कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
(४९)
धन्य धन्य तुम्ह पण्डित राजू । तुम ब्राह्मण हो का कर काजू ॥ करि अज्ञानतिलक शुठि नीको । कांधजनेउ चाल विनुफीको ॥ उत्तम जाति चालु किमि नीचा । छये चमार तब बालहु सीचा ॥ तोहिँ औ स्वानसो कस भीना । विप्र चमार चालु तुम्ह हीना ॥ पछिली रीति नहिंसमुझहु भेवा । सनकादिक नारद शुकदेवा ॥ किनअसकर्म कीन्ह कछु मोही । द्विजकी चाल न देखौं तोही ॥ हो पण्डित तोहि दया न आई । कैसे परगल काटे भाई ॥ कर्म कसाई विप्र कहावहु । मानुषदेह तुम वादिगैवावहु ॥ सर्वमयी भाषहु भगवाना । केहि गरकाटेहु कहहु सयाना ॥ जीव दया जेहि हृदये नाई । कहैं कबीर सो आहिँ कसाई ॥ गीता भागवत देखु विचारी । जीव दया भाषै बनवारी ॥ जिह्वा स्वाद काज जिव खोवे । जानि बूझि का जनम विगोवे ॥ एक तो भूले गूढ अयाने । तुम्हका दृष्टि देखि बौराने ॥ भूले मूढ जगत्के ज्ञानी । तुमको सृष्टि देखि बौरानी ॥ लाग्यो शब्द सारहियमाहीं । चितगहिपरचे आउ हियमाहीं ॥ तेज हाँड़ पदगहि अकुलायी ।
मोहि अचेत कहैं लियेउ जगायी ॥
सर्वानन्द वचन
मैं भूलेउँ विद्या अभिमाना । अबहिय बेध्यो शब्द सहिदाना ॥ मुख मंजन करि उठे तुरन्ता । पद गहि कहैतबकला अनन्ता ॥ अबमोहि शरणलेहुतुम स्वामी । कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी ॥ पुस्तक बहुत आनिधरि आगे । दीन वचन कहि अति अनुगगे ॥ रामानन्द पहुँ तेहि लै गयऊ । गुरुकी दीक्षा ताहि दिवयऊ ॥ भक्ति भेष तिन्ह लीन्हैसि भाई । गुरु ठिगकहहि साधु सेवकाई ॥ गुरुते बिदा मांगि दिन एका । जननी पहुँ कहिचले विवेका ॥
आरती विधि
(५०)
ज्ञानप्रकाश
धन्य धन्य जननी सुखदायी । जिन्हयह मोहि उपदेश बतायी॥ जाय भवन निज पहुंचे जबही । धाय जननि पग लगै तबही ॥ छन्द-तुम धन्य माता मोहि उधारेउ कहेउ सार उपदेश हो ॥ जाय दास कबीर कहि उन्ह हरेउ कालकलेश हो ॥ मैं थकेउँ उनते वाद करि वे ब्रह्म अविचल नाथ हो ॥ कछु कहत बने ना कला उनकी भयउ बहुत सनाथ हो ॥ साखी-सुनु जननी यह चित दै, हम उनकर शिक्षा लीन्ह ॥ मोहि प्रतीति उनसे वैसी, उन्ह गुरु कै दिशा दीन्ह ॥ सोरठा-भै जन्म शुभ मोर, पहुंचेउ मोक्ष रु मुक्ति घर ॥ जननी गुण बड़ तोर, कबहुँ न ददय तेविसारिहौं ॥
इति सर्वांनन्दकी गोष्ठी
सतगुरु वचन-चौपाई
हे धर्मदास तोहि कहि ससुझावा । सर्वांनन्द सो जो बनि आवा॥
धर्मदास वचन
धन्यधन्यसाहिबअविगतनाथा । प्रभुमोहिनिशिदिनराखोसाथा॥ सुतपरिजन मोहि कछु न सोहाई। धनदारा तिहुँ लोक बड़ाई ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि तुम्ह हमरे साथा । मिलीसुरतितब दुइ नहिंवाता॥ निरखोसुरति नाम लौ लाओ । तनछूटे सत्यलोक सिधाओ ॥ जीवन शब्द चेतावहु भाई । चेतिहिं जीव पुरुष लौ लाई ॥ अङ्ग मोर तुम लेहु सँभारी । जम्बूद्वीप तुम करहु कडिहारी॥ लै जीवन सतभक्ति ददाओ । तब तुम्ह सत्य पुरुष कहँ भाओ॥ सवालाख लै आरति करई । बोधहु जाहि लोक संचरई ॥
धर्मदास वचन
हे साहब मैं बूझों तोही । दयाकरी प्रभु कहिये सब मोही॥ सवालाख नहिं होय जेहि पाहीं। ताहि कहहु बोधबकी नाहीं ॥
बोधसागर
(५१)
सतगुरु वचन
धर्मदास जनि ताहि प्रबोधो । सवा लाख अरपै तेहि बोधो ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब तब बनिहैं नाहीं । सवा लाख विनु जीव यम खाहीं ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि जो आधौ होई । करि आरति देउ पान सजोई ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब भाषहु कछु थोरा । होय निस्तार जीवन बन्दीछोरा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास जो विन्ती करहु । सवा लाख चौथाई धगहु ॥
