कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानसागर
( ५१ )
साखी-मारहु जादव वंश कहैं, मानो वचन रसाल ।
गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल
कृष्ण वचन-चोपार्द
कृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना॥
निरंजन वचन
तैं मम अंश मोहिमें वासा । काल रूप संसार निवासा ॥
पातक जीव जो रहै महाबल । मारहुतिनिहीतुम अतिबल छल॥
उपजत विनसत क्षीन भइ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥
क्षीण शरीर अवधि भइ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥
जस कछु कहो कियासो चढ़िहौ । जाकौ दिया राज महिकरिहौ॥
छाड़ो महि मंडलको भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥
तजो कृष्ण अब वेग शरीरू । आये अन्न अब दास कबीरू ॥
कृष्ण वचन
साखी-सुन कियो कृष्ण अचंभो, कैसो दास कबीर ॥
सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरोर ॥
निरंजन वचन-चोपार्द
कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहिअवधि है थोरा ॥
पांडव नंदन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबहीनिवतजुआवहि॥
यज्ञ पूर्ण नहिं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहिं कोई ॥
कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू॥
तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूरण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥
या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥
बालिही राम रूप तुम मारा । ताकर होई व्याध औतारा ॥
ताकर बैर देहुँ तुम जाई । फेर जीव कछु संशय नाई ॥
सुनिकै कृष्ण चले सिरनाई । नगर द्वारिका पहुँचे आई ॥
पाण्डव यज्ञ तथा सुपच सुदर्शन कथा-वर्णन
( ५२ )
ज्ञानसागर
पांडव निवते यज्ञ पठाये । चलिये स्वामी बेग बुलाये ॥
मारन बंधु या किया लागा । तातें यज्ञ रची है रागा ॥
चल भये कृष्ण बार नहिलाये । पुर पांडव के आश्रम आये ॥
आवत समाधान नृप कीन्हा । छत्र तानि सिंहासन दीन्हा ॥
आवत कृष्णसभा सिर नावा । भोजन को तब आज्ञा पावा ॥
साखी-बैठे गन्धरव देव गण, ऋषि मुनिवर सब झार ॥
सब मिलि कीन्हा भोजन, इच्छा के अनुसार ॥
चौपाई
भोजन भये घंट नहिं बाजा । राय युधिष्ठिर को भयी लाजा ॥
अहो कृष्ण का करौं उपाई । सोमोहि स्वामी कहिये समुझाई ॥
जबहि कृष्ण अस भाव बताया । सुनहू मंत्र युधिष्ठिर राया ॥
खोजहु भक्त जो निर्गुण गावयी । सतगुण महिमा सदा बतावयी ॥
आनब ताहि यज्ञ निवताई । दीन भाव कर ताहि लिवाई ॥
कृष्ण वचन सुनि युधिष्ठिर राया । भगत बुलावन दूत पठाया ॥
सुनिके दूत चले चहुँ देशा । नहिं कोइ भक्तन भेटे वेशा ॥
चले भीम तब लागि न वारा । चहुँ दिश फिर काशी पगुधारा ॥
बैठे सुपच ताहि सों कहई । निर्गुन भक्त यहाँ कोइ रहई ॥
कहै सुपच निर्गुन को जानों । सतगुरु महिमा सदा बखानों ॥
साखी-कहै भीम सुन हरिजन, कृपा करौं मम संग ॥
चलो जहाँ हरि बैठे, स्वामी बाल गुविन्द ॥
चौपाई
कहै सुपच प्रभु कैसे कहऊ । कालहि जान कृष्ण परिहरऊ ॥
सुनतहि भीम कोप तब कीन्हा । यामैं कहा भक्त वर चीन्हा ॥
यहि मारो तो राख रिसाई । कह्यो मंत्र राजा पर जाई ॥
तीन लोक के जे प्रभुराई । तिनको भाखै काल कसाई ॥
ज्ञानसागर
( ५३ )
कृष्णहि कहै काल की फांसी । कीन्हही आय भक्त की हांसी ॥
मारचो नहि पर तुव भय माना । यह सुनकर विहिसे भगवाना ॥
सारखी-जाव युधिष्ठिर वेग दै, तुम आनो गहि पांय ॥
आज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥
चोपाई
अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥
चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै कालू ॥
कहैं सुपच सुन पांडव राज । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥
तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥
चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठे हरषंता ॥
आवत स्वपच कृष्ण जब जाना । होय काज पूरण सनमाना ॥
राय युधिष्ठिर पखारे पांऊ । भोजन सादर आन जिवाऊं ॥
भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥
बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥
पूरण यज्ञ विष्णु जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥
सारखी-बूझो रे नर परानी, क्या सुपचे अधिकार ॥
गण गन्धर्व सुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥
चोपाई
सब के खाये घंट नहि बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥
सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं । नामहि महिमा जानत नाहीं ॥
सुपच जान भल नाम प्रभाऊ । ताते पूरण यज्ञ कराऊ ॥
कृष्ण शक्ति में सुनि ऋषि झूला । जान बूझिकै पंडित भूला ॥
बूझौ सन्तो नाम हमारा । नाम विना किमि उत्तरौ पारा ॥
कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा । तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥
गोपी लैकै जाऊं मैं जहँवा । पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥
कृष्णका स्वर्गारोहण और जगन्नाथकी स्थापना
( ५४ )
ज्ञानसागर
मथुरा तैं तुम वेग लै आवहु । जाहु तुरन्त गहर जनिलावहु ॥
चल भयो पार्थ हाथ धनु तीरा । गोपी लैन कोटिन यदुबीरा ॥
आपस में जो करे लड़ाई । इक मारे एक मरजाई ॥
छप्पन कोटि जो सबै सिरानो । सो नट षट कृष्णहि के जानो ॥
अष्ट कन्या लखी चित्रसारी । तिनकहैं कृष्णजो यहि विधि मारी ॥
साखी-मारिन सब जेती हती, कृष्ण काल बरि यान ॥
तब अपने मन में गुनौ, करो उदधि अस्थान ॥
चौपाई
वधिक देव घात संधाना । बालि बैरको भाव जो जाना ॥
जम सब प्रान घेर लै गयेऊ । मारचो कृष्ण मूर्च्छित भयेऊ ॥
निरंकार निरंजन राऊ । आपहि मारिजो ताहि नसाऊ ॥
बालि का बैर व्याधा जबलीन्हा । यह तो भेद न काहू चीन्हा ॥
तीन लोक के कृष्ण भुवारा । रहै न बैर जीव व्यवहारा ॥
जो जीव आप स्वारथहि मारा । सो जीव अपनौ किमि निस्तारा ॥
तबहि कृष्ण अस मता विचारा । तत्त्व मता अस रूप संहारा ॥
जादव रूप कृष्ण सब मारे । पारथ बान रहे सब हारे ॥
गोपी रही जो प्राणहि प्यारी । तिनको कृष्ण येहि बिधि मारी ॥
आये कृष्ण पहुँ अर्जुन बीरा । लाज न छाड़ै अत्र शरीरा ॥
साखी-कहैं कृष्ण सुन अर्जुन, छाड़ो यहि संसार ॥
हम तो जात हैं स्वर्ग को, इत परंपंच अपार ॥
गये पारथ जहँ चारौं भाई । चलौ वही जहँ यादो राई ॥
कहै सन्देश सुनौ हो राऊ । यहवाँ मोर दर्श नहि पाऊ ॥
मृत मंडल नहि मेटव मोही । छाड़ौ महि बोलों अस तोही ॥
छाड़ौ राज पाट सब भाई । पुत्र राज देख सब जाई ॥
निकलंक अवतारकी वार्ता
ज्ञानसागर
( ५५ )
चारेउ पांडव काल बड़ा भयेऊ । रायशुधिष्ठिर सदेह तब गयेऊ ॥
ता कहैं बड़ शासन जो कीन्हा । नाम विना देखो अस चीन्हा ॥
देखत कृष्ण अपन तन त्यागा । चिता तासु की रचन जो लागा ॥
चन्दन काष्ठ तासु तन जारा । चल भयो काष्ठ समुद्र मझारा ॥
इंद्र देवन हरि सपना दयेऊ । तिन पुनि काष्ठ आन धरि लयेऊ ॥
सुंधायो द्वार काहु नहि जाना । ठक २ उठै दिन रात प्रवीना ॥
शिशुपाल भुजा चार रहो जाही । मारचो कृष्ण जो भक्ष्यो ताही ॥
साखी-सबै अंग सम्पूर्ण हैं, जगन्नाथ को भाव ॥
शिशुपाल की भुजा उखारी, ताको वैर दिवाव ॥
चौपाई
दोह भुजा काष्ठ जेहि उरेहा । वैर न छूटे सो गहि देहा ॥
जो काइ जीव जोर कर मारा । तासु जन्म किमिहो निस्तारा ॥
राम कृष्ण तैं को बड़ आही । वैर घात तासों न रहाही ॥
कृषी करै किसान जस भाऊ । ऐसी दसों जनम निर्माऊ ॥
दसों जनम ऐसे ही बीते । तासों कहै कि सुक्ति करीते ॥
