कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सुमिरनबोध
( ३९ )
गुरु कृपा ते जनक विदेही । सो गुरु माहि परमपद लेही ॥
गुरु कृपा ते जन प्रहलादा । दैत्य होइ भक्ति तिन साधा ॥
गुरु कृपा जो कोई पावै । सकलो दुरमति दूर बहावै ॥
साखी-गुरु कृपा ऐसी अहै, सुनो साधु चित देइ ।
ताते गुरु सुमिरण कहू, रहे कालको लेइ ॥
गुरु गुरु जाप करो मन मेरा । काल दूत नहि आवै नेरा ॥
गुरुको ध्यान धरों नर नारी । सहजे सहज तरो संसारी ॥
गुरु गुरु सुमिरो मनसे प्यारो । गुरु गुरु कहो कोटि अवतारो ॥
गुरु गुरु जाप काज सबसारे । दुर्मति कपट दूर करि तारे ॥
गुरु गुरु जाप करो मन धीरा । गुरुके नाम मिटै सब पीरा ॥
गुरु गुरु मंत्र हृदय धरीजै । तन मन धन सब अर्पण कीजै ॥
गुरुको सुमिरन निशदिन कीजै । जीवन जन्म सफल करि लीजै ॥
एक नाम गुरु देत दिखाई । सो निजनाम कलपि नहि जाई ॥
गुरु सुमिरण निज नाम विचारे । आप तरे औरनको तारे ॥
सतगुरु शब्द नाम निरधारा । भव सागरसे उतरे पारा ॥
साखी-गुरुको सुमिरण कीजिये, निशदिन ध्यान लगाय ।
गुरु लक्षण अब कहत हो, सुनहु धीर चित लाय ॥
राग द्वेष दोनों से न्यारे । ऐसा गुरु शिष्यको तारे ॥
आशा तृष्णा कुबुद्धि जलाई । तन मन वचन सबन सुखदाई ॥
निरालम्ब भ्रम रहित उदासी । निर्विकार जानो निर्वासी ॥
निरमोही निरबंध निशंका । सावधान निरवान निबंका ॥
सार याही और सरवज्ञी । संतोषी ज्ञानी सतसंगी ॥
अयाचक जन निर अभिमानी । पक्षरहित अस्थिर शुद्धवानी ॥
निस्तरंग बाही परंपंचा । निष्कर्म निरलिप्त अबंचा ॥
बोल अडोल भाखे सो सांची । कोई बात कहै नहि कांची ॥
( ४० )
बोधसागर
जेहि विधि कारज जिवका होई । निर्णय वाक्य उचारे सोई ॥
झाई सन्धि कालका फेरा । पारख लाई करे निबेरा ॥
सार्वी-जाति बड़ाई आश्रमहि, मानबड़ाई खोय ।
जो सतगुरु के पल लगे, सांच शिष्य है सोय ॥
गुरु आगे राखे माथ । करै बिनय दुख मेटो नाथ ॥
अहौ अधीन तुम्हारे दासा । देहू अपने चरनन बासा ॥
यह तन मैं तोहि भेट चढायो । अपनी इच्छा कुछ न रखायो ॥
जो चाहो सो तुम अब करो । या भांडको जेहि विधि भरो ॥
भावै धूप छांहमें डारो । भावै बोरो भावै तारो ॥
गुण पौरुष कछु ओ नहिं मेरो । सब विधि शरण गही गुरु तेरो ॥
मैं अब बैठा नाव तुम्हारी । आशा नदी सो करिये पारी ॥
अपना कीजै गहिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गोसाई ॥
बहु विधि बिनती गुरुसे करई । मान मोह हृदय नहिं धरई ॥
देखि बिनयगुरु होहि अनन्दा । तब पावै सिख परमानन्दा ॥
सार्वी-गुरुके आगे जायके, ऐसी बोले बोल ।
कूर कपट राखे नहीं, अरज करै मन खोल ॥
देखि प्रसन्नता गुरुकी भाई । गुरुते कहिये शीश नवाई ॥
ऋद्धि सिद्धि फलमैं कछु नहिं चाहूँ । जगत कामनाको नहिं लाहूँ ॥
चौरासी मैं बहु दुख पायो । ताते शरण तुम्हरी आयो ॥
मुक्त होनेको मनमें आवे । अवागमन सो जीव डरावे ॥
सत्य भक्ति की चाह हमारे । ताते पकन्यो चरण तिहारे ॥
सत्य ज्ञानते हृदया भीजै । यही दान दाता मोहि दीजै ॥
