं २ नारद ।

धर्मदासजीका अपने पिछले जन्मका हाल पूछना और सद्गुरुका बतलाना

(३६)

ज्ञानप्रकाश

बोलत घट महाँ ब्रह्म अखण्डा । रोमहिं रोम गरजे ब्रह्मण्डा ॥ जो बोले सो कबहिं न मरई । गन्दा तन नर सरि गलि जरई ॥ ब्रह्म देह धरि जीव कहावै । पाँच स्वाद रति सो दुख पावै ॥ निज घर डोरी छूटै भाई । जीव रहे यमफन्द अरुझाई ॥ सदगुरु मिले डोरि घर पावै । पाँचन्ह कर परपञ्च नसावै ॥ आपुहि जीव ब्रह्म है भाई । गुरु परिचय बिन लखो न जाई ॥ निः अक्षर लख तत्त्व विदेही । सत्यनाम गहि मिलै सुख तेही ॥ जौं लहि तन महाँ ब्रह्म सुरंगा । तब लगि रहै तन मन बहुरंगा ॥ यंत्री ब्रह्म यंत्र तन आही । यंत्री विनु नहीं यंत्र बजाही ॥ परिचै ब्रह्म दया चित लावै । सदगुरु सेह परम पद पावै ॥ पूजहु सरजिव साधु अमोला । लहहु अभयपद निश्चय लोला ॥ छंद-परसि देखहु श्रेष्ठ वानी शास्त्र सुस्मृति मत घना ॥ जिन्ह साधु सेवा कीन्ह तिन्ह लीन्ह अभैपद सुखसना ॥ योग यज्ञ आरम्भ कीन्हों ते गये पुनि हारि हो ॥ गुरु भक्ति अरु सतसंग कीन्हो ते चले कुल तारि हो ॥ दोहा-महिमा अनित साधु गुरु, समझहु सन्त सुजान ॥ पाहन सेवत भरम वश, बूडे सकल जहान ॥ सोरठा-साहब सन्तन पाहिं, जो सेवै सो भव तरे ॥ करम भरमके माहिं, जाय विगुरचे जीव बहु ॥

धर्मदास बचन-चोपाई

हो साहब तव पद शिर नाऊँ । तब पद परसि परमपद पाऊँ ॥ केहि विधि आपन भाग सराही । तुम बरत गहैं भाग पुनि ताही ॥ कोधो मैं शुभ करम कमाया । जो सदगुरु पद दर्शन पाया ॥

सतगुरु बचन

धर्मनि सुनो आपनी करनी । तुम सुकृत आये जिव तरनी ॥ पुरुष पठाये जीवन काजा । तुम पर कला कीन्ह यमराजा ॥

बोधसागर

(३७)

तब सत्य पुरुष आज्ञा मोहि कीन्हा। तत क्षण आय पृथ्वी पग दीन्हा बार अनेक कीन्ह मिलापू। धरम दास नहिं चेतहु आपू ॥ पाहन पूजि ध्यान मन लाये। सदगुरु शब्द चीन्हि नहिं पाये ॥ तीरथ व्रत कीन्ह बहु करनी। रूपदास गुरुकी गहि शरनी ॥ तासु प्रीति तोहि आन जगावा। नाम प्रताप यह परभावा ॥ जो जिव नाम तुम्हारा लैहैं। ताहि जीवको काल न खेहैं ॥ सदगुरु भक्ति जाहि कुल होई। तरे एकोतर पुरुषा सोई ॥

दूसरी प्रतियोंमें नोचे लिखे अनुसार है

सदगुरु वचन

धर्मनि सुनु आपनी करनी। जेहि तोहि मिले उशब्द भौतरनी ॥ द्रापर अन्त सुपच तुम रहेऊ। तव सुत एक सो मम व्रत गहेऊ ॥ तासु प्रीति तोहि आनि जगावा। है परताप नाम परभावा ॥ सदगुरु भक्ति जाहि कुल होई। तरे एकोतर पछिला सोई ॥ वही संयोग तोहि हम भेटे। तुव सुत प्रीति तार दुख मेटे ॥

