कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
(१२३)
धन्य राय धन्य पठाना । ऐसे गुरु पाये मतिवाना ॥ ऐसे बहुत दिन गये बिताई । रानी केरि अवधि नियराई ॥ सुन्दरदेह रानी कर नाऊ । पाये शब्द न प्रीति लगाऊ ॥ शब्द पाइ गुरु प्रीति न लागी । विना प्रीति सतभक्ति न जागी ॥ पाय शब्द नहिं कीन कमाई । ताते यम बहुते दुख लाई ॥ चारि दूत हरि तबहि बुलावा । तासे सकल मता समुझावा ॥ नगर गहो जाय नृप रानी । तहँवा जाय वेगि तुम आनी ॥ तब यमदूत गहि राजा गयऊ । जाय ठाढ़ मन्दिरमें भयऊ ॥ घट घट यम देखा व्योहारा । काया पैठि सो कीन विचारा ॥ तब रानीके वेदन भयऊ । व्याकुल करी दूत चित रहऊ ॥ राजा बूझे रानी बाता । कहे रानी मोहि नाहि सुहाना ॥ एक बात सुनिये मम राई । साधु संत सब देहु बुलाई ॥ राजा सकल साधु बुलवाये । सतगुरु भक्ति करो चित लाये ॥ बाढ़ विथा रानीकी काया । ततक्षिन आप पुरुष होय आया ॥ तबहीं यम जिव घेरे आयी । अरध अरध स्वासा चलि धायी ॥ भागि हंस त्रिकुटी में गयऊ । तहवाँ यम जिव घेरे लयऊ ॥ चारो जीव यम घेरे लायी । काहे बल तुम बचिहो जायी ॥ चलो हंस हरि कीन बुलाऊ । तब हंसा यक वचन सुनाऊ ॥ यहवाँ कस आये बटपारा । हमरे हैं समरथ रखवारा ॥ हम घर गुरु खसम यक आही । सो मोहि नाम दीन बतलाही ॥ दूत भूत यम तोहि चिन्हाई । आज्ञा देह खसम घर जाई ॥ जे साहेब मोहि नाम सुनाया । सो आवे गुरु जाय लिवाया ॥
साखी—तबही यम अस बोलिया, कहँ है धनी तुम्हार ॥ ताकहँ वेगि बुलावहू, नहिं चलु हरि दरबार ॥
(१२४)
बीरसिंह बोध
चौपाई
तब जिव यमसे कहवे लीना । साहब एक वचन कहि दीना ॥ निगमके पार अगमके आगे । सो सतगुरु मम श्रवणहि लागे ॥ धरनि अकाशते नगर निनारा । तहाँ विराजे धनी हमारा ॥ जहँ नहिँ चन्द सूरकी कांती । तहाँ नहीँ दिवस अरु राती ॥ अगम शब्द जब भाषे नाऊ । तब यम जीव निकट नहिँ आऊ ॥ चलो जीव हरि ब्रह्मा पासे । तुम्हरे धनी मोहि ना आसे ॥ तवहीं हँसा कीन पुकारा । कहँवा हौ तुम धनी हमारा ॥ मोसे यम कीनी बरि याई । कस नहिँ राखहु सद्गुरु आई ॥
छन्द-कीन जीव पुकार ततक्षण खसम बेगहिँ आइये ॥
बेग लागु गुहार सतगुरु हंस लोक पठाइये ॥
काहि करों पुकार साहब मातु पिता नहिँ कोइ जना ॥
करि ठिठाई मारि जीव यम झूठ जग मँह बन्धना ॥
सोरठा-लगे खसम गुहार, घाट घाट यम छेकिया ॥
कठिन परी यमधार, अति व्याकुल अकुलाय जिव ॥
चौपाई
तब सतगुरुका आसन डोला । काल दग्ध जिव व्याकुल बोला ॥
आई खसम तब दर्शन दियऊ । चरण बन्दि हँसा तब लियऊ ॥
साहब देखि भगा यमराई । अति आतुर होय हरिपै जाई ॥
हरिहर वचन
हरिहर बूझे यमसे बाता । कस नहिँ कियो जीवकी घाता ॥
दूत वचन
कहे यम स्वामी विन्ती मोरी । हम जिव छेकि कीन तेहि सोरी ॥
वह सुमिरे सतसुकृत नाऊ । सुनत पुकार धनी चलि आऊ ॥
आवत धनी भयो उजियारा । हम भागे चारो बटपारा ॥
नाम माहात्म्य
बोधसागर
(१२५)
कबीर वचन
वहाँ दूत पहुँचे हरि पासा । यहाँ जीव कहत सुखवासा ॥
जीव वचन
