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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

शवासुखज्जार

( ६७ )

कूर्म स्नेह लक्ष कर जोरा । चतुर सनेह ज्ञानबल जोरा ॥
पग छतनार होइ जेह जानी । पुस्तपांव पर काल कुबानी ॥

समय-चरण पलौ सम होय कर, घटिका पलो प्रमान ।

ज्ञान सनेही दूत है, रोम रोम भगवान ॥

चौपाई

दूनों अंग विचारेहु जानी । एकरज भक्ति एक विष खानी ॥
दोऊ अंग लक्षण गहो शरीरा । पाछे देहु मुक्ति बरबीरा ॥
परिचय भेद विचारहु जानी । पान लेत जिव होय न हानी ॥
लक्षण लक्ष्य होय सम तूला । पावै सतगुरु मुक्तिके मूला ॥

समय-आदि निशानी देखिकै, बांए दहिने बाम ।

शब्द सनेह नेह करि, तब दीनों निजनाम ॥

चौपाई

बांए अङ्ग मसा जो होई । तीरथ अङ्ग रेखा हो दोई ॥
बांए अंग विषयकी बासा । माया सघन वंश कुल ग्रासा ॥
दहिने अंग विषय जो होई । शीस संपति सुख गासै सोई ॥
विकटदंत होय जेहि बारी । शीलवंत सुख प्रेम सुधारी ॥
बिरर चिकुर सुख बुम्ब सनेही । विहसत वदन सदा सुखनेही ॥
उज्ज्वल नेह सदा सुखदाई । शील सनेह भक्ति बहुताई ॥
हंस गमन सतगुरु सों नेहा । मधुरी बोले प्रेम सनेहा ॥
कर पद कोमल शरद शरीरा । सुत संपति जैसे दारुण धीरा ॥
मधुर बात औ चमकै देहा । सबते बोले सुरति सनेहा ॥
सुरतिवंत प्रीतमकी प्यारी । पछो लांव जेठ पुर भारी ॥
श्यामगात लहसन तन माहा । माया संच न औ ग्रासै नाहा ॥
राजवरण प्रिय श्याम शरीरा । पियाहि आहिपरीमल गंभीरा ॥
बगलधि सुख आमिष जो होई । तन प्रसेव सुत सुताहि विगोई ॥

( ६८ )

बोधसागर

लभे गात मोट तन भारी । विरह विकार कोधअधिकारी॥
छोट शरीर पातरी वामा । आपु तजै अन्त विश्रामा ॥
निहली चितवनि ऐंचा तानी । बहुते पुरुष एक पटरानी ॥
विहसत बोले कुटिल निहारै । आपु जरे औरन कहँ जारै ॥
आगे चलै पाछे तन देखै । गुण औगुण एकौ नहिं लेखै ॥
ऊपर हँसै मनही पछताई । देह थोरहिं बहुत पुआई ॥
एक थन छोट कठोर कुबानी । एक थनझालरि विषकी खानी॥
नाभी पर तीनि होइ रेखा । सुखसम्पति सपनेहुनहींदेखा ॥
इन्द्री मांझ गुञ्ज होइ भारी । जो परसै तेहि करै खुआरी ॥
मोट पतंग चाकरी चाला । तेहि देखत मिय होइ बेहाला ॥
पग पातर पलो छत नारा । परसन बास परै यम धारा ॥
कनअंगरी अघर तिन लागै । आपु नाह तजि परघर बागै ॥
अस लक्षण होइ जाके गाता । प्रान लेइ करै यम घाता ॥
कुम्भ लिलार खम्भ जो होई । जो परशै सो जाय बिगोई ॥
कर पग पलौ गुञ्ज सनेही । परसत होइ भालुकी देही ॥
जोरे पुअर करमह होई । नाहरि नाहक आसै सोई ॥
अहहि होय लक्ष तिरझूला । काल स्वरूप होइ अस्थूला ॥
मुक्तिपन्थ कबहुं नहिं चाहै । सदा विकार विरह रस लाहै ॥
चञ्चल चित् थिर नहिं होई । भजन भंग रस भक्ति बिगोई ॥
वरुणी बसे बिसंभर जोरी । नेत्र बिलोन रंग होइ गोरी ॥
झंखत फिरै प्रकट नहिं होई । अन्तर भक्ति ऊपर होइ छोई ॥
प्रेमवन्ती होइ सुरति निहारै । आप तरे औरन कहँ तारै ॥
करे दंडवत निर्भय नारी । भक्तिवन्त बहु लीला धारी ॥
बिगसित बदन शीलकी आखी । कुल परिवार भक्तिगणसाखी ॥
सतगुरु नाम सुनै सजुपावै । मण्डल चारि शब्द फैलावै ॥

श्वसगुञ्जार

( ६९ )

