कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १८६ )
कर्मबोध
अनेक वृक्ष थे । समस्त वृक्षोंकी यही दशा थी कि सबमें राम राम लिखा हुआ था । जब सर्व वृक्षोंकी यही दशा देखी तब भली भांति दृष्टि दौड़ाई जड़से ऊपर पर्यंत समानही देख पड़ा । तब अनुमान किया कि इन वृक्षों पर कोई आकर लिख गया होगा और इन वृक्षोंमेंसे एक वृक्षकी छाल हटाकर देखा तो छालके भीतर भी वही राम राम सुन्दरताके साथ लिखा हुआ था । तब निश्चय होगया कि यह किसी मनुष्यके हाथों का लिखा हुआ नहीं बरन् प्राकृतिक लिखावट है और उसकी उत्पत्तिका-लसेही वह गुण उसमें आगया है उन वृक्षोंकी यह दशा देखकर मैं गाँवमें गया लोगोंसे पूछा कि इस वृक्षका क्या नाम है तब लोगोंने कहा कि इसे रामनामी वृक्ष बोलेते हैं । उस वृक्षकी जड़में जो अक्षर थे उनकी स्याही बहुत काली थी और जैसे जैसे वे ऊपर जाते थे वैसेही वैसे स्याही फीकी पड़ती जाती थी । पतली डालोंकी स्याही बड़ी फीकी थी । परंतु पत्तोंके नामतो अत्यन्त फीकी स्याही में होंगे कि वे दिखाई भी न देते थे । उस वृक्षका वह रंग ढंग देखकर मैंने जाना कि, पूर्वकालका यह कोई भक्त है और किसी दोषवश वृक्ष होगया है ।
उस समय यमलार्जुन कुबेरके पुत्र याद आये जो नारद मुनिके शापसे दोनों वृक्ष हो गये थे कृष्णजीने उनका उद्धार किया उस वृक्षकी अवस्थासे उन्हें छुड़ाकर उनको यथार्थ स्वरूप प्रदान किया । इसी प्रकार गौतम ऋषिकी स्त्री ( अहल्या ) गौतमके शापसे पत्थर होगयी थी । श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे अपनी पूर्वा-वस्थामें प्राप्त हुई इसी प्रकार सर्व जीव कर्मके बन्धनसे पड़े हैं जड़ और चैतन्यमें सर्व फँसे हुए हैं और किसी योग्ययत्नसे कदापि नहीं छूटते उलटा दिन प्रतिदिन अधिक फँसते जाते हैं ।
बोधसागर
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इस प्रकार सर्व जीव बन्धनमें पड़े और कर्मकी फाँसी सब जीवोंको लगी । इससे छूटना असम्भव हुआ । सहस्रों युक्तियाँ करता है परंतु प्रतिदिन बँधा जाता है । यह तीन लोक भवसागर ( उत्पत्तिसागर ) कर्मने बनाया है, कर्म-मन ब्रह्मा-काल पुरुष इत्यादि यह सब नाम इसीके हैं । इसी कर्मने यह भवसागर बनाया है और यही कर्म इस पर अधिकार कर रहा है, ब्रह्मांड और पिण्ड दोनोंकी स्थिति कर्मसे है । अनगिनती ब्रह्माण्ड हैं जिनकी सीमा नहीं । यह ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनों अनगिनती नाना प्रकारके जीवोंसे परिपूर्ण है । जीवोंका अनगिनती स्वरूप तथा स्वभाव है कि जिनका कुछ विवरण हो नहीं सकता । किसीका वय लाखों वर्षका है और कोई ऐसे हैं कि एक बार स्वांसके आने जानेमें बहुत बार उत्पन्न होते और मर जाते हैं । कोई गरम हैं कोई अत्यन्त ठण्ठे हैं ये सर्व जीव वासनासे भरे हुये हैं इस भवसागरमें पड़े गोता खाया करते हैं । कभी स्वर्ग/ कभी नरक और कभी मृत्युलोकमें रहते हैं । इस चौरासी लाख योनिके जीवोंको सुख नहीं मिलता सदैव दुःखी सुखी हुआ करते हैं । चारों खानिके जीवोंमें कोई न सुखी और न सन्तुष्ट है कर्मोंके बन्धनसे सदैव इनका आवागमन हुआ करता है । यह भवसागर पशुओंसे बसा हुआ है इसमें मनुष्य कोई नहीं और जो मनुष्य हैं उनके काम क्रोध लोभ आदि वासना नहीं जबलें अपनेको वासनाओंसे पृथक् न करे तबलें मनुष्यताके योग्य न होगा । जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया यह चारों अवस्था मनमें स्थिर किया है । जबलें कलुषित कार्योंसे पृथक् न हो तबलें प्रकाशका मार्ग न
( १८८ )
कर्मबोध
देखेगा । इस कारण वासनाओंके आनन्दसे दूर भागना चाहिये । हंस वही है कि, जो भवसागरके दूसरे जीवोंको कालके जालमें फँसा देखकर बुद्धिमानिसे दूर भाग जावे । जबलों मनुष्य अपने को जाग्रत अवस्थामें न अधिकृत करे तबलों मनुष्यता प्राप्त न करेगा । इस जीवको वासनासे नष्ट करके भवसागरमें बाँध रखा है । समस्त बुराई तथा बन्धनकी जड़ यही वासना है । इस मनके पाँच अहंकार हैं इन्हीं पाँचोंमें स्वामी तथा सेवक सभी फँसे हुये हैं ।
इति कर्मबोधे एकोनविंशस्तरंगः
श्रीः
अथ श्रीअमरमूल प्रारंभः
भारतपथिक कबीरपंथी
स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित
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मुद्रक व प्रकाशक-
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-“लक्ष्मीवेल्लुटेश्वर” स्टीम्-प्रेस, कल्याण-बम्बई.
पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “लक्ष्मीवेल्लुटेश्वर” मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षके अधीन है ।
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
अमरमूल ग्रन्थ (विंश तरंग)
सत्यमुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन. धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हकनाम. पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी वंश- व्यालीसकी दया
अथ श्रीबोधसागरे
विंशस्तरंगः
अथ श्रीअमरमूल प्रारम्भः
धर्मदास वचन साखी
धर्मदास बिन्ती करें, मुन गुरु कृपानिधान । जरा मरन दुख मेटके, दीजे पद निर्वाण ॥ मरन काल त्रयलोकमें, अमर न दीखा कोय । यह संशय निश दिन लंगो, जीते ताहि विगोय ॥
( १९२ )
अमरमूल
सोरठा-हे प्रभु दीनदयाल, जक्त जीव अति दुखित है । हरहु वेग उर साल, करहु कृपा निज दास कहैं ॥
सद्गुरु वचन-चौपाई
धर्मदास तुम मुक्ति अधीना । सो तब कथा सुनहु परवीना ॥ जरा मरन जिवको मिटजाई । पुरुष नाम गहै चितलाई ॥ अम्बर काया तबहीं पावे । अमर शब्द घट मांहि समावे ॥ ताकी महिमा और न जानी । अमर मूलमें कहीं बखानी ॥ अमर मूल है सबते सारा । अमर मूलका कहौं विचारा ॥
साखी-अमर मूल निज ग्रंथ है, कहैं कबीर बिचार । अमर मूल जाने बिना, बूड़ा सब संसार ॥
चौपाई
अमर मूल जानौ धर्मदासू । ताकर भेद कहौं परकासू ॥ अमर नाम कबीर कहाई । अक्षर बिन बूड़ी दुनियाई ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विन्ती अनुसारी । सुनहु गुरु अपराध विसारी ॥ अमर भेद साहिब कह दीजे । तृषा बुझाय अमीरस पीजे ॥ बन्दी छोड़ मुक्तिके दाता । अमर मूल कहिये विरुयाता ॥ संधि भेद कहिये निर्वारी । यहै ग्रंथ है बहुत अपारी ॥ भिन्न भिन्न सब मोहि बताई । जिह्ति मनकी संशय जाई ॥ प्रेम प्रीती तुमही सो लागी । वचन सुधा सुन हो अनुरागी ॥ अमृत नाम कबीर है सारा । पाऊँ ताहि होय निस्तारा ॥
सद्गुरु वचन-चौपाई
तब सतगुरु अस कहै विचारी । तुमसों ज्ञान कहों अति भारी ॥ प्रथमहि सुनो पाकर लेखा । तिहि पीछे नरिअरका लेखा ॥ तव प्रसाद मैं कहों विचारी । इतनी बातमें जीव उबारी ॥
बोधसागर
( १९३ )
शब्द विदेह भयो उच्चार । तिहिं पीछे त्रैलोक पसारा ॥ शब्दहि नाम लोक है भाई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥ निःअक्षर की परिचय होई । तब सतलोक पहुँचे है सोई ॥ जीवत लोक बैठ पुन जाई । सार शब्द महाँ रहै समाई ॥ अमर शब्दकी होय चिन्हारी । अम्बू द्वीप ताही बैठारी ॥ अम्बू द्वीप लोक कर नामा । शोभा कहा कहौं निजधामा ॥ अवर्ण रूप वणों नहिं जाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥ षोडश भान हंस को रूपा । पुरुषहि महिमा अमृत अनूपा ॥ अमर शब्द सों प्राणी भयऊ । वही शब्द सों लोकहि गयऊ ॥ पान परवाना शब्द है सारा । एही मूल सों हंस उबारा ॥ अकह नाम अक्षर है भाई । तुम निःअक्षर रहौ समाई ॥ निःअक्षर को करै निवेरा । कहैं कबीर सोई जन मेरा ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
