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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

श्वसगुआर

( ३३ )

साइ विष लेय तीर्थको आवै । चंद्र कमल पर जाय समावै ॥ एहिविधि चंद्रपक्ष चलि जाई । पाछै जीव सूर्य घर जाई ॥ पूनिमा बीते परिवा आवै । तब रथ चढिके सूर्य सिधवै ॥ सुरंग तुरै पर होय असवारा । योजन तीनि जाय चढिपारा ॥ सुखसागरमें पैठि नहाई । परसै योग सँताय न पाई ॥ अमृत मानसरोवर माहां । कामिनि दूरि धरै बोले ताहां ॥ सो अमान सुखसागर माहां । सूर्यके संग पीवे जिव ताहां ॥ पिये अमी जिव सूर्यके संग । मिटै तपत होय शीतलअंगा ॥ पल भीतर पल बाहर आवै । पीवै अमी रस तेज समावै ॥ जबही सूर्य अमीरस पावै । चंद्रहि पकरि आपुघर लावै ॥ जब चंदा आवै रवि द्वारा । होइ संक्रमण तेज अपारा ॥ तेज किरण पूरण जब होई । दरशाहि काल तपै रवि सोई ॥ तपै तेज बारहको धावै । सुखसागरमें पड़ि नहावै ॥ सुखसागरमें कर अस्नाना । उदितकमलहोइ द्वादश भाना ॥ सूर्यपर चंद होय जब जोरा । तब घर काल करै घनचोरा ॥ चन्द्र सूर्य कह राहु जो फाँसे । पल चन्दा पल सूर्यहि आसे ॥ इहि विधि देह डुइनको बाजी । पूनम धरिहि अमावससाजी ॥ चन्द्र सूर्य लै जाय अकाशा । सुखमुनिके घरदोजकर फाँसा ॥ मुसकि तुरौपर होइ असवारा । घरे शशि सूर्य अकाशके द्वारा ॥ जंबूद्वीप काल अस्थाना । सहज शून्य कह करै पयाना ॥ सहज शून्यमहैं पहुँचे जाई । सहज रहावै संग लगाई ॥ योजन डेठ सहजकर बासा । तहवाँ करै काल रहवासा ॥ सहज कालसों अंतर नाही । जीवहि छलै सहजकी बाही ॥ पलमें जंबूद्वीपहि आवै । पलमहैं सहज शून्यकहैं धावै ॥ एहिविधि चंद्र सूर्य दोह कांसै । काल सहज होय जीव गरासै ॥

( ३४ )

बोधसागर

चंद्र सूर्य दोउ अमृत पावै । काल सहज संग बाण लगावै ॥ बाण लगाय श्रुधा लेइ छीनी । जहर देइ चिव बुद्धि मलीनी ॥ जीवहि सदा कालकी आसा । तजि अमृत विष करही आसा ॥ कालहि राहु केतु होइ आवै । कालहि चंद्रहि सूर्य सतावै ॥ कालहि अमृत जीवसों लेही । कालहि जल थल बाजी देही ॥ कालहि प्रहण असत है जाई । देह विष अमृत लेइ छुडाई ॥ कालहि आगे पाछे धावै । कालहि रचै काल बिगडावै ॥ कालहि चारि खानि रचि राखा । कालहि सब घट बोलै भाखा ॥ घट २ काल करै रखवारी । एक देह दुइ अंग सँवारी ॥ एकअंग चंद एक अंग सूर । श्वासा पारस हाल हजूर ॥ इकइस हजार छःसै श्वासा । इतने एक घरी परकाशा ॥ निशिवासर बीते युग चारी । देओं अंग श्वासा संचारी ॥ दश हजार आठसै भारी । श्वासा चंद्र रनेह सुधारी ॥ जेतिक श्वासा चंद्र सनेहा । तेतिक चलै सूर्य सँग नेहा ॥ दशहजार तीनसै घाटी । चले चन्द्र अरु सूर्यकी बाटी ॥ दुइ हजार दुइसै अधिकारा । ताको भेद एक विस्तारा ॥ मध्यद्वार सहजके जाई । ता सुन्नह मों रहै ठहराई ॥ बारईस हजार चारिसै ऊने । जाप जपे जिव आप विहूने ॥ एकजीव तीनों घर संगा । राहु केतु शशि सूर्य अनंगा ॥ जाप जपै और तीर्थ नहाई । परसै देवल देय सहाई ॥ जब जिव सत्य सुकृत पगपरशे । तब निज ज्योति अखंडितदरशे ॥ जब जीव आदि निरञ्जन दरशे । हीरामें ज्योति तत्वजसपरशे ॥ तासु भेद मैं कहां बनाई । असिले गगनरु श्रुधा छुडाई ॥ जब परिवा पूनमकी साथी । तब चंद्रहि ले आवहि बाँधी ॥ राहुकाल होइ जाय समाई । अमृत छोड़ि पीवै दुखदाई ॥

श्वासगुआर

( ३५ )

