भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सत्यमुक्त, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दयानामकी दया, वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे सुमिरनबोध प्रारंभः

षट्त्रिंशस्तरङ्गः

तृतीय बोध

अथ गुरुमहिमा शतक प्रारंभः

गुरु संतन की आज्ञा पाई । गुरु महिमा अमृतरस गाई ॥ गुरु मिले तो अगम बतावे । यमकी आँच ताहि नहि आवे ॥ जेता नाम रूप जग माहीं । सबहींमें सत गुरुकी छाहीं ॥ सतगुरु सकल कलमके साखी । सकल भुवन गुरुतन्मय राखी ॥

( ३६ )

बोधसागर

सतगुरु अजर अमर अविनाशी । सतगुरु परमज्योतिपरकाशी ॥ गुरु गोविन्द दोउएकस्वरूपा । नाम रूप गुण भेद अचूपा ॥ गुरु अविचल पद पूर्णधामा । गुरु स्वामीगुरु जग विश्रामा ॥ सतगुरु जनम मरनते न्यारा । सतगुरु सबका सिर्जन हारा ॥ नर्गुण गुरु रूपसे न्यारा । छाड़ रह्यो सबही संसारा ॥ है सतगुरु सत पुरखै आपे । जासो प्रकट ब्रह्म भयो जापे ॥

साखी-गुरु ईश्वर गुरु परब्रह्म, सतगुरु सबका देव ।

गुरु बिन पार न आवई, ताते शरणो लेव ॥

गुरुकी शरणा लीजै भाई । जात जीव नरक नहिं जाई ॥ गुरुकी शरण साधू जाने । गुरुकी शरण मूढ पहिचानै ॥ गुरु सरणा सबहिनसे भारी । ससुझि गयो सोई नर नारी ॥ गुरु शरणा सो विघ्न विनाशे । डुरमति भाजे पातक नाशे ॥ गुरु शरणा चौरासी छूटे । आवगमनकी डोरी टूटे ॥ गुरु शरणा यमदण्ड न लागे । ममता मरै भक्तिमें पागे ॥ गुरु शरणासे प्रेम प्रकाशे । पारख पाद मिटै यम आसै ॥ गुरु शरणा परमात्म दर्शे । त्रय गुण छोड़ि सतपद परशे ॥ गुरु मुख होय परम पद पावै । चौरासीमें बहुरि न आवै ॥ सत्य कबीर बतायो भेवा । धर्मदास करु गुरुकी सेवा ॥

साखी-गुरुकी सेवा जो करै, हृदया ध्यान लगाय ।

काल जाल सो छूटिके, सत्य धामको जाय ॥

गुरुपद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहबकी होई ॥ गुरु सेवा जो करै सुभाग । माया मोह सकलभ्रम भागा ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्धा । गुरु चरणों सेवे बहु विद्धा ॥ गुरुके सेवे कटे दुख पापा । जनम जनमको मिटे सन्तापा ॥ गुरुकी सेवा सदा चित दीजै । जीवन जन्म सुफलकरलीजै ॥

सुमिरनबोध

( ३७ )

चौविस रूप हरि आपुहि धरिया । गुरु सेवा करि सबही विरिया ॥ शिव विरंचि गुरु सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा ध्रुवको दीन्हा ॥ सकल मुनि गुरु सेवा चाही । गुरु सेवा करि पँथ अवगाही ॥ गुरुसेवे सो चतुर सयाना । गुरुपट तर कोइ और न आना ॥ गुरुकी सेवा मुक्ति निज पावे । बहुरि न हँसा भवजल आवे ॥

साखी-गुरुकी सेवा कीजिये, तजि मनका अभिमान ।

गुरु विनु दोसर को नहीं, धर्मनि सतगुरु जान ॥

योग दान जप तीर्थ नहाना । गुरु सेवा विनु निष्फलजाना ॥ गुरु सेवा विनु बहु पछतावे । फिरि फिरि यमके द्वारे जावे ॥ गुरुसेवा विनु कौन जो तारे । भव सागरसे बाहर डारे ॥ गुरुसेवा विनु जड का करि है । काकी नाव बैठिकर तरि है ॥ गुरुसेवा विनु कछु न सरि है । महाअन्ध कूपै महाँ परि है ॥ गुरुसेवा विनु घट अँधियारा । कैसे प्रकटे ज्ञान उजियारा ॥ गुरुसेवा विनु सदा जो धावे । गुरु विनु सांच राह नहिं पावे ॥ गुरु सेवा विनु कान फुंकावे । भवैरि भवैरि भवजलमें आवे ॥ गुरुसेवा विनु द्रन्द अँधेरा । गुरु सेवा विनु कालको चेरा ॥ गुरुसेवा विनु प्रेम विहूना । दिन दिन मोह होयअम दूना ॥

साखी-गुरुसेवा विनु ना छुटे, भवजलको सन्ताप ।

गुरुसेवा करि गुरु मुख, काटे सबही पाप ॥

गुरुमुख होई परम पद पावे । चौरासीमें बहुरि न आवे ॥ गुरुकी नाव चढे जो प्रानी । खेद उतारे सतगुरु ज्ञानी ॥ गुरुके चरण सदा चितलाना । क्यों भूले तू चतुर सुजाना ॥ गुरु भगता गुरु आतम सोई । वाहीके मन रहो समोई ॥ गुरुमुख ज्ञान ले चेते सोई । भवमें जनम बहुरि न होई ॥ गुरुमुख प्राणी सदाई जीवै । अमर होई ज्ञान रस पीवै ॥

