कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३४ )
बोधसागर
चंद्र सूर्य दोउ अमृत पावै । काल सहज संग बाण लगावै ॥
बाण लगाय श्रुधा लेइ छीनी । जहर देइ चिव बुद्धि मलीनी ॥
जीवहि सदा कालकी आसा । तजि अमृत विष करही आसा ॥
कालहि राहु केतु होइ आवै । कालहि चंद्रहि सूर्य सतावै ॥
कालहि अमृत जीवसों लेही । कालहि जल थल बाजी देही ॥
कालहि प्रहण असत है जाई । देह विष अमृत लेइ छुडाई ॥
कालहि आगे पाछे धावै । कालहि रचै काल बिगडावै ॥
कालहि चारि खानि रचि राखा । कालहि सब घट बोलै भाखा ॥
घट २ काल करै रखवारी । एक देह दुइ अंग सँवारी ॥
एकअंग चंद एक अंग सूर । श्वासा पारस हाल हजूर ॥
इकइस हजार छःसै श्वासा । इतने एक घरी परकाशा ॥
निशिवासर बीते युग चारी । देओं अंग श्वासा संचारी ॥
दश हजार आठसै भारी । श्वासा चंद्र रनेह सुधारी ॥
जेतिक श्वासा चंद्र सनेहा । तेतिक चलै सूर्य सँग नेहा ॥
दशहजार तीनसै घाटी । चले चन्द्र अरु सूर्यकी बाटी ॥
दुइ हजार दुइसै अधिकारा । ताको भेद एक विस्तारा ॥
मध्यद्वार सहजके जाई । ता सुन्नह मों रहै ठहराई ॥
बारईस हजार चारिसै ऊने । जाप जपे जिव आप विहूने ॥
एकजीव तीनों घर संगा । राहु केतु शशि सूर्य अनंगा ॥
जाप जपै और तीर्थ नहाई । परसै देवल देय सहाई ॥
जब जिव सत्य सुकृत पगपरशे । तब निज ज्योति अखंडितदरशे ॥
जब जीव आदि निरञ्जन दरशे । हीरामें ज्योति तत्वजसपरशे ॥
तासु भेद मैं कहां बनाई । असिले गगनरु श्रुधा छुडाई ॥
जब परिवा पूनमकी साथी । तब चंद्रहि ले आवहि बाँधी ॥
राहुकाल होइ जाय समाई । अमृत छोड़ि पीवै दुखदाई ॥
श्वासगुआर
( ३५ )
चन्द्रके सुगममें जीवहि आसे । ग्रहण लगाय शून्यमहँ फांसे ॥
राहु काल जिव चन्द्र समाई । विष तजि मृत होइ छुड़ाई ॥
इहि विधि राहु चन्द्र कह घेरे । गहन गरासि ज्ञान कह फेरे ॥
अमृत छोड़ि विष सङ्ग लगावै । ज्ञान गर्मी उपजे नहिं पावै ॥
इहि विधि सूर्यहि केतु गरासे । अमृत हरि विष तेज तरासे ॥
इहि विधि दोउ सतावै काला । ता सँग जीवहि करै बिहाला ॥
जब चन्दा कह राहु गरासै । करमकाल ब्याल होय फासै ॥
उग्र होत है थास विवेखै । शशि और सूर्य दोऊ घर देखै ॥
छांडि केतु आप घर आवै । अपने घरमहँ सूर्य समावै ॥
सुरंग तुरेपर बाहर जाई । सुखसागर महँ पैठि नहाई ॥
योग सन्ताइनके पग परशै । निर्मलज्योति अखण्डितदर्शै ॥
अमृत पीवे तेज बल पावै । पल पल पीवे बहुरिघर आवै ॥
आपुहि मह विष अछप छिपावै । बहु विधि अमी सुधारस पावै ॥
पल भीतर पल बाहर जाई । जीवका मूल परसि सुखहाई ॥
पुनि जो चले सूर्यकी श्वासा । पूरण तत्व तेज परकासा ॥
कबहुँ सूर्य चन्द्र घर जाई । चन्द्रहि लाभ सूर्य पछिताई ॥
ज्यों लगि रहै चन्द्रघर सूर। तब लगि अमी अमान हजुरा ॥
इहि विधि तत्व छानि जब आवै । विद्वत्पुरुष हो अधिक पढ़ावै ॥
चन्द्र सनेह जीव तब पावै । पावे जानि भव बहुरि न आवै ॥
शशि और सूर्यग्रहण जब होई । तब देखै तन भेद बिलोई ॥
ग्रहण आसि छांडि जब कूरा । तब घर आवै शशि और सूर। ॥
अपने अपने घर जब आवै । तब नहिं कोई तत्व गवावै ॥
एकके घर एक जब आवै । कोई जीते कोई तत्व गवावै ॥
ग्रहण आस होत जब जाने । तो शशि घरही सुरलै आने ॥
शशि घर आवै शशि घरजाई । अग्रवास बासै लौलाई ॥
( ३६ )
बोधसागर
पुडुपबास तिल राखै छाई । तबके बासना बाहर जाई ॥
पुडुपके भीतर बास रहाई । सोई बास बाहर महकाई ॥
बाहरते भीतर लै आवै । ताके भीतर आनि समावै ॥
ताते वासन बाहर जाई । तिलके भीतर है ठहराई ॥
तिलते वासन बाहर आवै । बाहरते जो भीतर समावै ॥
भीतर वेधि एक जब होई । बास तेलमो रहै समोई ॥
समय-तौ लगि वास बहुत विधि, ज्यों लगि परैना तेल ।
तेल लाज छाड़िके डारै, दुइ मिलि होय फुलेल ॥
चौपाई
बास तेल मई रहे समाई । तेल काड़ि नहिं बाहर जाई ॥
तेलके संग बास महकाई । बासके संग तेल रहु छाई ॥
समय-लहा बास जहाँ तेल रहु जहाँ तेल तहाँ बास ।