हर्षित होइ सतगुरु गुण गावै । भक्ति कि बात सदा मन भावै ॥
गुरु सनमुख होइ सेवा लावै । सदाकाल तेहि मस्तक लावै ॥
संपुट वदन क्षीणता होई । सतगुरु शब्दहि एक विलोई ॥
सतगुरु देखि न परदा आनै । शब्दकी चाल सदा पहिचानै ॥
सदा अधीन रहै तनमाही । भागे काल देखिके ताही ॥
कर जोरै सनमुख शिर नावै । लाज कानकी दशा मिटावै ॥
ऐसी लक्ष गहै तन पास। पावन पान लोक होइ वासा ॥
ऐसी लक्ष विचारेउ हंसा । दीन्हेउ ताहि शब्दकर अंशा ॥
लाज काज कह देहु बहाई । भेद सुधारत काल पराई ॥
माता बेटी भई नेवारी । लजा तजिके काल बिडारी ॥
लोक लाजकी दशा मिटावै । तौ रिपुकाल निकट नहि आवै ॥
रामचन्द्र त्रिभुवन के राजा । लोक लाजबहि कपिदलसाजा ॥
जानि परी नहि यमकी वानी । ताते काल कीन्ह तन हानी ॥
लाज लिये तन करै उदासा । तेहि मन भरम भूतकरबासा ॥
गुरुसों करै कपट चतुराई । चाल बिहुन कालपुर जाई ॥
भक्त कहावै लजा नहि तोरै । निश्चल काल नर्क महाँ बोरै ॥
भक्त करै कुल दशा मिटावै । परदा ठानि कालपुर जावै ॥
सो सतगुरु जो होय सयाना । चाल चलावै शब्द प्रमाना ॥
आगत परदा मेटि बहावै । पाछे भक्ति पन्थ महाँ आवै ॥
कपट छाड़िकै शीस उतारै । हंस दशा धरी मुक्ति सुधारै ॥
शीस उतारि हाथ पर लेई । पाछे पाँव ताहिपर देई ॥
भक्तिका चित हर्षित होई । ममता मोह लहर तज दोई ॥
कामिनि कनककालकरफन्दा । भयउ काल कपटि मन मन्दा ॥
दुवो शीस अर्पना लाई । मुक्ति पंथ पावै तब भाई ॥
पावै भेद शब्द सहि दानी । काल कल्पना मेटै जानी ॥

( ७० )

बोधसागर

समय-निडुरीनिडुरै नाचै, चारिउ अंचल छोरी ।
धनी पियारी होइ रहै, यमसो तितुका तोरी ॥

चौपाई

इहि विधि मुक्ति गहे जो कोई । ताकौ आवागौन न होई ॥
आवागौन विचारै जानी । काया कष्ट होइ नहि हानी ॥
सतगुरु शब्द जो लागा रहै । निकसि चरण सतगुरुको गहे ॥
तीन लोक नाद जय जाई । सतगुरुको पग रहै समाई ॥
तिसरी श्वासा साधै जानी । कुल अभिमानमिटै सबखानी ॥
नरको लक्ष पारख करि लेहूँ । पाछै वाह ताही कइ देहूँ ॥
चंचल चपल कुटिल तन होई । पान पावै तन जाय बिगोई ॥
ताको लक्षण नर्ककी खानी । बोधत दुई दुवोंकी हानी ॥
राजा वरण तन बन्सी लावै । आप नष्ट होइ और नशावै ॥
जो वाकी संगति बैठे जाई । अपनी दशा ताहि पहराई ॥
सो सतगुरु जो होय सियाना । लक्षण देखि देइ तब पाना ॥
आगत पान धरै चितलाई । पाछे निर्णय शब्द बुझाई ॥
पानलेत चित हर्षित होई । चालु चले नहि दुर्मति खोई ॥
ताहि देहूँ गुरु पिपीलका । लक्षण हीन रेष होइ जिसका ॥
तापर अंक लिखे सहिदानी । काल कलाधरि देइ निशानी ॥
जैसा लक्ष जाहिपह होई । पान देहु तेहि तहाँ बिलोई ॥
भामत पौन लिखै तेहि माहाँ । दिटै इलाका गुरुको ताहाँ ॥
जाके होई सुमतीकी खानी । ताही देहु गुरुनाम निशानी ॥
राज वरण मुख शीतल बानी । ताघट होई ज्ञानकी खानी ॥
पूरी तत्त्व पान जो पावै । यमकी नाक छेदि घर आवै ॥
राजवर्ण होय क्षीण शरीरा । ता घट काल करे नहि पीरा ॥
राजबरण मुख गुंज चतेरा । सो जिव होय कालको चेरा ॥

श्वासगुञ्जार

( ७१ )

तापर काल लिखै सहिदानी । बोलत धीर हृदय कुबानी ॥
लक्षण भेद कहो सहिदानी । कालसभा भयभीत निशानी ॥
कालकला निरखेहु बहु भांती । करहु विचार दिवस औ राती ॥
कृपण होय माया नहिं छाडै । जोरी जोरी बरनि महेँ गाडै ॥
आशा रहे तहां लपटाई । मुक्ति होय नहिं यमघर जाई ॥
देह ताहि विष गंजित पाना । करम रेख सब देह पयाना ॥
नेत्र बिलोन मसा मुख होई । करत कल्पना जाय विगोई ॥
लवा शीश होय मुख छाही । हृदय कठोर दया नहिं ताही ॥
मध्य कपोल होइ तिल खानी । बांये तत्व लै बोले बानी ॥
बांये विभौ मासा जो होई । दहिने दारुण तेज समोई ॥
बांये विभौ ताहिके होई । अंत चले जिव सर्वस खोई ॥
गहरी चितवनि मुख चतुराई । लंपट चोर होइ दुखदाई ॥
छोटी गर्दन राजस भारी । मिथ्या बोले होय खुआरी ॥
ता घट जीव दया नहिं होई । बोधत ताहि काल पुर रोई ॥
जान ऊपजै कुमती शरीरा । तेहि जनि देहु मुक्ति बलवीरा ॥
एक समय पान जो पावै । आपु जाइ संगति बगरावै ॥
विषयहि लम्पट होय जुआरी । इनते होइ है पन्थ खुआरी ॥
शब्द पेलीजानि पांव छुआवहु । महाविकार तन कछहि पावहु ॥
ताते आगम कहौ पुकारी । कुमति छुडाय पान निरुआरी ॥
हर्षित वदन रहे दिनराती । गुरुसों प्रीति करै जेव स्वाती ॥
सोंपैही सदा स्वाती आसा । उपजै मुक्ती ज्योति प्रकासा ॥
रहनि गहनि बूझे करजोरी । दीन्हेहु ताहि शब्दकी डोरी ॥
गुरु सन्मुख होइ सेवा लावै । काम कोध ममता बिसरावै ॥
सदा अधीन रहे गुरुआगे । पावै शब्द सहज अनुरागे ॥

( ७२ )

