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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पञ्चमुद्रा

( १८३ )

अगोचरीको अब कहो निवासा । तासों कीजे योग प्रकाशा ॥
सुर्तनदी तहां उठे तरङ्गा । झालर भेरी शंख मृदंगा ॥
किकिन चिचिन किगरी बैना । गरजनशान धुनधुन सुवसेना ॥
शून्य महलमों बैठे जाई । दशोंद्वार तब वन्द कराई ॥
यह विध ध्यान गगनमों करई । सत्तर बाजा तब सुनु परई ॥
अनहद नाद सुने जो प्राणी । उपजे महासुखके खानी ॥
सतगुरु कहै सांच सोई योगी । तहां मरण मगन रमावत भोगी ॥
अगोचरी मुद्रा कहा प्रकाशा । ताको योग युक्तकी आशा ॥
उनमुनि मुद्रा महद अकाशा । अलखपुर्ष तहां कीन्हों वासा ॥
ब्रह्मप्रकाश तहांअण्ड न पिण्डा । लोकालोक नहीं ब्रह्मण्डा ॥
ब्रण अब्रण जात नहीं पाती । नहींतहां दिवस नहीं तहांराती ॥
तामों सरवर गहिर गँभीरा । जाके आदि अन्त नहीं तीरा ॥
ज्ञानी योगी जप तहां लागा । भयोअनन्द सकलो भ्रम भागा ॥
तामो लीन रहै जो कोई । गुप्त मनोरथ पावै सोई ॥
योग जीत कहो भेद अपारा । बिरला साधू करे विचारा ॥
खेचरी चाचरी भोचरी जानी । अगोचरा उनमुनिकही बखानी ॥
उनमुनि लागी योगपर निद्रा । सुख समाजजहांपरम अनन्दा ॥
यह प्रकाश उनमुनिमों कहिये । कछुक भेद पुनि तामों लहिये ॥
पञ्च मुद्रा और पञ्च अकाशा । पंच ध्यान और पञ्च प्रकाशा ॥
पञ्च वर्ण और पञ्च हैं वेदा । पञ्च तत्त्वके पञ्च हैं भेदा ॥
पञ्च मन्दिर औ पञ्च हैं द्वारा । पञ्च रूप औ पञ्च अहारा ॥
पञ्च इन्द्री औ पञ्च हैं स्वादा । पञ्च विद्या औ पञ्च हैं नादा ॥
पञ्च हैं आसन पञ्च हैं योगी । पञ्च मंदिर औ पञ्च हैं भोगी ॥
पञ्च सत्त औ पञ्च हैं सीउ । पञ्च कर्म औ पञ्च हैं जीउ ॥
पञ्च पृथ्वी औ पञ्च हैं नीरा । पञ्च तेज औ पञ्च समीरा ॥

( १८४ )

बोधसागर

पञ्च लिंग औ पञ्च हैं पूजा । पञ्च एक पञ्च है दूजा ॥
पांचों आवें पांचों जाई । पांचों मरें पांचोंको खाई ॥
पांचों सुक्षिम औ पांच अस्थूला । पांच डार औ पांच हैं मूला ॥
पांच पाप औ पांच हैं पुत्रा । पांच बस्ती और पांच हैं सुत्रा ॥
पांच पांच पांचों सब भवा । पांच स्वामी और पांच हैं सेवा ॥
पंच गुरु और पंच हैं चेला । पांच भाव और पांच हैं मेला ॥
पञ्च मुद्राका कहों बिचारा । ताको योगी करे सम्हारा ॥
चार छोड़ पांचो करे बासा । ताते पांचका कहो प्रकाशा ॥
पांचों मुद्रा उनमुनि कहिये । तासों भेद सुत्तिको लहिये ॥
ब्रह्म प्रकाश तहाँ पूरन चन्दा । रैन दिवस नहि सहज अनन्दा ॥
दुतिया भाव तहाँ नहि काया । तहवां नहीं धूप और छाया ॥
हम तुम कर्म भ्रम नहि दोई । तहां सिलान ब्रह्म सो होई ॥
सहज शून्यको लखे जो भेवा । आप ही कर्ता आप ही देवा ॥
प्रथमही आपुपुर्ष विस्तारा । तहांते भयो ब्रह्म आकारा ॥
आकारते अहंकार उपजाई । ताते बहु विस्तार बनाई ॥
सोहं स्वासा पुर्ष उचारा । तहांते भौ अक्षर ओंकारा ॥
पांच ब्रह्मकी उत्पति भाषों । तुमसों गाय कछू नहीं राखों ॥
अकास ब्रह्मको भास बताऊँ । वायु ब्रह्मको तहवां लाऊँ ॥
पुन है तेज ब्रह्मकी बानी । जलकी बहुरि कहों उत्पानी ॥
फिर पृथ्वीको भास लखाऊँ । प्रथम ब्रह्मको भेद सुनाऊँ ॥
अविगत आदि ब्रह्मको भासा । ताको भेद कहों प्रकाशा ॥
प्रथमें नाम आकाश कहाई । दुतिये गगनाकाश बताई ॥
फिर रकाशको नाम सुनाऊँ । चौथे गगनसकाश लखाऊँ ॥
पांचे महद अकाशकी बानी । पञ्च अकाशमें कहों बखानी ॥
अब सुन कहों पञ्च अस्थाना । सकित तुमसों कहों बखाना ॥

