कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १० )
अनुरागसागर
विषयाः
पृष्ठांकाः
श्रेतायुगमे भू ेद (कबीरसाहब) के | ---|--- पृथ्वीपर आनेको कथा | ७३ कबीरसाहबका जीवोंको उपदेश | करना | ७४ विचित्र भाटकी कथा लंकामें | ७४ मन्दोदरीका वृत्तांत | ७४ विचित्र वधूका वृत्तांत | ७४ मनीन्द्रिका रावणके पास जाना | मधुकरकी कथा | ७७ द्रापरयुगमे कृष्णामय (कबीरसाहब) | के पृथ्वीपर आनेको कथा | ७९ ज्ञानी और निरंजनका वार्तालाप | ८० रानी इन्द्रमतीकी कथा | ८१ मुपच मुदर्शनकी कथा | ९५ कलियुगमे कबीरसाहबके पृथ्वीपर | आनेका वृत्तांत | ९६ धर्मरायका वाट रोकना और कबीर | साहबका उसे परास्त कर आगे | बढ़ना | १०० निरंजनका कबीर साहबसे नामभेद | पूछना | १०१ कालका कबीरसाहबका भेद न पानेके | कारण अपना पन्थ चलानेको | बात कहना | १०१ जगन्नाथपुरीकी स्थापना वृत्तांत | १०१ जगन्नाथकी स्थापना का वृत्तांत | १०४ राय बंकेजी १ | १०४ सहतेजी २ | १०४ जमुर्ज ३ | १०५ धर्मदास ४ | १०५ धर्मदासके पिछले जन्मकी कथा | १०६
विषयाः
पृष्ठांकाः
कुलपति और महेश्वरी ब्राह्मणकी | ---|--- कथा | १०६ चन्दन साहूकी कथा | १०७ नीमा नीरुका वृत्तांत | १०८ रतनाकी कथा | १०९ मुकुत अंशको पृथ्वीपर भेजनका वृत्तांत | ११० धर्मराज (मुकुत अंश) का कालफन्दमें | पड़ना | ११० मुकुत अंश (धर्मदास) को चितानेके | लिये कबीरसाहबका पृथ्वीपर | आना | १११ कबीरसाहबका चौका करके धर्मदास- | जीको परवाना देना आरती | विधि | ११३ चौकाका साज | ११३ कबीरसाहबका धर्मराज की उपदेश | देना | ११४ नारायणदासजीका कबीरसाहबकी | अवज्ञा करना | ११५ धर्मदासजीको नारायणदासजीके अव- | ज्ञाका कारण कबीरसाहबसे | पूछना और कबीरसाहबका गुप्त | कथा कहना | ११५ द्राक्ष पन्थका वर्णन | १२० मृत्यु अन्ध्या वृत्तका पन्थ १ | १२० तिमिरवृत्तका पन्थ २ | १२० अन्ध अवैत वृत्तका पन्थ ३ | १२० अनमङ्ग वृत्तका पन्थ ४ | १२१ ज्ञानमङ्ग वृत्तका पन्थ ५ | १२१
विषयानुक्रमणिका
( ११ )
| विषयाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|
| मननकरन्द द्रुतका पन्थ ६ | १२१ |
| चित्तभङ्ग द्रुतका पन्थ ७ | १२१ |
| अकिलभङ्ग द्रुतका पंथ ८ | १२२ |
| विषवम्भर द्रुतका पंथ १० | १२२ |
| नकटानन द्रुतका पंथ १० | १२२ |
| द्रुगदानी द्रुतका पंथ ११ | १२२ |
| हंसमुनि द्रुतका पंथ १२ | १२२ |
| धर्मदास साहबको आत्म अंशका | |
| दर्शन होना | १२४ |
| चूराभणिको उत्पत्तिको कथा | १२५ |
| व्यातिश वंशके राज्यको स्थापना | १२६ |
| चूराभणिको कबीरसाहबका उपदेश | |
| देना | १२७ |
| वंश का माहात्म्य | १२८ |
| भविष्य कथा प्रारम्भ | १२९ |
| निरंजनका अपने चार अंशको पंथ | |
| बलानेको आज्ञा देना | १३० |
| चार द्रुतों का नाम वर्णन | १३२ |
| १ रम्भ द्रुतका वर्णन | १३२ |
| २ कुरम्भद्रुतका वर्णन | १३३ |
| ३ जय द्रुतका वर्णन | १३५ |
| ४ विजय द्रुतका वर्णन | १३७ |
| द्रुतोंसे बचनेका उपाय | १३८ |
| भविष्यकथन आगल व्यवहार (नाद | |
| और बिन्दवंशका और बड़ाई | |
| वंशके धोखा शाखा दशहजारी | |
| इत्यादिका पूरा-पूरा वृत्तांत इस | |
| आगल व्यवहारमें वर्णित है) | |
| नादवंशकी बड़ाई | १४० |
| विषयाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|
| गुरु महिमा | १४१ |
| धर्मदासजीका पुनः नारायणदासजी | |
| के उद्धारके लिये विनतो करना | |
| और कबीर साहबको उनका | |
| समाधान करनेपर उन्हें त्याग | |
| देना और कबीर साहबका शाप | |
| गुरु शिष्यके व्यवहार वर्णन | १४१ |
| नारायणदासजीके वंशोंके तरनेका | |
| उपाय | १४२ |
| विरवास (श्रद्धा) का माहात्म्य | १४६ |
| गुरु महिमा | १४६ |
| विरवासकी दृष्टाके लिये दृष्टांत कथन | १४७ |
