कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानस्थितिबोध
( ११७ )
कहाँ ये डसवत आये बिरहुली । सास्वी नामकी चले बिरहुली ॥
सब दुख तुरत नशाये बिरहुली । नामकी कहाउतपाति बिरहुली॥
सबहि तुच्छ कह जाय बिरहुली । वचनादिके अकार बिरहुली ॥
मन विष दूर पराय बिरहुली । तनसों दूर है जाय बिरहुली ॥
शब्दमुनत विष जाय बिरहुली । हरि प्रकटै संसार बिरहुली ॥
साहिब कीयो संसार बिरहुली । दूत भूत सब हारि बिरहुली ॥
पहुँचे सत्य कबीर बिरहुली । भई यम जिय पीर बिरहुली ॥
इन तन विषन समाय बिरहुली । उत्तर रानी पाय बिरहुली ॥
उठिके आसन दीन्ह बिरहुली । विरहुली दुःख नशाय बिरहुली॥
वार वार शिरनाय बिरहुली । कबीर गुण गाय बिरहुली ॥
बिरहुली संपूर्ण
धर्मदास वचन
धर्मदास फिर विनती करहीं । सतगुरु चरण शीश पर धरहीं॥
अब प्रभु कहिए लोक सुरूपा । दीन दयाल कृपाल अन्नापा ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास मैं कहाँ बुझाई । विना भेद लोके नहीं जाई ॥
अंधी सुरति शब्द बिन जानौ । लोक दीप कैसे पहिचानौ ॥
शब्द पाय जब सुस्थिर होई । थान मुकाम लखै पुनि सोई ॥
जो लखि पावै थान मुकामा । सुरति चले तब पावै नामा ॥
विना नाम नहीं ठौर ठिकाना । अंध सुरति हो रहे ठगाना ॥
सोहंगत सब छहौं बखानी । एक चित्त है गहे जु प्रानी ॥
पुहुप दीप सब दीप निवासा । छब्बिस दीप रचौ तेहि पासां ॥
कंचन दीप पाहु पर सोहै । रत्न अन्नाप कोटि रवि मोहै ॥
तहां पुरुष पर कीर्ति विराजै । उत्पति प्रलय तेहिपर छाजै ॥
लीलगर दीप पुरुषको वासा । जहां पहुँचे न कालकी त्रासा ॥
( ११८ )
बोधसागर
कालहि गमी वहाँ नहिं आवै । सहज पुरुष जहाँ बैठि रहावै ॥
विनती सहज कीन्ह कर जोरी । जीवन बंध वेगि प्रभु छोरी ॥
बीज शब्दमें सोहं वीरा । यह उत्पति गुरु कहै कबीरा ॥
यहाँ गमी कोऊ नहिं पावै । जहाँ लीलगर द्रौप रहावै ॥
तहाँ सुजन जन बैठे ज्ञानी । सत्य सुकृत दोई अगवानी ॥
अब मैं कहौं दीपकर लेखा । जाविधि रचिव रंग औ रेखा ॥
बीज शब्दमें सोहं बीरा । ये उत्पन्न सुन धरौं शरीरा ॥
जगमगज्योति सदा उजियारा । शब्दरूप काया कर प्यारा ॥
शब्दहि हेत वचन है वोटा । रत्न शिला चहुँ दिशि है कोटा ॥
लोक नाम है लोक अनन्दा । उडगन महाँ सोहत जस चन्दा ॥
आस पास कंचनकी बारी । हीरा लाल रत्न अवतारी ॥
कहा कहीं मंदिर कर रेखा । खम्भा कंचनके आहि विशेषा ॥
सिंहासन अति तहाँ विराजै । कंचन जडित लाल बहु छाजै ॥
लगै कोटि वहुँ दिश रूपा । चन्द्र प्रकाश ही जान स्वरूपा ॥
तेतिस कोटि सूर्यकी पांती । बीच बीच देखो अस क्रांती ॥
तापर सोहत अधर अटारी । हीरा मोती बहुत सँवारी ॥
ता ऊपर शोभित कस रेखा । कोटि रत्न दमकत जनु लेखा ॥
मोतिक चौक पूर जनु डारी । शोभित चौक कलित विस्तारी ॥
ता ऊपर जु रंग अस सोहै । मानहु रत्न मणी मय होवै ॥
जगर मगर सोहै उजियारी । उपमा बरण सके को प्यारी ॥
बहुत हि उपमा को कह दीजे । कोटिन भाग सूर्य शशि कीजे ॥
पालँगरूप काकहिके बखानी । हीरा रतन बीच बिच खानी ॥
सेजरूप शोभित शशि खानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥
चन्द्र सूर्य नाहीं वह तारा । नाहिं रत्न कञ्चन महि भारा ॥
साखी-ज्ञानस्थितिके यह गुण, पुरुष रूप उजियार ।
पलमें इच्छाते भए, लोक दीप विस्तार ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११९ )
चौपाई
तहाँ पुरुषने सेज विछाई । चन्द्र सूर्य जहाँ रहे लजाई ॥
तिलभर सिज्याको परवाना । सोहें सुरति अभयपद ज्ञाना ॥
तहवाँ पुरुष करहिँ आनन्दा । जिनसों अमी भए सब छन्दा ॥
तहाको बरन कहे को भाई । लक्ष जीवसों नाहिँ कहाई ॥
अमर चीर सोहें अस अंगा । सूर्यमणीसों अधिक सुरंगा ॥
यही व्रत हंसनको भाई । पुरुष रूपको कहै बनाई ॥
शोभा कहो दोऊ कर पानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥
सर्व वरणको कहो बुझाई । उभे सूर्य मानो उमगाई ॥
दंत सुरंग शोभित अति भारी । मानो मणि बत्तीस विचारी ॥
बालरूप का कहों बखानी । चन्द्र किरण मानो लपटानी ॥
इक २ चरित वरणि नहि जाई । मानहु सुकृत सत्य उमगाई ॥
अधर नासिका सोहत कैसा । उभय हंस बिहरत है जैसा ॥
साखी-बरणन सबका याहको, मोसों कहो न जाय ।
उपमा केहिको, दीजिये, पटतर नाहि दिखाय ॥
सूर्य होय समुद्र भर, भू अकाश भरि चंद ।
तबहु न पटतर पाइये, पुरुष वदन आनंद ॥
राई भर वह वस्तु है, अधराई अस्थूल ।
लहर लहर घटमेंकरै, वही पुरुष निजमूल ॥
इह गुण ज्ञानस्थितिहिके, कहे कबीर समुझाइ ।
पुरुष ध्यान जबही करै, सब दुख जाय पराइ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास तब बिनती ठाना । दीन्हों मोहि मुक्ति फलदाना ॥
साहेब कहिए मोहि बखानी । सत्ताइस दीप कहो बिलछानी ॥
दीपनको कहिये मोहि लेखा । जामे परचे शब्द विवेका ॥
( १२० )
बोधसागर
धर्मदास जो पूछिब आई । सो अब कथा कहो समुझाई ॥
पुहुप द्रौप जहाँ पुरुष रहाई । अलोप दीप तासों कहि भाई ॥
आस पास है छविबस दीपा । तहाँ पुरुष रहै अधर समीपा ॥
तीन दीपनको नाम बखानों । धर्मदास मनमें बिलछानों ॥
अजर द्रौप पुरुषके पास । कुसुम दीप सतगुरु निवासा ॥
अमरदीप सुजन जन जाना । सुमन द्रौप अब कहौ बखाना ॥
सहस्र नेत्र द्रौप सुनि लीजे । अलोक द्रौप सुनिके चितदीजे ॥
कंचन दीप बखानों आई । कंचन दीप सुनो चितलाई ॥
सुरजन द्रौप कहौ सम्भारा । अजर द्रौप निर्मल उजियारा ॥
हेत द्रौप सुनियो चितलाई । लवंग द्रौप द्रौप अति छाई ॥
अबहि निरक्षर कहिये द्रौपा । कमल द्रौप तहाँ पुरुष समीपा ॥
अंबु द्रौप बहुत उजियारा । सुरति द्रौप अब कहौ पसारा ॥
भिरत द्रौप सोही जन जानै । निग्रह द्रौप करै पहिचानै ॥
श्वेतद्रौप समझो हो ज्ञानी । निश्चित द्रौपमें जाय समानी ॥
सुस्थिर द्रौप चित जो राखा । कीरति द्रौपकरे अभिलाषा ॥
अकृत द्रौप आहि उजियारा । अक्ष द्रौप मह शब्द पसारा ॥
द्रौपचंद्र मन कहौ अनन्दा । पतंग द्रौप उमगै रवि चन्दा ॥
कुरअ द्रौप धर्मनि लघु जानी । सताइस द्रौपके नाम बखानी ॥
साखी-इतने द्रौपक गुम हैं, कोइ न जानत नांव ।
कहैं कबीर धर्म दाससों, सोई ठांव लखाव ॥
चौपाई
धर्मदास तुम सबै बिचारा । सार शब्द नाहिं अनुसारा ॥
जब लगि सार शब्द नाहिं होई । तौ जिय केता जन्म बिगोई ॥
काम कपाल भोज बसु नारी । सो साधू जिन नाम सँभारी ॥
ज्ञानस्थितिबाध
( १२१ )
इकोत्तरसे पुरुष तर जाई । इहि विधि रहन गहे चितलाई॥
नारि पराई चित मन देही । जन्म सात कुछी कर लेही ॥
नारि पराई अंग छुवावै । कशमल लगै तत्त्व घटि जावै॥
लाख वर्ष रहैं भूतकी खानी । भुगते नर्क घोर सो प्रानी ॥
बिना शब्द जो भुगवहि नारी । तो सब परै कालकी वारी ॥
बिना शब्द निरञ्जन लीन्हौं । ताते पुरुष माथ पुनि छीन्हौं॥
नर्कहिकी कहा बात जु कहिये । सुर नर सबै काम वश रहिये॥
धर्मदास सुनि लीजे हमसों । उत्पति सकल कही हम तुमसों॥
राजा युग घिर पास मैं गहिऊं । बालकरूप तहां पुनि रहिऊं ॥
घरन कुमार तासकी रानी । प्रीतभाव बहु सेवा ठानी ॥
पुत्र भाव उन हमकह जाना । कपट भाव नहिं तजौं निदाना॥
ज्ञान पुण्य वे बहुतहि करहीं । राज गुमान गर्व अति धरहीं ॥
शब्द हमार नहीं उन चीन्हौं । कुंजर देह जायसों लीन्हौं ॥
कनक सिंह तिनके सुत कहिये । राज तिलक उनके शिर रहिये॥
भाग्यवन्त भयेऊ बड़ राजा । पिता पीड करही सब साजा ॥
बहुतक दिवस तहां चलियऊं । एक दिवस कौतुक अस भयऊं॥
आधी रात बीति गइ जबही । राजा स्वप्न दीन्ह पुनि तबही ॥
कुंजर देह धरै तब आवा । कनक सिंह कहैं स्वप्न जनावा ॥
अहो पुत्र सुनु बचन हमारा । यहि घर आय तू सिरजनहारा॥
आतारूप उन्है जिनि जानो । सतगुरु आप लेव परमानो ॥
जब तुम भक्ति करो चितलाई । कुंजर देह छूटि मम जाई ॥