( ३८ )

बोधसागर

गुरुसीढी चढि ऊपर जाई । सुख सागरमें रहे समाई ॥ गौरी शंकर और गणेशा । उनहू लीना गुरु उपदेशा ॥ गुरुमुख सदाअटल अविनाशी । सुर नर मुनिसबध्यानधरासी ॥ गुरुमुख सब भक्त औ दासा । गुरुमहिमा उन्हीसे प्रकाशा ॥

साखी-गुरुमुख को सबही मिलै, चार पदार्थ सार ।

निगुरा को तो कुछ नहीं, वहे सो नरकहि धार ॥

गुरु विनु मुक्ति ना पावै भाई । नर्क ऊर्द्ध सुख वासा पाई ॥ गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । गुरु विनु रहीयमलोकसिधाना ॥ गुरु विनु पढे जो वेद पुराना । ताको नाहि मिलै सतज्ञाना ॥ गुरु विनु जो सो पशू कहावै । मातृ व बुधि दुर्लभ होय जावै ॥ गुरु विनु दान पुण्य जो करई । होय निष्फल सब मतसोकहई ॥ गुरु विनु भ्रम ना छूटे भाई । कोटि उपाय करे चतुराई ॥ गुरु विनु होम यज्ञ जो करई । जाय पुण्य पाप सो भरई ॥ भवसागर है अगम आगहा । गुरु विनु कैसे पावै थाहा ॥ गुरु विनु बूझे सकल अचारी । तैतीस कोटि देव सब धारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके बासी ॥

साखी-गुरु आज्ञा ग्रहणकरि, छोडे मनसुखताकाल ।

गुरु कृपा तब पावई, क्षणमें होय निहाल ॥

गुरुकी कृपा कटै यम फांसी । विलम्ब न होय मिलै अविनाशी ॥ गुरु कृपा शुक्रदेवहि पड़या । चढि विमान वैकुण्ठहि गइया ॥ गुरुकी कृपा जब नारद पयऊ । मेटि चौरासी सुखी सो भयऊ ॥ गुरुकी कृपा रामपर सोहै । जीवन मुक्ति पाई जग मोहै ॥ गुरु कृपा बामदेवहि दइया । गर्भ माहिं गुरुज्ञानहि पड़या ॥ गुरु कृपा ध्रुव जो दरसा । अटल अमान परमपदपरसा ॥ गुरु कृपा ते भये उजासी । सनक सनन्दन नारद व्यासी ॥

सुमिरनबोध

( ३९ )

गुरु कृपा ते जनक विदेही । सो गुरु माहि परमपद लेही ॥ गुरु कृपा ते जन प्रहलादा । दैत्य होइ भक्ति तिन साधा ॥ गुरु कृपा जो कोई पावै । सकलो दुरमति दूर बहावै ॥

साखी-गुरु कृपा ऐसी अहै, सुनो साधु चित देइ । ताते गुरु सुमिरण कहू, रहे कालको लेइ ॥

गुरु गुरु जाप करो मन मेरा । काल दूत नहि आवै नेरा ॥ गुरुको ध्यान धरों नर नारी । सहजे सहज तरो संसारी ॥ गुरु गुरु सुमिरो मनसे प्यारो । गुरु गुरु कहो कोटि अवतारो ॥ गुरु गुरु जाप काज सबसारे । दुर्मति कपट दूर करि तारे ॥ गुरु गुरु जाप करो मन धीरा । गुरुके नाम मिटै सब पीरा ॥ गुरु गुरु मंत्र हृदय धरीजै । तन मन धन सब अर्पण कीजै ॥ गुरुको सुमिरन निशदिन कीजै । जीवन जन्म सफल करि लीजै ॥ एक नाम गुरु देत दिखाई । सो निजनाम कलपि नहि जाई ॥ गुरु सुमिरण निज नाम विचारे । आप तरे औरनको तारे ॥ सतगुरु शब्द नाम निरधारा । भव सागरसे उतरे पारा ॥

साखी-गुरुको सुमिरण कीजिये, निशदिन ध्यान लगाय ।

गुरु लक्षण अब कहत हो, सुनहु धीर चित लाय ॥

राग द्वेष दोनों से न्यारे । ऐसा गुरु शिष्यको तारे ॥ आशा तृष्णा कुबुद्धि जलाई । तन मन वचन सबन सुखदाई ॥ निरालम्ब भ्रम रहित उदासी । निर्विकार जानो निर्वासी ॥ निरमोही निरबंध निशंका । सावधान निरवान निबंका ॥ सार याही और सरवज्ञी । संतोषी ज्ञानी सतसंगी ॥ अयाचक जन निर अभिमानी । पक्षरहित अस्थिर शुद्धवानी ॥ निस्तरंग बाही परंपंचा । निष्कर्म निरलिप्त अबंचा ॥ बोल अडोल भाखे सो सांची । कोई बात कहै नहि कांची ॥

( ४० )

बोधसागर

जेहि विधि कारज जिवका होई । निर्णय वाक्य उचारे सोई ॥ झाई सन्धि कालका फेरा । पारख लाई करे निबेरा ॥

