कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
श्वासगुआर
( ५३ )
ताकी डोरी सुतसम देखा । कमलनालके मध्य विशेषा ॥ तीजे द्रौप लंबनी नेहा । धर्मकमल तेहि मांहि सनेहा ॥ ताकी डोरी अग्र सनेहा । अग्रनाक तेहि मांह उरेहा ॥ चौथे द्रौप झांझरी कीन्हौ । कूर्म कमल दामिनको चीन्हौ ॥ ताकी डोरी सहल स्वरूपा । चमके धारा तार अनूपा ॥ पांचए झिलमिल द्रौप संवारा । ताके कमल कुसुम सुखसारा ॥ ताकी डोरी धुआंके नेहा । अन्ध कार अकार उगैहा ॥ पांचौ द्रौप अर्ध रहि वासा । पांचौ कमल ता ऊपर वासा ॥ पांचौ कमलमें प्रतिमा पांचा । लागी डोरी अर्ध धर सांचा ॥ कोई लक्ष कोई ऊत बनावै । कोई हजार कोई सब निरमावै ॥ कोई कमल पंखुरी सांचा । डोरी अर्ध पांचहुँके पांचा ॥ ब्रह्माद्रौप घरमांहि निवाना । तेहि मँह ऊर्ध्वकमल परकाशा ॥ प्रथमहि अमी कमल निरमावा । अमी अमान अर्धधुनि छावा ॥ तहवां होइ श्वासगुआ । बरसै अमी अखण्डित धारा ॥ अमी अमोल अर्ध रहि वासा । श्वासासार पुढुप परकासा ॥ निश वासरको जाने मूला । श्वासासार शब्दसम तूला ॥ निश दिन होय श्वासा गुंजारा । सातसै ग्यारह माठ हजारा ॥ अमी कमल अमान सो नाला । अट्टाईसदल पंखुरी रिसाला ॥ तेहि मँह चले पवनकी धारा । श्वासा साथ शब्द गुंजारा ॥ निश वासर श्वासा विस्तारा । छः सै अर्ब इकीस हजारा ॥ उनतालिस हजार एकसै आवै । एतिक चिकुरदार होय धावै ॥ दुइ दल कमलहै श्वासा आवै । इकइस हजार छः सैः धावै ॥ बाइस हजार चारिसै ऊने । जाप जापै जिव आप बिहूने ॥ एतिक श्वास दोइ दलमें आवै । पल बाहर पल भीतर धावै ॥ दूसर कमल झलाझल माँहा । झलकै ज्योति अर्धधुनि ताँहा ॥
( ५४ )
बोधसागर
सहस्र पंखुरी कमल अनूपा । तहाँ वसै मनज्योति स्वरूपा ॥ ताहि कमल पर बाजन बाजै । बानी अधर मधुर धुनि गाजै ॥ कूर्म कमल मकरंदी राजा । तहाँ विराजति शोभित साजा ॥ तहाँ घरनि घरियार बजावै । घनी घनी टंकोर लगावै ॥ दश और पचहत्तर श्वासा । इतना एक घरी परकासा ॥ एतिक श्वासा सहज घर आवै । तहाँ घरनि घरियार बजावै ॥ छसे पचहत्तर की सहदानी । एक टंकोर टोकावै जानी ॥ इहि विधि चारि टंकोर टोकावै । ताकर भेद सन्त कोई पावै ॥ राहु केतु सँग ब्यालिनि रोकै । ताको मर्म कोइ जनि अलोकै ॥ एक पहर मारै विधि पूरा । गहन गरासै शशि औ शूरा ॥ गहन गरासत निरखै श्वासा । रवि शशि राहु केतुपरकाशा ॥ ताहि संग एक नागिनी रहै । घड़ी घड़ी वह जीवहि गहै ॥ श्वासा सोहंगम गहन गरासै । आगम जानिके जीवहि त्रासै ॥ श्वासा सोरह गहन लगावै । छठये मासहि काल सतावै ॥ श्वासा परख घरीकी राखै । दमहि चलै सो आगम भाखै ॥ एहिविधि श्वासचलैपुनिजबही । दुइ हजार सातसे तबही ॥ पुजे घरि पूरण होय जबही । पहरके टोर मारै पुनि तबहीं ॥ एतिक श्वासा प्रहर प्रमाना । घरि चारि गरज बंधाना ॥ आठ घरी दुपहरि जब आवै । टोकै गहर गहन नहि लावै ॥ चारि घरी चारिउ युग मूला । चारि प्रहर चारिउ समतूला ॥ चारिउ युग एक पहरके माहीं । चारि प्रहर चारि युग ताहीं ॥ प्रथम प्रहर सतयुग परवाना । तापर प्रथम घरी निर्वाना ॥ सतयुगमें युग चारि अपारा । चारिउ युगको नाम निरारा ॥ प्रथमहि सतयुग रोपै थाना । चारों युग तेहि माँहि समाना ॥ सतयुग प्रथम घरी निर्वाना । कीलक युग तेहिमाँहि समाना ॥
श्वासयुञ्जार
( ५५ )