| अविरवाससे हानि | १४७ |
| गुरु शिष्यको रहनी | १४७ |
| गुरुभक्तिका फल | १४९ |
| अधिकारी जीवका लक्षण | १५० |
| कायाकाल विचार | १५० |
| वृद्ध्यक्रनिरूपण | १५१ |
| मनका व्यवहारवर्णन | १५२ |
| मनके फरसे बचनेका उपाय | १५२ |
| निरंजन चरित्र | १५४ |
| मुक्तिमार्ग (पंथसहिबानी) वर्णन | १५५ |
| पंथकी रहनी | १५६ |
| बैरागी विरक्त लक्षण | १५६ |
| गृही लक्षण | १५७ |
| आरती माहात्म्य | १५८ |
| अधिकारी प्रति आरतीका वर्णन | १५९ |
| बैरागी और गृही दोनों रहनीसे तरत्ते हैं | १५९ |
| असावधानीका फल | १५९ |
( १२ )
अनुरागसागरकी विषयानुक्रमणिका स०
| विषयाः | पृष्ठांकाः | विषयाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|
| सावधानीका फल | १५९ | परम परमार्थी गुरुका दृष्टांत | १६२ |
| कोपलका दृष्टांत | १५९ | परमार्थी संत लक्षण | १६२ |
| हंस लक्षण, ज्ञानीका लक्षण | १६१ | ग्रन्थकी समाप्ति | १६३ |
| परमार्थका वर्णन | १६२ | ग्रन्थका सार निबोड | १६३ |
इति अनुरागसागर की विषयानुक्रमणिका समाप्त
सदगुरु स्तुति
सद्गुरुस्तुतिः
श्लोकाः
सत्यं ज्ञानस्वरूपं विमलमधिगतं ब्रह्म साक्षान्नुरूपं शीर्षन्यस्ताच्छरत्नद्युतिसितमुकुटं भेतवासोऽभिरामम् । भास्वन्मुक्तावलीभिः कृतरुचिहृदयं दिव्यसिंहासनस्थं भक्तानां पारिजातं विकसितबदनं सद्गुरुं नौम्यहं तम् ॥१॥
सत्य और ज्ञानके स्वरूप, विमल साक्षादब्रह्मको प्राप्त मनुजस्वरूप, मस्तकमें धारण किया हुआ, स्वच्छ होरा आदि रत्नोंकी कांतिसे धवलित मुकुटसे युक्त, स्वेत वस्त्रोंसे अलंकृत, देवीप्यमान मोतियों की मात्राओंसे शोभित हृदय, दिव्य सिंहासन पर विराजमान, भक्त लोगोंके लिये कल्पवृक्ष प्रफुल्लित मुखारविंद है जिसका उस सद्गुरुको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १ ॥
यदंद्ध्यनुध्यानविभूतमोहाःसन्तो महत्त्वं शमवाप्य यन्ति । ब्रह्माऽद्वयं निर्गुणमाश्रुहं तं सत्यनामानमहं नतोऽस्मि ॥२॥
जितके चरमके ध्यान करनेसे संत लोग मोह पाशसे छूटकर महत्त्व और कल्याण को प्राप्त होते हैं, उस अर्द्ध ब्रह्मस्वरूप सत्य नामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥
यस्यामलेन यशसा विशदीकृतेऽस्मिंद्भोके जनोऽज्ञतमसं तरसा विभूय । सन्तं पुमांसमधिगत्य शमेति तस्मिन् श्रीसत्यनामनि परे जगतो रतिः स्यात् ॥ ३ ॥
सदगुरु स्तुति पंचरत्नोक्त
( २ )
जिसके स्वच्छ यज्ञसे परिमाजित इस संतारमें मनुष्य शीघ्रही अज्ञानांधकारको नाश कर, सत्पुरुषको प्राप्त होकर कल्याण पदपर पहुँचता है उस श्रेष्ठ भीसत्यनाममें जगतको प्रीति होवे ॥ ३ ॥
अनुधयया यस्य सदासिनाऽऽशां छित्वा स्वर्गेहादिषु योगिवन्ध्याः । विन्दंत्यथाऽऽनन्दममंदमेते स सत्यनामा विदधातु भूतिम् ॥ ४ ॥
लोग जिसके ध्यान रूपी ब्रह्मसे स्वगुहादिकोंमें जो आशा है उसे छेदन कर योगियोंसे बन्द- नीय होते हैं और विशेष आनन्द को पाते हैं वह सत्य नाम ऐश्वर्यको बढावे ॥ ४ ॥
अकलितमहिमानं पूर्णकामं कृपालुं धृतमनुजशरीरं भक्तसन्तारणाय सुरमुनिगणबंधं दिव्यदेहाभिरामं हृदयतिमिरभानुं सत्कवीरंस्मरामः
अगणितमहिमान, पूर्णकाम, व्यापुस्त, भक्त लोगोंके उद्धार करनेके लिये मनुष्य शरीर धारण करनेवाले, देवता और मुनिगणोंसे बंदनीय, दिव्य देह करके मनोहर हृदयांधकारके नाश करनेके लिये सूर्यके समान ऐसे सत् कबीरको हम लोग स्मरण करते हैं ॥ ५ ॥
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वविघ्नविनाशनम् ।
अधमोद्धारणं देवं सदगुरुं प्रणमाम्यहम् ॥ १ ॥
यं सबश्वरदं व हि स्तुवंति सततं सुराः ।
ध्यायन्ति मुनयश्चापि तं गुरुं प्रणमाम्यहम् ॥ २ ॥
शशजन्मजरामयाधनिधनैर्दुःखैः सदा पीडितान्,
दृष्ट्वा पाणभूतः कुशेशयदले स्वेरं च धृत्वा वपुः ।