बूझो नहि चरित्र भगवाना । तीन जुग गये काल नियराना ॥
है बड़ ठाकुर ज्योति स्वरूपा । तिन सब रच्यो मही औ भूपा ॥
आप स्वार्थी तिनहु मारे । ज्यों नकटी विश्वासहि वारे ॥
साखी-जिस सिरदार मही को, करै चरित्र भुवार ॥
जहैं तहैं शील पटावै, मछ बली तब धार ॥
चौपाई
कलियुग अन्त मलेच्छ व्यवहारा । तब हरि निष्कलंक अवतारा ॥
मारहि मलेच्छ सबै पुर कैसे । पावक मध्य तृण है जैसे ॥
पावक रूपनि कलंक अवतारा । तृण समान मलेच्छ संहारा ॥
बहुर कलंकी ज्योति समाई । कौतुक करै निरंजन राई ॥
ऐसे दसों जन्म निर्माये । निरंकार पुनि ताहि सताये ॥
उत्पत्ति परलयका लेखा
( ५६ )
ज्ञानसागर
धर्मदास वचन
धर्मदास कहैं सुनौं गुसाई । दसों जन्म कहि मोहि सुनाई ॥
कलप अनेक निरंजन राजा । आगे कैसा करि है साजा ॥
सो सब स्वामी मोहि जनाओ । उत्पति प्रलय भाव बताओ ॥
उत्पति प्रलय सुनौं तुम पाही । कहौ सबै जो संशय जाही ॥
साहिब कबीर वचन
चारौं युग हैं रहट स्वभाऊ । सो अब तोहि कहौं समुझाऊँ ॥
चारौं युग अंत जब होई । वषैं अग्नि निरंजन सोई ॥
पृथ्वी जार करै सब पानी । रहै स्वर्ग सो कहौ निशानी ॥
रहै जो देव तैंतीस करोरी । रहै जब तपसी तपकी जोरी ॥
चन्द्र सूर्य तारागण झारी । जबही देह तजै सुख चारी ॥
विष्णु बीतही दस अवतारा । नहिं शिव बीत योग जो धारा ॥
यहि विधि बहत रचौकड़ी जाई । सेवा फल पावै अन्याई ॥
उत्पति करै पुन प्रथम स्वभाऊ । ऐसे भवसागर निर्माऊ ॥
छंद-महा प्रलय जब किया निरंजन अग्नि सेवत ना रहो ।
लोमस ऋषितबहोय अंतहि शशि भानु पानी सब गयो ॥
तीन गुन पांच तत्त्व बीते दस चार सुत आकाश हो ।
महा देवी आदि कन्या ताही करै वह गरास हो ॥
सोरठा-सब भक्षे निरंजन राय, आदि अंत ना कछु रहै ।
शिव कन्यानाम विहाय, सब जी राखै आपमें ॥
चौपाई
सतगुरु दया जाहि पर होई । नाम प्रताप बाचे जन सोई ॥
निज घर हंसा करहि पयाना । और सकल जीवतहां समाना ॥
जाई रहैं जहां धर्महि द्वीपा । प्रथम करी जो लोक समीपा ॥
उत्पति कारण सेवा करहीं । पुनियहि भांति सृष्टि अनुसरहीं ॥
कृत्ययुगमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना
ज्ञानसागर
( ५७ )
भक्त अभक्त सबै पुनि खाई । सबको भक्षै निरंजन राई ॥
सो पुनि महिमा वेद बखाने । वेद पढे पर भेद ना जाने ॥
छंद-जेहि को भरोसा सोई चुरावै कहो तब कैसी वने ।
सेवा करै जेहि पुरुषकी सो भक्षण प्रति दिन करै ॥
जानी कै बूझै नहिं केतो कहो समुझाय हो ।
आदि अंत सबै यसै अस निरंजन राय हो ॥
सोरठा-काल सबनको खाय, हरि हर ब्रह्मासे सबै ।
वाचै कौन उपाय, एक नाम जाने बिना ॥
धर्मदासवचन-जीपाई
धर्मदास टेके गहि पाऊ । हे स्वामी मोहि भेद बताऊ ॥
कैसे आयो यहि संसारा । सो कहिये मोसों ध्यवहारा ॥
साहब कवीर वचन
सत्य युगमें कवीर साहबका पृथ्वी पर प्रगट होना
सुन धर्मनि मै तोहि बताउं । लोक छोड़ि मै इहँवां आउं ॥
सतयुग सत सुकृत मम नाउं । सोई सबै तोहि समझाउं ॥
हंस उवारन आयेउ जबही । मथुरा नगरहि पहुँचे तबही ॥
गुरुमठमांझ जो आसन कीन्ह। रक्षा अंत मोहि काहु न चीन्ह। ॥
कहौं भक्ति बहु भाति हटाई । बिन अंकूर न जीव जगाई ॥
बिबसी नाम रहै इक नांरी । ज्ञानवंत औ वरण कुँमारी ॥
तासों कहो भक्ति परमाना । बिबसी सुनै अचंभौ माना ॥
बिबसी वचन
साखी-अचरज कही तुम स्वामी, लोक वर्ण उजियार ॥
पहिले लोक दिखाओ, पीछे हो इतबार ॥
१ रानी-ऐसा भी पाठ है । २-बिश्वास
त्रेतामें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना
( ५८ )
ज्ञानसागर
चोपाई
तब हम मता अस कीन्हा । ताके शीश हाथ जो दीन्हा ॥
परसत शीश ताकर भय भागा । शून्य मंदिरमें सुहरा जागा ॥
देखत सुरति निरति सौ लोका । बिबसीका मेटचो सब धोखा ॥
हे स्वामी अब कीजे दाय। यमके घरसे जीव मुक्ताया ॥
बार अनेक विनय तिन कीन्हा । तब हम नाम लखाई दीन्हा ॥