कीलक युगकी श्वास सारा । छहसै सत्रे पाँच सुधारा ॥ एति श्वासा कीलक युग माहीं । परसे जीव अघरकी छाहीं ॥ बीतत घरी गरज चहराई । काल टकोरा मारे धाई ॥ इह युग अन्त कहावे घरी । नागिनि आसे सन्मुख खरी ॥ प्रथम कीलक होय संधारा । पाछे युगका मत रित्तारा ॥ सतयुग धरि दूसर जब आवै । तेहि श्वास कमत युग पावै ॥ कमत युग होइ कोधवरियारा । उत्पति थोर बहुत संधारा ॥ कमत युगकी श्वासा जाने । छः सै सत्रह पाँच बखानै ॥ एतिक श्वासा कामत युगमाहीं । गुण अवगुण दोछ निरखेहु ताहीं ॥ बीतत कामतक मोद युग आवै । तिसरी घरी वासना धावै ॥ आवा गौन विचारि कोई । युग कमोद सुख पावै सोई ॥ तिसरी घरी सतयुगके आई । तब कमोद युग होय सहाई ॥ युग कमोद सतयुग मई आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥ युग कमोदकी परलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥ तब जो होई सूर्य संचारा । महाविरोध उपजे अधिकारा ॥ चन्द सनेह होय जो हीना । महासुफल तन होय मलीना ॥ श्वासा चलै सातसै भारी । युग कमोदकी कथनी हैन्यारी ॥ युग कंकवत कि होय प्रकाशा । अतिही दुर्ज विषयकी त्रासा ॥ चौथी घरी कोध बेकारा । महा कठिन होई ताकी धारा ॥ चौथी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥ सतयुग अंत होय नहीं पावै । युग कंकवत आय शिरनावे ॥ युत कंकवतकाल बरिआरा । कायाके बहु करै विकारा ॥ काया कहर गरासै आई । तब न भेद मैं कहौ बुझाई ॥ काया कहर हो परचण्डा । नख शिख व्यापि रहै नौखण्डा ॥
( ५६ )
बोधसागर
युग कंकवत कालकी बानी । कालकला मति सब दिन जानी ॥ युग कंकवत महाबल योधा । अन्तकाल सतयुग पथ सोधा ॥ सतयुग अन्त कंकवत मांही । अन्त कालकी व्यापै छांही ॥ युग कंकवत मोह की खानी । काम क्रोध ममता लपटानी ॥ अन्तकाल सतयुगकर भयञ्ज । चारिञ् जुग परलैतर गयञ्ज ॥
समय-एकहि युगके बीते, चारों युग भये नाश ।
एकनद चारिञ् युगखाण, सतयुग कीन्ह गरास ॥
चौपाई
कीलक कमोद चंद सनेहा । कमत कंकवत सूर्य सनेहा ॥ भाजुग अन्त एक संग चारी । चारि घरी शब्द एक नाद संघारी ॥ एक नाद एक पहर कहावा । चारि घरी तेहि मांहि समावा ॥ चारि घरी चारिञ् युग बीते । शब्दनाद रवि शशि धर जीते ॥ सतयुग अन्त बाजु घरियारा । त्रेतायुग कर भया विस्तारा ॥ दुसरे युग भयो विश्वासा । दूसरे पहर तेज प्रकासा ॥ तेज लगन श्वासा रही बासा । ताते दूसर युग परकासा ॥ त्रेता युगकर भा अनुसारा । त्रेता युगहि ते व्यवहारा ॥ त्रेता युगकी पंखुरी चारी । चारि घरी युग चारि बिचारी ॥ जैसा युग सतयुग महाँ देखा । सोई गति त्रेता महाँ लेखा ॥ जब जब अन्त होय युग केरा । तब तब नाद काल घन घेरा ॥ त्रेता युग महाँ कला अपारा । योग व्रत तीरथ आचारा ॥ प्रथम घरी होय क्रोध अपारा । अहंकार अभिमान पहारा ॥ ताकर नाम चिंता युग राखा । चित चञ्चल चकित अभिलाषा ॥ चकितयुग अलोप जब भयञ्ज । ठोकि टकोर नाद तब कियञ्ज ॥ होत नाद मृतु अंधा धावै । लागत पलकमल नहिं लावै ॥ चकित युग बीती जब गयञ्ज । तेहि पाछै बुद्धि युग भयञ्ज ॥
श्वसगुआर
( ५७ )
बुद्धी युगकी बुद्धी अपारा । तायुग महाकाल बरियारा ॥ ज्ञान गयँद होइ असवारा । बुद्धि युगमान फोरे महिभारा ॥ बुधिकबधिक बाँधिकरे कमाई । विषे चतुराई कुमति समाई ॥ एही विधि बुधि युगचलि जाई । तेहि पीछे मन बरतैं आई ॥ मन मतंग महामद माता । तेज तपस्या व्यापै गाता ॥ मनयुग ऊंच नीच सतलीला । बरपै झारी विषैको शीला ॥ मन युगकी श्वासा बहुरंगी । ज्यों जलमध्ये उठै तरंगी ॥ मन युगराज बीतिगा जबही । अहंकार युग उपजा तबही ॥ अहंकार युग अनंत समाना । मरै पतंग हार नहीं माना ॥ हारे नहीं आपु अहंकारा । गरजै छुन्छ हारे सुख भारा ॥ अहंकार युग श्वासा ऊनी । गरचि घुमडिबरपै फिरि सूनी ॥ अहंकार ऊद्रेग अपारा । श्वासा हीन तत्व छिनधारा ॥ अहंकार युग बीते जबही । त्रेताकी परलै भइ तबही ॥ त्रेता अन्तकाल जब कीन्हों । आधी निशा टंकोरजोदीन्हों ॥ आधी रात नाद घन बाजा । महानिशान मेघ जनु गाजा ॥ त्रेता आदि अन्त व्यवहारा । उपजा द्रवा परकला अपारा ॥ द्वापर युगकी कला अनन्ता । सुखदुखमध्य आदिदुखअन्ता ॥ प्रथम घरी द्वापरकी आई । अर्थनाम युग महा समाई ॥ अर्थनाम युग द्वापर माहां । अर्थ अहर्निश व्यापै ताहां ॥ अर्थनाम युग घरी समाना । घरिकै बीते युग क्षय माना ॥ एक युग बीते दूसर आवा । धर्मनाम युग तहीं धरावा ॥ धर्मयुग धरनी धरु साँचा । श्वासा छहसै सतरी पाँचा ॥ धर्मधार औ धीर तुरझा । धर्मयुग रोग वियोग सुरझा ॥ धर्मनाम युग बीते जबही । गहर काल युग बरतैं तबही ॥ गहरकाल युग कहर कमाई । रविरथ बीच ध्वजा फहराई ॥