विनय जीव सुनु बन्दी छोरा । हम कहैं कष्ट दीन बड चोरा ॥ नाम तुम्हार बूझे यमराया । कहा नाम तब बचने पाया ॥ तब हम ततछिन कीन पुकारा । बेगहि आओ खसम हमारा ॥
ज्ञानी वचन
सुनो जीव नहिं शब्दहिं ध्यावा । राजा गुरु मानुष विसरावा ॥ गहे नाम अरु करे कमाई । तब यम दूत निकट न आई ॥
जीव वचन
जेहि ते हंसको घर पठवायी । तौन नाम मोहि भाषि सुनायी ॥ जाते जीव अमर घर जावै । दूत भूत यम खबर न पावै ॥
कबीर वचन
साखी-गुप्त नाम सुख भाखिया, अकह अमर निज नाम ॥ अमर कृपा निधि जीव कूँ, पहुँचे जीव निज ठाम ॥
चौपाई
पहुँचे जीव खसम घर जबहीं । सुख आनन्द भये बड तबहीं ॥ कंचन कलस बरत तहैं बाती । आरति करे हंस बहु भांती ॥ देखत जीव हंस उजियारा । अंग अंग शोभा चमकारा ॥ देख द्वीप शोभा बहु भांती । रविशशि मनि लागे जिमि पांती ॥ ता मध्ये जिमि लाल जंडाई । बीच बीच चुनि लै बैठाई ॥ मोतीसर झालरि बहु पोहा । देखत हंस रहे तहैं मोहा ॥ तबहिं पुरुष ज्ञानी हँकराई । कौन वचन तुम जीव सुनाई ॥ कौन वचन तुम जीवन दीना । जाते जीव अटक यम कीना ॥
(१२६)
बीरसिंह बोध
ज्ञानी वचन
दोय कर जोरि कहे शठिहारा । मुक्ति वचन जिव डार विसारा ॥ विसरे नाम छेके यम आयी । भाषि नाम यम जीव छुडायी ॥
पुरुष वचन
आज्ञा जीव पुरुष हंकराई । कहो जीव कस कीन कमाई ॥ कैसे पहुँचे लोक हमारे । सत्य वचन सो कहो विचारे ॥
हंस वचन
मस्तक नाय हंस कर जोरी । अमर पुरुष विन्ती यक मोरी ॥ हे साहब हम कछू न चीन्हा । गुरुको वचन मानि शिरलीन्हा ॥ जा दिन गुरु मोहिं दीनेउ पाना । तब मैं जानवो पद निर्बाना ॥ साधु गुरु मैं जान्यो एका । काम क्रोध छोडयो टेका ॥ साधु संत कर बन्देउ पायो । विसरचो नाम गुरु मोहि सुनायो ॥ अब पुरी यम छेकेउ आयी । पल यक दुख मोहिं तहाँ दिखायी ॥
साखी-खसम आइ दर्शन दिये, दीना नाम सुनाइ ॥ तब आये हम लोककूँ, यम शिर पाँव चढाइ ॥
चौपाई
जो नहिं नाम मुक्तिको पावे । माला डारि जगत बौरावे ॥ सुने नाम अरु करे कमाई । छाडे पारखण्ड अरु अधमाई ॥ निर्मल काया होय संसारा । जाकहँ दया करे करतारा ॥ नाम कवीर जपे बड भागी । उन मन ले गुरुचरमन लागी ॥ जापर दया जो होय तुम्हारी । ताकहँ कहा करहि बटपारी ॥ पुरुष दया जब होय सहायी । सत्यलोकमों जाय समायी ॥
छन्द-पुरुष दया कीन ततछिन अटल काया तब भयो ॥ पुहुप दीप निवास कीना सुमन सज्या आनन्दमयो ॥
बोधसागर
(१२७)
हंसन शिर क्षत्र राजे अमृत फल आनन्द घना ॥ रूप षोडश भानु हंसा कोटि शसिहिं अति बना ॥
सोरठा-धाम जो पाय अमोल, हंसा सुख तहैं विलसही ॥ द्वीपहिं द्वीप कलोल, जरा मरन भ्रम मेटिया ॥
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे बीरसिंहबोधवर्णनो नाम तृतीयस्तरंगः ॥
ग्रन्थ बीरसिंहबोध समाप्त ।
इति श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थ वीरसिंहबोध समाप्त
प्रारंभिक पृष्ठ (बोधसागर द्वितीय भाग)
कबीरसागर चतुर्थ खण्डान्तर्गत
भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी)
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खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.