निःअक्षर गुरु मोहि बताई । जाते हंसलोकमें जाई ॥ लोक प्रतीति करौं मैं कैसे । कहो विचार चित आवै तैसे ॥ तुम प्रभु निर्गुण भास्व सुनावा । अब कहिये सर्गुण परभावा ॥
सद्गुरु वचन-चौपाई
धर्मदास तुम मतिके आगर । सार शब्द कहियो सुखसागर ॥ हंसा सज्जन परम सनेही । कहियो ताहि परम पद तेही ॥ धर्मदास सो शिष्य तुम्हारा । सार शब्दको कहो सम्हारा ॥ तुम्हरे वंश कहिये उपदेशा । ज्ञानी होय तेहि कहो संदेशा ॥
साखी-मूरख सों जिन खोलिहौ, कहै कबीर विचार । ज्ञानी सों न दुराइ हौ, सुनो सत्त मत सार ॥
( १९४ )
अमरमूल
चौपाई
ज्ञानी होय जे मतिके धीरा । तहीं समाय वस्तु गम्भीरा ॥ धर्मदास सुनियो चितलाई । लोक प्रचय अब देउँ बताई ॥ निर्णय नाम निःअक्षर सारा । सर्गुण सकल कीन्ह विस्तारा ॥ निर्गुण सर्गुण बूझे कोई । सार शब्दमें रहै समोई ॥ अमर मूलका करे विचारा । धर्मदास सो शिष्य हमारा ॥ और ग्रन्थ बहुत मैं भाखा । अमर मूलकी है सब शाखा ॥ शाखा पत्र सबै लपटाना । अमर मूल काहू नहि जाना ॥ अमर मूल धर्मनि सुन लेहू । यही संदेश हंसन कहि देहू ॥ यह संतन को मत है भाई । जातें आवागवन नशाई ॥ सोई जीव उतर है पारा । नातर बूड़ मुआ संसारा ॥
साखी-ज्ञानी होय सो मानहीं, बूझे शब्द हमार ।
कहे कबीर सो बाचि है, और सकल यमधार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
पावन भेद अब कहो बुझाई । तामहिं जक्त रह्यो अरुझाई ॥ नीर भेद मोहिं कहो विचारी । बन्दी छोड़ जाउं बलिहारी ॥
सद्गुरु वचन-चौपाई
नीर पवन का भास्में लेली । सुकृत घटमें करौ विवेका ॥ हम टकसार ग्रन्थ यक भाखा । नीर पवन ताही महाँ राखा ॥ एही माहिं रहे लिपटाई । नीर पवन महाँ रहे भुलाई ॥
साखी-नीर पवन की उत्पति, कहे कबीर विचार ।
जो निज शब्द समावदी, सोई हंस हमार ॥
चौपाई
सार शब्द मैं कीन्ह नवेरा । नहिं माने सो जमको चेरा ॥ गर्भ वास जन्म सो धरई । जो यह लेखा बाहर परई ॥
बोधसागर
( ११५ )
छत्तिस नीर पचासी पवना । तासों रची सकल ही भवना॥ यह हो भेद कालको दीन्हा । नाम जो एक गुप्त हम कीन्हा॥ नाम भेद जो पावे सांचा । सोई जीव काल सौ बांचा ॥
सारखी-सार शब्द जो जानही, सो जेहै भव गीत ।
नातो जमपुर जायँगे, कठिन काल विपरीत ॥
चौपाई
गोरख पवन साध मर गयऊ । नाम प्रचय अजहूँ नहिं भयऊ॥
ब्यास देव ज्योतिषहि विचारा । लगन सोधकर घरी सम्हारा ॥
नामहि सार चित्त नहिं दीन्हा । लभ मुहूरत सब गहि लीन्हा ॥
सारखी-लभ मुहूरत साधिया, कर्म का भीत बनाय ।
भर्म टरै सद्गुरु मिलै, तबहीं लोकहि जाय ॥
चौपाई
यहै भर्म तब छूटै भाई । सतगुरु शब्द गहे चित लाई॥
नाम पान मैं कहौं बिचारी । जातैं छूटै भर्म किबारी ॥
मोह नसे सत चौकी होई । तबहि नाम कहैं पावै सोई ॥
ताते पान प्रवाना भाखा । भक्ति ज्ञान ताकर है साखा ॥
बिना नाम नहिं उतरे पारा । कैसे साध कहावे सारा ॥
पढ़ पढ़ विद्या वेद पुराना । नाम विना नहिं होय प्रमाना॥