नोट—एक प्रतिमें तो ऊपरके प्रमाणहो लिखा है किन्तु कई प्रतियोंमें ऊपरको नो पंक्तिके बदले नोचेकी पंक्तियाँ लिखीं हैं। पाठक गण स्वयम् विचार करके जो उत्तम और प्रामाणिक समझे वह रखें और पाठ करें। किन्तु इतना तो अवश्य कहा जायगा कि भिन्न २ ग्रन्थोंमें इन दोनों बातों का प्रमाण मिलता है। और लेखक महात्माओंकी कृपा से पक्षपात और अविद्यावश कबीरपंथके ग्रन्थोंकी जो दुर्दशा हुई है वह साक्षर वर्गसे छिपा नहीं है। ग्रन्थोंकी यही दशा देखकर स्वयम् कबीर पंथ यहाँतक बंशधर कहीं कतिपय महंत संत लज्जावश हो किसीके सामने इन ग्रन्थोंका नाम लेते भी सकुवाते हैं। और हृदयसे इन सब ग्रन्थोंपर अभ्रदा रखते हैं। इस ज्ञान प्रकाश की कई प्रतियाँ मेरे पास उपस्थित हैं किन्तु किसी भी प्रतिका एक दूसरे के साथ मिलाप नहीं होता है। इसी प्रकारसे लगभग सब ग्रन्थोंकी दशा हो गयी है। जो जो नवीन प्रतियाँ हैं उन सबोंमें अटपट छन्दोंमें अर्थमंग और भावमंग आदि दोष पूर्ण रीतिसे भरे हैं। हाँ पहलेकी प्रतियाँ कुछ शुद्ध हैं उसीके अनुसार जहाँतक होता है रखनेका प्रयत्न करता हूँ। ऐसा करनेपर भी प्रस्तुत विषयके समान जहाँ संबंध विषय आजाते हैं वहाँ-वोनों को रख देना उचित जानता हूँ। इतना होगा जिनके पास जैसी २ प्रति होगी वे अपनी प्रति—

सर्वानन्दकी कथा

(३८)

ज्ञानप्रकाश

सर्वानन्दकी कथा

हे धर्मनि परखहु चितलाऊ । विप्रगौष्ठि तोहि वरन सुनाऊ ॥

धर्मदास वचन

गहि पद धरमदास हरषाना । कहिये विप्र गोष्ठि सहिदाना ॥ जस कछु भयी विप्र सो चर्चा । सो स्वामी कहिये मोहिं परचा ॥ भिन्न २ के वर्णन कीजै । दास जानि दया प्रभु लीजै ॥

सतगुरु वचन

भलधर्मनि सुनहु अब सो कथा । गोष्ठिभयी सर्वानन्द से यथा ॥ सर्वानन्द विप्र एक रहई । कोइ न ज्ञाता तिनसम अहई ॥ सर्वानन्द द्विज जो रहेऊ । तासम ज्ञान अवर नहिं कहेऊ ॥ बहुपण्डितसोंगोष्ठितिन्हकीन्हा । ज्ञानजीति पोथी बहु लीन्हा ॥ काहु न जीते गये सब हारी । सर्वानन्द मन गर्व बहु भारी ॥ जिन्ह पण्डितसों चर्चा कीन्हा । ज्ञान जीति पोथी बहु लीन्हा ॥ गोष्ठि वाद के निजघर आया । बाहुअभिमानगुमान चितलाया

सर्वानन्द वचन माता प्रति

मातासों तिन वचन उचारा । हो जननी बड़ भाग्यतुम्हारा ॥ हम अस पण्डित हैं सुत तोरा । काहु न जीते गोष्ठि सो मोरा ॥ सर्वाजीत नाम मम धरहू । अजित तिलक सिर हमरे करहू ॥ काहे जननी धन्य पुत्र प्रवीना । सहि ज्ञाता तुम्ह हमहुँ चीन्हा ॥

