कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
शवासुखार
( ७३ )
पाँवके ऊपर पाँव चढावै । हाथ फेरिके संपुट लावै ॥ संपुट शीश छुआवै जानी । निरखै अरध उरधकी वानी ॥ कसनी कसै बहत्तर डोरी । सुरति शब्दसों राखै जोरी ॥ अधर अवाज लखै निरबाना । राग छतीसों सुने वँधाना ॥ सुरली टेर अर्ध धुनि होई । ज्ञानगुफा चढ़ि निरखेहु सोई ॥ सुनत अर्ध धुनि उन मुनिराता । बूझै आदि अन्तकी बाता ॥ मन मकरंदी के गुण पावै । मगन होइ चंचल नहिं धावै ॥ मन सर होई सरे सब काजा । छोंडे कपट शीश विचुराजा ॥ नख शिश मनै बियापै सोई । मन चीन्हे मन आपै होई ॥ यह मन शक्ती यह मन सीवा । यह मन पांच तत्त्वको जीवा ॥ इह मन लेकै उन मुनिरहै । तीन लोककी बातें कहै ॥ ऊन मुनीमें रहै रहावै । ताकर हंस काल नहिं पावै ॥ ऊनमुनी महीं लावै तारी । अङ्गमें महलमहँसुरतिबैठारी ॥ उनमुन महीं जो वासाकरै । अगम महलमें सुरति लै धरै ॥
समय-उन चढी आकाशको, गई गगनपर छूटि ।
हंस चले जो जात हैं, रहे शिर कूटि ॥
उन मुनीमें धर्मदासबसै, बंक नाल गहिजोर ।
शिर ऊपर सतशुक्ति तहै, तहां शीत शब्दकी डोर ॥
चौपाई
उनमुनी सांची सुरति है बासा । धर्मदास गहि राखहु पासा ॥ सोहं सार मूल धुनि राता । तासु नेह मिले दाता ॥
समय-हंसा सोहंग मान करै, निकसि खेल मैदान ।
तहां सुरति बैठारिकै, नित प्रति लावै ध्यान ॥
चौपाई
अमर आसन करौ बिचारी । धर्मदास यह कथा निनारी ॥
( ७४ )
बोधसागर
जो कोइ मूल ठीक धरि आवै । सोई अमर समाधि लगावै ॥ सार समान रहै दिन राती । पावै आदि अन्त उत्पत्ती ॥ अमर महात्म पावै नीका । अमर समाधि को गहै धरि ठीका ॥ पांच पचीस सकल सब जानै । आवत जात श्वास पहिचानै ॥ श्वास सार शब्द निरुआरै । अमर समाधि को भेद विचारै ॥ निशि वासर है शब्द समाना । जागत सोवत एक ठिकाना ॥ अमर मूल धुनि शब्द समाई । बोलै ज्ञान गर्मी अधिकाई ॥ लावै अमर मूल महतारी । अटल रहै मति टरति न हारी ॥ अमर सुहावन आसन मूला । नख शिख भेद गहै अस्थूला ॥ तनकी लक्ष्य लखै विस्तारा । लक्ष्य अलक्ष श्वास गुंजारा ॥ लक्ष्य लखै सो साधु कहावै । बिना लक्ष्य सतगुरु नहि पावै ॥ सतगुरु चीन्है के सहिदानी । काल ब्याल भयभीत निशानी ॥ काल काल बन रेख बनावा । नख शिव जानै तासु सुभावा ॥ पतरी ग्रीव नासिका भारी । भृकुटी देह नेह होइ कारी ॥ दहिने ग्रीव मासा को बासा । गुण गंभीर ज्ञान परकासा ॥ नेत्र रसाल बदन मनहारि । शब्द सनेही सदा पियारा ॥ सदा हृदय सतगुरुकी आसा । बोलै ज्ञान गर्मी परकासा ॥ पूरण लक्ष पक्ष दोइ होई । शब्द गहै बहु भेद बिलोई ॥ ललाट पाट रेखा होई चारी । सुरति सनेही सुरति सुधारी ॥ तेहि जानेहु पीछल सहिदानी । पाछिल बोध भये सब हानी ॥ सुनत शब्द मिलै सो आनी । शब्द सनेह गहै चित्त जानी ॥ पलक छत्र औ झीने बोलै । पावत पान कपट सब खोलै ॥ ताकह जानहु हंस सुहेली । आनि मिले यम परदा खोली ॥ भीतर वचन कहे हित जानी । पाछिल सुरति भई जत हानी ॥ चरण टेकि चित्त बोधहु जानी । जाते आगे होइ न हानी ॥ रोष करहु तो मोर दोहार्इ । गुरुको रोष लोक नहि जाई ॥
शवासगुञ्जार
( ७५ )
समय-गुरुते माथेते उत्तरे, शब्द वेहुना होय । ताको काल घसीट है, राखि सकै न कोय ॥
चौपाई
गुरु भृङ्गी कर एक सुभाऊ । मेटे करम करे सुकताऊ ॥ शीख जोमन बसिदुबिधा करई । गुरु पुरा होई चित ना घरई ॥ चित तो धरे शीख विगारे । आपु सहित भवसागर डारे ॥ दीन दयाल गुरुनकी रीति । जैसे चन्द चकोरहि प्रीति ॥ सीखे सिखापन बहुविधि देही । भरम मेटि निर्मल करि लेई ॥ शीख भेद जो पूछे आई । क्रूर होइ तो उठै रिसाई ॥ पूर होइ तो शीखहि बोधे । कलह कलपना तजिकै सोधे ॥ शीश अज्ञान पार नहि पाई । ताते करै कपट चतुराई ॥ करै कुटिलता बोलै जोरा । गुरु पूरा होइ करै निहोरा ॥ समय जानि बचन मुख बोलै । कहूँ शीतल कहूँ तेजस डोलै ॥ समय जानि बचन मुख बोलै । कहूँ तेजस कहूँ शीतल डोलै ॥ जब जब शिष्य करै अज्ञानी । हृदय शुद्ध मुख कहै कुबानी ॥ भाव विचारि शिष्य सों कहहीं । शिष्य की दशा जोनीके लहहीं ॥ जोर कहनको शिष्य डराई । गुरुशब्द महँ लेइ मेराई ॥ गुरु पूरा होय ताहि सुधारे । करम काटि भव सागर तारे ॥ गुरु सुवास सबके सुखदाई । गुरु राखै तो काल न खाई ॥ जानेहु ताहि काल अभिमानी । काल अङ्ग धरि प्रकटे आनी ॥ गुरु नाता धरि शिष्य नशाई । रहनि गहनि नहि एक लखाई ॥ अज्ञान दिसासे शिष्य कहावै । गुरु होय गुरुगम समुझावै ॥ शिष्य करै बहु चञ्चलताई । गुरु पुरा होय लेइ बचाई ॥ गुरुकी दशा ज्ञानकी भाऊ । अज्ञान दशाते शिष्य कहाऊ ॥ रण ज्ञान गमी जेहि होई । हंस उवारन सत गुरु सोई ॥
( ७६ )
बोधसागर
सतगुरु कला अनन्त कहावै । ताकर भेद शिष्य किमि पावै॥ ताते शिष्य कहिय अज्ञाना । गुरु बतावे शब्द निर्वाना ॥ शिष्य नाता धरिजो कोइ आवै सतगुरु होइ सत राह बतावै ॥ गुरु सोई जाको चित थीरा । सुरति सरोतर साजै वीरा ॥ केतो चूक शिष्य सो परई । सतगुरु पूरा सब परि हरई ॥
समय-जाका चित्त समुद्रसा, बुद्धिवन्ता मति धीर ।
सो धोखै बिचलै नहीं, सतगुरु कहै कबीर ॥
चौपाई
लक्षण लक्ष्य बिचारै जानी । निरखै आदि अन्त सहिदानी॥ गुरु पूरा शिष्य होय उदासा । गुरुगमन लेई शब्द परकासा ॥ आदि अन्तकी परिचय लेई । पाछे भेद शब्द तेहि देई ॥ परखै परिचय परखै रेखा । शब्द सनेह सुनावै लेखा ॥ त्रिकुटी तीर गुञ्ज जो होई । परखै शब्द रहै तन गोई ॥ ममता मोह करै हंकारा । अन्तरकुटिल चतुर वरिआरा॥ पलक भुअङ्ग परोहन साथा । हृदय मलीन नवावै माथा ॥ वरौनीपर जो गुञ्जै गुञ्जा । महा सुबुद्धि होह मुख पुञ्जा ॥ हृदय मलीन होय मुख छाहीं । गुरु गमि शब्द विचारै नाहीं ॥ लहसन मासा होय मुखमाहीं । शुक्ती रबी जम।हिकी छाहीं ॥ राज बरन औ लँबी देहा । गुरुगमि शब्द विचारै नेहा ॥ नेत्र कीर्ति कुटि वृक्षकी शाखा । बोले सदा मधुर धुनि भाखा ॥ बरण छीन लौ नेत्र मलीना । हृदय कपट मुख रह अधीना ॥ भुक्कुटी ऊँच शीश छतनारा । ज्ञान महाबल कथै अपारा ॥ लम्बी नासिका श्रवण है छोटा । हृदय शुद्ध मुख बोलै खोटा ॥ राज बरनहि मोट तन भारी । छोट शरीर ज्ञान अधिकारी ॥ मोटी नासिका ऊँच लिलारा । ज्ञानहीन मन कथै अपारा ॥
श्वसगुञ्जार
( ७७ )
पातारि अधर कपोलन्ह माँसा । ज्ञान महाबल कथे निरासा ॥ धरनी धीर धरै गरमाई । डाढी दरबर औ बहुताई ॥ आगै ग्रीव गुंज होइ भारी । माया सवन कोध अधिकारी ॥ भुज भुअंग नानिनि मनिहारा । करपग रसना रेख सुधारा ॥ रेखा चारि होय चतुरंगा । काल कला धरि प्रकटे अंगा ॥ करपर होइ दीर्घ भण्डारा । ताके निकट भजनकी धारा ॥ सोई धार अखंडित होई । क्षीण भंग मति गहे विलोई ॥ धारा मिलि अवधी कह आई । हंसदशा धरि पंथ चलाई ॥ सो धारा होइ मोट सनेही । ज्ञान गहे मति धरे ना देही ॥ वारिष धारा मिलै सुधारा । हृदयशुद्ध प्रीतम मनियारा ॥ भजनभंग कवहूँ नहिं होई । गहै शब्द गरभेद विलोई ॥ यशकी रेख विचारै जानी । जेठे पलौ जीवकी खानी ॥ तैसे ताहि विचारहू रेषा । तहाँ तहाँ तस कर्म विशेषा ॥ अवधिके नीचै चुंगल होई । अयश करत यश पावे सोई ॥ विश्वा जानि लक्ष गहि लेऊ । जस विश्वा तस सुपिरण देऊ ॥ विश्वा बीस होय नर पूरा । शब्द सनेही गुरुगमि शूरा ॥ अंडज होइ जड जनमैं आई । घटी बढी होइ अंक लिखाई ॥ पिंडज खानि देह धरि आवै । बारह पंद्रह अंक चढ़ावै ॥ ऊष्मज होइ जग लेह अवतारा । नरके कर दश अंक सुधारा ॥ अचल खानि जग जन्मे आई । बत्तिस विश्वा अंक चलाई ॥ चारि खानिकी लखै निशानी । दीहेहु ताकहँ शब्द सहि दानी ॥ खानी लक्ष विश्वा लखि राखै । कर्म अकर्म भित्रके भाखै ॥ पिंडज चारि भांति तन होई । कर्म अकर्म सुधारै सोई ॥ कर्मी नाहर घातिक जेता । अंक सुधारि लिखै कर तेता ॥ जे के करमह सती औ गेडा । लिखै अंक करमकर बेडा ॥