धर्मदास वचन
हो समरथ यह दायो कीजै । बोझ थोर जीवनपर दीजै ॥
द्रव्यहीन जिव केहि विधि तरिहैं । यम राजा तेहि भक्षण करिहैं ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि चौथाइहु चौथाई । यहि प्रमाण लै आरति लाई ॥
धर्मदास वचन
अहो साहेब कलिजीव अयाना । भाषहु शब्द थोर परवाना ॥
भाषहु थोर तुव पद लौलीना । कलियुग जीव द्रव्यके हीना ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मदास मानहु शिर नार्ई । अब जो कहा सो राखु दढार्ई ॥
हम निःइच्छा चाव कछु नाहीं । है मर्याद गुरुसेवा चाहीं ॥
गुरु साधु सेवा नहिं करिहैं । कहो सो जीव कौने विधि तरिहैं ॥
चौथाई कर जो चौथाई । तासु चौथाई मान लेहु भाई ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु मैं चित बहुत सकाऊं । कत साहिब सो उत्तर लाऊं ॥
जाहि न होय शक्ति गुरु एता । सो जिव ऐसहि जाय अचेता ॥
औरो थोर कहौ प्रभु राई । जेहि ते जीव न यम धरि जाई ॥
(५२)
ज्ञानप्रकाश
सतगुरु वचन
धर्मदास बहु कीन्ह निहोरा । कह्यो सो वचन मान लियो तोरा ॥ यह जो कहेऊँ चौथाई तेहि होई । तासु चौथाई करि आरति सोई ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु कलिके जीव दरिद्रा । जाहि न होइहैं एतिक सुद्रा ॥ सो कैसे तोहिं पैहै स्वामी । कहहु थोर प्रभु अन्तर्यामी ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास बहु कियेहु महताई । सवा पाँच सुद्रा लेहु भाई ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु विनती करो बहोरी । जाहि न एतिक किमि बंदी छोरी ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि दोय नारियर आने । सवा पाँच आधो लै ठानै ॥
धर्मदास वचन
सवा पाँच आधो जेहि नाहीं । हो प्रभु सो जिव कैसत राहीं ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जेहि इतनो नहिं होई । तासु प्रमोधेहु कहौ बिलोई ॥ सवा सेर मिष्टान्न मँगाओ । पान सवा सै उत्तम लाओ ॥ सवा हाथ बस्तर पुनि श्वेता । अग्र पुहुप पूँगी फल चेता ॥ गोघृत शुचि दीपक बारी । बैठि सिंहासन नाम सुधारी ॥ अन्तरध्यान सुरति संचरिये । सत्यसुकृत कहैं मालुम करिये ॥ यम तृण तोरहु वीरा दीजै । शक्ति होय तब आरति कीजै ॥ प्रति सम्भवत गुरु आरति चाही । आरति करै शक्ति होय जाही ॥ शक्ति अछतनहि आरति करई । भक्तिहीन बहु संकट परई ॥ माया ठगनी आहि रे भाई । यह काहूके संग न जाई ॥ जिन गुरु साधु सेवा चित लावा । सो माया कहैं जीति सिधावा ॥ जिन माया कहैं जोगयो भाई । नहिं परमारथ स्वारथ लाई ॥ सो जीव अन्त बहुत दुख पावै । भक्तिहीन यम नाच नचावै ॥
बोधसागर
(५३)
धर्मदास वचन
हो प्रभु तुम्ह सतपुरुष कृपाला । अन्तर्यामी दीन दयाला ॥ मोहि निश्चय तुवपद विश्वासा । यह माया स्वप्नेकी आशा ॥ जिन्ह जिन्ह माया नेह बढाया । तिन्ह २ निज २ जन्म गँवाया ॥ सवालाख तुम मोहि बतायो । सवा करोड प्रभु आरति लायो ॥ औ जन सप्पति मोर घरआही । अरपौ सभै संतन जो चाही ॥ तुम प्रभु निःइच्छा नहिं चाहो । धन्य समरथ मर्याद दिढाहो ॥ सो जिव पाँवर नरकै जायी । शक्ति अक्षत जो राखु छिपायी ॥ हो प्रभु कलु विनती अनुसार्हूँ । बकसहु दिढाई तो वचन उचारहूँ ॥ सवाशेर भाषहु मिष्टाना । औरौ वस्तु सवासो पाना ॥ हो प्रभु कोई जिव भिक्षुक होई । भीख माँगि तन पालै सोई ॥ सो जिव शब्द तोहार न जानै । कहहु केहि विधि लोक पयानै ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मनि जो अस जिव होई । गुरु निज ओर करै पुनि सोई ॥ इतने विनु जिव रोकि न राखा । छोरी बन्ध नाम तिहि भाखा ॥