माता वचन

हो सुतएक पूँछौ तोहिपाहीं । कवीरजोलहहिंजीतेहुकिनाहीं ॥

और श्रद्धाके अनुसार बाँजेगे । इसी प्रकारसे अनुरागसागरको अनेक प्रतिव्योमिं भी सुपुत्र सुवर्षानके पिताकाही अनेक जन्मके परचात् गुरु धर्मदास साहब बनना लिखा है किन्तु अभी जो इस पुस्तकके साबही छपे हुए अनुरागसागरमें सो बात नहीं है उसका कारण यह है कि वर्तमान आचार्य वं० श्री उग्रनाथ साहबकी सेवामें जो अनुरागसागरकी प्रति छपानेके लिये मुसको मिली थी उसके अनुसाष्टी यह अनुरागसागर छपा है ।

बोधसागर

(३९)

सर्वानन्द वचन

सुनु जननी तब ज्ञान हंताना । काजोलहा संवादमतिजाना ॥ पण्डित कोई जीते मोहि नाहीं । सो जोलहा वादेहि हम पाहीं ॥

माता वचन

सुनु सुततबहि कहब हम ज्ञानी । जबजोलहहि जीतहु बुधवानी॥ जोलहहि जीतिआवहुतुम जबहीं। सर्वाजित कहब तोहि तबहीं ॥ तबहीं तोहि सिरसारव टीका । बिनुजोलहिजीजीतेबुदिकीका ॥

सर्वानन्द वचन

अहो माता कवीर कहाँ रहहीं । कौन भेषबानी का कहहीं ॥ ( कहाँ कवीर रहै हो माता । कौन भेष बाना है ताका )

माता वचन

हो सुत काशी रहत है सोई । अविगत लीला लखै न कोई ॥ ( काशी है उनका अस्थाना । तिनकर लीला कहा बखाना ॥ नामकवीर जोलहा कहलावहीं। भक्ति भेष सो हरिगुण गावहीं॥ ( जोलहा नाम कवीर बतावै । भक्ति भेष हरिगुन गावै ) जब जनती बहुते धिरकारा । बढचो कोध भयो विकरारा ॥ कीन्ह प्रणामचित्तवत अभिमाना। काशी कहँपुनि कीन्ह पयाना ॥ आये नगर पैसारी कीन्हा । घर पूछिकै चितवन लीन्हा ॥ तहाँ कमाली तहाँ कह गयेऊ । पन्थ विप्र तँहि पूछै लियेऊ ॥

सर्वजीत वचन कमाली प्रति

अहो कन्या मोहि कहहु बुझायी । कवीर जोलहाँ कहाँ रहायी ॥

कमाली वचन

कन्या बिहँसि कहेउ एकबानी । को अस घर कवीर गमिजानी॥ त्रिदेवता तिहुँपुर अधिकई । तिनहु घर कवीर गमिपाई ॥

बाव करेगा अर्थात् सर्वाजीत कहता है, कि, जब बड़े पंडितों ने हमको नहीं जीता तो बोलहा हमसे क्या शास्त्रार्थ करेगा ।

(४०)

ज्ञानप्रकाश

सुर नरसुनिऔ जहाँ लगि देवा । तेहि घरकी कोइ लखै न भेवा ॥ बीचहि अरुझि रहै यम फांसा । चीन्ह न पावे अविचल वासा ॥ घर कवीर जहाँ है भाई । तहाँ त यमराजा गमि पाई ॥ जाहिं दया सद्रगुरु की होई । घर कबीर गमि पाव सोई ॥ द्विज चकित कन्या की बाता । यह तो अचरज आहि विधाता ॥

सर्वजीत वचन

हो कन्या तुम्ह अचरज भाषा । अबमोहिंकहहुप्रगट अभिलाषा ॥ यह कन्या तो निजकर भाषा । धाम कबीर प्रगट कहै वासा ॥ काशी मांह रहहिं केहि ठाई । तौन भौन तुम्ह मोहिं बताई ॥

