कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानस्थितिबोध
( ११५ )
यापर कीरत कैसे जाई । प्रकृति अंग मायाको भाई ॥ माया अंग अष्टांगी कीन्हौं । अष्टांगी गायत्री चीन्हौं ॥ यह शब्द हम कहो बुझाई । लीजो संतो शिरहिं चढ़ाई ॥ बारा योजन बुड़े जाइत्री । पल पल छूटे इहीठों गायत्री ॥ भ्रमनाको आगो यह टूटे । ब्रह्म कथौ हिरदय रस लूटे ॥ जार बार कालहिकर छीरा । करकर निर्मल अंग शरीरा ॥ बास अमरपुर शब्द संधाना । कहै कबीर काल पछिताना ॥
सम्पूर्ण
न्यास
रक्षा प्रथम न्यास जो करई । सुर गंधर्व न्याससों डरई ॥ कालजाल निज बंदन होई । निर्मल रहै काल कहैं खोई ॥ भूतहि प्रेत वीर वेताला । वायु बतास और सैताला ॥ साठ तीनसौ ऊखत कहिये । हगन्यास कर एक न रहिये ॥
साखी—यह गुन हग अन्यासके, कहै कबीर बखानि ॥ प्रथम रक्ष या कह पढे, बढ़ि हितचित्त पहिचानि ॥
चौपाई
दुष्टनको बंधन है येही । हंस मुक्त मन मुक्ति सनेही ॥ हगन्यास प्रथम जो पढ़ई । तब रक्षा मन शब्दहि दृढ़ई ॥ हगन्यास बालकको चाही । संशै अंश रहित हो ताही ॥ यही शब्द मैं कहों बखानी । यही भेद बिरले पहिचानी ॥
साखी—उत्तम मध्यम अधम जो, सबहि करै निर्वाह ॥ हगन्यासके यह गुण, कुशल क्षेम प्रवाह ॥
धर्मदान वचन
धर्मदास बिनती उठि कीन्हा । पुरुषहि भेदसकल हम चीन्हा ॥ निश दिन चरण चित्त तव धरहूँ । अन्य उपाय सबै परिहरहूँ ॥
( ११६ )
बोधसागर
येहि वचन प्रभु कहो बुझाई । जाते काल दंड दुख जाई ॥ इंडुमती कह काल सतावा । रहि सचेत शब्द लखि पावा ॥ सो मोहि भेद बतावहु स्वामी । करहु कृपा गुरु अन्तयार्मी ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास भल पूछन कीन्हौ । सो अब भेद तोहिकहि दीन्हौ ॥ रानी काल कीन्ह जब त्रासा । तब हम शब्द कीन्ह परकाशा ॥ साधु संत सेवा चित धरहीं । भक्ति प्रेमबहु बिधि सों करहीं ॥ हमहिं छोड़ि नहि जाने दूजा । कुलकरनीकीं छोड़े पूजा ॥ तजि कुल करनि अमरपदपावा । येही सात नाम चित लावा ॥ तोसों शब्द विरहुली भाखी । तव कारण हिरदेमें राखी ॥ येही शब्द लेहु शिर मानी । मनसा वाचा निश्चय जानी ॥
विरहुली
आदि अन्त तब न हते विरहुली । भूमि अकाशहु न हते विरहुली ॥ तब विष नहि अवतार विरहुली । विषकीकयारितुमबाहिबिरहुली ॥ बिषका कीन्ह अहार विरहुली । सवा लक्ष पर्वत थे विरहुली ॥ तहाँ विषको अवतार विरहुली । गड़िगड़िशंकर बोह विरहुली ॥ पर्वति डारेउ पानि विरहुली । सोविष संतहि खाइ विरहुली ॥ विष माटि होय जाय विरहुली । मउरी संसय करिय विरहुली ॥ आफूयों हरतार विरहुली । सबसों शब्द निरंत विरहुली ॥ भागु विषपैठि पताल विरहुली । बनहि कंदविषविकल विरहुली ॥ पोस्त धतूरा भाँग विरहुली । गुरु वचन धरि बाँध विरहुली ॥ विष न संचरे अंग विरहुली । उदमदविष मदराज विरहुली ॥ यह विष बिरलैसम्हारबिरहुली । जब नहि स्वर्ग पताल विरहुली ॥ तबविष नहि अवतारबिरहुली । दूत भूत सब भगे विरहुली ॥ जहाँ बसे साधू संग विरहुली । भोगा कीयो तैं कहां विरहुली ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११७ )
कहाँ ये डसवत आये बिरहुली । सास्वी नामकी चले बिरहुली ॥ सब दुख तुरत नशाये बिरहुली । नामकी कहाउतपाति बिरहुली॥ सबहि तुच्छ कह जाय बिरहुली । वचनादिके अकार बिरहुली ॥ मन विष दूर पराय बिरहुली । तनसों दूर है जाय बिरहुली ॥ शब्दमुनत विष जाय बिरहुली । हरि प्रकटै संसार बिरहुली ॥ साहिब कीयो संसार बिरहुली । दूत भूत सब हारि बिरहुली ॥ पहुँचे सत्य कबीर बिरहुली । भई यम जिय पीर बिरहुली ॥ इन तन विषन समाय बिरहुली । उत्तर रानी पाय बिरहुली ॥ उठिके आसन दीन्ह बिरहुली । विरहुली दुःख नशाय बिरहुली॥ वार वार शिरनाय बिरहुली । कबीर गुण गाय बिरहुली ॥
बिरहुली संपूर्ण
धर्मदास वचन