( ७८ )
बोधसागर
गाय भैंस परमारथ खानी । जैसे अंक सुधारै जानी ॥ पशु पक्षी परमारथ होई । नख शिख रेखा लखे बिलोई ॥ अंडज चार बरनकी काया । कर्म अकर्म तहाँ निर्माया ॥ अंडज मीन सुफल तन होई । तैसे अंक सुधारे कोई ॥ अंडज पक्षी तन निरदाया । तहाँ तहाँ तस अंक चलाया ॥ करमी पंछी जोरा बाजा । तैसे अंक सुधारे साजा ॥ अंडज नाग कर्मकी खानी । बोरे काल नरक सहिदानी ॥ ऊष्मज बरन चारि तन होई । गुण अवगुण सब लिखै बिलोई ॥ भृंगी आदि कीट सुखदाई । भजनके अंक लिखै यमराई ॥ बहुतक कीट होय सुखदाई । मारि खात नर रोग नशाई ॥ तासु लिखै परमारथ खानी । कर्म अकर्मकी सुनिये बानी ॥ एक कीट दुखदाई होई । कीटहि कीट खात है सोई ॥ सो निशान करमकर होई । जेतिक अंक लिखै तन सोई ॥ एक कीट नर दृष्टि न आवै । तेहि अवगुणते काल नचावै ॥ अचल खानि की चारि निशानी । गरम शीतल लिखै अमृतवानी ॥ गुण औगुणको करै विवेका । गुण अवगुण नरके कर रेखा ॥ सो सतगुरु जो सोइ सयाना । चारि खानिको लखै निशाना ॥ पाप पुण्यको करै विचारा । ताहि तहाँ निज पान सुधारा ॥ कर्म जीव कर्महिकी खानी । काल कर्मकी बोले बानी ॥ सतगुरु सोइ जो लक्ष्य विचारै । लक्ष्य विचारिके पान सुधारे ॥ चोर साहुको करै विचारा । भाव विचारि पान निरुआरा ॥ कपटी जीव कर्मबसि अंधा । शब्द सुनत चित होइ विष मंदा ॥ अस कर्मज जब देख बिचारै । कर्म मिटाय पान निरुआरै ॥ खानिकी लक्ष फेरि जब लेई । तब तेहि शब्द परीक्षा देही ॥ विश्वा निरखि विचारै रेखा । गुण अवगुणका जानै लेखा ॥
शवासुञ्जार
( ७९ )
कर पलौ कर रेख विचारै । तिरछि विषमको लेख सुधारै॥ तिरछा रेख विस्नाकी खानी । जस देखै तस बोले बानी ॥ विषम रेख कर्मज अधिकारी । जत कर्मज तत रेख सुधारी ॥ ततका मल हरि परसे परनारी । सुनो धर्मनि मैं कहौं विचारी ॥ नख उज्ज्वल होह गुंज चितेर । कलह कल्पना यमकर घेरा ॥ करपर लिखै विषमकी खानी । गुण औगुणकी लिखै निशानी॥ तिरछा रेख नारीकर नेहा । तासु नेह सुत सुता उरेहा ॥ माता पिता बन्धु भरतारा । विषमरेख यम लिखै विचारा॥ अवधि तीर दोउ तिरछा उरेहा । भक्ति भंडार विषमकर नेहा ॥ मीन पूछ भंडार सुधारी । सुख संपति बिभौ तन टारी ॥ नवो खण्ड यमरेख सुधारी । सुख संपति बिभौ तन टारी ॥ गुण अवगुणसबतबहि लिखावहु । युक्ति जानिकै हंस चेतावहु ॥ हंसा दासा तबही नर पावै । जब करताकी दशा मिटावै ॥ काल कर्म कालकी खानी । चाल चलावै नरकाग समानी ॥ काक कुबुद्धि तेज तनमाही । सतगुरु शब्द बतावहु ताही ॥ काक कुबुद्धि तजे कुटलाई । तब सतगुरुकै शरण समाई ॥ काक कुबुद्धि तत चाल मिटावै । तब निर्वान परमद पावै ॥ बुद्धि फेरि पलटावै बानी । सतगुरु शब्द गहे सहिदानी ॥ लोक लाज कुल दशा छुडावै । तब कौआते हंस कहावै ॥ यम रेखन की जाने बानी । सौ सतगुरु सोइ तत्त्व ज्ञानी ॥ रेखा विना न लेखा पावै । बिन लेखा नहिं गुरु कहावै ॥ सूकर खान गीध औतारा । बिनु यमरेख लखै नहिं पारा ॥ यमकी रेख सकल जब जाने । गुण अवगुण तबही पहिचाने॥ करपर होय चक्रकर थाना । शंख सीप गुरु भेद बखाना ॥ पाँचौं चक्र होय सम तूला । योगकला चतुरथ अस्थूला ॥
( ८० )
बोधसागर
एकचक्र अथवा दुइ होई । कछु ज्ञानी कछु दुर्मति खोई ॥ तीनि होय तो होय उदासा । चार होय तो सूर्य प्रकाशा ॥ पाँचौ शंख होय करमाहा । दुख दारिद जान अवगाहा ॥ सीप होई तौ होय उदासा । शब्द प्रतीत शब्दकी आसा ॥ नखशिख रेख बिचारेहु जानी । तबहि सुधारेहु हंसकी खानी ॥ समय-नख शिख जानिके, तबहि सुधारेहु पान । भर्मभूत नहिं दर्शही, हंस होय निर्बान ॥
चौपाई