चटपट परत राति नियरानी । मीन करत जो पानी पानी ॥
प्रात आइ पद शीश लगाऊँ । हम नहिं चीन्ह तुम्हारा भाऊँ॥
चूक परी हमसे गुरु साई । मरम तुम्हार चीन्ह नहिं पाई ॥
आतारूप हम तुम कह जाना । तुम तो ब्रह्म आहु निरवाना ॥
( १२२ )
बोधसागर
पिता हमार कुंजरहि भयऊ । आधी रात खबर मोहि दयऊ॥
क्षमा अपराध कीजिये स्वामी । कृपा सिंधु हो अंतरयामी ॥
साहब दया करौ अति भारी । सकल जीव हैं शरण तुम्हारी॥
दाया करि दीजै वर सोई । जाते आवागमन न होई ॥
जिहिमो होय मोर निस्तारी । सो प्रभु करिहों तब बलिहारी॥
तब हम उनपर दाया कीन्ह । संधिक नाम उनहि कह दीन्ह॥
विधिपर भक्त कीन्ह चितलाई । धनकर मनकर तनकर भाई ॥
सतरहसै रानी परवाना । कर्मनि काहु कहा नहि माना ॥
कइक उहागिल हती जो रानी । सोउठि चली शब्द पहिचानी॥
सकल रूप कर चली सिंगारा । भक्ति हेत कारन पग धारा ॥
लीलावती नाम तिहि केरा । सो हम जीवन कीन्ह उबेरा ॥
सोरह रानी सत्रहों राजा । पहुँचे लोकहि पुरुष समाजा ॥
सोई कथा कुंजर में आई । धर्मदास परखो चित लाई ॥
साखी--यह गुन ज्ञान स्थितिहिके, सेव शब्द निजसार ।
या विधि हंस करनी करै, उत्तै भवजल पार ॥
सजेको शब्द
साखी--अक्षय नामके सेजपर, हंसा पारस दीन्ह ।
कालमें यम लूटिके, हंस आपन कर लीन्ह ॥
अक्षय सुख सेज आदी बानी । जापर हंसा पारस आनी ॥
साखी--जो हंसा पारस परसि, कहे कवीर सत बोल ।
ताकहँ चोर डहके नहीं, युग २ आहि अमोल ॥
ते हंसागये अमर लोककहँ, अक्षय अंक हमपारसलीन्ह ।
कहै कवीर सतलोक बैठकर, जीमें चीन्होती दीन्ह ॥
धर्मदास बचन-चौपाई
धर्मदास चित सेवा ठाने । दोइ कर जोरि चरण लपटाने ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२३ )
कठिन वेद साहेब तुम कहेऊ । जीवन मर्म न काहू लहेऊ ॥
ब्रह्मा विष्णु शंकर मिलि भाई । अलख निरंजन ध्यान लगाई॥
सुर नर मुनिकी कौन चलावै । पच्च २ मरै पार नहिं पावै ॥
तवन भेद साहेब मोहि दीन्हौ । हंस उबारि लोक कहैं लीन्हौ ॥
अब प्रभु मोही कृतारथ कीजै । लोक दिखाय दरस प्रभु दीजै॥
यही देहसों लोक दिखावो । हे दयाल मम तृषा बुझावो ॥
चित चकोर तब होइ अनंदा । दिखे अघाइ लोक सुठि चंदा ॥
साखी-धर्मदास विनती करै साहब सुनो चितलाय ।
जबही मम संतोष होई, पुरुष दर्श दिखाइ ॥
चौपाई
सद्गुरु वचन
तब साहेब कहि बचन प्रमाना । धर्मदास तुम मन पतियाना ॥
तुम जग पंथ चलावहु जाई । हमकह चिह्न पुरुषकह पाई ॥
हमहि पुरुष कहु अंतर नाही । सुरती छाया संग रहाही ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास न्यौछावर कीन्हौ । भये कृतारथ दर्शन दीन्हौ ॥
अब साहब मोहि लोक दिखाऊ। तुमहि छांड़ि दूजा नहि भाऊ॥
बिनदेखे सुस्थिर नहिं होई । कृपा करहु निज राखो गोई ॥
जैसे कृपण द्रव्यकी आसा । बिन पाए बहु होवै त्रासा ॥
दरस करत तन तपत बुझाई । जैसे रंक महानिधि पाई ॥
बिन देखे व्याकुलचित भारी । पुत्र मरे जिमि मात दुखारी ॥
दरश विना नाही चित लागा । हे प्रभु मोकहैं करहु सुभागा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास भाल कीन्ह विचारा । अब तुम बचन सुनौ टकसारा॥
काया अवधि पुरी जब आही । तब लेजाव पुरुषके पाही ॥
( १२४ )
बोधसागर
सुरति शब्द डोरी हट धरहू । छूटै देह तर्स तब करहू ॥
तब लगि पंथ चलावहु जाई । हटता मानि करौ गुरुवाई ॥
मिथ्या वचन तुमहिस्सों करिहे । यमकी डगरि जाय सो परिहे ॥
धर्मदास वचन
मूर्छित होइ चरण चित लागे । जल बिनमीनप्राण जिमित्यागे ॥
बिन देखे नहि होय अनन्दा । चिडिया व्याकुल है अतिफन्दा ॥
तुम साहेब अस बचन उचारा । कंप्पो जीव त्रास भवसारा ॥
हम दरशन विनु हैं अति चोरा । तुम प्रसाद हम पाइत बोरा ॥
अंतरध्यान भए प्रभु जवहीं । सात दिवस बीते पुनि तबहीं ॥
सात दिवस लग अन्न न पाया । कबीर कबीर ध्यान मन लाया ॥