शास्त्राण्य प्रविगाह्य बीजकसुधाज्ञानं च तैभ्यो ददौ
तं वन्दे शिरसा प्रणम्य चरणौ वीरं कवीरं गुरुम् ॥ ३ ॥
नित्यानन्दस्वरूपो यो मायाऽऽतीतो महोदयः ।
सच्छास्त्रविषयः साक्षात्कवीरं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ ४ ॥
नमः श्रीधर्मदासाद्यमहामुन्यन्तसत्तमान् ।
द्विचत्वारिंशदाचार्यान् भूतभ्यमविष्यतः ॥ ५ ॥
ग्रन्भारम्भ मङ्गलाचरण
अनुरागसागर प्रारंभ
सत्यसुकृत, आदिअदली, अजर; अचिन्त पुरुष, सुनीन्द्र, करुणामयकवीर सुरतियोगसन्तायन, धनीधर्मदास, च्रामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम प्रमोध, गुरबालापीर, केवल नाम, अमोलनाम, सुरति, सनेही नाम, हक्कनाम, पाकनाम; प्रगट नाम, धीरजनाम, उग्रनाम, साहबकी दया, वंश्यालीसकी दया ।
★
मंगलाचरण । छन्द हरिगीतिका
प्रथमवन्दौसतिगुरुचरणजिन,अगमगम्यलखाइया ॥ गुरुज्ञान दीपप्रकाशकरि पट,खोलिदरशदिखाइया ॥ जिहि कारणे सिद्धचापचेसो, गुरु कृपाते पाइया ॥ अकह मूरति अमिय सूरति, ताहि जाय समाइया ॥
गुरुदेव पूर्ण है
सोरठा-कृपासिंधु गुरुदेव, दीनदयालु कृपालु है ॥ विरलेपावहि भेव, जिन चीन्हा परगट तहाँ ॥
अधिकारी कौन है ? छन्द
कोई बूझई जन जौहरी जो, शब्दकी पारख करै ॥ चितलाय सुनहि सिखावनो, हितजाके हिरदय धरै ॥
बिना अनुराग वस्तुको पा नहीं सकते
( ४ )
अनुरागसागर
तम मोह मोसम ज्ञान रवि, जब प्रगट हो तब सूझई॥ कहत हूं अनुरागसागर, संत कोइ कोइ बूझई ॥ २ ॥
बिना अनुराग वस्तुको पा नहीं सकते
सोरठा-कोइ इकसन्त सुजान, जो मम शब्द बिचारई॥ पावै पद निर्बान, बसत जासु अनुराग उरा॥ २ ॥
धर्मदास वचन-अनुरागीके लक्षण विषय प्रश्न
है सतगुरु विनवौं कर जोरी । यह संशय मेटो प्रभु मेरी ॥ जाके चित अनुराग समाना । ताकर कहो कवन सहिदाना॥ अनुरागी कैसे लखि परई । बिन अनुराग जीव नहिं तरई॥ सो अनुराग प्रभु मोहिं बताऊ । देई दृष्टान्त भले समझाऊ ॥
सतगुरुवचन-अनुरागीके दृष्टान्त
धर्मदास परखहु चितलाई । अनुरागी लच्छ कहुं समुझाई॥ मृगाका दृष्टान्त
जैसे मृगा नाद सुनि धावै । मगन होय व्याधा ढिग आवै ॥ चित कछु संक न आवै ताही । देत सीस सो नाहि डराही ॥ सुनि सुनि नाद सीस तिन दीन्हा । ऐसे अनुरागी कहैं चीन्हा ॥
पतंगका दृष्टान्त
औ पतंगको जैसो भाऊ । ऐसे अनुरागी उर आऊ ॥ सतीका दृष्टान्त
और लच्छ सुनियो धर्मदासा । सतगुरु शब्द करो प्रकाशा ॥ जरत नारि ज्यों भूतपति संग। तनिको जरत न मोरत अंगा ॥ तजै सुगृह धन धाम सुहेली । पिय विरहिन उठि चले अकेली ॥ सुत लै लोगन आगे कीन्हा । बहुत मोह ता कहैं पुनि कीन्हा ॥ बालक दुर्बल तोहि विनु मरिहै । घर भो सुत्र काहि विधिकरि है ॥ बहु संपति तुमरे घर अहाँ । पलट चलहु गृह अस बस कहई ॥ ताके चित कछु व्यापे नाहीं । पिय अनुराग वसे हिय माहीं ॥
तत्त्वानुरागिके लक्षण
अनुरागसागर
( ६ )
छन्द
तेहि बहुत कहिसमुझावहीं, नहिं नारिसमुझतसोधनी॥ नहिं काम है धन धाम सों, कछु मोहितो ऐसीवनी॥ जग जीवना दिन चारि है, कोइ नाहिं साथी अंतको॥ यह समुझि देख्यो ऐ सखी, ताते गह्यो पदकंतको॥३॥ सोरठा-लिये कियाकरमाह, जाय सरा ऊपर चढ़ी॥ गोद लियो निज नाह, रामनाम कहते जरी॥३॥
तत्त्वानुरागी के लक्षण
धर्म । येह अनुरागी बानी । तुम तत देख कहुं बिलछानी ऐसे जो नामहिं लौं लावे । कुलपरिवार सबहिं विसरावे॥ नारी सुतको मोह न आने । जीवनजनम सपन केरि जाने॥ जगमें जीवन थोरो भाई । अन्त समय सो नाहिं सहाई ॥ बहुत पियारि नारि जगमाहीं । मातु पितहु जाहि सर नाहीं॥ तेहि कारण नर सीस जु देही । अन्त समय सो नाहिं सनेही॥ निज स्वारथ कई रोदन करई । तुरतहि नैहरको चित धरई ॥ सुत परिजनधन सपनसनेही । सत्यनाम गहु निजमति एही॥ निजतनुसमप्रिय और न आना । सो तन संग न चलत निदाना॥
कालसे कौन छुड़ा सकता है ?
