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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

चन्दवारमें कबीरसाहबका जाना

ज्ञानसागर

( ७१ )

पठवै जीव नाम दे जहँवा । सुक्ति पदारथ फल है तहँवा ॥
चार भातु कामिन उजियारी । मान सरोवर है वह नारी ॥

धर्मदान वचन

धर्मदास कहै अस बानी । स्वामी कहू संत उत्पानी ॥
हंस रूप जो षोडश भाना । कामिनि चार भातु परवाना ॥

साखी-कारण कौन है कामिनि, चार भातु कह्यु थोर ॥

शब्द गहे सब हँसा, संशय भई जब मोर ॥

माहिर कबीर वचन-चोपाई

सुन धर्मनि मैं तोहि बताऊँ । यह सब भेद मैं तोहि बुझाऊँ ॥
चौरासी लक्ष जोइन ठाना । सुक्ति छेत्र नरको उत्पाना ॥
तातैं प्रभु प्रगटे नर भाऊ । ताते शोभा हंस बहु पाऊ ॥
आय अदेह पुरुष रह जहँवा । नर को रूप प्रगट भये तहँवा ॥
जेहि सुक्ति चंदा निर्माई । हंस प्यार सुक्ति अधिकाई ॥
भुंगी कीट शिष्य जो होई । पावै भेद मग्न होय मोई ॥
सिंधु मध्य राह तिन केरा । आवै जीव ताहि सों फेरा ॥
वहै राह भुंग राज कहैं दीन्हा । यही भेद विरले जन चीन्हा ॥
पाहै भेद सन्त जन सोई । आन्यो सतगुरु जेहि गम होई ॥
निज बीरा जो चौरा पावै । इकोतर सौ जीव लोक सिधवै ॥

साखी-यही चरित्र करि आयो, चौरा के व्यवहार ॥

निज बीरा जो पावै, तव जीव होय उवार ॥

चन्दवारैमें प्राकटचकी कथा

चोपाई

आसन कर आयो चंदवारा । चंदन शाह तहाँ पगु धारा ॥
बल रूप धर आयो तहँवा । आठै पहर रहचो मैं जहँवा ॥

नूरीको मिलनेकी कथा

( ७२ )

ज्ञानसागर

ताकी नारि गई अस्नाना । रूप देखि ताकर मन माना ॥
ले गये बालक सो निज गेहा । बहुत भांति तिन कीन्ह सनेहा ॥
चंदन साडु देखि रिसियाना । चल गयो नारि तोर अब ज्ञाना ॥
बेग डार बालक को आजू । सुने लोग तो होय अकाजू ॥
जाति कुटुम्ब सुने जो कोई । यह तो भली बात नहिं होई ॥
चेरी हाथ तिन दीन्ह पठाई । उद्यान मास तिन दीन्ह अडाई ॥

नूरीको मिलनेकी कथा

काशीमें प्राकट्य

कछु दिन काया धर दुख पावा । यहि अंतर इक जुलहा आवा ॥
नूरि नाम जो वा संग नारी । देखत बालक भई सुखारी ॥
बालक देख नारि मन भूला । रविके उदय कमल जस फूला ॥

सारखी-अति सनेह जिन कीन्हा, नूरी देख रिसान ॥

बालक लीन्हो नारि अब, कहा भयो अज्ञान ॥

बालक वचन-चौपाई

बालक दीन्ह मही मई डारी । अस सुनि बालक दीन्ह हुँकारी ॥
बूझो काल फांस नर नारी । पूर्व जन्म तेहि लीन्ह उबारी ॥
पाछिलि प्रीति भयी अब मोही । तातैं दरश भयो अब तोही ॥

नूरी वचन

तुम जानो अब मैं नहिं जाना । सो अब मोहि सुनाओ काना ॥

नूरीके पूर्वजन्मकी कथा

कबीर वचन

पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण दूखी । तोरे गृह कबहु नहिं सूखी ॥
श्वपच भक्त मम प्राणन प्यारा । ताको मान पिता अवतारा ॥
श्वपच भक्ति करै पुनि जबही । मात पिता पर लगै तबही ॥

ज्ञानसागर

( ७३ )

ताकी प्रीति भक्त मन धारा । तातैं भयो विप्र अवतारा ॥
प्रथम प्रीति मोरे मन भावा । तोरे गृह मैं यहि विधि आवा ॥
तोसों कहीं इक भक्ति हटाई । राखौ मर्म हमार छिपाई ॥
देव सुवर्ण नित्य मैं तोही । एक सुहर पुनि ताकी होई ॥

साखी-बोलो नहिं यहि कारणे, ताहि सुक्ति नहिं भाव ॥

माया देख सुलानो, यहि कारण तब पाव ॥

चोपाई

घर नहिं रहो पुरुष औ नारी । मैं शिवसों अस वचन उचारी ॥
आनि देव लक्ष्मी संसारा । आपन को निज भीख अहारा ॥
आन की बार बदत हौ योगू । आपन नार करत हौ भोगू ॥
काशी मरे जन्म नहिं होई । तुव महिमा वगैँ सब कोई ॥
औ पुन तुम सब जग ठग राखा । काशी मरे अजल तुम भाखा ॥
जब शंकर होवे तुव काला । कहाँ रहे तब भक्त विचारा ॥
जीवन करत जो होय अकाजा । या शंकर तब तुम कहैं लाजा ॥
सुनि शंकर तब चलयो लजाई । यहि अन्तर जुलहिनि चलिआई ॥
हे स्वामी मम भिक्षा लीजै । सब अपराध क्षमा प्रभु कीजै ॥
एक पुत्र जो विधि मोहि दीन्हा । कबहुँ बात कहै नहिं लीन्हा ॥