सार्वी-जाति बड़ाई आश्रमहि, मानबड़ाई खोय ।

जो सतगुरु के पल लगे, सांच शिष्य है सोय ॥

गुरु आगे राखे माथ । करै बिनय दुख मेटो नाथ ॥ अहौ अधीन तुम्हारे दासा । देहू अपने चरनन बासा ॥ यह तन मैं तोहि भेट चढायो । अपनी इच्छा कुछ न रखायो ॥ जो चाहो सो तुम अब करो । या भांडको जेहि विधि भरो ॥ भावै धूप छांहमें डारो । भावै बोरो भावै तारो ॥ गुण पौरुष कछु ओ नहिं मेरो । सब विधि शरण गही गुरु तेरो ॥ मैं अब बैठा नाव तुम्हारी । आशा नदी सो करिये पारी ॥ अपना कीजै गहिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गोसाई ॥ बहु विधि बिनती गुरुसे करई । मान मोह हृदय नहिं धरई ॥ देखि बिनयगुरु होहि अनन्दा । तब पावै सिख परमानन्दा ॥

सार्वी-गुरुके आगे जायके, ऐसी बोले बोल ।

कूर कपट राखे नहीं, अरज करै मन खोल ॥

देखि प्रसन्नता गुरुकी भाई । गुरुते कहिये शीश नवाई ॥ ऋद्धि सिद्धि फलमैं कछु नहिं चाहूँ । जगत कामनाको नहिं लाहूँ ॥ चौरासी मैं बहु दुख पायो । ताते शरण तुम्हरी आयो ॥ मुक्त होनेको मनमें आवे । अवागमन सो जीव डरावे ॥ सत्य भक्ति की चाह हमारे । ताते पकन्यो चरण तिहारे ॥ सत्य ज्ञानते हृदया भीजै । यही दान दाता मोहि दीजै ॥ मैंहूँ दास सो लेहु उबारी । हौ मच्छी तुम मिष्ट सुपारी ॥ हौ पतंग मैं तुम हौ डोरा । मैं तो फिरूँ तुम्हारे जोरा ॥ होहु दयाल दया अब कीजे । बूडत भव में बाहँ गहीजे ॥

सुमिरनबोध

( ४१ )

काल संधि झाँईके जाला । पडिकेहुःखित भयो विहाला ॥

साखी-दया होय गुरु देवकी, छुटे अविद्याभान ।

मिथ्या माया सब मिटे, पावे अविचल ज्ञान॥

सारशब्द गुरुते पावे । जाते जीव काज बनि आवे ॥

पूछ गुरुसे सब अरथाई । सारशब्दको निर्णय भाई ॥

जाते होय जीवको काजा । पाछे सोई होय निव्याजा ॥

त्रिविधि शब्दको पारख बूझे । सत्य पदारथ तबहीं सूझे ॥

सार शब्दको अङ्ग विचारे । मानुष लक्ष भले निरुआरे ॥

पशुवत धर्मको रूप लखावे । करि निरुआर सबगुरु बतावे ॥

हंस स्वरूपहु लीजे जानी । सबहि बतावे सतगुरु ज्ञानी ॥

साँच झूठका निर्णय करे । सत्य होय सो हिरदै धरे ॥

पक्का सौदा गुरुसे लेवे । देखि अधीन गुरु सब देवे ॥

गुरु सो देव सब कछु भाई । क्षणमें भेटे काल कलाई ॥

साखी-काल जालसे छूटिकै, मोक्ष मिलनकी चाह ।

सत्य मिलनकी युक्ति सब, गुरु बतावे राह ॥

गुरुसे पूछे ब्रह्मस्वरूपा । गुरुसे पूछे प्रकृति अनूपा ॥

गुरुसे पूछे सूक्ष्म तत्ता । गुरुसे पूछे त्रिगुण सत्ता ॥

गुरुसे पूछे महाकारण देही । गुरुसे पूछे तुरिया लेही ॥

गुरुसे पूछे पाच तनमात्रा । गुरुसे पूछे पंचकी यात्रा ॥

गुरुसे पूछे सूक्ष्म कारण । गुरुसे पूछे स्थूल सवारन ॥

गुरुसे पूछे ज्ञान अरु कर्मा । दशों इन्द्री सहित स्वधर्मा ॥

गुरुसे पूछे त्रिकुटी भाई । चौदह यम सब देइ बनाई ॥

गुरुसे पूछे चतुर्दश स्थाना । चौदह देव तबे मनमाना ॥

चौदह पूछि करे प्रवेशा । तबही पावे ब्यालिस वेशा ॥

पंचकोश सो गुरु से जाने । आतम ज्ञान तबही मनमाने ॥

( ४२ )

बोधसागर

साखी-पंचकोशमत प्रकट जग, वेद कहे सत सोइ । परख बुद्धि निज दृष्टि बल, गुरु कृपा करे जब होइ ॥ द्वैताद्वैत का करे विचारा । शुद्धाद्वैतका करे उपचारा ॥ विशिष्टाद्वैत भली बिधि जाने । पूछत पूछत सबै मन मानै ॥ कर्मोपासना करै विचारा । ज्ञान विज्ञानका पावे सारा ॥ अर्थ धर्म मोक्ष रू कामा । सबका पूछे असली धामा ॥ नवधा भक्तिको रूप पिछाने । योगक्रियाको भली बिधि जाने ॥ राजयोग हठयोग स्वरूपा । सबही आसन सिद्धि अनूपा ॥ ब्रह्म जीव अरु प्रकृतिका भेदा । द्वैतज्ञानका करे अच्छेदा ॥ नाना मत जग आहि जो भाई । सबका भेद जो गुरुसे पाई ॥ आस्तिकनास्तिक मन अनुहारा । सबही फंदा करे विचारा ॥ पूछि गुरुसे सबही सुधारै । गुरुके पारख काल फन्द टारै ॥