कमाली वचन

चलुद्विज तो कहभवन दिखाऊँ । कहो सो जाय संदेश सुनाऊँ ॥ तब सर्वांनन्द कीन्ह विचारा । जोहका ज्ञान देखों यहिवारा ॥

सर्वांनन्द वचन

जल पूरण वर्तन भरि लेहू । लै कबीरके आगे धरिदेहू ॥ कहुहिंसोमोहि सुनावहु आई । हो कन्या यह सुन चित लाई ॥ सन्मुख ले वर्तन धरिदैहो । जो कछु कहैंसो हमसे कहिहो ॥ कन्या भौन तुरत चलि आई । आवतहीं अस वचन सुनायी ॥ कन्या अस वचन उचरंता । विप्र द्वार ठाढ बुधिवंता ॥ जिन्ह जल पत्रदीन्ह मोहिं पाहीं । वचन संदेस कंहा कछु नाहीं ॥ तब हम उठके सुइ एकहेरा । जल मँहडारि दीन्ह तेहिं बेरा ॥ कन्या वरतन देहु तेहि जाई । पाछे हमहुं ताहिं पहुँ आई ॥ जाइ द्विजहिं जलवरतन दीन्हा । कन्यहिं विप्र पूछि पूनि लीन्हा ॥

सर्वांनन्द वचन

अहो कन्याकसकहिनविचारा । भाषिसुनावह सोनिरुवारा ॥

कमाली वचन

कन्या कहै भाषिन कछु नाहीं । सूरई एक डारि दीन्ह जलमाहीं ॥ पण्डित मूरख मरम न पावा । कहत न बूझै सूरई प्रभावा ॥

बोधसागर

(४१)

गुनहीं विप्र बहुत हिय माहीं । पुनि हमहू गै भेटेऊँ ताहीं ॥ कुशल प्रश्न पूछी सनमाना ॥

सर्वानन्द वचन

कहे पण्डित सुई मरम नहि जाना ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनो द्विजराई । अम्बु सुईगमि कहो बुझाई ॥ पठयउ जलभरि अस अनुमाने । हम विद्या सम्पूर्ण अघाने ॥ जिमि वरतन जलअम्बुन समाई । तिमिहम विद्या रहे अचाई ॥ भरै महाँ का भरै कबीरू । अस तुम्हरे चित सुनमतधीरू ॥ तुव हियगमि जानि द्विजराई । तब दीन्हही जल सुई एक नाई ॥ जौ विद्या सम्पूर्ण हो भाई । तौ शब्द हमार बेधि तोहिजाई ॥ सुनि पण्डित चितसम्भव आना । हृदय कहै अगमइन ज्ञाना ॥ तेहि क्षण रहेऊँ हिये अनुमानी । प्रातहिं करब गोष्ठि कहानी ॥ छन्द-तेहि दियो आसन आत्म पोषन भाव सहित समपैऊँ ॥ द्विज कीन्ह भोजन सेज पौदे रैनि हिये बहु तकेऊँ ॥ चिन्ता करत बहुत गुनावन वेद विधान ज्ञान अटावहीं ॥ होत प्रात कीजे वाद जो लहहिं जीव युक्ति अटावहीं ॥ साखी-वीतेउ रैन प्रभात औ, करि विचार मन माहँ ॥ सत्यनाम पद सुमिरिकै, पहुँच गये तिहि पाहँ ॥ सोरठा-भयेउ विप्र उठि ठाढ़, गयेउ जंगलकी दिसा ॥ करत तरक चित गाढ़, बैठे तजे शरीर मल ॥

चौपाई

हम गै रामनाम तेहि कहेऊँ । सुनतहिविप्रहृदय अति दहेऊँ ॥ भयेउकोप अतिकीन्ह प्रसन जल । इच्छायुक्ति नासिकै तजीमल ॥

(४२)

ज्ञानप्रकाश

सर्वानंद वचन

कहै विप्र देख्यो तुव ज्ञाना । फिरिजोलहा तुम्हजातिअयाना॥ ऐसे समय राम तुम्ह बोले । कहा कहो हरि त्रास न डोले ॥