चन्द्रके सुगममें जीवहि आसे । ग्रहण लगाय शून्यमहँ फांसे ॥ राहु काल जिव चन्द्र समाई । विष तजि मृत होइ छुड़ाई ॥ इहि विधि राहु चन्द्र कह घेरे । गहन गरासि ज्ञान कह फेरे ॥ अमृत छोड़ि विष सङ्ग लगावै । ज्ञान गर्मी उपजे नहिं पावै ॥ इहि विधि सूर्यहि केतु गरासे । अमृत हरि विष तेज तरासे ॥ इहि विधि दोउ सतावै काला । ता सँग जीवहि करै बिहाला ॥ जब चन्दा कह राहु गरासै । करमकाल ब्याल होय फासै ॥ उग्र होत है थास विवेखै । शशि और सूर्य दोऊ घर देखै ॥ छांडि केतु आप घर आवै । अपने घरमहँ सूर्य समावै ॥ सुरंग तुरेपर बाहर जाई । सुखसागर महँ पैठि नहाई ॥ योग सन्ताइनके पग परशै । निर्मलज्योति अखण्डितदर्शै ॥ अमृत पीवे तेज बल पावै । पल पल पीवे बहुरिघर आवै ॥ आपुहि मह विष अछप छिपावै । बहु विधि अमी सुधारस पावै ॥ पल भीतर पल बाहर जाई । जीवका मूल परसि सुखहाई ॥ पुनि जो चले सूर्यकी श्वासा । पूरण तत्व तेज परकासा ॥ कबहुँ सूर्य चन्द्र घर जाई । चन्द्रहि लाभ सूर्य पछिताई ॥ ज्यों लगि रहै चन्द्रघर सूर। तब लगि अमी अमान हजुरा ॥ इहि विधि तत्व छानि जब आवै । विद्वत्पुरुष हो अधिक पढ़ावै ॥ चन्द्र सनेह जीव तब पावै । पावे जानि भव बहुरि न आवै ॥ शशि और सूर्यग्रहण जब होई । तब देखै तन भेद बिलोई ॥ ग्रहण आसि छांडि जब कूरा । तब घर आवै शशि और सूर। ॥ अपने अपने घर जब आवै । तब नहिं कोई तत्व गवावै ॥ एकके घर एक जब आवै । कोई जीते कोई तत्व गवावै ॥ ग्रहण आस होत जब जाने । तो शशि घरही सुरलै आने ॥ शशि घर आवै शशि घरजाई । अग्रवास बासै लौलाई ॥

( ३६ )

बोधसागर

पुडुपबास तिल राखै छाई । तबके बासना बाहर जाई ॥ पुडुपके भीतर बास रहाई । सोई बास बाहर महकाई ॥ बाहरते भीतर लै आवै । ताके भीतर आनि समावै ॥ ताते वासन बाहर जाई । तिलके भीतर है ठहराई ॥ तिलते वासन बाहर आवै । बाहरते जो भीतर समावै ॥ भीतर वेधि एक जब होई । बास तेलमो रहै समोई ॥ समय-तौ लगि वास बहुत विधि, ज्यों लगि परैना तेल । तेल लाज छाड़िके डारै, दुइ मिलि होय फुलेल ॥

चौपाई

बास तेल मई रहे समाई । तेल काड़ि नहिं बाहर जाई ॥ तेलके संग बास महकाई । बासके संग तेल रहु छाई ॥ समय-लहा बास जहाँ तेल रहु जहाँ तेल तहाँ बास । एकै संग दूनों बसौ, महकै वास सुवास ॥

चौपाई

इहि विधि रहै दोऊ इक ठाऊँ । एकै बासना एक सुभाऊ ॥ बाहर कहि जब अंग लगावै । दुहे प्रतिमाको रूप दिखावै ॥ सुरति फूल मन तिलकी खानी । नाम बास जीव तेल बसानी ॥ बाहर फूल भीतर फुलवारी । रवि शशि करै दोय रखवारी ॥ तिल फूले विखियाकी खानी । दिनफूले निशि गिरतनजानी ॥ ऐसो फूल कुत्रिम उपराजा । तत्त्व तैल सबमध्य विराजा ॥ सोई तत्त्व मो अन्न सनेहा । तत्त्वहि तत्त्व मिलै तिल देहा ॥ तिल औ फूल एक सम कियऊ । तेहि पाछै पुनि प्राण बसियऊ ॥ दुख दीयते निकसेउ तेल । फुल देह तजि भयऊ फुलेला ॥ यहि विधि गुरु शिष्य जो होई । मुक्ति पंथ पावै पुनि सोई ॥ धर्मदास यह अद्भुत बानी । कही विचारि सुकृत सहिदानी ॥

शवासुआर

( ३७ )

उत्पत्तिकी गति सब हम पाईं । परलैकी गति कहौ बुझाईं ॥ रक्षक भक्षक एकहि सङ्ग । कहौ विचारि दोऊको अङ्ग ॥ जब साहब शिवशक्ति बनाईं । सो तो गम्य सबै हम पाईं ॥ सो शिवशक्तिकालरचिराखा । दोनों अङ्गधरि प्रकटी भाखा ॥ कामरूप विष वाण बनाया । कला अनन्तधरि प्रकटी काया ॥ घर घर शिवशक्तीसुत नारी । विरह वियोगसोगसुख भारी ॥ नाना रूप रंग उपराजा । उपजनविनसनसुखदुखसाजा ॥ कुल व्यवहार सकुचऔं लाजा । नात गौत रस लीला साजा ॥ चारि खानि बानिधरि गाजा । चारि बर्ण औ शर्म उपराजा ॥ लाज वरन कूरी कुल काजू । योग्य यज्ञ व्रत दान समाजू ॥ संपत्ति बिपत्ति रंक औ राजा । अन्न वस्त्र माया उपराजा ॥ सब ऊपर मन आप विराजा । मनबसि होय सैर सब काजा ॥ मन इन्द्री मई भोग संयोगा । मनै स्वाद औ स्वाद वियोगा ॥ मनहरता मन करता सोगा । मने रोग औ दुखसुख भोगा ॥ मनते कोई और न दूजा । मनसाहब मन सेवक पूजा ॥ मन देवल मन प्रतिमा साजा । मनपूजा मन तीर्थ विराजा ॥ मन शिवभक्ती विरह अपारा । रुधिरबिन्दु मनसिरजनहारा ॥ मनै जियावन मरने हारा । मनहिअशुभशुभ कर्मव्योहारा ॥ कर्मा कर्म मनहिते होई । भोग करै भुगतावै सोई ॥ मन भर्मित मन चेतन हारा । चारि खानि मनखेल पसारा ॥ मनशीतल मन तेज अपारा । मनश्वासा मन बोलनि हारा ॥ समय-चन्द्र सूर्य संग मन वसे, शुभ अशुभ मन आहि । श्वासा श्वासा मन बसे, कहि बरण गुण ताहि ॥

चौपाई

खानि खानिमनहोयअसवारा । फैलि रहा मन अगम अपारा ॥

( ३८ )

