कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९४ )
बोधसागर
त्रेता युगमें कलह अपारा । यज्ञ दान व्रत नेम अचारा ॥ तेहि पीछे द्वापर युग आवा । काल अंत तब आन समावा ॥ अहंकार तामें अति भाखा । अब कलयुगकी वणों साखा ॥ काम क्रोध और पाप अपारा । लोभ मोह यम कीन्ह पसारा ॥ एक पहर चारों युग जाना । ताको वर्ण कहों बिछलाना ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण कहिये । ताते पिंडकी उत्पति लहिये ॥ अष्टधात कहिये अस्थूला । ताते रचो गर्भको मूला ॥ शिवकी श्वासा वायु सरूपा । सक्ती गहे जानके रूपा ॥ शिवको रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मो जावन देई ॥ जावन जगे तब सांचा माहीं । थाका होय रुधिरके ताहीं ॥ तेहि थाकाकी रचना भारी । तीन लोककी विभो सवारी ॥ महल मध्य पुनि जीव समावा । जलके भीतर महल बनावा ॥ महलके माहिं बनाये छजा । तामो दश कीन्हों दरवजा ॥ सांचा अन्न जरे नहिं कबहीं । पिंड सवारो अन्तर जबहीं ॥ सांचा माहिं दियो रंग ढारी । नख सिख शोभा बहुत सवांगी ॥ तीनों लोक रचो पलमाहीं । गढ़पति अंश तब साजा ताहीं ॥ प्रथमहि सायेर सात सँवारा । पर्वत आठ कीन्ह अधिकारा ॥ अठारह गंडा नदी बहाई । तामह गुप्त बहे ठहराई ॥ अठारह सहस्र बनाये नारा । अष्टधातुले साज सुधारा ॥ रक्त हांडको सब अस्थूला । बाढ़े लिंग सवांरे मूला ॥ आगे रचो दोह भुज देडा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥ बहुर सँवारो दोय पग खंभा । मदन महाबल उपजो रंभा ॥ नासा चढाय मस्तक पर लाई । सातभैंवर नौनाट लगाई ॥ उत्तर मेर शिर जो अस्थूला । सरवर माहिं कमल बहु फूला ॥ नाभी माहिं दल चार बनाई । फूल फल बास घट छाई ॥
पञ्चमुद्रा
( १९५ )
आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥ सोई अंग शक्त सोह ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥ नख सिरख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥ प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥ एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥ एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥ सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥ त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥ ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥ ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥ झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर झून्य एक घर फेरी ॥ खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥ रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥ मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥ खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥ खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहे नीर तरंगा ॥ सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुरतसनेह धनी तहैं दसैं ॥ खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥ सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥ तहां बसे सरयू तेहि साथ । रावल एक बयालिस हाथा ॥ काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अथर दीखे नहिं माथा ॥ बाढी नदी दोह विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥ तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥ खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारा ॥ मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥
( १९६ )
त्रिधसागर
त्रिकुटी संगम भयो मिलाना । भवर गुफा माधो करथाना ॥ त्रिवेणी तट बसे सुदंगा । ताको मम लखा परसंगा ॥ गणगंधर्व मुनि सब कर थाना । सुर नर मुनि कर बैठे ध्याना ॥ तैतिस कोट देव मुनि भारी । यक्ष यक्षणी देव कुमारी ॥ नागसुता अपसरा मोहिनी । चढ़ विमान सब फिरे जोहिनी ॥ असुरपिशाचऋषनागजोलाहल । त्रिवेणीतट करे कोलाहल ॥ तीनलोक जौ जीव निवासा । सो सब करो त्रिवेणी बासा ॥ त्रिवेणी तट माधौ देवा । सब मिल करे तासुकी सेवा ॥ ताहि प्राग होय चलो प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥ देश देश गंगा फिर आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बँधई ॥ जहां तहां तप ध्यान लगावै । योग यज्ञ तप बहुत करावै ॥ ऋतुबसंत प्रागको धावै । मकर नहाय बजार लगावै ॥ अर्ध उर्ध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥ गर्भमाहि सब युक्ति बनाई । तीन कचहरी तहां लगाई ॥ जहां नदी संगम पर्वाना । तहवां रचो एक अस्थाना ॥ संगम बीच गुफा एकधारा । ताहि गुफामों सात है द्वारा ॥ एकद्वार होय नाद सूधारे । एकद्वार होय रूप निहारे ॥ एकद्वार होय वास बसावै । एकद्वार होय अग्नि समावै ॥ एकद्वार हो स्वाद लिवाने । एकद्वार होय न्याय चुकावै ॥ एकद्वार होय नाद उचारा । योग जीव यह मता विचारा ॥ सातनाल चौदह सुरभाऊ । सातोंके हैं एक सुभाऊ ॥ सातो सात शून्य में बासा । सातो बसे गुफाके पास ॥ अनहद भेद श्वासाकी धारा । ताको भाषतहों व्यवहारा ॥