चारहि गुरु जक्तमहैं कीन्हा । तिनके हाथ मुक्ति हमदीन्हा ॥
वे हंसन कहे लोक पठावैं । भवसागर मंह बहुरि न आवैं ॥
सारखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड़ अश ।
मुक्ति राज मैं दीन्हऊँ, अटल ब्यालिसहि वंश॥
चौपाई
धर्मदास तुम मतके धीरा । तातैं दीन्ह मुक्ति कों वीरा ॥
तुमतैं जीव उतर है पारा । दीन्हा सौप जक्त को भारा ॥
राय बकेजी चतुर्भुज राजा । सहतेजी गुरु तहां बिराजा ॥
( १९६ )
अमरमूल
साखी-राय बंकेजी चतुर्भुज, सहते जी हैरान । येहि छुड़ाय हरेक हीं, शब्द देहिं पहिचान ॥
चौपाई
यही छुड़ाय काल सों हंसा । शब्दहि दै कर हैं निःशंसा ॥ तुम धर्मदास ब्यालिसहि वंशा । ये निज आंहि पुरुषके अंशा॥ इन कहिये सौप दीन्ह जिवभारा । सब जीवनको करे उबारा ॥ इनही छोड़ अन्त चित लावै । जन्म जन्म सो भटका खावै॥ वंश ब्यालिस तुम्हरे सारा । और सकल सब छूठ पसारा ॥
साखी-नाम भेद जो जानही, सोई वंश हमार ।
नातर दुनियां बहुत ही, बूढ़ सुआ संसार ॥
चौपाई
धर्मदास मैं कहों बिचारी । यह विधि निबहै यह संसारी॥ काल कठिन है बहुत अपारा । जिन यह सृष्टि कीन्ह संहारा॥ ता कहैं कोइ न जाने भाई । कालहि सुमरण करहिं बनाई ॥ काल दुःख दे सबहि रुवावे । शब्द होय तहैं माथ नवावे ॥ नाम एक गुप्त है अमोला । सो धर्मनि मैं तुमसे खोला ॥ जो यह नाम को करे सम्हारा । सो भवसागर उतरे पारा ॥ तुम कहैं दीन्ह शब्द उपदेशा । सो हंसन कहैं कहौ सँदेशा ॥ ज्ञान प्रकाश जाहि घट होई । जीवन मुक्ति पावे जन सोई ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहैं सुनिय गुसाई । जीवन मुक्ति कहो ससुझाई ॥ जीवन मुक्ति कहौ किमि जाना । लोक वेद कैसे पहिचाना ॥ सो मोसां यह कहिये भेदा । जिहँतें मनकी संशय छेदा ॥
सदगुरु वचन-चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । वह निज भेद कहौ तुम पासू ॥ उग्र ज्ञान जाके घट होई । मुक्ति भेद कहैं पावै सोई ॥
बोधसागर
( १९७ )
अब मैं कहौं ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करौ प्रवेशा ॥ मुक्ति नाम निःसंशय होई । अमर नाम जब सुर्त समोई ॥ जहँलग कहि जिभ्या करगाया । तहँ लग जानौं सो सब माया ॥ अकह नाम कहा नहि जाई । घट २ व्याप्त निरंतर आई ॥ नाद शब्द जबहीं उच्चारा । तासौं अक्षर भयो बिस्तारा ॥ अक्षर हीते उपजी माया । संशय भई सबनकी काया ॥ तब ही शब्द सुर्त मन लाया । मन थिर भए नहीं है माया ॥ स्थिर घट मन लहर समानी । मुक्तिरूप तबही पहिचानी ॥ सो निःकर्म जीव हमारा । कर्म काट भव उत्तरे पारा ॥ जो यह गहै शब्द मन लाई । ताकर आवागमन नसाई ॥ सीखै पढ़ै काम नहि आवै । कर्म जीव मुक्ति नहि पावै ॥ ज्ञान प्रकाश जाहि घट होई । ताके हृदय मोह नहि कोई ॥ जैसे सूरज बादल हँधा । ऐसे मोह ज्ञान कहँ भँदा ॥ जब लग मोह न छूटे भाई । तबलग नाम न हृदय समाई ॥ जबलग मोह रहै तन बासा । तबलग नहीं ज्ञान प्रकाशा ॥ जन्म जन्म कर भक्त जो होई । तबहि नाम कहँ पावै सोई ॥ कोटिन जन्म भक्ति जिन कीन्हा । अमर मूल तबही पर चीन्हा ॥ अमर मूल कर पावे भेदा । कहैं कबीर सो हंस अछेदा ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बिनती अनुसारी । सदगुरु वचन जाऊँ बलिहारी ॥ जिहि विधिममन होय अछेदा । सो समरथ कहि दीजे भेदा ॥ जो मोहे कहो पान परवाना । नरियर भेद कहो सहिदाना ॥ कहाँ ते भयो पान परवाना । कहवाँ ते नरियर उत्पाना ॥