ऐसा कोइ न दीखे भाई । अन्त समयमें लेइ छुड़ाई ॥ अहै एक सो कहौं बखानी । जेहि अनुराग होय सों मानी॥ सत गुरु आहि छुड़ावन हारा । निश्चय मानो कहा हमारा ॥
सदगुरु क्या करता है ?
कालहिं जीत हंस ले जाहीं । अविचलदेश पुरुष जहाँ आहीं॥ जहाँ जाय सुख होय अपारा । बहुरि न आवै यहि संसारा ॥
नं. २ कबीरसागर २
अविचल देशको कौन पहुँच सकता है
( ६ )
अनुरागसागर
अविचल देशको कौन पहुँच सकता है ? छन्द
बिसवास कर मनवचनको, तब चढे सतकी राहहो॥ ज्यों सूरमा रनमें धसे, फिर पाछ चितवन नाहहो॥ सती श्रूरा भाव लाखके, संत सो मग धारिये ॥ मृतके भाव विचारगुरुगम, काल कष्ट निवारिये ॥
अधिकारीकी दुर्लभता
सोरठा-कोइक, शूर जीव, जो ऐसी करनी करें ॥ ताहि मिलगो पीव, कहै, कबीर विचारिके ॥४॥
धर्मदास-वचन मृतक किये कहते हैं
मृतक भाव प्रभु कहो बुझाई । जाते मनकी तपनि नसाई ॥ केहि विधिमरत कहो यह जीवन । कहो विलोय नाथ अमृतघन ॥
कवोरवचन-मृतकके दृष्टांत
धर्मदास यह कठिन कहानी । गुरुगम ते कोइ विरले जानी ॥
भृङ्गीका दृष्टांत
मृतक होयके खोजहिं सन्ता । शब्दविचारि गहैं मगु अन्ता ॥ जैसे भृङ्ग कीटके पास । कीटहिं गहि पुरुगम परगासा ॥ शब्द घातकर महितिहि डारे । भृङ्गी शब्द कीट जो धारे ॥ तब लैगौ भृङ्गी निज गेहा । स्वाती देह कीन्हो समदेहा ॥ भृङ्गी शब्द कीट जो माना । वरण फेर आपन करजाना ॥ बिरलाकीट जो होय सुखदाई । प्रथम अवाज गहे चितलाई ॥ कोइ दूजे कोइ तीजे मानै । तनमनरहित शब्दहित जानै ॥ भृङ्गी शब्द कीट ना गहई । तौ पुनि कीट आसरे रहई ॥ धर्मदास यह कीट को भेवा । यहि मति शिष्य गहे गुरुदेवा ॥
सुंघीमात्रकी प्राप्ति कैसे होती है
अनुरागसागर
( ७ )
भृङ्गीभावकी प्राप्ति कैसे होती है छन्द
भृङ्गि मति दिदृक गहे तो, करो निजसमओहि हो ॥ दुतियाभाव न चित व्यापे, सो लहे जिव मोहिहो ॥ गुरु शब्द निश्चय सत्यमाने, भृङ्गि मत तव पावई॥ तजि सकल आसा शब्द वासा, काग हंस कहावई॥
हंस कौन है ?
सोरठा-तज कागेकी चाल, सत्य शब्द गहि हंसहो॥ मुकता चुगे रसाल, पुरुष पच्छ गुरु मग गवन ॥५॥
मृतकके और दृष्टांत
सुनहु संत यह मृतक सुभाऊ । विरला जीवपीव मग धाऊ॥ औरै सुनहु मृतकका भेवा । मृतक होय सतगुरु पद सेवा॥ मृतक छोह निभाव उरधारै । छोह निभावहि जीव उबारै ॥
पृथ्वी का दृष्टांत
जस पृथ्वीके गंजन होई । चित अनुमान गहे गुणसोई॥ कोई चन्दन कोई विष्टा डारे । कोई कोई किरणी अनुसारै ॥ गुण औगुण तिन समकर जाना । महाविरोध अधिक सुखमाना॥
ऊखका दृष्टांत
औरो मृतक भाव सुनि लेहू । निरखिपरखिगुरुमगुपगु देहू ॥ जैसे ऊख किसान बनावे । रती रती कर देह कटावे ॥ कोल्हू मई पुनि आप पिरावे । पुनि कड़ाहमें आप उँटावे ॥ जिन तनु दाहे गुडू तब होई । बहुरि ताव दे खाँड विलोई॥ ताहू माहि ताव पुनि दीन्हा । चीनी तबै कहावन लीन्हा ॥ चीनी होय बहुरि तन जारा । ताते मिसरी है अनुसार ॥ मिसरीते जब कंद कहावा । कहे कवीर सबके मन भावा॥ यही विधिते जो शिष सहई । गुरु कृपा सहजे भव तरई ॥
मृतकभाव कौन धारण कर सकता है
( ८ )
अनुरागसागर
मृतकभाव कौन धारण कर सकता है ? छन्द
