कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १८४ )
बोधसागर
पञ्च लिंग औ पञ्च हैं पूजा । पञ्च एक पञ्च है दूजा ॥ पांचों आवें पांचों जाई । पांचों मरें पांचोंको खाई ॥ पांचों सुक्षिम औ पांच अस्थूला । पांच डार औ पांच हैं मूला ॥ पांच पाप औ पांच हैं पुत्रा । पांच बस्ती और पांच हैं सुत्रा ॥ पांच पांच पांचों सब भवा । पांच स्वामी और पांच हैं सेवा ॥ पंच गुरु और पंच हैं चेला । पांच भाव और पांच हैं मेला ॥ पञ्च मुद्राका कहों बिचारा । ताको योगी करे सम्हारा ॥ चार छोड़ पांचो करे बासा । ताते पांचका कहो प्रकाशा ॥ पांचों मुद्रा उनमुनि कहिये । तासों भेद सुत्तिको लहिये ॥ ब्रह्म प्रकाश तहाँ पूरन चन्दा । रैन दिवस नहि सहज अनन्दा ॥ दुतिया भाव तहाँ नहि काया । तहवां नहीं धूप और छाया ॥ हम तुम कर्म भ्रम नहि दोई । तहां सिलान ब्रह्म सो होई ॥ सहज शून्यको लखे जो भेवा । आप ही कर्ता आप ही देवा ॥ प्रथमही आपुपुर्ष विस्तारा । तहांते भयो ब्रह्म आकारा ॥ आकारते अहंकार उपजाई । ताते बहु विस्तार बनाई ॥ सोहं स्वासा पुर्ष उचारा । तहांते भौ अक्षर ओंकारा ॥ पांच ब्रह्मकी उत्पति भाषों । तुमसों गाय कछू नहीं राखों ॥ अकास ब्रह्मको भास बताऊँ । वायु ब्रह्मको तहवां लाऊँ ॥ पुन है तेज ब्रह्मकी बानी । जलकी बहुरि कहों उत्पानी ॥ फिर पृथ्वीको भास लखाऊँ । प्रथम ब्रह्मको भेद सुनाऊँ ॥ अविगत आदि ब्रह्मको भासा । ताको भेद कहों प्रकाशा ॥ प्रथमें नाम आकाश कहाई । दुतिये गगनाकाश बताई ॥ फिर रकाशको नाम सुनाऊँ । चौथे गगनसकाश लखाऊँ ॥ पांचे महद अकाशकी बानी । पञ्च अकाशमें कहों बखानी ॥ अब सुन कहों पञ्च अस्थाना । सकित तुमसों कहों बखाना ॥
पञ्चसुद्धा
( १८५ )
मुखके अग्र खेचरी बासा । ताको ध्यान जन करे अकाशा ॥ नासा अग्रत्रिकुटी अस्थाना । चाचरी सुद्धा तहाँ बखाना ॥ चक्षु अग्र भोचरी जाना । उर्ध्वअकाशको है तहाँ ध्याना ॥ श्रवन अग्र अगोचरी थाना । सहज शून्यको है तहाँ ध्याना ॥ तिलकपाट उनसुनी कहीजै । महाशून्य ध्यान तहाँ कीजै ॥ प्रथमहि खेचरीक सुद्धा कहिये । धूमवरण रंग तहाँ लहिये ॥ पीतवर्ण तहाँ देखे जाई । अकह रूप तहाँ रहो समाई ॥ औरौ वर्ण रक्त लख आई । कामधेनु तहाँ देखो गार्ई ॥ करुणवृक्षकी तहवों छाया । नहीं तहाँ काल नहीं तहाँ काया ॥ तहाँ समाध लगावे जाई । अमी बुंद तहाँ चाखे भाई ॥ ताकर पीवत अमर होइ जाई । सोई भेदमें वरण सुनाई ॥ द्वितिये चाचरि सुद्धा बखानी । नासा ध्यान तासको जानी ॥ तहाँ उत्तंग ब्रह्मको देखा । हंस रूप तहवों पुन पेखा ॥ मणिगण रतन विन्दको बासा । कर्तारूप पुरुष प्रकाशा ॥ जगमग ज्योति देखिये तहिया । बिन शशि सूर उजैरो जहिया ॥ चहुँदिश दामिनि दमके आई । चन्द्र सूर तामों छपजाई ॥ इतना रूप चाचरी जानी । ताको भेद कहीं प्रवानी ॥ त्रितिये भोचारी सुद्धा कहिये । अष्ट अंग पुन तामों लहिये ॥ मन बुध चित अहंकारन माया । ममता काम हर्षकी छाया ॥ तेज पुञ्ज तहाँ झिलमिल देखा । सूक्ष्म अस्थान तहाँ पुन पेखा ॥ चित चेतन्य तहाँ पुन दोई । तामों मिले परमपद सोई ॥ भोचरी सुद्धा कहि समझाई । ताको मर्म कोइ ज्ञानी पाई ॥ चौथे अगोचरी सुद्धा जाहीं । महाशब्द धुन उपजे ताहीं ॥ नाना ताल बैन मृदंगा । यंत्र ढोल सहनाई अंगा ॥ राबाब किंकिन झालरी बाजा । नभेरी चिंचिन शंखधुन गाजा ॥
( १८६ )
बोधसागर
मेघनाद गजनीं तहां कहिये । शंख शब्द धुन तामों लहिये ॥ बाजा सुने सूष्य तव होई । काम क्रोध मद सब गहि खोई ॥ लोभ मोह तज पावे सोई । प्रवर्त छोड़ निरवर्त जो होई तमो सतो रजो गुण विसरावै । आगे रूप दर्श तब पावै ॥ अगोचरीको अब कहेउ उपाई । योगी कर्म महा सच पाई ॥ पांचे मुद्रा उनमुनि जानी । ताकर भेद अब कहीं बखानी ॥ उनमुनि देश लखे जब जाई । अमर वस्तु तब भाषे आई ॥ ब्रह्म अखण्ड देखिये जाई । ब्रह्मरूप तब भाषे आई ॥ श्वेत पीत श्याम नहीं सोई । अरुण सजुजतें न्यारा होई ॥ रूप सरूप हृद वेहद नहीं । चारो बानि खानि नहीं ताहीं ॥ ब्रण अब्रण काया नहीं माया । युग बैदनकी तहाँ न छाया ॥ षटदर्शन पाखंड ना तहाँ । बावन अक्षर अकार न जहाँ ॥ नौ षट चार अष्टदश नहीं । पांचो तत्त्व धाम नहीं ताहीं ॥ मन बुध चित अहंकार नावासा । काल कर्मको नहीं प्रकाशा ॥ तहाँ ध्यानधर तारी लावै । सोई मूल परम पद पावै ॥ उनमुनि सिरवर बहुर चढ़जाई । जहाँकी गम्य देव नहीं पाई ॥ नहीं तहाँ काल नहीं तहँ काया । नहीं तहाँ प्रमत्ता मोहन माया ॥ चन्द्र सूर तारागण नहीं । दिवस रैन तहाँ धूप न छाहीं ॥ पिंड ब्रह्मांडको तहाँ न लेखा । केवल पारब्रह्म तहाँ देखा ॥ अलखरूप तहाँ अबिगत सोई । सबके परे ध्यान वह होई ॥ तासों ध्यान लगावे प्राणी । असी चारके छूटे खाणी ॥ अब वेदनको बास बताऊँ । ताको भेद अब वर्ण सुनाऊँ ॥ जिह्वा अग्र ऋग्वेदको वासा । नासा अग्र यजुर प्रकाशा ॥ श्रवण अग्र शाम सुति कहिये । चक्षु अग्र अथरवण लहिये ॥ शून्य अग्र सोहंग प्रकाशा । तहवों सुसमे वेद को बासा ॥
पञ्चमुद्रा
( १८७ )
वेदनके अस्थान बताई । अब इंद्रिनके स्वाद लखाई ॥ लिंग इंद्री कामिन सो नेही । जिह्वा षट् श्वाद तो लेही ॥ नासा गंध सुगंध अघाई । चक्षु इंद्री रूप लोभाई ॥ श्रवण स्वाद मधुर धुन बानी । ये पांचोंके स्वाद बखानी ॥ पृथी अस्थूल ऋग्वेदकी बानी । नीर अस्थूल जजुर पहिचानी ॥ वायु अस्थूल साम सुतिं कहिये । तेज अस्थूल अथरवण लहिये ॥ अनहद अस्थूल सोहंगकी बानी । सुसम देवताको पहिचानी ॥ खोजे ताहि मुक्त तब होई । सुसम वेद सम और न कोई ॥ वेद अस्थूल कहा समझाई । आसन योगी भेद बताई ॥ पृथ्वीरूप जहाँ आसन जाना । जीवरूप योगी पहिचाना ॥ पानीरूप जहाँ आसन कहिये । हंसरूप योगी तहाँ लहिये ॥ तेजरूप जहाँ आसन जानी । चेतनरूप योगी पहिचानी ॥ बांयेरूप है आसन जहिया । निराकार योगी है तहिया ॥ आकाश रूप आसन प्रवाना । निरंजन योगी जहाँ बखाना ॥ आवागम अब भेद बताई । तुमसो सुकृत नाहिं डुराई ॥ जीव पृथी मिल आवे जाई । मिल पृथी पुनि बहुरि सिधाई ॥ हंस रूप जल मिलके आवै । बहुर नीर मिल घरहि सिधावै ॥ चैतन तेज मिल आवै सोई । बहुर तेज मिल तहाँ सगोई ॥ निरालंब बाये मिलि आवै । बहुर बाये मिल गृहे समावै ॥ निरञ्जन मिल आकाशको आवै । बहुर गगन मिल उलट समावै ॥ आवागम मैं दीन बताई । जन पहुँचनको भेद लखाई ॥ प्रथम पृथीको जल उपजावै । सो जल बहुर पृथीको खादे ॥ जलकी उत्पत्त तेज सो होई । भक्षे तेज पुन जलको सोई ॥ तेजको बाये रूप उपजावै । उलट वाये पुन ताको खावै ॥ बाँये रूप अकाश उपजाई । फिर अकाश पुन ताको खाई ॥ आकाश शून्यते उत्पत्त जानौ । बहुरि शून्यमें जाय समानौ ॥
( १८८ )
बोधसागर
पृथी जीव गृहे कहौं प्रकाशा । गुदा द्वारमें कीन्हो बासा ॥ पानी हंसको गृहे बताई । ललाट अधरमें बैठक पाई ॥ तेज चेतनको धाम बताई । पीत चक्षुके द्वार रढ़ाई ॥ निरालंभ बायेको थाना । नाभी नाशिक द्वार समाना ॥ आकाश निरंजनको प्रकाशा । श्रवण द्वार ब्रह्मांड है बासा ॥ पांचोंके गृह वर्ण सुनाई । रंग अहार कहौं समुझाई ॥ पृथ्वी पीतवर्ण उच्चार । सो तो जीवको कहौं अहारा ॥ पानी श्वेतवर्ण है भाई । सो तो अहार हंसको आई ॥ तेजको रक्तवर्ण पहिचाना । सो तो अहार चेतन को जाना ॥ बायेको सवुजवर्ण है भाई । निरालंबको भक्षण आई ॥ अकाश नीलवर्ण पहिचानी । निरंजनको अहारसो जानी ॥ रंग अहार कहेउ समुझाई । पृथ्वी पंचके नीर बुझाई ॥ पृथ्वी नीर पुत्र है भाई । हाड पृथ्वीको बिंद कड़ाई ॥ नीर पृथीको श्रोणित अंशा । पसीना त्वचा पृथीको वंशा ॥ रोम पृथीको वंश कड़ाई । पृथी नीरको भेद लखाई ॥ पृथी बिमल गुण कहिये भाई । अब पृथी गन वर्ण बताई ॥ तेज तमोगुणको पहिचाना । बाये गन्धगुण लखो सुजाना ॥ अकाशअलखगुण जानहु भाई । पांचोंके गुणवर्ण सुनाई ॥ अब प्रक्रीत पचीस बताऊँ । पाचों तत्त्व विभाग लखाऊँ ॥ हाड चाम मास रोम लखाई । नाटिका पृथी प्रकृत बताई ॥ रक्त पित्त कफ स्वाद बखाना । स्नारप्रकृतजलतत्त्वको जाना ॥ भूखप्यास मुख प्रभा जम्हानो । आलस निद्रा तेज पहिचानो ॥ धावन कूदन बलकर भाई । परसन सकुचन पवन बताई ॥ लोभ मोह हंकार भै जाना । बिंद अकाश प्रकृत बखाना ॥ पांच पचीस अंग कहि दीन्हौं । तासु मर्म कोइ बिरले चीन्हौं ॥
पञ्चमुद्रा
( १८९ )
प्रथमहि जीवरूप पहिचानो । प्रथमै ताके चेला जानो ॥ औ पुन हंसरूप है भाई । पानी चेला तास बताई ॥ चेतनरूप गुरु है सोई । चेला तेज तासुको होई ॥ निरालंब गुरु पहिचानो । वाय तासको चेला जानो ॥ अलख निरंजन गुरु बखाना । चेला आकाश तासको जाना ॥ गुरु शिष्यको भेद बताई । अब तत्त्वनकी परष लखाई ॥