एकै संग दूनों बसौ, महकै वास सुवास ॥
चौपाई
इहि विधि रहै दोऊ इक ठाऊँ । एकै बासना एक सुभाऊ ॥
बाहर कहि जब अंग लगावै । दुहे प्रतिमाको रूप दिखावै ॥
सुरति फूल मन तिलकी खानी । नाम बास जीव तेल बसानी ॥
बाहर फूल भीतर फुलवारी । रवि शशि करै दोय रखवारी ॥
तिल फूले विखियाकी खानी । दिनफूले निशि गिरतनजानी ॥
ऐसो फूल कुत्रिम उपराजा । तत्त्व तैल सबमध्य विराजा ॥
सोई तत्त्व मो अन्न सनेहा । तत्त्वहि तत्त्व मिलै तिल देहा ॥
तिल औ फूल एक सम कियऊ । तेहि पाछै पुनि प्राण बसियऊ ॥
दुख दीयते निकसेउ तेल । फुल देह तजि भयऊ फुलेला ॥
यहि विधि गुरु शिष्य जो होई । मुक्ति पंथ पावै पुनि सोई ॥
धर्मदास यह अद्भुत बानी । कही विचारि सुकृत सहिदानी ॥
शवासुआर
( ३७ )
उत्पत्तिकी गति सब हम पाईं । परलैकी गति कहौ बुझाईं ॥
रक्षक भक्षक एकहि सङ्ग । कहौ विचारि दोऊको अङ्ग ॥
जब साहब शिवशक्ति बनाईं । सो तो गम्य सबै हम पाईं ॥
सो शिवशक्तिकालरचिराखा । दोनों अङ्गधरि प्रकटी भाखा ॥
कामरूप विष वाण बनाया । कला अनन्तधरि प्रकटी काया ॥
घर घर शिवशक्तीसुत नारी । विरह वियोगसोगसुख भारी ॥
नाना रूप रंग उपराजा । उपजनविनसनसुखदुखसाजा ॥
कुल व्यवहार सकुचऔं लाजा । नात गौत रस लीला साजा ॥
चारि खानि बानिधरि गाजा । चारि बर्ण औ शर्म उपराजा ॥
लाज वरन कूरी कुल काजू । योग्य यज्ञ व्रत दान समाजू ॥
संपत्ति बिपत्ति रंक औ राजा । अन्न वस्त्र माया उपराजा ॥
सब ऊपर मन आप विराजा । मनबसि होय सैर सब काजा ॥
मन इन्द्री मई भोग संयोगा । मनै स्वाद औ स्वाद वियोगा ॥
मनहरता मन करता सोगा । मने रोग औ दुखसुख भोगा ॥
मनते कोई और न दूजा । मनसाहब मन सेवक पूजा ॥
मन देवल मन प्रतिमा साजा । मनपूजा मन तीर्थ विराजा ॥
मन शिवभक्ती विरह अपारा । रुधिरबिन्दु मनसिरजनहारा ॥
मनै जियावन मरने हारा । मनहिअशुभशुभ कर्मव्योहारा ॥
कर्मा कर्म मनहिते होई । भोग करै भुगतावै सोई ॥
मन भर्मित मन चेतन हारा । चारि खानि मनखेल पसारा ॥
मनशीतल मन तेज अपारा । मनश्वासा मन बोलनि हारा ॥
समय-चन्द्र सूर्य संग मन वसे, शुभ अशुभ मन आहि ।
श्वासा श्वासा मन बसे, कहि बरण गुण ताहि ॥
चौपाई
खानि खानिमनहोयअसवारा । फैलि रहा मन अगम अपारा ॥
( ३८ )
बोधसागर
चारि खानि मन रहा समाई । चारि चक्र चढ़ि बोले आई ॥
रोम रोम मन रहा समाई । आपहि मारे आपहि खाई ॥
आपहि भिक्षुक आपहि दाता । आपहि ईश्वर आपु विधाता ॥
आपहि चोर आप रखवारा । आपहि रचे आप संहारा ॥
आपहि सीखै आप बिसरावै । आपहि मेटे आप बनावै ॥
आपहि अन्य आपडिठिहारा । आपहिज्योतिआपउजियारा ॥
आपहितिमिर आप अँधियारा । आपहि मासपक्ष व्यवहारा ॥
आप निरक्षर अक्षर होई । गुप्त प्रकट होय बोले सोई ॥
नानारङ्ग ज्योति दिखलावै । आदि अन्त मनमनहिसमावै ॥
मनही नाद शून्य महाँ बोले । मनही ज्योति शून्यमहाँ डोले ॥
मनही कह सब ध्यान लगावै । मनको अन्त न कोई पावै ॥
मनही शास्त्र वेद है चारी । तीनलोक मन कथा पसारी ॥
निर्गुण सगुण मनहीकी वाजी । कवी पुराण कोकमन साजी ॥
ब्रह्मज्ञान कथि मनहि सुनावै । आपु छिपाय दूसर दिखलावै ॥
समय-आदिअन्तमन कर्ता, चारि खानि मनबास ।
बन्द छोरि करी मोपै, कहू मन्त्र प्रकाश ॥
चौपाई
सुनहुँ संदेश हंसपति आगर । पुरुष पुराण हंसपति सागर ॥
सुरति पुरुष हंसनके नायक । ज्ञान अतृप्त सुनी चितलायक ॥
कहो अग्र आग्रकी खानी । कहो ज्ञान विज्ञान बखानी ॥
चार खानिके श्वासा जेती । कहो बिचारि चले दम तेती ॥
अचल खानिप्रथमहि विस्तारा । तेहि पाछे पिंडज अनुसारा ॥
तिसरे अण्डज खानि सचारा । चौथे ऊषमज रचा अपारा ॥
चारि खानिको रचना भारी । चारि खानि संगहि अनुसारि ॥
प्रथम खानि सतसुकृत कीन्हा । रचना रचे निरञ्जन लीन्हा ॥
श्वासगुप्कार
( ३९ )
प्रथम अक्षय वृक्ष प्रभु कीन्हां । अक्षय बट है ताकर छीन्हां ॥
आदि अन्त पिंडज अनुसारा । जाते जग शिवशक्ति सुधारा ॥
तिसरे अंडज अर्ध निवासा । जाते जग पंछी परकासा ॥