निर्खहु आदि अंत सहिदानी । गुण अवगुण देखहुँ बिलछानी ॥ कर्मजीव काल अधिकारा । कर्मके घर लेई अवतारा ॥ वरण भेद परिसै कुल जाती । रेखा लेख देखै उतपाती ॥ कर्मों काल कर्म वश होई । गुण अवगुण सबदेखिबिलोई ॥ उपजै चोर जुआरी झूँटा । कर्मों काल कर्म धरि लूटा ॥ कामीके घर कर्मों होई । कर्म रेख तब देख बिलोई ॥ कर्म खानि कायामहँ बासा । सुनै शब्द चित होई उदासा ॥ भर्म भूतकी गहै निसानी । पूजै शिला औ उलछै पानी ॥ मारु मारु मुख बानी भाखै । मन बशि जीव काल घर राखै ॥ नेत्र बिरह रस खुकुटी छीना । कबहुँ चंचल कबहुँ मलीना ॥ बालक होई पौनके साथी । मदमातै जस मैगल हाथी ॥ तिन जीवनकी दशा मिटावै । पाछे सत्य शब्द ससुझावै ॥ पद्म मुरक जाके तन होई । सो कर्मों जग जीवै लोई ॥ दया लगनकी परमित पावै । निर्मल हो सत्यलोक सिधावै ॥ नेत्र विशाल रक्तकी झाई । सुरति सनेह ज्ञान बहुताई ॥ जब तब चितमहँ संशय आवै । ज्ञान गम्यते मार बहावै ॥ ताकी निर्णय अगम सुभाऊ । पावै सत्य शब्दको दाऊ ॥
श्वसगुञ्जार
( ८१ )
काग बुद्धि मन दशा छुडावै । पावै शब्द लोक सो आवै ॥ स्वेत कुष्ठ मद गात मलीना । कर्म विश्व विषयी लौलीना ॥ जहद कुष्ठ मोती मनी भारी । धुन्द्य कुहेर बहिरी रक्तारी ॥ शून्य भाग्य दाग मतिमारी । फोकट कुष्ठ औ गंध पहारी ॥ रक्तविकार जहर धुनि फीका । अंग मलीन कर्मको लीका ॥ पाछिल कर्मज नरकी देहा । परखे सतगुरु शरण सनेहा ॥ तासु निशान परखिके काया । नेत्र गुञ्ज विषवाण बनाया ॥ कर्म निशान दशा पहिराया । तनविकार गुरुवचन नभाया ॥ तेहि जनि देहु मुक्ति बर बीरा । निश्चय काल करै बड पीरा ॥ पीरा सहे जीव शब्द न मानै । गुरु निन्दा निशिवासरजानै ॥ निन्दा करत जाइ यमदेशा । ज्ञान बुद्धि नाह गहै सदेशा ॥ गुरुकी दया जो मुखमहँ आनै । लोभ लहरि ममता मनसानै ॥ कबहिं न होहि ताहिकरकाजा । कितनो करै बुद्धिकर साजा ॥ गुरु निन्दा कुष्टी औतारा । परै रौर नरककी धारा ॥ सो सतगुरु जो होहि सयाना । ऐसे जीव कहँ देह न पाना ॥ पान लेइ अंतै बगडावै । स्वर्ग नर्क महँ ठाँव न पावै ॥ तनकी दुर्मति लहै न पारा । भजै राज नर्ककी धारा ॥ कर्मी खानि दहे नर पावै । पाछिल अवगुण संगहि आवै ॥ तेहि जनि देऊ शब्दसहिदानी । मानहु सत्य शब्दकै बानी ॥ धोखे आइ पान जो लेई । पाछै समुझि सिखावनि देई ॥ सुनत सिखावन हर्षित होई । ताहि देहु गुरुशब्द बिलोई ॥ गुरु की त्रास करै लौ लीना । सुनत सिखापन होइ अधीना ॥ मानै त्रास रहै लौ लाई । पावत पान करम कटि जाई ॥ उतपनि लगनजो साधहु धीरा । ताहि लगन सँग साजहुबीरा ॥ नाम पान पाँजी समुझायहु । सत्य शब्दकी रहनि बतायहु ॥
( ८२ )
बोधसागर
कामिनि कनक कलाकी फंदा । अरपै दुनौ शीश मनमंदा ॥ कामिनि अरपै कनक चुरावै । इहि विधि हंसलोकनहिंआवै ॥ कनक अरपि कुलभावदिसावै । वाजी दिखाइके कलाछिपावै ॥ कामिनि कनक करै सम तूला । पावै शब्द मुक्तिकर मूला ॥ चाल विना लागै बडि वारा । तामैं नहि है दोष हमारा ॥ चाल चलै कुलदशा मिटावै । भक्तिसार धरि लोक सिधावै ॥ कथनी कथै करनी नहिं जाने । ताते अवगुण सबै बखानै ॥ कथनी कथै लोक नहिं जाई । भात कहै नहिं भूख बुझाई ॥ पानी कहै प्यास नहिं जाई । कथनी कथै पाछे पछताई ॥ कथनी थोथर करनी सारा । कथनी कथि कथि हुये गँवारा ॥ कथनी कथि जो करनी करै । कहैं कबीर सो प्राणी तरे ॥
समय-करनी बोलै पारकी, करपै ले व्यवहार ।
करनी कर शब्दै गहै, उतरे भवजल पार ॥
चौपाई
महा शून्यके भीतर रहई । सत्यलोक की बातें कहई ॥ कहै अर्थ कथ करै विचारा । कहै कबीर सो शिष्य हमारा ॥ कथै आन करै जो आना । सो अब जानहु पशू समाना ॥ जैसा कहै करै पुनि तैसा । हैं हमहीं हमहीं सो ऐसा ॥ करनी करै कहै तब बाता । ताहि मिलै गुरु समरथदाता ॥ कथनी कथै गर्भ होय भारी । बिनु करनी सब यमकीबारी ॥
समय-करनी गर्भ निवारनी, मुक्ति सारथी सोय ।
कथनी कथि करनी करै, तो मुक्ताहल होय ॥
चौपाई
इहि विधि गहै शब्दकी आसा । निश वासर हम ताके पास ॥ अति अधीन करनी कर शूरा । करनी किये मिले गुरुपूग ॥ शूर होय करनी मन लावै । भक्ति करै जगबहुरि न आवै ॥