धर्मदास वचन
धन्य धन्य तुम दीन दयाला । दया सिन्धु दुखहरण कृपाला ॥ छन्द-तुम धन्य सदगुरु जीव रक्षक कालमर्दन नाम हो ॥ शुभ पन्थ भक्ति दिढायऊ प्रभु अमर सुखके धाम हो ॥ मैं सुदिन आपन तबहिं जान्यो प्रथमपद जब देखेऊँ ॥ अब भयेऊँ सुखी निशङ्क यमते सुफल जीवन लेखेऊँ ॥ दोहा-विनती एक करौ प्रभु, कृपा करहु जंगदीश ॥ दो सेवक जो तुम मिले, सो तो कहूँ नहिं दीश ॥
सतगुरु वचन
सोरठा-धर्मदास लेहु जानि, हम वो एकै थान है ॥ कहौ शब्द परमान, वो हम में उन माँहि हम ॥
(५४)
ज्ञानप्रकाश
धर्मदास वचन-चौपाई
हो प्रभु उन मोहिँ बड़ सुख दीन्ह। तुम भये गुप्त राखि उन्ह लीन्ह॥ विरह सिन्धु बूड़त उन्ह राखा। उन्ह दृशन की है अभिलाखा॥
सतगुरु वचन
हो धर्मनि हम माँहि उन्ह देखो। उन्ह मोहिँ द्वितीय भाव जनिलेखो॥ स्वामा सेवक एकै प्र ना। परिचै सुरति नाहिँ विलगाना॥ हो धर्मनि तुमहूँ हम माहीं। मोहिँ तोहिँ अब अन्तर नाहीं॥ जो सेवक गुरु सुरति खमीरा। जीवन मुक्ति सो आहि कबीरा॥ जेहि सेवक गुरुहीं परशंसा। कहै कबार सो निर्मल हंसा॥ सेवक कहँ अस चाहिये भाई। गुरुहिँ रिझावे आपु गँवाई॥ जिमि नटकला मगन होय खेला। तिमि गुरु भक्ति मगन होय चेला॥ निजतन मन सुख स्वाद गँवावै। मन वच कर्म गुरु सेवा लावै॥ निशि वासर सेवा चित देई। गुरुहिँ रिझाय परम पद लेई॥ जग पहाँ सेवा वश भगवाना। धर्मदास यह वचन प्रमाना॥ सेवक सुरति प्रीति वश भाई। शून्य महा वस्ती होय जाई॥ तैसी प्रीति सुरति शुचि सेवा। किमि प्रसन्न नहिँ होहिँ गुरु देवा॥ धर्मनि सो सेवक मोहिँ भावै। जो गुरु साधु सेवा चित लावै॥ सेवा करि नहिँ धरै हंकारा। रहै अधीन दास सोइ प्यारा॥ हा धर्मनि तुम्ह अससिख अहहू। हम तुम्ह एक साँच हिय गहहू॥
धर्मदास वचन
धर्मदास पद गहे अनुरागा। हो प्रभु तुम्ह सोहि कीन्ह सुभागा॥ मैं पामर गुणहीन कुचाली। तुम्ह दीन्है उ मोहि पन्थ मराली॥ हे प्रभु नहि रसना प्रभुताई। अमित रसन गुण वरणि नहि जाई॥ महिमा अमित अहे हो स्वामी। केहि विधि वणौ अन्तर्यामी॥ जेहि सेवक पर होय तव दाया। ताके हृदय बुद्धि अस आया॥ पूर्ण भाग करै सेवकाई। धन्य सेवक जिन्ह गुरुहिँ रिझाई॥ मैं सब विधि अयोग्य अविचारी। मोहि अधर्महि तुम लीन्ह उबारी॥
कबीर साहबका चौथीबार अन्तर्धान होना और धर्मदास साहबका व्याकुल होना और पांचवीबार फिर मिलना
बोधसागर
(५५)
अब यह दया करो सुखदाई । दोउ सेवक कै दरशन पाई ॥ बड़ इच्छा उन्ह दरशन केरा । हो प्रभु हम आहीं तुव चेरा ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्म निदरशन तिन्ह पैहौ । लीला देखि थकित होइ जैहौ ॥ आप तीनरूप प्रकट दिखावा । एक तीन होय एक समावा ॥ धरमदास अचरज है रहेऊ । समिता होय युगल पद गहेऊ ॥ लीला देखि चकित भये दासा । पुनि विनती एककीन्ह प्रगासा ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु अविगति कला तुम्हारी । हम हैं कीट जीव व्यभिचारी ॥ सत्यलोक तुम्ह वरणि सुनावा । सोभा पुरुष ईसन सतभावा ॥ कैसन देश राज वह आही । चित इच्छा प्रभु देखन ताही ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास यह निरघिन काया । यहितन पुरुष दरश किमि पाया ॥ तन ठीका जब पुरि है आई । सत्यलोक तब देखहु जाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास गहि चरण निहोरा । हे प्रभु तृषा मिटावहु मोरा ॥ चरण टेकि प्रभु विनवौ तोहीं । पुरुष दरश विनु कल नहिं मोहीं ॥