शंकर वचन

तोरें गृह पंडित अधिकारी । झूठ बोल कस बोलहु नारी ॥
हरि कमला सम देखो ज्ञाना । बुद्धिवंत तुम पुत्र सुजाना ॥
साखी-सुनकर महिमा पुत्रकी, नारि धरे तब पांव ॥
हे स्वामी मम इच्छा, श्रवणन वचन सुनाव ॥

चोपाई

कहा लजान कहा फिर आवा । बिहँसि कहा तुम सिद्ध कहावा ॥
सुनिकै वहै दर्प बहु कीन्हा । भिक्षा कनक जाति को दीन्हा ॥

( ७४ )

ज्ञानसागर

भिक्षा दै प्रसुदित चलि आई । हस्तामल को खोज न पाई ॥
वाचा बन्ध तहाँ पुनि आयो । काल कष्ट मैं तोर मिटायो ॥
सुन जुलहा मन भयो आनंदा । जिमि चकोर पायो निशि चंदा ॥
ले सुत चले हर्ष मन कीन्हा । तासों पुनि अस बोलेहि लीन्हा ॥
आगिल जन्म जब होइ तुम्हारा । तुम्हैं पठायब यम तैं न्यारा ॥

साखी-सुत काशी को लै चले, लोग देखन तहाँ आव ॥
अन्न पानी भक्ष नहीं, जुलहा शोक जनाव ॥

चौपाई

तब जुलहा मन कीन्ह तिवाना । रामानन्द सौँ कहि उत्पाना ॥
मैं सुत पायो बड़ गुणवंता । कारण कौन भखै नहीं संता ॥
रामानन्द ध्यान तब धारा । जुलहा सो तब वचन उचारा ॥
पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण जाती । हरि सेवा कीन्हेसि भलि भांती ॥
कछु तुव सेवा हरिकी चूका । तातैं भायो जुलहा को रूपा ॥
प्रीति प्रभू गहि तोरी लीन्हा । तातैं उद्यानमें सुत तोहि दीन्हा ॥

नूरी वचन

हे प्रभु जस कीन्हो तस पायो । आरत हो तुव दर्शन आयो ॥
सो कहिये उपाय गुसाई । बालक श्रुधावंत कछु खाई ॥
रामानंद अस युक्ति विचारा । तुम सुत कोई ज्ञानी अवतारा ॥
बछिया जाही बैल नहीं लागा । सो ले ठाढै करै तेहि आगा ॥
साखी-दूध चले तेहि थन तैं, दूधहि धरौ छिपाइ ॥
श्रुधावंत जब होवै, ता कहैं देउ खवाइ ॥

चौपाई

जुलहा इक बछिया ले आवा । चल्यो दूत कोउ मर्म न पावा ॥
चल्यो दूत जुलहा हरषाना । राख छिपाइ काहूँ नहीं जाना ॥
सुन भामिनि आगे चल आवा । सो ले जाइ कोई भेद न पावा ॥

बाललीला और रामानन्दको गुरु करनेका वर्णन

ज्ञानसागर

( ७५ )

दूध न पीवत नाम कबीरा । खेलेत संत संग मत धीरा ॥
तिनसौँ कहैं जागौ रे भाई । बिना नाम नहिँ काल पराई ॥
कोई न बूझौ भेद हमारा । रामानंद पर तब पगु धारा ॥
तब अपने मन कीन्ह उपाई । तिनहि दरश कैसहु नहि पाई ॥

रामानन्दको गुरु करना

जाहि रामानंद गंग स्नाना । तेहि मारग में जा पौढाना ॥
तबहि पांव गुरु लाग कबीरू । रामानंद बोल्यो मत धीरू ॥
उठ कबीर तब वचन उचारा । रामानंद है गुरु हमारा ॥

साखी-करहिगोष्ठी शिष्य सब, कोई ज्ञान जीत नहिं जाय ॥
सत ऋषि सुधि पाई, गुरु सों बोले आय ॥

बोपाई

विद्या कहे मलेच्छ को दीन्हा । रामानंद कोध तब कीन्हा ॥
चले शिष्य तब आज्ञा पाई । कबीर संतको आन बुलाई ॥
सुनतहिं शिष्य चहुँ दिशि धाये । हेर खोज कबीरै लाये ॥
आये कबीर लागि नहि बारा । गुरु मंडलमें आन पगु धारा ॥
अन्तर कपाट शिष्य तब लाया । पूजत रामानंद हरि राया ॥
सुन कबीर आगे चलि आये । गुरुहि आनकर मस्तक नाये ॥
लक्ष्मीनारायण मुकुट सिरनाये । पहिरै वस्त्र माल नहीं समाये ॥
तबहि कबीर वचन अस भाखा । वस्त्र पहिरि माला तुम राखा ॥
अंतर कपाट खोल तब दीन्हा । रामानंद सुन अचरज कीन्हा ॥
दिव्यज्ञान तुम कहैं केहि दीन्हा । जोर कर गुरुहि विनोदित कीन्हा ॥
कब हम तुम को दिशा दीन्हा । नाम हमारा काहे तुम लीन्हा ॥
गुरु हमैं तुम दिशा दीन्हा । झूठ बोलका क्या फल चीन्हा ॥

नं. १ कबीर सागर -

( ७६ )