( ५८ )
बोधसागर
गहर टंकोर जब धरनी मारा । गहर कहर रस ज्ञान अपारा ॥ गहर यम युग बीता जबही । मोक्ष महाबल उपजे तबही ॥ मोक्ष नाम जग सत्य सुरंगा । निमिषि लक्ष दलसात तुरंग ॥ मोक्ष नाग युग बीति जब जाई । द्वापर युगकी परलै आई ॥ जब परलै द्वापरकी होई । आदिअन्त सबजाय बिगोई ॥ द्वापर अन्त बिगुरचन भारी । दुःख प्रचंड सुखसबै खुवारी ॥ बीता द्वापर कलियुग आवा । कलियुग कालकलाके भावा ॥ कलियुग महाँ युगचार समाना । चारिउ युगको करै बखाना ॥ चारिउ युगकी अर्थ कहानी । बिन परिचै सबयमकी खानी ॥ सतगुरु बिना न होय मिटाऊ । चारिउ घरी कालकी दाऊ ॥ चारि घरी युगचारि बँधाना । कहाँ भेद सुनु संत सुजाना ॥ प्रथमहि युगकर चेतन नाऊ । चेतनि चित करै सब ठाऊँ ॥ चेतनियुगमहाँ चिताको धामा । विस्मय हर्ष दुनौ विश्रामा ॥ चेतनि चिता करै सब ठाऊँ । महा बली है श्वास सुभाऊँ ॥ तीनहिं ताप तपै ब्रह्मण्डा । भरमि भूत व्यापै नौ खण्डा ॥ भर्मित पौन भर्मकी खानी । भर्म हाथ सब दुनी बिकानी ॥ कैतौ पढै गुनै संसारा । बिनसतगुरुनहिं चितसुधारा ॥ सतगुरु मिलै होय सत चूला । तेहि पाछै उत्पतिकर मूला ॥ दोरस युग बुद्धी बलनामा । श्रुची अश्रुची करै जो कामा ॥ ताकी संख्या बहुत विचारा । छःसै सत्तरि दण्ड पसारा ॥ पांच दण्ड वाकी रहि वासा । ताका भेद काल परकासा ॥ बुद्धी कुबुद्धी दोउ कर भाऊ । एकहि युग दोउ रहनि बताऊ ॥ बुद्धि हीन मैं मत पसारा । बिनु आँकुश नहिं होत सुधारा ॥ अंकुश देई मिलै गुरु पूरा । मोह महामद विषहोय दूरा ॥ बुद्धि नाम युगकी सहिदानी । सुमति सनेह सुरति लपटानी ॥
श्वसगुञ्जार
( ५९ )
बुद्धि नाम युग पारस सनेही । चित अभिमान रहे नहिं देही ॥ बुद्धि नाम युग बीते जबही । इच्छा राशि गरासे तबही ॥ इच्छा युगकी अकथ कहानी । सुनहु सन्देश कहो सहिदानी ॥ इच्छा आदि पुरुषकी काया । तासु नेह सब लोग बनाया ॥ सो इच्छा है जीवन नेहा । रही समाय जहां लौ देहा ॥ ता युगमाही विषय विकारा । ज्ञान न उपजै भर्म पसारा ॥ ता युग माहि धैर नहिं धीरा । लालच लोभहि व्यापै पीरा ॥ इच्छा युगकी अटपट डोरी । शहर सँधार होय निश चोरी ॥ जब जब इच्छा युग विस्तारी । काया कष्ट होय दुख भारी ॥ ता युगकी बाकी भुगतावै । दृष्टि नाहिं अदृष्टि दिखावै ॥ अन्न अहार करै जब कोई । इच्छा युग तब पूरण होई ॥ तासे युगकी दूसरी धारा । सतगुरु मिलै तो होय उवारा ॥ सतगुरु शरण अमर पद पावै । इच्छा समय दूरी बिसरावै ॥ इच्छा युगकर तार पसारा । लाज महा बल तजै विकारा ॥ सातों दण्ड इच्छा कर भावा । दण्ड पांच सातहि बिसरावा ॥ पांच शून्य इच्छा कर साथी । मद माते जस मङ्गल हाथी ॥ तासु नेह संयम जब पावै । इच्छा मेटि गरव बिसरावै ॥ इच्छा युगकी एतिक बानी । सतगुरु मिलै होय छुटानी ॥ जाहि देह सतसुत्ती बीरा । ताकह काल देह नहिं पीरा ॥ समय-कालत्रासव्यापै नहीं, इच्छा युगके माहिं । सतगुरुसो परचय करै, परसै निरगुण नाहिं ॥
चौपाई
चौथे युगको करौ बखाना । धर्म महाबल माह समाना ॥ अभय तरंग ताहि युग नामा । संशय रहित सदा बिसरामा ॥ तेहि युग माहि सरव सुख होई । अहंकार व्यापै नहिं कोई ॥
( ६० )
बोधसागर
तेहिधुग माहि सुधाकी खानी । बोले धीर मधुर धुनि बानी ॥ झीनी रङ्ग तरंग विराजै । नाना नाद अर्ध धुनि गाजै ॥ सातों द्वीप होइ उजियारा । दामिनि दमकै शहर मझारा ॥ वन औ वृक्ष सघन सब होई । सदा बसन्त खेले सब कोई ॥ षट ऋतु महा एक सम तूला । एकै बानी एक अस्थूला ॥ साहब सेवक एकै होई । सदा बसन्त खेले सब कोई ॥ साहब सन्त लख सब कोई । साहब सेवक लखै न कोई ॥ ( एकै बास बसै सब कोई । )