धर्मदास फिर विनती करहीं । सतगुरु चरण शीश पर धरहीं॥ अब प्रभु कहिए लोक सुरूपा । दीन दयाल कृपाल अन्नापा ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास मैं कहाँ बुझाई । विना भेद लोके नहीं जाई ॥ अंधी सुरति शब्द बिन जानौ । लोक दीप कैसे पहिचानौ ॥ शब्द पाय जब सुस्थिर होई । थान मुकाम लखै पुनि सोई ॥ जो लखि पावै थान मुकामा । सुरति चले तब पावै नामा ॥ विना नाम नहीं ठौर ठिकाना । अंध सुरति हो रहे ठगाना ॥ सोहंगत सब छहौं बखानी । एक चित्त है गहे जु प्रानी ॥ पुहुप दीप सब दीप निवासा । छब्बिस दीप रचौ तेहि पासां ॥ कंचन दीप पाहु पर सोहै । रत्न अन्नाप कोटि रवि मोहै ॥ तहां पुरुष पर कीर्ति विराजै । उत्पति प्रलय तेहिपर छाजै ॥ लीलगर दीप पुरुषको वासा । जहां पहुँचे न कालकी त्रासा ॥
( ११८ )
बोधसागर
कालहि गमी वहाँ नहिं आवै । सहज पुरुष जहाँ बैठि रहावै ॥ विनती सहज कीन्ह कर जोरी । जीवन बंध वेगि प्रभु छोरी ॥ बीज शब्दमें सोहं वीरा । यह उत्पति गुरु कहै कबीरा ॥ यहाँ गमी कोऊ नहिं पावै । जहाँ लीलगर द्रौप रहावै ॥ तहाँ सुजन जन बैठे ज्ञानी । सत्य सुकृत दोई अगवानी ॥ अब मैं कहौं दीपकर लेखा । जाविधि रचिव रंग औ रेखा ॥ बीज शब्दमें सोहं बीरा । ये उत्पन्न सुन धरौं शरीरा ॥ जगमगज्योति सदा उजियारा । शब्दरूप काया कर प्यारा ॥ शब्दहि हेत वचन है वोटा । रत्न शिला चहुँ दिशि है कोटा ॥ लोक नाम है लोक अनन्दा । उडगन महाँ सोहत जस चन्दा ॥ आस पास कंचनकी बारी । हीरा लाल रत्न अवतारी ॥ कहा कहीं मंदिर कर रेखा । खम्भा कंचनके आहि विशेषा ॥ सिंहासन अति तहाँ विराजै । कंचन जडित लाल बहु छाजै ॥ लगै कोटि वहुँ दिश रूपा । चन्द्र प्रकाश ही जान स्वरूपा ॥ तेतिस कोटि सूर्यकी पांती । बीच बीच देखो अस क्रांती ॥ तापर सोहत अधर अटारी । हीरा मोती बहुत सँवारी ॥ ता ऊपर शोभित कस रेखा । कोटि रत्न दमकत जनु लेखा ॥ मोतिक चौक पूर जनु डारी । शोभित चौक कलित विस्तारी ॥ ता ऊपर जु रंग अस सोहै । मानहु रत्न मणी मय होवै ॥ जगर मगर सोहै उजियारी । उपमा बरण सके को प्यारी ॥ बहुत हि उपमा को कह दीजे । कोटिन भाग सूर्य शशि कीजे ॥ पालँगरूप काकहिके बखानी । हीरा रतन बीच बिच खानी ॥ सेजरूप शोभित शशि खानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥ चन्द्र सूर्य नाहीं वह तारा । नाहिं रत्न कञ्चन महि भारा ॥
साखी-ज्ञानस्थितिके यह गुण, पुरुष रूप उजियार । पलमें इच्छाते भए, लोक दीप विस्तार ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ११९ )
चौपाई
तहाँ पुरुषने सेज विछाई । चन्द्र सूर्य जहाँ रहे लजाई ॥ तिलभर सिज्याको परवाना । सोहें सुरति अभयपद ज्ञाना ॥ तहवाँ पुरुष करहिँ आनन्दा । जिनसों अमी भए सब छन्दा ॥ तहाको बरन कहे को भाई । लक्ष जीवसों नाहिँ कहाई ॥ अमर चीर सोहें अस अंगा । सूर्यमणीसों अधिक सुरंगा ॥ यही व्रत हंसनको भाई । पुरुष रूपको कहै बनाई ॥ शोभा कहो दोऊ कर पानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥ सर्व वरणको कहो बुझाई । उभे सूर्य मानो उमगाई ॥ दंत सुरंग शोभित अति भारी । मानो मणि बत्तीस विचारी ॥ बालरूप का कहों बखानी । चन्द्र किरण मानो लपटानी ॥ इक २ चरित वरणि नहि जाई । मानहु सुकृत सत्य उमगाई ॥ अधर नासिका सोहत कैसा । उभय हंस बिहरत है जैसा ॥
साखी-बरणन सबका याहको, मोसों कहो न जाय । उपमा केहिको, दीजिये, पटतर नाहि दिखाय ॥ सूर्य होय समुद्र भर, भू अकाश भरि चंद । तबहु न पटतर पाइये, पुरुष वदन आनंद ॥ राई भर वह वस्तु है, अधराई अस्थूल । लहर लहर घटमेंकरै, वही पुरुष निजमूल ॥ इह गुण ज्ञानस्थितिहिके, कहे कबीर समुझाइ । पुरुष ध्यान जबही करै, सब दुख जाय पराइ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास तब बिनती ठाना । दीन्हों मोहि मुक्ति फलदाना ॥ साहेब कहिए मोहि बखानी । सत्ताइस दीप कहो बिलछानी ॥ दीपनको कहिये मोहि लेखा । जामे परचे शब्द विवेका ॥