ज्ञानसागर

साखी-गुरु जब चलैं नहाने, तब हम दिक्षा पाव ॥
तातैं गुरु कहि थाप्यो, फिर पीछे पछताव

चौपाई

पूज्यो पाहन पंडित धर्मा । पहिल न जानो तुम्हरो मर्मा ॥
मैं तो चाहत मुक्ति पदार्थ । तुम पाहिन जापूजे निश्चारथ ॥
तब गुरु सुनकै अचरज भयऊ । योग समाधि वैकुंठहि गयऊ ॥
सत्त समाधि विष्णु जब देखा । तापर देश कबीरहि लेखा ॥
जहैं देखा तहां सत्त कबीरा । झूठ ध्यान भूले मत धीरा ॥
हे कबीर तुम मर्म न जाना । जान मलेछ किया अपमाना ॥
जो कछु आहि मुक्ति सन्देशा । सो सब मोहि कहौ उपदेशा ॥

साहिब कबीर वचन

छोड़ी सबै मान अभिमाना । तो कह देव मुक्ति फल दाना ॥
शिष्य सरवा सौ बात जनाऊ । काल तोर शरणगत आऊ ॥
कहैं कबीर काल है काला । है बड़ दारुण काल कराला ॥

साखी-मुक्तिदेव नहिं लेव तुम, रामानंद गुरु देव ॥
भोरहि जन्म गवांय हो, करि पाहन की सेव ॥

सिकन्दर शाहकी बारता-चौपाई

ता निशि को तब भयो प्रभाता । काशी आइ भयी एक बाता ॥
आये सिकन्दर शाह सुल्ताना । है व्याधा बहु भेद न जाना ॥
रामानंद की सुनी बड़ावा । तातैं शाह आप चलि आवा ॥
आये मंडप जहां सुल्ताना । रामानंद तब देख रिसाना ॥
आये शाह सन्मुख भये जबही । रामानंद मुख फेरा तबही ॥
वार अनेक तिहितें सुख फेरा । तांकी ओर क्रोध कर हेरा ॥
मारचो खंग परचो खसि धरनी । शाह के अङ्ग अनिल सम बरनी ॥
आये शाह जहां दुःख नसावन । अधिक भई जो देह सतावन ॥

सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना

ज्ञानसागर

( ७७ )

पय औ रुधिर चल्योगुरु अंगा । पावक उठी शाह के अंगा ॥
तवै शाह ने सुधि अस पाई । महिमा जान कबीर बुलाई ॥

सारखी-कबीर दर्शन दीन्हा जबै, तपन भई सब दूर ॥

शाह कहा तुम सांच हो, औ अल्लहका नूर ॥

सिक्कन्दरवन-चोपाई

पय औ रुधिर चल्यो गुरु अंगा । शाह कहै यह कौन प्रसंगा ॥

कबीरवन

जेहि तन मान्यो शब्द हमारा । तेहि तैं चले दूध की धारा ॥

कीन्हा कालउ केर विचारा । आधा अङ्ग रुधिर अनुसारा ॥

अगले जन्म मुक्ति जो होई । अंकूरी जीव कहावै सोई ॥

गोको बिलाना

यहै चरित्र तहां पुनि भयऊ । तब नूरी के मंदिर गयऊ ॥

काजी मुह्ता सबै रहाये । गाय आनि के गलो कटाये ॥

देखि दुखित भये सत्त कबीरू । महा व्याधि गाई की पीरू ॥

केहि कारण गाई जो मारा । सो सब मोहि कहो उपचारा ॥

काजी काया देख विचारी । एकहि ब्रह्म गाय क्यों मारी ॥

गाय ज़िवावहु मुर्गा सारू । नातर वेद अथर्वन हारू ॥

सत्त शब्द है जासु शरीरू । व्यापी महा गाय की पीरू ॥

सारखी-उठिके गाय ठाढ़ी भई, आज्ञा जबही कीन्ह ॥

काजी मुह्ता जानि कै, पाव पकर तब लीन्ह ॥

चोपाई

नगर के लोग अचंभो लागा । यह कबीर कर्ता हो जागा ॥

मगध गवन

तब तहैं से पुनि कीन पयाना । उत्तर देश मगध अस्थाना ॥

नूवा नूरी काल बस भयऊ । तिन पुनि जन्म मनुष्य हिलयऊ ॥

( ७८ )

ज्ञानसागर

राजा बीरसिंह देव बड़ राज । ताके गृह अब धारचो पाऊँ ॥
कमलावती तासु नृप नारी । तिन बड़ सेवा कीन्ह हमारी ॥
ताकौ दीन्ह पान परवाना । तिन कछु भेद हमारा जाना ॥
कह्यो तासों मुक्ति प्रभाऊ । सुनत भयो आनंदित चाऊ ॥
विजुलीखां पठान बड़ ज्ञानी । सन्त जान जिन सेवा ठानी ॥
तासों कही मुक्ति परभाऊ । ज्ञान गम्य तिन बहुत कराऊ ॥