बोधसागर

गुरुपद छांड़ि अनत नहिं जाई । खुशै अमी रस पीवै अघाई ॥
समता धीर होइ जेहि गाता । तेहि यमकबहि करै नहिं घाता ॥
गुरुगम भेद बूझि सब पावै । ममता मोह सबै विसरावै ॥
समय-गुरुकी आज्ञा आवै, गुरुकी आज्ञा जाय ।

कहै कबीर सो हंस भए, बहुबिधि अमृत खाय ॥

चौपाई

क्षीण अधर औ नेत्र विसाला । गुरुगमी बोले शब्द रिसाला ॥
जो कोई तपत ताहि पहुँ आवै । अमृत सींचिके ताहि जुडावै ॥
पावै अमृत हर्षित होई । मोह महाबल जाइ बिगाई ॥
शब्दकी परच बोले बानी । तन अभिमान विसारे खानी ॥
तत्त्व तमाशा निश दिन देखै । भाव अभाव एक करि लेखै ॥
आसन मारि समाधि लगावै । एक पग संपुट पाछे लावै ॥
उलटी बाँह शीशपर राखै । पूर्णतत्व अमीरस चाखै ॥
पलकन मारै राखै साधी । तिरवेणी तट राखि समाधी ॥
अमर महातम तत्वहि राता । दशै सूख सागरके दाता ॥
ज्ञान महातम तबही पावै । अमर समाधि एकपल लावै ॥
तबही मिटै काल करदाऊ । दुविधा दूसर सब विसराऊ ॥
अमर समाधि महा फल पावै । जमदारुन तेहि शीश नवावै ॥
करपग कोमल रोग न व्यापै । काल कला तेहि देखिके काँपै ॥
अखंड मंडल गुफाके तीरा । दरशै ज्योति अखंडित धीरा ॥
जो देखै तो प्रकटै चोरा । देखे बिना ज्ञान होय भोरा ॥
तत्व समाधि लगावै जानी । उपजै ज्ञान अमी रस खानी ॥
सत्य सुकृत पग परसै जाई । रोग न व्यापै काल न खाई ॥
तत्व तमासा गुरुमुख देखे । तत्व छाड़ि निहतत्व बिबेखे ॥
तत्व समाधि करै नित पूजा । सत्य सुकृत तजि और न दूजा ॥

शवासुखार

( ७३ )

पाँवके ऊपर पाँव चढावै । हाथ फेरिके संपुट लावै ॥
संपुट शीश छुआवै जानी । निरखै अरध उरधकी वानी ॥
कसनी कसै बहत्तर डोरी । सुरति शब्दसों राखै जोरी ॥
अधर अवाज लखै निरबाना । राग छतीसों सुने वँधाना ॥
सुरली टेर अर्ध धुनि होई । ज्ञानगुफा चढ़ि निरखेहु सोई ॥
सुनत अर्ध धुनि उन मुनिराता । बूझै आदि अन्तकी बाता ॥
मन मकरंदी के गुण पावै । मगन होइ चंचल नहिं धावै ॥
मन सर होई सरे सब काजा । छोंडे कपट शीश विचुराजा ॥
नख शिश मनै बियापै सोई । मन चीन्हे मन आपै होई ॥
यह मन शक्ती यह मन सीवा । यह मन पांच तत्त्वको जीवा ॥
इह मन लेकै उन मुनिरहै । तीन लोककी बातें कहै ॥
ऊन मुनीमें रहै रहावै । ताकर हंस काल नहिं पावै ॥
ऊनमुनी महीं लावै तारी । अङ्गमें महलमहँसुरतिबैठारी ॥
उनमुन महीं जो वासाकरै । अगम महलमें सुरति लै धरै ॥

समय-उन चढी आकाशको, गई गगनपर छूटि ।

हंस चले जो जात हैं, रहे शिर कूटि ॥

उन मुनीमें धर्मदासबसै, बंक नाल गहिजोर ।

शिर ऊपर सतशुक्ति तहै, तहां शीत शब्दकी डोर ॥

चौपाई

उनमुनी सांची सुरति है बासा । धर्मदास गहि राखहु पासा ॥
सोहं सार मूल धुनि राता । तासु नेह मिले दाता ॥

समय-हंसा सोहंग मान करै, निकसि खेल मैदान ।

तहां सुरति बैठारिकै, नित प्रति लावै ध्यान ॥

चौपाई

अमर आसन करौ बिचारी । धर्मदास यह कथा निनारी ॥

( ७४ )

बोधसागर

जो कोइ मूल ठीक धरि आवै । सोई अमर समाधि लगावै ॥
सार समान रहै दिन राती । पावै आदि अन्त उत्पत्ती ॥
अमर महात्म पावै नीका । अमर समाधि को गहै धरि ठीका ॥
पांच पचीस सकल सब जानै । आवत जात श्वास पहिचानै ॥
श्वास सार शब्द निरुआरै । अमर समाधि को भेद विचारै ॥
निशि वासर है शब्द समाना । जागत सोवत एक ठिकाना ॥
अमर मूल धुनि शब्द समाई । बोलै ज्ञान गर्मी अधिकाई ॥
लावै अमर मूल महतारी । अटल रहै मति टरति न हारी ॥
अमर सुहावन आसन मूला । नख शिख भेद गहै अस्थूला ॥
तनकी लक्ष्य लखै विस्तारा । लक्ष्य अलक्ष श्वास गुंजारा ॥
लक्ष्य लखै सो साधु कहावै । बिना लक्ष्य सतगुरु नहि पावै ॥
सतगुरु चीन्है के सहिदानी । काल ब्याल भयभीत निशानी ॥
काल काल बन रेख बनावा । नख शिव जानै तासु सुभावा ॥
पतरी ग्रीव नासिका भारी । भृकुटी देह नेह होइ कारी ॥
दहिने ग्रीव मासा को बासा । गुण गंभीर ज्ञान परकासा ॥
नेत्र रसाल बदन मनहारि । शब्द सनेही सदा पियारा ॥
सदा हृदय सतगुरुकी आसा । बोलै ज्ञान गर्मी परकासा ॥
पूरण लक्ष पक्ष दोइ होई । शब्द गहै बहु भेद बिलोई ॥
ललाट पाट रेखा होई चारी । सुरति सनेही सुरति सुधारी ॥
तेहि जानेहु पीछल सहिदानी । पाछिल बोध भये सब हानी ॥
सुनत शब्द मिलै सो आनी । शब्द सनेह गहै चित्त जानी ॥
पलक छत्र औ झीने बोलै । पावत पान कपट सब खोलै ॥
ताकह जानहु हंस सुहेली । आनि मिले यम परदा खोली ॥
भीतर वचन कहे हित जानी । पाछिल सुरति भई जत हानी ॥
चरण टेकि चित्त बोधहु जानी । जाते आगे होइ न हानी ॥
रोष करहु तो मोर दोहार्इ । गुरुको रोष लोक नहि जाई ॥