साहब सेवककी एकै शोभा । चीन्हि न परै अङ्गकी ओभा ॥ साहब सेवक बरन दुहेला । एकै बरण गुरु औ चेला ॥ जैसे फूल बास कह तोरी । पाछे फूल बास गहि जोरी ॥ पाछे फूल शोभासों देही । तिलतजितेल बास गहि लेही ॥ विना भेद जीव होइ अन्धेरा । पाछे परै कालकी घेरा ॥ सीख बिना गुरु छुटे नाहीं । बिरि फिरि परिहै भौचक माहीं ॥ गुरु सुवास है फूल सनेही । सीख स्वरूप आसिका देही ॥ गुरु बिन कौन उतारै पारा । कठिन काल है भौजल धारा ॥
समय-विनसतगुरु नहि बाचै, फिरि बुडे तेहि माहिं ।
भवसागरके त्रासते, गुरु पकरी बांहि ॥
चौपाई
युगत रंगकी कला अपारा । बिना भेदको करै बिचारा ॥ जस तरंग जलमाह विराजै । ऐसे शब्द शीश पर छाजै ॥ मन मकरन्दीके गुण ऐसा । कोटके बासै विषधर जैसा ॥ अग्नि बीच काया कह डाढै । सागर मांझ दून होइ चाढै ॥ पर्वत मारि उडावे छारा । पुढुमी मेटि करै मसि आरा ॥ सूर्य मेटि सब किरन वनावै । पवन बांधि काया दिखरावै ॥
श्वासयुञ्जार
( ६१ )
पानी बांधि अग्रिको ढाहे । पाला मेटि गरमि नहिं चाहे ॥ तीन लोककी जेतिक खानी । करै बास सबकी सहिदानी ॥ विष दारुण विषयाबसि होई । मारे मरे जियावै सोई ॥ जो चाहे सो सबै बनावै । मनकी कला हाथ जो आवै ॥ मन भूखाँ औ मनै अधाना । मनै पियासाकर जल पाना ॥ मन सूरा मन कायर हीजा । मनै विरह विरहिनसङ्ग भीजा ॥ मन दारुण मन कही सियारा । मने तास औ मनै पियारा ॥ मन राई मन राव कहावै । मनै बिना मन हाथ न आवै ॥ मन बाहर मन सबके माहीं । मनते भिन्न कोऊ जग नाही ॥ मन सर्वज्ञ चराचर माहीं । मनते करता दूसर नाही ॥ मनही देह मनहि पुनि लेई । मनबसि काम लहरिवस सोई ॥ मन लोभी मन कृपणी होई । मन उदार मन दाता सोई ॥ मन पापी मन अघ ढोई । मनै भक्ति लरि तारै सोई ॥ मनै लेख मन करै अलेखा । मनही स्वर्ग नर्कको लेखा ॥ मनहि मरै मन मन नरकें जाई । मन बसि जीव सदा पछिताई ॥ करता जीव रंग मन आहीं । शोभा सकल रंगके माहीं ॥ रंगदेखि सब जगहि भुलाना । रंगरूपको एक ठिकाना ॥ बिन रंगरूप होई फीका । रंगरूप मिलि देखिय नीका ॥ नीक देखि सब शीश नवावै । निरखि देखिकै शीश डुलावै ॥ नीकै लागि रहा सब कोई । अनइस नीक मनैते होई ॥ ताते इह मन कर्ता भाखा । तिरगुण डोरी बांधिजगराखा ॥ मन हर्षित होय गावै गीता । मन उत्कण्ठमन कहै पुनीता ॥ मन खोजी वादी होई । मनै गुरु समुझावै सोई ॥ मन बारै मन आनि जुड़ावै । मनमलीन दशहु दिशि धावै ॥ मन अज्ञान मनै सज्ञाना । मन कविता मन चतुर प्रमाना ॥
नं. १० बोधसागर - ५
( ६२ )
बोधसागर
मनछन्द धरि भाषा बोलै । मन अस्थिर मन चञ्चल डोलै॥ मनै ध्यान धरि वेद बखानै । मनै नबोडा कर न बैधानै ॥ मन षट्चक्र मन विप्र बैधाना । मनके सकल रूप हैं ठाना ॥ मन नट नाटक महा समाना । मन नट सर्व कथै अभिमाना ॥ मनहि अठारह पदै पुराना । मन मन कहि समुझावै ज्ञाना ॥ मन चउदय विद्या अधिकारी । मन त्रिकुटी महै लावै तारी ॥ मनकी ज्योति सकल उजियारी । मनकी छाया मन अधिकारी ॥ मनहीसों सब सरही काजा । मन है सात द्रौपको राजा ॥ मन बिनु सरे न एको काजा । मनके ऊपर मनहि विराजा ॥ ( मननवखण्डदशहूँदिशगाजा । )
सतगुरु सीख मनहिको कीन्हा । मनते भक्ति मनते पथचीन्हा ॥ मन मानै तो सबै बनावै । मन बिनु पन्थसो कौन चलावै ॥ मन चीन्है तो मनकहँ पावै । बिनु मन सत्यशब्द नहि आवै ॥ मन चीन्है तो सब बश होई । बिनु चीन्है सब जात बिगोई ॥ तीन लोक जो बाहर भाखा । सो सब आनि देहमें राखा ॥ मन चीन्है तो हाथहि आवै । तीनहि लोक देहमें पावै ॥ जो बाहर सो भीतर पावै । तीन लोक पल माँह दिखावै ॥ तीन लोकते बाहर बासा । मन चीन्है तो होइ प्रकाशा ॥ जब लगि मनको अन्त न पावै । तौ लगि इह मन हाथ न आवै ॥ समय-तीनलोक हैं देहमहैं, रोमरोम मन ध्यान ।
बिन सतगुरु नहि पाइये, सत्यशरण निजनाम ॥
चौपार्ह