साखी-अति आधीन जब देखा, ता कहैं दीन्हहा नाम ॥

प्रीति जानि कै ताकी, कछु दिन किय विश्राम ॥

चोपाई

विजुलीखां कहै पीर हमारे । नृप वीरसिंह शिष्य तुम्हारे ॥
साहिब आप तजो जब देहा । दोह दीन सो कीन्ह सनेहा ॥
सुनि विहंसि अस आज्ञा ठानी । दोह दीन से हम निरवानी ॥
हिन्दू तुरक नहीं हो भाई । सुन पठान संशय उपजाई ॥
जो तुम दोइसों न्यारी रीती । मेरे मन कैसे होय प्रतीती ॥
तुम तो हो अछह के बन्दा । यह तो अहै आदमी गंदा ॥
तुमहि शरीर तजौगे जबही । शरीर उपाय करों क्या तबही ॥
कै पृथिवी कै देहों जारा । करहु हुकम सो पीर हमारा ॥
जो कछु होई लोक व्यवहारा । सोई कहो मम पीर पियारा ॥
जो साहिब हुकम जस करिहौ । मजार तुम्हारा रचिके धरिहौ ॥

साखी-बिहंसि कह्यो तब तिनसैं, मजार करौ सम्हार ॥

हिन्दू तुरक नहीं हौं, ऐसा वचन हमार ॥

चोपाई

दिन कछु गये तासु संबादा । राजा बीरसिंह ने भेजे प्यादा ॥
बन्दीछोर आवैं मम गेहा । रानी विन्ती कीन्ह सनेहा ॥
ताकी प्रीति तहाँ पगुधारा । दुःखद्वन्द्व तिन सबै विसारा ॥

ज्ञानसागर

( ७१ )

तिन पुनि कही सुनौ गुरु ज्ञानी । दुतिया ब्याह लगन में ठानी ॥
ब्याह जो होय बिकट अस्थाना । क्या जाने होवे संग्रामा ॥
कोइ घायल कोइ जाई मारा । खाड़ो आही दुहु दिशि धारा ॥
ताकी आज्ञा करौ गुसाई । तिनहि देह क्या करो उपाई ॥
कै गाड़ौ कै जारौ धूरी । यह संशय मेटो प्रभु मोरी ॥
करौ सोई लोक कुल धर्मा । बिन लागै कोई जानै न मर्मा ॥
साखी-जो गाड़ौ तो माटी, जो जारौ तो छार ॥
करो लोककी जो कृति, बोलता ब्रह्म निनार ॥

चौपाई

हे स्वामी तुम मोहि बताओ । तुम तनतजोतो काहि कराओ ॥
जस प्रभु तस पुन सेवक करई । सेवा युक्ति सदा सो तरई ॥
जो तुम कितहू करहू प्याना । गाड़हि लागै तुमहिं पठाना ॥
हँसै सबै यह देखि परतच्छा । गुरु तुम्हारो आहि मलेच्छा ॥
तस कछु भेद बताओ स्वामी । करो कृपा सो अन्तर्यामी ॥
वास्तव तेहो कहाँ बुझाई । जारौ देह जो क्षार उड़ाई ॥
तातैं लोक मैं नहीं छुड़ाओ । यातैं दोह दीन फरमाओ ॥
गयो नृपति तहैं साज बराती । कौतुक रचो देह तब त्यागी ॥
सुनत साज दल चले पठाना । राना मुर्दा ले बिल खाना ॥
लेकर गाड़ै करै निमाजा । करन बिहानक दूरी काजा ॥
साखी-रानी भेजे प्यादहीं, तन जब तजो कबीर ॥
आयो बिजुली खान तब, सुनि वृत्तान्त गंभीर ॥

चौपाई

राजा पास पठाओ पाती । सुनतहि क्रोध जरी तब छाती ॥
छाड़्यो ब्याह चले दल साजी । हनें निशान सम्हर की बाजी ॥
बाजा गाजी तुरही आवहि । यह बिजुलीखां युक्ति बनावहि ॥
ऐसी भांति सो कीन्ह प्याना । रन के आगे बजै निशाना ॥

रतनाकी कथा

( ८० )

ज्ञानसागर

बांधी अस्त्र अस चले बहु बीरा । कुहुक बान औ बहु धन तीरा ॥
बरछी सेल औ छुरी कटारी । खड्ग रु तुरी चपल परचारी ॥
दोड़ दिशि देख अस्त्र चमकारा । मानो साज चलो जल धारा ॥
राजा कीन्ह मरन का ठाना । वयरख रोप जो रहो पठाना ॥
जब देखा मैं होत लराई । युद्ध जानि अस कन्यो उपाई ॥
रानी जान मोर कछु मर्मा । तिन पुनि कही तजो नृप भर्मा ॥

साखी-पहिले खोदो माटी, मुदां देखु निहार ॥

सुरदा नहिं वहि भीतरे, कहा करत ही रार ॥

चोपाई

सत् कबीर नहीं नर देही । जारै जरत ना गाई गड़ही ॥
पठयो दूत पुनि जहां पठाना । सुनिके खान अचंभी माना ॥
दोड़ दल आई सलाहा जबही । बने गुरु नहिं भेटे तबही ॥
दोनों देख तबै पछतावा । ऐसे गुरु चीन्ह नहिं पावा ॥
अपने मैं अचंभा ठाना । रंक माहिं धन गया छिपाना ॥
दोड़ दीन कीन्ह बड़ शोगा । चकित भये सबै पुनि लोगा ॥

रतनाकी कथा

तब अपने मन कीन्ह विचारा । रतना कँदोइन कै पगु धारा ॥
रतना समाधान बहु कीन्हा । राजहि पठय सँदेशा दीन्हा ॥
तुम नृप किमि करते पछताना । निश्चय आही शब्द प्रवाना ॥
रहौ सदा शब्दहि मन लाई । दर्शन मोक्ष होय नहिं भाई ॥
साखी-विजुलीखां सौं दुआ कहि, किमि कारण पछताव ॥
रहौ नाम लौ लाइके, जाते कर्म कटाव ॥