मैंहूँ दास सो लेहु उबारी । हौ मच्छी तुम मिष्ट सुपारी ॥
हौ पतंग मैं तुम हौ डोरा । मैं तो फिरूँ तुम्हारे जोरा ॥
होहु दयाल दया अब कीजे । बूडत भव में बाहँ गहीजे ॥
सुमिरनबोध
( ४१ )
काल संधि झाँईके जाला । पडिकेहुःखित भयो विहाला ॥
साखी-दया होय गुरु देवकी, छुटे अविद्याभान ।
मिथ्या माया सब मिटे, पावे अविचल ज्ञान॥
सारशब्द गुरुते पावे । जाते जीव काज बनि आवे ॥
पूछ गुरुसे सब अरथाई । सारशब्दको निर्णय भाई ॥
जाते होय जीवको काजा । पाछे सोई होय निव्याजा ॥
त्रिविधि शब्दको पारख बूझे । सत्य पदारथ तबहीं सूझे ॥
सार शब्दको अङ्ग विचारे । मानुष लक्ष भले निरुआरे ॥
पशुवत धर्मको रूप लखावे । करि निरुआर सबगुरु बतावे ॥
हंस स्वरूपहु लीजे जानी । सबहि बतावे सतगुरु ज्ञानी ॥
साँच झूठका निर्णय करे । सत्य होय सो हिरदै धरे ॥
पक्का सौदा गुरुसे लेवे । देखि अधीन गुरु सब देवे ॥
गुरु सो देव सब कछु भाई । क्षणमें भेटे काल कलाई ॥
साखी-काल जालसे छूटिकै, मोक्ष मिलनकी चाह ।
सत्य मिलनकी युक्ति सब, गुरु बतावे राह ॥
गुरुसे पूछे ब्रह्मस्वरूपा । गुरुसे पूछे प्रकृति अनूपा ॥
गुरुसे पूछे सूक्ष्म तत्ता । गुरुसे पूछे त्रिगुण सत्ता ॥
गुरुसे पूछे महाकारण देही । गुरुसे पूछे तुरिया लेही ॥
गुरुसे पूछे पाच तनमात्रा । गुरुसे पूछे पंचकी यात्रा ॥
गुरुसे पूछे सूक्ष्म कारण । गुरुसे पूछे स्थूल सवारन ॥
गुरुसे पूछे ज्ञान अरु कर्मा । दशों इन्द्री सहित स्वधर्मा ॥
गुरुसे पूछे त्रिकुटी भाई । चौदह यम सब देइ बनाई ॥
गुरुसे पूछे चतुर्दश स्थाना । चौदह देव तबे मनमाना ॥
चौदह पूछि करे प्रवेशा । तबही पावे ब्यालिस वेशा ॥
पंचकोश सो गुरु से जाने । आतम ज्ञान तबही मनमाने ॥
( ४२ )
बोधसागर
साखी-पंचकोशमत प्रकट जग, वेद कहे सत सोइ ।
परख बुद्धि निज दृष्टि बल, गुरु कृपा करे जब होइ ॥
द्वैताद्वैत का करे विचारा । शुद्धाद्वैतका करे उपचारा ॥
विशिष्टाद्वैत भली बिधि जाने । पूछत पूछत सबै मन मानै ॥
कर्मोपासना करै विचारा । ज्ञान विज्ञानका पावे सारा ॥
अर्थ धर्म मोक्ष रू कामा । सबका पूछे असली धामा ॥
नवधा भक्तिको रूप पिछाने । योगक्रियाको भली बिधि जाने ॥
राजयोग हठयोग स्वरूपा । सबही आसन सिद्धि अनूपा ॥
ब्रह्म जीव अरु प्रकृतिका भेदा । द्वैतज्ञानका करे अच्छेदा ॥
नाना मत जग आहि जो भाई । सबका भेद जो गुरुसे पाई ॥
आस्तिकनास्तिक मन अनुहारा । सबही फंदा करे विचारा ॥
पूछि गुरुसे सबही सुधारै । गुरुके पारख काल फन्द टारै ॥
साखी-संसाररी पारख बिना, कैसे पावे ठौर ।
विध युक्ति अनमिल सबै, भोग वहीँ औरके और ॥
कालजालकी विकट है चाला । जीव विकल तेहिमध्ये विहाला ॥
पारख यथारथ प्रभु प्रकाशू । कठिन महात्म काल विनाशू ॥
काल चक्र चक्की कठिनाई । पारख पाये जात बिलाई ॥
पारख बल बहियाँ भौजेही । सबहीविधि चीन्ह पडाखलतेही ॥
गुरु प्रसाद पारख हठ पाये । विकट कला यम जालछुडाये ॥
एक एक पारखे जेहि फाँसा । सो संक्षेप करे प्रकाशा ॥
जाते जीव बचे यमफाँसा । शरणागत हठ परख विलासा ॥