साखी-संसाररी पारख बिना, कैसे पावे ठौर । विध युक्ति अनमिल सबै, भोग वहीँ औरके और ॥ कालजालकी विकट है चाला । जीव विकल तेहिमध्ये विहाला ॥ पारख यथारथ प्रभु प्रकाशू । कठिन महात्म काल विनाशू ॥ काल चक्र चक्की कठिनाई । पारख पाये जात बिलाई ॥ पारख बल बहियाँ भौजेही । सबहीविधि चीन्ह पडाखलतेही ॥ गुरु प्रसाद पारख हठ पाये । विकट कला यम जालछुडाये ॥ एक एक पारखे जेहि फाँसा । सो संक्षेप करे प्रकाशा ॥ जाते जीव बचे यमफाँसा । शरणागत हठ परख विलासा ॥ भक्तिभाव प्रेमहि अधिकाई । परख लहत बल काल नशाई ॥ कालकला नहि पावे ताको । भक्ति भाव गुरु पारख जाको ॥ परम पारखी जीवन मुकता । नहि पावे तेही कालक उकता ॥ साखी-बिनु शरणागति परख गुरु, नहि जीवन निस्तार । सरवोपरि गुरु परख हैं, लहै तो होय उबार ॥

सुभिरनबोध

( ४३ )

गुरु से दीक्षा लीजे भाई । सदा गुरुकी कीजे सेवकाई ॥ दीक्षा लेई जले जो आडा । सात जनम सो सिरजे पाडा ॥ सतगुरुकी जो आज्ञा लोपे । ता ऊपर यम राजा कोपे ॥ सतगुरु की जो अदब न राखे । ताको दोजख शास्तर भाखे ॥ सतगुरु की न लाये विश्वास । ताको काल करत है आसा ॥ गुरुसेती गूमान जानावै । जनम जनम सो यमपुरजावै ॥ गुरुसङ्ग आडी टेढी बोलै । स्थान होइ सो घरघर डोलै ॥ गुरुसङ्ग ज्ञान गर्व दिखावे । कोटि जनम क्रूर को पावै ॥ गुरुसे बाद करे नरनारी । कोटि जनम सो नरक मँझारी ॥ गुरुको शब्द मेटि पग धरई । यम किंकर के फन्दे परई ॥

साखी- गुरुसीढीते उत्तरे, शब्द विद्वान होय ।

ताको काल घसीटि है, राखी सकै नहिं कोय ॥

सतगुरु की मरयाद न धरई । लख चौरासी कुण्डमें परई ॥ गुरुको शब्द न सुने अज्ञानी । भवसागर डूबे अभिमानी ॥ गुरुको देखि धरत अभिमाना । ब्यास बचन पड नरकनिधाना ॥ गुरुको ज्ञान मेटि मत थापी । तीन लोकमें बडो ते पापी ॥ गुरुको मेटि बखानत आपा । धरती भार मरत तेहि पापा ॥ गुरुसे सो ऊंचा चढि बैठे । सात कुण्ड नरकमें पैठे ॥ गुरुसे उलटा बचन सुनावै । सात जनम कोढी को पावै ॥ गुरुको उलट सुनावे बैना । सात जनम अन्धा होय सो नैना ॥ गुरुको छोड देव जो पूजे । बादुर होय दिवस नहिं सूझे ॥ गुरु को छोड अनत जो जावे । उलूक होय सो जन्म गँवावे ॥

साखी- शिवपूजामें बैठिके, गुरुसे करि अभिमान ।

काकभुशुण्ड शिवशापते, पडचो चौरासीखान ॥

गुरुनिन्दा जाके मुख उपजे । कोटि जनम गद्दा हो निपजे ॥

( ४४ )

बोधसागर

गुरु निन्दा जाके सुख होई । ताको सुख ना देखो कोई ॥ अपने सुख गुरु निन्दा करई । शूकर भान जनम सो धरई ॥ गुरु की निन्दा सुने जो काना । सो तो पावे नरक निधाना ॥ गुरु निन्दा सुने जो श्रवण सुनयी । अपने हाथ प्राख निज हनयी ॥ गुरु निन्दक नारायण होई । वाको सुख ना देखौ कोई ॥ गुरु निन्दक धरती पग चम्पे । ताके भार धरनि अति कम्पे ॥ गुरु निंदक अवनी पर सोवे । धरती धरत शेष अति रोवे ॥ गुरु निंदक जब ही सुख बोले । धरती गगन मेरु ग्रह डोले ॥ गुरु निन्दक जो बचन सुनावे । ज्ञानी कान मूँदिके जावे ॥

साखी-गुरु निन्दा छाडो सुजन, गुरु स्तुति मन धारि ।

गुरुको राखो शीश पर, सब विधि करे गुहारि ॥

सतगुरु मिले परम सुखदाई । जनम जनम का दुःख नशाई ॥ सतगुरु मिले तो अगम बतावे । यमकी आँच ताहिनिहिं आवे ॥ सुख सम्पति अपनो नहिं प्राणी । समझि देखु तुमनिश्चय जानी ॥ तीरथ वरत और सब पूजा । गुरु बिनु होवे सबही लूँजा ॥ धारा दोई भल जग माहीं । गृह वैराग बिन औरन आहीं ॥ दोऊ गुरुकी कृपासे पावे । गुरु बिनु भेदसोकौन बतावे ॥ करि त्याग सब गुरुको दीजे । पारख पाइ सदा सुख लीजे ॥ गिरही रही भगति अनुसारै । तन मन धनअर्पण करि डारे ॥ दशवां अंश गुरु को दीजै । जीवन जन्म सुफल करलीजै ॥ सतगुरुके सब आगे धरिये । शीश नाइ गुरुदंडवत करिये ॥