भक्ति भावसों करै अनंदा । ज्यों चकोर पाये निशि चन्दा ॥
ताके गृह निंदक सब रहई । बिबसी देखत ही पर हरई ॥
साखी-जाके पाछे हंस जो उबरे, तिनहिको जो बताव ॥
हंस ग्यारह आयऊ, गुरुसे कीन्ह भिट्ठाब ॥
चोपाई
तिन कह सत् शब्द जो दीन्हा । परम पुरुषके दर्शन कीन्हा ॥
तब उठि गयो पुरुषके ठाऊँ । सतयुग सत सुकृत मम नाऊँ ॥
आवत जात लखे नहिं कोई । आज्ञा पुरुषकी जापर होई ॥
त्रेतायुगमें कबीर साहबका प्राकट्य
चोपाई
त्रेतायुग आयो पुनि जबही । युग अनुमान चलो मैं तबही ॥
नाम मुनींद्र धरो निःशंका । प्रथम जाय देखेउ गढ़लंका ॥
द्वारपाल सों कहि समुझाई । राजाको ले आव बुलाई ॥
सुन प्रतिहार कह अस वानी । रावन मरम सिद्ध नहिं जानी ॥
महा गर्व कछु गिने न आनो । शिवके बल कछु शंक न मानो ॥
मारहि मोहि कहाँ जो जाई । गर्व प्रहारी है रावन राई ॥
मुनींद्रववन
जाहु तुरत कहा सुन मोरा । बार बंक नहिं होवहिं तोरा ॥
प्रतीहार जब बात सुनाई । सिद्ध एक है ठाढ़ गुसाई ॥
सुनिनुपक्रोध अनल समकीन्हा । प्रतीहार तुम मति अति हीना ॥
भिक्षुक एक जो मोहि बुलावै । शिव सुत मार दरशनहिं पावै ॥
ज्ञानसागर
( ५१ )
साखी-कहा रूप तेहि ऋषीकर, मोहि कहो समझाय ॥
जो मांगे सो देव वहि, लेइ बहुर घर जाय ॥
चौपाई
हे प्रभु आहि सेत जो भाऊ । सेत अंग जैसे शशि गऊ ॥
माला तिलक बदन है सेता । कहै नृपति कोई आहि अजेता ॥
मन्दोदरि कहै सुनो हो राजा । ऐसा रूप और नहि छाजा ॥
सेत रूप महिमा मैं जानौं । निश्चय है कोई पुरुष पुरानो ॥
जार्ई तुरन्त गहौ तुम पाऊ । होऊ अकल सुन रावन राऊ ॥
दस सिर बचन सुनत पर जरेऊ । जगत हुताशन जनु वृत्त परेऊ ॥
चलि भयो असुर अनिल समचीन्हा । बहुत वेग मनमें अस कीन्हा ॥
सत्तरवार खड़ सो चलावा । तब हम ओट तृणकी लावा ॥
साखी-तृण ओट जेहि कारणे, गर्व परिहरौ राव ॥
तृण जवही ना टूटयो, राजहि शोक जनाव ॥
चौपाई
कह मन्दोदरि गहि मम पाऊ । गर्व न छाड़ रावन राऊ ॥
शिवकी सेव करै मन मानी । अटल राज दीन्हा तिन ठानी ॥
तब चलत हम कही अस बाणी । मृदु नृपति तुम मर्म न जानी ॥
सुनु रावण जो लंक मझारा । सब कहैं रामचन्द्र जो मारा ॥
काहू मुक्ति गम्य नहि पाई । ताते मैं कछु कहां बुझाई ॥
तो कहैं भक्षहि काल अन्याई । काचा मास स्वान जिमि खाई ॥
काल भक्ष जिव सबहि निदाना । अधिक तोर कछु मरदै माना ॥
अगिला जन्म तोर होइ जवही । भक्षी कृष्ण देख पुन तबही ॥
उनसे करिहौ बहु अभिमाना । ताकर तोहि कहा परवाना ॥
तृण नहि टूटो बल तुम बूझा । आगै कहा तोह बल सूझा ॥
वालि नाम इक कपि जो होई । रख छह मास तोहि कहैं गोई ॥
तिनकी कांख रहिहौ छै मासा । ऐसा कहैं पग कौन्ह प्रकाशा ॥
( ६० )
ज्ञानसागर
सार्वी-रावणको अपमान करि, अवध नगर चलि आय।
दशा सन्त की जान कै, मधुकर पकरै पाय ॥
प्रसंग-चौपाई
नमस्कार कर गहि लिये पाऊं । बाल गोपाल चरण तर नाऊं ॥
ताकी प्रीति नीक मैं जाना । तासों लोक संदेश बखाना ॥
तिन कीन्ही विन्ती बहुवानी । हे प्रभु देखों लोक सहिदानी ॥
लैकर चले पंथ तेहि जहँवा । पांजी एक रहे धर्म तहँवा ॥
देखि ताहि दौरे यम दूता । कहाँ ले चले विप्रको पूता ॥
कहैं सुनींद्र सुनो यमराई । इनको जिन रोकौ तुम आई ॥
जाकर दूत जाव तेहि पास। पाछे करो वैर की आशा ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव आज्ञा देही । तीन लोक महाँ जिव गहि लेही ॥
सार्वी-छोड़ देव यह मारग, तुम अब आहु कौन ॥
यहां कोई नहीं आवे, तुम कह करत हो गौन ॥
चौपाई
तव सुनींद्र अस बोले लीन्हा । होहु दूत तुम सब बलहीना ॥
शब्द प्रमाण न होई बल थोड़ा । दूतन जीत गये महि ओरा ॥
तिनको दिव्य दृष्टि कर दीन्हा । तहँवा जाय लोक तिन चीन्हा ॥
देखि स्वरूप सुरंग अपारा । झलके जोत जहां उजियारा ॥