कबीर साहिबका फिर अन्तर्धान हो जाना और धर्मदास
साहबका विकल होना
गुप्त भये प्रभु अविगति ताता । धर्मदास मुख आवै न बाता ॥
धर्मदासविलाप
मैं मतिहीनकुमति मुहिलागा । मोहिंसमको जग आहि अभगा ॥ मैं मूरख प्रतीति न कीन्हा । अस साहेब कहैं मैं नहि चीन्हा ॥ अब कौने विधि दरशन पाऊँ । दरशन विनु मैं प्राण गवाऊँ ॥ चरणोदक विनु करौं न आसा । तजौं शरीर कहैं धर्मदासा ॥ दिवस सात लगि अन्न न खावा । भजन अखण्ड नाम लौलावा ॥
धर्मदासजीको सत्यलोक दिखाना
(५६)
ज्ञानप्रकाश
कबौर साहिबका पांचवीं बार फिर धर्मदासजीको दर्शन देना
सतयै दिन प्रभु प्रकट दिखाये । धर्मदास पद गहि अकुलाये ॥ धरहिं न श्वामहिनिपट अधीरा । परे चरण महाँ क्षीण शरीरा ॥ कर गहि साहब तबहिं उठावा । शीश हाथ दै अंक मिलावा ॥ धर्मदास चरणोदक लीन्हा । चरण पखारि आचमन कीन्हा ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मदास प्रमाद कछु पाओ । करि प्रसाद तव मोपहैं आओ ॥ छन्द-चित्तसकुचिधर्मनिविछुरन गुनि सर्वत्र सब हौरा किये ॥ कछु जाइ अलप प्रमाद ततक्षण तृण जल अंचवन लिये ॥ पुनि वेगि समरथ निकट आये सकुचि चित ठाढे भये ॥ अनुशासनो कहु धर्मनि कहा चित चिन्ता भये ॥
धर्मदास वचन
दोहा-धर्मदास कह नाइ शिर, सुनु प्रभु अगम अपार ॥ सात दिवस कहवों रहे, कौन दिशा पगु ढार ॥
सतगुरु वचन
सोरठा-धर्मनि सुनु चित लाय, जौन दिशा हम गौन किये । कालिजर पहुँचे जाय, तहाँ पुनि शब्द प्रकाशेउँ ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हो साहेब कै जीव परमोधा । कौन शब्द सो आन समोधा ॥ आरति चौका नरियर मोरचो । कै जीवन यमते तृणतोरचो ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि सुनहु ताहि सहिदाना । तहाँकेजीवहिंनहिंदीन्ह प्रवाना ॥ आरति चौका तहाँ न कीना । नहीं तहाँ नरियर मोरु प्रवीना ॥ वचन बंध जीवनकहैं कियेऊँ । साखी शब्द रमैनी दियेऊँ ॥ कहिआयेऊँतहैंवचन ठिकाना । धर्मदास सो न लियेहु प्रवाना ॥
बोधसागर
(५७)
जम्बूद्वीप कलिके कडिहारा । धर्मनि बाहु जीव होयँ पारा ॥ धर्मनि बाँह जिय पहुँचे आयी । देहु दान जेहि आरति लायी ॥ शब्द मानि पुनि मस्तक नाया । पुरुष दरशकै बात जनाया ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु चिन्तागण करु मोरा । पुरुष दरश देउ करो निहोरा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास यह हठ का करहु । मानहुँ शब्द शीश पर धरहु ॥ हमरे गहे पुरुष पहुँ जैहा । विना गहे उहाँ जान न पैहा ॥ हमसों पुरुष सो ऐसी अहई । जल तरंग जल अन्तर रहई ॥ जिमिरवि और वि तेजप्रकाशा । तिमिमाहि पुरुष अन्तर धर्मदासा ॥ हमरी सुरति गहौ चितलायी । तबहीं पुरुष पद दर्शन पायी ॥ शिष्य हृदय प्रतीति अस आनै । गुरु औ पुरुष भिन्न नहि जानै ॥ जौ लौ चित अस रीति न आवै । तौ लौ जिवनहि लोकसिधावै ॥ धर्मदास चित बहुत सकाने । चरण टेकि बहु विनती ठाने ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु सत्य कहौ तोहि पाहीं । तुम्हते कछु दुचितार्ई नाहीं ॥ मोरे तुमहि पुरुष हौ स्वामी । यमते छोड़ावहु अन्तर्यामी ॥ हो प्रभु बरणेउँ लोककी शोभा । ताते आहि मारममलोभा ॥ तव लीला बहुतै हम देखा । पुरुष दरशविनु रहै हिय रेखा ॥ जौ किंकर पर होहु दयाला । तौ छिन महाँहायगत उरसाला ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जौ ऐसो चित कीन्हा । तनुतजि चलौ लोकप्रवीना ॥ राखेउ तन गौने लै हंसा । तहँ पहुँचे जहँ कालै संसा ॥ लवन एक महाँ पहुँचे जाई । अविगति लीला लखै को भाई ॥ शोभालोक देखि सुख माना । उदित असंख्य शशिऔ भाना ॥
(५८)
ज्ञानप्रकाश
जितदेखिये जगमगझलकाहीं । देखत छकित भये हियमाहीं ॥ द्वारपाल हंस जो रहिया । ता महाँ एकहंसहिँ असकहिया ॥ एहि संसहिँ तुम्हजाहु लिवाई । पुरुष दरश दे आनहुँ भाई ॥ चले लिवाय पुरुष पहुँ जबहीं । झझकि हंस बहु आये तबहीं ॥ करत कोलाहल मंगल चारा । शोभा अद्भुत अंग अपारा ॥ हंसन शोभा कहाँ बताऊँ । कछुक प्रभाव सो वरणि सुनाऊँ ॥ रतनमाल ग्रिव शोभित हंसा । और मणिमाल किमिकरौँ प्रशंसा ॥ जगमग देह हंसन करहीं । अमर चीर बहु शोभा धरहीं ॥ उडुराख चिकुर शोभा छबि आछे । रविका करतार रोम छबिकाछे ॥ हंसन्हभाल शोभा किमि कहऊँ । षोडस चन्द्रभाल छबि लहऊँ ॥ हंस कान्ति प्रतिरोम प्रकाशा । हीरामणी उदित रोमासा ॥ कोटिकविधु हंसन छबिमोहा । देह प्राण शोभा अमी गिरोहा ॥ षोडश रवि हंसन छबि मोहा । देह प्राण शुभ अमृत सोहा ॥ कञ्चन कलश जडित मणि लोना । रतन थार आरतिमहि सोना ॥ हंस मगन शब्द मुख उचारा । कीडाविनोद रतन मणियारा ॥ सुरति हंस कहँ आगे लीन्हा । नृत करत चले हंस प्रवीणा ॥ सुरति हंस अप्रानि अघाने । पुरुष सकल देखत हरषाने ॥ सिंघासन छबि देखत मनमोहा । अद्भुत अमित कलातन सोहा ॥ पुरुष राम एक कला अनन्ता । वरणत कोउ न पावै अन्ता ॥ एक रोम रवि शशि कोटीशा । नखकोटिन्ह विधुमलिन रवीशा ॥ पुरुष प्रकाश सतलोक अँजोरा । तहाँ न पहुँच निरञ्जन चोरा ॥ पुरुष कबीर देखा एक भाई । धर्मदास पुनि रहे लजाई ॥ पुरुष दरश करि आयेउ तहँवा । प्रथम कबीर बैठे रहै जहँवा ॥ इहाँ कबीर बैठे पुनि देखा । कला पुरुष तन अचरजपेखा ॥ का अजगुत कीन्हैके भाई । उहाँ मोहिँ प्रतीति न आई ॥
बोधसागर
(५९)
कवीर पुरुष यक उहाँ छिपाये । सत्य पुरुष जग दास कहाये ॥ धाये चरण गहु अति सकुचायी । हे प्रभु हम परिचै अब पायी ॥ यह शोभा कस उहाँ छिपावा । कस नहिं जगमहँ प्रगट दिखावा ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जोवहि छवि जग जाऊ । तो होय विकल निरअन राऊ ॥ सब जीव तब मोहि लौलावे । उजरे भौ सब लोकहि आवै ॥ ताते गुप्त राखो जग भाऊ । शब्द सँदेश जीवन समुझाऊ ॥ शब्दपरखि चीन्हैं माहिं कोई । गहि प्रतीति घर पहुँचे सोई ॥ कहै कवीर सुनहुँ सुकृति हंसा । दरश पुरुष मिटेहु चित मंसा ॥ अब तुम्ह वेगि चला संसारा । जिवहि चेतावहु करहु पुकारा ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब अब उहाँ न जाही । यह सुख घरतजि कहाँ झुराही ॥ वहि यम देश अपरबल काला । नहिं जानौधौ मति होयवेहाला ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तोहि चिन्ता नाहीं । तुमरे सङ्ग हम सदा रहाहीं ॥ तुम देखो सत्य लोक प्रभाऊ । हंसन कहो संदेश सुनाऊ ॥
धर्मदास वचन