चोपाई

लोक वेद मैं ऐसे विचारा । किमि कारण मन दुखी तुम्हारा ॥
सुने दंडवत बहु विध कीन्हा । तत्त्व मता नामहि गहि लीन्हा ॥
रतना सौं कहि मता अपाना । तेहि सुनिके हरष बहु आना ॥

ज्ञानसागर

( ८१ )

हे स्वामी मोहिं कीजै चेरी । जातै कटै कर्म की बेरी ॥
धन्य शब्द धनिजो कह्यु चहिये । सो सब स्वामी मोसों कहिये ॥
सवा सेर मिष्ठान ले आवहु । और सवासौ पान मैगावहु ॥
इतना चहिये और न काजा । तातै भाग चले यमराजा ॥
सोई अंश पान निज लीन्हा । ताको जीव दान मैं दीन्हा ॥
अंकुरी जिव भेटे निज गेहा । नूवा नाम जो प्रथम सनेहा ॥
साखी-ताको पठयो निज भवन, तीन लोक तें न्यार ॥
नूरी के मन इच्छा, धर्मदास अवतार ॥

चौपाई

सुन धर्म दास यहै कुल धर्मा । मेटो तीरथ बरत कुल भर्मा ॥
कोटि जन्म कीन्हौ तप धर्मा । विनसत गुरु नहिं मिटिहै भर्मा ॥

धर्मदासवचन

हंस राज जो दर्शन दीन्हा । जन्म स्वारथ अधमको कीन्हा ॥
हे प्रभु मोरे बन्दी छोरा । हौं आधीन दास मैं तोरा ॥
आनहु पान और मिठाई । जितनौ रतना के मन भाई ॥
आनहु रतना कहौ तुम स्वामी । कृपा करो तुम अन्तर््यामी ॥

कबीरवचन

प्रथम हि जो पावै निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥
जाके रहे पुरुष औ नारी । बीरा नाम जीव रखवारी ॥
सवा लक्ष जीव नित जो मारा । तातैं सवा सेर व्यवहारा ॥
साखी-सवा सेर मिष्ठान जो, और सवा सौ पान ॥
इतना ले जो शिष्य हो, यम तेहि देखि डरान ॥

चौपाई

सुहर देखि जैसे घट वारा । जिनहैं घाट ऊपर बैठारा ॥
जो कोइ झूठा रूप बनावै । बिना पान जान नहिं पावै ॥

( ८२ )

ज्ञानसागर

आने फेर परवाना सोई । जैसा अंक सुहर पर होई ॥
इतनी सुन हरषे धर्म दासा । शिरनी पान लाइ धरे पासा ॥
सेत सिंहासन सेतु ई साजा । सेत पान सिर क्षत्र बिराजा ॥
पाने दलतै सबहीं कीन्हहा । तामें अंक अग्र को दीन्हहा ॥
प्रथम हि तितुका वेग तुरायी । मारग भेद तबै समुझायी ॥
बाएं दाहिने है सहि दानी । इकदिशि धर्म द्वितीय दुर्गदानी ॥
पाछे चित्र गुपित्र को थाना । तेहि तजि हंसा देइ पयाना ॥
टूटै घाट अठासा कोरी । हंसा चढ़े नाम की डोरी ॥

साखी-यमसों तितुका तोरकै, तब दीजौ निजपान ॥

पाई प्रसादै हर्ष तब, शब्द देख मन मान ॥

चौपाई

जाई उबारौ हंस अंकुरा । मन की दिशा देख मन भुला ॥
हे प्रभु कौन शब्द है सारा । तौन शब्द तैं जीव उबारा ॥
एक शब्द पुनि दीन्हहा हेरी । यही शब्द तैं जीव उबेरी ॥
जस दरपर लै दीजे हाथा । दर्शन देखै मुख औ माथा ॥
धर्म दास सुनत मन माना । बिकसे कमल उदैं जनु भाना ॥
यही वस्तु से जीव उबारा । और ज्ञान है बहुत अपारा ॥
मूल नाम अक्षर धुनि साचा । जेहि तैं जीव काल सों बाचा ॥
आदि नाम पुरुष कर आही । भाग जीव पाव पुनि ताही ॥
धन्य भाग वस्तु जिन पाया । मोकहँ सत गुरु अलख लखाया ॥
अक्षर मूल और सब डाला । डारहि में फल फूल रसाला ॥
किंचित को फल पावै सोई । कहैं कबीर अमर सो होई ॥
अक्षर मूल अमी पैंच शाखा । साखी रमैनी ताकी पाता ॥
सुमिरन डार पुहुप है जोगा । तेहि सम आहिना दूसर भोगा ॥
साखी-अक्षर धुनि लौ लावई, अपराधै परिचय योग ॥
कहैं कबीर संशय गयी, भोगहि मध्ये भोग ॥

चौका आरतीकी विधि

ज्ञानसागर

( ८३ )

चौपाई

भव मैं अक्षर परचे पावे । सत्त गहै सतलोक सिधावे ॥
पुहुपहि से फल उपजे सारा । फल है मुक्ति भोगसे न्यारा ॥
हे प्रभु जो इतना नहि जाना । सो जिव कैसे लोग पयाना ॥
पंच अमीका सुमिरन दीजे । बंदी छोर ताहि किमि कीजे ॥
औ पुनि ताहि देव जप माला । आवहि लोकसो भौनहि डाला ॥
निश्चय कहौ पंथ कर भाऊ । दुविधा भाव लरो मत काऊ ॥
कहो पंथ जो पाँजी वाका । धरती शीश स्वर्ग का नाका ॥