सात द्रौप काया अस्थाना । सातों द्रौप कमल बंधाना ॥ नाल साति रचना गति देहा । सातों सुरकर एक सनेहा ॥ तहाँको भेद हँस जो पावै । दुबिधा दूर मति सबै गवाँवै ॥
श्वासयुञ्ज्जार
( ६३ )
पावै भेद करै विश्रामा । पल पल परशै निर्गुण नामा ॥ आवत जात बार नहिं लावै । परसै नाम अमर पद पावै ॥ नाल सात सुर एक ठिकाना । ताके निकट रुसके थाना ॥ नदी तीन बाढी गम्भीरा । साम तहां गोफाके तीरा ॥ तहां बैठि अजपा लौ लावै । रोम रोम की सब सुधि पावै ॥ रस औ बिरस तहांकर मेला । होत बसन्त गुरु तहां चेला ॥ गुरु समाधि मैंह अटल प्रमाना । चेला अग्रवास मह साना ॥ चेला बास गुफा मैंह करई । पल पल सुरति शब्दपर धरई ॥ त्रिगुण तेजकी दीखै काया । दामिनि दमकि झकोरें बाया ॥ जो गुरु मिलै तो पांजी पावै । बिनु पांजी बिचही भटकावै ॥ पांजी पावै सुरति सनेही । पूर्ण तत्व चले जब देही ॥ करै चन्द्र तापर असवारी । प्रीति पूर्ण जागै खुमारी ॥ प्रेम पियाला तहवां पीवहि । निश्वासरचित आनंद दीवहि ॥ चेतनि चेत होय बल जोरा । जागत साह न मूसत चोरा ॥ श्वासा चारि लगनकर भावा । जब उपजै तब संगहि आवा ॥ चारि लगन दुइ भाव अपारा । उपजै विनशै क्रम व्यवहारा ॥ एक लगन संग उपजै काया । एक लगन बहु सुख समाया ॥ एक लगन दुख दारुण होई । शब्द गहे नहिं दुर्मति खोई ॥ एक लगन संग उपजै काया । एक लगन बहुसुख समाया ॥ एक लगन दुख दारुण होई । शब्द गहे नहिं दुर्मति खोई ॥ एक लगन संग उपजै काया । मोह महामद विषकी छाया ॥ विलसत उपजत सब जीव जाई । ना गुरु मिलैना अर्थहि पाई ॥ चारि लगनकर नाम निराला । दुइ सुक्ती दुइ काल कराला ॥ उत्पति संग सुधाकी छाया । दुखदारुण होइ तजे काया ॥
( ६४ )
बोधसागर
जे मुनि लगत सँवारे बीरा । उत्पति के सँग तजै शरीरा ॥ बाकी जवनिकाल लखि राखा । मेटै अंक कालकी शाखा ॥ उत्पति होत लिखे यमराया । सो सब दीसे नरकी काया ॥ सातों द्वीप लखे सहिदानी । वासिल बाकी कर्म निसानी ॥ जेतिक श्वास चलै नर देहा । ताकर जाने सबै सनेहा ॥ दम विस्तार लिखे सब दाऊ । पाछे करै करे जे घाऊ ॥ द्वीप द्वीपकर अंग जलावै । करपग परलो प्रकट दिखावै ॥ चौरासी लक्ष योनिनकी धारा । नरकी देह ते कर्म अपारा ॥ चौरासीकर पातक भारी । नरकी देह सब लिखे विचारी ॥ करपाछै वासिल लिखि राखै । बाकी अंक मध्यमें भाखै ॥ जमा शीसपर लिखे विचारी । नित उठीके न्यावे निर्बारी ॥ सातों द्वीप सुधारै रेखा । ऐसा यमकर वरवस देखा ॥ करमज चारि अंक लिखि देई । पाछे सबसों निरगै लेई ॥ रेखा इलालि लिखे विष पूजा । लहसन मसा लिखे तिलगूजा ॥ चक्र लिखै औ आपहि बासै । सन्धि लिखै जीवन कहैं फासै ॥ नखशिख लिखै कर्मकी खानी । गुण औगुण नहिं मेटे जानी ॥ जाहि द्वीप जस अंक लिखावै । तहाँ तहाँ तस चाल चलावै ॥ रवि शशि अंक दोउ लिखि लेई । पाछे दोष जीव कहैं देई ॥ श्वासा स्नेह लिखै सहि दानी । पाप पुण्य भुगतावे जानी ॥ जेमुनि लगन होय उत्पानी । लगन केतुकी सबही हानी ॥ दोऊ लगत साथै शशि सुरा । पावै सत गुरु हाल हजुरा ॥ जो गुरु मिलै तो मेटे रारी । बिन सतगुरु सब यमकी बारी ॥ सतगुरु बिना न होय उबारा । केतो ज्ञान कथै संसारा ॥ जप तप योग यज्ञ व्रत पूजा । काल सनेह और नहिं दूजा ॥
श्वसगुञ्ज्जार
( ६५ )
तप साधै रहसे मन माहीं । काल करमकी लखै न छाहीं ॥ विद्या वेदकी करै उचारा । कर्मवश जीव भये यमचारा ॥ जब लगि हृदय शुद्ध नहिं होई । तब लगि पार न पावै कोई ॥ जाही लगन तन जग लेही । ताही लगन तजै जो देही ॥ सो जीव उतरि जाय भौ पारा । नहिं तौ अटकि रहै संसारा ॥ कालहि बस जो तजै शरीरा । ताकह काल देह बड़ पीरा ॥ लगन केतुकी होय न न्यारा । पाछै लेई गरभ औतारा ॥ नर्क खानि भुगतै चौरासी । धरि काया बांधे विसवासी ॥ सतगुरु बिना लगन नहिं पावै । अन्तकाल यम धोखा लगावै ॥ जीवत कथै बड़ ज्ञान अपारा । काल चतुराई छन्द पसारा ॥ कर्मकी वंशी सब जीव फाँसै । हरी न मानै आनै हासै ॥ तादिन भूलि है सब चतुराई । जादिन काल धरै तन आई ॥ श्रृंख चतुराई सहज बैलाना । छोटे बड़े मर्म नहिं जाना ॥ ताते सत गुरु खोजहु भाई । जाते कर्म भर्म मिटि जाई ॥ लगन केतुकी देह बहाई । बाकी सबै कालकी जाई ॥ जे मुनि जन तजै शरीरा । गहै न काल विषयके तीरा ॥ कागद करि जाय भव पारा । मेटे यमकर सकल पसारा ॥ सतगुरुसेती चाल गहि लेई । ताकह काल दगा नहिं देई ॥