( १२० )
बोधसागर
धर्मदास जो पूछिब आई । सो अब कथा कहो समुझाई ॥ पुहुप द्रौप जहाँ पुरुष रहाई । अलोप दीप तासों कहि भाई ॥ आस पास है छविबस दीपा । तहाँ पुरुष रहै अधर समीपा ॥ तीन दीपनको नाम बखानों । धर्मदास मनमें बिलछानों ॥ अजर द्रौप पुरुषके पास । कुसुम दीप सतगुरु निवासा ॥ अमरदीप सुजन जन जाना । सुमन द्रौप अब कहौ बखाना ॥ सहस्र नेत्र द्रौप सुनि लीजे । अलोक द्रौप सुनिके चितदीजे ॥ कंचन दीप बखानों आई । कंचन दीप सुनो चितलाई ॥ सुरजन द्रौप कहौ सम्भारा । अजर द्रौप निर्मल उजियारा ॥ हेत द्रौप सुनियो चितलाई । लवंग द्रौप द्रौप अति छाई ॥ अबहि निरक्षर कहिये द्रौपा । कमल द्रौप तहाँ पुरुष समीपा ॥ अंबु द्रौप बहुत उजियारा । सुरति द्रौप अब कहौ पसारा ॥ भिरत द्रौप सोही जन जानै । निग्रह द्रौप करै पहिचानै ॥ श्वेतद्रौप समझो हो ज्ञानी । निश्चित द्रौपमें जाय समानी ॥ सुस्थिर द्रौप चित जो राखा । कीरति द्रौपकरे अभिलाषा ॥ अकृत द्रौप आहि उजियारा । अक्ष द्रौप मह शब्द पसारा ॥ द्रौपचंद्र मन कहौ अनन्दा । पतंग द्रौप उमगै रवि चन्दा ॥ कुरअ द्रौप धर्मनि लघु जानी । सताइस द्रौपके नाम बखानी ॥
साखी-इतने द्रौपक गुम हैं, कोइ न जानत नांव ।
कहैं कबीर धर्म दाससों, सोई ठांव लखाव ॥
चौपाई
धर्मदास तुम सबै बिचारा । सार शब्द नाहिं अनुसारा ॥ जब लगि सार शब्द नाहिं होई । तौ जिय केता जन्म बिगोई ॥ काम कपाल भोज बसु नारी । सो साधू जिन नाम सँभारी ॥
ज्ञानस्थितिबाध
( १२१ )
इकोत्तरसे पुरुष तर जाई । इहि विधि रहन गहे चितलाई॥ नारि पराई चित मन देही । जन्म सात कुछी कर लेही ॥ नारि पराई अंग छुवावै । कशमल लगै तत्त्व घटि जावै॥ लाख वर्ष रहैं भूतकी खानी । भुगते नर्क घोर सो प्रानी ॥ बिना शब्द जो भुगवहि नारी । तो सब परै कालकी वारी ॥ बिना शब्द निरञ्जन लीन्हौं । ताते पुरुष माथ पुनि छीन्हौं॥ नर्कहिकी कहा बात जु कहिये । सुर नर सबै काम वश रहिये॥ धर्मदास सुनि लीजे हमसों । उत्पति सकल कही हम तुमसों॥ राजा युग घिर पास मैं गहिऊं । बालकरूप तहां पुनि रहिऊं ॥ घरन कुमार तासकी रानी । प्रीतभाव बहु सेवा ठानी ॥ पुत्र भाव उन हमकह जाना । कपट भाव नहिं तजौं निदाना॥ ज्ञान पुण्य वे बहुतहि करहीं । राज गुमान गर्व अति धरहीं ॥ शब्द हमार नहीं उन चीन्हौं । कुंजर देह जायसों लीन्हौं ॥ कनक सिंह तिनके सुत कहिये । राज तिलक उनके शिर रहिये॥ भाग्यवन्त भयेऊ बड़ राजा । पिता पीड करही सब साजा ॥ बहुतक दिवस तहां चलियऊं । एक दिवस कौतुक अस भयऊं॥ आधी रात बीति गइ जबही । राजा स्वप्न दीन्ह पुनि तबही ॥ कुंजर देह धरै तब आवा । कनक सिंह कहैं स्वप्न जनावा ॥ अहो पुत्र सुनु बचन हमारा । यहि घर आय तू सिरजनहारा॥ आतारूप उन्है जिनि जानो । सतगुरु आप लेव परमानो ॥ जब तुम भक्ति करो चितलाई । कुंजर देह छूटि मम जाई ॥ चटपट परत राति नियरानी । मीन करत जो पानी पानी ॥ प्रात आइ पद शीश लगाऊँ । हम नहिं चीन्ह तुम्हारा भाऊँ॥ चूक परी हमसे गुरु साई । मरम तुम्हार चीन्ह नहिं पाई ॥ आतारूप हम तुम कह जाना । तुम तो ब्रह्म आहु निरवाना ॥
( १२२ )
बोधसागर
पिता हमार कुंजरहि भयऊ । आधी रात खबर मोहि दयऊ॥ क्षमा अपराध कीजिये स्वामी । कृपा सिंधु हो अंतरयामी ॥ साहब दया करौ अति भारी । सकल जीव हैं शरण तुम्हारी॥ दाया करि दीजै वर सोई । जाते आवागमन न होई ॥ जिहिमो होय मोर निस्तारी । सो प्रभु करिहों तब बलिहारी॥ तब हम उनपर दाया कीन्ह । संधिक नाम उनहि कह दीन्ह॥ विधिपर भक्त कीन्ह चितलाई । धनकर मनकर तनकर भाई ॥ सतरहसै रानी परवाना । कर्मनि काहु कहा नहि माना ॥ कइक उहागिल हती जो रानी । सोउठि चली शब्द पहिचानी॥ सकल रूप कर चली सिंगारा । भक्ति हेत कारन पग धारा ॥ लीलावती नाम तिहि केरा । सो हम जीवन कीन्ह उबेरा ॥ सोरह रानी सत्रहों राजा । पहुँचे लोकहि पुरुष समाजा ॥ सोई कथा कुंजर में आई । धर्मदास परखो चित लाई ॥