साखी-गुरु सो भेद जो लीजिये, शीश दीजिये दान ।

बहुतक भोढ़ पचिमुये, राखि जीव अभिमान ॥

गुरुसे रहे सदा मन जोरी । जैसे नटुवा चढ़त है डोरी ॥ पारख तार चढी भयनिहिं पावे । छेडे पारख चूर होइ जावे ॥

सुमिरनबोध

( ४५ )

लोपे नहीं सतगुरुका बाचा । सो सतगुरुका सेवक सांचा ॥ सोइ शिष पावै पारख घाटा । सोइ पावे सत्य सो बाटा ॥ निर्माही सतगुरु की रीती । सांचा सेवक लावै प्रीती ॥ मिलि पारखसबभयमिटिजावै । गुरुमुख शब्द सदालौ लावै ॥ देखि दुसह दुख जीवन केरी । दया करी पारख प्रभु प्रेरी ॥ निज पद जानि दया सोकरई । बन्धन जीव छुटावन लहई ॥ केतिक पारख प्रभुके पाये । जरा मरण यम जाल मिटाये ॥ जिन्ह जिवलहे पारखप्रभु केरा । महाराज यम जीव निवेरा ॥ सारखी-गुरु महिमा पूरण भई, सतगुरु किरपा कीन ।

संतनकी वाणी बहुत, यामें संग्रह लीन ॥

पाठफल वर्णन

गुरुमहिमा सबते अधिकाई । शिव शिवाप्रति यही दृढाई ॥ ब्यास वचन औ वेदे गाया । गुरुसे अधिक नहीं रघुराया ॥ सत्यगुरु कबीरहु परखाये । धर्मदास गुरु महिमा गाये ॥ रामहरस जू पूरण दासा । सबही गुरु महिमा परकाशा ॥ जेते भये जग बुद्धिमति धारी । सब गुरुमहिमा कीन उचारी ॥ सबका सार यामधि पढ़े । अब याकी महिमा सुन लइये ॥ तीनों संध्या जो यहि पढ़यी । छोड़ि कुमारग सतपथ लहयी ॥ सांची श्रद्धा मनमें लाई । बूझि बूझिके पाठ कराई ॥ बिन बूझे सो धुन्द अँधेरा । परि अभिमानखायजग फेरा ॥ गुरुके लक्षण भलिविधि यांचे । यम फन्दाते तबही बांचे ॥

सारखी-बूझ विवेक सह जो पढ़े, गुरुमहिमा यक बार ।

कबीर दीनदयाल तेही, तुरत उतारे पार ॥

योग यज्ञ अरु जप तप अहई । पढ़ि गुरुमहिमा सबफल लहई ॥ विष्णु सहस्र अरु भगवद्गीता । भागवत आदिक आठपुनीता ॥

( ४६ )

बोधसागर

एकबार गुरु महिमा पठयी । सोफल सबही क्षणमें लहयी ॥ काशी क्षेत्र बहुबिधि दाने । गया प्रयाग पुष्कर असनाने ॥ सो फल सबही यामधि पावे । श्रद्धासहित जो पाठ करावे ॥ निर्मल होय पाठ जो करई । सो नर सहजे भवनिधि तरई ॥ वेद पुराण अरु शास्त्र विलोई । जाह्निकस्योगुरुमहिमासोई ॥ गुरु महिमा सारको सारी । गिरिजाप्रति भाष्योत्रिपुरारी ॥ गुरु महिमा गुरुगमसे गाया । चढि सत पारख नादबजाया ॥ सत्तकबीर जब दाय़ा कीनी । गुरुमहिमा तब वर्णन कीनी ॥ साखी-गुरुमहिमा गुरु गम अहै, जाने सन्त सुजान ।

पढे विचारे मन करे, पावै मोक्ष निदान ॥

गुरुमहिमा शतक यहि नामा । पाठ किये पूरे सब कामा ॥ सो चौपाई यामहि आही । बीस दोहरा साख सदाई ॥ दो चौपाई दुइ सो साखी । फल वर्णन महाँ पुनि राखी ॥ पांच चौपाई यक सो दोहा । संख्या तिथि वर्णनमहाँ जोहा ॥ या विधि पूर्ण भयोयहग्रन्था । जाते जिव पावे सत पंथा ॥ याको पाठ करे जो कोई । उभय आनन्दफल पावे सोई ॥ गुरुसंतन पाऊँतिन शिर नाऊँ । मातु पिताके बलिबलि जाऊँ ॥ सत्य कबीर सत्य गुरु राई । जिनकी कृपा परख पद पाई ॥ धर्मदास गुरु जग आये । करि उपदेश जगजीवचिताये ॥ राम रहस पूरण गुरु राई । सबको वन्दो शीश नवाई ॥

साखी-नभ रस निधि चन्द्र कह, पौष पूर्णिमा जान ।

बिक्रम सम्बत जानिये, रविवासर दिन मान ॥

इति श्रीगुरुमहिमा शतक समाप्त

सुमिरनबोध

( ४७ )