नं. ५ कबीरसागर - १
संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५
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कबीरपंथके प्रधान आचार्य
A black and white portrait of a bearded man, identified as Shri Ugranam Sahab. He is seated, wearing a crown and traditional robes, and is holding a small object in his hands. The portrait is framed by a dark, textured border.
श्री १०८ पं० श्री उग्रनाम साहब
THE NEW YORK
THE NEW YORK
बोधसागर द्वितीय भागकी अनुक्रमणिका
इसमें चौथे तरंगसे लेकर आठवें तरंगतक है, जिसमें- चौथे तरंगमें भोपालबोध है जो पृष्ठ १ से आरंभ होकर पृष्ठ १६ पर समाप्त हुआ है ।
पाँचवाँ तरंग जगजीवन बोध है जो पृष्ठ १७ से आरम्भ होकर ६० पर समाप्त हुआ है ।
छठा तरंग गढ़बोध है जो पृष्ठ ६१ से आरंभ होकर पृष्ठ १०८ पर समाप्त हुआ है ।
सातवाँ तरंग हनुमानबोध है जो पृष्ठ १०९ से आरम्भ होकर पृष्ठ १३६ पर समाप्त हुआ है ।
आठवाँ तरंग लक्ष्मण बोध है जो पृष्ठ १३७ से आरंभ होकर पृष्ठ १६० पर समाप्त हुआ है ।
उपरोक्त तरङ्गोंकी अलग अलग अनुक्रमणिका इस प्रकार है-
अथ भोपालबोधकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. | विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|---|---|
| धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर | ५ | राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना | ११ |
| धर्मरायका मृत्युको मनुष्योंके मारनेकी आज्ञा देना | राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना | १२ | |
| सत्यगुरुका कबीर साहबको जीवों की रक्षा के लिये पृथ्वीपर आनेकी आज्ञा देना | ॥ | मंत्रि आदिका राजाको महल में न देखकर परजात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना | १५ |
| कबीर साहबका जालंदर देशमें राय भोपाल के घर जाना | ६ | इति | |
| राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना | ७ | अथ जगजीवनबोधकी अनु-क्रमणिका | |
| राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकृता | ८ | धर्मदास साहबका गर्भवियय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर | २१ |
| रानीका सद्गुरुके अधीन होना | ९ | गर्भोत्पत्ति वर्णन | २२ |
| कबीर साहबका राजारानीको ज्ञान समझाना | ॥ | जगजीवनका गर्भके कष्ट से व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कीस करना | २३ |
( ६ )
बोधसागर द्वितीयभागको अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. | विषय. | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर | सदगुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बना | ||
| गर्भसे मुक्त करना | २५ | कर गमन करना | ४९ |
| पिशुन कर्म वर्णन | २६ | राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना | |
| पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भ- | और अधिकारी हूँताँका साथ जाना | ५० | |
| का कौल भूल जाना और संसारी बँधबन्धमें | सत्य लोकके मार्गमें धर्मरायसे हूँताँ का | ||
| मगन होना | २९ | वातालाप | ५१ |
| सदगुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखे | कामिनीसे बातचीत | ५२ | |
| बागमें ठहरना, उसका हरा होजाना | हंस गुज्रन जनसे बातचीत | ५३ | |
| और राजाका खबर पाकर बाग देखने | सब हूँताँको लेकर ज्ञानीजीका सत्य पुरुषके | ||
| आना फिर कबीर साहबसे मिलना | ३२ | सन्मुख जाना और सत्य पुरुषको प्रसन्नता | ५४ |
| सदगुरुका राजा हो गर्भका कौल याद | ग्रन्थसार | ५६ | |
| दिलाना | ३४ | इति | |
| राजाका सदगुरुसे उद्धारकी बिल्ली करना | ३५ | अथगुरुबोधकी अनुक्रमणिका | |
| सदगुरुका राजाको आरती करनेका उप- | सत्यपुरुषका ज्ञानीजीको संसारमें जाकर | ||