मानेउँ शब्द शीश पर राखा । लैचलु अंश सुकृत तब भाषा ॥ छिन एक महँ जगहीं चलि आये । पैठि देह धर्मनि अकुलाये ॥ परेउ चरण गहि साहब केरा । करि बिनती पदगहि सुख हेरा ॥
छन्द-धन्य साहेब सतगुरु तुम सत्य पुरुष अनादि हो ॥ तुव अमितलीला कोलखै प्रभु सकल लोकके तुम आदिहो ॥ त्रिदेव मुनि सनकादि नारद कोईना लखि तुम पावई ॥ तेहि हंस भाग सराहिये जो नाम तुव लौ लावई ॥
(६०)
ज्ञानप्रकाश
दोहा-निर्गुण सर्गुण आदिहौं, अविगति अगम अथाह ॥
गुप्त भये जग महाँ फिरो, को तुव पावै थाह ॥
सोरठा-मोहि परचै तुम दीन्ह, ताते चीन्हैउँ तोहि प्रभु ॥
भये चरण लौलीन, दुचितार्ई सकलो गयी ॥
चौपाई
कीट ते भुंङ्ग मोहि प्रभुकीन्ह। निश्चलरंग आपनो दीन्ह। ॥
जिमिनिलते जग होय फुलेला। तिमिमोहिं भयोसमर्थपदमेला॥
पारस परसि लोहा जिमिहेमा। तिमि मोहिं भयउनाथव्रतनेमा॥
अगर परसि जिमिभयोसुवासा। जल प्रसंग बसन मल नासा ॥
सनपट शुद्ध सूत कहै न कोई। प्रभुगुण लखित शिरनावैलोई ॥
हे प्रभु तिमिमाहिं भयउ अनंदा। जिमिचकोरहरहितलखिचंदा ॥
जनम मरण भौ संशय नाशी। तवपद सुखनिधान सुखराशी ॥
हे प्रभु अस शिख दीजै मोहीं। एकौ पल न विसारौं तोहीं ॥
सतगुरु वचन
जस मनसा तस आगे आवै। कहै कवीर ईजा नहिं पावै ॥
धर्मनि गुरुहिं दोष देह प्रानी। आपु करहिंनर आपनहानी ॥
जो गुरु वचन कहै चित लाई। ब्यापै नाहिं ताहि दुचितार्ई ॥
जो गुरुचरन शिष्य संयोग। उपजै ज्ञान न नासै भ्रम रोगा ॥
जिमि सौदागर साहु मिलाहीं। पूँजि जोग बहु लाभ बढ़ाहीं ॥
सतगुरु साहु सन्त सौदागर। सजीशब्द गुरुयोगा बहुनागर ॥
जो गुरु शब्द कहै विश्वासा। गुरु पूरा पुरवहिं आसा ॥
विनु विश्वास पावै दुखचैला। गहै न निश्चय हृदय गुरुमेला ॥
सुत नारी तन मन धन जाई। तन जोरहै न प्रीति टढाई ॥
शूरा हंस सोई कहलावै। अग्नि रहै तो शोक न लावै ॥
जो विचलै तौ यम धरि खायी। अड़ा रहै तौ निज घर जायी ॥
हंसरहनीवर्णन
बोधसागर
(६१)
काल कसौटी ठहरे हँसा । कहैं कबीर सोइ सुकृत अंसा ॥ सत्य असत्य जानि किमि जायी । कादर विचलै सूर रहायी ॥ धर्मदास तोहि बहुत बुझावा । रहनि गहनि सतपन्थ बतावा ॥ बहुते बेर सिखायो तोही । देखौ अयश न पावै मोही ॥ बहुरि कोटि शिखापन तोही । देखहुँ कोइ हँसै ना मोही ॥
रहनी वर्णन
अभ्यागत जो आवे द्वारा । सन्त असन्त सोहि विचारा ॥ दीजै भिक्षा हरष सो ताहीं । एहि सम योग पुण्य तप नाहीं ॥
धर्मदास वचन
हे साहेब विनती एक करऊं । समरथ जानि पट उतर धरऊं ॥ हे प्रभु रंक होय कोइ दासा । जाय अभ्यागत ताहि अवासा ॥ ताके घर कछु सुकृत न होई । सो कस करै कहो प्रभु सोई ॥ सो कस करै कहौ प्रभुराई । केहि प्रकार तेहि सेवा लाई ॥
सत्गुरु वचन
मुनु धर्मनि पथ नीती भाखे । शक्ति अछत पुनि गोय न राखे ॥ तन बस्तर लै गोय न भाई । जब अशक्त तब काह कराई ॥ आप खाय तब ताहि खिआवै । नहि तो यक सम समय गँवावै ॥ तीरथ व्रत जप तप बहु करमा । काहे परै याहि निज धरमा ॥ कोटि तीर्थ भ्रमर फल पावै । सो फल भरहीं साधु जिवैं ॥ मानो गुरु साधुनका बानी । कह कबीर शब्द सहिदानी ॥ कहै कबीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम गहि मिटै उपाधू ॥ सत्यकवीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम कहैं सत्य अवराधू ॥ सत्य नाम गहि तजे दुचितार्ई । कहैं कवीर हम ताहि सहाई ॥ सत्यनाम कहैं चीन्हैं सोई । कहैं कवीर गुरु गम जेहि होई ॥ को हम को तुम को है अनन्ता । कहैं कबीर यह बूझैं सन्ता ॥
(६२)
ज्ञानप्रकाश