शवासगुञ्जार

( ७५ )

समय-गुरुते माथेते उत्तरे, शब्द वेहुना होय ।
ताको काल घसीट है, राखि सकै न कोय ॥

चौपाई

गुरु भृङ्गी कर एक सुभाऊ । मेटे करम करे सुकताऊ ॥
शीख जोमन बसिदुबिधा करई । गुरु पुरा होई चित ना घरई ॥
चित तो धरे शीख विगारे । आपु सहित भवसागर डारे ॥
दीन दयाल गुरुनकी रीति । जैसे चन्द चकोरहि प्रीति ॥
सीखे सिखापन बहुविधि देही । भरम मेटि निर्मल करि लेई ॥
शीख भेद जो पूछे आई । क्रूर होइ तो उठै रिसाई ॥
पूर होइ तो शीखहि बोधे । कलह कलपना तजिकै सोधे ॥
शीश अज्ञान पार नहि पाई । ताते करै कपट चतुराई ॥
करै कुटिलता बोलै जोरा । गुरु पूरा होइ करै निहोरा ॥
समय जानि बचन मुख बोलै । कहूँ शीतल कहूँ तेजस डोलै ॥
समय जानि बचन मुख बोलै । कहूँ तेजस कहूँ शीतल डोलै ॥
जब जब शिष्य करै अज्ञानी । हृदय शुद्ध मुख कहै कुबानी ॥
भाव विचारि शिष्य सों कहहीं । शिष्य की दशा जोनीके लहहीं ॥
जोर कहनको शिष्य डराई । गुरुशब्द महँ लेइ मेराई ॥
गुरु पूरा होय ताहि सुधारे । करम काटि भव सागर तारे ॥
गुरु सुवास सबके सुखदाई । गुरु राखै तो काल न खाई ॥
जानेहु ताहि काल अभिमानी । काल अङ्ग धरि प्रकटे आनी ॥
गुरु नाता धरि शिष्य नशाई । रहनि गहनि नहि एक लखाई ॥
अज्ञान दिसासे शिष्य कहावै । गुरु होय गुरुगम समुझावै ॥
शिष्य करै बहु चञ्चलताई । गुरु पुरा होय लेइ बचाई ॥
गुरुकी दशा ज्ञानकी भाऊ । अज्ञान दशाते शिष्य कहाऊ ॥
रण ज्ञान गमी जेहि होई । हंस उवारन सत गुरु सोई ॥

( ७६ )

बोधसागर

सतगुरु कला अनन्त कहावै । ताकर भेद शिष्य किमि पावै॥
ताते शिष्य कहिय अज्ञाना । गुरु बतावे शब्द निर्वाना ॥
शिष्य नाता धरिजो कोइ आवै सतगुरु होइ सत राह बतावै ॥
गुरु सोई जाको चित थीरा । सुरति सरोतर साजै वीरा ॥
केतो चूक शिष्य सो परई । सतगुरु पूरा सब परि हरई ॥

समय-जाका चित्त समुद्रसा, बुद्धिवन्ता मति धीर ।

सो धोखै बिचलै नहीं, सतगुरु कहै कबीर ॥

चौपाई

लक्षण लक्ष्य बिचारै जानी । निरखै आदि अन्त सहिदानी॥
गुरु पूरा शिष्य होय उदासा । गुरुगमन लेई शब्द परकासा ॥
आदि अन्तकी परिचय लेई । पाछे भेद शब्द तेहि देई ॥
परखै परिचय परखै रेखा । शब्द सनेह सुनावै लेखा ॥
त्रिकुटी तीर गुञ्ज जो होई । परखै शब्द रहै तन गोई ॥
ममता मोह करै हंकारा । अन्तरकुटिल चतुर वरिआरा॥
पलक भुअङ्ग परोहन साथा । हृदय मलीन नवावै माथा ॥
वरौनीपर जो गुञ्जै गुञ्जा । महा सुबुद्धि होह मुख पुञ्जा ॥
हृदय मलीन होय मुख छाहीं । गुरु गमि शब्द विचारै नाहीं ॥
लहसन मासा होय मुखमाहीं । शुक्ती रबी जम।हिकी छाहीं ॥
राज बरन औ लँबी देहा । गुरुगमि शब्द विचारै नेहा ॥
नेत्र कीर्ति कुटि वृक्षकी शाखा । बोले सदा मधुर धुनि भाखा ॥
बरण छीन लौ नेत्र मलीना । हृदय कपट मुख रह अधीना ॥
भुक्कुटी ऊँच शीश छतनारा । ज्ञान महाबल कथै अपारा ॥
लम्बी नासिका श्रवण है छोटा । हृदय शुद्ध मुख बोलै खोटा ॥
राज बरनहि मोट तन भारी । छोट शरीर ज्ञान अधिकारी ॥
मोटी नासिका ऊँच लिलारा । ज्ञानहीन मन कथै अपारा ॥