| देश देना | ३० | जीवोंको चितानेको आज्ञा देना | ६५ |
| राजाका पहलेके हूँताँका हाल पूछना और | ज्ञानीजीका संसारमें आना और गुरुसे | ||
| सदगुरुका उत्तर देना | ३७ | भेट होना | ६६ |
| राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद- | गुरुका श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना | ६७ | |
| गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका | गुरुका ज्ञानीजीके आधीन होना | ६८ | |
| हट करना पीछे शरणमें आना | ३९ | श्रीकृष्णका गुरुको कबीर साहबको गुरु | |
| कुफर्मा जीवके उद्धारका उपाय | ४० | बनानेको आज्ञा देना | ७० |
| सत्यलोकके आनेका मार्ग | " | गुरुका आरतीका साज एकट्ठा करना | ७१ |
| आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवों- | गुरुका सब देवोंको आरतीमें बुलानेके | ||
| का पान लेना | ४३ | लिये नेवता देनेको ब्रह्मसभामें जाना | " |
| तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्न | महादेवका बोध करना और गुरुका उन्हें | ||
| २ लोककी प्राप्ति | ४४ | समझाना | ७२ |
| राजाका सदगुरुसे लोक लेजानेको बिल्ली | गुरुकी आरतीमें सब देवोंका आना और | ||
| करना | ४५ | गुरुका परवाना लेना | ७३ |
| सदगुरुका प्रसाद पाना | ४६ | गुरुका त्रिवेवसे जर्बा करने जाना | ७४ |
| पान माहात्म्य | ४७ | गुरु और ब्रह्मासे जर्बा | " |
| काल ज्ञान | " | ब्रह्माका विमान भंजकर विष्णु और महादेव | |
| सदगुरुका पाटनसे चलनेका बिचार प्रगट | को बुलाना | ७७ | |
| करना और बहूँके हूँताँकी बिल्ली | ४८ |
बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका
( ७ )
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत | ७९ |
| गरुड़ और महादेवका बातलाप | ८१ |
| तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद | |
| पूछनेको जाना | ८३ |
| निर्गुण भेद वर्णन | ८६ |
| लौकिक ज्ञान वर्णन | ८७ |
| महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान | ८८ |
| गरुड़का तीनों देवोंकी परीक्षा लेनेके लिये | |
| बालक लाना | ८९ |
| बालकका कालसे रक्षाके लिये त्रिदेवसे | |
| विनती करना | ९० |
| तीनों देवका कालसे रक्षा करनेमें असमर्थ | |
| होना और गरुड़का बालकको जिलाने की | |
| प्रतिज्ञा करना | ९३ |
| गरुड़का लोक लोकान्तरमें अमृतके लिये | |
| फिरना और सब लोकपालोंसे चर्चा | |
| करना | ९६ |
| गरुड़का अमृत लाकर बालक को जिलाना | |
| और तीनों देवका हार मानना | १०४ |
| गरुड़ बोधका संक्षेपसार | १०५ |
| इति | |
| अथ हनुमान बोधकी अनु- | |
| क्रमणिका | |
| धर्मदास साहबका प्रश्न | ११३ |
| हनुमान शब्दका अर्थ और हनुमान बोधका | |
| भाव (टीप्पणीमें) | ” |
| बेतामें कबीरसाहबका हनुमान से मिलना | |
| हनुमानका अपनी बड़ाई करना और | |
| मुनीन्द्रजीका समझाना | ११५ |
| हनुमान रामचन्द्रजीको सबके ऊपर | |
| बापना (रामनामकी बड़ाई) | ११६ |
| मुनीन्द्रजीका हनुमानके वचनका खण्डन | |
| कर देना | ११७ |
| हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई | |
| करना | ११९ |
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| मुनीन्द्रजीका समरथकी बड़ाई करना | |
| और हनुमानका सन्देहमें आकर समरथ | |
| की बात पूछना मुनीन्द्रजीका समरथकी | |
| बात कहना | १२१ |
| हनुमानका मुनीन्द्रजीसे समरथके देशमें | |
| लंजानेपर उसको देख लेने पर विस्वास | |
| करनेकी बात कहना | १२३ |
| मुनीन्द्रजीका लोप होजाना और हनुमानका | |
| घबराकर पुकारना, फिर मुनीन्द्रजीका | |
| प्रगट होना | ” |
| हनुमानका मुनीन्द्रजीसे अपनेको शिष्य कर | |
| लेनेको प्रार्थना करना | १२४ |
| मुनीन्द्रजीके योग्यीत नामसे प्रकट होकर | |
| आदि उत्पत्तिकी कथा हनुमानको | |