भक्तिभाव प्रेमहि अधिकाई । परख लहत बल काल नशाई ॥
कालकला नहि पावे ताको । भक्ति भाव गुरु पारख जाको ॥
परम पारखी जीवन मुकता । नहि पावे तेही कालक उकता ॥
साखी-बिनु शरणागति परख गुरु, नहि जीवन निस्तार ।
सरवोपरि गुरु परख हैं, लहै तो होय उबार ॥
सुभिरनबोध
( ४३ )
गुरु से दीक्षा लीजे भाई । सदा गुरुकी कीजे सेवकाई ॥
दीक्षा लेई जले जो आडा । सात जनम सो सिरजे पाडा ॥
सतगुरुकी जो आज्ञा लोपे । ता ऊपर यम राजा कोपे ॥
सतगुरु की जो अदब न राखे । ताको दोजख शास्तर भाखे ॥
सतगुरु की न लाये विश्वास । ताको काल करत है आसा ॥
गुरुसेती गूमान जानावै । जनम जनम सो यमपुरजावै ॥
गुरुसङ्ग आडी टेढी बोलै । स्थान होइ सो घरघर डोलै ॥
गुरुसङ्ग ज्ञान गर्व दिखावे । कोटि जनम क्रूर को पावै ॥
गुरुसे बाद करे नरनारी । कोटि जनम सो नरक मँझारी ॥
गुरुको शब्द मेटि पग धरई । यम किंकर के फन्दे परई ॥
साखी- गुरुसीढीते उत्तरे, शब्द विद्वान होय ।
ताको काल घसीटि है, राखी सकै नहिं कोय ॥
सतगुरु की मरयाद न धरई । लख चौरासी कुण्डमें परई ॥
गुरुको शब्द न सुने अज्ञानी । भवसागर डूबे अभिमानी ॥
गुरुको देखि धरत अभिमाना । ब्यास बचन पड नरकनिधाना ॥
गुरुको ज्ञान मेटि मत थापी । तीन लोकमें बडो ते पापी ॥
गुरुको मेटि बखानत आपा । धरती भार मरत तेहि पापा ॥
गुरुसे सो ऊंचा चढि बैठे । सात कुण्ड नरकमें पैठे ॥
गुरुसे उलटा बचन सुनावै । सात जनम कोढी को पावै ॥
गुरुको उलट सुनावे बैना । सात जनम अन्धा होय सो नैना ॥
गुरुको छोड देव जो पूजे । बादुर होय दिवस नहिं सूझे ॥
गुरु को छोड अनत जो जावे । उलूक होय सो जन्म गँवावे ॥
साखी- शिवपूजामें बैठिके, गुरुसे करि अभिमान ।
काकभुशुण्ड शिवशापते, पडचो चौरासीखान ॥
गुरुनिन्दा जाके मुख उपजे । कोटि जनम गद्दा हो निपजे ॥
( ४४ )
बोधसागर
गुरु निन्दा जाके सुख होई । ताको सुख ना देखो कोई ॥
अपने सुख गुरु निन्दा करई । शूकर भान जनम सो धरई ॥
गुरु की निन्दा सुने जो काना । सो तो पावे नरक निधाना ॥
गुरु निन्दा सुने जो श्रवण सुनयी । अपने हाथ प्राख निज हनयी ॥
गुरु निन्दक नारायण होई । वाको सुख ना देखौ कोई ॥
गुरु निन्दक धरती पग चम्पे । ताके भार धरनि अति कम्पे ॥
गुरु निंदक अवनी पर सोवे । धरती धरत शेष अति रोवे ॥
गुरु निंदक जब ही सुख बोले । धरती गगन मेरु ग्रह डोले ॥
गुरु निन्दक जो बचन सुनावे । ज्ञानी कान मूँदिके जावे ॥
साखी-गुरु निन्दा छाडो सुजन, गुरु स्तुति मन धारि ।
गुरुको राखो शीश पर, सब विधि करे गुहारि ॥
सतगुरु मिले परम सुखदाई । जनम जनम का दुःख नशाई ॥
सतगुरु मिले तो अगम बतावे । यमकी आँच ताहिनिहिं आवे ॥
सुख सम्पति अपनो नहिं प्राणी । समझि देखु तुमनिश्चय जानी ॥
तीरथ वरत और सब पूजा । गुरु बिनु होवे सबही लूँजा ॥
धारा दोई भल जग माहीं । गृह वैराग बिन औरन आहीं ॥
दोऊ गुरुकी कृपासे पावे । गुरु बिनु भेदसोकौन बतावे ॥
करि त्याग सब गुरुको दीजे । पारख पाइ सदा सुख लीजे ॥
गिरही रही भगति अनुसारै । तन मन धनअर्पण करि डारे ॥