साखी--यह गुन ज्ञान स्थितिहिके, सेव शब्द निजसार । या विधि हंस करनी करै, उत्तै भवजल पार ॥
सजेको शब्द
साखी--अक्षय नामके सेजपर, हंसा पारस दीन्ह । कालमें यम लूटिके, हंस आपन कर लीन्ह ॥ अक्षय सुख सेज आदी बानी । जापर हंसा पारस आनी ॥
साखी--जो हंसा पारस परसि, कहे कवीर सत बोल । ताकहँ चोर डहके नहीं, युग २ आहि अमोल ॥ ते हंसागये अमर लोककहँ, अक्षय अंक हमपारसलीन्ह । कहै कवीर सतलोक बैठकर, जीमें चीन्होती दीन्ह ॥
धर्मदास बचन-चौपाई
धर्मदास चित सेवा ठाने । दोइ कर जोरि चरण लपटाने ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२३ )
कठिन वेद साहेब तुम कहेऊ । जीवन मर्म न काहू लहेऊ ॥ ब्रह्मा विष्णु शंकर मिलि भाई । अलख निरंजन ध्यान लगाई॥ सुर नर मुनिकी कौन चलावै । पच्च २ मरै पार नहिं पावै ॥ तवन भेद साहेब मोहि दीन्हौ । हंस उबारि लोक कहैं लीन्हौ ॥ अब प्रभु मोही कृतारथ कीजै । लोक दिखाय दरस प्रभु दीजै॥ यही देहसों लोक दिखावो । हे दयाल मम तृषा बुझावो ॥ चित चकोर तब होइ अनंदा । दिखे अघाइ लोक सुठि चंदा ॥
साखी-धर्मदास विनती करै साहब सुनो चितलाय ।
जबही मम संतोष होई, पुरुष दर्श दिखाइ ॥
चौपाई
सद्गुरु वचन
तब साहेब कहि बचन प्रमाना । धर्मदास तुम मन पतियाना ॥ तुम जग पंथ चलावहु जाई । हमकह चिह्न पुरुषकह पाई ॥ हमहि पुरुष कहु अंतर नाही । सुरती छाया संग रहाही ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास न्यौछावर कीन्हौ । भये कृतारथ दर्शन दीन्हौ ॥ अब साहब मोहि लोक दिखाऊ। तुमहि छांड़ि दूजा नहि भाऊ॥ बिनदेखे सुस्थिर नहिं होई । कृपा करहु निज राखो गोई ॥ जैसे कृपण द्रव्यकी आसा । बिन पाए बहु होवै त्रासा ॥ दरस करत तन तपत बुझाई । जैसे रंक महानिधि पाई ॥ बिन देखे व्याकुलचित भारी । पुत्र मरे जिमि मात दुखारी ॥ दरश विना नाही चित लागा । हे प्रभु मोकहैं करहु सुभागा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास भाल कीन्ह विचारा । अब तुम बचन सुनौ टकसारा॥ काया अवधि पुरी जब आही । तब लेजाव पुरुषके पाही ॥
( १२४ )
बोधसागर
सुरति शब्द डोरी हट धरहू । छूटै देह तर्स तब करहू ॥ तब लगि पंथ चलावहु जाई । हटता मानि करौ गुरुवाई ॥ मिथ्या वचन तुमहिस्सों करिहे । यमकी डगरि जाय सो परिहे ॥
धर्मदास वचन
मूर्छित होइ चरण चित लागे । जल बिनमीनप्राण जिमित्यागे ॥ बिन देखे नहि होय अनन्दा । चिडिया व्याकुल है अतिफन्दा ॥ तुम साहेब अस बचन उचारा । कंप्पो जीव त्रास भवसारा ॥ हम दरशन विनु हैं अति चोरा । तुम प्रसाद हम पाइत बोरा ॥ अंतरध्यान भए प्रभु जवहीं । सात दिवस बीते पुनि तबहीं ॥ सात दिवस लग अन्न न पाया । कबीर कबीर ध्यान मन लाया ॥ सदगुरु दया करी चित लाई । कच्छ देशते तब चलि आई ॥ कच्छ देश जब कीन्ह पयाना । अलीदास धोबी पहिचाना ॥ नाम पान ता कहैं समुझाई । धर्मदास कह आन जगाई ॥ छोड़हु हठ चित शब्द विचारौ । पंथ चलावहु हंस उबारौ ॥ जीवन अपनी बाँह चलावो । दै परवान हंस सुत्तावो ॥ तुम सब हंसनको सरदारा । जीव उबारि जाय दरबारा ॥ देही सहित जान तुम चाहौ । देह धरै कैसे निर्बाही ॥ लोक बैठि तब करिहौ राजी । काग कालकी टोरहु बाजी ॥ अपनी संशय तुम मत धरहू । जीव उबारनकी सुधि करहू ॥
साखी—देह धरेका यह गुण, देहसहित नहि जाव ।
सुखसागर तबहींमिलै, सुरति शब्द लौलाव ॥
चौपाई