साखी-यहि विधि राह चलावहु, सुनहु हो धर्मदास ॥
जीव छुड़ाओ काल सो, सत्त शब्द परकाश ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे प्रभु मैं कहत डराऊँ । कहों सो एक वस्तु जो पाऊँ ॥
जो नहि पावहि एती साजा । तासों किमि डरि है यमराजा ॥

कबीर वचन

साठ समय बारह चौपाई । एही तत्व हंस घर जाई ॥
पांच अमी महाँ एकौ पावे । है परमान सो लोग सिधावे ॥
अथवा जो एकौ नहि पावे । चार करी तत्त्व मन लावे ॥
चार करी बूझे मन लाई । यमराजा तेहि देख डराई ॥
अदेख देख तत्व मन धरयी । बोलता ब्रह्म सो परिचय करई ॥
इनकी देख नाम लौ लावे । डोर गहै सत्य लोक सिधावे ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु जो इतना नहि जानै । सो जिव कहा करै विश्रामै ॥
नामहि पाइ तत्व मन धरई । दुविधा भाव कबहुँ नहि करई ॥
निर्गुण नाम रहे लव लाई । ताके निकट काल नहि जाई ॥

( ८४ )

ज्ञानसागर

साखी-खोजकर सत शब्द का, गहै तत्त्व मत धीर ॥
निश्चय लोक सिधाइ है, अस कथ कहैं कबीर ॥

धर्मदासवचन-चोपाई

हे प्रभु जा पर दाय़ा होई । पावै वस्तु सार पुनि सोई ॥
अथवा जो ऐती नहि पावै । हे प्रभु तो कैसी बनि आवै ॥

साहब कबीर वचन

पावै सार जान निज बीरा । निश दिन सुमिरे धन्य कबीरा ॥
जहाँ सुने सतगुरु को नामा । सुने भक्ति छाड़ै सब कामा ॥
सुने जो भक्ति तत्त्व मन लावै । देह छोड़ि सत लोक सिधौवै ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु जो इतना नहि राता । तासौ कैसी कहिये वाता ॥
माया जीव अधिक लपटाना । तातैं प्रभु पूछौ इठ ग्याना ॥

साहब कबीर वचन

धर्मदास मोहि यदि भावै । करही जाप धनी जो पावै ॥
आवै मल्ल तब करै लड़ाई । जाने दाव घात चतुराई ॥
तबही बने कृपी को साजा । कोठी बीज खेत उप राजा ॥

साखी-शूरा बैर भल खोजिये, बीज धरहि को सार ॥
रयाया बीज न बोइये, ऐसा मता हमार ॥

चोपाई

बिना नाम बहु तन डहकाया । फिर फिर भौजल भटकाखाया ॥
जुग जुग जन्मबहुरि भवलीन्हा । होई हित नहि नाम विहूना ॥
नाम पाय जो तत्त्व न धरई । ते पुनि जन्मै गुरु क्या करई ॥
तत्त्व प्रमाण यही धरमदासा । तातैं मिटै कालकी फाँसा ॥

धर्मदास वचन

बालक कहा तत्त्व को जानैं । मुक्त होय तेहि कौन प्रमानै ॥

योग कर्मका वर्णन

ज्ञानसागर

( ८५ )

साहित्य कवीर वचन

बालक नाम कौ दीजै बीरा । पहुँचे लोक जब तजे शरीरा ॥
त्रिया कह सनेह है सारा । उपजै भाव होय जम न्यारा ॥
जातैं नर अचेत अज्ञाना । तातैं तत्त्व नाम परमाना ॥
तत्त्व है मूल और सब साखा । ताकौ नाम जोग मय भाखा ॥
जो नर तत्त्व न राखे ज्ञाना । ताकौ ज्ञान बालक सब जाना ॥
पावै आदि अंत निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥
छठै मास बीरा निज पावै । है प्रमान सो लोक सिधवै ॥

साखी-तत्त्व मुक्ति है निश्चय, औ बीरा निज सार ॥

माया लीन्ह नर प्राणी, भूल परा संसार ॥

धर्मदास वचन-चोपाई

निसिदिन रह माया लपटाना । सो प्रभु कैसे होय निर्वाना ॥

साहित्य कवीर वचन

निस दिन रहे माया विस्तारा । पलकौ भज तो उतरै पारा ॥
पलकौ नाम चित्त ना धरई । ते पुनि जन्मैं गुरु क्या करई ॥
कर्म निवारन जेहिते होई । परिचय सहज तत्त्व है सोई ॥

धर्मदास वचन

सो मोहि स्वामी प्रगट बताऊ । केहि विधिजोगकर्मसमझाऊ ॥

साहित्य कवीर वचन

प्रथम सत्य आसन आराधै । निवरी कर्म जो या विधि साधै ॥
काम मारिये अरूप अहारा । जहाँ काम तेहि जोग बिकारा ॥
कोइ कछु कहै हृदय नहीं धरई । निन्दा विन्दा मब परिहरई ॥
तजै देह जिमि कांचरि सांपा । आलस निद्रा सहज निदापा ॥
दृष्टि न जावै भल औ मंदा । मनहि न आनै संसो नंदा ॥
धोती वस्ती नेती करई । जिमि कामिन सो ग्रहै बहरई ॥