| सुनाना | ” |
| हनुमानका साधु लक्षण विषय मुनीन्द्रजीसे | |
| प्रश्न करना और नाना वेष तथा योग | |
| युक्ति का वर्णन करना | १२५ |
| साधुलक्षण (मुनीन्द्रबचन) | १२६ |
| हनुमानका समरथका ठिकाना और वहां | |
| पहुँचनेकी युक्ति पूछना | १२७ |
| मुनीन्द्रजीका सुरति निरति एक करना | |
| समरथके घर पहुँचनेका मार्ग बताना | ” |
| हनुमानका सुरति निरति एक करनेकी | |
| युक्ति पूछना | ” |
| मुनीन्द्रजीका समरथके घर पहुँचनेके लिये | |
| सुरति निरति एक करनेकी युक्ति | |
| हनुमान को बताना | १२८ |
| हनुमानका कबीर साहबका उपकार मानना | १३१ |
| ग्रन्थकी सभाप्ति कबीरका वचन धर्मदास | |
| प्रति | १३२ |
| सारविचार पचीसी | १३३ |
| इति |
( ८ )
बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| अथ लक्ष्मण बोधकी अनुक्रमणिका संगत्ता- | |
| चरण और उत्थानिका | १४१ |
| कृष्णजीका शरीर त्याग देना, बलभद्रजी | |
| का संदेश और कृष्णका समझाना | ” |
| बलभद्रजीका कृष्णके शवका दाह करके | |
| समुद्रमें बहा देना और कृष्णजीका उडीसा | |
| के राजाको स्वप्न देना | १४२ |
| राजाका समुद्रमें स्नानको जाना और कृष्ण | |
| के शवको पाकर स्वप्नको सच्चा समझ | |
| कर जगन्नाथका मन्दिर बनवाना | १४३ |
| समुद्रका अपना बहला लेनेके लिये मंदि- | |
| रको छः बार बहा ले जाना | ” |
| सातवें बार कबीर साहबका समुद्र तटपर | |
| बैठना और समुद्रका पीछे लौट जाना | ” |
| लक्ष्मी और कबीरसाहबकी बातलाप | १४४ |
| समुद्र और कबीर साहबकी बातचीत | १४६ |
| ब्रह्मायुगकी वार्ता (लक्ष्मणबोध) | १४८ |
| समुद्रका द्वारिका दुबा लेना और कबीर | |
| साहबका जगन्नाथके यज्ञमें जाना पण्डा | |
| का संदेह और अनंत कबीरका दर्शन | |
| तथा जगन्नाथमें छूत छात माननेवाले | |
| के दंडका वर्णन | १४९ |
| ब्राह्मणका समुद्र तटपर स्नान करने जाना | |
| वहां कबीर साहबकी देखकर घृणा | |
| करना उसके देहमें कोढ़ फूटना राजा |
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| का कबीर साहबसे प्रार्थना करके | |
| ब्राह्मणका शरीर अच्छा कराना | १५० |
| जगन्नाथजीकी काष्ठकी प्रतिमा बनानेके | |
| लिये राजाको स्वप्न देना | १५१ |
| राजाका मलयगिरिसे चन्दन लाना और | |
| मूर्ति बनानेके लिये कारीगरका खोजना | |
| और कारीगर न मिलनेसे राजाका | |
| विकल होना | ” |
| कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे | |
| कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार पर | |
| जाना और सोलह दिनतक द्वार न खोलनेका | |
| वचन लेकर प्रतिमा बनानेको बैठना | १५३ |
| कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे | |
| कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार | |
| पर जाना और सोलह दिनतक द्वार | |
| न खोलनेका वचन लेकर प्रतिमा | |
| अपूर्ण रहना | १५४ |
| जगन्नाथजीका गोरखको शाप देना और | |
| योगियोंका जगन्नाथ दर्शन बन्द होना | ” |
| सम्मानित और कबीर साहबका सिंहल | |
| दीप गमन | ” |
| संक्षेपसार और ग्रन्थपर साधारण दृष्टि | १५४ |
| इति |
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित
श्री-भोपालबोध
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४
नं. ५ कबीरसागर - २
श्री कालिका
प्रकाशक : श्री कालिका पुस्तक संख्या : १०१ प्रकाशक : श्री कालिका
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or sage, holding a staff or lotus, with a small figure to the right. The figure is depicted in a meditative or seated posture, wearing robes. Above the figure is a small, triangular, umbrella-like structure. The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a faded print on the page.