कबीर वचन

अहोविप्र मोहिं कहहु बुझाई । कौनी सभै रामलौ लायी ॥

सर्वानंद वचन

कहा सर्वानन्दमुनहु जोलाहा । करम नीति भाषौ तोहि पाहा॥ वेद प्रमान लै माटी पानी । तबमुख शुद्धराम जपुजानी ॥

कबीर वचन

अहो विप्र जो हम अस करहीं । तौ मुख शुद्ध होय संचरहीं ॥

सर्वानन्द वचन

कहै विप्र है वेद प्रमाना । तब मुख होय पवित्र सुजाना ॥ यह कहिचलिभौ सुरसरितीरा । कर पग मज्जहिं मुखदे नीरा ॥ हम पुनिकर पगु मजे लीन्हा । कर पखारि पुनि कुछा कीन्हा॥ कुछा कीन्ह द्विजवचन प्रमाना । एक कुछा तेहिं ऊपर ताना ॥

सर्वानन्द वचन

चिहुँकि उठे द्विज यहका कीन्हा । फिरिजोलहा तुम्हजाति कमीना ॥

कबीर वचन

हो सर्वानन्दमुख शुचि भयऊ । कुछा कीन्ह अशुचि तर गयऊ॥ यहिविधि मुखशुचि तुम भाषा । तुम्हरो कहा हिये महाँ राखा ॥ हो सर्वानन्द तुझ बड ज्ञानी । सत्य नाममर्मअजहूँनहिजानी॥ रज अरु बीज नरककी देही । सदाअशुचि शुचिनाम सनेही ॥ जो मल तजत प्राण करे गवना । करमुख शुचि हरिजप कवना ॥ समुझि शब्दसो रहु मुखचाहू । उत्तर कछु तब दीन्ह न ताहू ॥ पुनि द्विजमंजनलागु शरीरा । ताभ्रपात्र एक लीन्ह कबीरा ॥

बोधसागर

(४३)

गोबर घोरि ताहि भरि लीन्हा । वरतन कर मुख टाँकन दीन्हा ॥ लै त्रिन रेनु जल मंजै ताही । झलकै अधिक प्रगट मल नाही ॥

सर्वानन्द वचन

कहा सर्वानंद सुनहुँ कबीरा । भो सुन्दर वर्तन मति धीरा ॥ केहि कारण अब मांजहु भाई । मल नहि तनिको देइ दिखाई ॥

कबीर वचन

सुनु पंडित नीक तुम्ह कहेऊ । अपर शुचि अन्तर पल रहेऊ ॥ मोहडा खोलि उलटि दिखलावा । सर्वानन्द देखि धिन पावा ॥ सुनु सर्वानन्द अस नर बाता । अंतर मल प्रगट शुचि गाता ॥ जलमञ्जन तन मैल नशायी । मन मल कहो कौन विधि जायी ॥ विन गुरु ज्ञान न मन शुचि होई । रैन दिवस तन मज्जे कोई ॥

सर्वानन्द वचन

कहै विप्र मन मल कहु मोहीं ।

कबीर वचन

कहै कबीर कहौ मैं तोहीं ॥ काम क्रोध तृष्णा हंकारा । लोभ मोह मन मैल विकारा ॥ परनिन्दा परघात अनीती । मन रहै अशुचि कुकर्म कुनीती ॥ छन्द-सुनु विप्र सोई पंडित सोई ज्ञाता जो परमोघै पाचहीं ॥ जहँ लगि योगी मुनी मुनीश्वर पांच वशि सब नाचहीं ॥ यहि पाँचके परपञ्च महँ सब परे शिव सनकादिक हो ॥ इन्द्र आदि अरु बहु भेष लूटे विष्णु ओ ब्रह्मादि हो ॥ साखी-असरे पखेरिन्ह लूटिया, को नर कीट पतंग ॥ कहै कबीर सो ऊबरे, निरख परखि करे संग ॥ सोरठा-करि गुरु पद परतीति, सदगुरु शब्द निरखत चले ॥ निश्चै पाँचौ जीति, घर अंजोर जागत रहै ॥