चौथी खानि अमीरज कौन्हा । तेहि संयम उषमजकर चीन्हा ॥
चारि खानिकी चारिज बानी । श्वासा नेह देह सहिदानी ॥
चारि खानि मह एकै श्वासा । कहुँ खंडित कहुँ पूर प्रकाशा ॥
अचल खानिकी श्वासा भारी । चालि तीस पांच अधिकारी ॥
गिनती सौ हजार औ लाखा । श्वासा अचल खानि महराखा ॥
चारि पहर चारिज जग भारी । तीनी पहर श्वासा अधिकारी ॥
एक पहर वह उनमुनि रहै । ताते काल न आतुर गहै ॥
तीन तत्त्वकी रचना भारी । अचल खानकी देह सुधारी ॥
धरती तत्त्व भास अस्थूला । जल औ तेज ताहि कर मूला ॥
बाँए आकाश नहिं रहिवासा । तातेजड अचल खानि परगासा ॥
तत्त्व बिहून देह अनुसार । ताते जड नहिं वचन उचारा ॥
गहन ग्रास होत नहिं ताही । ताते बहु विधि बाढत जाही ॥
जाको गहन गारसे काला । सौ नहिं बाढे बेलि बेहाला ॥
अचलखानि बहुभांति सँवारी । नाना रंग रूप अधिकारी ॥
कतहुँ छोट कतहुँ बड भारी । कतहुँ साय सरवन सुधारी ॥
एक सुक्षम है एक अस्थूला । एक अमृत एक विषकर मूला ॥
एक खात पलमह मरि जाई । एक खातकछु अवधि बढाई ॥
इक खट्टा इक कडुवा होई । एक मधुररस खावे सोई ॥
एक विसौइध विषके रूपा । नामशब्द गुण भेद अन्त्रपा ॥
पांच सदा औ पांचौ रोगा । पांचौ औषध पांचौ भोगा ॥
पांच वास और पांच कुबासा । पांच पचीस रंग परकासा ॥
पांच पानि पांचौ रहि बासा । पांच शुभ और पांचविश्वासा ॥
( ४० )
बोधसागर
पांच पांच सकल पसारा । पांच रंग श्वासा अनुसारा ॥
तीनि तत्त्व अस्थूल निवासा । तीनि मध्य दुई बाहर वासा ॥
पांच तत्त्व सब इनके पास । जहाँलिंगआपलखनि परकासा ॥
पांच तत्त्व तीन गुण साजा । नारि एक तामध्य विराजा ॥
अचल खानिमह कीन्हे वासा । तामध्ये श्वासा रहि वासा ॥
चन्द्र सूर्य बिन श्वासाहीनी । ताते खानि जड भई मसीनी ॥
अचल खानि ताते जड होई । सूर्य चन्द्र नहि मध्य समोई ॥
नारी एक श्वासा संग ताहां । जहाँलै अचलखानिजगमाहां ॥
नारिसुषुमण अचल घटबासा । ताहि संग श्वासा रहि वासा ॥
ता घट दोई नारी नहीं होई । ताते चन्द्र सूर्य नहि दोई ॥
इंगला पिंगला नाहिन बासा । ताते रवि शशि नाहि निवासा ॥
चन्द्र सूर्य घटके रखवारा । एहि डोले एहि बोलन हारा ॥
चन्द्र सूर्य बिन जागे नाहीं । ताते अचल खानि जगमाहीं ॥
दुई दिन कोई मास गलिजाई । कोई छ मास कोई वर्ष रहाई ॥
कोई दश वर्ष माह जग राते । कोई तीस चालिस तन बासे ॥
कोइ पचास साठि रहि वासा । कोइ सत्तरी कोई असी नेवासा ॥
वर्ष इकावन कोई तन राखा । कोइ सौ हजार कोइ लाखा ॥
कोइ कोटि कोइ अरब निवासा । कोइ पेड चारों युग बासा ॥
इहिविधि अचलखानिकरभावा । औषधि व्याधिरोग उपजावा ॥
एक सजीवन जड़ी अनूपा । एक जडी विश्व तेज सरूपा ॥
समय-कोई शीतल कोइ तेज है, कोइ पारसकी खानि ।
फूल विना फल ऊपजै, सब फलफूल समानि ॥
चौपाई
इहिविधि अचलखानिउपजावा । तेहि पाछे अंडज निरमावा ॥
अंडज खानि सजीवक कीन्हा । चन्द्र सूर्य सङ्ग जीवन दीन्हा ॥
शवासुञ्जार्
( ४१ )
नख शिख खचोप उपराजा । श्वासा सहज अर्थ धुनिगाजा ॥
दुह सूर्य एक सहज घर शुन्या । तिहिं घर कर्म पापनहिं पुन्या ॥
दुई घर इंगला पिंगलाभारी । चांद सूर्य संग जीव संचारी ॥
ताकी श्वासा शक्ति सुधारी । अमृत प्रसन्नसहज सुख भारी ॥
पाँच तत्त्व रथ साजी थारा । तापर चंद्र सूर्य असवारा ॥
ताके संग जीव उठि धावै । मन तरंग रूप उपजावै ॥
सुरंग तुरै पर होय असवारा । सूर्य स्नेह जाए चढ़ि पारा ॥
विषम सरोवर पहुँचे जाई । विष धारामें पैठि नहाई ॥
करि असनान ध्यान लौ लावै । धर्मराय कह माथ नवावै ॥
परसै राय निरंजन देवा । पल मल करै ज्योतिकर सेवा ॥
चरण परसि भरमत घर आवै । रविजीवहि विष आनि पिवावै ॥
रवि रथ रहै चन्द्र उठि धावै । तुरै लीला सरवर पहुँचावै ॥
जीवसहित शशि पहुँच्यो जाई । मान सरोवर पढ़ि नहाई ॥
करि असनान देवपग परशै । कामिनि देह कमलमहँ दरशै ॥
लेके वास चन्द्र घर आवै । घर आवत यम ग्रहण लगावै ॥