सदगुरु दया करी चित लाई । कच्छ देशते तब चलि आई ॥
कच्छ देश जब कीन्ह पयाना । अलीदास धोबी पहिचाना ॥
नाम पान ता कहैं समुझाई । धर्मदास कह आन जगाई ॥
छोड़हु हठ चित शब्द विचारौ । पंथ चलावहु हंस उबारौ ॥
जीवन अपनी बाँह चलावो । दै परवान हंस सुत्तावो ॥
तुम सब हंसनको सरदारा । जीव उबारि जाय दरबारा ॥
देही सहित जान तुम चाहौ । देह धरै कैसे निर्बाही ॥
लोक बैठि तब करिहौ राजी । काग कालकी टोरहु बाजी ॥
अपनी संशय तुम मत धरहू । जीव उबारनकी सुधि करहू ॥
साखी—देह धरेका यह गुण, देहसहित नहि जाव ।
सुखसागर तबहींमिलै, सुरति शब्द लौलाव ॥
चौपाई
धर्मदास उठि बिनती कीन्हां । नामसंधि साहब मोहि दीन्हां ॥
लोक दीपकी सुनी बडाई । ताते दरश परश चित लाई ॥
जब लगि नाहीं देखौ नैना । तब लगि नहि पतियाहूँ बैना ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२५ )
अन्तर ध्यान बहुरि प्रभु भयञ्जः। धर्मदास विलखत मन भयञ्जः॥
रुदन करत फिरै विलखाता । कहैं ना देखे साहब गाता ॥
मोहि अपराधी कस प्रभु छांङ्गा । विरह ज्वाल जरही मन भांङ्गा॥
हौ अपराधि करम कर हीना । साहेब तरस परै नहिं चीन्हा ॥
बिन देखे नहिं जियत न आऊँ । गुरुचरणामृत बिन पछताऊँ ॥
अपना दास दास प्रभु कीन्हा । अग्रिम पदार्थ हम कह दीन्हा॥
अब साहेब मोहि दर्शन देहू । तुम बिन कासो करब सनेहू ॥
दिवस आठ अन्नहि बिन बीता । बिना कबीर जीव नहिं जीता ॥
या विधि बारह दिन हो गयहू । तब साहब फिर दर्शन दियहू ॥
साखी-सजिव भये निजीवते, अति अनन्द उर बाढ़ि ।
धर्मदास मन हर्ष भा, सुख अनन्द हिय गाढ़ि ॥
चौपाई
धर्मदास बिनती तब लाई । इतने दिवस दरस बिन जाई ॥
हम तो भ्रमर कमलके वासी । जल बिन मीन सुरतिज्यों प्यासी ॥
सद्गुरु वचन
तब साहब अस भाखब बैना । अब तुम देखो अपने नैना ॥
देखहु धर्म निरूप हमारा । हमही छांङ्ग और चित धारा ॥
हिरिणिरूप धरो प्रभु तबहीं । कोटिन भानु छिपाने जबहीं ॥
येहि रूप है आदि हमारा । हठ नियह जिन करब बिचारा ॥
जब तुम इतना कीन्हा उपासा । तब कह दरस पाइ हम पासा ॥
धर्मदास वचन
भये कृतार्थ दर्शन लीन्हा । धर्मदास न्यौछावर कीन्हा ॥
बहुरि दास उठि पायन परही । चरण टेक बिनती अनुसरही ॥
जबसे पावब नाम तुम्हारा । तबसे सुनब लोक व्यवहारा ॥
अब मनसौं अभिलाखा येही । सोक दिखावहु पुरुष विदेही ॥
( १२६ )
बोधसागर
मो कह लेहि चलौ प्रभु तहवां । सत्य लोक पूरुषही जहवां ॥
बिन परिचय नहिं मन पतियाई। विन दर्शन नहिं सुरति हद्दाई॥
तुम प्रसाद पाइब मैं भेदा । अब परसौ चित अमृत केदा ॥
सत्यलोक परसौ उजियारी । मैं अब बलि २ जाऊँ तिहारी॥
साखी—यम बंधन सब काटिकै, हंस लगावहु तीर ।
धन्य भाग्य वा हंसके, कहि नाम कबीर ॥
सदगुरु वचन चौपाई
तब साहब चित पाया आई । चलहुँ वेग मैं दर्श दिखाई ॥
प्रथमहि करौ नासिका बारी । फिर रक्षा मन है रखवारी ॥
पैठै नाहीं काल शरीरा । बहुरि कठिन होवे तब पीरा ॥
जब तुम करहु अग्र सनेहा । शब्द संधिसौं राखो नेहा ॥
उन मुन कर पवनहि अवराथौं। उलटे ते सुलटा करि साथौं ॥
सोहं सोहं होइ सवारा । छोड़हु देह चलो दरबारा ॥
चले जो हंस पवनके तेजा । पहुँचे निमिष मांह जहां सेजा ॥
पलैंग साठ राह हम कीन्हों । साहिब खैंचि पलकमों लीन्हों ॥
राह माह एक नाचहि दूता । शब्द बान मारेय अजगूता ॥
छिनमें साहब लैगये तहँवा । पुहुप दीप पूरुष रह जहँवा ॥
सुरजन पीप जाइ भे ठोढ़े । देखत दरस हरष अति बाढ़े ॥
धर्मदास सत बिनती कीन्हों । साहब सुरति घटहिमों चीन्हों ॥
लेकर सुररति चले पुनि तहां । हंस सुजन बैठे जहां ॥
करी प्रणाम दण्डवत कीन्हों । हंसन कुशल पूछि सब लीन्हों ॥
केहि बिधि तुम रक्षा मन आयहु । कौन शब्दसों अमृत पायहु ॥
यमको जोर पहुँचत है प्रचण्डा । कैसे कदि आये नव खण्डा ॥
कौन प्रसाद पाय तुम भाई । कौन वस्तु बल इहवां आई ॥