पञ्चसुद्धा

( १८५ )

मुखके अग्र खेचरी बासा । ताको ध्यान जन करे अकाशा ॥
नासा अग्रत्रिकुटी अस्थाना । चाचरी सुद्धा तहाँ बखाना ॥
चक्षु अग्र भोचरी जाना । उर्ध्वअकाशको है तहाँ ध्याना ॥
श्रवन अग्र अगोचरी थाना । सहज शून्यको है तहाँ ध्याना ॥
तिलकपाट उनसुनी कहीजै । महाशून्य ध्यान तहाँ कीजै ॥
प्रथमहि खेचरीक सुद्धा कहिये । धूमवरण रंग तहाँ लहिये ॥
पीतवर्ण तहाँ देखे जाई । अकह रूप तहाँ रहो समाई ॥
औरौ वर्ण रक्त लख आई । कामधेनु तहाँ देखो गार्ई ॥
करुणवृक्षकी तहवों छाया । नहीं तहाँ काल नहीं तहाँ काया ॥
तहाँ समाध लगावे जाई । अमी बुंद तहाँ चाखे भाई ॥
ताकर पीवत अमर होइ जाई । सोई भेदमें वरण सुनाई ॥
द्वितिये चाचरि सुद्धा बखानी । नासा ध्यान तासको जानी ॥
तहाँ उत्तंग ब्रह्मको देखा । हंस रूप तहवों पुन पेखा ॥
मणिगण रतन विन्दको बासा । कर्तारूप पुरुष प्रकाशा ॥
जगमग ज्योति देखिये तहिया । बिन शशि सूर उजैरो जहिया ॥
चहुँदिश दामिनि दमके आई । चन्द्र सूर तामों छपजाई ॥
इतना रूप चाचरी जानी । ताको भेद कहीं प्रवानी ॥
त्रितिये भोचारी सुद्धा कहिये । अष्ट अंग पुन तामों लहिये ॥
मन बुध चित अहंकारन माया । ममता काम हर्षकी छाया ॥
तेज पुञ्ज तहाँ झिलमिल देखा । सूक्ष्म अस्थान तहाँ पुन पेखा ॥
चित चेतन्य तहाँ पुन दोई । तामों मिले परमपद सोई ॥
भोचरी सुद्धा कहि समझाई । ताको मर्म कोइ ज्ञानी पाई ॥
चौथे अगोचरी सुद्धा जाहीं । महाशब्द धुन उपजे ताहीं ॥
नाना ताल बैन मृदंगा । यंत्र ढोल सहनाई अंगा ॥
राबाब किंकिन झालरी बाजा । नभेरी चिंचिन शंखधुन गाजा ॥

( १८६ )