सोइ हम सोइ तुम सोइ अनन्ता । कहैं कबीर गुरु पारस सन्ता ॥ सन्त चेतु चित सतगुरु ध्याना । कहैं कबीर सद्गुरु परमाना ॥ सतगुरु शब्द ज्ञान गुरु पुंजा । कहैं कबीर लखु मोहनकुंजा ॥ कुंज मोहि मोहन ठहरावै । कहैं कबीर सोइ सन्त कहावै ॥ सन्त कहाय जो सोधै आपू । कहैं कबीर तेहि पुण्य न पापू ॥ पुण्य पाप नहि मान गुमाना । कहैं कबीर सो लोक समाना ॥ जिन्दा सुरदा चीन्है जीवा । कहैं कबीर सतगुरु निज पीवा ॥ सुरदा जग जिन्दा सतनामा । कहैं कबीर सतगुरु निज धामा ॥ यक जग जीतै यक जग हारै । कहैं कबीर गुरु काज सवैरै ॥
धर्मदास बचन
कौन जग जीतै कौन जग हारै । कहौ कौन विधि काज सवैरै ॥
सतगुरु बचन
इन्द्रिन जीते साधुन सो हारै । कहैं कबीर सतगुरु निस्तारै ॥ सतगुरु सो सत्यनाम लखावै । सतपुर लै हंसन पहुँचावै ॥ सत्यनाम सतगुरु तत भाखा । शब्द ग्रन्थ कथि गुप्तहि राखा ॥ सत्य शब्द गुरु गम पहिचाना । विनु जिभ्या करु अमृत पाना ॥ सत्य सुरति अम्मर सुख चीरा । अमी अंकका साजहु वीरा ॥ सोहं ओहं जावन वीरु । धर्मदास सो कहै कबीरु ॥ धरिहौ गोय कहिहौ जिन काहीं । नाद सुशील लखैहो ताहीं ॥ प्रथमहि नाद विन्द तब कीन्हा । मुक्ति पन्थ सो नाद गहि चीन्हा ॥ नाद सो शब्द पुरुष मुख बानी । गुरुमुख शब्द सो नाद बखानी ॥ पुरुष नाद सुत षोडश अहई । नाद पुत्र शिष्य शब्द जो लहई ॥ शब्द प्रतीति गहै जो हंसा । शब्द चालु जेहिसे मम बंशा ॥ शब्द चाल नाद दृढ़ गहई । यम शिर पगु देइ सो निस्तरई ॥ सुमिरण दया सेवा चित धरई । सत्यनाम गहि हंसा तरई ॥
पठित मूर्खका वर्णन
बोधसागर
(६३)
बिन्दो होय शब्द मम धावैँ । नाहबिन्दु दोउ मोहिँ पहुँ आवैँ ॥ नाद सखा जेहि अहँविगुरचे । अहँ रहित सो निज घर पहुँचे ॥ केते पढ़ि गुणि नर्कीहि जैहै । केते पढ़ि गणि लोक सिधैहै ॥
धर्मदास बचन
हो सद्गुरु मैं तुम्हारो दासा । विनती करौँ खसम तुव पासा ॥ पढ़े गुणै दुइदिशि किमिजाहीं । सो चरित्र वरणों मोहिँ पाहीं ॥
सतगुरु बचन
सुनु धर्मनि बहु पढ़ि अरथावै । शब्द कहै सो चालु न पावै ॥ पढ़ि गुणि नीति विचारे नाही । अस पढुआ सुनु नरकहिँ जाही ॥ जिन्ह पढ़िशब्दचाल गहिभाई । सुनु धर्मनि सो लोकहि जाई ॥ छन्द-जो कथत बकतौ तरे जग तो जग सबै तरि जायहो ॥ तजि तरुत सुलतान उबैर नृप कयों बनजाय हो ॥ तातै कहूँ निज समुझ पापी शब्द पढ़ि सतपद गहै ॥ जो सत्य पद निरखत चलै तो नहिँ फेरि जो नीवहै ॥ दोहा-सत्यनाम सुमिरण करै, सतगुरुपद निज ध्यान ॥ आतम पूजा जीव दया, लहै सो मुक्ति अमान ॥ सोरठा-सदगुरु कहै पुकारी, चाल चलै पथ निरखिके ॥ इंस होय भव पारि, शब्द गहन सदगुरु कृपा ॥
चोपाई
गुप्त भयो कहि शब्द प्रमाना । कालिंजर पुनि आय तुलाना ॥ कहैं कालिंजर विनै बडाई । देहु पान मोहिँ अहो गुसाई ॥ धर्मदास कहै देउँ परवाना । साहिब मोहि कह्यो सहिदाना ॥ कह कालिंजर सुनहुँ गोसाई । का सहिदान आहि तुव ठाई ॥ तब सहिदान कहा सुख बासा । सतगुरु बोल कीन्ह परगासा ॥ समय संयोग बोल सो कहेऊ । सुनि भौमौन मुगुध होई रहेऊ ॥ जात कमीना सुनत परायी । केहि कारण आरती लायी ॥
साधन वर्णन
(६४)
ज्ञानप्रकाश
औरहिँ और बुझा उन्ह भाई । पान नलीन्ह वैसहिँ चलिजाई ॥ तेहि गौनत प्रभु प्रगटे तुरन्ता । कला अमित को पावै अन्ता ॥ धर्मदास गहि चरणशिर नाथी । युगकर जोरि ठाढ़ भो जायी ॥ बैठे पुनि आज्ञा प्रभु पाई । विमुख जीव कर बात जनाई ॥
धर्मदास वचन