अथ गुरु उपदेशमहिमायोग प्रारम्भः

दोहा—गुरु संत वन्दन कहूं, ऐहै सुखको पूर ।

गुरुमाहिमा बरनन कहूं, शिर धरि पदरजधूर ॥

सन्त सबै शिर ऊपरे, निस्पृही निज नाम ।

सबके मस्तक मुक्ति गुरु, पूरवे मनके काम ॥

चौपाई

परब्रह्मको आदि मनाऊँ । तिनकी कृपा गुरुचरनन पाऊँ ॥

गुरु सोई सब सिरजन हारा । गुरुकी कृपा होय भवपारा ॥

गुरु बिन होम यज्ञ नहीं कीजे । गुरुकी आज्ञा माहि रहीजे ॥

गुरु संतनके चरण मनायो । ताते बुद्धि उत्तम मैं पायो ॥

सब इष्टनमें सतगुरु सारा । सो सुमिरावे पुरुष हमारा ॥

शरण होय शिष आवै कोई । सहज पदारथ पावै सोई ॥

गुरु सुरतरु सुरधेनु समाना । आवै चरण मुक्ति परवाना ॥

मन बाँधित फल पावै सोई । प्रीति सहित जो सुमिरे कोई ॥

तन मन धन आर्पि गुरु सेवै । होय गलतान उपदेशहि लेवै ॥

गुरु बिन पदारथ और नजानै । आज्ञा मेटि और नहीं मानै ॥

सतगुरुकी गति हिरदय धारै । और सकल बकवाद निवारै ॥

गुरुके सन्मुख बचन न कहै । सो शिष रहनिगहनि मुखलहै ॥

गुरुसे बैर करै शिष जोई । भजन नाश अरु बहुत विगोई ॥

पीढ़ि सहित नरकमें परिहै । गुरु आज्ञा शिषलोपन करिहै ॥

चेलो अथवा उपासक होई । गुरु सन्मुख ले झूठ संजोई ॥

निश्चय नरक परै शिष सोई । वेद पुराण भनत सब कोई ॥

सनमुख गुरुकी आज्ञा धारै । अरु पाछे तैं सकल निवारै ॥

सो शिष घोर नरकमें परिहै । रुधिर राध पीवै नहीं तरिहै ॥

मुखपर बचन करै परमाना । घर पर जाय करै विज्ञाना ॥

( ४८ )

बोधसागर

जहाँ जावै तहाँ निंदा करई । सो शिष कोध अगिन ते जरई ॥ ऐसे शिषको ठौर जो नाही । गुरु रुख लोपत है मनमाहीं ॥ वेद पुराण कहै सब साखी । साखी शब्द सबै यों भाखी ॥ मानुष जन्म पायकर खोवै । सतगुरु विमुखा युगयुग रोवै ॥ ताते सतगुरु शरना लीजै । कपट भाव सब दूर करीजै ॥ योग यज्ञ तप दान करावै । गुरु विमुख फल कबहु न पावै ॥ गुरुही जपतप तीरथ कहिये । गुरुही सांच अरु मिथ्या पहिये ॥ सतगुरु बिना मुक्ति नहिं कोई । ऊंच नीच भावै जो होई ॥ आतम ब्रह्म गुरु ते मेरा । ताके शरणों आयो मैं चेरा ॥ चार युगन जे संतहि भयऊ । ब्रह्मरूप होय पारहि गयऊ ॥ सो जानहु गुरु संग प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन पराऊ ॥

दोहा—गुरु आज्ञा जिन जिन लही, सन्यो सकल विधि काज ॥ नरक रूप जग दूर धरयो, श्रीगुरु महाराज ॥

उपदेश प्राप्ति लक्षण—चौपाई

दोउ कर जोरि गुरुके आगे । करि बहु विन्ती चरनन लागे ॥ अति शीतल बोलै सब वैना । मेटे सकल कपके वैना ॥ हे गुरु तुम हो दीनदयाला । मैं हूँ दीन करो प्रतिपाला ॥ तुम बन्दी छोर अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥ दै उपदेश गुरु मंत्र सुनाओ । जनम मरन भवदुःख छुडाओ ॥ यो अधीन होय शिष जबहीं । शिषपर कृपा करै गुरु तबहीं ॥ गुरुसे शिष जब दीक्षा मांगै । मन कम वचन धरै धन आगै ॥ ऐसी प्रीति देखै गुरु जबही । गुप्त मंत्र सुनावै तबही ॥ अरु भक्तिमुक्तिको पंथ बतावै । बुरो होय को पंथ छुडावै ॥ ऐसे शिष उपदेशी पावै । होय दिव्य दृष्टि पुरुषपेजावै ॥

सुभिरनबोध

( ४९ )

गुरुसेवा माहात्म्य

गंगा यमुना बद्दीश समेते । जगन्नाथादि धाम हैं तेते ॥ सेवे फल प्राप्त होय न जेतो । गुरुसेवामें पावै फल तेतो ॥ गुरु महात्म को वार न पारा । वरणेशिवसनकादिक अवतारा ॥ गुरु महिमा मोपै वरणि न जाई । महिमा अनन्तममम तिलघुताई ॥

गुरु भावना

गुरुको पुरुष ब्रह्मकर जाने । और भाव कबहुँ नहि आने ॥ काम क्रोध रहितगुरु मेरा । पाप पुण्यका करत निवेरा ॥ काम क्रोध लोभ समाना । तो शिष जानहु तीन समाना ॥ यही दृष्टिसे गुरुको सबै । तबतन मन धन गुरु सबको देवै ॥ तनकरि टहल करै गुरु सेवा । सो शिष लहै मुक्तिको मेवा ॥ बचन उचारे पुढुम सम वाणी । द्रव्य लगावै गुरुहित जानी ॥ ऊँच नीच सबही सुन लीजै । कबीर बचन प्रमाण करीजै ॥ मेरे और कछु नहि चहिये । गुरु भावना गुरुहिय लहिये ॥