सतगुरु वचन
अमर मूल सौं पान बनावा । बेली बीज नहीं निर्मावा ॥ हतो न बेल बीज तिहि ठाई । शब्द माहि बेली निर्माई ॥
( १९८ )
अमरमूल
उपजो तबै पान परवाना । जाते हंस होय निर्वाना ॥ नरियर आहि धर्मको माथा । सो मैं दीन्ह तुम्हारे हाथा ॥ जीवके बदले नरियर दीन्हा । हंस छुड़ाय धर्म सो लीन्हा ॥ नारियर पान प्रसादकी जोरी । सार शब्द सो नरियर मोरी ॥ जिन नरियरको पाय प्रसादा । जन्म मरणका पाप नसादा ॥ जे जीव पायो पान प्रवाना । देह छोड़ सतलोक पयाना ॥ काल दगा तबही मिटजाई । सत्यलोक महाँ जाय समाई ॥ ऐसी भक्ति जीव जो करई । भक्ति बिना सो नहिं निस्तरई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥ नरियर पान प्रसाद बतावा । ताकर भेद नाहिं हम पावा ॥ सोई भेद मोहे देहु बताई । जिह्ति मन संशय मिटजाई ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तुम सुनो सुजाना । नरियर भेद पान परवाना ॥ धर्मदास जब सेवा लाई । तबकी कथा कहौं समुझाई ॥ जब तुम सुनो धर्मकी आदी । तब मिटि है जिवकी बकवादी ॥ सेवा बसहि पुरुष तब भयऊ । तीन लोग भवसागर दयऊ ॥ मानसरोवर बैठक दीन्हा । कामिनि देख बहुत सुख कीन्हा ॥ धर्मराज कामिन कहँ ग्रासा । तबही पुरुष आप परकाशा ॥ तीनलोक जिव करौं अहारा । तबही भरि है उद्र तुम्हारा ॥ तीनलोक महाँ जीव जो होई । धर्मराय कहँ आवैं सोई ॥ ताते नरियर बदला दीन्हा । जीव छुड़ाय कालसौ लीन्हा ॥ भक्ति प्रवान कहेउ समुझाई । बिना भक्ति नहिं काल पराई ॥ नरियर पान शब्द है नौका । भक्ति प्रवान कहेउ तहाँ चौका ॥
बोधसागर
( १९९ )
भक्ति प्रवान कहौ समुझाई । कवन भक्ति सों जीव मुक्ताई ॥ तुम प्रभु हौ हंसनके नायक । पुरुष पुरातन जीवहित लायक ॥ भक्ति अँग मोहे देव बताई । तिहिं गहि हंसा लोक सिधाई ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास सुन भक्ति विचारा । जासों उत्तर जाय भव पारा ॥ प्रथमहि पान प्रवाना पावै । साधनकी सेवा मन लावै ॥ सार शब्द घट रहे समोई । अक्षर भेद पावै जन कोई ॥ अमर वस्तु गुप्त हम राखा । ज्ञानी होय तेहि सों भाखा ॥ शब्द रूप निःअक्षर जानो । सो हंसा सत लोक पयानो ॥ इतना ज्ञान जाहि घट होई । अमर मूलको जाने सोई ॥
छन्द-ज्ञान पूरन होय जा घट पान नरिअर भक्ति हो । बिन ज्ञान नहिं भेद पावैं केते पद गुण शक्ति हो ॥ अमरमूल यह ग्रन्थ धर्मनि सुनियो चित्त लगायकै । जन्म २ को पाप नासै अमरलोक सिधायकै ॥
सोरठा-सुन धर्मदास सुजान, किहिं विधि साधु कहावई । कहैं कबीर बखान, अमरमूल जाने बिना ॥
इति श्रीअमरमूल ग्रन्थ प्रथम विश्राम
ज्ञान भक्ति वर्णन