शवासयुञ्जार
( ८३ )
करनी शूरा कथनी सार । करनी केवल उत्तरे पार ॥ करनी करै शूरमा होई । कादर करनी करै न कोई ॥ शूरा होय तो करनी आवै । कादर होई सो बार लजावै ॥
समय-शूरा सोई सराहिये, अंग ना पहिरे लोह ।
लरै सकल वँद खोलिकै, मेटै तनकर मोह ॥
चौपाई
सदा अधीन रहै तनमाहीं । परिचे शब्द विचारे नाहीं ॥ रहे अधीन सतगुरुके आगे । निश्वासर सेवा चित लागे ॥ जो लगि नहीं अधीनता आवै । तब लगि सत्य शब्द ना पावै ॥
समय-नहीं दीन नहिं दीनता, नहीं सन्त सन्मान ।
ताधर यम डेरा किये, जीवतै भया मसान ॥
चौपाई
सदा अधीन रहै जो प्रानी । दीनेहु ताहि शब्द सहिदानी ॥ कुल अभिमान महानद भारी । भक्ति पन्थगहि ताहि सुधारी ॥ शब्द लेह कुलदशा न तोरे । तेहि यम विषम सरोवर बोरे ॥ भक्ति करै कुल कानि न खोवै । आवागोन गर्भ सुख गोवै ॥ जननी बेटी भैनी बाला । बहिन भयए ततक्षण काला ॥ इन्हते होइहि भक्तिकी हानी । लाज नदी महाँ बोरे आनी ॥ कुलकी राह बहारै लोही । कुलना तयारी छुती बिगोई ॥
समय-कुलकरनीके कारणे, हंसा गये बिगोय ।
तब काको कुल लाज है, जब चला चलाको होय ॥
चौपाई
कामिनि कनक कालकी खानी । काल कला धरि बोलै बानी ॥ इनते होय भक्ति कर नाशा । ताते बहुरि गर्भ महाँ बासा ॥ परदा प्रकट जबै ना होई । बोलै वचन मधुर धुन सोई ॥
( ८४ )
बोधसागर
परदै रहै लाजकी बैधी । परदा साथ कालकी सँधी ॥ गुरुसों कपट करी धन लीनी । सुरति निरति विनुकाल अधीनी ॥ कामिनी परदा सति सो ठानै । लाज लिये मुख बात न आनै ॥ गुरुके परदा बांचै नाही । बूढै विषम सरोवर माहीं ॥ गुरुसम मात पिता सो नाही । गुरु विन बूढि सरोवर माहीं ॥ गुरुसम मात पिता नहिं होई । मात पिता गुरु जानहु सोई ॥ समय-जे कामिनि परदै रहै, गुरुमुख सुनै न बात । ते कामिनि कुतिया भई, फिरै उधारै गात ॥
चौपाई
लोकलाज पति सबै बिचारा । लक्षण लक्ष्य सबै निरधारा ॥ जाको होई भक्तिकी आसा । सतगुरु चरण करै विसवासा ॥ तजै गर्भ जो निकसी आसा । पावै सतगुरु चरण निवासा ॥ यमको अन्त जानि जो पावै । भवसागर तब साधु कहावै ॥ सतगुरु चरण गहै चित जानी । मेट कुटिल कर्मकी खानी ॥ सन्त कहावै अन्त सम्झारी । चौदह काल चरण चित धारी ॥ चौदह यमकर सकल पसारा । सतगुरु शरण होई निरुयोरा ॥ चौरासी कर करम अपारा । विनु सतगुरु का करै उबारा ॥ गुरु करता गुरुदेव नरेशा । विनु गुरुगम सब भेद अनेशा ॥ गुरुसे दूसर और न कोई । जाते मुक्ति पदार्थ होई ॥
समय-गुरुकरता कर मानिये, रहिए शब्द सभाय ।
दर्शन कीजे बन्दगी, सुनै सुरति लगाय ॥
चौपाई
आगे मिलै बन्दगी कीजै । पाछे चरण कमल चित दीजै ॥ शब्द सुरति मिलि रहे समाई । ताप तपै नहिं सुरति समाई ॥ एकै देह एक अस्थूला । एकै भाव भक्ति कर मूला ॥
शवासुखार
( ८५ )
शिष्यके हिरदैं गुरुके वासा । शिष्य रहैं गुरुचरण निवासा ॥ गुरु शिष्यसों अन्तर नाहीं । मन है एक देह दुइ ताहीं ॥ शब्द स्वरूप गुरुकर वासा । सुरति स्वरूपशिष्यकीआसा ॥ समय-गुरु समाना शिष्य महँ, शिष्य लियाकरि नेह । विलगाये विलगैं नहीं, एक प्राण दुइ देह ॥
चौपाई
ताहिं गुरुसों सत्य जो कीजे । बाहर अंतैं चित्त ना दीजै ॥ जो गुरु शिष्य हृदय नहिं होई । तासों सत्य करै नहिं कोई ॥ गुरु बाहर शिष्य भीतर आवै । दुविधा धोखा काल तेहि लावै ॥ सत्य होय सो सत्यहिं जानै । गुरुकहँ राखि हृदयमहँ आने ॥ गुरु हृदये सो बसै निनारा । सत्य करत जाईं यमद्वारा ॥ गुरु शिष्यसों बाहर बसई । सत्य करत काल तेहि डसई ॥ गुरुकी मति अंतैं रहैं वासा । शिष्यकी मती गुरुके पास ॥ ऐसे गुरुसों सत्यजो करहीं । सेवा करत काल तेहि धरहीं ॥ शिष्य सयान गुरु अज्ञानी । धोखैं होइ दुनोंकी हानी ॥ गुरु शिष्यकी मति एकैं होई । सत्य करै तारै कुल दोई ॥ गुरुकी मति जो शिष्य न पावै । काज विसार चिंता मन लावै ॥ गुरुको भेद लखैं नहिं बानी । सत्य करै कुमती अज्ञानी ॥ नवका ऊपर बहुजीव चढावै । खेवा बिना पार नहिं पावै ॥ खेवनहार चीन्हि जब लेही । पाछै पाँव नउका पर देही ॥ खेवन हार चीन्हि नहिं पावै । नउका चढै सो मूर्ख कहावै ॥ सागर सुमति मुक्तिकी धारा । ममती न्याव ज्ञान कडहारा ॥ करै विवेक चोर औ साहू । बिना विवेक घाटलागुनकाहू ॥ चोर जानिके पाँव न देई । साधु जानिके पारहु जेई ॥ चोर साहूकर भाव बतावा । सागर नाव धार दिखलावा ॥