बोधसागर

चारि खानि मन रहा समाई । चारि चक्र चढ़ि बोले आई ॥ रोम रोम मन रहा समाई । आपहि मारे आपहि खाई ॥ आपहि भिक्षुक आपहि दाता । आपहि ईश्वर आपु विधाता ॥ आपहि चोर आप रखवारा । आपहि रचे आप संहारा ॥ आपहि सीखै आप बिसरावै । आपहि मेटे आप बनावै ॥ आपहि अन्य आपडिठिहारा । आपहिज्योतिआपउजियारा ॥ आपहितिमिर आप अँधियारा । आपहि मासपक्ष व्यवहारा ॥ आप निरक्षर अक्षर होई । गुप्त प्रकट होय बोले सोई ॥ नानारङ्ग ज्योति दिखलावै । आदि अन्त मनमनहिसमावै ॥ मनही नाद शून्य महाँ बोले । मनही ज्योति शून्यमहाँ डोले ॥ मनही कह सब ध्यान लगावै । मनको अन्त न कोई पावै ॥ मनही शास्त्र वेद है चारी । तीनलोक मन कथा पसारी ॥ निर्गुण सगुण मनहीकी वाजी । कवी पुराण कोकमन साजी ॥ ब्रह्मज्ञान कथि मनहि सुनावै । आपु छिपाय दूसर दिखलावै ॥

समय-आदिअन्तमन कर्ता, चारि खानि मनबास ।

बन्द छोरि करी मोपै, कहू मन्त्र प्रकाश ॥

चौपाई

सुनहुँ संदेश हंसपति आगर । पुरुष पुराण हंसपति सागर ॥ सुरति पुरुष हंसनके नायक । ज्ञान अतृप्त सुनी चितलायक ॥ कहो अग्र आग्रकी खानी । कहो ज्ञान विज्ञान बखानी ॥ चार खानिके श्वासा जेती । कहो बिचारि चले दम तेती ॥ अचल खानिप्रथमहि विस्तारा । तेहि पाछे पिंडज अनुसारा ॥ तिसरे अण्डज खानि सचारा । चौथे ऊषमज रचा अपारा ॥ चारि खानिको रचना भारी । चारि खानि संगहि अनुसारि ॥ प्रथम खानि सतसुकृत कीन्हा । रचना रचे निरञ्जन लीन्हा ॥

श्वासगुप्कार

( ३९ )

प्रथम अक्षय वृक्ष प्रभु कीन्हां । अक्षय बट है ताकर छीन्हां ॥ आदि अन्त पिंडज अनुसारा । जाते जग शिवशक्ति सुधारा ॥ तिसरे अंडज अर्ध निवासा । जाते जग पंछी परकासा ॥ चौथी खानि अमीरज कौन्हा । तेहि संयम उषमजकर चीन्हा ॥ चारि खानिकी चारिज बानी । श्वासा नेह देह सहिदानी ॥ चारि खानि मह एकै श्वासा । कहुँ खंडित कहुँ पूर प्रकाशा ॥ अचल खानिकी श्वासा भारी । चालि तीस पांच अधिकारी ॥ गिनती सौ हजार औ लाखा । श्वासा अचल खानि महराखा ॥ चारि पहर चारिज जग भारी । तीनी पहर श्वासा अधिकारी ॥ एक पहर वह उनमुनि रहै । ताते काल न आतुर गहै ॥ तीन तत्त्वकी रचना भारी । अचल खानकी देह सुधारी ॥ धरती तत्त्व भास अस्थूला । जल औ तेज ताहि कर मूला ॥ बाँए आकाश नहिं रहिवासा । तातेजड अचल खानि परगासा ॥ तत्त्व बिहून देह अनुसार । ताते जड नहिं वचन उचारा ॥ गहन ग्रास होत नहिं ताही । ताते बहु विधि बाढत जाही ॥ जाको गहन गारसे काला । सौ नहिं बाढे बेलि बेहाला ॥ अचलखानि बहुभांति सँवारी । नाना रंग रूप अधिकारी ॥ कतहुँ छोट कतहुँ बड भारी । कतहुँ साय सरवन सुधारी ॥ एक सुक्षम है एक अस्थूला । एक अमृत एक विषकर मूला ॥ एक खात पलमह मरि जाई । एक खातकछु अवधि बढाई ॥ इक खट्टा इक कडुवा होई । एक मधुररस खावे सोई ॥ एक विसौइध विषके रूपा । नामशब्द गुण भेद अन्त्रपा ॥ पांच सदा औ पांचौ रोगा । पांचौ औषध पांचौ भोगा ॥ पांच वास और पांच कुबासा । पांच पचीस रंग परकासा ॥ पांच पानि पांचौ रहि बासा । पांच शुभ और पांचविश्वासा ॥

( ४० )

बोधसागर

पांच पांच सकल पसारा । पांच रंग श्वासा अनुसारा ॥ तीनि तत्त्व अस्थूल निवासा । तीनि मध्य दुई बाहर वासा ॥ पांच तत्त्व सब इनके पास । जहाँलिंगआपलखनि परकासा ॥ पांच तत्त्व तीन गुण साजा । नारि एक तामध्य विराजा ॥ अचल खानिमह कीन्हे वासा । तामध्ये श्वासा रहि वासा ॥ चन्द्र सूर्य बिन श्वासाहीनी । ताते खानि जड भई मसीनी ॥ अचल खानि ताते जड होई । सूर्य चन्द्र नहि मध्य समोई ॥ नारी एक श्वासा संग ताहां । जहाँलै अचलखानिजगमाहां ॥ नारिसुषुमण अचल घटबासा । ताहि संग श्वासा रहि वासा ॥ ता घट दोई नारी नहीं होई । ताते चन्द्र सूर्य नहि दोई ॥ इंगला पिंगला नाहिन बासा । ताते रवि शशि नाहि निवासा ॥ चन्द्र सूर्य घटके रखवारा । एहि डोले एहि बोलन हारा ॥ चन्द्र सूर्य बिन जागे नाहीं । ताते अचल खानि जगमाहीं ॥ दुई दिन कोई मास गलिजाई । कोई छ मास कोई वर्ष रहाई ॥ कोई दश वर्ष माह जग राते । कोई तीस चालिस तन बासे ॥ कोइ पचास साठि रहि वासा । कोइ सत्तरी कोई असी नेवासा ॥ वर्ष इकावन कोई तन राखा । कोइ सौ हजार कोइ लाखा ॥ कोइ कोटि कोइ अरब निवासा । कोइ पेड चारों युग बासा ॥ इहिविधि अचलखानिकरभावा । औषधि व्याधिरोग उपजावा ॥ एक सजीवन जड़ी अनूपा । एक जडी विश्व तेज सरूपा ॥