दशवां अंश गुरु को दीजै । जीवन जन्म सुफल करलीजै ॥
सतगुरुके सब आगे धरिये । शीश नाइ गुरुदंडवत करिये ॥
साखी-गुरु सो भेद जो लीजिये, शीश दीजिये दान ।
बहुतक भोढ़ पचिमुये, राखि जीव अभिमान ॥
गुरुसे रहे सदा मन जोरी । जैसे नटुवा चढ़त है डोरी ॥
पारख तार चढी भयनिहिं पावे । छेडे पारख चूर होइ जावे ॥
सुमिरनबोध
( ४५ )
लोपे नहीं सतगुरुका बाचा । सो सतगुरुका सेवक सांचा ॥
सोइ शिष पावै पारख घाटा । सोइ पावे सत्य सो बाटा ॥
निर्माही सतगुरु की रीती । सांचा सेवक लावै प्रीती ॥
मिलि पारखसबभयमिटिजावै । गुरुमुख शब्द सदालौ लावै ॥
देखि दुसह दुख जीवन केरी । दया करी पारख प्रभु प्रेरी ॥
निज पद जानि दया सोकरई । बन्धन जीव छुटावन लहई ॥
केतिक पारख प्रभुके पाये । जरा मरण यम जाल मिटाये ॥
जिन्ह जिवलहे पारखप्रभु केरा । महाराज यम जीव निवेरा ॥
सारखी-गुरु महिमा पूरण भई, सतगुरु किरपा कीन ।
संतनकी वाणी बहुत, यामें संग्रह लीन ॥
पाठफल वर्णन
गुरुमहिमा सबते अधिकाई । शिव शिवाप्रति यही दृढाई ॥
ब्यास वचन औ वेदे गाया । गुरुसे अधिक नहीं रघुराया ॥
सत्यगुरु कबीरहु परखाये । धर्मदास गुरु महिमा गाये ॥
रामहरस जू पूरण दासा । सबही गुरु महिमा परकाशा ॥
जेते भये जग बुद्धिमति धारी । सब गुरुमहिमा कीन उचारी ॥
सबका सार यामधि पढ़े । अब याकी महिमा सुन लइये ॥
तीनों संध्या जो यहि पढ़यी । छोड़ि कुमारग सतपथ लहयी ॥
सांची श्रद्धा मनमें लाई । बूझि बूझिके पाठ कराई ॥
बिन बूझे सो धुन्द अँधेरा । परि अभिमानखायजग फेरा ॥
गुरुके लक्षण भलिविधि यांचे । यम फन्दाते तबही बांचे ॥
सारखी-बूझ विवेक सह जो पढ़े, गुरुमहिमा यक बार ।
कबीर दीनदयाल तेही, तुरत उतारे पार ॥
योग यज्ञ अरु जप तप अहई । पढ़ि गुरुमहिमा सबफल लहई ॥
विष्णु सहस्र अरु भगवद्गीता । भागवत आदिक आठपुनीता ॥
( ४६ )
बोधसागर
एकबार गुरु महिमा पठयी । सोफल सबही क्षणमें लहयी ॥
काशी क्षेत्र बहुबिधि दाने । गया प्रयाग पुष्कर असनाने ॥
सो फल सबही यामधि पावे । श्रद्धासहित जो पाठ करावे ॥
निर्मल होय पाठ जो करई । सो नर सहजे भवनिधि तरई ॥
वेद पुराण अरु शास्त्र विलोई । जाह्निकस्योगुरुमहिमासोई ॥
गुरु महिमा सारको सारी । गिरिजाप्रति भाष्योत्रिपुरारी ॥
गुरु महिमा गुरुगमसे गाया । चढि सत पारख नादबजाया ॥
सत्तकबीर जब दाय़ा कीनी । गुरुमहिमा तब वर्णन कीनी ॥
साखी-गुरुमहिमा गुरु गम अहै, जाने सन्त सुजान ।
पढे विचारे मन करे, पावै मोक्ष निदान ॥
गुरुमहिमा शतक यहि नामा । पाठ किये पूरे सब कामा ॥
सो चौपाई यामहि आही । बीस दोहरा साख सदाई ॥
दो चौपाई दुइ सो साखी । फल वर्णन महाँ पुनि राखी ॥
पांच चौपाई यक सो दोहा । संख्या तिथि वर्णनमहाँ जोहा ॥
या विधि पूर्ण भयोयहग्रन्था । जाते जिव पावे सत पंथा ॥
याको पाठ करे जो कोई । उभय आनन्दफल पावे सोई ॥
गुरुसंतन पाऊँतिन शिर नाऊँ । मातु पिताके बलिबलि जाऊँ ॥
सत्य कबीर सत्य गुरु राई । जिनकी कृपा परख पद पाई ॥