पल पल कमल कमल महनावै । अंडज खानि दर्श नहिं पावै ॥
परसै चरण सरोवर दोई । आवत जात न लागे कोई ॥
श्वासा नेह देह व्यवहारा । एक लाख औ सात हजार ॥
एतिक श्वासा अंडज खानी । करै कुलाहल बोले बानी ॥
तत्त्व चले जोजन एक दोई । झाझरि पाटन बसे बिलोई ॥
खाज अखाज विचारै नाहीं । भर्मत फिरै सदा भव माहीं ॥
पल धरती पल फिरै अकासा । जल थल महिँहफिरै उदासा ॥
कायाके बहु रूप सवारी । नानारंग वरन विष धारी ॥
चञ्चल कुटिल कला मनधरहीं । नाना बानि शब्द उच्चरहीं ॥
करै कल्पना जगमँह भारी । नाचै गावै करै खुमारी ॥
( ४२ )
बोधसागर
उड़ि अकाश तरुवर फलखाहीं । पानी उत्तरि पीवै जगमाहीं ॥
जो चन्दा घर चन्दा आवै । तो चन्दा सत्यलोक सिधावै ॥
मान सरोवर पैठि नहावै । विष तजि अमृत घर ले आवै ॥
पुष्प द्रौप होय फिरि घर आवै । पुष्प द्रौपमहँ जाय समावै ॥
एहि विधि चन्द्रग्रहणको देखे । चन्द्र अंशकी श्वास बिवेखे ॥
आयु अंश श्वासा महँ पावै । तो चन्दा नहि मूल गमावै ॥
अंश जो आयु घरहिफिरिआवै । पूरी तत्व सदा सुखपावै ॥
उग्रह होते सुरघर आवै । तादिन चंदा मूल गमावै ॥
एहि विधि सूर सतावे काला । ग्रहण गरासि करे जंजाला ॥
उग्रह होते श्वास विवेखे । शशि औ सुर दोऊ घर देखे ॥
जहाँ पीवै पानी सब आवै । तहाँ दूतलै फंदा लावै ॥
एक तरुवर बनलासा लावहि । एकजल पीत चुगत सँतावहि ॥
एक पींजरा महँ जीव आवहि । रामनाम कह सदा पढावहि ॥
एक अमृत मुक्ताफल खाही । एकजलाहारफलआनिअघाही ॥
एक जीव मारिकै करै अहारा । एक जीव जीवहि कर चारा ॥
एक जोने बल बजाये अधीना । एकउज्वलजल ज्योतिमलीना ॥
जीव एकमत बहुत अपारा । एकउज्वलजलज्योतिअपारा ॥
श्वासा तेजी ज्ञानगा देहा । काम कलाते बहुत सनेहा ॥
अंडज देह महाबल भारी । वचन बिचारि करै सब झारी ॥
शुभ औ अशुभ दुही हैं ताहीं । एक मधुर एक तेज सुहाहीं ॥
एक सुहावन वचन सुनावहि । एक अपावन सुनतन भावहि ॥
तीनलोक भरि रहा समार्ई । ज्ञान गुमान करे सेवकाई ॥
त्रिविध ज्ञान लीए तन डौले । ऋतुऋतु बिरहका लिपै बोले ॥
तेजहीन नाना दशा कीन्हार् । ताकर भेद न काहू चीन्हार् ॥
श्वासयुञ्जार
( ४३ )
समय-एक अधीन एक दारुण, एकलै एके खाय ।
वह बानी जगमों कहहि, सुनौ भेद चितलाय ॥
चौपाई
अण्डज कला अनन्त सुधारा । तेहि पीछै पिण्डज अनुसार ॥
कला अपार तत्व बहुरङ्ग । सिरजी पिण्डज भ्रमके सङ्ग ॥
पांचतत्व निश वासर सङ्ग । जाकर पहर ताहिके रङ्ग ॥
पाँचो पाँच तत्वके साथी । गाय भैंस घोडा और हाथी ॥
खर्च कंटनी छेरी खारी । चुहि चाही मंजारी पारी ॥
सो नहीं सुवरी कीनरी भाली । माली नौसी गही कङ्काली ॥
कहाँ लगी बरनौ बहुभाँती । मढ़ही ते नरकी उतपाती ॥
पांच तत्व सबहीके संग । श्वासाके सँग चले तुरंगा ॥
पाँचौं तत्व पाँच पुरजाहीं । प्रीत पाँच हैं छत्रके माहीं ॥
पाँच कुच पाँच मोकामा । पाँच सरोवर पाँचहि धामा ॥
पाँचै देवल पाँचै देवा । पाँचै करहि पाँच कर सेवा ॥
पाँचों मह सम पाँच उदासी । पाँचों पाँच शून्य अविनाशी ॥
पाँचों आवही पाँचौं जाहीं । पाँचौं पाँच महँ पाँच समाई ॥
पाँच शून्य पाँच अस्थूला । पाँचै पाँच पाँचकर मूला ॥
पाँचहि होयघर एकजो आवै । पाँच पाँच तबही समुझावै ॥
पाँचौं सात राइ होइ धावै । तिनहींके घर मंगल गावै ॥
पाँच तीन जब सात समावै । पंद्रह मेटि एक घर आवै ॥
पाँचहि तीन सात एक धारा । पाँचों नाद बजावन हारा ॥
पाँचौका है खेल अपारा । पाँचों करही एक विस्तारा ॥
पाँचौं दशके माँहि समाई । पाँचौं आवहि पाँचौं जाई ॥
भौर गुफा पाँचोंकर याना । बाजै ताल मृदंग बँधाना ॥
जब पाँचौं दशके घर जाई । तब दश पाँचहि आनि समाई ॥
( ४४ )
बोधसागर
जब दश पाँच गुफामहँ आवहि । मधुरी तान अर्धधुनिगावहि ॥
कोई घंटा कोह ताल बजावहि । कोई शंखनाद कोई झालरिलावहि ॥
कोई किंकिनिचिचिनिकिन्नरिवीना । कोई भेरिभृदंग औढोलसहीना ॥
कोई तारी कोई बेन बजावहि । रहसि रहसि नानागुणगावहि ॥
सारंग जल तरंग धुनिधारी । तबलाचहुँ ओरनरसिगाडफारी ॥