प्रभु विरतन्त कहो अब ताहीं । वह पान मुक्तिकै लीन्हेसि नाहीं ॥ मैं भाषेऊँ तुमरी सहि दाना । दुर्मति बूझेसि कहु आना ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि उन्ह जोन पान नलीन्है । परिहैं कालमुख जायकमीने ॥ तजि रणभूमि टरै जो भाई । तेहि जीवहिं निश्चै यम ख ई ॥ वह यम चोर कालके हंस । धर्मराय धरि करै विध्वंसा ॥ धर्मदास तुम सुनहु हमारा । निशिदिनरहिहो नाम अधारा ॥ अब तुम आपन करहु विचारा । करिहहु निशिदिन ज्ञानविचारा ॥ दुष्ट मित्र सों प्रेम बढै हो । भक्ति भजन आनन्द रहै हो ॥
अर्थ—दुष्ट और मित्र दोनोंमें किसीसे राग द्वेष न रखकर समान प्रीति रखना सबकी भलाई चाहूँ किसीकी बुराई नहीं चाहना ॥
जो सुख होय तो जनि इतरैहौ । दुख परै तौ जनि विललैहौ ॥ संकट महाँ बहु साहब कीजै । निश्चल नाम ध्यान चित दीजै ॥ चित निश्चन्त रहै जो भाई । तो तेहि संकट जाय नसाई ॥ यह मम देश दोउ है भाई । दुख सुख तन धरि चारै आई ॥ चहिये साधुन नहि चित डोलावैँ । हठ प्रतीतिनाम गुरु गावैँ ॥ कच्चे जीवन कर यह लेखा । संकट परै विकल हिय पेखा ॥ सुख सम्पति धन पुत्र सगाई । यह सब सपना आहै भाई ॥ धर्मनि शूरा हंस जो होई । गन न दुख सुख एकौ सोई ॥ अरु घर झगरा निवेरेहु भाई । गुरु गमहि पन्थ कहौ उपाई ॥
समाप्ति
बोधसागर
(६५)
पाँचौ कै परपञ्च मिटावै । पाँच भूतकै स्वाद गँवावै ॥ नासा श्रवण रसना चक्षु इन्द्री । पाँचौ चोर काल मतिमन्द्री ॥ पाँचहु स्वाद विषयकी पूजा । गुरुगमिपन्थ परखहि तेहि दूजा ॥ चक्षु स्वाद रस रूप सलोना । राँचि रहै जग अकिलविलोना ॥ साधु चक्षु राते सतरूपा । गुरुपदनिरखत अकिल अनूपा ॥ श्रवण स्वाद रस गीत कवीता । मगन होई सुनु रसमत चीता ॥ सन्तन श्रवण स्वाद गुरु बानी । शब्द भजन पद सार समानी ॥ नासा वास सुवास अघाहीं । कुबास वासके निकटन जाहीं ॥ सन्त न लागे वास कुवासा । नाम विदेह जपै निःस्वासा ॥ रसना स्वाद षट्स रस मधुभोजन । तजे विलोना सुरस परोजन ॥ सन्त न स्वाद नाम रससारा । षट्स रस व्यंजन छार असारा ॥ निःइच्छित जो पहुँचे आई । सुरस व्यंजन प्रीति सोपाई ॥ इन्द्री स्वादु काम रति नेहा । नारी भोग रतन तजि देहा ॥ सत्य सुरति अनुराग समावे । निशिदिन प्रेमभक्ति चितलावे ॥ पाँचौ आहि प्रबल घट माहीं । मन राजा पाँचौ कर नाहीं ॥ सत्यगुरु ज्ञान मन धरि राखे । पाँच चोरसाधि सत्यसुखमाखे ॥ छन्द-धरि मनहि बाँधहु पाँच साधहु सारसतगुरु ज्ञानते ॥ यह देशहै यमराजको तरे सो विदेही नामते ॥ सतनामव्रतगहिशब्द हियधरि करहु सेवा तासु हो ॥ तत्त्वध्यान सतपदरूप स्थित होय अमर लोकैनिवासुहो ॥ दोहा-गुरु सुखशब्द प्रतीति करि, हर्ष शोक विसराय ॥ दया क्षमा सतशील गहि, अमरलोक को जाय ॥ सोरठा-वण्यौ ज्ञान प्रकार, धर्मदास सम्बोध मत ॥ कहै कवीर कवीर, जेहि मम शब्द प्रतीति दृढ ॥ इति श्री धर्मदास बोध ज्ञान प्रकाश समाप्तः ॥
इति श्री बोधसागरे धर्मदास बोधज्ञानप्रकाश वर्णनो नामप्रथमस्तत्रंगः ॥
नं. ४ कबीरसागर - ३
इति श्रीधर्मदासबोध ग्रन्थ ज्ञानप्रकाश समाप्त
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित
श्री-अमरसिंह बोध
A decorative horizontal line with a central diamond-shaped ornament, used as a section separator.
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन
बम्बई
श्रीमद्भगवद्गीता
संस्कृत भाषायां प्रथमः विभागः
सप्तमः अध्यायः
श्रीमद्भगवद्गीता
श्रीमद्भगवद्गीता
१९९९