धर्मदास गुरु जग आये । करि उपदेश जगजीवचिताये ॥
राम रहस पूरण गुरु राई । सबको वन्दो शीश नवाई ॥
साखी-नभ रस निधि चन्द्र कह, पौष पूर्णिमा जान ।
बिक्रम सम्बत जानिये, रविवासर दिन मान ॥
इति श्रीगुरुमहिमा शतक समाप्त
सुमिरनबोध
( ४७ )
अथ गुरु उपदेशमहिमायोग प्रारम्भः
दोहा—गुरु संत वन्दन कहूं, ऐहै सुखको पूर ।
गुरुमाहिमा बरनन कहूं, शिर धरि पदरजधूर ॥
सन्त सबै शिर ऊपरे, निस्पृही निज नाम ।
सबके मस्तक मुक्ति गुरु, पूरवे मनके काम ॥
चौपाई
परब्रह्मको आदि मनाऊँ । तिनकी कृपा गुरुचरनन पाऊँ ॥
गुरु सोई सब सिरजन हारा । गुरुकी कृपा होय भवपारा ॥
गुरु बिन होम यज्ञ नहीं कीजे । गुरुकी आज्ञा माहि रहीजे ॥
गुरु संतनके चरण मनायो । ताते बुद्धि उत्तम मैं पायो ॥
सब इष्टनमें सतगुरु सारा । सो सुमिरावे पुरुष हमारा ॥
शरण होय शिष आवै कोई । सहज पदारथ पावै सोई ॥
गुरु सुरतरु सुरधेनु समाना । आवै चरण मुक्ति परवाना ॥
मन बाँधित फल पावै सोई । प्रीति सहित जो सुमिरे कोई ॥
तन मन धन आर्पि गुरु सेवै । होय गलतान उपदेशहि लेवै ॥
गुरु बिन पदारथ और नजानै । आज्ञा मेटि और नहीं मानै ॥
सतगुरुकी गति हिरदय धारै । और सकल बकवाद निवारै ॥
गुरुके सन्मुख बचन न कहै । सो शिष रहनिगहनि मुखलहै ॥
गुरुसे बैर करै शिष जोई । भजन नाश अरु बहुत विगोई ॥
पीढ़ि सहित नरकमें परिहै । गुरु आज्ञा शिषलोपन करिहै ॥
चेलो अथवा उपासक होई । गुरु सन्मुख ले झूठ संजोई ॥
निश्चय नरक परै शिष सोई । वेद पुराण भनत सब कोई ॥
सनमुख गुरुकी आज्ञा धारै । अरु पाछे तैं सकल निवारै ॥
सो शिष घोर नरकमें परिहै । रुधिर राध पीवै नहीं तरिहै ॥
मुखपर बचन करै परमाना । घर पर जाय करै विज्ञाना ॥
( ४८ )
बोधसागर
जहाँ जावै तहाँ निंदा करई । सो शिष कोध अगिन ते जरई ॥
ऐसे शिषको ठौर जो नाही । गुरु रुख लोपत है मनमाहीं ॥
वेद पुराण कहै सब साखी । साखी शब्द सबै यों भाखी ॥
मानुष जन्म पायकर खोवै । सतगुरु विमुखा युगयुग रोवै ॥
ताते सतगुरु शरना लीजै । कपट भाव सब दूर करीजै ॥
योग यज्ञ तप दान करावै । गुरु विमुख फल कबहु न पावै ॥
गुरुही जपतप तीरथ कहिये । गुरुही सांच अरु मिथ्या पहिये ॥
सतगुरु बिना मुक्ति नहिं कोई । ऊंच नीच भावै जो होई ॥
आतम ब्रह्म गुरु ते मेरा । ताके शरणों आयो मैं चेरा ॥
चार युगन जे संतहि भयऊ । ब्रह्मरूप होय पारहि गयऊ ॥
सो जानहु गुरु संग प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन पराऊ ॥
दोहा—गुरु आज्ञा जिन जिन लही, सन्यो सकल विधि काज ॥
नरक रूप जग दूर धरयो, श्रीगुरु महाराज ॥
उपदेश प्राप्ति लक्षण—चौपाई
दोउ कर जोरि गुरुके आगे । करि बहु विन्ती चरनन लागे ॥
अति शीतल बोलै सब वैना । मेटे सकल कपके वैना ॥
हे गुरु तुम हो दीनदयाला । मैं हूँ दीन करो प्रतिपाला ॥
तुम बन्दी छोर अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥
दै उपदेश गुरु मंत्र सुनाओ । जनम मरन भवदुःख छुडाओ ॥
यो अधीन होय शिष जबहीं । शिषपर कृपा करै गुरु तबहीं ॥