समय-कोई शीतल कोइ तेज है, कोइ पारसकी खानि ।

फूल विना फल ऊपजै, सब फलफूल समानि ॥

चौपाई

इहिविधि अचलखानिउपजावा । तेहि पाछे अंडज निरमावा ॥

अंडज खानि सजीवक कीन्हा । चन्द्र सूर्य सङ्ग जीवन दीन्हा ॥

शवासुञ्जार्

( ४१ )

नख शिख खचोप उपराजा । श्वासा सहज अर्थ धुनिगाजा ॥ दुह सूर्य एक सहज घर शुन्या । तिहिं घर कर्म पापनहिं पुन्या ॥ दुई घर इंगला पिंगलाभारी । चांद सूर्य संग जीव संचारी ॥ ताकी श्वासा शक्ति सुधारी । अमृत प्रसन्नसहज सुख भारी ॥ पाँच तत्त्व रथ साजी थारा । तापर चंद्र सूर्य असवारा ॥ ताके संग जीव उठि धावै । मन तरंग रूप उपजावै ॥ सुरंग तुरै पर होय असवारा । सूर्य स्नेह जाए चढ़ि पारा ॥ विषम सरोवर पहुँचे जाई । विष धारामें पैठि नहाई ॥ करि असनान ध्यान लौ लावै । धर्मराय कह माथ नवावै ॥ परसै राय निरंजन देवा । पल मल करै ज्योतिकर सेवा ॥ चरण परसि भरमत घर आवै । रविजीवहि विष आनि पिवावै ॥ रवि रथ रहै चन्द्र उठि धावै । तुरै लीला सरवर पहुँचावै ॥ जीवसहित शशि पहुँच्यो जाई । मान सरोवर पढ़ि नहाई ॥ करि असनान देवपग परशै । कामिनि देह कमलमहँ दरशै ॥ लेके वास चन्द्र घर आवै । घर आवत यम ग्रहण लगावै ॥ पल पल कमल कमल महनावै । अंडज खानि दर्श नहिं पावै ॥ परसै चरण सरोवर दोई । आवत जात न लागे कोई ॥ श्वासा नेह देह व्यवहारा । एक लाख औ सात हजार ॥ एतिक श्वासा अंडज खानी । करै कुलाहल बोले बानी ॥ तत्त्व चले जोजन एक दोई । झाझरि पाटन बसे बिलोई ॥ खाज अखाज विचारै नाहीं । भर्मत फिरै सदा भव माहीं ॥ पल धरती पल फिरै अकासा । जल थल महिँहफिरै उदासा ॥ कायाके बहु रूप सवारी । नानारंग वरन विष धारी ॥ चञ्चल कुटिल कला मनधरहीं । नाना बानि शब्द उच्चरहीं ॥ करै कल्पना जगमँह भारी । नाचै गावै करै खुमारी ॥

( ४२ )

बोधसागर

उड़ि अकाश तरुवर फलखाहीं । पानी उत्तरि पीवै जगमाहीं ॥ जो चन्दा घर चन्दा आवै । तो चन्दा सत्यलोक सिधावै ॥ मान सरोवर पैठि नहावै । विष तजि अमृत घर ले आवै ॥ पुष्प द्रौप होय फिरि घर आवै । पुष्प द्रौपमहँ जाय समावै ॥ एहि विधि चन्द्रग्रहणको देखे । चन्द्र अंशकी श्वास बिवेखे ॥ आयु अंश श्वासा महँ पावै । तो चन्दा नहि मूल गमावै ॥ अंश जो आयु घरहिफिरिआवै । पूरी तत्व सदा सुखपावै ॥ उग्रह होते सुरघर आवै । तादिन चंदा मूल गमावै ॥ एहि विधि सूर सतावे काला । ग्रहण गरासि करे जंजाला ॥ उग्रह होते श्वास विवेखे । शशि औ सुर दोऊ घर देखे ॥ जहाँ पीवै पानी सब आवै । तहाँ दूतलै फंदा लावै ॥ एक तरुवर बनलासा लावहि । एकजल पीत चुगत सँतावहि ॥ एक पींजरा महँ जीव आवहि । रामनाम कह सदा पढावहि ॥ एक अमृत मुक्ताफल खाही । एकजलाहारफलआनिअघाही ॥ एक जीव मारिकै करै अहारा । एक जीव जीवहि कर चारा ॥ एक जोने बल बजाये अधीना । एकउज्वलजल ज्योतिमलीना ॥ जीव एकमत बहुत अपारा । एकउज्वलजलज्योतिअपारा ॥ श्वासा तेजी ज्ञानगा देहा । काम कलाते बहुत सनेहा ॥ अंडज देह महाबल भारी । वचन बिचारि करै सब झारी ॥ शुभ औ अशुभ दुही हैं ताहीं । एक मधुर एक तेज सुहाहीं ॥ एक सुहावन वचन सुनावहि । एक अपावन सुनतन भावहि ॥ तीनलोक भरि रहा समार्ई । ज्ञान गुमान करे सेवकाई ॥ त्रिविध ज्ञान लीए तन डौले । ऋतुऋतु बिरहका लिपै बोले ॥ तेजहीन नाना दशा कीन्हार् । ताकर भेद न काहू चीन्हार् ॥

श्वासयुञ्जार

( ४३ )