(४४)

ज्ञानप्रकाश

चौपाई

सर्वानन्द मगन मन भयऊ । पै उत्तर कछुओ नहि दियऊ ॥ पुनि लागे जल अरपे सोई । चित निश्चल छल एक न होई ॥ हम जल उलिचन लागु करारे । सर्वानन्द पुनि मोहिं निहारे ॥

सर्वानन्द वचन

कहैं सर्वानन्द सुनहु कबीरा । काह कवन उलिचन हौ नीरा ॥

कबीर वचन

कहैं कबीर सुनु विप्र सुजाना । फुलवारी गुरु केर सुखाना ॥ तेहि सींचन कहैं पठइन्हि नीरू । सुनु पण्डित अस कहहिं कबीरू ॥

सर्वानन्द वचन

कह सर्वानन्द यह अनरीती । बात अगम भाषहु विपरीती ॥ कहाँ धौं फुलवारी है भाई । जल सुरसरि महाँ रहै समाई ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनु पण्डित राजू । तुम्ह जल उलिचौ कौने काजू ॥

सर्वानन्द वचन

कहा सर्वानन्द सुनहु गोसाईँ । देव पितर जल तृषित अघाई ॥

कबीर वचन

हो सर्वानन्द कहहु यह मोहीं । कहा पितर तुव पूछों तोहीं ॥

सर्वानन्द वचन

कहे सर्वानन्द सुनहु सुजाना । देव पितर मम स्वर्ग अस्थाना ॥

कबीर वचन

कहैं कबीर जल ठामहिं रहई । कहहु पितरधौं केहि विधि लहई ॥ कीधौं जलहिं रहै तव पुरखा । पेढ़हु वेद यह लखेउ न सुरखा ॥ वेद शास्त्र नहिं करहु विचार । हरिके कचन आहिं जग सारा ॥ पित्ररूप जनार्दन भाखा । जनार्दन आप सन्तन्हमहँ राखा ॥

बोधसागर

(४५)

हमरे अस मति जानिय भाई । साधु माहिं प्रभु प्रकट रहाई ॥ जहाँ हरी तहाँ पितर अरु देवा । सब होइ तस साधुकी सेवा ॥ कहाँ अन्तै प्रभु खोजौ जाई । हम देखै प्रभु सन्तन आई ॥ हरिऔ सन्त दोय जनिजानौ । प्रभु कहै सन्तन्ह माहिं पिछानौ ॥ अस परतीति आनहु उरमाहीं । सन्तन्हतजि अन्तै प्रभु नाहीं ॥ जल तरंग जल आहे भाई । हरि हरिजन अस माँहि रहाई ॥ जैसे वृक्ष वृक्षकी छाया । अस हरिहरिजनमाहिं रहाया ॥ छन्द-तुलसी अभूषण जीवदायातहाँ आपुहरि निशिदिन रहै ॥ अरु तहाँ प्रकट निवास प्रभु गुरु साधु सेवा जो गहै ॥ हैं आपु सर्व भूतमय प्रभु गुप्त प्रगट लेखिये ॥ हरि प्रगट सन्तन्ह गुप्त जग शास्त्र निगम विवेकिये ॥

दोहा-हरिपूरण सब माहिहै, पण्डित करहु विचार ॥ ज्ञान दृष्टि ते परखहू, कहै कबीर विचार ॥ सो०-ज्ञान दिव्य जब होय, करम गरम तब छूटई ॥ पण्डित गहहु विलोय, देव पितर सब साधु महाँ ॥

चौपाई

रहेउ मुग्ध होय कछु नहिं बोला । ज्ञाता शब्द परखि हिय डोला ॥ पुनि चौकाकरि शिला विडावा । प्रतिमापूजन कहै मन लावा ॥ वेद नित्य बहु करहिं विधाना । तहाँ हमहू उपाय यकठाना ॥ मुरतिन कहै पुनि पूछहिं कुशलता । कहै न मूरति कछु मुखबाता ॥ हो पण्डित कस देव तुम्हारा । एकहु बात न सुनहिं हमारा ॥ तब हम पण्डित सोयह कहिया । प्रतिमा पूजन जेहिचितरहिया ॥