देखत मधुकर बहुत प्रतीती । हे स्वामी तुम यम कहैं जीती ॥
मो कहैं दीजै शब्द दृढाई । जेहिते हम परम पद पाई ॥
अति आधीन देखा मैं जबहीं । नाम दृढाय दियो तेहि तबहीं ॥
अति आधीन जो बोलस्वभाऊ । मोरे गृह अब धारो पाऊ ॥
ताके गृह आयो मैं जबहीं । सोरा जीव शरण भये तबहीं ॥
सार्वी-मधुकर जेते जीव सब, लोकहि कीन्ह पयान ॥
तातैं नाम सुनींद्र कहि, जीव सत्त दियो दान ॥
द्वापरमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना
ज्ञानसागर
( ६१ )
चोपाई
तब हम गये आप सुख सागर । अभय पक्ष जहाँ नाम उजागर ॥
विन्ती दंडवत कीन्ह अनेका । पुहुप द्वीप द्वीपन को थेगा ॥
कीडा विनोद होत बहु भावा । द्वापर युग धर्म न नियराया ॥
द्वापरमें कबीर साहिबका प्राकट्य
आज्ञा पुरुष दीन्ह मोहिं सारा । ताते बहुरि नाम उर धारा ॥
करूणा मय मम नाम प्रकासा । बहु जीवन कहैं छुड़ायो फांसा ॥
आयो जहाँ चन्दबिज बड़राऊ । गढ़ गिरनार नगर तेहि ठाऊ ॥
ताकी नारि रहे ब्रतधारी । पूजै साधु कुल लाज विसारी ॥
तिन पुनि सुधि सो हमारी पाई । लैगयी बहु विधि तुरत लिवाई ॥
आई चेरि विन्ती कीन्हा । तुव दर्शन रानी चित दीन्हा ॥
मैं नहिं राजा रावकर जाऊं । उठ रानी आपहि चलि आऊ ॥
नमस्कार कै कहि अस बानी । मोरे गृह पगु धारौं ज्ञानी ॥
ताकी प्रीति नीक मैं जाना । राजा गृह तब कीन्ह पयाना ॥
रानी कह उपदेश जो दीन्हा । राजा कर कछु शंक न कीन्हा ॥
साखी-एक दिवस जो रानी, बूझा मता अपार ॥
कहा मता तुम ज्ञानी, सो कछु कहो विचार ॥
रानी इन्दुमतीका कबीर साहबसे ज्ञान चर्चा करना-चोपाई
तासो कह्यो सुनौं हो रानी । अथरहिं रहौं नाम मम ज्ञानी ॥
जो कोइ माने कहा हमारा । ताको पठऊं जम सों न्यारा ॥
कहे रानी मोहि कीजे दाय। जातैं नहिं हते यमराया ॥
बहुत भांति तत्त्व जो चीन्हा । बहु विधि विन्ती मुक्ति अधीना ॥
कृष्ण-विष्णु-म्यवहार
सोवत कृष्ण स्वप्न इक देखा । बहु वैकुंठ सेत जनु रेखा ॥
उग्यो बादल सेतहिं फूला । सपना देख कृष्ण मन भूला ॥
( ६२ )
ज्ञानसागर
अहो ब्रह्मा मैं सपना देखा । बादल उमंग पड्डप की रेखा ॥
सोवत देखा पुरमें अपना । ब्रह्मा वेद देख कहु सपना ॥
रास वर्ग गनि मोहि बताओ । जेहि ते जीवका भर्म मिटाओ ॥
तब पुनि ब्रह्मा वेद विचारा । पुनि भाष्यो ताकर उपचारा ॥
सुनो विष्णु समझाऊं तोही । यही आज्ञा भयीं सो मोही ॥
साखी—है कोई ज्ञानी जीव बड़ा, तेहि कारण प्रभु आव ॥
दूत ताहि नहि पावई, सत्त पुरुष सुन नाव ॥
चोपाई
सुनिके विष्णु अचरज मन कीन्हा । ब्रह्मा सों तब बोले लीन्हा ॥
सोइ करौ जो जीव न जाई । राखौ ताहि महि भरमाई ॥
सुनिके ब्रह्मा मतौ विचारा । तक्षक रूप दूत पगु धारा ॥
यह सब भेद जबै हम जानी । इन्दुमती सो आज्ञा ठानी ॥
काल रूप तक्षक को आही । डस है तोहि जो कष्ट जनाई ॥
विरहुलि शब्द गहो मन लाई । यमको दूत जीत नहि जाई ॥
रानी शब्द विरहुली पाई । ता कहैं तब प्रतीति मन लाई ॥
बहुविधि सुमरै शब्द अघाई । काल घरी निकटै है आई ॥
चारौ दूत पठाव यम राऊ । गढ़ गिरनार बेग चल आऊ ॥
साखी—रानी भक्ती लीन्ह मन, काल न पावै दाव ॥
साध चले घर आपने, रानी मस्तक नाव ॥
चोपाई
राजा रानी दोई शिष्य मोरा । रानी लीन्ह राव मति भोरा ॥
तब यमदूत मता अस कीन्हा । चित्रसारमें पहुँचे लीन्हा ॥
रानी चली सिज्या पर जबहीं । तक्षक ग्रास भर्म भयो तबहीं ॥
रानी कहे डस्यो मोहि सांपा । राजा कियो कठिन संतापा ॥
मंत्री गुणी सब तुरत बुलाये । राजा आज्ञा सों सब आये ॥
ज्ञानसागर
( ६३ )
रानी शब्द विरहुली भाखा । दूर दूर सबदिन को राखा ॥
रानी क्रोध बहुत तब कीन्हा । बहुत होय नृप अति आधीना ॥
अरे भाई मम प्राण प्यारी । यही बार तुम लेव सम्हारी ॥
सृष्टित रानी सब चलि आये । जाग्रत जान के सबै सिधाये ॥
तक्षक विष नहि लाग्यो नारी । अंतक दूत रहे सब हारी ॥