श्वसगुञ्जार

( ७७ )

पातारि अधर कपोलन्ह माँसा । ज्ञान महाबल कथे निरासा ॥
धरनी धीर धरै गरमाई । डाढी दरबर औ बहुताई ॥
आगै ग्रीव गुंज होइ भारी । माया सवन कोध अधिकारी ॥
भुज भुअंग नानिनि मनिहारा । करपग रसना रेख सुधारा ॥
रेखा चारि होय चतुरंगा । काल कला धरि प्रकटे अंगा ॥
करपर होइ दीर्घ भण्डारा । ताके निकट भजनकी धारा ॥
सोई धार अखंडित होई । क्षीण भंग मति गहे विलोई ॥
धारा मिलि अवधी कह आई । हंसदशा धरि पंथ चलाई ॥
सो धारा होइ मोट सनेही । ज्ञान गहे मति धरे ना देही ॥
वारिष धारा मिलै सुधारा । हृदयशुद्ध प्रीतम मनियारा ॥
भजनभंग कवहूँ नहिं होई । गहै शब्द गरभेद विलोई ॥
यशकी रेख विचारै जानी । जेठे पलौ जीवकी खानी ॥
तैसे ताहि विचारहू रेषा । तहाँ तहाँ तस कर्म विशेषा ॥
अवधिके नीचै चुंगल होई । अयश करत यश पावे सोई ॥
विश्वा जानि लक्ष गहि लेऊ । जस विश्वा तस सुपिरण देऊ ॥
विश्वा बीस होय नर पूरा । शब्द सनेही गुरुगमि शूरा ॥
अंडज होइ जड जनमैं आई । घटी बढी होइ अंक लिखाई ॥
पिंडज खानि देह धरि आवै । बारह पंद्रह अंक चढ़ावै ॥
ऊष्मज होइ जग लेह अवतारा । नरके कर दश अंक सुधारा ॥
अचल खानि जग जन्मे आई । बत्तिस विश्वा अंक चलाई ॥
चारि खानिकी लखै निशानी । दीहेहु ताकहँ शब्द सहि दानी ॥
खानी लक्ष विश्वा लखि राखै । कर्म अकर्म भित्रके भाखै ॥
पिंडज चारि भांति तन होई । कर्म अकर्म सुधारै सोई ॥
कर्मी नाहर घातिक जेता । अंक सुधारि लिखै कर तेता ॥
जे के करमह सती औ गेडा । लिखै अंक करमकर बेडा ॥

( ७८ )

बोधसागर

गाय भैंस परमारथ खानी । जैसे अंक सुधारै जानी ॥
पशु पक्षी परमारथ होई । नख शिख रेखा लखे बिलोई ॥
अंडज चार बरनकी काया । कर्म अकर्म तहाँ निर्माया ॥
अंडज मीन सुफल तन होई । तैसे अंक सुधारे कोई ॥
अंडज पक्षी तन निरदाया । तहाँ तहाँ तस अंक चलाया ॥
करमी पंछी जोरा बाजा । तैसे अंक सुधारे साजा ॥
अंडज नाग कर्मकी खानी । बोरे काल नरक सहिदानी ॥
ऊष्मज बरन चारि तन होई । गुण अवगुण सब लिखै बिलोई ॥
भृंगी आदि कीट सुखदाई । भजनके अंक लिखै यमराई ॥
बहुतक कीट होय सुखदाई । मारि खात नर रोग नशाई ॥
तासु लिखै परमारथ खानी । कर्म अकर्मकी सुनिये बानी ॥
एक कीट दुखदाई होई । कीटहि कीट खात है सोई ॥
सो निशान करमकर होई । जेतिक अंक लिखै तन सोई ॥
एक कीट नर दृष्टि न आवै । तेहि अवगुणते काल नचावै ॥
अचल खानि की चारि निशानी । गरम शीतल लिखै अमृतवानी ॥
गुण औगुणको करै विवेका । गुण अवगुण नरके कर रेखा ॥
सो सतगुरु जो सोइ सयाना । चारि खानिको लखै निशाना ॥
पाप पुण्यको करै विचारा । ताहि तहाँ निज पान सुधारा ॥
कर्म जीव कर्महिकी खानी । काल कर्मकी बोले बानी ॥
सतगुरु सोइ जो लक्ष्य विचारै । लक्ष्य विचारिके पान सुधारे ॥
चोर साहुको करै विचारा । भाव विचारि पान निरुआरा ॥
कपटी जीव कर्मबसि अंधा । शब्द सुनत चित होइ विष मंदा ॥
अस कर्मज जब देख बिचारै । कर्म मिटाय पान निरुआरै ॥
खानिकी लक्ष फेरि जब लेई । तब तेहि शब्द परीक्षा देही ॥
विश्वा निरखि विचारै रेखा । गुण अवगुणका जानै लेखा ॥

शवासुञ्जार

( ७९ )