पिछली सुरति कछु तुम आनौं । रक्षा हंस आप कह जानौं ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२७ )
धर्मदास तब वचन प्रकाशा । आये इह कबीरकी आशा ॥
नाम संधि उन मोहि हटाई । तिहि प्रसाद सेवा तुम पाई ॥
आरतीकर परवाना पावा । काल फाँस सबहीय नशावा ॥
सुरति निरति भूल गये जब ही । भवसागरमों ठाढे तब ही ॥
साखी-लोक वेद सब भूलिहू, भूला आपनु भाव ।
बलिहारी सतगुरुनकी, जो ल्याये इहि ठाव ॥
चौपाई
तबहि सुजन जन पूछी बाता । कहिब कहा है हमरे आता ॥
तुमरे दीप माँहि वे ठाढे । हम पूरन उनहीके बाढे ॥
तब सुरजन जन आये तहँवा । आइ कबीर बैठे हैं जहँवा ॥
चरण लगाइ अंकमहँ लीन्हों । भले गुसाईं दर्शन दीन्हों ॥
सिंहासन साहब बैठारी । सुरजन हंस विराजे भारी ॥
आज्ञा साहब दीन्ही जबही । धर्मदास ठाढे भये तब ही ॥
पुरुषहि तबहि वचन उचारा । सुकृत अंश लावो सठिहारा ॥
आरति साजि हंस सब आये । चलिए सुकृत पुरुष बुलाये ॥
तब सुकृत चित आये तहँवा । पुहुपदीप पुरुष रहि जहँवा ॥
पुहुपदीप नहिं बरनो जाई । जगमगज्योति सदा अधिकई ॥
दामिनि दमक होय अति भारी । कोटिन भानु जाय तहाँ वारी ॥
हंस जाय तहाँ करै अनन्दा । कालजाल व्यापै नहिं फन्दा ॥
पंख बेहु नभचर तहाँ फिरही । अगिन बेहुते दीपक जरही ॥
बिन करताल मुदंग जो बाजे । चित्र विचित्र बीन कर छाजे ॥
बीना सुर तहाँ शब्द पुकारा । बीना श्रवण सुनत झनकारा ॥
बिना नालके कमल अन्तूपा । तामध्ये है पुरुष स्वरूपा ॥
करतहि दरश हरष उर आनी । सतगुरुवचन सत्य कर मानी ॥
साखी-अति अनंद उर ऊपजो, बाजत अनहद तूर ।
हीरा लाल मणि जग मगै, अमृत शोभा भरपूर ॥
( १२८ )
बोधसागर
चौपाई
धर्मदास मन भये अनन्दा । जिमिरविदरश फूलि अरविदा॥
शोभा दरश हरष अति भाऊ । उभयसुरखगतिबरणि न जाऊ॥
तब सुरजन जन जाइ जनावा । साहेब धर्मदास यह आवा ॥
इच्छा अधिक करै दर्शनको । पुरुष चरण हियमो परसनको॥
ये दोइ रूप तुमहि उत्पानी । सद्वरु सुकृतै नाम बखानी ॥
तब ही पुरुष बचन फरमाया । सुरजन हंस जबै बुलवाया ॥
लेहु बेगि सुकृत तुम अंशा । पुरुष दरश करीब निःशंसा ॥
दंडवत अष्टांगहि कीन्हौ । धर्मदास आगे पग दीन्हौ ॥
पायर दीप ठाढ़ भै जब ही । अमृतकला देखत भै तब तब ही॥
पर धर्मदास हि सुरझाई । देखि रूप अब मति अधिकाई॥
कोटिन कला सूर्य औ चन्दा । हीरा रतन गिने को गन्दा ॥
जगमगज्योति अधिकतहाँराजे । चितवनदृष्टि डगत गुनराजे ॥
हग संपुट अंबुज सम आही । दरशहरशच्छबिहियहि अघाही॥
आनन्दरूप मूरछा आई । तब सुरजन तन कीन्ह उठाई ॥
सुचित चित्त होऊ धर्मदासा । आभारूप करि शब्द निवासा॥
उठिकर बाह निछावर करही । शीश नवाय चरण रज धरही ॥
दंड प्रणाम कीन्ह बहुभांती । सीप अघाइ पाइ जिमि स्वाती॥
तबहि पुरुष असआसन दीन्हौ । शब्द सहाय हमही तुम चीन्हौ॥
तब सुरजन जन बचन उचारा । सुकृत अंश कीन्ह दीदारा ॥
पुरुष दीन सिंहासन टारी । हंसहरम्मर बैठो झारी ॥
पुरुष तबहि यह वचन उचारा । केहिके अंग आहि दरबारा ॥
धर्मदास कैसे तुम आये । को वहियां जिनधरि पहुँचाये ॥
काहेके बल कालहि जीता । कौन शब्दसे राखब प्रीता ॥
तब सुकृत बिनती अनुसारी । साहब बचन प्रीति उर धारी ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२५ )
ज्ञानी अंश शब्द मोहि दीन्ह। उनकी बाँह गौन हम कीन्ह। ॥
करता देत छेकि जब बाटा। शब्द बाँह श्रोता कह काटा ॥
कालहि जीति अंशलै आवा। उनकी बाँह दरस हम पावा ॥
सुरजन अंश वचन उच्चार। सुकृतघटमें कवि सम्हारा ॥
देखहुँ लोकहि दृष्टि पसारी। ज्ञानी अंश कहां अनुसारी ॥
कौन दीप कहवाँ अस्थाना। कौन रूप ज्ञानी कर जाना ॥
धर्मदास घट कीन्ह विचारा। पुरुष वचन दृष्टि उजियारा ॥
लोक दीप देखो सब ठावा। ज्ञानी अंश नजर नहिं आवा ॥
साखी—लोक दीप सब देखिया, अंश नजर नहिं आय।