अष्ट कमल वर्णन

( ८६ )

ज्ञानसागर

तिनका खेह मंदिर में होई । करई दूर भामिनी सोई ॥
या विधि काया संयम राधै । बांधै मूल अरु नाको साधै ॥

छंद-मूल बांधै नाम साधै काया संयम जानिकै ।

मन पवन दोई तुरी साजै युक्ति जीव बनायकै ॥

देह ताडना चित्त को तुबक सर छाड़ै आस हो ।

तेही आस चढ़टोरै ममासा जीव होय निकास हो ॥

सोरठा-ऐसी बाजी होई, मनके संग दौराइये ।

मन शूरा पुनि सो, कष्ट परै पुनि ना टरै ॥

चोपाई

परै कष्ट तब तोरिगे वासा । राखै खड़ नाम को पासा ॥

नाम अछ ते दूत डराई । भागे अरि शूरा जिमि पाई ॥

अरि के भाजैं होय हुलासा । दुविधा भिटै कमल परगासा ॥

अष्ट कमल देखै पुनि सोई । मानौ रंक महा धन होई ॥

देखै ब्रह्म जहाँ अस्थाना । भय भाजैं तब हो निर्वाना ॥

अष्टकमल वर्णन

अष्ट कमल तोहि भेद बताऊँ । अजपा सोहं प्रगट बुझाऊँ ॥

मूल कमल दल चार ठिकाना । देव गणेश तहाँ कीन्ह पयाना ॥

ऋद्धि सिद्धि बासा तहाँ होई । छै सौ जप अजपा तहाँ सोई ॥

द्वितीय कमल पटदल परमाना । तहाँ कमलन कर आहि ठिकाना ॥

सावित्री ब्रह्मा है जहवाँ । षट सहस्र जाप है तहवाँ ॥

छन्द-त्रय कमल दल अष्ट है हरि लक्ष्मी तिहि संग मौँ ।

षट सहस्र जहँ होई अजपा निरखि देखो अंग मौँ ॥

कमल चौथा द्वादश दल शिव को तहाँ निवासु हो ।

सुरति नरति करि लोक पहुँचै षट सहस्र जहाँ जासु हो ॥

ज्ञानसागर

( ८७ )

सोरठा-पञ्चयें कमल प्रकाश, तिहिं पोडश दल अहै ॥
आतम जीव निवास, कइ सहस्र अजपा कह्यो ॥

चौपाई

छठवां कमल अहै दल तीनी । सरस्वती तहैं वासा कीनी ॥
दोसौ एक अजपा जहैं होई । बूझे भेद सो बिरला कोई ॥
भौर गुफा दो जल परवाना । सातों कमलकोआहि ठिकाना ॥
एक सहस्र अजपा परकाशा । तहां बोलता ब्रह्म को वासा ॥
तहां जोग साधे बहु जोगी । इंगलापिंगला सुखमनि भोगी ॥
तहां देख असंख्य जो फूला । ब्रह्म थाप काया में भूला ॥
सात कमल जाने सब कोई । अष्टम कमल विनुमुक्ति न होई ॥
विनु सतगुरु को भेद बतावै । नाम प्रताप जोग हि आवै ॥
काया तें जो बाहिर होई । भाग जीव पावै पुनि सोई ॥
छन्द-बहु भांति मुनि ऋषिजोग ठान्यो भयोरहित नहिं लेस हो ॥
काया थापी सुरति सों सब काग भये नहिं हंस हो ॥
पक्षी होई तब होइ महाबल नाम विना तो काग हो ॥
पक्षी त्यागी जो नाम साधे हंस होय बड़ भाग हो ॥
सोरठा-जोग तो आहि अपार, पक्षी भया पर नयन नहीं ॥
जोग नाम उजियार, नाम तेहि जो पावही ॥

चौपाई

पक्षी भाग नयन जिन पावै । ताके जहां तहां उड़ जावै ॥
देखे लोक जो गुरु बतावै । पक्षी नयन को यहै स्वभावै ॥
अथवा नाम नेक जो पावै । साधे तत्त्व जो लोक सिधावै ॥
नाम नयन पक्षी जो होई । तेहि समान दूसर नहिं कोई ॥
बाहिर को मैं कहब ठिकाना । सुरतिकमलसतगुरु निरवाना ॥

( ८८ )

ज्ञानसागर

छः सौ एक एकसौ बीसा । अजपा ऊपर देखे ईसा ॥
सातदलकमल देवऋषि माना । अष्ट कमल उनहूँ नहिं जाना ॥

छन्द-यह भांति अजपा तत्त्वऽराधे बस करे पाँचों भूत हो ।
रुनक झुनक बाजेआदि अक्षर दिमँकर बाचे तार हो ॥
षट् चक्र बांधे देह में तब जोग मुद्रा सार हो ।
प्रेम को बाजे पखावज प्रति दिना ततकार हो ॥

सोरठा-आतम जीव जो जाय, मुक्ति मुक्ता संग में ॥
तिन सँग ब्रह्म समाय, जिमि जा सरिता सागरेँ ॥