इहिविधि भोरगुफा धुनि गाजै । नानारंग मधुर धुनि बाजै ॥
बाजे बाजन होइ धुनि गाजा । बिछुली चमके मोहै राजा ॥
दश औ पाँच पचीस समावै । तब घरनी घरियार बजावै ॥
पांच पचीस दश दशहि समावै । गुफाके ऊपर सुरली बजावै ॥
बाजै सुरली कला अनन्ता । जागै कमला सो मैं मन्ता ॥
निर्झर झरे गुफाके द्वारा । रवि शशिपांचतत्त्वउजियारा ॥
श्वासा सार सहज घर वासा । रविशशि पांचतत्त्व परकाशा ॥
और गुफामहँ बाजन बाजै । रवि शशि श्वासासंयमगाजै ॥
समय-नाना बाजन बाजहीं, नानारंग अपार ।
मन औ जिव इक संगहीं, अविनाशीके द्वार ॥
चौपाई
मन नाचै पल लै औ गावै । आप नाचिके जिवहि नचावै ॥
जीव नचै अविनाशी आगे । मन जिव रहे सदा संगलागे ॥
आनंदधाम होत दिनराती । दीसे ज्योति दीवा बिखुबाती ॥
सुरली बाजै निर्झर झरे । नाडी सुषम मन्दिर भरे ॥
निर्भय सदा न जाति अजाती । निर्वश सदा न पूजा पाती ॥
स्वर्ग नर्क औ नदी है ताहाँ । ज्योति उजागर निर्गुण नाहाँ ॥
सरगुण निरगुण एके माहा । दीखै ज्योति निरंजन ताहा ॥
सात तीन पाँचों जब एका । दुइ घर वास एक घर ठेका ॥
उतरि गुफासे जब घर आवै । आपु आपु कहचहुँ दिश धावै ॥
श्वासगुप्कार
( ४५ )
पल घर आवै पल घर जाई । पांचतत्त्व संग सदा सहाई ॥
पांच तत्त्व श्वासा असवारा । फिरहिं शहरवार औ पारा ॥
जहाँ बाहर है शहर देवाला । तहाँ पांचो तुरै फिरै चौफाला ॥
ता ऊपर आतम चढ़ि धावै । पल बाहर पल भीतर आवै ॥
पांच तुरै श्वासा चढ़ि धावै । सरवर पांच परसि घर आवै ॥
सरवर पांच पांच तहाँ घाटा । गली एक पर्वत डुइ बाटा ॥
पांचौ तत्त्व चलै एक साथ । रविशशि श्वासा नाथ अनाथा ॥
पांचौ तत्त्व घर बाहर जाई । ता संग कमल हरी उमगाई ॥
जादिन पांच तत्त्व नहिं आवै । एक तत्त्व निश वासर धावै ॥
ता दिन पांच तत्त्व गुणपावै । लखै तुरै जो बाहर धावै ॥
बाहर चाल चलत गहि लेई । श्वास सुभाव बंद तहाँ देई ॥
एक तत्त्व निश वासर धावै । दुसरी तत्त्व संग नहिं लावै ॥
पांचौ तत्त्व चीन्हि जब पावै । जो बाहर चलै तासु गुणु पावै ॥
पांचौ तत्त्व जीव संग आवै । पल बाहर पल भीतर धावै ॥
ताकर पावै पांचों मोकामा । लेइ तत्त्व पांचोंके धामा ॥
पांचों पांच सरोवर जाहीं । अमी अमान विरह रसखाहीं ॥
दुई पुहुप सुख सागर परशै । अमी अंक सत्य सुकृतै दरशै ॥
तहाँ अमीरस पीवत अधाना । रवि शशि संग जीव निर्वाना ॥
उत्पति पारस तहवाँ पावै । ले पारस फिरि घरहि सिधावै ॥
द्वेमन विष एक मनहै अमाना । परसै आदि अन्त शहिदाना ॥
कालि काल जोति उजियारा । तहाँ एक नागिनवसे अपारा ॥
सो नागिन घर भीतर बासा । बाहर भीतर एक निवासा ॥
नख शिख बेधि रहा विष पूरा । श्वासा संयम शशि और सूरा ॥
पांचै तत्त्व रहो घट पाँचा । पांचहि साथ जीवकर साँचा ॥
रवि शशि श्वासा संग बसावै । उत्पति प्रलय गहन लगावै ॥
( ४६ )
बोधसागर
दुइ घर रवि शशि जीव बसावै । इक घर राहु केतु भच्छावै ॥
चारिउ चारि दिशा चलि जाई । फिर चारिऊ एकमाँह समाई ॥
दुइ झंझरी परशि फिरि आवै । दुइ फिरि झंझरी बाहर धावै ॥
घर आवत राखै अटकावै । राहु केतु दोई रहन लगावै ॥
जादिन पांच तत्त्व नहिं धावै । तादिन कालगहन नहिं लावै ॥
दुवो तुरै जा निकसे धाई । फोरी द्वारी बाहर जाई ॥
बाहर अमी अमान अमाया । उत्पति पारस नारी काया ॥
नारी नेह निरञ्जन काया । ताते शिव शक्ती उपजाया ॥
एहि निजबुझहु धरमन भाया । नाना वानी वरन बनाया ॥
शिवकाया पति सूर्य सनेहा । ऊगे चन्द्र शक्तिकी देहा ॥
शिवकी देह सूर्य प्रभु साजा । शक्ती देह चन्द्र है राजा ॥
रवि शशि पांच तत्त्वदइकाया । एक एक संग उपजे काया ॥
एकतत्त्व निश वासर धावै । जीवका मूल परोस सुखपावै ॥
जीव मूल पारस परवाना । लेउत्पति पारस जाय ठिकाना ॥
मन जिव तत्त्व एक चढि धावै । लै पारस अपने घर आवै ॥
पारस आनि जगावे कामा । बिरह बाण मारे संग्रामा ॥
दोई तत्त्व निर्वाण उजागर । दुइ घटशिवशक्ती मनि आगर ॥