समय-काल दगा सब मेटिकै, उतरहु भवजल पार ।
यमकी चाल बिचारिकै, बहुरि न हो औतार ॥
चौपाई
धर्मदास औरो सुनि लेहु । जीवन बाह जानिके देहु ॥ जाको होइ सत्यको रेखा । नख शिख देखहु अङ्गविशेषा ॥ चतुर शील दोउ निरखेउ जानी । करपर देखहु भक्ति निशानी ॥ शंख चककर देखेहु थाना । लक्षण जानि सुधारेहु पाना ॥
( ६६ )
बोधसागर
बोले मधुर शीलकी बानी । तेहि तन होय ज्ञानकी खानी ॥ पहिने ग्रीव समा जौ होई । शब्द विवेकी जाने सोई ॥ खंभज होय जाहि कर माहा । यश विस्तार ज्ञान अवगाहा ॥ पलक पसार छत्र जो होई । लोक निशानि अंश जनु खोई ॥ नासिका नेह होय जो मासा । कुटिल कठोर रोग तन वासा ॥ बौरनीपर जो गुजौ गुजा । तामस तेज विषयको पूजा ॥ कोतह गरदनी एचातानी । कुबजा गाडर विषकी खानी ॥ सुख चतुराई हृदय कठोरा । बोले झीन कोध कर जोरा ॥ इन जीवन जनि बोधहु जानी । अन्तकाल पुनि होवै हानी ॥ नारी नेह विचारहु जानी । देखहु देह द्वीप सहि दानी ॥ राज गुञ्ज निरखेहु अनुहारी । कर पगशीस लक्षहि विचारी ॥ चंचल चाल पोल होय पाऊ । तेहि जनि कबहु चरण छुआऊ ॥ गुञ्ज होय जेहि मास लिलारा । तेहि बोधते होई कर्म अपारा ॥ वोठ भुजंग औ जीव भुजंगी । विष बरजोर बसै तेहि संगी ॥ नेत्र गुञ्ज ए ऊंच लिलारा । कामलहरि बहु जहर पसारा ॥ हंसत वदन चालै चतुरंगा । बोधत ताहि होत सुख भंगा ॥ नैन शेष निरखे जेहि ओरा । ताकह कष्ट देह तन चोरा ॥ शुभ रंगुत्र होई विषखानी । क्षीरे छिर विष बालककी हानी ॥ सो गुण छांडे तासु शरीरा । द्वादश कँवल बसै बलवीरा ॥ नाभिकमल होइ रेखा तीनी । वाएँ अङ्ग होए शशि हीनी ॥ कच्छदीप होइ गुञ्ज चितेरा । परसत ताहि कालको चेरा ॥ जङ्घदीप होइ गुञ्ज गहीला । लहसन मासा होइ जो ईला ॥ तेहि परसै औ बेघे जानी । गुरु शिष्य दोनोंकी हानी ॥ मीनहि द्वीप विकट होइ रेखा । ताके अङ्ग कालकी रेखा ॥ बाँझ मुआ बछ गूगी होई । कलपत जाय कालपुर रोई ॥
शवासुखज्जार
( ६७ )
कूर्म स्नेह लक्ष कर जोरा । चतुर सनेह ज्ञानबल जोरा ॥ पग छतनार होइ जेह जानी । पुस्तपांव पर काल कुबानी ॥
समय-चरण पलौ सम होय कर, घटिका पलो प्रमान ।
ज्ञान सनेही दूत है, रोम रोम भगवान ॥
चौपाई
दूनों अंग विचारेहु जानी । एकरज भक्ति एक विष खानी ॥ दोऊ अंग लक्षण गहो शरीरा । पाछे देहु मुक्ति बरबीरा ॥ परिचय भेद विचारहु जानी । पान लेत जिव होय न हानी ॥ लक्षण लक्ष्य होय सम तूला । पावै सतगुरु मुक्तिके मूला ॥
समय-आदि निशानी देखिकै, बांए दहिने बाम ।
शब्द सनेह नेह करि, तब दीनों निजनाम ॥
चौपाई
बांए अङ्ग मसा जो होई । तीरथ अङ्ग रेखा हो दोई ॥ बांए अंग विषयकी बासा । माया सघन वंश कुल ग्रासा ॥ दहिने अंग विषय जो होई । शीस संपति सुख गासै सोई ॥ विकटदंत होय जेहि बारी । शीलवंत सुख प्रेम सुधारी ॥ बिरर चिकुर सुख बुम्ब सनेही । विहसत वदन सदा सुखनेही ॥ उज्ज्वल नेह सदा सुखदाई । शील सनेह भक्ति बहुताई ॥ हंस गमन सतगुरु सों नेहा । मधुरी बोले प्रेम सनेहा ॥ कर पद कोमल शरद शरीरा । सुत संपति जैसे दारुण धीरा ॥ मधुर बात औ चमकै देहा । सबते बोले सुरति सनेहा ॥ सुरतिवंत प्रीतमकी प्यारी । पछो लांव जेठ पुर भारी ॥ श्यामगात लहसन तन माहा । माया संच न औ ग्रासै नाहा ॥ राजवरण प्रिय श्याम शरीरा । पियाहि आहिपरीमल गंभीरा ॥ बगलधि सुख आमिष जो होई । तन प्रसेव सुत सुताहि विगोई ॥