( ८६ )
बोधसागर
चोरके नाव चढ़ै जो कोई । सागर पार कबहुँ नहिं होई ॥ साहुकी नाव होइ असवारा । सागर उतरत लाग न वारा ॥ सागर पार मुक्ति कर वासा । जो गुरु मिलैतो करै निवासा ॥ घर घर गुरु घरहि घर चेला । लालच बाँचै फिरै अकेला ॥ जैसे श्वान कामबश धावै । तृष्णा बाँधै अंग लगावै ॥ तृष्णा मिटै गांठि जुरि जाई । पाछै शीश धुनि पछितार्ई ॥ एहि बिधि होइ दुवोजग भूटा । काल कलाधरि गहै न खूटा ॥ ऐसी सत्य करै जो कोई । धोखे जाय काल बसि होई ॥ गुरुकी करनी शिष्य जो पावै । तब सत्य करै सत्यलोक सिधवै ॥ समय-सत्य तो तासों कीजिये, जहवां मन पतियाय । ठाँव ठाँवकी सतीसों, कुलकलंक चढ़ि जाय ॥
चौपाई
अंकके मिटत कलंक मिटि जाई । अंकके रहत अकलंक न जाई ॥ अंक लिखा यम एहतन माहा । अंक मिटाइ देहु तेहि माहा ॥ नख शिख अंक लिखा यमराई । चौदह कला थाना बैठाई ॥ गुरुगमि शब्द जानि जो पावै । तब चौदह यमफन्द मिटावै ॥ एहि फन्दै सुर नर मुनि भूलै । देह धरी धरि सब जग झूलै ॥ चौदह काल विकार अन्याई । नर नारी घट रहै समाई ॥ भिन्न भिन्नके न्याय विलोवै । पारस निहार अन्तमुख गोवै ॥ प्रथम काल कामके अंगा । नख शिर व्यापै विषै भुजंगा ॥ चित्तभंग औ कुल व्यवहारा । लाज सनेह सकुच बटपारा ॥ आलस निद्रा रूप बरियारा । लालच लोभ मोह कर धारा ॥ विषय वास बसै बेकारा । इन्द्र चौदह मिलि भक्ति उजारा ॥ भक्ति प्रतीत शितल इन्हनासी । प्रेम बिगारि लगावहि फासी ॥ दया धीरज संतोष न आवै । सुमति सहज लै दूरि बहावै ॥
शवासगुञ्जार
( ८७ )
निर्भय ज्ञान विवेक गरासै । सुरति निरतिलै उपजत फाँसे ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । निर्भय लगन देह तिहि पाना ॥ निर्भय दशा सूर समुझावै । कूर कपट और भर्म बहावै ॥ निर्भय होइ भय तिलुका टूटा । नरनारी गुरु यमसों छूटा ॥ लगन सनेह गहै सहिदानी । उत्पति प्रलय विचारै खानी ॥ आदि अन्तकी लगन विचारै । सत्य दिशा धरि हंस उबारे ॥ चन्द सूर्य की गहै निशानी । आदि अन्त गुरुभेद बखानी ॥ चंद सनेह लेह औतारा । सोइ लगन गहि उत्तरै पारा ॥ ताहि चन्दकी नाकी पावै । सौ पाँजी गहि लोक सिधावै ॥ सूर सनेह विषम जम जोरी । प्रलय काल चौरासी डोरी ॥ सूर्य सनेह होइ सन्धारा । मारिके बहुरि लेह औतारा ॥ जत उपजै तत विनशै प्रानी । सूर्य सनेह सबनकी हानी ॥ चाँद सूर्य दोय गढके राजा । पौरि पगार बनौ दरवाजा ॥ अहुँठ हाथ गढ भीतर साजा । कपटभाव माया उपराजा ॥ दुइ दरवाजै बानो किवारा । एकपट रहै एक खुलै किवारा ॥ दोइ लगनकी राह संवारी । आवत जात लखै वैपारी ॥ आवत एक राह चलि आवै । फिर तेहि राह जान नहि पावै ॥ जौनी राह महलमहँ आवै । तहाँ स्वाति मुक्ता बरषावै ॥ तहाँ स्वाति मुक्ता बरषावै । फिर तेहि राय जाय जो खावै ॥ मुक्ता होय जग बहुरि न आवै । देवरूप होय जय जय पावै ॥ जब आवै तब खुलै किवारी । जात समय फिर मारत तारी ॥ जब वह द्वार जान नहि पावै । तारी मारि बहुरि तहाँ धावै ॥ जाने बिना होय मतिहीना । भूलि परै होय काल अधीना ॥ आवत जौन तुरे चढि आवै । सोइ तुरे यम फेरि छिपावै ॥ आने तुरे आन सो द्वारा । ताते पैर कालके धारा ॥
( ८८ )
बोधसागर