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास कहैं सुनो गुसाई । जीवन मुक्ति सो मोहे बताई ॥ नाम अमोल तत्त्व अति भारी । दुविधा माहिं जीव संचारी ॥ यह संशय मोहे निसदिन व्यापे । हरहु बेग गुरु यह संतापे ॥
( २०० )
अमरमूल
तुम सतगुरु घर बैठे तारा । आवागमन मोरे निर्बारा ॥ मन अरु जीव भेद बतलाओ । अबजिनमोसन अन्तर लाओ ॥ समझो तबै जीव मुक्ताऊँ । वही डोर गहलोक पठाऊँ ॥
सद्गुरु वचन
पावन पचासी सकल पसारा । जीव पवनसों आहि निसारा ॥ ब्रह्म रूप सब माँहिँ समार्ई । सूक्ष्म रूप जीव दरसारई ॥ दसवां भाग राई कर जाना । आतम रूपी देह समाना ॥ अरु योगिनमें बरते भाऊ । मानस देहमें मुक्ति प्रभाऊ ॥ पांच तत्त्व दस इन्द्री संग । प्रकृति पचीस कहेउ प्रसंगा ॥ यह प्रमान मन करे बखाना । जीव ब्रह्मसों भये उत्पाना ॥ मन करता यह देह समाना । सूक्ष्म रूप नाहिँ पहिचाना ॥ अंक चीन्ह स्थिर होये सोई । ताकी आवागमन न होई ॥ ताकौ बरन भेद जब पावे । मुक्ति होय जग बहुरि न आवे ॥ चौरासी कब बन्धन छूटे । काल जंजाल ताहि नहिँ लूटे ॥ मुक्ति भेद कोइ बिरले जाना । काल फांस जग सब लपटाना ॥ अमर मूल है मुक्ति पसारा । ताकौ संतो करौ विचारा ॥ आतम ब्रह्म एक है भाई । परमातम मिल ब्रह्म कहाई ॥ ज्यों जलमधि सों लहरि उगाई । तिमि परमातम आतम आई ॥ जिमि किसान चिनगी संचारा । इमि जिव भयउ ब्रह्म विस्तारा ॥ जिमि कंचन आभूषण कीन्हा । ऐसे जीव ब्रह्म कहँ चीन्हा ॥ उमैं अंश दीपक इक फूटै । जीव ब्रह्म संग न छूटै ॥ जिमिरविज्योतिकिरणपरकाशा । ऐसे ब्रह्म कर मोहिँ जिवबासा ॥ यहि विधि ब्रह्म जीवहिँ गाई । समझे तबही एक होजाई ॥ शिव शक्ती एकहिँ मतकीन्हा । तारक भेदको बिरले चीन्हा ॥ जे जाना ते मुक्ति समाना । प्रेम भाव सद्गुरु पहिचाना ॥
बोधसागर
( २०१ )
सारखी-जिन जाना निज प्रेम कहैं, सोईं जन परवान । तासों कहिये सूरमा, कहैं कबीर बखान ॥ चौपाई
केवल ज्ञान पाय है सोईं । जिहि पर कृपा गुरुकी होई ॥ केवल ज्ञान प्रगट समझाऊँ । भिन्न २ कर तोहि लखाऊँ ॥ प्रथमहि सुनो ज्ञान कर भेदा । निर्माही होय हंस अछेदा ॥ सुर्तवंत अक्षर पहिचाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥ सुखदाई सबही कहैं भावै । बाल रूप होय अग्नि बुझावै ॥ समदृष्टी एकहि कर जानै । भला बुरा कछु मन नहिं आनै ॥ हृदय पुनीत शुद्ध मन होई । पाखण्ड भर्म डार सब खोई ॥ ब्रह्म वियोग सदा अनुरागी । दसहूँ दिशा झूठ तिन त्यागी ॥ झूठ सकल जग देखौ जानी । जैसे अहै बुदबुदा पानी ॥ अस मति जाकर होय सुहाई । केवल ज्ञान ताहि समुझाई ॥ माया बिना मोह नहिं आवै । नाम पदारथ निश्चय ध्यावै ॥ यह विधि केवल ज्ञान कहावै । जो सुमिरत सतलोक सिधावै ॥ केवल काम निःअक्षर आई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥ निःअक्षर तो करै नवेरा । कहैं कबीर सोईं जन मेरा ॥ अमर मूल मैं बरन सुनाई । जिहिते हंसा लोक सिधाई ॥ शब्द भेद जाने जो कोई । सार शब्द मैं रहै समोई ॥ शब्द ज्ञानका लख जिन पाया । समदृष्टि सब माहिं समाया ॥ जेतक जीव देह धर आए । शब्दहिं सों ते सकल उपाए ॥ शब्द अखण्डा और सब खंडा । सार शब्द गरजे ब्रह्मंडा ॥ निःअक्षर की परिचय पावै । सत् लोक महाँ जाय समावै ॥