धर्मदास उठि बिनती कीन्हां । नामसंधि साहब मोहि दीन्हां ॥ लोक दीपकी सुनी बडाई । ताते दरश परश चित लाई ॥ जब लगि नाहीं देखौ नैना । तब लगि नहि पतियाहूँ बैना ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२५ )
अन्तर ध्यान बहुरि प्रभु भयञ्जः। धर्मदास विलखत मन भयञ्जः॥ रुदन करत फिरै विलखाता । कहैं ना देखे साहब गाता ॥ मोहि अपराधी कस प्रभु छांङ्गा । विरह ज्वाल जरही मन भांङ्गा॥ हौ अपराधि करम कर हीना । साहेब तरस परै नहिं चीन्हा ॥ बिन देखे नहिं जियत न आऊँ । गुरुचरणामृत बिन पछताऊँ ॥ अपना दास दास प्रभु कीन्हा । अग्रिम पदार्थ हम कह दीन्हा॥ अब साहेब मोहि दर्शन देहू । तुम बिन कासो करब सनेहू ॥ दिवस आठ अन्नहि बिन बीता । बिना कबीर जीव नहिं जीता ॥ या विधि बारह दिन हो गयहू । तब साहब फिर दर्शन दियहू ॥
साखी-सजिव भये निजीवते, अति अनन्द उर बाढ़ि ।
धर्मदास मन हर्ष भा, सुख अनन्द हिय गाढ़ि ॥
चौपाई
धर्मदास बिनती तब लाई । इतने दिवस दरस बिन जाई ॥ हम तो भ्रमर कमलके वासी । जल बिन मीन सुरतिज्यों प्यासी ॥
सद्गुरु वचन
तब साहब अस भाखब बैना । अब तुम देखो अपने नैना ॥ देखहु धर्म निरूप हमारा । हमही छांङ्ग और चित धारा ॥ हिरिणिरूप धरो प्रभु तबहीं । कोटिन भानु छिपाने जबहीं ॥ येहि रूप है आदि हमारा । हठ नियह जिन करब बिचारा ॥ जब तुम इतना कीन्हा उपासा । तब कह दरस पाइ हम पासा ॥
धर्मदास वचन
भये कृतार्थ दर्शन लीन्हा । धर्मदास न्यौछावर कीन्हा ॥ बहुरि दास उठि पायन परही । चरण टेक बिनती अनुसरही ॥ जबसे पावब नाम तुम्हारा । तबसे सुनब लोक व्यवहारा ॥ अब मनसौं अभिलाखा येही । सोक दिखावहु पुरुष विदेही ॥
( १२६ )
बोधसागर
मो कह लेहि चलौ प्रभु तहवां । सत्य लोक पूरुषही जहवां ॥ बिन परिचय नहिं मन पतियाई। विन दर्शन नहिं सुरति हद्दाई॥ तुम प्रसाद पाइब मैं भेदा । अब परसौ चित अमृत केदा ॥ सत्यलोक परसौ उजियारी । मैं अब बलि २ जाऊँ तिहारी॥
साखी—यम बंधन सब काटिकै, हंस लगावहु तीर । धन्य भाग्य वा हंसके, कहि नाम कबीर ॥
सदगुरु वचन चौपाई
तब साहब चित पाया आई । चलहुँ वेग मैं दर्श दिखाई ॥ प्रथमहि करौ नासिका बारी । फिर रक्षा मन है रखवारी ॥ पैठै नाहीं काल शरीरा । बहुरि कठिन होवे तब पीरा ॥ जब तुम करहु अग्र सनेहा । शब्द संधिसौं राखो नेहा ॥ उन मुन कर पवनहि अवराथौं। उलटे ते सुलटा करि साथौं ॥ सोहं सोहं होइ सवारा । छोड़हु देह चलो दरबारा ॥ चले जो हंस पवनके तेजा । पहुँचे निमिष मांह जहां सेजा ॥ पलैंग साठ राह हम कीन्हों । साहिब खैंचि पलकमों लीन्हों ॥ राह माह एक नाचहि दूता । शब्द बान मारेय अजगूता ॥ छिनमें साहब लैगये तहँवा । पुहुप दीप पूरुष रह जहँवा ॥ सुरजन पीप जाइ भे ठोढ़े । देखत दरस हरष अति बाढ़े ॥ धर्मदास सत बिनती कीन्हों । साहब सुरति घटहिमों चीन्हों ॥ लेकर सुररति चले पुनि तहां । हंस सुजन बैठे जहां ॥ करी प्रणाम दण्डवत कीन्हों । हंसन कुशल पूछि सब लीन्हों ॥ केहि बिधि तुम रक्षा मन आयहु । कौन शब्दसों अमृत पायहु ॥ यमको जोर पहुँचत है प्रचण्डा । कैसे कदि आये नव खण्डा ॥ कौन प्रसाद पाय तुम भाई । कौन वस्तु बल इहवां आई ॥ पिछली सुरति कछु तुम आनौं । रक्षा हंस आप कह जानौं ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२७ )
धर्मदास तब वचन प्रकाशा । आये इह कबीरकी आशा ॥ नाम संधि उन मोहि हटाई । तिहि प्रसाद सेवा तुम पाई ॥ आरतीकर परवाना पावा । काल फाँस सबहीय नशावा ॥ सुरति निरति भूल गये जब ही । भवसागरमों ठाढे तब ही ॥ साखी-लोक वेद सब भूलिहू, भूला आपनु भाव । बलिहारी सतगुरुनकी, जो ल्याये इहि ठाव ॥
चौपाई