विष्णु विष्णु वि
धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर
सत्यकबीराय तमः
यस्योपदेशमाराध्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् । तं कबीरमहं वन्दे मनोवाक्यायकर्मभिः ॥
अथ श्रीबोधसागरे
चतुर्थस्तरंगः
श्रीग्रन्थ भोपालबोध प्रारंभः
धर्मदासवचन चौपाई
धर्मदास कहे बन्दी छोरा । कैसे जीवन मारत चोरा ॥ केहि विधि जीवन मारत आई । साहिब सो मोहि भाष सुनायी ॥ कारण कौन मारत यम जीवा । मारन काल कौन है नीवा ॥
सतगुरु वचन
सद्गुरु कहै अंश सुनु वानी । महा कालकी कहौं निशानी ॥ धर्मराय आज्ञा जब करई । तबहीं मीच पृथ्वी पग धरई ॥
धर्मराय वचन
भयी मृष्टि बहुत अधिकार्ई । पृथ्वी भार न जाय सहाई ॥ ताते मीच पृथ्वी तुम जाऊ । जीवन धरि हम पर ले आऊ ॥ आनो जीव हमारे पास । जाहु मीच पृथ्वी करु बासा ॥ पवनरूप घट जाइ समाओ । जीवन जाय बाँधि ले आओ ॥ खांसी जूडी ताप तिजारी । काम क्रोध होउ रोग अपारी ॥
कबीर साहबका जालंधर देशमें राय भोपाल के घर जाना
( ६ )
भोपालबोध
लोभ मोह भ्रम फाँस अपारा । यह नहीं मर्म लखै संसारा ॥ यहि फन्दा जग सबहिं फन्दाओ । विरले हंस सुकृत बन्दाओ ॥ साखी-यहि विधि जगमें जाइके, जीव लाउ हम पास ॥ फन्दा डारहु जीव पै, होहु मीच दुख रास ॥
चौपाई
यहि विधि काल जब आज्ञादीना । चले यमदूत सब साज सजीना ॥ उत पुरुष आज्ञा मोहि दीन्हा । जीव सुक्तावन कहै पठावन लीन्हा कहे पुरुष सुनु ज्ञानी बाता । काल करे अब जीवन घाता ॥ घात करी सो भक्षण करिहै । बहुरि जीव भौसागर परि है ॥ काल दुष्ट बहु जीव सतावै । सारशब्द विनु मोहि न पावै ॥ याते जगमहँ अब तुम आओ । जीवहिं चिताय लोक कहँ लाओ ॥ आज्ञा मोरि लेहु सहिदाना । जाइ जगत जीव लाओ निदाना ॥ साखी-सुकृत जाहु संसार में, उल्टी राह चलाउ ॥ शब्दसार जीवन कहो, काल हंस सुक्ताउ ॥
चौपाई
पुरुष आज्ञा हम शिर मानी । करि प्रणाम तब जगत पयानी ॥ देश जलंधर राय भोपाला । गयउ तहां जिन्दाके हाला ॥ जाई पौरिमें ठाढ रहायी । कह्यो पौरिया बहुत चितायी ॥ राजहिं लाउ हमारे पास । दर्शन करै कर्म नृप नासा ॥ लागे कुंजी कुलुफ किवौरा । बहुत लोग बैठे शठिहारा ॥ कोइ कहै न्याय जिन्द चाहै । कोइ कहै बटपार यह आहै ॥ कोई कहै मारि यहि खेदो । निर्गुण भेद तिन्है नहिं भेदो ॥ चारि पहर तब रैन बितावा । भयो भिनसार भोर हो आवा ॥ तब हम चरित दिखावन लागे । फूटि कपाट भये दोह भागे ॥