पुरुष कबीर घट एकहै, दूजा नहीं लखाय ॥
चौपाई
धर्मदास दुबिधा बिलगाना। पुरुष कबीर एक पहिचाना ॥
रूप रेख सब एकहि देखा। दूजा भाव अन्य नहिं लेखा ॥
धर्मदास तब चकृत भयऊ। पुरुष कबीर एकही भयऊ ॥
कीन्ह बन्दगी शीस नवाई। क्षमा अपराध कीजिये साई ॥
तुम प्रभु आप अवसर नहिं कोई। बकसडु चूकि मोर कछु होई ॥
ब्रह्म अखंडित अन्तर्यामी। कृपासिंधु प्रभु पूरण स्वामी ॥
लज्जावान अविगति अविनाशी। लोक दीप सब कीन्ह प्रकाशी ॥
पुरुष वचन
धर्मदास तोहि दाय। कीन्हौ। अवगति रूपदरश हम दीन्हौ। ॥
ये दोह कला भिन्न नहिं जानो। पुरुष कबीर एक पहिचानो ॥
एक रूप हम हंस उबारा। एक रूप त्रैलोक मझारा ॥
तुम्हरे शिर जीवनको भार। भवसागरके तुम कटियारा ॥
यासे परखो दीन्ह बताई। यह रमती घट देवरि गाई ॥
जो तुमरे घटते नाहिं जाती। तो सब जीवन माँह समाती ॥
नं. ८ कबीरसागर - ५
( १३० )
नोधसागर
यह हुरमत मनमहँ जो धरही । फिर २ भवसागरमें परही ॥
पुरुष कबीर एक जिन जाना । हंस हमारा सोइ पहिचाना ॥
के काल निकट नहि आई । नाम कबीर कहो चितलाई ॥
साखी—अब तुम जाइब जगतमें, हंसन करो उबार ।
हंसराज तुम अंश मम, भुगवो सुखहि अपार ॥
प्रलयकालके अंतमें, जीव जन्तु सब तार ।
दरस परस सब मिलि करे, अस्थिर रूप अपार ॥
चौपाई
पुरुष रूपसे ज्योति निकारा । नाम कबीर देह तब धारा ॥
धर्मदास ढिग बैठे आई । जौन रूप धरि गये लेवाई ॥
चीन्हो सुकृत रूप हमारा । अब तुम घटमें भव उजियारा ॥
चलहु बेगि जिन लावहु बारा । जीवनाथ देव टकसारा ॥
चले सुकृत तबही शिरनाई । ज्ञानी लीन्ह संग लगाई ॥
निमिष एक नहि लागी बारा । पहुँचे सहज शून्य मझधारा ॥
धर्मदासकी काया जहँवाँ । पहुँचे ज्ञानी आये तहँवाँ ॥
चारी दूत देह ढिग आवा । पैठन केर उपाय लगावा ॥
घटमें पड़ि देह ले जाऊ । धर्मदास फिर कहँवाँ आऊ ॥
साहब शब्द बानसे मारा । दूतहि मारि हंस पैठारा ॥
धर्मदास कहा महँ जागा । रोम २ आनंद बहु पागा ॥
गुरु कबीर कह निज कर चीन्हों । तन मन धन न्योछावर कीन्हों ॥
बहुत अनन्द कीन्ह गृह माँहीं । चरण शरण मन लीन्ह सदाँहीं ॥
साखी—यह गुण ज्ञान स्थितहिके, कहै कबीर विचार ।
धर्मदास दीदार करि, आए जगत मँझार ॥
चौपाई
धर्मदास हियमें अति हवैं । गढ़द गिरा नैन जल ववैं ॥
ज्ञानस्थिति बोध
( १३१ )
मम हियतिमिर आहि अधियारा । महर पतंग कीन्ही उजियारा ॥
मन अहि तपत कबहुँ नहि धीर । वचन अंग शीतलमलयागीर ॥
तेहिपर सत त्रिय ताप बुझानी । अमी असन त्रियत्रिपतअघानी ॥
पायउ दरश कृतारथ आजू । दरसन देखेव हंस समाजू ॥
अब गुरु मोकहैं देव लखाई । पुहुप दीप कैसे निरमाई ॥
अंबुदीप कौन विधि भयऊ । धर्मराज कैसे निर्मयऊ ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास पूछी भलवानी । सो सब कथा कही बिलछानी ॥
पुरुष विदेही देह निमासा । श्वासा सारते पुहुप प्रकाशा ॥
सत्रह शंख पंखुरी कीन्हौ । ताहि मध्य वासा प्रभु लीन्हौ ॥
अंबुदीप तबही जो कीन्हौ । सहज पुत्र कह बैठक दीन्हौ ॥
सवा शंख पंखुरी राजै । जग मग शोभा तहां विराजै ॥
आठ पुत्र तहँसे उत्पानी । तिनसों आठों सिद्धि बखानी ॥
जोति सरूपी पाया आई । ज्योति रूपके काल बनाई ॥
उत्पत करै प्रलय संहारा । तउना उपजै काल अहारा ॥
सहज धर्मसों गुण परकासा । ज्योति सरूपी ज्योति निवासा ॥
धर्मरायको बल परकाशा । माया जाल जीव सब फाँसा ॥
आपुन रहियब सुनी मझारा । वहाँ बैठि सब कीन्ह पसारा ॥
पुहुप दीप आवन नहि पावा । जानै साहब नाहि रहावा ॥
धर्मराय माया उपजाई । ज्योति स्वरूप जीव अरुझाई ॥
साखी-पुरुष पार नाहीं लहेउ, अटके ज्योतिहि मूर्ति ।
ज्योति भई है प्रकृतितें, प्रकृति बनी है मूर्ति ॥
चौपाई
इह कारण वह दीप सम्हारा । धर्मनि पाव वही बैठारा ॥
पुहुप दीप जब सिरजन लीन्हौ । समसर पवन वास तहैं कीन्हौ ॥
( १३२ )
बोधसागर