समय-एक अधीन एक दारुण, एकलै एके खाय । वह बानी जगमों कहहि, सुनौ भेद चितलाय ॥

चौपाई

अण्डज कला अनन्त सुधारा । तेहि पीछै पिण्डज अनुसार ॥ कला अपार तत्व बहुरङ्ग । सिरजी पिण्डज भ्रमके सङ्ग ॥ पांचतत्व निश वासर सङ्ग । जाकर पहर ताहिके रङ्ग ॥ पाँचो पाँच तत्वके साथी । गाय भैंस घोडा और हाथी ॥ खर्च कंटनी छेरी खारी । चुहि चाही मंजारी पारी ॥ सो नहीं सुवरी कीनरी भाली । माली नौसी गही कङ्काली ॥ कहाँ लगी बरनौ बहुभाँती । मढ़ही ते नरकी उतपाती ॥ पांच तत्व सबहीके संग । श्वासाके सँग चले तुरंगा ॥ पाँचौं तत्व पाँच पुरजाहीं । प्रीत पाँच हैं छत्रके माहीं ॥ पाँच कुच पाँच मोकामा । पाँच सरोवर पाँचहि धामा ॥ पाँचै देवल पाँचै देवा । पाँचै करहि पाँच कर सेवा ॥ पाँचों मह सम पाँच उदासी । पाँचों पाँच शून्य अविनाशी ॥ पाँचों आवही पाँचौं जाहीं । पाँचौं पाँच महँ पाँच समाई ॥ पाँच शून्य पाँच अस्थूला । पाँचै पाँच पाँचकर मूला ॥ पाँचहि होयघर एकजो आवै । पाँच पाँच तबही समुझावै ॥ पाँचौं सात राइ होइ धावै । तिनहींके घर मंगल गावै ॥ पाँच तीन जब सात समावै । पंद्रह मेटि एक घर आवै ॥ पाँचहि तीन सात एक धारा । पाँचों नाद बजावन हारा ॥ पाँचौका है खेल अपारा । पाँचों करही एक विस्तारा ॥ पाँचौं दशके माँहि समाई । पाँचौं आवहि पाँचौं जाई ॥ भौर गुफा पाँचोंकर याना । बाजै ताल मृदंग बँधाना ॥ जब पाँचौं दशके घर जाई । तब दश पाँचहि आनि समाई ॥

( ४४ )

बोधसागर

जब दश पाँच गुफामहँ आवहि । मधुरी तान अर्धधुनिगावहि ॥ कोई घंटा कोह ताल बजावहि । कोई शंखनाद कोई झालरिलावहि ॥ कोई किंकिनिचिचिनिकिन्नरिवीना । कोई भेरिभृदंग औढोलसहीना ॥ कोई तारी कोई बेन बजावहि । रहसि रहसि नानागुणगावहि ॥ सारंग जल तरंग धुनिधारी । तबलाचहुँ ओरनरसिगाडफारी ॥ इहिविधि भोरगुफा धुनि गाजै । नानारंग मधुर धुनि बाजै ॥ बाजे बाजन होइ धुनि गाजा । बिछुली चमके मोहै राजा ॥ दश औ पाँच पचीस समावै । तब घरनी घरियार बजावै ॥ पांच पचीस दश दशहि समावै । गुफाके ऊपर सुरली बजावै ॥ बाजै सुरली कला अनन्ता । जागै कमला सो मैं मन्ता ॥ निर्झर झरे गुफाके द्वारा । रवि शशिपांचतत्त्वउजियारा ॥ श्वासा सार सहज घर वासा । रविशशि पांचतत्त्व परकाशा ॥ और गुफामहँ बाजन बाजै । रवि शशि श्वासासंयमगाजै ॥

समय-नाना बाजन बाजहीं, नानारंग अपार ।

मन औ जिव इक संगहीं, अविनाशीके द्वार ॥

चौपाई

मन नाचै पल लै औ गावै । आप नाचिके जिवहि नचावै ॥ जीव नचै अविनाशी आगे । मन जिव रहे सदा संगलागे ॥ आनंदधाम होत दिनराती । दीसे ज्योति दीवा बिखुबाती ॥ सुरली बाजै निर्झर झरे । नाडी सुषम मन्दिर भरे ॥ निर्भय सदा न जाति अजाती । निर्वश सदा न पूजा पाती ॥ स्वर्ग नर्क औ नदी है ताहाँ । ज्योति उजागर निर्गुण नाहाँ ॥ सरगुण निरगुण एके माहा । दीखै ज्योति निरंजन ताहा ॥ सात तीन पाँचों जब एका । दुइ घर वास एक घर ठेका ॥ उतरि गुफासे जब घर आवै । आपु आपु कहचहुँ दिश धावै ॥

श्वासगुप्कार

( ४५ )

पल घर आवै पल घर जाई । पांचतत्त्व संग सदा सहाई ॥ पांच तत्त्व श्वासा असवारा । फिरहिं शहरवार औ पारा ॥ जहाँ बाहर है शहर देवाला । तहाँ पांचो तुरै फिरै चौफाला ॥ ता ऊपर आतम चढ़ि धावै । पल बाहर पल भीतर आवै ॥ पांच तुरै श्वासा चढ़ि धावै । सरवर पांच परसि घर आवै ॥ सरवर पांच पांच तहाँ घाटा । गली एक पर्वत डुइ बाटा ॥ पांचौ तत्त्व चलै एक साथ । रविशशि श्वासा नाथ अनाथा ॥ पांचौ तत्त्व घर बाहर जाई । ता संग कमल हरी उमगाई ॥ जादिन पांच तत्त्व नहिं आवै । एक तत्त्व निश वासर धावै ॥ ता दिन पांच तत्त्व गुणपावै । लखै तुरै जो बाहर धावै ॥ बाहर चाल चलत गहि लेई । श्वास सुभाव बंद तहाँ देई ॥ एक तत्त्व निश वासर धावै । दुसरी तत्त्व संग नहिं लावै ॥ पांचौ तत्त्व चीन्हि जब पावै । जो बाहर चलै तासु गुणु पावै ॥ पांचौ तत्त्व जीव संग आवै । पल बाहर पल भीतर धावै ॥ ताकर पावै पांचों मोकामा । लेइ तत्त्व पांचोंके धामा ॥ पांचों पांच सरोवर जाहीं । अमी अमान विरह रसखाहीं ॥ दुई पुहुप सुख सागर परशै । अमी अंक सत्य सुकृतै दरशै ॥ तहाँ अमीरस पीवत अधाना । रवि शशि संग जीव निर्वाना ॥ उत्पति पारस तहवाँ पावै । ले पारस फिरि घरहि सिधावै ॥ द्वेमन विष एक मनहै अमाना । परसै आदि अन्त शहिदाना ॥ कालि काल जोति उजियारा । तहाँ एक नागिनवसे अपारा ॥ सो नागिन घर भीतर बासा । बाहर भीतर एक निवासा ॥ नख शिख बेधि रहा विष पूरा । श्वासा संयम शशि और सूरा ॥ पांचै तत्त्व रहो घट पाँचा । पांचहि साथ जीवकर साँचा ॥ रवि शशि श्वासा संग बसावै । उत्पति प्रलय गहन लगावै ॥