कबीर वचन

हो पण्डित कस देव तुम्हारा । एकहु बात न सुनहिं हमारा ॥ मेवा मिठाई साजि धरु आगे । खाहिं न मूरति परम अभागे ॥

(४६)

ज्ञानप्रकाश

औंख कान मुख नाही स्वासा । केहि बिधिमूरति करहिं गरासा ॥ हो पण्डित जनि सुनत रिसाहू । कहो परमारथ शब्द उछाहू ॥ मूरति सरीजव पूजहू ताहीं । इन्ह ते सूछि उहै सुनु आहीं ॥ सरजिव पातीं तोरि तुम आना । सो ले निरजिव पूजा ठाना ॥ हो पंडित तुम आप न चीन्हा । विनु गुरुज्ञान चक्षुबुधि हीना ॥ जग महाँ ब्याह करै जो कोई । आपुते अधिक होय जो सोई ॥ आपुते अधिक मिलै जो नाहीं । तौ निज समन रखो जमिलाई ॥ तुम सर्जीव घट ब्रह्म समायी । कस निजीव अबोल मन लायी ॥ सरजीव होय सरजीव कहीं सेवे । ज्ञानी शब्द परखि हिय लेवे ॥ मैं तोहिं कहो सुनो हो देवा । जिव है अमर अलेक अभेवा ॥ जीव अमर तन विनशे भाई । तन धरि जीव बहुत दुख पाई ॥ अमर नाम जब जीए भेटें । जेहिजन्म मरणको संशय भेटें ॥ अमर नाम खोजहु द्विज राई । जेहिप्रताप यम निकट न आई ॥ अमरनाथ सत्पुरुषको सारा । सत्यपुरुष सत्यलोक मैझारा ॥ अमरलोक सतलोकहि आहीं । तीनि लोक परलैतर जाहीं ॥ कृत्रिम कला नाम धरु जेते । जनमै मरै प्रलयतर भै तेते ॥ जासु चेतना अमर है भाई । तासु नाम अमर सुखदाई ॥ अमर देह सत्पुरुषके आही । वो नहिं आवै गर्भके माही ॥ जो सतगुरु पद रहै समायी । ते हंसा सतलोकहीं जायी ॥ अमर नाम सतगुरुते पावै । सतगुरु अस्थिर ध्यान लखावै ॥ भूत भविष्य जपै नर लोई । सत्यनाम विनु मुक्ति न होई ॥ वरतमान महाँ सतगुरु सारा । सतगुरु भवतारण कैंडिहोरा ॥ जागृत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया । जागृत आहि संजीवन सुरिया ॥ जागृत रहै तुरिया सो पावै । स्वप्न सुषुप्ति जग भरमावै ॥ पुरुष विदेह तुरिया अस्थाना । जागृत ब्रह्म देहुमों जाना ॥

१ करणधारका अपभ्रंश है ।

बोधसागर

(४७)

तीरथ वरत जप पूजा पाती । करम भरम ओजाति कुजाती॥ यह मति स्वप्न सुषुप्ती अहई । जाग्रत विलु कोई भेद न लहई॥ जाग्रत ब्रह्म देह धरु सोई । सबसे श्रेष्ठ साधु गुरु होई ॥ बोलता तजिकिमि जड़लो लायी । जड़पषान सेव कहैं पायीं ॥ इतना कहि फिरि हम कहिया । तिन आपनहाथयक बाहररखिया॥ हो पण्डित यक बूझों तोही । करि विवेक चित कहिये मोही॥ बायूँकर चौका के बाहर । केहि कारण सो कहहु विद्याधर॥