कर पलौ कर रेख विचारै । तिरछि विषमको लेख सुधारै॥
तिरछा रेख विस्नाकी खानी । जस देखै तस बोले बानी ॥
विषम रेख कर्मज अधिकारी । जत कर्मज तत रेख सुधारी ॥
ततका मल हरि परसे परनारी । सुनो धर्मनि मैं कहौं विचारी ॥
नख उज्ज्वल होह गुंज चितेर । कलह कल्पना यमकर घेरा ॥
करपर लिखै विषमकी खानी । गुण औगुणकी लिखै निशानी॥
तिरछा रेख नारीकर नेहा । तासु नेह सुत सुता उरेहा ॥
माता पिता बन्धु भरतारा । विषमरेख यम लिखै विचारा॥
अवधि तीर दोउ तिरछा उरेहा । भक्ति भंडार विषमकर नेहा ॥
मीन पूछ भंडार सुधारी । सुख संपति बिभौ तन टारी ॥
नवो खण्ड यमरेख सुधारी । सुख संपति बिभौ तन टारी ॥
गुण अवगुणसबतबहि लिखावहु । युक्ति जानिकै हंस चेतावहु ॥
हंसा दासा तबही नर पावै । जब करताकी दशा मिटावै ॥
काल कर्म कालकी खानी । चाल चलावै नरकाग समानी ॥
काक कुबुद्धि तेज तनमाही । सतगुरु शब्द बतावहु ताही ॥
काक कुबुद्धि तजे कुटलाई । तब सतगुरुकै शरण समाई ॥
काक कुबुद्धि तत चाल मिटावै । तब निर्वान परमद पावै ॥
बुद्धि फेरि पलटावै बानी । सतगुरु शब्द गहे सहिदानी ॥
लोक लाज कुल दशा छुडावै । तब कौआते हंस कहावै ॥
यम रेखन की जाने बानी । सौ सतगुरु सोइ तत्त्व ज्ञानी ॥
रेखा विना न लेखा पावै । बिन लेखा नहिं गुरु कहावै ॥
सूकर खान गीध औतारा । बिनु यमरेख लखै नहिं पारा ॥
यमकी रेख सकल जब जाने । गुण अवगुण तबही पहिचाने॥
करपर होय चक्रकर थाना । शंख सीप गुरु भेद बखाना ॥
पाँचौं चक्र होय सम तूला । योगकला चतुरथ अस्थूला ॥

( ८० )

बोधसागर

एकचक्र अथवा दुइ होई । कछु ज्ञानी कछु दुर्मति खोई ॥
तीनि होय तो होय उदासा । चार होय तो सूर्य प्रकाशा ॥
पाँचौ शंख होय करमाहा । दुख दारिद जान अवगाहा ॥
सीप होई तौ होय उदासा । शब्द प्रतीत शब्दकी आसा ॥
नखशिख रेख बिचारेहु जानी । तबहि सुधारेहु हंसकी खानी ॥
समय-नख शिख जानिके, तबहि सुधारेहु पान ।
भर्मभूत नहिं दर्शही, हंस होय निर्बान ॥

चौपाई

निर्खहु आदि अंत सहिदानी । गुण अवगुण देखहुँ बिलछानी ॥
कर्मजीव काल अधिकारा । कर्मके घर लेई अवतारा ॥
वरण भेद परिसै कुल जाती । रेखा लेख देखै उतपाती ॥
कर्मों काल कर्म वश होई । गुण अवगुण सबदेखिबिलोई ॥
उपजै चोर जुआरी झूँटा । कर्मों काल कर्म धरि लूटा ॥
कामीके घर कर्मों होई । कर्म रेख तब देख बिलोई ॥
कर्म खानि कायामहँ बासा । सुनै शब्द चित होई उदासा ॥
भर्म भूतकी गहै निसानी । पूजै शिला औ उलछै पानी ॥
मारु मारु मुख बानी भाखै । मन बशि जीव काल घर राखै ॥
नेत्र बिरह रस खुकुटी छीना । कबहुँ चंचल कबहुँ मलीना ॥
बालक होई पौनके साथी । मदमातै जस मैगल हाथी ॥
तिन जीवनकी दशा मिटावै । पाछे सत्य शब्द ससुझावै ॥
पद्म मुरक जाके तन होई । सो कर्मों जग जीवै लोई ॥
दया लगनकी परमित पावै । निर्मल हो सत्यलोक सिधावै ॥
नेत्र विशाल रक्तकी झाई । सुरति सनेह ज्ञान बहुताई ॥
जब तब चितमहँ संशय आवै । ज्ञान गम्यते मार बहावै ॥
ताकी निर्णय अगम सुभाऊ । पावै सत्य शब्दको दाऊ ॥

श्वसगुञ्जार

( ८१ )

काग बुद्धि मन दशा छुडावै । पावै शब्द लोक सो आवै ॥
स्वेत कुष्ठ मद गात मलीना । कर्म विश्व विषयी लौलीना ॥
जहद कुष्ठ मोती मनी भारी । धुन्द्य कुहेर बहिरी रक्तारी ॥
शून्य भाग्य दाग मतिमारी । फोकट कुष्ठ औ गंध पहारी ॥
रक्तविकार जहर धुनि फीका । अंग मलीन कर्मको लीका ॥
पाछिल कर्मज नरकी देहा । परखे सतगुरु शरण सनेहा ॥
तासु निशान परखिके काया । नेत्र गुञ्ज विषवाण बनाया ॥
कर्म निशान दशा पहिराया । तनविकार गुरुवचन नभाया ॥
तेहि जनि देहु मुक्ति बर बीरा । निश्चय काल करै बड पीरा ॥
पीरा सहे जीव शब्द न मानै । गुरु निन्दा निशिवासरजानै ॥
निन्दा करत जाइ यमदेशा । ज्ञान बुद्धि नाह गहै सदेशा ॥
गुरुकी दया जो मुखमहँ आनै । लोभ लहरि ममता मनसानै ॥
कबहिं न होहि ताहिकरकाजा । कितनो करै बुद्धिकर साजा ॥
गुरु निन्दा कुष्टी औतारा । परै रौर नरककी धारा ॥
सो सतगुरु जो होहि सयाना । ऐसे जीव कहँ देह न पाना ॥
पान लेइ अंतै बगडावै । स्वर्ग नर्क महँ ठाँव न पावै ॥
तनकी दुर्मति लहै न पारा । भजै राज नर्ककी धारा ॥
कर्मी खानि दहे नर पावै । पाछिल अवगुण संगहि आवै ॥
तेहि जनि देऊ शब्दसहिदानी । मानहु सत्य शब्दकै बानी ॥
धोखे आइ पान जो लेई । पाछै समुझि सिखावनि देई ॥
सुनत सिखावन हर्षित होई । ताहि देहु गुरुशब्द बिलोई ॥
गुरु की त्रास करै लौ लीना । सुनत सिखापन होइ अधीना ॥
मानै त्रास रहै लौ लाई । पावत पान करम कटि जाई ॥
उतपनि लगनजो साधहु धीरा । ताहि लगन सँग साजहुबीरा ॥
नाम पान पाँजी समुझायहु । सत्य शब्दकी रहनि बतायहु ॥