पारस एक दुवोंकी काया । चंद्र सूर्य संगही उपजाया ॥
चंद्र उगै शक्तीकी देहा । चलै तत्त्व जलरंग सनेहा ॥
एक तत्त्व चंद्र घर धारा । सात रोज एकै व्यवहारा ॥
सात वार निश वासर धावै । पल पल बढै घटै नहिं पावै ॥
पारस परसि होइ जिव पूरा । शक्तीशशि घरशिव घरसुरा ॥
एकतत्त्व संग पारस पावै । राहु केतु नहिं गहन लगावै ॥
तत्त्व तार टूटै नहिं पावै । बिना सिधनी काल समावै ॥
एकै पेली एक जो धावै । तौ शक्ती नहिं पारस पावै ॥
शवासगुप्कार
( ४७ )
टूटे तार तत्वकी जबही । काल सन्धि पावै घट तबही ॥
टूटे तत्व होय दुख क्रा । चन्द्रहि पेली ऊगै घर सूर । ॥
धरि शशि सूर्य काल लै जाई । बांधि अकाश राखै विरमाई ॥
चन्द्र सूर्य आसा सहिदानी । पारस तत्व लेइ अस छानी ॥
पारस टूटत होय मलीना । निशवासर जीव काल अधीना ॥
पारस सङ्गहि लेइ निचोई । छांडि देइ जब जाने सोई ॥
छिन बाहर छिन भीतर धाया । जरामरण व्यापै आ माया ॥
एक तत्व सङ्ग सबै विगोई । एक तत्व उपजे सब कोई ॥
शिव घर सूर्य होय उजियारा । एक तत्व निश वासर धारा ॥
पारस परसि होय विधिधूरा । प्रेम प्रकाश ऊगै घट सूर । ॥
एकतत्व चलै रवि धारा । सूर्य सिंध घट तेज अपारा ॥
शक्ती देह चन्द्र रखवारा । चले तत्व जल रङ्ग अपारा ॥
एकतत्व निशवासर धावै । सातबार टूटे नहिं पावै ॥
एक समाधि रहत अस्थूला । तब शक्ती घट फूले फूला ॥
फूलत फूल तहां अकुलाई । मनबिकार तन रुधिर चलाई ॥
ताहि समै तन खीर समावै । शिव सनेह रचि काम जनावै ॥
ताहि समै शिवशक्ती परशै । रति रुचि अमी गर्भ तेहि द्रशै ॥
रहै गर्भ कामिनिकी देहा । उपजे जातक वरन सनेहा ॥
पुरुष देह शशि चलैजो धारा । कन्या उपजै कला अपारा ॥
सूर्य सनेह चलै जो धारा । उपजै कन्या कला अपारा ॥
सूर्य सनेह चलै जो धारा । उपजे सूरति सार कुमार । ॥
रहै गर्भ तब काया साजै । रुधिर मांस तिलतिल उपराजै ॥
पांच तत्व तीनों गुण मूला । तासों रचे गर्भ अस्थूला ॥
शिवके आस बांये स्वरूपा । शक्ती गहै जानिके रूपा ॥
शिवके रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मई जावन देई ॥
( ४८ )
बोधसागर
जावन जा मैं सांचा माहीं । थाका होय रुचिरके ताहीं ॥
तेहि थाककी रचना भारी । तीन लोककी विष सँवारी ॥
तीन लोककी जेतिक खानी । सो सब थाका माधि समानी ॥
उपजा थाका थाल सँवारी । गर्भभेद यह कहौ बिचारी ॥
थल थहाए माल निरमाया । महलहिके माहीं जलहि समाया ॥
जलके मध्य महल बनवाया । महलहिके मधि रचना लाया ॥
महलके बार धन वह छाजा । पवरि पगार बना दरवाजा ॥
सांचा अर्ज जरै नहि कबही । शोच मटिर चाहे सबही ॥
सांचा मांहिलोकदियोर सडारी । नख शिख शोभा सबै सुधारी ॥
तीनहि लोक रचा पलमाहीं । गढके गढ पति गासौ ताहीं ॥
प्रथमें सायर सात सुधारा । पर्वत अहुट रच्यो अधिकारा ॥
अठारह सहस्र बहतारि नारा । पांचतन्त्र सब साज सुधारा ॥
अठारह गंडा नदी बनाई । सब तरि नीर रहा पुनि छाई ॥
लोहू हान स्तंभ अस्थूला । बढे लिंग सवारे मूला ॥
आगे सवारे दुइ भुज दंडा । सात द्वीप द्वीप पुहमी नौ खंडा ॥
बहुरि सवारे दूनौ खम्भा । मदन महा बहल उपजे रम्भा ॥
नासिका चढाई मस्तक भारा । दुइकर जोरिकै निकासी धारा ॥
श्रवने नेत्र रुचि अर्ध बनाई । कीला कीला मधी नवाई ॥
नौमी कूटी दश गुफा बनाई । सात भँवर नौ नाल लगाई ॥
उत्तर मेरु सिरजा अस्थूला । सरवर माहि कमल बहु फूला ॥
नाभि माह नखशिख करलाई । फूला फूल बास घट छाई ॥
बाहर बास तन मांह समाई । सोई बास इन्द्री होय धाई ॥
इन्द्री रसना रङ्ग जनाई । लिंग जल हरिसे भूमि बनाई ॥
आठो अङ्ग रचा अस्थूला । शिवशक्ती दोउ सम तूला ॥
सोह अङ्ग शक्ती सोह अंगशीवा । शो एक एक सम नीवा ॥
शवासुगुप्कार
( ४९ )
नख शिख अंग एक अनुहारी । देह स्वभाव वचन दुह मारी ॥
शक्ति देह विरह अधिकारी । शिव आशिष शक्तिको चारी ॥
इहि विधि रचना रची बिलोई । गर्भ सनेह संपूरन सोई ॥
नखशिख रचा गर्भ अस्थाना । सात द्रौप नौखण्ड वखाना ॥