ज्योति ओट यह बोलत बानी । सबको जानै पुरुष निसानी ॥
काल दुष्ट जीवन छलि राखा । ज्योतिहिओट वचनमुख भाखा॥
उत्पति प्रलय याहिसों भयऊ । भूल भुलाय सबनको दयऊ ॥
पुहुप दीपको सुमिरन करई । ज्योति स्वरूप नहिं सो परई॥
साखी--इह गुन ज्ञानस्थितिके, पुहुपदीप अनुसार ।
एहि दीप बासा करै, आवा गवन निवार ॥
चौपाई
पुहुप दीपमें समसर कीन्हौ । समसर पवन खास तहाँ लीन्हौ॥
अमर वासना येही आहे । इहँहि बैठि सब करी कथा है ॥
थाह न जानत मूढ़ गवँरा । लुब्ध रहेव जयमाल पसारा ॥
पुहुपदीपको सब दीप निवासा । जहाँ वह पारब्रह्मकर बासा ॥
येहि शब्द तुम लेव बिचारी । पुहुप दीप कीन्हौ बहु बारी ॥
पुहुपदीप दीपनमें सारा । जो बूझे सो उत्तरहि पारा ॥
साखी--येहि सुरति ले राखहु, पुहुप दीपके पास ।
सत्य पुरुष जहाँ आप है, अमृत सिंधु निवास ॥
चौपाई
तहँको हंस करहि पैठारा । जब मिलि है सद्वरु कइहारा॥
हंस जाय पुरुषहिं दरबारा । अविचलनामकोमरहि सद्धार॥
सत्य कमलपर बैठक दीन्हा । बैठे हंस अतिहिं सुख लीन्हा ॥
सुधा अहार अमर भै काया । आदि नाम अविचल मन भाया॥
कोटिन कोटि दंडवत लीन्हा । धनि सत्य सुकृतनामजो दीन्हा॥
पुरुष शब्दजिनि आपु बतावा । आवा गौन रहित घर पावा ॥
साखी--येहि गुण ज्ञान स्थितिके, पुहुप दीप निजु बास ।
कहे कबीर वह शब्द गुन, हंसा करहि विलास ॥
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास तब सेवा ठानी । सुरति भेद पूछनको आनी ॥
ज्ञानसिग्धनिबोध
( १३३ )
सो सद्गुरु मोहि कहो बखानी । जासो आदि अन्त पहिचानी ॥
जौन सुरति साहब तुम साथी । सो मोहि कहिये मिटत उपाधी ॥
जेहि सुरति प्रथम जो आहे । वही सुरति मिलि सबको थाहे ॥
बिना सुरति नहिं गुरुको पाही । बिना सुरति नहिं लोके जाई ॥
सुरति होइ तब ज्ञान उचारे । सुरति होय तब ध्यान सम्हारै ॥
सुरतिहि पैठि पवन को गहे । बिना सुरति वह प्राणी डहे ॥
सुरति होइ तब अगम जानी । भला बुरा सबही पहिचानी ॥
बहिनभानजी सुरतिहिजानी । माता पुत्री सुरति बखानी ॥
मोह न नारि सुरति कहैं देखौ । धर्म पाप सब सुरति बिसेखौ ॥
साखी--जो कुछ है सो सुगति है, साहब दे बतलाय ।
सुरति भाव जब चीन्ह है, तब हंसा घर जाय ॥
सद्गुरु वचन
तब सद्गुरु अस वचन उचारा । धर्मदास पूछव मत साग ॥
बिना सुरति पुनि कुछ अनपाई। सुरति विहूँ नहिं आवहि जाई ॥
सो अब तुमसों कहां बुझाई । सात सुरति सब देव लखाई ॥
पुरुष सुरति आपहि उपराजा । विहँगसुरतिप्रथमहि किय साजा ॥
बीस आठ प्रकृति जो कीन्हौ । जो जनमें तस भुगने लीन्हा ॥
जैसे योग मनहिं रहाई । तैसे बुद्धि शरीरहि सोई ॥
प्रथम कहौ अब सुरति विचारी । पुरुष एक उत्पन किय नारी ॥
जेठी सुरति तबहि उच्चारी । चारहु लोक कीन्ह बिस्तारी ॥
विहँग सुरति ताही सो कहिए । ब्रह्म सुरति मूल वह लहिए ॥
निरति सुरति ये स्थूलहिछाजा । हरषत सुरति विदेही साजा ॥
बाढी सुरति नाद गुन गहे । धीर सुरति नाद गुण गहे ॥
साखी--सुरति पुरुष अंगहि बसी, फूट अंडके भाव ।
बीजमूल गुण प्रकट है, देखै ते सच पाव ॥
( १३४ )
बोधसागर
चौपाई
सुरति शब्द अब कहौं बखानी । धर्मदास लीजो पहिचानी ॥
सुरति शब्द भाखिब हम तुमसे। सुरति प्रसन्न होय तब हमसे ॥
सुरतिहि माहि रच्यो संसारा । सुरति करै तब उत्तरे पारा ॥
जेठौं अंश सुरति जो आही । पुरुष संग वह सदा रहाही ॥
बिहंग सुरति पुरुष जब कीन्हौं। रचना सपत सोप तब दीन्हौं ॥
अबही कहौं सुरती कर मूला । उपज्यो अग्र शब्दसो स्थूला ॥
जबही पुरुष कीन्ह है इच्छा । तब इह प्रकट भई सब शिक्षा ॥
सुरति शब्द पुरुषहि उपजाई । सुरति प्रसन्न लोभ रच आई ॥
सुरति निरति सुख देह अनन्दा। मेटत सुरति सकल दुख द्रंदा ॥
सुरति निरति जब एके होई । तब साहेब कह देखे सोई ॥
साखी—कहै कबीर वह सुरतिते, सब कछु भयो प्रकाश ।
शब्दहि सुरति बिहंग है, लीन्ह अग्रमो बास ॥