भूलै आदि तुरौ अस्थाना । ताते काल देहि बँधि खाना ॥ जौं वह तुरौ अन्त जीव पावै । खोलि कपाट बाहरको धावै ॥ आदि तुरौ चटि बाहर जाई । पाछै काल रहै खिसि आई ॥ आदि तुरौ विनु द्वार न पावै । बहुरि बहुरि चौरासी आवै ॥ धर्मदास बिनती अनुसारी । सतगुरु हो मैं तुम बलिहारी ॥ आदि अन्त प्रभु कहौ बुझाई । पकर न पावै काल कसाई ॥ अन्त करै पुनि गर्भमें बासा । काया धरे करें रहि बासा ॥ कायाते जब बाहेर जाई । ताकर भेद कहो समुझाई ॥ मैं आधीन हा मतिके थोरा । चरण टेकि प्रभुकरौ निहोरा ॥ आदि अन्त प्रभु कहौ बुझाई । सो सब जानौ चरण समाई ॥ वर्तमान भाषेहु उत्पानी । जानेहु आदि भेद सहिदानी ॥ अन्त अवस्था कहौ बखानी । जाते आगे होय न हानी ॥ जाहि द्वार प्रथमें चलि आवै । तुम प्रसाद शब्द लखि पावै ॥ कर्म अकर्म वरण कुल जाती । कहेउ बुझाय दिवस औराती ॥ कर्म अकर्म भाषहु बहु भावा । थमकर अन्त नजरि सब आवा ॥ कर्मरेख काल लखि राखा । गुरुप्रताप जानी सब शाखा ॥ गुणअवगुण सब कहि समुझायहु । गुरु शिष्यकर भाव बतायहु ॥ सो सब जानि गही सहिदानी । आदिभेद गुरु नाम निशानी ॥ नखशिख काल लिखा सहिदानी । सो सब जानिपरी मोहि बानी ॥ करम रेख काल लिखि दीन्हां । सो हम जानि दृष्टिमहँ लीन्हां ॥ गुण अवगुण दोऊकर भाऊ । परिखे काल करमकर भाऊ ॥ जहाँ २ काल लिखी सहिदानी । तू अदया है सब पहिचानी ॥ नखशिख रेखा काल बनावा । सो जो रेख जानि सब पावा ॥ आदि मध्य भाषहु सहिदानी । सो निशान जानी सब वानी ॥ जो भरि कहेउ सिखावन आनी । सो सब जानिकरौ दिलछानी ॥
श्रासगुप्कार
( ८९ )
कहेहु बुझाय मुक्तिके नाहा । रेखा परखि देहु ताहि वाहा ॥ गुणअवगुणसबमोहिलखिआवा । रेखा परखि तब पंथ चलावा ॥ भाषेहु आदि लक्षकी खानी । सो सब जानि गहो सहिदानी ॥ गुणअवगुणसबमोहिलखिआवा । परखौ लक्ष हंसकर भावा ॥ लक्ष्य अलक्ष्य दोऊ लखि लेहु । पाछै बाँह हंस कहि देहु ॥ नर नारी लक्षण देखि शरीरा । पाछै देहो मुक्तिके बीरा ॥ करपर रेखा लखौ सुभाऊ । शीश हृदय नाभी कर दाऊ ॥ कच्छ जंग औ मीन निशानी । लक्षण परखि चेतावो जानी ॥ चौदह काल विषमंकर दाऊ । शरण सनेह हंस मुक्ताऊ ॥ चौरासी कर बीज अंकुरा । संशय मेटि देहु मतिपूरा ॥ करमी जीवहि सूम पठायहु । निःकर्मा कह लोक पठायहु ॥ यह सब भेद विचारेहु जोरा । दगा देह नहि पावै चोरा ॥ उत्पति भेद सबै मैं पाया । वर्तमान हृदये महाँ आया ॥ चरण टेककी करौ निहोरा । अंत अवस्था भाषहु थोरा ॥ जादिन अंत अवस्था होई । तादिनकी गति कहौ बिलोई ॥ जादिन अंत अवस्था आवै । पाँजी भेद कहौ समुझावै ॥ जाते हंसहि काल न खाई । मुक्ति होइ सतलोकें जाई ॥ जैसे आवा गमन बतायहु । आदिमध्यसबकहि समुझायहु ॥ तैसे कहो अंतकी बानी । जाते न होय जीवकी हानी ॥ धर्मदास मैं तुम्हैं बुझाई । अंत दशाकर भेद बताई ॥ जा दिन हंस देह तजि जाई । ता दिनकी गति कहो बुझाई ॥ सोरह खाई दश दरवाजा । रविशशि संग जीव तहां गाजा ॥ आवा गौन करै दिन राती । गहौ निशान छोडि कुलजाती ॥ धर्मदास कुल जाति गँवावहु । तब तुम शुब्दहि पारख पावहु ॥ शशिके संग गर्भ जीव आवै । जलरंगतत्त्व चढि आनि समावै ॥
( ९० )
बोधसागर
ताहि संग रहै ठहराई । देह सनेह गहै यमराई ॥ काया परचै गहै निशानी । अंतकाल जीव करै न हानी ॥ जादिन अमल कालकी आवै । आगम भेद हंस जो पावै ॥ पावै भेद चित होय सयाना । गुरुते लेह सुधारस पाना ॥ काया परिचय आगम जानै । आदि अंत कह भेद बखानै ॥ प्रथमहि देह हमारी जो देखै । सो परिचय अवधी घट लेखै ॥ अंत देह हम यमकहैं दीन्हों । जानि गहै जीव ताकर चीन्हों ॥ देह हमारी निश दिन देखै । पूरण अटल सुफल तन लेखै ॥ जब देखै विनु शीशकी काया । तब जाने घट काल समाया ॥ छटए मास अवधि नियरावै । हमरि देह यम अछप छिपावै ॥ अपनी देह दिखावै काला । तब जीव जाने काल जंजाला ॥ हमरी देह लै शून्य समावै । अपनी देह प्रकट दिखलावै ॥ यमकी देह शीश विनु होई । तेहि देखत जीव जाइ विगोई ॥ हमरी देह बिमल बिस्तारा । काल देह बहुरंग अपारा ॥ जर्द श्याह औ नील सुरंगा । और रंग बहु कला तरंगा ॥ हमरी देह रंग विनु होई । नखशिख निर्मल देखै सोई ॥ जादिन आदि पुरुष निर्माया । तादिन देह वरण हम पाया ॥ सोइ देह धरि इहवों आए । कला अनंत जीव समुझाए ॥ देह धरे बहु लीला कीन्हों । ताते देह कालकर चीन्हों ॥ कालकला विष बान बनाया । सोइ विष नीर विषै दिखलाया ॥ जब हम चले पुरुषके पास । काया रही अघरही बासा ॥ काया त्यजी हम भए निनारा । सोई काया रही संसारा ॥ कायाकाल लीन्ह सहिदानी । अपने देश बसायसि आनी ॥ सो काया सबही दिखलाया । जो देखे सो थीर रहाया ॥ सो काया जो अघरहि देखै । शशि संपति सुखबिभौबिशेखै ॥
श्वसगुआर
( ९१ )
ता काया की यह सहिदानी । सो काया मम हाथ विकानी ॥ ऐसा काल भया अज्ञानी । हमसे लीन्हि सन्देह निसानी ॥ नरकी देह कालके हाथा । झाँई चले ताहिके साथा ॥ काया सरी गली इहाँ जाई । झाँई जानि गहै यमराई ॥ गहै काल औ लेखा लेई । धोखा लाइ नरक मई देई ॥ तेकाया कर करै विचारा । तीन लोक तजिहोए निन्यारा ॥ सहज सुन मह पकरै काला । झाँई साथ करै जझाला ॥ काया धरिके लज्जित कीन्हों । तेहि कायाकर माँगै चीन्हों ॥ देह धरे कीहिसि अति चारा । झाँई साथ जाए नहिं पारा ॥ सो झाँई जो इहइ बिबेखे । कंठ ध्यान धरिहम कह देखे ॥ अखंड मंडील मह काया रहई । ताकर भेद जानके गहई ॥ एह काया तजि ईहई वासा । झाँई तजी होयलोक निवासा ॥ सत्य शब्द जानै जो कोई । ताको आवा गौन न होई ॥ शब्द शब्द जो जीव न पावै । झाँइ साथ गर्भ फिरि आवै ॥ आवा गौन लखै सहिदानी । आदि अंतकी बूझे बानी ॥ गुण अवगुण झाँईके संगा । ताते काल करै मतिभंगा ॥ झाँई झमकि दिखावै गाता । आदि अंतकी बूझे वाता ॥ हमरी कयोंकर ध्यान लगावै । देखत ताहि परम सुख पावै ॥ जब वह काया काल चुरावै । काया परिचय आगम पावै ॥ काया परिचय भेद विचारै । नाम सुमिरिके हंस उबारै ॥ अंग अंगकी परिचय देखै । आगम जानि हरषितमन लेखै ॥ हर्षित रहै सदा दिलमाहीं । शोक मोह कछु व्यापै नाहीं ॥ कर औ शीश जानिके भावा । मास बरष कर आगमपावा ॥ आगम जानि गहै सहिदानी । बोलै सत्य शब्दकी बानी ॥ आगम जानि रहे लौ लाई । छूटत देह लोक तब जाई ॥
( ९२ )
बोधसागर
समाधान होइ आगम पावै । ता घट चोर न मूसन आवै ॥ लगन जानि जो पाँजी पावै । तत्त्व सनेह विलोक सिधायै ॥ आगमकी गति काया देखै । पर्वत नाम मंडल हित लेखै ॥ पर्वत पांच नाम अनुमाना । कहौ भेद सुन संत सुजाना ॥ पाँचौ पर्वत नजरि समावै । काया भेद नजरि तब आवै ॥ रवि लीला एक पर्वत भारी । चंद उनेह दूसर अधिकारी ॥ दुइके बीच सुमेर अनुमाना । देखत ताहि हंस निर्बाना ॥ चौथे मलय गिरि कैलासा । गोमत नाम पँचए परकासा ॥ पाँचौ पर्वत देखै सोई । गुरुगमि बुद्धि जाहि तन होई ॥ जब देखै तब कुशल शरीरा । विन देखै जानै तन पीरा ॥ रवि गिरि जादिन नजरेनआवै । तेजहि तन ना कष्ट जनावै ॥ चन्द्र शिखर जादिन नहि देखै । द्रव्यशोक कछु हानि विवेखै ॥ जादिन कैलास नजरेनहि आवै । मित्र हानि दुख खबरिजनावै ॥ गोमत पहार नजरि नहि आवै । काया कष्ट देश दुख पावै ॥ गिरि सुमेर जादिनहीं देखै । अन्तकाल तन घाव विशेषै ॥ रसना कान नजरि नहि आवै । मास सातमहँ काल चलावै ॥ जाकी रसना चूमक वासा । सो नहि देखै सदा निवासा ॥ पर्वत धवला नजरि नहि आवै । मास एक महँ मृत्यु जनावै ॥ तादिन काल चौकीअग आवै । ध्रुवमंडल नजरै नहि आवै ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । जैमुन जानि देह तेहि पाना ॥ जबतै काया आगम नहि पावै । तबतै अमी बीज नहि पावै ॥ काम बसी पावे जो ताही । बोरे विषम सरोवर माहीं ॥ काया श्वास चलै पर मेहा । काल वश्य होय छाँडे देहा ॥ पश्चिम लहरी जो गावै जानी । पांजी द्वार लखै सहिदानी ॥ चंद उगे सूर्य अथवै जबही । हंस सुजन तन यागै तबही ॥