( ४६ )

बोधसागर

दुइ घर रवि शशि जीव बसावै । इक घर राहु केतु भच्छावै ॥ चारिउ चारि दिशा चलि जाई । फिर चारिऊ एकमाँह समाई ॥ दुइ झंझरी परशि फिरि आवै । दुइ फिरि झंझरी बाहर धावै ॥ घर आवत राखै अटकावै । राहु केतु दोई रहन लगावै ॥ जादिन पांच तत्त्व नहिं धावै । तादिन कालगहन नहिं लावै ॥ दुवो तुरै जा निकसे धाई । फोरी द्वारी बाहर जाई ॥ बाहर अमी अमान अमाया । उत्पति पारस नारी काया ॥ नारी नेह निरञ्जन काया । ताते शिव शक्ती उपजाया ॥ एहि निजबुझहु धरमन भाया । नाना वानी वरन बनाया ॥ शिवकाया पति सूर्य सनेहा । ऊगे चन्द्र शक्तिकी देहा ॥ शिवकी देह सूर्य प्रभु साजा । शक्ती देह चन्द्र है राजा ॥ रवि शशि पांच तत्त्वदइकाया । एक एक संग उपजे काया ॥ एकतत्त्व निश वासर धावै । जीवका मूल परोस सुखपावै ॥ जीव मूल पारस परवाना । लेउत्पति पारस जाय ठिकाना ॥ मन जिव तत्त्व एक चढि धावै । लै पारस अपने घर आवै ॥ पारस आनि जगावे कामा । बिरह बाण मारे संग्रामा ॥ दोई तत्त्व निर्वाण उजागर । दुइ घटशिवशक्ती मनि आगर ॥ पारस एक दुवोंकी काया । चंद्र सूर्य संगही उपजाया ॥ चंद्र उगै शक्तीकी देहा । चलै तत्त्व जलरंग सनेहा ॥ एक तत्त्व चंद्र घर धारा । सात रोज एकै व्यवहारा ॥ सात वार निश वासर धावै । पल पल बढै घटै नहिं पावै ॥ पारस परसि होइ जिव पूरा । शक्तीशशि घरशिव घरसुरा ॥ एकतत्त्व संग पारस पावै । राहु केतु नहिं गहन लगावै ॥ तत्त्व तार टूटै नहिं पावै । बिना सिधनी काल समावै ॥ एकै पेली एक जो धावै । तौ शक्ती नहिं पारस पावै ॥

शवासगुप्कार

( ४७ )

टूटे तार तत्वकी जबही । काल सन्धि पावै घट तबही ॥ टूटे तत्व होय दुख क्रा । चन्द्रहि पेली ऊगै घर सूर । ॥ धरि शशि सूर्य काल लै जाई । बांधि अकाश राखै विरमाई ॥ चन्द्र सूर्य आसा सहिदानी । पारस तत्व लेइ अस छानी ॥ पारस टूटत होय मलीना । निशवासर जीव काल अधीना ॥ पारस सङ्गहि लेइ निचोई । छांडि देइ जब जाने सोई ॥ छिन बाहर छिन भीतर धाया । जरामरण व्यापै आ माया ॥ एक तत्व सङ्ग सबै विगोई । एक तत्व उपजे सब कोई ॥ शिव घर सूर्य होय उजियारा । एक तत्व निश वासर धारा ॥ पारस परसि होय विधिधूरा । प्रेम प्रकाश ऊगै घट सूर । ॥ एकतत्व चलै रवि धारा । सूर्य सिंध घट तेज अपारा ॥ शक्ती देह चन्द्र रखवारा । चले तत्व जल रङ्ग अपारा ॥ एकतत्व निशवासर धावै । सातबार टूटे नहिं पावै ॥ एक समाधि रहत अस्थूला । तब शक्ती घट फूले फूला ॥ फूलत फूल तहां अकुलाई । मनबिकार तन रुधिर चलाई ॥ ताहि समै तन खीर समावै । शिव सनेह रचि काम जनावै ॥ ताहि समै शिवशक्ती परशै । रति रुचि अमी गर्भ तेहि द्रशै ॥ रहै गर्भ कामिनिकी देहा । उपजे जातक वरन सनेहा ॥ पुरुष देह शशि चलैजो धारा । कन्या उपजै कला अपारा ॥ सूर्य सनेह चलै जो धारा । उपजै कन्या कला अपारा ॥ सूर्य सनेह चलै जो धारा । उपजे सूरति सार कुमार । ॥ रहै गर्भ तब काया साजै । रुधिर मांस तिलतिल उपराजै ॥ पांच तत्व तीनों गुण मूला । तासों रचे गर्भ अस्थूला ॥ शिवके आस बांये स्वरूपा । शक्ती गहै जानिके रूपा ॥ शिवके रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मई जावन देई ॥

( ४८ )