एक द्रौपमें सातों दीपा । सात सुकृत तेहिमाय समीपा ॥
प्रथमै गर्भ द्रौप उपजावा । ता ऊपर रचना बिलमावा ॥
एकद्रौप नौखण्ड बनावा । त्रिकुटी सात तहाँ निरमावा ॥
एक द्रौपमें सातों नाला । सातों कमल अधर दुहमाला ॥
सरवर सात कमल तहाँ साता । रंग पांच पांचौ उतपाता ॥
पांचके मध्यहि पांच रसीला । त्रिकुटीमध्य एकतहाँ कीला ॥
ता कीलामहँ कानी लागी । पौन सनेह आतमा जागी ॥
ता कीलामहँ लागी होरी । खूटा गाडि पवन झकझोरी ॥
ता खूटा महँ डोरि लगाई । मन पवना गहि राखु झुलाई ॥
झुलि मन पवन झुलावे चेरी । इक घर शून्य एक घर फेरी ॥
खूटा होय पवन झकझोरे । इंगला पिंगला सुषुमण जोरे ॥
रवि शशि मनपौना गहि जोरी । खूट न लागि सबनकी डोरी ॥
मेरे दंडपर खूटा गाडा । नदी तीन ता ऊपर बाडा ॥
खूटाकी बाई दिशि है गंगा । विमल शीतल बहे नीर तरंग्गा ॥
चन्द्र सनेही जिव जल परशै । सुरति स्वरूप धनी दिल दरशै ॥
तासु खूटाके दहिने अंगा । यमुना नदी बहै बहुरंग्गा ॥
कीर्ति नीर और पीत तुरंगा । लहर लाल तेज विष संग्गा ॥
तहाँ बसै सुर जीवके साथ । खल एक बयालिस हाथा ॥
कला अनंत रूप रस नाथा । सबै अर्थ नहि दीसै माथा ॥
बाढि नदी जो दोउ करारा । शीतल तेज बहै दोउ धारा ॥
तिसरी नदी है गुप्त प्रवाहा । नाजल थाह न होय अथाहा ॥
( ५० )
बोधसागर
खूँटा तर होय निकरी धारा । चली सरस्वती फोरि पगारा ॥
मध्य लहरि विषधार सखानी । गंगा यमुना मध्य समानी ॥
त्रिकुटी संगम भयउ मिलावा । मनही पवन लेत विरमावा ॥
भैंवरगुफा माधवकर थाना । बसै त्रिवेणी प्रयाग स्थाना ॥
त्रिवेणी तट वसै प्रयागा । जागत सोवै भाग अभाग ॥
गनि गंधर्व सुनि सबके थाना । सुरनर करै पैठि अस्नाना ॥
तैतिस कोटि देवगण नारी । किन्नर गुणी कंचनी भारी ॥
यक्ष यक्षनी देव कुमारी । नागसुता अप्सरा सुभारी ॥
चटि विमानसबकरिहैजोहारी । काया मध्य इहअदभुत भारी ॥
असुरपिशाचचारिखानिजुलाहल । त्रिवेणी तट करी कुलाहल ॥
यक्ष यक्ष असुर सब देवा । बसे ग्राम करै माधव सेवा ॥
तीन लोक जब जीव निवासा । सो सब करै त्रिवेणी बासा ॥
तेहि त्रिवेणी तट माधो देवा । सब मिलि करै ताहिकी सेवा ॥
तब प्रयाग होइ चटि प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥
देश देश गंगा फिरि आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बनाई ॥
जहां तहां जप ध्यान लगावै । योग्य यज्ञ व्रत प्राप्त नहावै ॥
ऋतु बसंत प्रयागहि धावहि । मकर महीना वजार लगावहि ॥
अरध उरध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥
गर्भमाहि सब युगति बनावा । तीनि कचहरि तहां बसावा ॥
जहां नदी संगम परवाना । तहैंवा रचा एक अस्थाना ॥
संगम बीच गुफाके तीरा । सातहि द्वार गुफामहैं बीरा ॥
एकद्वार होय शब्द सुधारे । एक द्वार होय रूप निहारे ॥
एक द्वार होय बास बसावै । एक द्वार होय अग्नि समावै ॥
एक द्वार होय खाद संवारे । एक द्वार होय न्याय निवारे ॥
एक द्वार होय नाद उचारै । सत्य सुकृतकी रहनि विचारे ॥
शवासुञ्जार
( ५१ )
सात नाल चौदह सुरभाऊ । सातों करहै एक सुभाऊ ॥
सातों सात शून्य मह वासा । सातों बसै गुफाके पास ॥
गुफाके मध्य कंदरा वासा । तहां सातों मिलि करै निवासा ॥
एतिक कुञ्ज द्रौपरी शोभा । आवागमन मोहमद लोभा ॥
कुञ्ज भँवरकी रचना भारी । शून्यसहज धुनिसकल सुधारी ॥
दुवहु नाल कैसे के सोरी । एक सुखवंकनाल मह जोरी ॥
अग्र नील अमरकी डोरी । शोभानाल होय विष रसघोरी ॥
कुञ्ज द्रौप रचि सुधर बनावा । नेह अमर पद क्षीर समावा ॥
सुधर द्रौप परनाभि सँवारा । नाभी मण्डल पौन किंवारा ॥
पौन घोर नाभी रस कीला । मध्य सरोंवर जंबू शीला ॥
जम्बु द्रौप यम करहि स्थाना । ताहि द्रौपमाहि जीव भुलाना ॥
नाभि द्रौप रचि कच्छ बनावा । इंद्री आसनको रंग सुभावा ॥
कच्छ कला निज द्रौप सुधारा । ऋतु वसन्त जावन विस्तारा ॥
कच्छ द्रौप काशी अस्थाना । नरनारी हि करै अस्नाना ॥