दोहा—सात द्रौप नौ खण्डमें, औ इकीस ब्रह्मण्ड ।

सतगुरु विना न बाचिहौ, काल बढ़ो परचंड ॥

यही भाव भक्तिका लक्षण कहिये । गुरुके भाव विन भव जल बहिये ॥ जिन बातनसे गुरु दुख पावे । तिन बातनको दूर बहावे ॥ वेद पुराण सबै मिलि गावै । नेमी धर्मौ चौरासि न जावै ॥ अष्ट अङ्गसों दंड परनामा । संध्या प्रात करै निषकासा ॥ गुरुको शिष ऐसे नहि मानै । सो त्रयताप जरत चारो खानै ॥ योगी यती तपी आशरमा । बिनु गुरु कोउ न जानै मरमा ॥

गुरुचरणोदक माहात्म्य

कोटिक तीरथ सब करआवै । गुरु चरणा फल तुरतहि पावै ॥ कदाचित् चरणा मृत पावै । चौरासी गत सतलोक सिधावै ॥

( ५० )

बोधसागर

कोटिक जप तप करै करावै । वेद पुराण सबै मिलि गावै ॥ गुरुपद रज मस्तक पर देवै । सो फल तत्कालहि लेवै ॥

दोहा—गुरु चरणोदक अनन्त फल, हमते कही न जाय ।

मनकी पुरवै कामना, जो लेवे चित्त लगाय ॥

सतगुरु समान को हिन्तु, अन्तर करो विचार ।

कागा सो हंसा करै, दरसावै ततसार ॥

गुरु महिमा ग्रंथ यह, कहैं कबीर समझाय ।

पाप ताप सबही हरे, अमरलोक लै जाय ॥

इति श्रीगुरु उपदेश महिमायोग समाप्त


[कबीर पंथी भारत पथिक स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत और संशोधित कबीर दर्शन लाइब्रेरीसे संपादित]

सुमिरनबोध

( ५१ )

गुरुमहिमा प्रारंभः

प्रथम खण्ड

चौपाई

गुरुकी शरणा लीजै भाई । जाते जीव नरक नहिं जाई ॥ गुरु मुख हो परम पद पावे । चौरासीमें बहुरि न आवे ॥ गुरु पद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहबकी होई ॥ गुरु विनु मुक्ति न पावे भाई । नरक उर्द्धमुख वासा पाई ॥ गुरुको कृपा कटे यम फांसी । विलम्बनहोयमिलेअविनाशी ॥ गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । ज्यों थोथा भुसछडेकिशाना ॥ गुरु महिमा शुक्र देवजो पाई । चढि विमान वैकुंठे जाई ॥ गुरु विनु पढै जो वेद पुराना । ताको नाहिं मिलै भगवाना ॥ गुरु सेवा जो करे सुभागा । माया मोह सकलभ्रम त्यागा ॥ गुरुकी नाव चढे जो प्राणी । खेद उतारे सतगुरु ज्ञानी ॥ तीरथ वरत और सब पूजा । गुरु विन देवता और न दूजा ॥ नौ नाथ चौरासो सिद्धा । गुरुके चरण सेवे गोविन्दा ॥ गुरु विनु प्रेत जनम सब पावै । वर्ष सहस्र गर्भ मांहि रहावै ॥ गुरु विनु दान पुण्य जो करही । मिथ्या होय कबहुँनहिंफलही ॥ गुरु विनु भरम न छूटै भाई । कोटि उपाय करै चतुराई ॥ गुरु विनु होम यज्ञ जो साधे । औरो मन दश पातक बाधे ॥ सतगुरु मिले तो अगम बतावै । यमकी आंचताहिं नहिं आवै ॥ गुरुके मिले कटे दुख पापा । जनम जनमको मिटै संतापा ॥ गुरुके चरण सदा चित दीजै । जीवनजन्म सुफल करलीजै ॥ गुरुके चरण सदा चित जानो । क्यों भूले तुम चतुर स्थानो ॥ गुरु भगता मन आतम सोई । वाके हिरदे रहों समोई ॥

( ५२ )