मिरतक भाव है कठिन धर्मनि, लहे विरलश्रृंखल हो ॥ कादर सुनतेहि तनमन दहै, पाछे न चितवतकूरहो ॥ ऐसे शिष्य आप सम्हारै, नाव सही गुरुज्ञानको ॥ लहै भेदी भेद निश्चय, जाय दीप अमानको ॥ ६ ॥
मृतक ही साधु होता है
सोरठा-मृतक हो सो साधु, सो सतगुरुको पावई ॥ मेटे सकल उपाध, तासु देव आसा करै ॥ ६ ॥
साधु किये कहते हैं
साधुमार्ग कठिन धर्मदासा । रहनी रहे सो साधु सुबासा ॥ पाँचों इन्द्री सम करि राखै । नाम अमीरसनिशिदिन चारखै ॥
चक्षुर्वशाकरण
प्रथमहिं चक्षु इन्द्री कहैं साधे । गुरु गम पंथ नाम अवराधे ॥ सुन्दर रूप चक्षुकी पूजा । रूप कुरुप न भावे दूजा ॥ रूप कुरुपहिं सम करजाने । दरस विदेह सदा सुख माने ॥
श्रवणवशीकरण
इन्द्री श्रवण वचन शुभ चाहे । उत्कट वचन सुनत चित दाहे ॥ बोल कुबोल दोउ सह लेखै । हृदय शुद्ध गुरुज्ञान विशेषै ॥
नासिकावशीकरण
नासिका इन्द्री बास अधीना । यहि सम राखै संत प्रवीना ॥
जिहावशीकरण
जिभ्या इन्द्री चाहे स्वादा । खट्टा मीठा मधुर सवादा ॥ सहज भावमें जो कछु आवै । रूखा फीका नहिं विलगावै ॥ जो कोई पंचामृत ले आवै । ताहि देख नहिं हरष चढ़ावै ॥ तजे न रूखा साग अलूना । अधिक प्रेमसौ पावैं दूना ॥
शिश्नवशीकरण
अनुरागसागर
( १ )
शिवनवशीकरण
इन्दी दुष्ट महा अपराधी । कुटिलकाम होई विरलेसाधी ॥ कामिनि रूप कालकी खानी । तजहु तासु सँग हो गुरुज्ञानी ॥
कामवशीकरण
जबही काम उमंग तन आवै । ताहि समय जो आप जुगावै ॥ शब्द विदेह सुरत लै राखै । गहिन मन मौन नामरसचाखै ॥ जब निहतत्त्वमें जाय समाई । तबहीं काम रहै सुरझाई ॥
कामदेव लुटेरा है । छन्द
काम परबल अति भयंकर, महा दारुण काल हो ॥ सुरदेव मुनिगणयक्षगंधर्व, सबहि कीन्ह विलास हो ॥ सबहि लूटे विरल छूटे, ज्ञान गुण निज हट गहे ॥ गुरुज्ञान दीप समीप सतगुरु, भेदमारग तिन लहे ॥ ७ ॥
कामलुटेरेसे वचने का उपाय
सोरठा-दीपक ज्ञान प्रकाश, भवन उजैरा करि रहौ ॥ सतगुरुशब्द विलास, भाज चोर अँजोरा जब ॥ ७ ॥
अनलपक्षिका दृष्टान्त
गुरु कृपासों साधु कहावै । अनलपच्छ है लोक सिधावै ॥ धर्मदास यह परखो बानी । अनलपच्छ गम कहाँ बखानी ॥ अनलपच्छ जो रहै अकाशा । निशि दिन रहै पवनकी आशा ॥ दृष्टिभाव तिनरति विधिठानी । यह विधिगरभ रहेतिहिजानी ॥ अंडप्रकाश कीन्ह पुनि तहवां । निराधार आलंबहि जहवां ॥ मारग माहिं पुष्टु भो अंडा । मारग माहिं त्रिरह नौखण्डा ॥ मारग माहिं चक्षु तिन पावा । मारग माहिं पंख पर भावा ॥ महिद्विग आवा सुधि भइताहीं । इहां मोर आश्रम नहिं आहीं ॥ सुरति सम्हार चले पुनि तहवां । मात पिताको आश्रम जहवां ॥
साधु अनलपक्षी समान कब होता है
( १० )
अनुरागसागर
अनलपच्छ तेहिलेन न आवैं । उलटचीन्हनिजघरहि सिधावैं । बहु पंछी जग माहिं रहावैं । अनलपच्छ सम नाहिं कहावैं । अनलपच्छजसपच्छिन माहीं । अस विरलेजिव नाम समाहीं । यहि विधि जो जिव चेतैभाई । मेटि काल सतलोक सिधाई ॥
साधु अनलपक्षी समान कब होता है ? छन्द
निरालंब अलंब सतगुरु, एक आसा नामकी ॥ गुरुचरणलीनअधीननिशिदिन, चाहनहिंथनधामकी सुतनारि सकल विसारिविषया, चरणगुरुदृष्टकैगहे ॥
ऐसे साधुको गुरु
सतगुरुकृपादुखदुसहनाशै, धाम अविचलसो लहे ॥
अविचल धामको प्राप्ति किससे होती है ?