वरुणा असी गंगके तीरा । मनि कर्णिका निर्मल नीरा ॥
लिंग जलहरी माहि समाना । नर नारि पूजही धर ध्याना ॥
पूजहि कामिनी मंगल गावहि । रहसि रहसि लिंगही न्हवावहि ॥
अक्षत चंदन बिल्व चढावहि । धूप दीप दे तत्त्व लगावहि ॥
भामिनी भाव फूलरंग धरही । करि असनान बसन भुइधरही ॥
सोइ बसन नर नाटक माँही । काशी तेहि बसनकी छाँही ॥
सोइ बसनकी वास उडानी । योग भोग छलकी सहिदानी ॥
बसन कुसुम दल ध्वजा उडाई । कच्छ द्रौप शिव शिव शरनाई ॥
कच्छ द्रौप रचा रस कोपा । लिंग जलहरी घर घर रोपा ॥
कच्छ द्रौप शिवको अस्थाना । शक्तिमांहि शिव आप समाना ॥
शिवशक्ती रंग रूप रसीला । शिवसमान शक्ती गहि लीला ॥
( ५२ )
बोधसागर
गर्भ सनेह रचा जब द्वीपा । लिंग जलहली सदा समीपा ॥
कच्छद्वीप रचि पूरन कीन्हौ । पाछे पच्छ द्वीप पग दीहौ ॥
पच्छ द्वीप रचि रंग बढावा । रंग रोस है विरत स्वभावा ॥
प्लक्षद्वीप रचि पच्छ पसारा । प्लक्षद्वीप रचि गर्भ सुधारा ॥
समय-कच्छद्वीप तट पच्छद्वीप है, कच्छ प्लक्षकर भाव ।
दुनो द्वीप कर एक कला है, रंगरोष कर दाव ॥
पुक्षद्वीप रचि गर्भ संभारा । पाछे मानद्वीप विस्तारा ॥
पुक्षद्वीप बाहेर सुधारा । द्वीप ही कच्छप के द्वारा ॥
बारह द्वीप रचि पूरण कीन्हा । पाछे मीनद्वीप पग दीन्हा ॥
मीनद्वीप रस कंज अमाना । करहि कुलाहल द्वीप समाना ॥
मीन द्वीप रचि प्रगटी माया । पूरन भई गर्भ मई काया ॥
मीनद्वीप तनको व्यवहारा । चमकै चपल ज्योति उजियारा ॥
चली चिकुर चित्र बलवानी । दामिनि दमकै बलके बढानी ॥
मीनद्वीप मन मदन महीपा । सुख दुःख साँराग दीपा ॥
मीनद्वीप रचि पूरण कीन्हौ । पाछे सुधाद्वीप पग दीन्हौ ॥
मीनद्वीप सुख अमृत लीन्हौ । पाछे सुधाद्वीप पग दीन्हौ ॥
मीनद्वीप सुख अमृत नेहा । चक्र सुदर्शन द्वीप उरेहा ॥
सुदर्शनचक्र द्वीप निर्बाना । सुधा वारि सत्य शुक्तिहिसाना ॥
सुदर्शनद्वीप पति गुण आगर । परमानंद परम गुणसागर ॥
सातों द्वीप रचा निर्बाना । काया ब्रह्म भया बंधाना ॥
द्वीप सुधारी कमल परकासा । कमलबास प्रगटी चहुँ पासा ॥
प्रथमहि मकाद्वीप निरमावा । उमराव कमल तेहि माह बनावा ॥
उमर कमल मकरि कस जाना । लाख पंखुरी दलकी अनुपाना ॥
मकर तार डोरी तहां लागी । दरशे सुरति सदा अखुरागी ॥
दूजे पद्म द्वीप निरमावा । कमल कूर्म तेहि माँहि बनावा ॥
श्वासगुआर
( ५३ )
ताकी डोरी सुतसम देखा । कमलनालके मध्य विशेषा ॥
तीजे द्रौप लंबनी नेहा । धर्मकमल तेहि मांहि सनेहा ॥
ताकी डोरी अग्र सनेहा । अग्रनाक तेहि मांह उरेहा ॥
चौथे द्रौप झांझरी कीन्हौ । कूर्म कमल दामिनको चीन्हौ ॥
ताकी डोरी सहल स्वरूपा । चमके धारा तार अनूपा ॥
पांचए झिलमिल द्रौप संवारा । ताके कमल कुसुम सुखसारा ॥
ताकी डोरी धुआंके नेहा । अन्ध कार अकार उगैहा ॥
पांचौ द्रौप अर्ध रहि वासा । पांचौ कमल ता ऊपर वासा ॥
पांचौ कमलमें प्रतिमा पांचा । लागी डोरी अर्ध धर सांचा ॥
कोई लक्ष कोई ऊत बनावै । कोई हजार कोई सब निरमावै ॥
कोई कमल पंखुरी सांचा । डोरी अर्ध पांचहुँके पांचा ॥
ब्रह्माद्रौप घरमांहि निवाना । तेहि मँह ऊर्ध्वकमल परकाशा ॥
प्रथमहि अमी कमल निरमावा । अमी अमान अर्धधुनि छावा ॥
तहवां होइ श्वासगुआ । बरसै अमी अखण्डित धारा ॥
अमी अमोल अर्ध रहि वासा । श्वासासार पुढुप परकासा ॥
निश वासरको जाने मूला । श्वासासार शब्दसम तूला ॥
निश दिन होय श्वासा गुंजारा । सातसै ग्यारह माठ हजारा ॥
अमी कमल अमान सो नाला । अट्टाईसदल पंखुरी रिसाला ॥
तेहि मँह चले पवनकी धारा । श्वासा साथ शब्द गुंजारा ॥
निश वासर श्वासा विस्तारा । छः सै अर्ब इकीस हजारा ॥
उनतालिस हजार एकसै आवै । एतिक चिकुरदार होय धावै ॥
दुइ दल कमलहै श्वासा आवै । इकइस हजार छः सैः धावै ॥
बाइस हजार चारिसै ऊने । जाप जापै जिव आप बिहूने ॥
एतिक श्वास दोइ दलमें आवै । पल बाहर पल भीतर धावै ॥
दूसर कमल झलाझल माँहा । झलकै ज्योति अर्धधुनि ताँहा ॥