छंद-चौकोर मंद और शुद्धपुरी धरनी है सोई । नीचे शीतल मंद चले जलको तत होई ॥ तेज तत्त्व जो ऊंच आगमनकी आइसु होई । दहिने बांये चले बाँये तत्त्व जानो सोई ॥ सबुजके मध्य सुखमना पवन गगनको जानिये । आकाश नाम तासों कहि पाँचों तत्त्व बखानिये ॥ नाभी गंध समान पवनको अंश बखानो । ह्दे माही प्राण अगिनको अंश सो जानो ॥ कंठ बसे आपान अंश तेहि जलको जानो । गगन बसे उद्यान अंश आकाश बखानो ॥ सब देहीमें ब्यान है अंश पृथ्वीको जानिये । पंच प्राण ये जानिये अंशहीते पहिचानिये ॥
चौपाई
पंचप्राणकी संघ लखाई । अब उनमुनिको भेद बताई ॥ मुद्रापांच प्रकट मैं भाषा । तामहि श्रेष्ठ उनमुनि राखा ॥ चारोंके परे उनमुनि कहिये । अलखरूप पुनि तामों लहिये ॥ सोई ब्रह्मज्ञान कहलावै । धरे ध्यान तहां अमृत पावै ॥ पावे साध अमीरस पीवै । सो योगी जग युगयुग जीवै ॥ ना फिर आवै ना फिर जाई । अखंड मंडलमें रहे समाई ॥
( १९० )
बोधसागर
ताको जरा मरन नहीं होई । परम तत्त्वमें रहे समोई ॥ योग जीत कहु ज्ञान अपारा । यह मार्ग है सत् विचारा ॥
सुकित वचन
सुकित कहैं सुनो गुरुज्ञानी । सुद्धा पंच तुम कही बखानी ॥ और कथा एक पूछो तोही । सो समुझाय कहु प्रभु मोही ॥ कायामाहे कमल जो होई । तेहि स्थान सुनावो सोई ॥ कौन कमलकै पखुरी जाना । कौन देव तहां कीन्हों थाना ॥ कौन कमलसों स्वासा आवै । कौन कमलमें जाय समावै ॥ कौन कमलसों होय गुंजारा । कौन कमलसों करे उचारा ॥ केतिक स्वासा आवै जाई । भिन्न भिन्न सब लेख बताई ॥
योग जीत वचन
हे सुकित मैं तुम्हैं लखाऊं । कमलनको प्रमान बताऊं ॥ प्रथमहि कमल चतुरदल कहिये । देवगणेश पुन तामों लहिये ॥ रिद्धसिद्ध जहाँ सत्क उपासा । तहाँ जा पूछै सो प्रकाशा ॥ षटदल कमल ब्रह्माको बासा । सावित्री तहाँ कीन्ह निवासा ॥ षटसहस्र तहाँ जाप बखाना । देवन सहित इन्द्र अस्थाना ॥ अष्टदलकमलहरिलक्ष्मी वासा । षटसहस्र तहाँ जाप निवासा ॥ द्वादश कमलमों शिवको जाना । षटहजार जाप बंधाना ॥ तहाँ शिव योग लगावैं तारी । पारवती संग सहित विचारी ॥ षोडश कमल जीव मन वासा । एक सहस्र जाप प्रकाशा ॥ त्रैदल कमल भारथी वासा । सोतो उज्ज्वल कमल निवासा ॥ एक सहस्र जाप तहाँ कीजै । यह संकल्प जाय तहाँ दीजै ॥ दोय दल कमल हंस अस्थाना । तामह परम हंसको जाना ॥ एक सहस्र जाप प्रकाशा । कर्म भ्रमको है तहाँ नाशा ॥ सहस्रदल कमलमों झिलमिल जाना । ज्योति सरूप तहाँ पहिचाना ॥ ताहै रंगहै अलख अपारा । अलख पुर्ष है सबते सारा ॥
पञ्चमुद्रा
( १९१ )
नवें कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥ एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥ अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥ स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥ अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहिं पाऊँ ॥ अभी अखण्डते वर्ये धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥ निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥ दशयें घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥ निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजार ॥ अभी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥ तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥ उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥ हृदे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥ एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥ एतिक स्वासा हृदे ले आवै । क्षिन् बाहिर क्षिन् भीतर धावै ॥ दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अथर धुन ताही ॥ सहस्र पखुरी कमल अनूपा । तहाँ बसे मन जीत सुरूपा ॥ ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ बिराजै ॥ तहां घरनी घरियार बजावै । घरी घरी टंकोरा लावै ॥ छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥ एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥ या विधि चार टंकोरा ठोकै । राहु केतु संग व्यालि न रोकै ॥ पहर एक करे धुन पूरा । ग्रहण गिरासे शशि औ सूर ॥ गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥ तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥ श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥
( १९२ )
बोधसागर
स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै ॥ सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥ एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥ आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥ चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥ चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतैं छाही ॥ प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥ सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥ प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥ सतयुग प्रथमहि घरी उतपानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥ किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥ एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अच्छेकी छाहीं ॥ वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥ या युग अन्तकी आवे घरी । आसे नागिन सनमुख खड़ी ॥ प्रथम किलकयुग होय संधारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥ सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥ जवे कमत युगकरे हंकारा । उतपत थोरी बहुत संधारा ॥ कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥ एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखैं ताही ॥ बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥ आवांगवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥ तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥ युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥ युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥ तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥
पञ्चमुद्रा
( १९३ )
चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥ श्वासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥ युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥ ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥ सतयुग अंत होन नहि पावै । युग कंकवत आन समावै ॥ युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥ युगकंकवत कालकी वाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥ युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों कोधा ॥ सतयुगअंत कंकवत माही । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥ युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥ अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥ चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥
साखी—एके युगके बीतते, चारों गये बिनास ।
एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥
किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥ भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥ एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥ चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥ सतयुगको तब भयो बिनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥ दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥ तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥ त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार बिचारी ॥ जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥ जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥
नं. ८ कबीरसागर - ७
( १२४ )
बोधसागर
त्रेता युगमें कलह अपारा । यज्ञ दान व्रत नेम अचारा ॥ तेहि पीछे द्वापर युग आवा । काल अंत तंब आन समावा ॥ अहंकार तामें अति भाखा । अब कलयुगकी वर्णों साखा ॥ काम क्रोध और पाप अपारा । लोभ मोह यम कीन्ह पसारा ॥ एक पहर चारों युग जाना । ताको वर्ण कहों बिछलाना ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण कहिये । ताते पिंडकी उत्पत्ति लहिये ॥ अष्टधात कहिये अस्थूला । ताते रचो गर्भको मूला ॥ शिवकी खासा वायु सरूपा । सत्ती गहे जानके रूपा ॥ शिवको रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मो जावन देई ॥ जावन जगे तब सांचा माहीं । थाका होय रुधिरके ताहीं ॥ तेहि थाकाकी रचना भारी । तीन लोककी विभो सवारी ॥ महल मध्य पुनि जीव समावा । जलके भीतर महल बनावा ॥ महलके माहिं बनाये छप्पा । तामो दश कीन्हों दरवप्पा ॥ सांचा अत्र जरे नहिं कबहीं । पिंड सवारो अन्तर जबहीं ॥ सांचा माहिं दियो रंग ढारी । नख सिख शोभा बहुत सवांगी ॥ तीनों लोक रचो पलमाहीं । गढ़पति अंश तब साजा ताहीं ॥ प्रथमहि सायेर सात सँवारा । पर्वत आठ कीन्ह अधिकारा ॥ अठारह गंडा नदी बहाई । तामह गुप्त बहै ठहराई ॥ अठारह सहस्र बनाये नारा । अष्टधातुले साज सुधारा ॥ रक्त हांडको सब अस्थूला । बाढ़े लिंग सवांरे मूला ॥ आगे रचो दोह भुज दंडा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥ बहुर सँवारो दोय पग खंभा । मदन महाबल उपजो रंभा ॥ नासा चढाय मस्तक पर लाई । सातभैंवर नौनाट लगाई ॥ उत्तर मेर शिर जो अस्थूला । सरवर माहिं कमल बहु फूला ॥ नाभी माहिं दल चार बनाई । फूल फल बास घट छाई ॥
पञ्चमुद्रा
( १९५ )
आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥ सोई अंग शक्त सोइ ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥ नख सिख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥ प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥ एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥ एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥ सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥ त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥ ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥ ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥ झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर शून्य एक घर फेरी ॥ खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥ रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥ मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥ खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥ खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहै नीर तरंगा ॥ सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुर्तसनेह धनी तहैं दसैं ॥ खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥ सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥ तहां बसे सरयू तेहि साथा । रावल एक बयालिस हाथा ॥ काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अघर दीखे नहिं माथा ॥ बाढी नदी दोइ विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥ तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥ खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारारा ॥ मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥
( १९६ )
बोधसागर
त्रिकुटी संगम भयो मिलाना । भवर गुफा माधो करथाना ॥ त्रिवेणी तट बसे सुठंगा । ताको मम लखा परसंगा ॥ गणगंधर्व मुनि सब कर थाना । सुर नर मुनि कर बैठे ध्याना ॥ तैतिस कोट देव मुनि भारी । यक्ष यक्षणी देव कुमारी ॥ नागसुता अपसरा मोहिनी । चढ़ बिमान सब फिरे जोहिनी ॥ असुरपिशाचऋषनागजोलाहल । त्रिवेणीतट करे कोलाहल ॥ तीनलोक जौ जीव निवासा । सो सब करो त्रिवेणी बासा ॥ त्रिवेणी तट माधौ देवा । सब मिल करे तासुकी सेवा ॥ ताहि प्राग होय चलो प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥ देश देश गंगा फिर आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बँधाई ॥ जहां तहां तप ध्यान लगावै । योग यज्ञ तप बहुत करावै ॥ ऋतुवसंत प्रागको धावै । मकर नहाय बजार लगावै ॥ अर्ध उर्ध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥ गर्भमाहि सब युक्ति बनाई । तीन कचहरी तहां लगाई ॥ जहां नदी संगम पर्वाना । तहवां रचो एक अस्थाना ॥ संगम बीच गुफा एकधारा । ताहि गुफामों सात है द्वारा ॥ एकद्वार होय नाद सूधारै । एकद्वार होय रूप निहारै ॥ एकद्वार होय वास बसावै । एकद्वार होय अग्नि समावै ॥ एकद्वार हो स्वाद लिवावै । एकद्वार होय न्याय चुकावै ॥ एकद्वार होय नाद उचारा । योग जीव यह मता विचारा ॥ सातनाल चौदह सुरभाऊ । सातोंके हैं एक सुभाऊ ॥ सातो सात शून्य मों बासा । सातो बसे गुफाके पास ॥ अनहद भेद श्वासाकी धारा । ताको भाषतहों व्यवहारा ॥
साखी-रचना भाषेउ पिंडकी, श्वासा सहित विचार । विरलाजन कोई परखि है, अलखरूप व्यवहार ॥
पञ्चसुत्रा
( १२७ )
सुक्ति वचन-चौपाई
सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कही अन्तर्यामी ॥ और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गोय न राषों ॥ हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥ आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥ ताको भेद कहीं समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत् मम बानी । भिन्न भिन्न मैं कहीं बखानी ॥ पांचवरी वांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥ दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥ आठ पहर पिगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥ आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दौय रहै ॥ सोरह दिन पिगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥ वीस रैयन दिन दहिनौ पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥ एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दौय दिनमें हंस पयानो ॥ पांचवरी सुखमन जो हालै । पांचवरी मो हंसा चालै ॥ चन्द सुर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥ ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥
साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय ।
छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥
छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय ।
दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥
गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय ।
मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥
भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय ।
पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥
( १८८ )
बोधसागर
पृथी जीव गृहे कहौं प्रकाशा । गुदा द्वारमें कीन्हो वासा ॥ पानी हंसको गृहे बताई । ललाट अथरमें बैठक पाई ॥ तेज चेतनको धाम बताई । पीत चक्षुके द्वार रखाई ॥ निरालंभ बायेको थाना । नाभी नाशिक द्वार समाना ॥ आकाश निरंजनको प्रकाशा । श्रवण द्वार ब्रह्मांड है वासा ॥ पांचोंके गृह वर्ण सुनाई । रंग अहार कहौं समुझाई ॥ पृथ्वी पीतवर्ण उच्चार । सो तो जीवको कहौं अहारा ॥ पानी श्वेतवर्ण है भाई । सो तो अहार हंसको आई ॥ तेजको रक्तवर्ण पहिचाना । सो तो अहार चेतन को जाना ॥ बायेको सवुजवर्ण है भाई । निरालंबको भक्षण आई ॥ अकाश नीलवर्ण पहिचानी । निरंजनको अहारसो जानी ॥ रंग अहार कहेउ समुझाई । पृथ्वी पंचके नीर बुझाई ॥ पृथ्वी नीर पुत्र है भाई । हाड पृथ्वीको बिंद कहाई ॥ नीर पृथीको श्रोणित अंशा । पसीना त्वचा पृथीको वंशा ॥ रोम पृथीको वंश कहाई । पृथी नीरको भेद लखाई ॥ पृथी विमल गुण कहिये भाई । अब पृथी गन वर्ण बताई ॥ तेज तमोगुणको पहिचाना । बाये गन्धगुण लखो सुजाना ॥ अकाशअलखगुण जानहु भाई । पांचोंके गुणवर्ण सुनाई ॥ अब प्रकीत पचीस बताऊँ । पाचों तत्त्व विभाग लखाऊँ ॥ हाड चाम मास रोम लखाई । नाटिका पृथी प्रकृत बताई ॥ रक्त पित्त कफ स्वाद बखाना । स्नारप्रकृतजलतत्त्वको जाना ॥ भूखप्यास मुख प्रभा जम्हानो । आलस निद्रा तेज पहिचानो ॥ धावन कूदन बलकर भाई । परसन सकुचन पवन बताई ॥ लोभ मोह हंकार भै जाना । बिंद अकाश प्रकृत बखाना ॥ पांच पचीस अंग कहि दीन्हौं । तासु मर्म कोइ बिरले चीन्हौं ॥