बोधसागर

मेघनाद गजनीं तहां कहिये । शंख शब्द धुन तामों लहिये ॥
बाजा सुने सूष्य तव होई । काम क्रोध मद सब गहि खोई ॥
लोभ मोह तज पावे सोई । प्रवर्त छोड़ निरवर्त जो होई
तमो सतो रजो गुण विसरावै । आगे रूप दर्श तब पावै ॥
अगोचरीको अब कहेउ उपाई । योगी कर्म महा सच पाई ॥
पांचे मुद्रा उनमुनि जानी । ताकर भेद अब कहीं बखानी ॥
उनमुनि देश लखे जब जाई । अमर वस्तु तब भाषे आई ॥
ब्रह्म अखण्ड देखिये जाई । ब्रह्मरूप तब भाषे आई ॥
श्वेत पीत श्याम नहीं सोई । अरुण सजुजतें न्यारा होई ॥
रूप सरूप हृद वेहद नहीं । चारो बानि खानि नहीं ताहीं ॥
ब्रण अब्रण काया नहीं माया । युग बैदनकी तहाँ न छाया ॥
षटदर्शन पाखंड ना तहाँ । बावन अक्षर अकार न जहाँ ॥
नौ षट चार अष्टदश नहीं । पांचो तत्त्व धाम नहीं ताहीं ॥
मन बुध चित अहंकार नावासा । काल कर्मको नहीं प्रकाशा ॥
तहाँ ध्यानधर तारी लावै । सोई मूल परम पद पावै ॥
उनमुनि सिरवर बहुर चढ़जाई । जहाँकी गम्य देव नहीं पाई ॥
नहीं तहाँ काल नहीं तहँ काया । नहीं तहाँ प्रमत्ता मोहन माया ॥
चन्द्र सूर तारागण नहीं । दिवस रैन तहाँ धूप न छाहीं ॥
पिंड ब्रह्मांडको तहाँ न लेखा । केवल पारब्रह्म तहाँ देखा ॥
अलखरूप तहाँ अबिगत सोई । सबके परे ध्यान वह होई ॥
तासों ध्यान लगावे प्राणी । असी चारके छूटे खाणी ॥
अब वेदनको बास बताऊँ । ताको भेद अब वर्ण सुनाऊँ ॥
जिह्वा अग्र ऋग्वेदको वासा । नासा अग्र यजुर प्रकाशा ॥
श्रवण अग्र शाम सुति कहिये । चक्षु अग्र अथरवण लहिये ॥
शून्य अग्र सोहंग प्रकाशा । तहवों सुसमे वेद को बासा ॥

पञ्चमुद्रा

( १८७ )

वेदनके अस्थान बताई । अब इंद्रिनके स्वाद लखाई ॥
लिंग इंद्री कामिन सो नेही । जिह्वा षट् श्वाद तो लेही ॥
नासा गंध सुगंध अघाई । चक्षु इंद्री रूप लोभाई ॥
श्रवण स्वाद मधुर धुन बानी । ये पांचोंके स्वाद बखानी ॥
पृथी अस्थूल ऋग्वेदकी बानी । नीर अस्थूल जजुर पहिचानी ॥
वायु अस्थूल साम सुतिं कहिये । तेज अस्थूल अथरवण लहिये ॥
अनहद अस्थूल सोहंगकी बानी । सुसम देवताको पहिचानी ॥
खोजे ताहि मुक्त तब होई । सुसम वेद सम और न कोई ॥
वेद अस्थूल कहा समझाई । आसन योगी भेद बताई ॥
पृथ्वीरूप जहाँ आसन जाना । जीवरूप योगी पहिचाना ॥
पानीरूप जहाँ आसन कहिये । हंसरूप योगी तहाँ लहिये ॥
तेजरूप जहाँ आसन जानी । चेतनरूप योगी पहिचानी ॥
बांयेरूप है आसन जहिया । निराकार योगी है तहिया ॥
आकाश रूप आसन प्रवाना । निरंजन योगी जहाँ बखाना ॥
आवागम अब भेद बताई । तुमसो सुकृत नाहिं डुराई ॥
जीव पृथी मिल आवे जाई । मिल पृथी पुनि बहुरि सिधाई ॥
हंस रूप जल मिलके आवै । बहुर नीर मिल घरहि सिधावै ॥
चैतन तेज मिल आवै सोई । बहुर तेज मिल तहाँ सगोई ॥
निरालंब बाये मिलि आवै । बहुर बाये मिल गृहे समावै ॥
निरञ्जन मिल आकाशको आवै । बहुर गगन मिल उलट समावै ॥
आवागम मैं दीन बताई । जन पहुँचनको भेद लखाई ॥
प्रथम पृथीको जल उपजावै । सो जल बहुर पृथीको खादे ॥
जलकी उत्पत्त तेज सो होई । भक्षे तेज पुन जलको सोई ॥
तेजको बाये रूप उपजावै । उलट वाये पुन ताको खावै ॥
बाँये रूप अकाश उपजाई । फिर अकाश पुन ताको खाई ॥
आकाश शून्यते उत्पत्त जानौ । बहुरि शून्यमें जाय समानौ ॥

( १८८ )