बोधसागर

जावन जा मैं सांचा माहीं । थाका होय रुचिरके ताहीं ॥ तेहि थाककी रचना भारी । तीन लोककी विष सँवारी ॥ तीन लोककी जेतिक खानी । सो सब थाका माधि समानी ॥ उपजा थाका थाल सँवारी । गर्भभेद यह कहौ बिचारी ॥ थल थहाए माल निरमाया । महलहिके माहीं जलहि समाया ॥ जलके मध्य महल बनवाया । महलहिके मधि रचना लाया ॥ महलके बार धन वह छाजा । पवरि पगार बना दरवाजा ॥ सांचा अर्ज जरै नहि कबही । शोच मटिर चाहे सबही ॥ सांचा मांहिलोकदियोर सडारी । नख शिख शोभा सबै सुधारी ॥ तीनहि लोक रचा पलमाहीं । गढके गढ पति गासौ ताहीं ॥ प्रथमें सायर सात सुधारा । पर्वत अहुट रच्यो अधिकारा ॥ अठारह सहस्र बहतारि नारा । पांचतन्त्र सब साज सुधारा ॥ अठारह गंडा नदी बनाई । सब तरि नीर रहा पुनि छाई ॥ लोहू हान स्तंभ अस्थूला । बढे लिंग सवारे मूला ॥ आगे सवारे दुइ भुज दंडा । सात द्वीप द्वीप पुहमी नौ खंडा ॥ बहुरि सवारे दूनौ खम्भा । मदन महा बहल उपजे रम्भा ॥ नासिका चढाई मस्तक भारा । दुइकर जोरिकै निकासी धारा ॥ श्रवने नेत्र रुचि अर्ध बनाई । कीला कीला मधी नवाई ॥ नौमी कूटी दश गुफा बनाई । सात भँवर नौ नाल लगाई ॥ उत्तर मेरु सिरजा अस्थूला । सरवर माहि कमल बहु फूला ॥ नाभि माह नखशिख करलाई । फूला फूल बास घट छाई ॥ बाहर बास तन मांह समाई । सोई बास इन्द्री होय धाई ॥ इन्द्री रसना रङ्ग जनाई । लिंग जल हरिसे भूमि बनाई ॥ आठो अङ्ग रचा अस्थूला । शिवशक्ती दोउ सम तूला ॥ सोह अङ्ग शक्ती सोह अंगशीवा । शो एक एक सम नीवा ॥

शवासुगुप्कार

( ४९ )

नख शिख अंग एक अनुहारी । देह स्वभाव वचन दुह मारी ॥ शक्ति देह विरह अधिकारी । शिव आशिष शक्तिको चारी ॥ इहि विधि रचना रची बिलोई । गर्भ सनेह संपूरन सोई ॥ नखशिख रचा गर्भ अस्थाना । सात द्रौप नौखण्ड वखाना ॥ एक द्रौपमें सातों दीपा । सात सुकृत तेहिमाय समीपा ॥ प्रथमै गर्भ द्रौप उपजावा । ता ऊपर रचना बिलमावा ॥ एकद्रौप नौखण्ड बनावा । त्रिकुटी सात तहाँ निरमावा ॥ एक द्रौपमें सातों नाला । सातों कमल अधर दुहमाला ॥ सरवर सात कमल तहाँ साता । रंग पांच पांचौ उतपाता ॥ पांचके मध्यहि पांच रसीला । त्रिकुटीमध्य एकतहाँ कीला ॥ ता कीलामहँ कानी लागी । पौन सनेह आतमा जागी ॥ ता कीलामहँ लागी होरी । खूटा गाडि पवन झकझोरी ॥ ता खूटा महँ डोरि लगाई । मन पवना गहि राखु झुलाई ॥ झुलि मन पवन झुलावे चेरी । इक घर शून्य एक घर फेरी ॥ खूटा होय पवन झकझोरे । इंगला पिंगला सुषुमण जोरे ॥ रवि शशि मनपौना गहि जोरी । खूट न लागि सबनकी डोरी ॥ मेरे दंडपर खूटा गाडा । नदी तीन ता ऊपर बाडा ॥ खूटाकी बाई दिशि है गंगा । विमल शीतल बहे नीर तरंग्गा ॥ चन्द्र सनेही जिव जल परशै । सुरति स्वरूप धनी दिल दरशै ॥ तासु खूटाके दहिने अंगा । यमुना नदी बहै बहुरंग्गा ॥ कीर्ति नीर और पीत तुरंगा । लहर लाल तेज विष संग्गा ॥ तहाँ बसै सुर जीवके साथ । खल एक बयालिस हाथा ॥ कला अनंत रूप रस नाथा । सबै अर्थ नहि दीसै माथा ॥ बाढि नदी जो दोउ करारा । शीतल तेज बहै दोउ धारा ॥ तिसरी नदी है गुप्त प्रवाहा । नाजल थाह न होय अथाहा ॥

( ५० )

बोधसागर

खूँटा तर होय निकरी धारा । चली सरस्वती फोरि पगारा ॥ मध्य लहरि विषधार सखानी । गंगा यमुना मध्य समानी ॥ त्रिकुटी संगम भयउ मिलावा । मनही पवन लेत विरमावा ॥ भैंवरगुफा माधवकर थाना । बसै त्रिवेणी प्रयाग स्थाना ॥ त्रिवेणी तट वसै प्रयागा । जागत सोवै भाग अभाग ॥ गनि गंधर्व सुनि सबके थाना । सुरनर करै पैठि अस्नाना ॥ तैतिस कोटि देवगण नारी । किन्नर गुणी कंचनी भारी ॥ यक्ष यक्षनी देव कुमारी । नागसुता अप्सरा सुभारी ॥ चटि विमानसबकरिहैजोहारी । काया मध्य इहअदभुत भारी ॥ असुरपिशाचचारिखानिजुलाहल । त्रिवेणी तट करी कुलाहल ॥ यक्ष यक्ष असुर सब देवा । बसे ग्राम करै माधव सेवा ॥ तीन लोक जब जीव निवासा । सो सब करै त्रिवेणी बासा ॥ तेहि त्रिवेणी तट माधो देवा । सब मिलि करै ताहिकी सेवा ॥ तब प्रयाग होइ चटि प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥ देश देश गंगा फिरि आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बनाई ॥ जहां तहां जप ध्यान लगावै । योग्य यज्ञ व्रत प्राप्त नहावै ॥ ऋतु बसंत प्रयागहि धावहि । मकर महीना वजार लगावहि ॥ अरध उरध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥ गर्भमाहि सब युगति बनावा । तीनि कचहरि तहां बसावा ॥ जहां नदी संगम परवाना । तहैंवा रचा एक अस्थाना ॥ संगम बीच गुफाके तीरा । सातहि द्वार गुफामहैं बीरा ॥ एकद्वार होय शब्द सुधारे । एक द्वार होय रूप निहारे ॥ एक द्वार होय बास बसावै । एक द्वार होय अग्नि समावै ॥ एक द्वार होय खाद संवारे । एक द्वार होय न्याय निवारे ॥ एक द्वार होय नाद उचारै । सत्य सुकृतकी रहनि विचारे ॥