धर्मदास उवाच-छन्द
बिन्ती करै कर जोर धर्मन, सुनहु सत गुरु सार हो । सत्तलोक है कौन शोभा, तहाँ कौन व्योहार हो ॥
( २०२ )
अमरमूल
कवन रूप जो पुरुष रहहीं, कवन सुख हँसा करै । कामिनी किहि रूप राजै, तहाँ सुख विस्तार हो ॥
सोरठा-सो मोहे प्रगट सुनाव, दया करौ निज दास कहैं । बार बार बलि जाँव, अब जिन मोहि छिपावहु ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
कहैं कबीर सुनहु धर्मदासू । सतलोक को कहों प्रकासू ॥ है सतलोकहि अम्बर काया । एक रूप सबही त्रय माया ॥ षोडश भान हंस की कांती । अमर चीर पहिरे बहु भांती ॥ शोभा पुरुष कही नहिं जाई । कोटिन रवि इक रोम लजाई ॥ अमर लोक अमर है काया । अमर पुरुष जहां आप रहाया ॥ अमर पुरुष का पावै भेदा । कहै कबीर सों हंस अछेदा ॥ सतलोक सत शब्द पसारा । सत् नाम है हंस अधारा ॥ अमृत फल के भोजन करहीं । युगन २ की क्षुभ्या हरहीं ॥ पीवत सुधा भर्म मिट जाई । जन्म २ की तृषा बुझाई ॥ कामिनी रूप वरन उजियारा । चार भान की ज्योति पसारी ॥ शोभा बहुतक प्राण पियारी । प्रेम भाव सब हंस निहारी ॥ अनहित वचन बोल नहिं बानी । प्रेम भाव अमृत रसरानी ॥ शोभा बहुत जहां मन भावन । हंस कामिनी रंग बढावन ॥ अमृत नाम हृदयमें लावे । प्रेम भाव पुरुषहि मन भावे ॥ आशा बस मन कोऊ नाहीं । भयो प्रकाश शब्दके माहीं ॥ बूझे संत ज्ञानी जो होई । सतगुरु शब्द हृदय समाई ॥ है निहशब्द शब्द सौ कहेऊ । ज्ञानी सोई जो वह पद लहेऊ ॥ धर्मदास मैं तोहि सुझावा । सार शब्दका भेद बतावा ॥ सार शब्द का पावै भेदा । कहैं कबीर सो हंस अछेदा ॥
बोधसागर
( २०३ )
सार शब्द निःअक्षर आहीं । गहै नाम तेहि संशय नहीं ॥ सार शब्द जो प्राणी पावै । सत्तलोक महि जाय समावै ॥
साखी—कहै कबीर विचार के, सुनहु साधु धर्मदास ।
अमरमूल निज शब्द है, ताकर अस परकास ॥
चौपाई
अमर मूल ग्रन्थ में सारा । बिना अमर नहिं हंस उबारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कर जोर निहोरा । स्वामी सुनिये बिनती मोरा ॥
कवन प्रसाद दरश हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥
कवन प्रसाद साधु कहलायऊ । कवन प्रसाद हंस गति पायऊ ॥
कवन प्रसाद ज्ञान हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥
कवन प्रसाद नाम हम पाया । कवन प्रसाद हम लोक सिधाया ॥
कवन प्रसाद सजन जन जानी । सो समुझाय कहो मोहि बानी ॥
सद्गुरु वचन
कहैं कबीर सुनौ धर्मदास । यह सब भेद कहों परकास ॥
पुरुष दयातैं दर्शन पावा । कोटि भक्ति सत नाम समाया ॥
जब कीन्ही सतगुरु ने दया । नाम जान अमर भई काया ॥
सेवा कीन्ही साधु कहाए । लोक जायके हंस कहाए ॥
हेत दीप सज्जन जन जाना । कहैं कबीर भेद निर्वाना ॥
साखी—एक नामकी शोभा, कहैं लग कहों बखान ।