( ६८ )
बोधसागर
लभे गात मोट तन भारी । विरह विकार कोधअधिकारी॥ छोट शरीर पातरी वामा । आपु तजै अन्त विश्रामा ॥ निहली चितवनि ऐंचा तानी । बहुते पुरुष एक पटरानी ॥ विहसत बोले कुटिल निहारै । आपु जरे औरन कहँ जारै ॥ आगे चलै पाछे तन देखै । गुण औगुण एकौ नहिं लेखै ॥ ऊपर हँसै मनही पछताई । देह थोरहिं बहुत पुआई ॥ एक थन छोट कठोर कुबानी । एक थनझालरि विषकी खानी॥ नाभी पर तीनि होइ रेखा । सुखसम्पति सपनेहुनहींदेखा ॥ इन्द्री मांझ गुञ्ज होइ भारी । जो परसै तेहि करै खुआरी ॥ मोट पतंग चाकरी चाला । तेहि देखत मिय होइ बेहाला ॥ पग पातर पलो छत नारा । परसन बास परै यम धारा ॥ कनअंगरी अघर तिन लागै । आपु नाह तजि परघर बागै ॥ अस लक्षण होइ जाके गाता । प्रान लेइ करै यम घाता ॥ कुम्भ लिलार खम्भ जो होई । जो परशै सो जाय बिगोई ॥ कर पग पलौ गुञ्ज सनेही । परसत होइ भालुकी देही ॥ जोरे पुअर करमह होई । नाहरि नाहक आसै सोई ॥ अहहि होय लक्ष तिरझूला । काल स्वरूप होइ अस्थूला ॥ मुक्तिपन्थ कबहुं नहिं चाहै । सदा विकार विरह रस लाहै ॥ चञ्चल चित् थिर नहिं होई । भजन भंग रस भक्ति बिगोई ॥ वरुणी बसे बिसंभर जोरी । नेत्र बिलोन रंग होइ गोरी ॥ झंखत फिरै प्रकट नहिं होई । अन्तर भक्ति ऊपर होइ छोई ॥ प्रेमवन्ती होइ सुरति निहारै । आप तरे औरन कहँ तारै ॥ करे दंडवत निर्भय नारी । भक्तिवन्त बहु लीला धारी ॥ बिगसित बदन शीलकी आखी । कुल परिवार भक्तिगणसाखी ॥ सतगुरु नाम सुनै सजुपावै । मण्डल चारि शब्द फैलावै ॥
श्वसगुञ्जार
( ६९ )
हर्षित होइ सतगुरु गुण गावै । भक्ति कि बात सदा मन भावै ॥ गुरु सनमुख होइ सेवा लावै । सदाकाल तेहि मस्तक लावै ॥ संपुट वदन क्षीणता होई । सतगुरु शब्दहि एक विलोई ॥ सतगुरु देखि न परदा आनै । शब्दकी चाल सदा पहिचानै ॥ सदा अधीन रहै तनमाही । भागे काल देखिके ताही ॥ कर जोरै सनमुख शिर नावै । लाज कानकी दशा मिटावै ॥ ऐसी लक्ष गहै तन पास। पावन पान लोक होइ वासा ॥ ऐसी लक्ष विचारेउ हंसा । दीन्हेउ ताहि शब्दकर अंशा ॥ लाज काज कह देहु बहाई । भेद सुधारत काल पराई ॥ माता बेटी भई नेवारी । लजा तजिके काल बिडारी ॥ लोक लाजकी दशा मिटावै । तौ रिपुकाल निकट नहि आवै ॥ रामचन्द्र त्रिभुवन के राजा । लोक लाजबहि कपिदलसाजा ॥ जानि परी नहि यमकी वानी । ताते काल कीन्ह तन हानी ॥ लाज लिये तन करै उदासा । तेहि मन भरम भूतकरबासा ॥ गुरुसों करै कपट चतुराई । चाल बिहुन कालपुर जाई ॥ भक्त कहावै लजा नहि तोरै । निश्चल काल नर्क महाँ बोरै ॥ भक्त करै कुल दशा मिटावै । परदा ठानि कालपुर जावै ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । चाल चलावै शब्द प्रमाना ॥ आगत परदा मेटि बहावै । पाछे भक्ति पन्थ महाँ आवै ॥ कपट छाड़िकै शीस उतारै । हंस दशा धरी मुक्ति सुधारै ॥ शीस उतारि हाथ पर लेई । पाछे पाँव ताहिपर देई ॥ भक्तिका चित हर्षित होई । ममता मोह लहर तज दोई ॥ कामिनि कनककालकरफन्दा । भयउ काल कपटि मन मन्दा ॥ दुवो शीस अर्पना लाई । मुक्ति पंथ पावै तब भाई ॥ पावै भेद शब्द सहि दानी । काल कल्पना मेटै जानी ॥
( ७० )
बोधसागर
समय-निडुरीनिडुरै नाचै, चारिउ अंचल छोरी । धनी पियारी होइ रहै, यमसो तितुका तोरी ॥
चौपाई