तबहि सुजन जन पूछी बाता । कहिब कहा है हमरे आता ॥ तुमरे दीप माँहि वे ठाढे । हम पूरन उनहीके बाढे ॥ तब सुरजन जन आये तहँवा । आइ कबीर बैठे हैं जहँवा ॥ चरण लगाइ अंकमहँ लीन्हों । भले गुसाईं दर्शन दीन्हों ॥ सिंहासन साहब बैठारी । सुरजन हंस विराजे भारी ॥ आज्ञा साहब दीन्ही जबही । धर्मदास ठाढे भये तब ही ॥ पुरुषहि तबहि वचन उचारा । सुकृत अंश लावो सठिहारा ॥ आरति साजि हंस सब आये । चलिए सुकृत पुरुष बुलाये ॥ तब सुकृत चित आये तहँवा । पुहुपदीप पुरुष रहि जहँवा ॥ पुहुपदीप नहिं बरनो जाई । जगमगज्योति सदा अधिकई ॥ दामिनि दमक होय अति भारी । कोटिन भानु जाय तहाँ वारी ॥ हंस जाय तहाँ करै अनन्दा । कालजाल व्यापै नहिं फन्दा ॥ पंख बेहु नभचर तहाँ फिरही । अगिन बेहुते दीपक जरही ॥ बिन करताल मुदंग जो बाजे । चित्र विचित्र बीन कर छाजे ॥ बीना सुर तहाँ शब्द पुकारा । बीना श्रवण सुनत झनकारा ॥ बिना नालके कमल अन्तूपा । तामध्ये है पुरुष स्वरूपा ॥ करतहि दरश हरष उर आनी । सतगुरुवचन सत्य कर मानी ॥
साखी-अति अनंद उर ऊपजो, बाजत अनहद तूर ।
हीरा लाल मणि जग मगै, अमृत शोभा भरपूर ॥
( १२८ )
बोधसागर
चौपाई
धर्मदास मन भये अनन्दा । जिमिरविदरश फूलि अरविदा॥ शोभा दरश हरष अति भाऊ । उभयसुरखगतिबरणि न जाऊ॥ तब सुरजन जन जाइ जनावा । साहेब धर्मदास यह आवा ॥ इच्छा अधिक करै दर्शनको । पुरुष चरण हियमो परसनको॥ ये दोइ रूप तुमहि उत्पानी । सद्वरु सुकृतै नाम बखानी ॥ तब ही पुरुष बचन फरमाया । सुरजन हंस जबै बुलवाया ॥ लेहु बेगि सुकृत तुम अंशा । पुरुष दरश करीब निःशंसा ॥ दंडवत अष्टांगहि कीन्हौ । धर्मदास आगे पग दीन्हौ ॥ पायर दीप ठाढ़ भै जब ही । अमृतकला देखत भै तब तब ही॥ पर धर्मदास हि सुरझाई । देखि रूप अब मति अधिकाई॥ कोटिन कला सूर्य औ चन्दा । हीरा रतन गिने को गन्दा ॥ जगमगज्योति अधिकतहाँराजे । चितवनदृष्टि डगत गुनराजे ॥ हग संपुट अंबुज सम आही । दरशहरशच्छबिहियहि अघाही॥ आनन्दरूप मूरछा आई । तब सुरजन तन कीन्ह उठाई ॥ सुचित चित्त होऊ धर्मदासा । आभारूप करि शब्द निवासा॥ उठिकर बाह निछावर करही । शीश नवाय चरण रज धरही ॥ दंड प्रणाम कीन्ह बहुभांती । सीप अघाइ पाइ जिमि स्वाती॥ तबहि पुरुष असआसन दीन्हौ । शब्द सहाय हमही तुम चीन्हौ॥ तब सुरजन जन बचन उचारा । सुकृत अंश कीन्ह दीदारा ॥ पुरुष दीन सिंहासन टारी । हंसहरम्मर बैठो झारी ॥ पुरुष तबहि यह वचन उचारा । केहिके अंग आहि दरबारा ॥ धर्मदास कैसे तुम आये । को वहियां जिनधरि पहुँचाये ॥ काहेके बल कालहि जीता । कौन शब्दसे राखब प्रीता ॥ तब सुकृत बिनती अनुसारी । साहब बचन प्रीति उर धारी ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १२५ )
ज्ञानी अंश शब्द मोहि दीन्ह। उनकी बाँह गौन हम कीन्ह। ॥ करता देत छेकि जब बाटा। शब्द बाँह श्रोता कह काटा ॥ कालहि जीति अंशलै आवा। उनकी बाँह दरस हम पावा ॥ सुरजन अंश वचन उच्चार। सुकृतघटमें कवि सम्हारा ॥ देखहुँ लोकहि दृष्टि पसारी। ज्ञानी अंश कहां अनुसारी ॥ कौन दीप कहवाँ अस्थाना। कौन रूप ज्ञानी कर जाना ॥ धर्मदास घट कीन्ह विचारा। पुरुष वचन दृष्टि उजियारा ॥ लोक दीप देखो सब ठावा। ज्ञानी अंश नजर नहिं आवा ॥
साखी—लोक दीप सब देखिया, अंश नजर नहिं आय।
पुरुष कबीर घट एकहै, दूजा नहीं लखाय ॥
चौपाई
धर्मदास दुबिधा बिलगाना। पुरुष कबीर एक पहिचाना ॥ रूप रेख सब एकहि देखा। दूजा भाव अन्य नहिं लेखा ॥ धर्मदास तब चकृत भयऊ। पुरुष कबीर एकही भयऊ ॥ कीन्ह बन्दगी शीस नवाई। क्षमा अपराध कीजिये साई ॥ तुम प्रभु आप अवसर नहिं कोई। बकसडु चूकि मोर कछु होई ॥ ब्रह्म अखंडित अन्तर्यामी। कृपासिंधु प्रभु पूरण स्वामी ॥ लज्जावान अविगति अविनाशी। लोक दीप सब कीन्ह प्रकाशी ॥
पुरुष वचन
धर्मदास तोहि दाय। कीन्हौ। अवगति रूपदरश हम दीन्हौ। ॥ ये दोह कला भिन्न नहिं जानो। पुरुष कबीर एक पहिचानो ॥ एक रूप हम हंस उबारा। एक रूप त्रैलोक मझारा ॥ तुम्हरे शिर जीवनको भार। भवसागरके तुम कटियारा ॥ यासे परखो दीन्ह बताई। यह रमती घट देवरि गाई ॥ जो तुमरे घटते नाहिं जाती। तो सब जीवन माँह समाती ॥