बोधसागर

पृथी जीव गृहे कहौं प्रकाशा । गुदा द्वारमें कीन्हो बासा ॥
पानी हंसको गृहे बताई । ललाट अधरमें बैठक पाई ॥
तेज चेतनको धाम बताई । पीत चक्षुके द्वार रढ़ाई ॥
निरालंभ बायेको थाना । नाभी नाशिक द्वार समाना ॥
आकाश निरंजनको प्रकाशा । श्रवण द्वार ब्रह्मांड है बासा ॥
पांचोंके गृह वर्ण सुनाई । रंग अहार कहौं समुझाई ॥
पृथ्वी पीतवर्ण उच्चार । सो तो जीवको कहौं अहारा ॥
पानी श्वेतवर्ण है भाई । सो तो अहार हंसको आई ॥
तेजको रक्तवर्ण पहिचाना । सो तो अहार चेतन को जाना ॥
बायेको सवुजवर्ण है भाई । निरालंबको भक्षण आई ॥
अकाश नीलवर्ण पहिचानी । निरंजनको अहारसो जानी ॥
रंग अहार कहेउ समुझाई । पृथ्वी पंचके नीर बुझाई ॥
पृथ्वी नीर पुत्र है भाई । हाड पृथ्वीको बिंद कड़ाई ॥
नीर पृथीको श्रोणित अंशा । पसीना त्वचा पृथीको वंशा ॥
रोम पृथीको वंश कड़ाई । पृथी नीरको भेद लखाई ॥
पृथी बिमल गुण कहिये भाई । अब पृथी गन वर्ण बताई ॥
तेज तमोगुणको पहिचाना । बाये गन्धगुण लखो सुजाना ॥
अकाशअलखगुण जानहु भाई । पांचोंके गुणवर्ण सुनाई ॥
अब प्रक्रीत पचीस बताऊँ । पाचों तत्त्व विभाग लखाऊँ ॥
हाड चाम मास रोम लखाई । नाटिका पृथी प्रकृत बताई ॥
रक्त पित्त कफ स्वाद बखाना । स्नारप्रकृतजलतत्त्वको जाना ॥
भूखप्यास मुख प्रभा जम्हानो । आलस निद्रा तेज पहिचानो ॥
धावन कूदन बलकर भाई । परसन सकुचन पवन बताई ॥
लोभ मोह हंकार भै जाना । बिंद अकाश प्रकृत बखाना ॥
पांच पचीस अंग कहि दीन्हौं । तासु मर्म कोइ बिरले चीन्हौं ॥

पञ्चमुद्रा

( १८९ )

प्रथमहि जीवरूप पहिचानो । प्रथमै ताके चेला जानो ॥
औ पुन हंसरूप है भाई । पानी चेला तास बताई ॥
चेतनरूप गुरु है सोई । चेला तेज तासुको होई ॥
निरालंब गुरु पहिचानो । वाय तासको चेला जानो ॥
अलख निरंजन गुरु बखाना । चेला आकाश तासको जाना ॥
गुरु शिष्यको भेद बताई । अब तत्त्वनकी परष लखाई ॥

छंद-चौकोर मंद और शुद्धपुरी धरनी है सोई ।
नीचे शीतल मंद चले जलको तत होई ॥
तेज तत्त्व जो ऊंच आगमनकी आइसु होई ।
दहिने बांये चले बाँये तत्त्व जानो सोई ॥
सबुजके मध्य सुखमना पवन गगनको जानिये ।
आकाश नाम तासों कहि पाँचों तत्त्व बखानिये ॥
नाभी गंध समान पवनको अंश बखानो ।
ह्दे माही प्राण अगिनको अंश सो जानो ॥
कंठ बसे आपान अंश तेहि जलको जानो ।
गगन बसे उद्यान अंश आकाश बखानो ॥
सब देहीमें ब्यान है अंश पृथ्वीको जानिये ।
पंच प्राण ये जानिये अंशहीते पहिचानिये ॥

चौपाई

पंचप्राणकी संघ लखाई । अब उनमुनिको भेद बताई ॥
मुद्रापांच प्रकट मैं भाषा । तामहि श्रेष्ठ उनमुनि राखा ॥
चारोंके परे उनमुनि कहिये । अलखरूप पुनि तामों लहिये ॥
सोई ब्रह्मज्ञान कहलावै । धरे ध्यान तहां अमृत पावै ॥
पावे साध अमीरस पीवै । सो योगी जग युगयुग जीवै ॥
ना फिर आवै ना फिर जाई । अखंड मंडलमें रहे समाई ॥

( १९० )

बोधसागर

ताको जरा मरन नहीं होई । परम तत्त्वमें रहे समोई ॥
योग जीत कहु ज्ञान अपारा । यह मार्ग है सत् विचारा ॥

सुकित वचन

सुकित कहैं सुनो गुरुज्ञानी । सुद्धा पंच तुम कही बखानी ॥
और कथा एक पूछो तोही । सो समुझाय कहु प्रभु मोही ॥
कायामाहे कमल जो होई । तेहि स्थान सुनावो सोई ॥
कौन कमलकै पखुरी जाना । कौन देव तहां कीन्हों थाना ॥
कौन कमलसों स्वासा आवै । कौन कमलमें जाय समावै ॥
कौन कमलसों होय गुंजारा । कौन कमलसों करे उचारा ॥
केतिक स्वासा आवै जाई । भिन्न भिन्न सब लेख बताई ॥