( ८२ )

बोधसागर

कामिनि कनक कलाकी फंदा । अरपै दुनौ शीश मनमंदा ॥
कामिनि अरपै कनक चुरावै । इहि विधि हंसलोकनहिंआवै ॥
कनक अरपि कुलभावदिसावै । वाजी दिखाइके कलाछिपावै ॥
कामिनि कनक करै सम तूला । पावै शब्द मुक्तिकर मूला ॥
चाल विना लागै बडि वारा । तामैं नहि है दोष हमारा ॥
चाल चलै कुलदशा मिटावै । भक्तिसार धरि लोक सिधावै ॥
कथनी कथै करनी नहिं जाने । ताते अवगुण सबै बखानै ॥
कथनी कथै लोक नहिं जाई । भात कहै नहिं भूख बुझाई ॥
पानी कहै प्यास नहिं जाई । कथनी कथै पाछे पछताई ॥
कथनी थोथर करनी सारा । कथनी कथि कथि हुये गँवारा ॥
कथनी कथि जो करनी करै । कहैं कबीर सो प्राणी तरे ॥

समय-करनी बोलै पारकी, करपै ले व्यवहार ।

करनी कर शब्दै गहै, उतरे भवजल पार ॥

चौपाई

महा शून्यके भीतर रहई । सत्यलोक की बातें कहई ॥
कहै अर्थ कथ करै विचारा । कहै कबीर सो शिष्य हमारा ॥
कथै आन करै जो आना । सो अब जानहु पशू समाना ॥
जैसा कहै करै पुनि तैसा । हैं हमहीं हमहीं सो ऐसा ॥
करनी करै कहै तब बाता । ताहि मिलै गुरु समरथदाता ॥
कथनी कथै गर्भ होय भारी । बिनु करनी सब यमकीबारी ॥

समय-करनी गर्भ निवारनी, मुक्ति सारथी सोय ।

कथनी कथि करनी करै, तो मुक्ताहल होय ॥

चौपाई

इहि विधि गहै शब्दकी आसा । निश वासर हम ताके पास ॥
अति अधीन करनी कर शूरा । करनी किये मिले गुरुपूग ॥
शूर होय करनी मन लावै । भक्ति करै जगबहुरि न आवै ॥

शवासयुञ्जार

( ८३ )

करनी शूरा कथनी सार । करनी केवल उत्तरे पार ॥
करनी करै शूरमा होई । कादर करनी करै न कोई ॥
शूरा होय तो करनी आवै । कादर होई सो बार लजावै ॥

समय-शूरा सोई सराहिये, अंग ना पहिरे लोह ।

लरै सकल वँद खोलिकै, मेटै तनकर मोह ॥

चौपाई

सदा अधीन रहै तनमाहीं । परिचे शब्द विचारे नाहीं ॥
रहे अधीन सतगुरुके आगे । निश्वासर सेवा चित लागे ॥
जो लगि नहीं अधीनता आवै । तब लगि सत्य शब्द ना पावै ॥

समय-नहीं दीन नहिं दीनता, नहीं सन्त सन्मान ।

ताधर यम डेरा किये, जीवतै भया मसान ॥

चौपाई

सदा अधीन रहै जो प्रानी । दीनेहु ताहि शब्द सहिदानी ॥
कुल अभिमान महानद भारी । भक्ति पन्थगहि ताहि सुधारी ॥
शब्द लेह कुलदशा न तोरे । तेहि यम विषम सरोवर बोरे ॥
भक्ति करै कुल कानि न खोवै । आवागोन गर्भ सुख गोवै ॥
जननी बेटी भैनी बाला । बहिन भयए ततक्षण काला ॥
इन्हते होइहि भक्तिकी हानी । लाज नदी महाँ बोरे आनी ॥
कुलकी राह बहारै लोही । कुलना तयारी छुती बिगोई ॥

समय-कुलकरनीके कारणे, हंसा गये बिगोय ।

तब काको कुल लाज है, जब चला चलाको होय ॥

चौपाई

कामिनि कनक कालकी खानी । काल कला धरि बोलै बानी ॥
इनते होय भक्ति कर नाशा । ताते बहुरि गर्भ महाँ बासा ॥
परदा प्रकट जबै ना होई । बोलै वचन मधुर धुन सोई ॥

( ८४ )

बोधसागर

परदै रहै लाजकी बैधी । परदा साथ कालकी सँधी ॥
गुरुसों कपट करी धन लीनी । सुरति निरति विनुकाल अधीनी ॥
कामिनी परदा सति सो ठानै । लाज लिये मुख बात न आनै ॥
गुरुके परदा बांचै नाही । बूढै विषम सरोवर माहीं ॥
गुरुसम मात पिता सो नाही । गुरु विन बूढि सरोवर माहीं ॥
गुरुसम मात पिता नहिं होई । मात पिता गुरु जानहु सोई ॥
समय-जे कामिनि परदै रहै, गुरुमुख सुनै न बात ।
ते कामिनि कुतिया भई, फिरै उधारै गात ॥