गुरुसे शिष जब दीक्षा मांगै । मन कम वचन धरै धन आगै ॥
ऐसी प्रीति देखै गुरु जबही । गुप्त मंत्र सुनावै तबही ॥
अरु भक्तिमुक्तिको पंथ बतावै । बुरो होय को पंथ छुडावै ॥
ऐसे शिष उपदेशी पावै । होय दिव्य दृष्टि पुरुषपेजावै ॥
सुभिरनबोध
( ४९ )
गुरुसेवा माहात्म्य
गंगा यमुना बद्दीश समेते । जगन्नाथादि धाम हैं तेते ॥
सेवे फल प्राप्त होय न जेतो । गुरुसेवामें पावै फल तेतो ॥
गुरु महात्म को वार न पारा । वरणेशिवसनकादिक अवतारा ॥
गुरु महिमा मोपै वरणि न जाई । महिमा अनन्तममम तिलघुताई ॥
गुरु भावना
गुरुको पुरुष ब्रह्मकर जाने । और भाव कबहुँ नहि आने ॥
काम क्रोध रहितगुरु मेरा । पाप पुण्यका करत निवेरा ॥
काम क्रोध लोभ समाना । तो शिष जानहु तीन समाना ॥
यही दृष्टिसे गुरुको सबै । तबतन मन धन गुरु सबको देवै ॥
तनकरि टहल करै गुरु सेवा । सो शिष लहै मुक्तिको मेवा ॥
बचन उचारे पुढुम सम वाणी । द्रव्य लगावै गुरुहित जानी ॥
ऊँच नीच सबही सुन लीजै । कबीर बचन प्रमाण करीजै ॥
मेरे और कछु नहि चहिये । गुरु भावना गुरुहिय लहिये ॥
दोहा—सात द्रौप नौ खण्डमें, औ इकीस ब्रह्मण्ड ।
सतगुरु विना न बाचिहौ, काल बढ़ो परचंड ॥
यही भाव भक्तिका लक्षण कहिये । गुरुके भाव विन भव जल बहिये ॥
जिन बातनसे गुरु दुख पावे । तिन बातनको दूर बहावे ॥
वेद पुराण सबै मिलि गावै । नेमी धर्मौ चौरासि न जावै ॥
अष्ट अङ्गसों दंड परनामा । संध्या प्रात करै निषकासा ॥
गुरुको शिष ऐसे नहि मानै । सो त्रयताप जरत चारो खानै ॥
योगी यती तपी आशरमा । बिनु गुरु कोउ न जानै मरमा ॥
गुरुचरणोदक माहात्म्य
कोटिक तीरथ सब करआवै । गुरु चरणा फल तुरतहि पावै ॥
कदाचित् चरणा मृत पावै । चौरासी गत सतलोक सिधावै ॥
( ५० )
बोधसागर
कोटिक जप तप करै करावै । वेद पुराण सबै मिलि गावै ॥
गुरुपद रज मस्तक पर देवै । सो फल तत्कालहि लेवै ॥
दोहा—गुरु चरणोदक अनन्त फल, हमते कही न जाय ।
मनकी पुरवै कामना, जो लेवे चित्त लगाय ॥
सतगुरु समान को हिन्तु, अन्तर करो विचार ।
कागा सो हंसा करै, दरसावै ततसार ॥
गुरु महिमा ग्रंथ यह, कहैं कबीर समझाय ।
पाप ताप सबही हरे, अमरलोक लै जाय ॥
इति श्रीगुरु उपदेश महिमायोग समाप्त
[कबीर पंथी भारत पथिक स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत और संशोधित
कबीर दर्शन लाइब्रेरीसे संपादित]
सुमिरनबोध
( ५१ )
गुरुमहिमा प्रारंभः
प्रथम खण्ड
चौपाई
गुरुकी शरणा लीजै भाई । जाते जीव नरक नहिं जाई ॥
गुरु मुख हो परम पद पावे । चौरासीमें बहुरि न आवे ॥
गुरु पद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहबकी होई ॥
गुरु विनु मुक्ति न पावे भाई । नरक उर्द्धमुख वासा पाई ॥
गुरुको कृपा कटे यम फांसी । विलम्बनहोयमिलेअविनाशी ॥
गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । ज्यों थोथा भुसछडेकिशाना ॥
गुरु महिमा शुक्र देवजो पाई । चढि विमान वैकुंठे जाई ॥
गुरु विनु पढै जो वेद पुराना । ताको नाहिं मिलै भगवाना ॥
गुरु सेवा जो करे सुभागा । माया मोह सकलभ्रम त्यागा ॥