योग जीत वचन

हे सुकित मैं तुम्हैं लखाऊं । कमलनको प्रमान बताऊं ॥
प्रथमहि कमल चतुरदल कहिये । देवगणेश पुन तामों लहिये ॥
रिद्धसिद्ध जहाँ सत्क उपासा । तहाँ जा पूछै सो प्रकाशा ॥
षटदल कमल ब्रह्माको बासा । सावित्री तहाँ कीन्ह निवासा ॥
षटसहस्र तहाँ जाप बखाना । देवन सहित इन्द्र अस्थाना ॥
अष्टदलकमलहरिलक्ष्मी वासा । षटसहस्र तहाँ जाप निवासा ॥
द्वादश कमलमों शिवको जाना । षटहजार जाप बंधाना ॥
तहाँ शिव योग लगावैं तारी । पारवती संग सहित विचारी ॥
षोडश कमल जीव मन वासा । एक सहस्र जाप प्रकाशा ॥
त्रैदल कमल भारथी वासा । सोतो उज्ज्वल कमल निवासा ॥
एक सहस्र जाप तहाँ कीजै । यह संकल्प जाय तहाँ दीजै ॥
दोय दल कमल हंस अस्थाना । तामह परम हंसको जाना ॥
एक सहस्र जाप प्रकाशा । कर्म भ्रमको है तहाँ नाशा ॥
सहस्रदल कमलमों झिलमिल जाना । ज्योति सरूप तहाँ पहिचाना ॥
ताहै रंगहै अलख अपारा । अलख पुर्ष है सबते सारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९१ )

नवें कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥
एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥
अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥
स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥
अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहिं पाऊँ ॥
अभी अखण्डते वर्ये धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥
निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥
दशयें घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥
निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजार ॥
अभी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥
तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥
उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥
हृदे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥
एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥
एतिक स्वासा हृदे ले आवै । क्षिन् बाहिर क्षिन् भीतर धावै ॥
दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अथर धुन ताही ॥
सहस्र पखुरी कमल अनूपा । तहाँ बसे मन जीत सुरूपा ॥
ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ बिराजै ॥
तहां घरनी घरियार बजावै । घरी घरी टंकोरा लावै ॥
छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥
एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥
या विधि चार टंकोरा ठोकै । राहु केतु संग व्यालि न रोकै ॥
पहर एक करे धुन पूरा । ग्रहण गिरासे शशि औ सूर ॥
गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥
तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥
श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥

( १९२ )

बोधसागर

स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै ॥
सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥
एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥
आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥
चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥
चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतैं छाही ॥
प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥
सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥
प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥
सतयुग प्रथमहि घरी उतपानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥
किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥
एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अच्छेकी छाहीं ॥
वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥
या युग अन्तकी आवे घरी । आसे नागिन सनमुख खड़ी ॥
प्रथम किलकयुग होय संधारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥
सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥
जवे कमत युगकरे हंकारा । उतपत थोरी बहुत संधारा ॥
कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥
एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखैं ताही ॥
बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥
आवांगवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥
तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥
युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥
युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥
तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९३ )

चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥
श्वासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥
युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥
ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥
सतयुग अंत होन नहि पावै । युग कंकवत आन समावै ॥
युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥
युगकंकवत कालकी वाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥
युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों कोधा ॥
सतयुगअंत कंकवत माही । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥
युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥
अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥
चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥

साखी—एके युगके बीतते, चारों गये बिनास ।

एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥

किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥
भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥
एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥
चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥
सतयुगको तब भयो बिनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥
दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥
तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥
त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार बिचारी ॥
जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥
जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥

नं. ८ कबीरसागर - ७

( १२४ )