नं. ८ कबीरसागर - ५
( १३० )
नोधसागर
यह हुरमत मनमहँ जो धरही । फिर २ भवसागरमें परही ॥ पुरुष कबीर एक जिन जाना । हंस हमारा सोइ पहिचाना ॥ के काल निकट नहि आई । नाम कबीर कहो चितलाई ॥
साखी—अब तुम जाइब जगतमें, हंसन करो उबार । हंसराज तुम अंश मम, भुगवो सुखहि अपार ॥ प्रलयकालके अंतमें, जीव जन्तु सब तार । दरस परस सब मिलि करे, अस्थिर रूप अपार ॥
चौपाई
पुरुष रूपसे ज्योति निकारा । नाम कबीर देह तब धारा ॥ धर्मदास ढिग बैठे आई । जौन रूप धरि गये लेवाई ॥ चीन्हो सुकृत रूप हमारा । अब तुम घटमें भव उजियारा ॥ चलहु बेगि जिन लावहु बारा । जीवनाथ देव टकसारा ॥ चले सुकृत तबही शिरनाई । ज्ञानी लीन्ह संग लगाई ॥ निमिष एक नहि लागी बारा । पहुँचे सहज शून्य मझधारा ॥ धर्मदासकी काया जहँवाँ । पहुँचे ज्ञानी आये तहँवाँ ॥ चारी दूत देह ढिग आवा । पैठन केर उपाय लगावा ॥ घटमें पड़ि देह ले जाऊ । धर्मदास फिर कहँवाँ आऊ ॥ साहब शब्द बानसे मारा । दूतहि मारि हंस पैठारा ॥ धर्मदास कहा महँ जागा । रोम २ आनंद बहु पागा ॥ गुरु कबीर कह निज कर चीन्हों । तन मन धन न्योछावर कीन्हों ॥ बहुत अनन्द कीन्ह गृह माँहीं । चरण शरण मन लीन्ह सदाँहीं ॥
साखी—यह गुण ज्ञान स्थितहिके, कहै कबीर विचार । धर्मदास दीदार करि, आए जगत मँझार ॥
चौपाई
धर्मदास हियमें अति हवैं । गढ़द गिरा नैन जल ववैं ॥
ज्ञानस्थिति बोध
( १३१ )
मम हियतिमिर आहि अधियारा । महर पतंग कीन्ही उजियारा ॥ मन अहि तपत कबहुँ नहि धीर । वचन अंग शीतलमलयागीर ॥ तेहिपर सत त्रिय ताप बुझानी । अमी असन त्रियत्रिपतअघानी ॥ पायउ दरश कृतारथ आजू । दरसन देखेव हंस समाजू ॥ अब गुरु मोकहैं देव लखाई । पुहुप दीप कैसे निरमाई ॥ अंबुदीप कौन विधि भयऊ । धर्मराज कैसे निर्मयऊ ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास पूछी भलवानी । सो सब कथा कही बिलछानी ॥ पुरुष विदेही देह निमासा । श्वासा सारते पुहुप प्रकाशा ॥ सत्रह शंख पंखुरी कीन्हौ । ताहि मध्य वासा प्रभु लीन्हौ ॥ अंबुदीप तबही जो कीन्हौ । सहज पुत्र कह बैठक दीन्हौ ॥ सवा शंख पंखुरी राजै । जग मग शोभा तहां विराजै ॥ आठ पुत्र तहँसे उत्पानी । तिनसों आठों सिद्धि बखानी ॥ जोति सरूपी पाया आई । ज्योति रूपके काल बनाई ॥ उत्पत करै प्रलय संहारा । तउना उपजै काल अहारा ॥ सहज धर्मसों गुण परकासा । ज्योति सरूपी ज्योति निवासा ॥ धर्मरायको बल परकाशा । माया जाल जीव सब फाँसा ॥ आपुन रहियब सुनी मझारा । वहाँ बैठि सब कीन्ह पसारा ॥ पुहुप दीप आवन नहि पावा । जानै साहब नाहि रहावा ॥ धर्मराय माया उपजाई । ज्योति स्वरूप जीव अरुझाई ॥
साखी-पुरुष पार नाहीं लहेउ, अटके ज्योतिहि मूर्ति । ज्योति भई है प्रकृतितें, प्रकृति बनी है मूर्ति ॥
चौपाई
इह कारण वह दीप सम्हारा । धर्मनि पाव वही बैठारा ॥ पुहुप दीप जब सिरजन लीन्हौ । समसर पवन वास तहैं कीन्हौ ॥
( १३२ )
बोधसागर
ज्योति ओट यह बोलत बानी । सबको जानै पुरुष निसानी ॥ काल दुष्ट जीवन छलि राखा । ज्योतिहिओट वचनमुख भाखा॥ उत्पति प्रलय याहिसों भयऊ । भूल भुलाय सबनको दयऊ ॥ पुहुप दीपको सुमिरन करई । ज्योति स्वरूप नहिं सो परई॥
साखी--इह गुन ज्ञानस्थितिके, पुहुपदीप अनुसार ।
एहि दीप बासा करै, आवा गवन निवार ॥
चौपाई
पुहुप दीपमें समसर कीन्हौ । समसर पवन खास तहाँ लीन्हौ॥ अमर वासना येही आहे । इहँहि बैठि सब करी कथा है ॥ थाह न जानत मूढ़ गवँरा । लुब्ध रहेव जयमाल पसारा ॥ पुहुपदीपको सब दीप निवासा । जहाँ वह पारब्रह्मकर बासा ॥ येहि शब्द तुम लेव बिचारी । पुहुप दीप कीन्हौ बहु बारी ॥ पुहुपदीप दीपनमें सारा । जो बूझे सो उत्तरहि पारा ॥