गुरुकी नाव चढे जो प्राणी । खेद उतारे सतगुरु ज्ञानी ॥
तीरथ वरत और सब पूजा । गुरु विन देवता और न दूजा ॥
नौ नाथ चौरासो सिद्धा । गुरुके चरण सेवे गोविन्दा ॥
गुरु विनु प्रेत जनम सब पावै । वर्ष सहस्र गर्भ मांहि रहावै ॥
गुरु विनु दान पुण्य जो करही । मिथ्या होय कबहुँनहिंफलही ॥
गुरु विनु भरम न छूटै भाई । कोटि उपाय करै चतुराई ॥
गुरु विनु होम यज्ञ जो साधे । औरो मन दश पातक बाधे ॥
सतगुरु मिले तो अगम बतावै । यमकी आंचताहिं नहिं आवै ॥
गुरुके मिले कटे दुख पापा । जनम जनमको मिटै संतापा ॥
गुरुके चरण सदा चित दीजै । जीवनजन्म सुफल करलीजै ॥
गुरुके चरण सदा चित जानो । क्यों भूले तुम चतुर स्थानो ॥
गुरु भगता मन आतम सोई । वाके हिरदे रहों समोई ॥
( ५२ )
बोधसागर
गुरु मुख ज्ञान ले चेतो भाई । मानुष जन्म बहुरिनहिं पाई ॥
सुख संपति आपन नहिं प्राणी । समझि देखु तुमनिश्वयजानी ॥
चौविस गुरु हरि आपहि धरिया । गुरु सेवा हरि आपहि करिया ॥
गुरुकी निंदा सुनै जो काना । ताको निश्वय नरक निदाना ॥
दशवां अंश गुरुको दीजै । जीवन जनम सुफल कर लीजै ॥
गुरु मुख प्राणी काहे न हूजै । हृदय नाम सदा रस पीजै ॥
गुरु सीढी चढ़ि ऊपर जाई । सुखसागरमें रहे समाई ॥
अपने मुख निंदा जो करई । शूकर स्थान जन्म सो धरई ॥
निगुरु करै करै मुक्ति आशा । कैसे पावै मुक्ति निवासा ॥
औरो सुकृत देह जो पावे । सतगुरु विन मुक्ती नहिं आवे ॥
गौरी शंकर और गणेशा । सबही लीन्हा गुरु उपदेशा ॥
शिव विरंचि गुरु सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा भुवको दीन्हा ॥
सतगुरु मिले परम सुखदायी । जनम जन्मका दुःख नसाई ॥
जबगुरु किया अटल अविनाशी । सुर नर मुनि सब सेवक रासी ॥
भवजन नदिया अगम अपारा । गुरु विनु कैसे उतरे पारा ॥
गुरु विनु आत्म कैसे जाने । सुख सागर कैसे पहिचाने ॥
भक्ति पदार्थ कैसे पावे । गुरु विनु कीन जो राह बतावे ॥
गुरु मुख नाम देव रैदासा । गुरु महिमा उनहूँ परकासा ॥
तैतिस कोटि देव त्रिपुरारी । गुरु विनु भूले सकल अचारी ॥
गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके वासी ॥
गुरु विनु पशु जनम सो पावै । फिर २ गर्भ बासमें आवै ॥
गुरु विमुख सोई दुख पावे । जनम जनम सोई डहकावै ॥
गुरु सेवे जो चतुर स्थाना । गुरु पटतर कोई और न आना ॥
गुरुकी सेवा मुक्ति निज पावे । बहुरि न हंसा भवजल आवे ॥
भवजल छूटन यही उपाई । गुरुकी सेवा करो सब धाई ॥
सुमिरनबोध
( ५३ )
सारखी-सतगुरु दीन दयाल है, देवे भक्ति सुकाम ।
मनसा वाचा कर्मना, सुमिरो सतगुरु नाम ॥
सत्य शब्द के पटतरे, देवेको कछु नाहिं ।
कहले गुरु संतोषिये, हवस रही मन माहिं ॥
अति उण्डा गहरा घना, बुद्धिवन्त मति धीर ।
सो धोखा विरचे नहीं, सतगुरु मिलहि कबीर ॥
इति श्री प्रथमखण्ड गुरुमहिमा समाप्त
अथ गुरुदेवकी महिमा प्रारंभः
द्वितीय खण्ड
गुरुदेवकी महिमा बरणौ । जे गुरु देव तुम्हारी शरणों ॥
गावत जे गुण पार न पावे । ब्रह्मा शंकर शेष गुण गावे ॥