बोधसागर

त्रेता युगमें कलह अपारा । यज्ञ दान व्रत नेम अचारा ॥
तेहि पीछे द्वापर युग आवा । काल अंत तंब आन समावा ॥
अहंकार तामें अति भाखा । अब कलयुगकी वर्णों साखा ॥
काम क्रोध और पाप अपारा । लोभ मोह यम कीन्ह पसारा ॥
एक पहर चारों युग जाना । ताको वर्ण कहों बिछलाना ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण कहिये । ताते पिंडकी उत्पत्ति लहिये ॥
अष्टधात कहिये अस्थूला । ताते रचो गर्भको मूला ॥
शिवकी खासा वायु सरूपा । सत्ती गहे जानके रूपा ॥
शिवको रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मो जावन देई ॥
जावन जगे तब सांचा माहीं । थाका होय रुधिरके ताहीं ॥
तेहि थाकाकी रचना भारी । तीन लोककी विभो सवारी ॥
महल मध्य पुनि जीव समावा । जलके भीतर महल बनावा ॥
महलके माहिं बनाये छप्पा । तामो दश कीन्हों दरवप्पा ॥
सांचा अत्र जरे नहिं कबहीं । पिंड सवारो अन्तर जबहीं ॥
सांचा माहिं दियो रंग ढारी । नख सिख शोभा बहुत सवांगी ॥
तीनों लोक रचो पलमाहीं । गढ़पति अंश तब साजा ताहीं ॥
प्रथमहि सायेर सात सँवारा । पर्वत आठ कीन्ह अधिकारा ॥
अठारह गंडा नदी बहाई । तामह गुप्त बहै ठहराई ॥
अठारह सहस्र बनाये नारा । अष्टधातुले साज सुधारा ॥
रक्त हांडको सब अस्थूला । बाढ़े लिंग सवांरे मूला ॥
आगे रचो दोह भुज दंडा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥
बहुर सँवारो दोय पग खंभा । मदन महाबल उपजो रंभा ॥
नासा चढाय मस्तक पर लाई । सातभैंवर नौनाट लगाई ॥
उत्तर मेर शिर जो अस्थूला । सरवर माहिं कमल बहु फूला ॥
नाभी माहिं दल चार बनाई । फूल फल बास घट छाई ॥

पञ्चमुद्रा

( १९५ )

आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥
सोई अंग शक्त सोइ ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥
नख सिख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥
प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥
एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥
एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥
सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥
त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥
ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥
ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥
झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर शून्य एक घर फेरी ॥
खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥
रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥
मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥
खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥
खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहै नीर तरंगा ॥
सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुर्तसनेह धनी तहैं दसैं ॥
खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥
सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥
तहां बसे सरयू तेहि साथा । रावल एक बयालिस हाथा ॥
काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अघर दीखे नहिं माथा ॥
बाढी नदी दोइ विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥
तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥
खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारारा ॥
मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥

( १९६ )

बोधसागर

त्रिकुटी संगम भयो मिलाना । भवर गुफा माधो करथाना ॥
त्रिवेणी तट बसे सुठंगा । ताको मम लखा परसंगा ॥
गणगंधर्व मुनि सब कर थाना । सुर नर मुनि कर बैठे ध्याना ॥
तैतिस कोट देव मुनि भारी । यक्ष यक्षणी देव कुमारी ॥
नागसुता अपसरा मोहिनी । चढ़ बिमान सब फिरे जोहिनी ॥
असुरपिशाचऋषनागजोलाहल । त्रिवेणीतट करे कोलाहल ॥
तीनलोक जौ जीव निवासा । सो सब करो त्रिवेणी बासा ॥
त्रिवेणी तट माधौ देवा । सब मिल करे तासुकी सेवा ॥
ताहि प्राग होय चलो प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥
देश देश गंगा फिर आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बँधाई ॥
जहां तहां तप ध्यान लगावै । योग यज्ञ तप बहुत करावै ॥
ऋतुवसंत प्रागको धावै । मकर नहाय बजार लगावै ॥
अर्ध उर्ध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥
गर्भमाहि सब युक्ति बनाई । तीन कचहरी तहां लगाई ॥
जहां नदी संगम पर्वाना । तहवां रचो एक अस्थाना ॥
संगम बीच गुफा एकधारा । ताहि गुफामों सात है द्वारा ॥
एकद्वार होय नाद सूधारै । एकद्वार होय रूप निहारै ॥
एकद्वार होय वास बसावै । एकद्वार होय अग्नि समावै ॥
एकद्वार हो स्वाद लिवावै । एकद्वार होय न्याय चुकावै ॥
एकद्वार होय नाद उचारा । योग जीव यह मता विचारा ॥
सातनाल चौदह सुरभाऊ । सातोंके हैं एक सुभाऊ ॥
सातो सात शून्य मों बासा । सातो बसे गुफाके पास ॥
अनहद भेद श्वासाकी धारा । ताको भाषतहों व्यवहारा ॥

साखी-रचना भाषेउ पिंडकी, श्वासा सहित विचार ।
विरलाजन कोई परखि है, अलखरूप व्यवहार ॥

पञ्चसुत्रा

( १२७ )

सुक्ति वचन-चौपाई

सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कही अन्तर्यामी ॥
और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गोय न राषों ॥
हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥
आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥
ताको भेद कहीं समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥

योगजीत वचन

सुक्ति सुनो सत् मम बानी । भिन्न भिन्न मैं कहीं बखानी ॥
पांचवरी वांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥
दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥
आठ पहर पिगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥
आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दौय रहै ॥
सोरह दिन पिगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥
वीस रैयन दिन दहिनौ पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥
एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दौय दिनमें हंस पयानो ॥
पांचवरी सुखमन जो हालै । पांचवरी मो हंसा चालै ॥
चन्द सुर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥
ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥

साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय ।

छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥

छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय ।

दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥

गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय ।

मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥

भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय ।

पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥

( १८८ )

बोधसागर

पृथी जीव गृहे कहौं प्रकाशा । गुदा द्वारमें कीन्हो वासा ॥
पानी हंसको गृहे बताई । ललाट अथरमें बैठक पाई ॥
तेज चेतनको धाम बताई । पीत चक्षुके द्वार रखाई ॥
निरालंभ बायेको थाना । नाभी नाशिक द्वार समाना ॥
आकाश निरंजनको प्रकाशा । श्रवण द्वार ब्रह्मांड है वासा ॥
पांचोंके गृह वर्ण सुनाई । रंग अहार कहौं समुझाई ॥
पृथ्वी पीतवर्ण उच्चार । सो तो जीवको कहौं अहारा ॥
पानी श्वेतवर्ण है भाई । सो तो अहार हंसको आई ॥
तेजको रक्तवर्ण पहिचाना । सो तो अहार चेतन को जाना ॥
बायेको सवुजवर्ण है भाई । निरालंबको भक्षण आई ॥
अकाश नीलवर्ण पहिचानी । निरंजनको अहारसो जानी ॥
रंग अहार कहेउ समुझाई । पृथ्वी पंचके नीर बुझाई ॥
पृथ्वी नीर पुत्र है भाई । हाड पृथ्वीको बिंद कहाई ॥
नीर पृथीको श्रोणित अंशा । पसीना त्वचा पृथीको वंशा ॥
रोम पृथीको वंश कहाई । पृथी नीरको भेद लखाई ॥
पृथी विमल गुण कहिये भाई । अब पृथी गन वर्ण बताई ॥
तेज तमोगुणको पहिचाना । बाये गन्धगुण लखो सुजाना ॥
अकाशअलखगुण जानहु भाई । पांचोंके गुणवर्ण सुनाई ॥
अब प्रकीत पचीस बताऊँ । पाचों तत्त्व विभाग लखाऊँ ॥
हाड चाम मास रोम लखाई । नाटिका पृथी प्रकृत बताई ॥
रक्त पित्त कफ स्वाद बखाना । स्नारप्रकृतजलतत्त्वको जाना ॥
भूखप्यास मुख प्रभा जम्हानो । आलस निद्रा तेज पहिचानो ॥
धावन कूदन बलकर भाई । परसन सकुचन पवन बताई ॥
लोभ मोह हंकार भै जाना । बिंद अकाश प्रकृत बखाना ॥
पांच पचीस अंग कहि दीन्हौं । तासु मर्म कोइ बिरले चीन्हौं ॥

पञ्चमुद्रा

( १८९ )

प्रथमहि जीवरूप पहिचानो । प्रथमै ताके चेला जानो ॥
औ पुन हंसरूप है भाई । पानी चेला तास बताई ॥
चेतनरूप गुरु है सोई । चेला तेज तासुको होई ॥
निरालंब गुरु पहिचानो । वाय तासको चेला जानो ॥
अलख निरंजन गुरु बखाना । चेला आकाश तासको जाना ॥
गुरु शिष्यको भेद बताई । अब तत्त्वनकी परष लखाई ॥

छंद-चौकोर मंद और शुद्धपुरी धरनी है सोई ।

नीचे शीतल मंद चले जलको तत होई ॥
तेज तत्त्व जो ऊंच आगमनकी आइसु होई ।
दहिने बांये चले बाँये तत्त्व जानो सोई ॥
सबुजके मध्य सुखमना पवन गगनको जानिये ।
आकाश नाम तासों कहि पांचों तत्त्व बखानिये ॥
नाभी गंध समान पवनको अंश बखानो ।
हृदे माही प्राण अगिनको अंश सो जानो ॥
कंठ बसे आपान अंश तेहि जलको जानो ।
गगन बसे उद्यान अंश आकाश बखानो ॥
सब देहीमें ब्यान है अंश पृथ्वीको जानिये ।
पंच प्राण ये जानिये अंशहीते पहिचानिये ॥