शवासुञ्जार

( ५१ )

सात नाल चौदह सुरभाऊ । सातों करहै एक सुभाऊ ॥ सातों सात शून्य मह वासा । सातों बसै गुफाके पास ॥ गुफाके मध्य कंदरा वासा । तहां सातों मिलि करै निवासा ॥ एतिक कुञ्ज द्रौपरी शोभा । आवागमन मोहमद लोभा ॥ कुञ्ज भँवरकी रचना भारी । शून्यसहज धुनिसकल सुधारी ॥ दुवहु नाल कैसे के सोरी । एक सुखवंकनाल मह जोरी ॥ अग्र नील अमरकी डोरी । शोभानाल होय विष रसघोरी ॥ कुञ्ज द्रौप रचि सुधर बनावा । नेह अमर पद क्षीर समावा ॥ सुधर द्रौप परनाभि सँवारा । नाभी मण्डल पौन किंवारा ॥ पौन घोर नाभी रस कीला । मध्य सरोंवर जंबू शीला ॥ जम्बु द्रौप यम करहि स्थाना । ताहि द्रौपमाहि जीव भुलाना ॥ नाभि द्रौप रचि कच्छ बनावा । इंद्री आसनको रंग सुभावा ॥ कच्छ कला निज द्रौप सुधारा । ऋतु वसन्त जावन विस्तारा ॥ कच्छ द्रौप काशी अस्थाना । नरनारी हि करै अस्नाना ॥ वरुणा असी गंगके तीरा । मनि कर्णिका निर्मल नीरा ॥ लिंग जलहरी माहि समाना । नर नारि पूजही धर ध्याना ॥ पूजहि कामिनी मंगल गावहि । रहसि रहसि लिंगही न्हवावहि ॥ अक्षत चंदन बिल्व चढावहि । धूप दीप दे तत्त्व लगावहि ॥ भामिनी भाव फूलरंग धरही । करि असनान बसन भुइधरही ॥ सोइ बसन नर नाटक माँही । काशी तेहि बसनकी छाँही ॥ सोइ बसनकी वास उडानी । योग भोग छलकी सहिदानी ॥ बसन कुसुम दल ध्वजा उडाई । कच्छ द्रौप शिव शिव शरनाई ॥ कच्छ द्रौप रचा रस कोपा । लिंग जलहरी घर घर रोपा ॥ कच्छ द्रौप शिवको अस्थाना । शक्तिमांहि शिव आप समाना ॥ शिवशक्ती रंग रूप रसीला । शिवसमान शक्ती गहि लीला ॥

( ५२ )

बोधसागर

गर्भ सनेह रचा जब द्वीपा । लिंग जलहली सदा समीपा ॥ कच्छद्वीप रचि पूरन कीन्हौ । पाछे पच्छ द्वीप पग दीहौ ॥ पच्छ द्वीप रचि रंग बढावा । रंग रोस है विरत स्वभावा ॥ प्लक्षद्वीप रचि पच्छ पसारा । प्लक्षद्वीप रचि गर्भ सुधारा ॥

समय-कच्छद्वीप तट पच्छद्वीप है, कच्छ प्लक्षकर भाव ।

दुनो द्वीप कर एक कला है, रंगरोष कर दाव ॥

पुक्षद्वीप रचि गर्भ संभारा । पाछे मानद्वीप विस्तारा ॥ पुक्षद्वीप बाहेर सुधारा । द्वीप ही कच्छप के द्वारा ॥ बारह द्वीप रचि पूरण कीन्हा । पाछे मीनद्वीप पग दीन्हा ॥ मीनद्वीप रस कंज अमाना । करहि कुलाहल द्वीप समाना ॥ मीन द्वीप रचि प्रगटी माया । पूरन भई गर्भ मई काया ॥ मीनद्वीप तनको व्यवहारा । चमकै चपल ज्योति उजियारा ॥ चली चिकुर चित्र बलवानी । दामिनि दमकै बलके बढानी ॥ मीनद्वीप मन मदन महीपा । सुख दुःख साँराग दीपा ॥ मीनद्वीप रचि पूरण कीन्हौ । पाछे सुधाद्वीप पग दीन्हौ ॥ मीनद्वीप सुख अमृत लीन्हौ । पाछे सुधाद्वीप पग दीन्हौ ॥ मीनद्वीप सुख अमृत नेहा । चक्र सुदर्शन द्वीप उरेहा ॥ सुदर्शनचक्र द्वीप निर्बाना । सुधा वारि सत्य शुक्तिहिसाना ॥ सुदर्शनद्वीप पति गुण आगर । परमानंद परम गुणसागर ॥ सातों द्वीप रचा निर्बाना । काया ब्रह्म भया बंधाना ॥ द्वीप सुधारी कमल परकासा । कमलबास प्रगटी चहुँ पासा ॥ प्रथमहि मकाद्वीप निरमावा । उमराव कमल तेहि माह बनावा ॥ उमर कमल मकरि कस जाना । लाख पंखुरी दलकी अनुपाना ॥ मकर तार डोरी तहां लागी । दरशे सुरति सदा अखुरागी ॥ दूजे पद्म द्वीप निरमावा । कमल कूर्म तेहि माँहि बनावा ॥