प्रथमहि रगुण ऐसा कीन्हा । तारक मंत्र रामको दीन्हा ॥
माता तिलक दिया सरूपा । जाको बन्दे राजा औ भूपा ॥
ज्ञानगुरु उपदेश बताया । दया धर्मकी राह चिन्हाया ॥
जीव दया घटहीमें होई । जीव दया ब्रह्म है सोई ॥
गुरुसे आधीन चेला बोले । खरा शब्द उर अन्तर खोले ॥
स्वारा मिशरी बचने स्वमें । गुरुके चरणों चेला रमें ॥
भीतर हिरदे गुरुसों भले । ताके पीछे रामहिं मिले ॥
गुरु रीझेसो कीजे कामा । ताके पीछे रामहिं रामा ॥
शिष सरस्वतीगुरु यमुना अङ्गा । राम मिले सब सरिता गङ्गा ॥
चेला गुरुमें गुरुमें राम । भक्ति महातम न्यारा नाम ॥
गुरु आज्ञा निरबाहें नेम । तब पावे सरवज्ञी प्रेम ॥
सरवज्ञी राम सकल घट सारा । है सबही में सब सों न्यारा ॥
ऐसी जाने मनमें रहै । खोजे बूझे तासो कहै ॥
( ५४ )
बोधसागर
गुरुकी महिमा संक्षेप भनी । गुरुकी महिमा अनंत घनी ॥
औतार धरी हरि गुरु करे । गुरु किये तब नारद तरे ॥
साख पुरातम ऐसी सुनी । बात हमारी गुरु चरणों बनी ॥
कीड़ी जैसा मैं हों दासा । पडा रहा गुरु चरणों पास ॥
गुरु चरणों राखों विश्वास । गुरुहि पुरावे मनकी आसा ॥
सारखी-गुरु गोविन्द अरु शिष मिलि, कीन्हा भक्ति विवेक ॥
तिरबेनी धारा बही, आगै गङ्गा एक ॥
गुरुकी महिमा अनंत है, मोसो कही न जाय ।
तन मन गुरुको सौंपिकै, चरणों रहों समाय ॥
इति श्रीद्वितीय खण्ड गुरु महिमा समाप्त
अथ गुरुमहिमा प्रारंभः
तृतीयखण्ड
गुरु सतपद भजु अमृतबानी । गुरु बिनु नहीं रे प्राणी ॥
गुरु हैं आदि अन्तके दाता । गुरु हैं मुक्ति पदके दाता ॥
गुरु गङ्गा काशिहि स्थाना । चारवेद गुरुगमसे जाना ॥
अरसठ तीरथ भ्रमि २ आवे । सो फल गुरुके चरणों पावे ॥
गुरुको तजै भजै जो आना । ता पशु याको फोकट ज्ञाना ॥
गुरु पारस परसे जो कोई । लोहाते जिव कश्चन होई ॥
शुक्र गुरु किये जनकरुवैदेही । वो भै गुरुके परम सनेही ॥
नारद गुरु प्रहलाद पढाये । भक्तिहेतु जिन दर्शन पाये ॥
काकभुशुंडि शंभु गुरु कीन्हा । अगम निगम सब कहि दीन्हा ॥
ब्रह्मा गुरु अग्निको कियेऊ । होम यज्ञ जिन यज्ञ दियेऊ ॥
वशिष्ठ मुनिगुरुकियेरघुनाथा । पाये दर्शन भये सनाथा ॥
कृष्ण गये दुर्वासा शरणा । पाये भक्ति जब तारन तरना ॥
प्रारंभिक पृष्ठ (कबीर चरित्र बोध)
सुमिरनबोध
( ५५ )
नारद उपदेश धिमरसे पाये । चौरासीसे तुरत बचाये ॥
गुरु कह सोई है सांचा । बिलु परचे सेवक है काँचा ॥
गुरु सामरथ सबके पारा । गहे शरण उतरे भवपारा ॥
कहैं कबीर गुरु आप अकेला । दशो औतार गुरूका चेला ॥
सारखी-राम कृष्णसों को बड़ा, तिनहू तो गुरु कीन्ह ।
तीन लोकके वे धनी, सो गुरु आगे अधीन ॥
हरिसेवा युगचार हैं गुरु सेवा पल एक ।
तासु पटतर ना तुले, संतन किया विवेक ॥
अथ प्रचलित गुरुमहिमा कबीर दर्शन लाइब्रेरीके संस्थापक
कबीरपंथी भारतपथिक स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत
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इति श्रीतृतीय खण्ड गुरुमहिमा समाप्त
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