इहि विधि मुक्ति गहे जो कोई । ताकौ आवागौन न होई ॥ आवागौन विचारै जानी । काया कष्ट होइ नहि हानी ॥ सतगुरु शब्द जो लागा रहै । निकसि चरण सतगुरुको गहे ॥ तीन लोक नाद जय जाई । सतगुरुको पग रहै समाई ॥ तिसरी श्वासा साधै जानी । कुल अभिमानमिटै सबखानी ॥ नरको लक्ष पारख करि लेहूँ । पाछै वाह ताही कइ देहूँ ॥ चंचल चपल कुटिल तन होई । पान पावै तन जाय बिगोई ॥ ताको लक्षण नर्ककी खानी । बोधत दुई दुवोंकी हानी ॥ राजा वरण तन बन्सी लावै । आप नष्ट होइ और नशावै ॥ जो वाकी संगति बैठे जाई । अपनी दशा ताहि पहराई ॥ सो सतगुरु जो होय सियाना । लक्षण देखि देइ तब पाना ॥ आगत पान धरै चितलाई । पाछे निर्णय शब्द बुझाई ॥ पानलेत चित हर्षित होई । चालु चले नहि दुर्मति खोई ॥ ताहि देहूँ गुरु पिपीलका । लक्षण हीन रेष होइ जिसका ॥ तापर अंक लिखे सहिदानी । काल कलाधरि देइ निशानी ॥ जैसा लक्ष जाहिपह होई । पान देहु तेहि तहाँ बिलोई ॥ भामत पौन लिखै तेहि माहाँ । दिटै इलाका गुरुको ताहाँ ॥ जाके होई सुमतीकी खानी । ताही देहु गुरुनाम निशानी ॥ राज वरण मुख शीतल बानी । ताघट होई ज्ञानकी खानी ॥ पूरी तत्त्व पान जो पावै । यमकी नाक छेदि घर आवै ॥ राजवर्ण होय क्षीण शरीरा । ता घट काल करे नहि पीरा ॥ राजबरण मुख गुंज चतेरा । सो जिव होय कालको चेरा ॥
श्वासगुञ्जार
( ७१ )
तापर काल लिखै सहिदानी । बोलत धीर हृदय कुबानी ॥ लक्षण भेद कहो सहिदानी । कालसभा भयभीत निशानी ॥ कालकला निरखेहु बहु भांती । करहु विचार दिवस औ राती ॥ कृपण होय माया नहिं छाडै । जोरी जोरी बरनि महेँ गाडै ॥ आशा रहे तहां लपटाई । मुक्ति होय नहिं यमघर जाई ॥ देह ताहि विष गंजित पाना । करम रेख सब देह पयाना ॥ नेत्र बिलोन मसा मुख होई । करत कल्पना जाय विगोई ॥ लवा शीश होय मुख छाही । हृदय कठोर दया नहिं ताही ॥ मध्य कपोल होइ तिल खानी । बांये तत्व लै बोले बानी ॥ बांये विभौ मासा जो होई । दहिने दारुण तेज समोई ॥ बांये विभौ ताहिके होई । अंत चले जिव सर्वस खोई ॥ गहरी चितवनि मुख चतुराई । लंपट चोर होइ दुखदाई ॥ छोटी गर्दन राजस भारी । मिथ्या बोले होय खुआरी ॥ ता घट जीव दया नहिं होई । बोधत ताहि काल पुर रोई ॥ जान ऊपजै कुमती शरीरा । तेहि जनि देहु मुक्ति बलवीरा ॥ एक समय पान जो पावै । आपु जाइ संगति बगरावै ॥ विषयहि लम्पट होय जुआरी । इनते होइ है पन्थ खुआरी ॥ शब्द पेलीजानि पांव छुआवहु । महाविकार तन कछहि पावहु ॥ ताते आगम कहौ पुकारी । कुमति छुडाय पान निरुआरी ॥ हर्षित वदन रहे दिनराती । गुरुसों प्रीति करै जेव स्वाती ॥ सोंपैही सदा स्वाती आसा । उपजै मुक्ती ज्योति प्रकासा ॥ रहनि गहनि बूझे करजोरी । दीन्हेहु ताहि शब्दकी डोरी ॥ गुरु सन्मुख होइ सेवा लावै । काम कोध ममता बिसरावै ॥ सदा अधीन रहे गुरुआगे । पावै शब्द सहज अनुरागे ॥
( ७२ )
बोधसागर
गुरुपद छांड़ि अनत नहिं जाई । खुशै अमी रस पीवै अघाई ॥ समता धीर होइ जेहि गाता । तेहि यमकबहि करै नहिं घाता ॥ गुरुगम भेद बूझि सब पावै । ममता मोह सबै विसरावै ॥ समय-गुरुकी आज्ञा आवै, गुरुकी आज्ञा जाय ।
कहै कबीर सो हंस भए, बहुबिधि अमृत खाय ॥
चौपाई
क्षीण अधर औ नेत्र विसाला । गुरुगमी बोले शब्द रिसाला ॥ जो कोई तपत ताहि पहुँ आवै । अमृत सींचिके ताहि जुडावै ॥ पावै अमृत हर्षित होई । मोह महाबल जाइ बिगाई ॥ शब्दकी परच बोले बानी । तन अभिमान विसारे खानी ॥ तत्त्व तमाशा निश दिन देखै । भाव अभाव एक करि लेखै ॥ आसन मारि समाधि लगावै । एक पग संपुट पाछे लावै ॥ उलटी बाँह शीशपर राखै । पूर्णतत्व अमीरस चाखै ॥ पलकन मारै राखै साधी । तिरवेणी तट राखि समाधी ॥ अमर महातम तत्वहि राता । दशै सूख सागरके दाता ॥ ज्ञान महातम तबही पावै । अमर समाधि एकपल लावै ॥ तबही मिटै काल करदाऊ । दुविधा दूसर सब विसराऊ ॥ अमर समाधि महा फल पावै । जमदारुन तेहि शीश नवावै ॥ करपग कोमल रोग न व्यापै । काल कला तेहि देखिके काँपै ॥ अखंड मंडल गुफाके तीरा । दरशै ज्योति अखंडित धीरा ॥ जो देखै तो प्रकटै चोरा । देखे बिना ज्ञान होय भोरा ॥ तत्व समाधि लगावै जानी । उपजै ज्ञान अमी रस खानी ॥ सत्य सुकृत पग परसै जाई । रोग न व्यापै काल न खाई ॥ तत्व तमासा गुरुमुख देखे । तत्व छाड़ि निहतत्व बिबेखे ॥ तत्व समाधि करै नित पूजा । सत्य सुकृत तजि और न दूजा ॥