सो०-मनवचक्रमगुरुध्यान, गुरुआज्ञानिरखत चले ॥ देहि मुक्ति गुरु दान, नाम विदेह लखायकै ॥ ८ ॥
नाम ध्यान माहात्म्य
जबलग ध्यान विदेह न आवे । तबलगजिवभवभटका खावे ॥ ध्यान विदेह औ नाम विदेहा । दोह खल पावे मिटे संदेहा ॥ छन इक ध्यान विदेह समाई । ताकी महिमा वरणि न जाई ॥ काया नाम सबै गोहरावे । नाम विदेह विरले कोई पावे ॥ जो युग चार रहे कोई कासी । सार शब्द विन यमपुरवासी ॥ नीमषार बंदी परधामा । गया द्वारिका प्राग अस्नाना ॥ अडसठ तीरथ भूपरिकरमा । सार शब्द विन मिटै न भरमा ॥ कहैलग कहीं नाम परभाऊ । जा सुमिरे जमत्रास नसाऊ ॥
नाम पानेवालेको क्या मिलता है
सार नाम सतगुरुसो पावे । नाम डोर रहि लोक सिधावे ॥ धर्मराय ताको सिर नावे । जो हंसा निःतत्त्व समावे ॥
सारशब्द (नाम जपनेकी विधि)
अनुरागसागर
( ११ )
सार शब्द क्या है
सार शब्द विदेह स्वरूपा । निअच्छर वहि रूप अन्नूपा ॥ तत्त्व प्रकृतिभाव सब देहा । सार शब्द नितत्त्व विदेहा ॥ कहन सुननको शब्द चौधारा । सार शब्दसों जीव उबारा ॥ पुरुष सु नाम सार परबाना । सुमिरण पुरुष सार सहिदाना ॥ बिन रसनाके जाय समाई । तासों काल रहे सुगझाई ॥ सूच्छम सहज पन्थ है पूरा । तापर चढो रहे जन सूरा ॥ नहिं वहाँ शब्द न सुमरा जापा । पूरन वस्तु काल दिख दापा ॥ हंस भार तुम्हरे शिर दीना । तुमको कहों शब्दको चीन्हा ॥ पदम अनन्त पँखुरी जाने । अजपा जाप डोर सो ताने ॥ सुच्छम द्वार तहां तब परसे । अगम अगोचर सत्पथ परसे ॥ अन्तरशून्य महिहोय प्रकाशा । तहँवाँ आदि पुरुषको बासा ॥ ताहिं चीन्ह हंस तहँ जाई । आदि सुरत तहँ लै पहुँचाई ॥ आदि सुरत पुरुषको आदी । जीव सोहँगम बोलिये ताही ॥ धर्मदास तुम सन्त सुजाना । परखो सारशब्द निरबाना ॥
सारशब्द ( नाम ) जपनेकी विधि गुरुगमभेद छन्द
अजपा जाप हो सहजधुना, परखिगुरुगम डारिये ॥ मन पवनथिरकर शब्द निरखै, कर्ममनमथ मारिये ॥ होत धुनि रसना विना, कर माल विन निरवारिये ॥ शब्दसार विदेह निरखत, अमरलोक सिधारिये ॥ ५ ॥ सोरठा-शोभा अगम अपार, कोटिभानुशशिरोमहका ॥ षोडश रवि छिटकार, एकहंस उजियार तनु ॥ ५ ॥
धर्मदासका आनन्दोद्गार
हे प्रभु तब चरण बलिहारी । किये सुखी सब कष्ट निवारी ॥ चक्षुहीन जिमि पावे नेना । तिमि मोहि हरष सुनत तव नैना ॥
धर्मदासका आनन्दोद्गार
( १२ )
अनुरागसागर
कबीर वचन
धर्मदास तुम अंस अंकुरी । मोहि मिलेउकीन्हे दुख दूरी ॥ जस तुम कीन्हे मोमन नेहा । तजिधनधामरु सुत पितु गेहा ॥ आगेशिष्यजोअसविधिकहिहैं । गुरुचरण मननिश्चलधरिहैं ॥ गुरुके चरण प्रीत चित धारै । तन मन धन सतगुरुपर वारै ॥ सोजिवमोहिअधिक प्रिय होई । ताकहँ रोकि सकै नहि कोई ॥ शिष्य होय सरबस नहि वारे । हृदयकपट मुख प्रीतिउचारे ॥ सो जिव कैसे लोग सिधार्ई । बिन गुरुमिलै मोहि नहि पाई ॥
अवीसीकर्मधनदाता
यह सब तो प्रभु आपहि कीन्हा । नहि तो हतो मैं परम मलीना ॥ करके दया प्रभु आपहि आये । पकड़ि वाह प्रभु काल छुड़ाये ॥
सृष्टि उत्पत्ति विषय प्रश्न
अब साहब मोहि देउ बताई । अमर लोग सो कहाँ रहाई ॥ लोकदीप मोहि बरनि सुनावहु । तृषनावन्तको अमी पियावहु ॥ कौन द्रौप हंसको वासा । कौने द्रौप पुरुष रह वासा ॥ भोजन कौन हंस तहँ करई । और बानी कहँ पुनि उच्चरई ॥ कैसे पुरुष लोग रचि राखा । द्रौपहि करकैसे अभिलाखा ॥ तीन लोक उत्पत्ती भाखो । वर्णहुसकल गोय जनि राखो ॥ कालनिरंजनकेहि विधि भयऊ । कैसे घोडश सुत निर्मयऊ ॥ कैसे चार खानि विस्तारी । कैसे जीव कालवश डारी ॥ कैसे कूर्म शेष उपराजा । कैसे मीन बराहहि साजा ॥ त्रय देवा कौने विधि भयऊ । कैसे महि अकाश निरमयऊ ॥ चन्द्र सूर्य कहु कैसे भयऊ । कैसे तारागण सब ठयऊ ॥ किहि विधि भइ शरीरकी रचना । भाषो साहब उत्पत्ति बचना ॥ जाते संशय हो उच्छेदा । पाय भेद मन होय अखेदा ॥
अनुरागसागर
( १३ )
छन्द
आदि उत्पतिकहोसतगुरु, कृपाकरी निजदासको ॥ बचन सुधा सु प्रकाश कीजै,नाश हो यमत्रासको॥ एक एक विलोयबर्णहु, दास मोहि निज जानिकै॥ सत्य वक्ता सदगुरु तुम,लेव निश्चयमानिकै॥१०॥ सो० निश्चयबचनतुम्हार,मोहि अधिकप्रियताहिते॥ लीला अगम अपार,धन्यभाग दर्शन दिये॥१०॥
कबीर बचन
धर्मदास अधिकारी पाया । ताते मैं कहि भेद सुनाया ॥ अब तुम सुनहु आदिकी बीनी । भाषां उत्पति प्रलय निशानी॥
सृष्टिके आदिमें क्या था ?