चौपाई

पंचप्राणकी संघ लखाई । अब उनमुनिको भेद बताई ॥
मुद्रापांच प्रकट मैं भाषा । तामहि श्रेष्ठ उनमुनि राखा ॥
चारोंके परे उनमुनि कहिये । अलखरूप पुनि तामों ल्हिये ॥
सोई ब्रह्मज्ञान कहलावै । धरे ध्यान तहां अमृत पावै ॥
पावे साध अमीरस पीवै । सो योगी जग युगयुग जीवै ॥
ना फिर आवै ना फिर जाई । अखंड मंडलमें रहे समाई ॥

( १९० )

बोधसागर

ताको जरा मरन नहिं होई । परम तत्त्वमें रहे समोई ॥
योग जीत कहु ज्ञान अपारा । यह मार्ग है सत् विचारा ॥

सुक्ति वचन

सुक्ति कहैं सुनो गुरुज्ञानी । सुद्रा पंच तुम कही बखानी ॥
और कथा एक पूछो तोही । सो समुझाय कहो प्रभु मोही ॥
कायामाहे कमल जो होई । तेहि स्थान सुनावो सोई ॥
कौन कमलकै पखुरी जाना । कौन देव तहाँ कीन्हों थाना ॥
कौन कमलसों स्वासा आवै । कौन कमलमें जाय समावै ॥
कौन कमलसों होय गुजारा । कौन कमलसों करे उचारा ॥
केतिक स्वासा आवे जाई । भिन्न भिन्न सब लेख बताई ॥

योग जीत वचन

हे सुक्ति मैं तुम्हैं लखाऊं । कमलनको प्रमान बताऊं ॥
प्रथमहि कमल चतुरदल कहिये । देवगणेश पुन तामों लहिये ॥
रिद्धसिद्ध जहाँ सत् उपासा । तहाँ जा पूछै सो प्रकाशा ॥
षटदल कमल ब्रह्माको बासा । सावित्री तहाँ कीन्ह निवासा ॥
षटसहस्र तहाँ जाप बखाना । देवन सहित इंद्र अस्थाना ॥
अष्टदलकमलहरिलक्ष्मी वासा । षटसहस्र तहाँ जाप निवासा ॥
द्वादश कमलमें शिवको जाना । षटहजार जाप बंधाना ॥
तहाँ शिव योग लगावैं तारी । पारवती संग सहित विचारी ॥
षोडश कमल जीव मन वासा । एक सहस्र जाप प्रकाशा ॥
त्रैदल कमल भारथी वासा । सोतो उज्ज्वल कमल निवासा ॥
एक सहस्र जाप तहाँ कीजे । यह संकल्प जाय तहाँ दीजे ॥
दोय दल कमल हंस अस्थाना । तामह परम हंसको जाना ॥
एक सहस्र जाप प्रकाशा । कर्म भ्रमको है तहाँ नाशा ॥
सहस्रदलकमलमें झिलमिल जाना । ज्योति सरूप तहाँ पहिचाना ॥
ताहै रंगहै अलख अपारा । अलख पुर्ण है सबते सारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९१ )

नवै कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥
एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥
अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥
स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥
अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहीं पाऊँ ॥
अमी अखण्डते वर्ष धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥
निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥
दशयै घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥
निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजारा ॥
अमी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥
तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥
उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥
ह्दे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥
एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥
एतिक स्वासा ह्दे ले आवै । क्षिन बाहिर क्षिन भीतर धावै ॥
दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अधर धुन ताही ॥
सहस्र पखुरी कमल अन्ना । तहाँ बसे मन जीत सरूपा ॥
ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ विराजै ॥
तहाँ घरनी घरियार बजावे । घरी घरी टंकोरा लावै ॥
छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥
एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥
या विधि चार टँकोरा ठोकै । राहु केतु संग ब्यालि न रोकै ॥
पहर एक करे धुन पूरा । गृहण गिरासे शशि औ सूरा ॥
गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥
तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥
श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥

( १९२ )

बोधसागर

स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै॥
सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥
एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥
आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥
चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥
चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतें छाही ॥
प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥
सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥
प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥
सतयुग प्रथमहि घरी उत्पानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥
किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥
एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अछैकी छाहीं ॥
वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥
या युग अन्तकी आवे घरी । ग्रासे नागिन सनमुख खड़ी ॥
प्रथम किलकयुग होय संघारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥
सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥
जवे कमत युगकरे हंकारा । उत्पत थोरी बहुत संघारा ॥
कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥
एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखें ताही ॥
बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥
आवागवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥
तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥
युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥
युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥
तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