बोधसागर

गुरु मुख ज्ञान ले चेतो भाई । मानुष जन्म बहुरिनहिं पाई ॥ सुख संपति आपन नहिं प्राणी । समझि देखु तुमनिश्वयजानी ॥ चौविस गुरु हरि आपहि धरिया । गुरु सेवा हरि आपहि करिया ॥ गुरुकी निंदा सुनै जो काना । ताको निश्वय नरक निदाना ॥ दशवां अंश गुरुको दीजै । जीवन जनम सुफल कर लीजै ॥ गुरु मुख प्राणी काहे न हूजै । हृदय नाम सदा रस पीजै ॥ गुरु सीढी चढ़ि ऊपर जाई । सुखसागरमें रहे समाई ॥ अपने मुख निंदा जो करई । शूकर स्थान जन्म सो धरई ॥ निगुरु करै करै मुक्ति आशा । कैसे पावै मुक्ति निवासा ॥ औरो सुकृत देह जो पावे । सतगुरु विन मुक्ती नहिं आवे ॥ गौरी शंकर और गणेशा । सबही लीन्हा गुरु उपदेशा ॥ शिव विरंचि गुरु सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा भुवको दीन्हा ॥ सतगुरु मिले परम सुखदायी । जनम जन्मका दुःख नसाई ॥ जबगुरु किया अटल अविनाशी । सुर नर मुनि सब सेवक रासी ॥ भवजन नदिया अगम अपारा । गुरु विनु कैसे उतरे पारा ॥ गुरु विनु आत्म कैसे जाने । सुख सागर कैसे पहिचाने ॥ भक्ति पदार्थ कैसे पावे । गुरु विनु कीन जो राह बतावे ॥ गुरु मुख नाम देव रैदासा । गुरु महिमा उनहूँ परकासा ॥ तैतिस कोटि देव त्रिपुरारी । गुरु विनु भूले सकल अचारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके वासी ॥ गुरु विनु पशु जनम सो पावै । फिर २ गर्भ बासमें आवै ॥ गुरु विमुख सोई दुख पावे । जनम जनम सोई डहकावै ॥ गुरु सेवे जो चतुर स्थाना । गुरु पटतर कोई और न आना ॥ गुरुकी सेवा मुक्ति निज पावे । बहुरि न हंसा भवजल आवे ॥ भवजल छूटन यही उपाई । गुरुकी सेवा करो सब धाई ॥

सुमिरनबोध

( ५३ )

सारखी-सतगुरु दीन दयाल है, देवे भक्ति सुकाम । मनसा वाचा कर्मना, सुमिरो सतगुरु नाम ॥ सत्य शब्द के पटतरे, देवेको कछु नाहिं । कहले गुरु संतोषिये, हवस रही मन माहिं ॥ अति उण्डा गहरा घना, बुद्धिवन्त मति धीर । सो धोखा विरचे नहीं, सतगुरु मिलहि कबीर ॥ इति श्री प्रथमखण्ड गुरुमहिमा समाप्त

अथ गुरुदेवकी महिमा प्रारंभः

द्वितीय खण्ड

गुरुदेवकी महिमा बरणौ । जे गुरु देव तुम्हारी शरणों ॥ गावत जे गुण पार न पावे । ब्रह्मा शंकर शेष गुण गावे ॥ प्रथमहि रगुण ऐसा कीन्हा । तारक मंत्र रामको दीन्हा ॥ माता तिलक दिया सरूपा । जाको बन्दे राजा औ भूपा ॥ ज्ञानगुरु उपदेश बताया । दया धर्मकी राह चिन्हाया ॥ जीव दया घटहीमें होई । जीव दया ब्रह्म है सोई ॥ गुरुसे आधीन चेला बोले । खरा शब्द उर अन्तर खोले ॥ स्वारा मिशरी बचने स्वमें । गुरुके चरणों चेला रमें ॥ भीतर हिरदे गुरुसों भले । ताके पीछे रामहिं मिले ॥ गुरु रीझेसो कीजे कामा । ताके पीछे रामहिं रामा ॥ शिष सरस्वतीगुरु यमुना अङ्गा । राम मिले सब सरिता गङ्गा ॥ चेला गुरुमें गुरुमें राम । भक्ति महातम न्यारा नाम ॥ गुरु आज्ञा निरबाहें नेम । तब पावे सरवज्ञी प्रेम ॥ सरवज्ञी राम सकल घट सारा । है सबही में सब सों न्यारा ॥ ऐसी जाने मनमें रहै । खोजे बूझे तासो कहै ॥

( ५४ )

बोधसागर

गुरुकी महिमा संक्षेप भनी । गुरुकी महिमा अनंत घनी ॥ औतार धरी हरि गुरु करे । गुरु किये तब नारद तरे ॥ साख पुरातम ऐसी सुनी । बात हमारी गुरु चरणों बनी ॥ कीड़ी जैसा मैं हों दासा । पडा रहा गुरु चरणों पास ॥ गुरु चरणों राखों विश्वास । गुरुहि पुरावे मनकी आसा ॥ सारखी-गुरु गोविन्द अरु शिष मिलि, कीन्हा भक्ति विवेक ॥

तिरबेनी धारा बही, आगै गङ्गा एक ॥

गुरुकी महिमा अनंत है, मोसो कही न जाय ।

तन मन गुरुको सौंपिकै, चरणों रहों समाय ॥

इति श्रीद्वितीय खण्ड गुरु महिमा समाप्त

अथ गुरुमहिमा प्रारंभः

तृतीयखण्ड

गुरु सतपद भजु अमृतबानी । गुरु बिनु नहीं रे प्राणी ॥ गुरु हैं आदि अन्तके दाता । गुरु हैं मुक्ति पदके दाता ॥ गुरु गङ्गा काशिहि स्थाना । चारवेद गुरुगमसे जाना ॥ अरसठ तीरथ भ्रमि २ आवे । सो फल गुरुके चरणों पावे ॥ गुरुको तजै भजै जो आना । ता पशु याको फोकट ज्ञाना ॥ गुरु पारस परसे जो कोई । लोहाते जिव कश्चन होई ॥ शुक्र गुरु किये जनकरुवैदेही । वो भै गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु प्रहलाद पढाये । भक्तिहेतु जिन दर्शन पाये ॥ काकभुशुंडि शंभु गुरु कीन्हा । अगम निगम सब कहि दीन्हा ॥ ब्रह्मा गुरु अग्निको कियेऊ । होम यज्ञ जिन यज्ञ दियेऊ ॥ वशिष्ठ मुनिगुरुकियेरघुनाथा । पाये दर्शन भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा शरणा । पाये भक्ति जब तारन तरना ॥