तबकी बात सुनहु धर्मदासा । जबनहिंमहिपाताल अकाशा॥ जब नहिं कूर्म बराह और शेषा । जब नहिं शारदगौरिगणेशा ॥ जब नहिं हते निरंजन राया । जिन जीवनकहवां धिङ्गुलाया॥ तेतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊ काहीं ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश न तहिया । शास्त्र वेद पुराण न कहिया॥ तब सब रहे पुरुषके माहीं । ज्यों बट वृक्ष मध्य रह छाहीं॥
छन्द
आदि उत्पति सुनहु धर्मनि,कोइ न जानत ताहिहो॥ सबहि भो बिस्तार पाछे,खास देउँ मैं काहि हो ॥ वेदचारो नाहिं जानत, सत्य पुरुष कहानियाँ ॥ वेदको तब मूल नाहीं,अकथकथा बखानियाँ॥११॥ सोरठा-निशकारतैं वेद, आदिभेद जाने नहीं ॥ पण्डित करत उछेद,मते वेदके जग चले॥११॥
सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुष की रचना
( १४ )
अनुरागसागर
सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुषकी रचना
सत्य पुरुष जब गुप्त रहाये । कारण करण नहीं निरमाये ॥ समपुट कमल रह गुप्त सनेहा । पुहुपमाहि रह पुरुष विदेहा ॥ इच्छा कीन्ह अंश उपजाये । हंसन देखि हरष बहुपाये ॥ प्रथमहि पुरुषशब्द परकाशा । दीपलोकरचिकीन्ह निवासा ॥ चारि कर सिंहासन कीन्हा । तापर पुहुप दीपकर चीन्हा ॥ पुरुष कला धरि बैठे जहिया । प्रगटी अगर वासना तहिया ॥ सहस अठासी दीपरचिराखा । पुरुष इच्छातैं सबअभिलाखा ॥ सवै द्वीप रह अगर समायी । अगर वासना बहुत सुहायी ॥
सोलह सुतका प्रगट होना
दूजे शब्द भयेजुपुरुषप्रकाशा । निकसे कूर्मचरण गहि आशा ॥ तीजे शब्दभयेजुपुरुष उच्चार । ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥ टेकी चरण सम्मुख है रहेऊ । आज्ञा पुरुषद्वीपतिन्ह दण्ड ॥ चौथे शब्द भये पुनि जबही । विवेकनाम सुत उपजे तबही ॥ आप पुरुष किये द्वीपनिवासा । पंचम शब्दसो तेज परकासा ॥ पांचवे शब्द जब पुरुष उच्चार । काल निरंजन भो औतारा ॥ तेज अंगते काल है आवा । ताते जीवन कह संतावा ॥ जीवरा अंश पुरुषका आही । आदिअन्त कोउ जानत नाही ॥ छठे शब्द पुरुष मुख भाषा । प्रगटे सहजनाम अभिलाषा ॥ सनयै शब्द भयो संतोषा । दीन्हो द्वीप पुरुष परितोषा ॥ अठयै शब्द पुरुष उच्चार । सुरति सुभाष द्वीप बैठारा ॥ नवमै शब्द आनन्द अपारा । दशयै शब्द क्षमा अनुसारा ॥ ग्यारहै शब्द नाम निष्कामा । बारहै शब्द जलरंगी नामा ॥ तेरहै शब्द अर्चित सुत जाने । चौदहै शब्द सुत प्रेम बखाने ॥ पन्द्रहै शब्द सुत दीन दयाला । सोलहै शब्दभे धीर्यरसाला ॥
निरंजन की तपस्या और मानसरोवर तथा शून्यकी प्राप्ति
अनुगगसागर
( १६ )
सत्रहवें शब्दसुतयोगसंतायन । एक नाल षोडषसुत पायन ॥ शब्दहिने भयो सुतन अकारा । शब्दते लोक द्वीप विस्तारा ॥ अग्र अभी दिव्य अंश अहारा । द्वीप द्वीप अंशन बैठारा ॥ अंशन शोभा कला अनन्ता । होततहां सुख सदा बसन्ता ॥ अंशन शोभा अगम अपारा । कला अनन्त को वरगै पारा ॥ सब सुत करें पुरुषको ध्याना । अमी अहार सदा सुख माना ॥ याही विधि सोलह सुत भेऊ । धर्मदास तुम चितधरि लेऊ ॥ द्वीप करी को अनत शोभा, नहि वरणतसो बने ॥ अमितकल अपार अद्भुत, सुनत शोभाको गने ॥ पुरके उजियारसे सुन, सवै द्वीप अजो रहो ॥ सत पुरुषरोम प्रकाश एकहि, चन्द्र सूर्य करो रहो ॥ सो०-सतगुरुआनैधाम, शोकमोहदुःख तहैं नहीं ॥ हंसनको विश्राम, पुरुष दरश अँचवन सुध ॥१२॥
निरंजनकी तपस्या और मानसरोवर तथा शून्यकी प्राप्ति