साखी-रानी उठि ठाढ़ी भई, राजहि हरष अपार ॥
सुमिरन हम को कियो, धन्य है गुरु हमार ॥
चोपाई
तक्षक राव तब आये जहवां । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर तहवां ॥
विष को तेज शब्द सों जांता । सुनिके विष्णुहिं भयी तब चिंता ॥
धर्मराय का तुरत हंकारा । यम दूतन को जो सिरदारा ॥
ताका हरि अस मता सुनावा । करियो सबै तुम सेतहि भावा ॥
आने छलिकैं जो नृप नारी । निश्चय आज्ञा आहि हमारी ॥
सुनिके दूत भेष कियो रंगा । अपन कीन्ह सब सेतहि अङ्गा ॥
आये दूत नगर नियरावा । रानी ऐसा सपना पावा ॥
आये गुरु ज्ञानी जो हमारे । बोलत अमृत वचन सुधारे ॥
ज्ञानी वचन
सुन रानी तोहि भेद बताऊं । काल चरित्र सब तोहि सुनाऊं ॥
छलबे अइहैं ताहि सम्हारो । सेत रूप जिन भाव विचारो ॥
साखी-मस्तक ऊंचा कालका, चित्तमें गुणका रंग ॥
यही चिह्न तुम चीन्हियो, और सेत सब अंग ॥
चोपाई
भये प्रभात काल तब आवा । सेत रूप सब अंग बनावा ॥
आये जहां तहां नृप नारी । तिनसौं ऐसो बचन उचारी ॥
चीन्हत है कै नाही रानी । मरदन काल आइस मैं ज्ञानी ॥
( ६४ )
ज्ञानसागर
मैं तो तोकहँ दीक्षा दीन्हा । तक्षक डसै तोहि कहँ लीन्हा ॥
तब तोहि मंत्र दियो मैं सोई । कालको अजय जाहिते होई ॥
तँ पुनि तैसो तत्त्व विचारा । हर्षत भये तब धनी तुम्हारा ॥
बेगी चलो गहर जिन लाओ । प्रभु को दरस तुरत तुम पाओ ॥
इंडु मती सपना जो देखा । बैसो देखो ताकर रेखा ॥
तीनों गुण चक्षु मैं राता । और पुन देखो ऊंचा माथा ॥
और स्वेत सब देख्यो अंगा । पाइ प्रतीत स्वप्न परसंगा ॥
अरे काल तँ क्या ठग मोही । हंस रूप नहि छाजै तोही ॥
यह छल मता न लागु तुम्हारा । है समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥
साखी- मम गुरुकी परतीत यह, धरनी धरै न पांव ॥
काग न होय मराल सम, यह छति तोहि न भाव ॥
चोपाई
सुनिके दूत कीन्ह तब रोषा । इन्दुमती को दीन्ह सो दोषा ॥
तिन पुनि सुमरे अपने स्वामी । भक्त हेतु चले अन्तर्यामी ॥
ज्ञानी आवत काल पराना । ता कहँ लै पुनि लोक सिधाना ॥
धन्य भाग तिन रानी केरा । ज्ञानी आय काल सों फेरा ॥
रानी मानसरोवर आई । अमी सरोवर ताहि दिखाई ॥
कबीरके सागर पांव परो जबही । सुरति सागरे पहुँची तबही ॥
पहुँचत तासु हंस हरषाने । सबमिलिकीन्हतासु सन्माने ॥
सतगुरु दायी कीन्ही जबही । पोडशा भानु रूप भयो तबही ॥
भयो हर्ष रानी अति शोभा । राजा लग्यो करन अति क्षोभा ॥
हे सतगुरु मे तुम बलिहारी । राजहि आनो पतहि हमारी ॥
सतगुरु कहैं सुन संत सुजाना । राजा भाव भक्ति नहि जाना ॥
आ तोहि भयो हंसको रूपा । कारण कवन चहै तू भूपा ॥
ज्ञानसागर
( ६५ )
साखी-राजा भक्ति न जानही, तातें हंस न आव ॥
विना तत्त्व नहिं हिरम्बर, हंस न होय भुक्ताव ॥
चौपाई
हे स्वामी मैं भव जब रहिया । राजा भक्ति न वरजै कहिया ॥
है संसार का ऐसा भाऊ । पुरुष पराय ध्यान नहिं आऊ ॥
जो कोइ राते त्रिया बिरानी । ताकी करै सवै मिलि हानी ॥
छोटे बड़े को यह व्यवहारा । धन्यनृपति जिन ज्ञान विचारा ॥
करों साथ सेवा मैं जबही । राजा मोहि न वरजै कबही ॥
जो राजा अटकावत मोहीं । कैसे भेटत तब मैं तोहीं ॥
धन्यनृपति जिन भक्ति हटावा । आनिय ताहि हंस पति रावा ॥
सुनि ज्ञानी ताही की वाता । चले तबहि तहँही बिहँसाता ॥
आये भवसागर जब ज्ञानी । यहाँ नृपति की अवध खुटानी ॥
आये लेन ताहि यमदूता । राजहि कष्ट जो देत बहुता ॥
साखी-हंस ताको नहिं पावे, घेर रहो जो राव ॥
राजा परो अगाध में, सतगुर को गुहराव ॥
चौपाई
राजा तत्त्व मता नहिं चीन्हा । ताते यम राजन दुख दीन्हा ॥
पावे यम नहिं छाड़े ताही । भक्ति योग जो ऐसो आही ॥
तब ज्ञानी आये तेहि ठाई । देखत जीव बहुत संकाई ॥
ज्ञानी लीन्ह जीव कर आगे । देखत दूत ताहि सब भागे ॥