सर्वानन्द वचन

सर्वानन्द कहै अस सूत्रा । बाएँ कर परसे मल सूत्रा ॥ केहि कारण यह कीन्ह निषेधा । चौकाके बाहर कर जिन्दा ॥

कबीर वचन

कहै कबीर यह अचरज बाता । उलटी रीति अपंथ जगजाता॥ तुम्हरे हृदय मई मल भरिया । मलद्वारे मल त्यागित करिया॥ कर शुचि करै अशुचिमलद्वारा । ताहि निषेध तुम करिडारा ॥ विपरीति कथा कहौ कस भाई । राजा पण्डित सब अन्याई ॥ धन्य पंडित धन्य तोर वेदा । कहै कबीर सिद्ध मत भेदा ॥ सुनिवाणी चितभयेउ अँजोरा । लागेउ शब्द प्रेम हित मोरा ॥ नायशिरतिन दुइकर जोरा । जो कछु कहो सो है सब थोरा॥ पुनि जलपान करै तिन चाही । जल माटीके वरतन माही ॥ करवा छुई दीन्ह हम भाई । सर्वानन्द चित रहेउ सकाई ॥ कर करवा लै रह मुख चाहीं । भरम बड़ो जल अँचवै नाहीं ॥

सर्वानंद वचन

कस छुयेउ मम वरतन स्वामी । हम ब्राह्मण तुम यती अनामी ॥

कबीर वचन

हो पंडित यह कहहु बुझायी । उत्तम मध्यम सो कोहै भाई ॥

(४८)

ज्ञानप्रकाश

छन्द-तन अस्थि माँस रुधिर त्वचा सर्व में सुनु एक है ॥ प्रकृति तत्त्व त्रिगुण सबै यह कौन भेद विधेक है ॥ सो ब्रह्म विप्र सर्वमयी सर्वमयी सुनु एक जो ॥ पठि शास्तर निगम पुराण बहु भरम कहा मंडेक जो ॥ दोहा-कर्म अशुचि जेहि देखिये, सो अस करै विचार ॥ सन्त सों दुचिताइ किये, कहैं कबीर पुकार ॥ सोरठा-मन महाँ रहेउ लजाय, सर्वांनन्द अनीति लखि ॥ मम पदशीश नवाय, कहैं धन्य तुम्ह धन्य हो ॥

चौपाई

जब प्रसाद कै कीन्ह अरम्भा । तब जमि बालकको देत है थम्भा ॥ हमहिं कहसि गवनहँ प्रभुगेहा । करब प्रसाद पोषन निज देहा ॥ तासु हृदय बुधिलखि हमपाये । ताते वेगि भवन चलि आये ॥ तब उन अशुचकर्मयक कीन्हा । धर्मदास तुम सुनो प्रवीना ॥ अजा एक पुनि गुप्त मँगायो । गुप्तहि ताकर गला कटायो ॥ निज सेवकन सोकहि समुझावै । अजगा सुधि कबीर नहि पावै ॥ गुप्त रसोई मासु रँधायेसि । बहुविधि अन्तरपाट दिआयेसि ॥ तब चौका पर बैठे जबहीं । हाड़ एक कर लीन्हेसि तबहीं ॥ तेहि क्षण हमहूँ पहुँचे जायी । मोहिं देखत रहु शीश नवायी ॥

कबीर वचन

तब हम कहो सुनो द्विजराई । हमते अन्तर पाट दिवाई ॥ गुप्त अकर्म करै नर कोइ । प्रभु ते नाहि छिपै पुनि सोई ॥ जगकर्ता तुम सङ्गहि देखै । नाहि न लखै नर वह सब पेखै ॥ पाप पुण्य नहि छिपै छिपाये । केतिक जो नर राखु दुराये ॥ नरनारी जिमिलहसुन खायी । गुप्त खाहिं वह पुनि प्रकटायी ॥ तुम्ह अस श्रुतिधारी सज्जानी । सो नहिं जलहु पाठ पहिचानी ॥ हाथ हाड़ मुख थारि हि हाडा । स्वान स्वाँग बन्यो अतिगाढा ॥