यहि विधि बहुत दिवस गये बीती । ता पीछे ऐसी भइ रीती ॥ धरमराय अस कीन्हतमासा । सो चरित्र बूझहु धर्मदासा ॥ युग सत्तर सेवा तिन कीन्ही । इकपद ठाठ पुरुष हर्षित दीन्ही ॥ सेवा कठिन भांति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हर्षित होय चीन्हा ॥
पुरुष वचन निरंजन प्राप्ति
पुरुष अवाज उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥ निरंजन वचन
कहै धरम तब सीस नवायी । देहु ठौर जहां बैठों जायी ॥ आज्ञा किये जाहु सुत तहवाँ । मानसरोवर द्वीप है जहवाँ ॥ चलयो धरम तब मानसरोवर । बहुत हरष चित करत कल्लोहर ॥
सहजका निरंजनके पास जाना
( १६ )
अनुरागसागर
मान सरोवर आये जहिया । भये आनन्द धरमपुनितहिया ॥ बहुरि ध्यान पुरुषको कीन्हा । सत्तर जुग सेवा चित दीन्हा ॥ यक पगु ठाढे सेवा लायी । पुरुष दयालु दया उर आयी ॥
पुरुषवचन सहजप्रति
विकस्योपुरुषउठचोजब बानी । बोलत बचन उठचो अथरानी ॥ जाहु सहज तुम धरमकेपासा । अबकसध्यानकीन्ह परकासा ॥ सेवा बहु कीन्हा धर्मराऊ । दियो ठौर वहि जहाँ रहाऊ ॥ तीन लोग तब पलमें दीन्हा । लखिसेवकाइ दया अस कीन्हा ॥ तीन लोक कर पायो राजू । भयो अनन्द धरम मन गाजू ॥ अवका चाहें पूछो जाई । जो कुछ कह सो देउ सुनाई ॥
सहजका निरंजनके पास जाना
चले सहज तब सील नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥ कहे सहज सुनु आता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥ अवका मांगहु सो कह मोही । पुरुष अवाज दीन्हा यह तोही ॥
निरंजनवचन सहजप्रति
अहो सहज तुम जेठे भाई । करो पुरुष सो बिन्ती जाई ॥ इतना ठाव न मोहि सुहाई । अब मोहिबकसि देहहुठकुराई ॥ मोरे चित असभौ अनुरागा । देउ देश मोहि करहु सभागा ॥ कै मोहि देवलोक अधिकारा । कै मोहि देहु देश यक न्यारा ॥
सहजवचन सत्पुरुषप्रति
चले सहज सुन धर्मकी बाता । जाय पुरुषसो कहे विरुषाता ॥ जो कहु धर्मराय अभिलाषी । तैसे सहज सुनाये भाषी ॥
पुरुषवचन सहजप्रति । छन्द
सुन्यो सहजके वचन, जबही पुरुष वैन उच्चारेऊ ॥ धरमसे सन्तुष्ट हैं हम, वचन मम उर धारेऊ ॥
निरंजनको सृष्टि रचनाका साज
अनुरागसागर
( १७ )
लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश वसावहू ॥ करहु रचना जाय तहैंवा, सहज वचन सुनावहू ॥१३॥ सो०-जाहु सहज तुम वेग, अस कहि आवो धर्मसो॥ दियो शून्यकर थोग, रचना रचहु बनाइके ॥ १३ ॥
निरंजनको छुटि रचनाका साज मिलानेका वृत्तान्त
सहज वचन निरंजन प्रति
आये सहज वचन सुनावा । सत्यपुरुषजसकहिसमुझावा॥
कबीर वचन धर्मराज प्रति
सुनतहि वचन धर्म हरषाना । कछुकर्हकछुविस्मय आना॥
निरंजनवचन सहज प्रति
कहे धर्म सुनु सहज पियारा । कैसे रचौं करौं विस्तारा ॥
पुरुष दयाल दीन्ह मोहिं राजू । जानु न भेद करौं किमि काजू॥
गम्य अगम मोहे नहिं आयी । करौं दया सो युक्ति बतायी॥
विन्ती करौं पुरुषसों मोरी । अहो आत बलिहारी तेरी ॥
किहि विधिरचैनवखण्ड बनाई । हे आत सो आज्ञा पाई ॥
मो कहैं देहु साज प्रभु सोई । जातैं रचना जगत्की होई ॥
सहजका लोकको जाना
तबही सहज लोक पग धारा । कीन्ह दंडवत बारम्बारा ॥
पुरुषवचन सहज प्रति
अहो सहज कस इहैंवा आई । सो हमसो तुम शब्द सुनाई॥
कबीर वचन धर्म दास प्रति
कहो सहज तब धर्मकी बाता । जो कछु धर्म कही विरुयाता॥
धर्मराज जस विन्ती लायी । तैसे सहज सुनायउ जायी ॥
पुरुषकी आज्ञा सहजसे
आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि वारा । सुनौ सहज तुम वचन हमारा॥