दूत चहुँ दिशि देखत जावैं । मरकट दृष्टि पक्षि नहिं पावैं ॥
जस आकाश कहैं जाय पखेरू । मरकट दृष्टि आये सत हेरू ॥
ऐसे ताहि दूत गुहरावैं । नहिं जब देखैं तब पछतावैं ॥
जहाँ लगि गम तहैं लग हेरा । आगे देखा धुन्ध कुहेरा ॥
हंस गये जब लोक द्वारा । रूप अनूप देख उजियारा ॥
गये नृपति हंसन की पांती । ता मध्ये पुन जइस अजाती ॥
( ६६ )
ज्ञानसागर
साखी-रानी चीन्हौ नृपति को, आन धरे तब पांव ॥
नृप मन में बहु संकुंचै, लज्जा ताहि जनाव ॥
चौपाई
कह रानी सुन साधु भुवारा । चीन्ह नृपति मैं हौ तुम दारा ॥
इन्दुमती है मेरा नाऊँ । यहि कारण टेक्यो तुव पाऊँ ॥
राव कहे कि म करो प्रमाना । बर्ण तुम्हारो हंस समाना ॥
शोभा बहु देखौ तुम अंगा । कैसे तोहि कहौ अर्धगा ॥
हंस करुणामय वचन उचारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥
हंस रूप होवे नर नारी । जिन भवसागर भक्ति विचारी ॥
नृप को भयो हंस का भावा । जिन पुनि ऐसी शोभा पावा ॥
भुई में रहै जो अंतक दूता । तिन पुनि विस्मय कीन्ह बहुता ॥
दूत चलि गये जहैं त्रिय राऊ । तिनसों जाय कहचो सत भाऊ ॥
स्वामी श्वेत वरण यक आवा । रानी नृप लेह लोक सिधावा ॥
कैसो लोक ब्रह्मा पर जरेऊ । जरत हुताशन जनु घृत परेऊ ॥
चलो हरी हर संग हमारे । जहँवा राजा रानी सिधारे ॥
चले वेग तब तीनों भाई । बाहन साज चले तिय राई ॥
साखी-सुम्मेरते ऊँचे गये, तब देखा अँधियार ॥
नव खंड महि तब छाँड़िके, आगे को पगधार ॥
चौपाई
पहुँचे विषम सरोवर जाई । बिजुली हुओ ह्यां अन्याई ॥
ब्रह्मा शिव बाहन थकि गयऊ । सतगुन तेज विष्णु का भयऊ ॥
अलख निरंजन भयो तिहिठाऊँ । औ देवी तें आशिष पाऊँ ॥
तेहि ते विष्णु गो अँमर जहँवा । कामिनि मान सरोवर तहँवा ॥
देखत रूप विष्णु मन भूला । श्वेत पुष्प पद्म जस फूला ॥
कामिनि मान सरोवर राजै । जुत्थ जुत्थ जोड़ भल साजै ॥
कलियुग में कबीरसाहबका प्रगट होना
ज्ञानसागर
( ६७ )
न अध्यान तहाँ तिन्ह लागी । सत्त सुकृत बोले अनुरागी ॥
सब मिलि भयो अचंभो वाता । ऐसा अचरज नरको वाता ॥
कोइ कहे नर देख पखेरू । ऊँची दृष्टि सबै मिलि हेरू ॥
वेग निकारी यहाँते आजू । रहन न पावे करौ सो काजू ॥
साखी-दोई सठहार जो भेजे, नर से कहो बुझाय ॥
छांढौ मान सरोवर; यहाँ नहीं तुव ठाय ॥
चोपाई
प्रतिहारन तब आज्ञा कीन्हा । तिनसोंहरि अस बोलन लीन्हा ॥
देखा चाहों तुम पुर पाटन । हे प्रभु भेद कहो कछु आपन ॥
तब प्रतिहार कहैं समझाई । नरको रूप दरश नहिं पाई ॥
जौ लग बीरा नाम नहिं पावे । सो जीव कैसे लोक सिधावे ॥
भयो जो बड़ो निरंजन राऊ । तेऊ यहाँ रहन नहिं पाऊ ॥
जा तू विष्णु कहा सुन मोरा । नातर चक्षु हीन होय तोरा ॥
चले विष्णु तब लागि न बारा । हरि कमलासो मंत्र विचारा ॥
यह कछु बात अचंभो आही । कहत न बने रूप मोहि पाही ॥
देख सठिहारन बेग निकारा । चले जीव जहाँ राज तुम्हारा ॥
अचरज बात कही नहिं जाई । धन्य पुरुष जिन लोक बनाई ॥
जब मैं ध्यान धरा प्रभु केरा । अलख रूप देखौ बहुतेरा ॥
ऐसा रूप कहुं नहिं देखा । अचरज भयो नजाय विशेषा ॥
साखी-चले ब्रह्मा हरि शंकर, छाडि लोकके खोज ॥
बस शशि के परभावतें, सकुचन होत सरोज ॥
कलियुगमें कबीर साहिबका प्राकट्य-चोपाई
सतयुग त्रेता बीत जब गयऊ । कलियुगको प्रभाव तब भयऊ ॥
छाडयो लोक लोककी काया । प्रथमहि मान सरोवर आया ॥
जगन्नाथके मन्दिरकी स्थापना
( ६८ )
ज्ञानसागर
पाँच तत्त्व तीन गुण साना । त्रिगुण रूप कीन्ह उत्पाना ॥
रूप मनुष्य सुदेह सम्हारा । नहिं लेई अहार व्यवहारा ॥
जो कोइ ये विधि करै उछेदा । सो तो है करता को भेदा ॥
करता देह तबै निरमावा । तामहिं तत्त्व प्रकृतिहि स्वभावा ॥
आयो निरगुण काछ शरीरा । आवा गमनकी भेटन पीरा ॥
जगन्नाथके मंदिरकी स्थापना
प्रथमहि आयो सागर तीरा । जगन्नाथ जहाँ काछ शरीरा ॥