निःअक्षर जो जानि है, सोई सन्त सुजान ॥
चौपाई
सत सहिदानि तोहि समझाई । अमर मूल महि देखौ आई ॥
कोटि जन्मको पातक होई । नाम प्रताप जाय सब खोई ॥
नामहि गहैं सूरमा जानी । बिना नाम कायर सो मानी ॥
( २०४ )
अमरमूल
नाम बिना सबही बिधि हीना । नाम बिना है ज्ञान बिहीना ॥ नाम बिना सो मूरख कहिये । नाम बिना सो पापी लहिये ॥ नाम जान सोई गुण आगर । नाम जान पहुँच सुख-सागर ॥
छंद
नाम अमी अमोल अबिचल अंक वीरा पावही । तज कागकि चाल मरालपथ गह अमरलोक सिधावही ॥ जिमि सदन दीपक बिना नहिं मिटत है अँधियार हो । तिमि नाम विन सुनु दास धर्मनि नहीं घट उजियार हो ।
मोरठा-नाम अमोल अपार, अमर मूल मैं वर्णैऊ ।
करहि कर्म जर छार, कहै कबीर बिचार कर ॥
इति श्रीअमरमूल नाम लोकमहिमा वर्णन ।
द्वितीय विश्राम
धर्मदास वचन-चौपाई
बिन्ती इक मैं करों गुसाईं । जिहि तें मन की संशय जाईं ॥
अमरमूल का कहौं विचारा । जाते हंस उत्तर है पारा ॥
कौन भक्त सों हंस कहावा । कौन विधीसों पंथ चलावा ॥
सो मर्यादि देहु बतलाई । तुम प्रभु ही हंसन सुखदाईं ॥
सद्गुरु वचन
कहै कबीर सुन धर्मनि नागर । यहविधिहंस पहुँच सुख सागर ॥
प्रथम करै सतगुरु की सेवा । जाते मिटै काल कर भेवा ॥
महा प्रसाद प्रेम सो पावै । सेवा कर निज गुरुहि मनावै ॥
घट में राखे प्रेम अनंदा । चौरासी के छूटे फंदा ॥
गुरु साहिब एकहि कर जाने । सो हंसा सतलोक पयाने ॥
साधन सों एकहि मति रहई । दुबिधा भाव न कबहुँ करई ॥
गुरु साधु सेवा जिन कीन्ह। ताकहँ मुक्ति निकट हम दीन्ह। ॥
बोधसागर
( २०५ )
सारखी-गुरु संतनको जान कै, हृदय करै परतीत । कहे कबीर सो हंस है, चलि है भव जल जीत ॥
चौपाई
सतगुरु तहां आरती करहीं । सब तज जहां जाय पगु धरहीं ॥ चरणाश्रुत साधन को लीजै । मुख पूजाकर अचवन कीजै ॥ गुरुकी दया निरवरत रहई । निंदा रूप न कबहूँ करई ॥ निःअक्षर सुमिरौ चितलाई । जासों आवागवन नसाई ॥ निःअक्षर को निरैवे भावा । देह छोड़ सतलोक सिधावा ॥ गुरुके वचन सोचकर माना । नाम बिना मिथ्या जगजाना ॥ और न देख और नहिं पेखै । निस दिन पल २ नाम विवेखै ॥
सारखी-छूट पसारा देख जग, करनी देय बताय । एक नाम कहैं जानके, ता महीं रहै समाय ॥
चौपाई
कर्म भर्म की छोड़हि आशा । एक नाम सों कर विश्वासा ॥ कुलकी लब्धा भर्म नसावै । ऐसी रहिनी साधु कहावै ॥ यह विधिसों तुम पंथ चलाओ । जन्म जन्म को पाप नसावो ॥ वंश तुम्हार लोक कहैं जाई । नाम बिना बूड़ी दुनियाई ॥ नाम जान सो वंश तुम्हारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥ नाम पार नहिं वेदन पावा । नेति नेति कर सब गुहरावा ॥ आदि ब्रह्मको पार न पावे । पठ पठ पण्डित भर्म लगावे ॥ मुक्ति पंथ नहिं सुतै समावा । पठ गुन थकित पार नहिं पावा ॥ अंतकाल जम घेरै आई । तब विद्या कछु काम न आई ॥ विद्या पठ कीन्हा अभिमाना । अंतकाल होय नर्क निदाना ॥ वेद पुराण साख यह भाखा । नाम बिनाको जमसों राखा ॥ व्यास ब्रह्मकी अस्तुति कीन्हा । श्रीभागवत भाखनित लीन्हा ॥