चौपाई

सरिता परै सिन्धु महाँ जबहीं । दुबिधा भाव न उपजै कबहीं ॥
सरिता संग रहे यक नीरा । भिन्न भाव कथ कहैं कबीरा ॥
दक्षिण नयन जब नेह निहारी । ते समरै बहुतै अधिकारी ॥
चन्दन निकट वृक्ष जो होई । भेद सुवास प्रबल है सोई ॥
संगति का फल ऐसा होई । यह तो भेद जाने जन कोई ॥
चन्दन नाम सुमेर है जोगा । इतनी प्रगट करै जो भोगा ॥
आतम जीव भेद पुनि होई । चन्दन बेल कहै सब कोई ॥
चन्दन कष्ट सब कोई जाना । यहै भेद विरले पहिचाना ॥

छन्द-जोग सम कछु भोग नाहीं देखु हृदय विचारि कै ।
पांच को बस करो आपने बसै पांच सम्हारि कै ॥
तीन गुण औ नाम चौथा बहुरि इनहि सम्हारिये ।
तब जीतिये निष्कंटका हो प्रति योग यहि विधि साधिये ॥

सोरठा-मेटें जम को दंड, मुक्ति होय तेहि अटल पुन ॥
विष को करे निकन्द, जोग होय जो नाम फल ॥

ज्ञानसागर

( ८९ )

चोपाई

संशय मिटे जोग के धारे । मैं अपने मन कीन्ह विचारे ॥
संशय को खंडन है जोगा । ता सम आहि न दूसर भोगा ॥
जीव को काज जाहितें होई । सोई जतन करो सब कोई ॥
अथवा देह जोग कोई न साथे । तो अब सहज जोग अवराधे ॥
ता मैं मिल जो यह निस रहई । दुविधा भाव कबहुँ नहिं करई ॥

साखी-पांच तत्त्व गुण तीन हैं, और प्रकृति पञ्चीस ॥

चौतीस ऊपर डेरा करई, नाम तत्त्व इक्कीस ॥

चोपाई

चौतीस ऊपर डेरा करई । नाम तत्त्व पलक नहिं टरई ॥
ये सब एक नखा मैं राखै । गुरु प्रसाद अमीरस चाखै ॥
सत गुरु दया सम्पुट उघराई । शून्य शहर में बैठे जाई ॥
देखे बोलता ब्रह्म तेहि ठाई । करे हर्ष धर्ष सी जाई ॥
ब्रह्म देखि त्रिकुटी मैं मुक्ता । जीव सीव होय इक जुगता ॥
जीव सीव एकै लख जाना । देह जीव तब देख पयाना ॥
शब्द प्रतीत देख सत लोका । गुरु की दया मिटे सब धोखा ॥
अगम अलख सो गुरु समझावै । सुरती निरति से दर्शन पावै ॥
गुरु की दया गम्य जो होई । निश्चय दर्शन पावै सोई ॥
एक बार जो दर्शन पावै । देखै बहुरि विलम्ब न लावै ॥
एकै सुरति निरति जो धारे । सुरति सनेही दीप निहारे ॥
यह निस तत्त्व मता जो धारे । गुरु प्रताप सों लोक सिधारे ॥
जाते सहज योग नहिं होई । तातैं आरति साथे लोई ॥
जो मनसा मारे नहिं कोई । तो पुन दासी कर निज सोई ॥
जो कोई काछे सन्त का भेखा । तासों कहिये जोग का लेखा ॥

साखी-गेही लीन्हें आरती, संत सोई सो भोग ॥

इडा पिंगला साधिकै, सुषमनि राधे जोग ॥

गैबी रहनी

( ९० )

ज्ञानसागर

चौपाई

जैसे ग्रेही के मन नेहा । तैसे साथे जोग सनेहा ॥
आसन हठ पर नारि न जावै । ग्रेही रहै न भेष बनावै ॥
देखी देखा भेष बनावै । राध जोग तो शोभा पावै ॥
भेषै धरे सूरता चाही । कादर भेष की हांसी आही ॥
जाते मन सूरमा नहिं होई । तातैं ग्रेही थाप्यो सोई ॥
ग्रेही मैं छल मता अपारा । तातैं सत्य भक्ति चित धारा ॥
करे जो सेवा सन्त की सोई । आरत भक्त महा फल होई ॥
धन्य सन्त जो आरति साजा । काल जंजाल तेहि घरतैं भाजा ॥
आरति समान भक्ति नहीं दूजा । सब ते भली सन्त की पूजा ॥
चरणामृत तासु को लेई । सुरति निरति चरणन चित देई ॥

साखी-सन्त आरती जोग मन, करहि गगनमें बास ॥

ग्रेही जोग न जानहीं, कर आरति परकाश ॥

चौपाई

विना जोग मैं होय उबारा । कै नेवर कै दीपक बारा ॥
तातैं सहज जोग मैं भाखा । शिरनि पान महातम राखा ॥
आरति तो नानाविधि साजै । पान मिष्टान्न भक्त भय भाजै ॥
जो कछु आहि जोगकर भाऊ । सब भाखौ आरति पर भाऊ ॥
वह देही यह ग्रेही व्यवहारै । काया संजम दै अनुसारै ॥
निशिदिन सुरति निरति बिचारा । तातैं मंदिर सेत सद्धार ॥
पांचौ तत्त्व तीन गुण साथै । तातैं मन बिच आरति राधै ॥
इंगला पिंगला सुषमनि वासा । मन बिच कर्म आरत परकाशा ॥
बांधै मूल नाम को साथै । दुबिधा मिटै एक अवराधै ॥
एक घरै कर प्रकृति पचीसा । सोई पुरुष आरति मैं दीसा ॥

साखी-उलट पवन जब आवै, त्रिकुटी भेट जो होय ॥

गुरु की दायो प्रकट हो, संपुट उघरै सोय ॥