पञ्चमुद्रा
( १८९ )
प्रथमहि जीवरूप पहिचानो । प्रथमै ताके चेला जानो ॥ औ पुन हंसरूप है भाई । पानी चेला तास बताई ॥ चेतनरूप गुरु है सोई । चेला तेज तासुको होई ॥ निरालंब गुरु पहिचानो । वाय तासको चेला जानो ॥ अलख निरंजन गुरु बखाना । चेला आकाश तासको जाना ॥ गुरु शिष्यको भेद बताई । अब तत्त्वनकी परष लखाई ॥
छंद-चौकोर मंद और शुद्धपुरी धरनी है सोई ।
नीचे शीतल मंद चले जलको तत होई ॥ तेज तत्त्व जो ऊंच आगमनकी आइसु होई । दहिने बांये चले बाँये तत्त्व जानो सोई ॥ सबुजके मध्य सुखमना पवन गगनको जानिये । आकाश नाम तासों कहि पांचों तत्त्व बखानिये ॥ नाभी गंध समान पवनको अंश बखानो । हृदे माही प्राण अगिनको अंश सो जानो ॥ कंठ बसे आपान अंश तेहि जलको जानो । गगन बसे उद्यान अंश आकाश बखानो ॥ सब देहीमें ब्यान है अंश पृथ्वीको जानिये । पंच प्राण ये जानिये अंशहीते पहिचानिये ॥
चौपाई
पंचप्राणकी संघ लखाई । अब उनमुनिको भेद बताई ॥ मुद्रापांच प्रकट मैं भाषा । तामहि श्रेष्ठ उनमुनि राखा ॥ चारोंके परे उनमुनि कहिये । अलखरूप पुनि तामों ल्हिये ॥ सोई ब्रह्मज्ञान कहलावै । धरे ध्यान तहां अमृत पावै ॥ पावे साध अमीरस पीवै । सो योगी जग युगयुग जीवै ॥ ना फिर आवै ना फिर जाई । अखंड मंडलमें रहे समाई ॥
( १९० )
बोधसागर
ताको जरा मरन नहिं होई । परम तत्त्वमें रहे समोई ॥ योग जीत कहु ज्ञान अपारा । यह मार्ग है सत् विचारा ॥
सुक्ति वचन
सुक्ति कहैं सुनो गुरुज्ञानी । सुद्रा पंच तुम कही बखानी ॥ और कथा एक पूछो तोही । सो समुझाय कहो प्रभु मोही ॥ कायामाहे कमल जो होई । तेहि स्थान सुनावो सोई ॥ कौन कमलकै पखुरी जाना । कौन देव तहाँ कीन्हों थाना ॥ कौन कमलसों स्वासा आवै । कौन कमलमें जाय समावै ॥ कौन कमलसों होय गुजारा । कौन कमलसों करे उचारा ॥ केतिक स्वासा आवे जाई । भिन्न भिन्न सब लेख बताई ॥
योग जीत वचन
हे सुक्ति मैं तुम्हैं लखाऊं । कमलनको प्रमान बताऊं ॥ प्रथमहि कमल चतुरदल कहिये । देवगणेश पुन तामों लहिये ॥ रिद्धसिद्ध जहाँ सत् उपासा । तहाँ जा पूछै सो प्रकाशा ॥ षटदल कमल ब्रह्माको बासा । सावित्री तहाँ कीन्ह निवासा ॥ षटसहस्र तहाँ जाप बखाना । देवन सहित इंद्र अस्थाना ॥ अष्टदलकमलहरिलक्ष्मी वासा । षटसहस्र तहाँ जाप निवासा ॥ द्वादश कमलमें शिवको जाना । षटहजार जाप बंधाना ॥ तहाँ शिव योग लगावैं तारी । पारवती संग सहित विचारी ॥ षोडश कमल जीव मन वासा । एक सहस्र जाप प्रकाशा ॥ त्रैदल कमल भारथी वासा । सोतो उज्ज्वल कमल निवासा ॥ एक सहस्र जाप तहाँ कीजे । यह संकल्प जाय तहाँ दीजे ॥ दोय दल कमल हंस अस्थाना । तामह परम हंसको जाना ॥ एक सहस्र जाप प्रकाशा । कर्म भ्रमको है तहाँ नाशा ॥ सहस्रदलकमलमें झिलमिल जाना । ज्योति सरूप तहाँ पहिचाना ॥ ताहै रंगहै अलख अपारा । अलख पुर्ण है सबते सारा ॥
पञ्चमुद्रा
( १९१ )
नवै कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥ एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥ अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥ स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥ अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहीं पाऊँ ॥ अमी अखण्डते वर्ष धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥ निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥ दशयै घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥ निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजारा ॥ अमी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥ तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥ उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥ ह्दे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥ एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥ एतिक स्वासा ह्दे ले आवै । क्षिन बाहिर क्षिन भीतर धावै ॥ दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अधर धुन ताही ॥ सहस्र पखुरी कमल अन्ना । तहाँ बसे मन जीत सरूपा ॥ ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ विराजै ॥ तहाँ घरनी घरियार बजावे । घरी घरी टंकोरा लावै ॥ छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥ एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥ या विधि चार टँकोरा ठोकै । राहु केतु संग ब्यालि न रोकै ॥ पहर एक करे धुन पूरा । गृहण गिरासे शशि औ सूरा ॥ गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥ तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥ श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥
( १९२ )
बोधसागर
स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै॥ सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥ एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥ आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥ चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥ चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतें छाही ॥ प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥ सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥ प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥ सतयुग प्रथमहि घरी उत्पानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥ किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥ एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अछैकी छाहीं ॥ वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥ या युग अन्तकी आवे घरी । ग्रासे नागिन सनमुख खड़ी ॥ प्रथम किलकयुग होय संघारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥ सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥ जवे कमत युगकरे हंकारा । उत्पत थोरी बहुत संघारा ॥ कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥ एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखें ताही ॥ बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥ आवागवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥ तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥ युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥ युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥ तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥
पञ्चसुत्रा
( १५३ )
चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥ धासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥ युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥ ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥ सतयुग अंत होन नहिं पावै । युग कंकवत आन समावै ॥ युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥ युगकंकवत कालकी बाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥ युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों क्रोधा ॥ सतयुगअंत कंकवत माहीं । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥ युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥ अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥ चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥
साखी—एके युगके बीतते, चारों गये विनास ।
एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥
किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥ भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥ एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥ चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥ सतयुगको तब भयो विनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥ दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥ तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥ त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार विचारी ॥ जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥ जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥
नं. ८ कबीरसागर - ७