साखी--येहि सुरति ले राखहु, पुहुप दीपके पास ।
सत्य पुरुष जहाँ आप है, अमृत सिंधु निवास ॥
चौपाई
तहँको हंस करहि पैठारा । जब मिलि है सद्वरु कइहारा॥ हंस जाय पुरुषहिं दरबारा । अविचलनामकोमरहि सद्धार॥ सत्य कमलपर बैठक दीन्हा । बैठे हंस अतिहिं सुख लीन्हा ॥ सुधा अहार अमर भै काया । आदि नाम अविचल मन भाया॥ कोटिन कोटि दंडवत लीन्हा । धनि सत्य सुकृतनामजो दीन्हा॥ पुरुष शब्दजिनि आपु बतावा । आवा गौन रहित घर पावा ॥
साखी--येहि गुण ज्ञान स्थितिके, पुहुप दीप निजु बास ।
कहे कबीर वह शब्द गुन, हंसा करहि विलास ॥
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास तब सेवा ठानी । सुरति भेद पूछनको आनी ॥
ज्ञानसिग्धनिबोध
( १३३ )
सो सद्गुरु मोहि कहो बखानी । जासो आदि अन्त पहिचानी ॥ जौन सुरति साहब तुम साथी । सो मोहि कहिये मिटत उपाधी ॥ जेहि सुरति प्रथम जो आहे । वही सुरति मिलि सबको थाहे ॥ बिना सुरति नहिं गुरुको पाही । बिना सुरति नहिं लोके जाई ॥ सुरति होइ तब ज्ञान उचारे । सुरति होय तब ध्यान सम्हारै ॥ सुरतिहि पैठि पवन को गहे । बिना सुरति वह प्राणी डहे ॥ सुरति होइ तब अगम जानी । भला बुरा सबही पहिचानी ॥ बहिनभानजी सुरतिहिजानी । माता पुत्री सुरति बखानी ॥ मोह न नारि सुरति कहैं देखौ । धर्म पाप सब सुरति बिसेखौ ॥
साखी--जो कुछ है सो सुगति है, साहब दे बतलाय ।
सुरति भाव जब चीन्ह है, तब हंसा घर जाय ॥
सद्गुरु वचन
तब सद्गुरु अस वचन उचारा । धर्मदास पूछव मत साग ॥ बिना सुरति पुनि कुछ अनपाई। सुरति विहूँ नहिं आवहि जाई ॥ सो अब तुमसों कहां बुझाई । सात सुरति सब देव लखाई ॥ पुरुष सुरति आपहि उपराजा । विहँगसुरतिप्रथमहि किय साजा ॥ बीस आठ प्रकृति जो कीन्हौ । जो जनमें तस भुगने लीन्हा ॥ जैसे योग मनहिं रहाई । तैसे बुद्धि शरीरहि सोई ॥ प्रथम कहौ अब सुरति विचारी । पुरुष एक उत्पन किय नारी ॥ जेठी सुरति तबहि उच्चारी । चारहु लोक कीन्ह बिस्तारी ॥ विहँग सुरति ताही सो कहिए । ब्रह्म सुरति मूल वह लहिए ॥ निरति सुरति ये स्थूलहिछाजा । हरषत सुरति विदेही साजा ॥ बाढी सुरति नाद गुन गहे । धीर सुरति नाद गुण गहे ॥
साखी--सुरति पुरुष अंगहि बसी, फूट अंडके भाव ।
बीजमूल गुण प्रकट है, देखै ते सच पाव ॥
( १३४ )
बोधसागर
चौपाई
सुरति शब्द अब कहौं बखानी । धर्मदास लीजो पहिचानी ॥ सुरति शब्द भाखिब हम तुमसे। सुरति प्रसन्न होय तब हमसे ॥ सुरतिहि माहि रच्यो संसारा । सुरति करै तब उत्तरे पारा ॥ जेठौं अंश सुरति जो आही । पुरुष संग वह सदा रहाही ॥ बिहंग सुरति पुरुष जब कीन्हौं। रचना सपत सोप तब दीन्हौं ॥ अबही कहौं सुरती कर मूला । उपज्यो अग्र शब्दसो स्थूला ॥ जबही पुरुष कीन्ह है इच्छा । तब इह प्रकट भई सब शिक्षा ॥ सुरति शब्द पुरुषहि उपजाई । सुरति प्रसन्न लोभ रच आई ॥ सुरति निरति सुख देह अनन्दा। मेटत सुरति सकल दुख द्रंदा ॥ सुरति निरति जब एके होई । तब साहेब कह देखे सोई ॥
साखी—कहै कबीर वह सुरतिते, सब कछु भयो प्रकाश ।
शब्दहि सुरति बिहंग है, लीन्ह अग्रमो बास ॥
चौपाई
धर्मदास सुनियो चितलाई । घट भीतर लीजो निरताई ॥ सुरति रूप देखो निरधारा । मन बुद्धि चित्त पवनसे न्यारा ॥ पाँच तत्त्वकी रचना येही । इनते सुरति जो आहि विदेही ॥ ब्रह्म अंगसे प्रकटी आई । तोनि अंग गुण कला धराई ॥ सत्यरूपसे सुरति बखानौ । चेतन अंग निरति कहैं जानौ ॥ आनंद सदन शब्द पहिचाना । सत्य सुकृत दोइ नाम बखाना ॥ सुरति रूप चैतन्य समाई । चेतन रहित शब्द लौ लाई ॥ सुरति समुद्रहि मठी हुवारा । हंसा पैठि देखि निर्धारा ॥
साखी—कहै कबीरहि सुरति बल, अपने पुरुषहि देख ।
मन बुद्धि चित्त समेटि के, चेतनरूप विशेष ॥
अक्षय वृक्षकी सुरतिमें, हंसा लेहि बसेर ।
कहै कबीर लै निबहि है, जात न लागे बेर ॥