जाते परम वचन मैं हारा । बाजी मांड किया प्रति पारा ॥
आसन बेल तीर मैं लीन्हा । सो स्वरूप काहू नहिं चीन्हा ॥
आया राम विप्रके रूपा । तासों कथि कह्यो अंजगूता ॥
साहित्य कबीर वचन
साखी-वाचा वंघ मैं आइया, मंडप उठि है तोर ॥
मान त्रास सिंधू जवे, दर्शन देखौ मोर ॥
चौपाई
तो कहैं थापौ वचन प्रवाना । तीन लोक तुम करत बखाना ॥
तो परसै को कहा अधिकारा । सोई कहौ तुम बौद्ध विचारा ॥
बौद्ध वचन
मन वच क्रम परसै जो मोई । कोटि जन्म लगि विप्र सोहोई ॥
औ पुनि विद्या औ धनवंता । यहि मुनकै जो भयो हरषंता ॥
साहित्य कबीर वचन
आवा गवन निरवारन आयो । सत् शब्द ते जीव छुड़ायो ॥
जो बहु जन्म थाकौ तुहि पाहीं । कैसे जीव लोक तब जाहीं ॥
बिना नाम नहिं जीव उबारा । कहि अब भाखौं कलु उपचारा ॥
मारकंठे तर जाइ नहाई । अस हँस बोले त्रिभुवन राई ॥
ज्ञानसागर
( ६९ )
अक्षैबट कृष्णरोहिणी अस्नाना । इन्द्र दमन समुद्र अस्थाना ॥
यहि विधि तीर्थकरे मन जानी । पुनर्जन्म ना होवे प्रानी ॥
सार्वी-हँसे कृष्ण छल मता कहि, जिमि माहुरको मीठ ॥
अस पुरुषोत्तम क्षेत्र फल, ज्ञानवन्त कहैं दीठ ॥
चौपाई
समाधान हरिको जब कीन्हहा । आसन उदधि तीर में लीन्हहा ॥
चौरा कीन्ह तहाँ पुन जाई । इन्द्र दमन तब आज्ञा पाई ॥
जबहीं मंडप काम लगावा । सागर उमँग खसावन आवा ॥
उठावहु मंडप करि निःशंका । उदधि त्रासकी मेटव शंका ॥
आयो क्रोध लहर जब पानी । मेटचो पुरुषोत्तम सहिदानी ॥
लहर उमंगी सागर तीरा । आय जहां तहैं सत्त कबीरा ॥
देखत दरस महा भय मानी । बोल्यो वचन जोर युग पानी ॥
हे स्वामी तुव मर्म न जाना । जगन्नाथ वर किया पयाना ॥
क्षमौ अपराध मोर प्रभुराया । लेउ बैर अस कीजै दाया ॥
तासों पुनि अस वचन उचारा । बोर द्वारिका बैर तुम्हारा ॥
सार्वी-राम रूप सागर बँध्यो, तातैं उदधि उमंग ॥
बोरौ नगर द्वारका, भयो रुचिर परसंग ॥
चौपाई
तब तैं उजर द्वारका भयऊ । पंडनको तब स्वप्ना दयऊ ॥
आये मोपर साहिब कबीरा । आवा गमनकी मेटन पीरा ॥
ऐसा स्वप्न पंडन दीन्हहा । तीर्थ स्नान तेहि सब कीन्हहा ॥
उठचो जो मंडप बाज बधावा । कनक उरे नहिं हाथ बनावा ॥
एक दिना कौतुक अस भयऊ । सागर तीर पंडा चलि गयऊ ॥
करि असनानचलो मंडप पासा । मनमें ऐसा वचन प्रकासा ॥
प्रथमहिं चौरा म्लेछ को गयऊ । ठाकुरके नहिं दर्शन कियऊ ॥
( ७० )
ज्ञानसागर
तेहिके मन पाखंड जब देखा । किय कौतुक सो कहौं विशेषा॥
जहँ लग मंडप पूजहि बीरा । तहँ लग देखहि रूप कबीरा ॥
गयो जहां कठ मूरत आहीं । कबीरको रूप भयो तेहि पाहीं॥
अच्छत पुहुप लैविप्रमन भूला । नहिं ठाकुर जो पूजहु फूला ॥
साखी-तब पंडा सिर नायो, प्रभु चरित्र अवगाह ॥
कोध छोड़िये स्वामी, कृपा करो मोहि पांह ॥
चौपाई
अपने मन आन्यो प्रभु हीना । तातैं प्रभु तुम कौतुक कीन्हा ॥
तासौं वचन मैं बोलये लीन्हा । सो पंडा पुनि कही जो कीन्हा॥
सुनहु विप्र तुम्हे आयसु होई । दुबिधा भाव करौ मत कोई ॥
ब्राह्मण छाड़हु जात अजाती । ताते मेटब सबकी फांसी ॥
भोजन माहि भर्म जो करहीं । ताकी अज्ञ हीन अनुसरहीं ॥
तब पडा विन्ता अस ठाना । हे स्वामी मैं तोहि न जाना ॥
करौं सोई जो आज्ञा दीजे । कछु जांचोंसोप्रदानमुहिकीजे॥
जो मन इच्छा होय तुम्हारी । देउ सोइ अस वचन उचारी ॥
साखी-सागर नीर बड़ खारा, सो तो असो न जाय ॥
निर्मल जल मैं मांगौं, सो दीजै प्रभुराय ॥
जहँ चौरा है सागर तीरा । खनहु कूप होय निर्मल नीरा ॥
तहां खनायो आय तब कीन्हा । जल मँगाय पंडन कहैं दीन्हा ॥
कूप बनायो सागर तीरा । तहां भयो पुनि निर्मल नीरा ॥
यह तो भेद जाने सोई संता । कबीर सागर बूझे मतवंता ॥
हरी भेद मैं सागर आयो । तेही सकल चरित्र सुनायो ॥
भुंगी को कीन्ही मैं दाय। ताको एक जो भेद बताया ॥
ताकी दियो मता कडहारी । जीव भेद सों लेत उबारी ॥