चौपाई

लोकलाज पति सबै बिचारा । लक्षण लक्ष्य सबै निरधारा ॥
जाको होई भक्तिकी आसा । सतगुरु चरण करै विसवासा ॥
तजै गर्भ जो निकसी आसा । पावै सतगुरु चरण निवासा ॥
यमको अन्त जानि जो पावै । भवसागर तब साधु कहावै ॥
सतगुरु चरण गहै चित जानी । मेट कुटिल कर्मकी खानी ॥
सन्त कहावै अन्त सम्झारी । चौदह काल चरण चित धारी ॥
चौदह यमकर सकल पसारा । सतगुरु शरण होई निरुयोरा ॥
चौरासी कर करम अपारा । विनु सतगुरु का करै उबारा ॥
गुरु करता गुरुदेव नरेशा । विनु गुरुगम सब भेद अनेशा ॥
गुरुसे दूसर और न कोई । जाते मुक्ति पदार्थ होई ॥

समय-गुरुकरता कर मानिये, रहिए शब्द सभाय ।

दर्शन कीजे बन्दगी, सुनै सुरति लगाय ॥

चौपाई

आगे मिलै बन्दगी कीजै । पाछे चरण कमल चित दीजै ॥
शब्द सुरति मिलि रहे समाई । ताप तपै नहिं सुरति समाई ॥
एकै देह एक अस्थूला । एकै भाव भक्ति कर मूला ॥

शवासुखार

( ८५ )

शिष्यके हिरदैं गुरुके वासा । शिष्य रहैं गुरुचरण निवासा ॥
गुरु शिष्यसों अन्तर नाहीं । मन है एक देह दुइ ताहीं ॥
शब्द स्वरूप गुरुकर वासा । सुरति स्वरूपशिष्यकीआसा ॥
समय-गुरु समाना शिष्य महँ, शिष्य लियाकरि नेह ।
विलगाये विलगैं नहीं, एक प्राण दुइ देह ॥

चौपाई

ताहिं गुरुसों सत्य जो कीजे । बाहर अंतैं चित्त ना दीजै ॥
जो गुरु शिष्य हृदय नहिं होई । तासों सत्य करै नहिं कोई ॥
गुरु बाहर शिष्य भीतर आवै । दुविधा धोखा काल तेहि लावै ॥
सत्य होय सो सत्यहिं जानै । गुरुकहँ राखि हृदयमहँ आने ॥
गुरु हृदये सो बसै निनारा । सत्य करत जाईं यमद्वारा ॥
गुरु शिष्यसों बाहर बसई । सत्य करत काल तेहि डसई ॥
गुरुकी मति अंतैं रहैं वासा । शिष्यकी मती गुरुके पास ॥
ऐसे गुरुसों सत्यजो करहीं । सेवा करत काल तेहि धरहीं ॥
शिष्य सयान गुरु अज्ञानी । धोखैं होइ दुनोंकी हानी ॥
गुरु शिष्यकी मति एकैं होई । सत्य करै तारै कुल दोई ॥
गुरुकी मति जो शिष्य न पावै । काज विसार चिंता मन लावै ॥
गुरुको भेद लखैं नहिं बानी । सत्य करै कुमती अज्ञानी ॥
नवका ऊपर बहुजीव चढावै । खेवा बिना पार नहिं पावै ॥
खेवनहार चीन्हि जब लेही । पाछै पाँव नउका पर देही ॥
खेवन हार चीन्हि नहिं पावै । नउका चढै सो मूर्ख कहावै ॥
सागर सुमति मुक्तिकी धारा । ममती न्याव ज्ञान कडहारा ॥
करै विवेक चोर औ साहू । बिना विवेक घाटलागुनकाहू ॥
चोर जानिके पाँव न देई । साधु जानिके पारहु जेई ॥
चोर साहूकर भाव बतावा । सागर नाव धार दिखलावा ॥

( ८६ )

बोधसागर

चोरके नाव चढ़ै जो कोई । सागर पार कबहुँ नहिं होई ॥
साहुकी नाव होइ असवारा । सागर उतरत लाग न वारा ॥
सागर पार मुक्ति कर वासा । जो गुरु मिलैतो करै निवासा ॥
घर घर गुरु घरहि घर चेला । लालच बाँचै फिरै अकेला ॥
जैसे श्वान कामबश धावै । तृष्णा बाँधै अंग लगावै ॥
तृष्णा मिटै गांठि जुरि जाई । पाछै शीश धुनि पछितार्ई ॥
एहि बिधि होइ दुवोजग भूटा । काल कलाधरि गहै न खूटा ॥
ऐसी सत्य करै जो कोई । धोखे जाय काल बसि होई ॥
गुरुकी करनी शिष्य जो पावै । तब सत्य करै सत्यलोक सिधवै ॥
समय-सत्य तो तासों कीजिये, जहवां मन पतियाय ।
ठाँव ठाँवकी सतीसों, कुलकलंक चढ़ि जाय ॥

चौपाई

अंकके मिटत कलंक मिटि जाई । अंकके रहत अकलंक न जाई ॥
अंक लिखा यम एहतन माहा । अंक मिटाइ देहु तेहि माहा ॥
नख शिख अंक लिखा यमराई । चौदह कला थाना बैठाई ॥
गुरुगमि शब्द जानि जो पावै । तब चौदह यमफन्द मिटावै ॥
एहि फन्दै सुर नर मुनि भूलै । देह धरी धरि सब जग झूलै ॥
चौदह काल विकार अन्याई । नर नारी घट रहै समाई ॥
भिन्न भिन्नके न्याय विलोवै । पारस निहार अन्तमुख गोवै ॥
प्रथम काल कामके अंगा । नख शिर व्यापै विषै भुजंगा ॥
चित्तभंग औ कुल व्यवहारा । लाज सनेह सकुच बटपारा ॥
आलस निद्रा रूप बरियारा । लालच लोभ मोह कर धारा ॥
विषय वास बसै बेकारा । इन्द्र चौदह मिलि भक्ति उजारा ॥
भक्ति प्रतीत शितल इन्हनासी । प्रेम बिगारि लगावहि फासी ॥
दया धीरज संतोष न आवै । सुमति सहज लै दूरि बहावै ॥