चौपाई
धर्मदास सुनियो चितलाई । घट भीतर लीजो निरताई ॥
सुरति रूप देखो निरधारा । मन बुद्धि चित्त पवनसे न्यारा ॥
पाँच तत्त्वकी रचना येही । इनते सुरति जो आहि विदेही ॥
ब्रह्म अंगसे प्रकटी आई । तोनि अंग गुण कला धराई ॥
सत्यरूपसे सुरति बखानौ । चेतन अंग निरति कहैं जानौ ॥
आनंद सदन शब्द पहिचाना । सत्य सुकृत दोइ नाम बखाना ॥
सुरति रूप चैतन्य समाई । चेतन रहित शब्द लौ लाई ॥
सुरति समुद्रहि मठी हुवारा । हंसा पैठि देखि निर्धारा ॥
साखी—कहै कबीरहि सुरति बल, अपने पुरुषहि देख ।
मन बुद्धि चित्त समेटि के, चेतनरूप विशेष ॥
अक्षय वृक्षकी सुरतिमें, हंसा लेहि बसेर ।
कहै कबीर लै निबहि है, जात न लागे बेर ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १३५ )
अबु दीपकी सुरतिपर, हंस होय असवार ।
कहै कबीर लै निबहिहौं, कोटि बसैं बटपार ॥
गृहदान रोके नहीं, सुरति हंस लै जाय ।
कहै कबीर यम हारियो, काल पैठि पछिताय ॥
इह गुण ज्ञान स्थितिहिके, गहे शब्द चितलाय ।
कहै कबीर यम हारिया, काल बैठि पछिताय ॥
धर्मदासवचन-चौपाई
धर्मदास बिनती अनुसारी । तुम साहब हम दास तुम्हारी ॥
गुरु शिष्यकी रहनी कैसी । सो समुझाय कहौ गुरु तैसी ॥
योग अयोग मोहि समुझावो । हे दयाल मम त्रिखा बुझावो ॥
सद्गुरु वचन
सद्गुरुवचनहि विहँसि उचारी । अगुण सगुण विच गुरु अचारी ॥
शिष्य पूछि गुरु भए उदासा । सो गुरु उठि आए धर्मदासा ॥
जिमि बालक रोवै बिछाई । मात पिता बहु बोध कराई ॥
येयाविधि गुरु शिष्य हैं मोई । जगमें अमृत पीवैं वोई ॥
शिष्य सीप गुरु स्वाती जानो । गुरुपारस शिष्य लोह समानो ॥
गुरु मलयागिरि शिष्य भुजंगा । गुरु पारस शीतल होय अंगा ॥
गुरु समुद्र है शिष्य तरंगा । गुरु दीपक है शिष्य पतंगा ॥
शिष्य चकोर गुरु शशि जानौ । गुरुरविकमल शिष्यविकशानौ ॥
इह सनेह शिष्य निहचै लहई । गुरुपद परस दर्श हिय गहई ॥
जब शिष्ययाविधिध्यानविशेषा । सो वह सीख गुरु समलेखा ॥
गुरुन गुरुनमों भेद विचारा । गुरु गुरु कहै सकल संसारा ॥
गुरु सोई जिन शब्द लखाया । आवा गौन रहित दिखलाया ॥
गुरुहि सजीवन शब्द लखाया । जाके बल हंसा घर आया ॥
वा गुरुसो कछु अन्तर नाही । गुरु औ शिष्यमताएक आही ॥
( १३६ )
बोधसागर
साखी—गुरु शिष्य एके भए, भिन्न न कबहुँ होय ।
दुर्मति दिलसो मारिकै, सुरति शब्द चित पोय ॥
धर्मदासबचन--चौपाई
धर्मदास तब बिनती कीन्हौ । चरण पकरिके विन्ती लीन्हौ ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । केहिविधि उपजे सो कहि भेवा ॥
चारि मुक्तिको भेद बतावौ । सुस्थिर ज्ञान मोहि समझावौ ॥
सत्गुरु बचन
सदगुरु बचन विहसि कर बोले । मुक्ति भेद कहुँ परदा खोले ॥
आदिहि पुरुष निरञ्जन कीन्हौ । माया आदि ताहि कह दीन्हौ ॥
तिहि संयोग भये त्रिय बारी । ब्रह्मा विष्णु महेश विचारी ॥
चार मुक्तिके वे हैं राजा । पँचइ मुक्ति भिन्न उपराजा ॥
प्रथम मुक्ति सालोक बताई । मारग वाम ताहि कर आई ॥
दूजी मुक्ति समीप कहावा । निर्वाण मार्ग हो ताकहँ पावा ॥
तीसरि मुक्ति स्वरूप बखानी । अघोर मार्गही ताकर जानी ॥
चौथी मुक्ति कहिये सायोजा । सर्मग मार्ग कलमा पढ़ रोजा ॥
चारों मुक्ति निरञ्जन लीन्हौ । तिनके बसहि जीव सबकीन्हौ ॥
अब सुन पांचइ मुक्ति विचारा । धर्मदास परखो मतसारा ॥
जीवनमुक्ति दरस तब लहये । मृतकदसा होय नामहि गहिये ॥
सत्य वचन मुखसो उच्चरई । नाम सार हृदये महाँ धरई ॥
नियम धर्म षट्कर्म अचारा । त्रिगुण फंदसों रहै निन्यारा ॥
सुरति निरति नामसों राखै । सद्गुरु बचन सत्यकर भाखै ॥
लोभ मोहसों रह निह न्यारा । करम क्रोधते आप उवारा ॥
दुख सुखकी कछु संशय नाही । पाप पुण्य नाही चित माहीं ॥
अरथ द्रव्य मिथ्याकर मानै । जीवन जन्म नाम पहिचानै ॥
दया क्षमा कुल टूट कहावा । विषमें हरषन चितमें लावा ॥