साखी-रचना भाषेउ पिंडकी, श्वासा सहित विचार । बिरलाजन कोई परखि है, अलखरूप व्यवहार ॥
पञ्चसुदृढा
( १९७ )
सुक्ति वचन-चौपाई
सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कहीं अन्तरयार्मी ॥ और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गीय न राषों ॥ हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥ आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥ ताको भेद कहों समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत् मम वानी । भिन्न भिन्न मैं कहों बखानी ॥ पाचघरी बांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥ दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥ आठ पहर पिंगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥ आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दोय रहै ॥ सोरह दिन पिंगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥ वीस रैयन दिन दहिनो पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥ एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दोय दिनमें हंस पयानो ॥ पांचघरी सुखमन जो हालै । पांचघरी मो हंसा चालै ॥ चन्द सूर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥ ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥
साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय । छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥ छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय । दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥ गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय । मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥ भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय । पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥
( १९८ )
बोधसागर
सुक्रित वचन चौपाई
सुक्रित कहे सुनो गुरु ज्ञानी । आगम पचै सब हम जानी ॥ और एक पूछौं गुरु तोही । भिन्न भिन्नके भाखौ मोही ॥ जीव ब्रह्म कैसे प्रगटाई । सबके उत्पत्त देहु बताई ॥ ताकर भेद गोंय जिन राखो । सत्य सत्य सब मोसो भाखो ॥
कौतुक
कौन सो मन है कौन पवन है कौन शब्द है भाई । कौन प्रान है कौन हंस है कौन ब्रह्म ठहराई ॥ कौन काल है कौन जीव है कौन शून्य पहिचानी । कौन शिव है कौन निरंजन कहो सकल उत्पानी ॥
योगजीत वचन
चंचल मन है श्वास पवन है शब्द शून्य पहिचानी । प्राण निरंतर अखल ब्रह्म है सोहंग हंस बखानी ॥ कारण काल शून्य अविनाशी जीव कर्म पहिचानी । जीव शक्ति करतार निरंजन ऐसा भेद बखानी ॥
सुक्रित वचन
मन कहाँ रहे पवन कहाँ वासा शब्द वास कहैं कीन्ह । कहाँ प्रान कहैं ब्रह्म वास है हंस कहाँ है लीन्ह ॥ कारण काल केहि ठोर बसत है कहाँ शून्य ठहराई । जीव शीव निरंजन वासा सो मोहि देहु बताई ॥
योगजीत वचन
हृदे मन है नाभि पवन है अनहद शब्द को वासा । निरन्तर प्राण ब्रह्म ब्रह्मण्डे गगन हंस पर्काशा ॥ सकलमें काल शीव चंदामें शून्य निरूपम माही । सुखमन मध्य निरंजन वासा योगी देखे ताही ॥
पञ्चमुद्रा
( १९९ )
सुक्ति वचन
इन्द्री नाभी तब नाहीं स्वामी पवन कहा तब बासा । जादिन अनहद रूप नहीं तब शब्द कहाँ पकीशा ॥ ब्रह्मांड ना तो तब ब्रह्म कहाँ तो गगन नहीं कहाँ हंसा । निरूपम विना शून्य कहाँ कहिये भेद कहौं प्रकाशा ॥ आकार नहीं तब जीव कहाँ तो चन्द नहीं तब शीऊ । सुखमन नहीं तब कहाँ निरंजन ससुझाय कहो सब भेऊ ॥
योगजीत वचन
इंद्री विन मन हतो निरूपम निराकारमें प्रवना । अलख रूपमें शब्द बासतो अविगतिमें तब प्राना ॥ अविनाशीमें हंसबास तो शून्य कालमें बासा । ऊँकारमें काल बास तो ऐसा भेद प्रकाशा ॥ जीव शीवमें प्रथमो बासा शीव निरंजन माहीं । सबको बास प्रकट कर भाखों भेद कहैं तुम पाहीं ॥
सुक्ति वचन
कहाँते उत्पत भयो निरंजन कहाँ शीव उत्पानी । काल जीव कहाँते प्रकटो शून्य भयो केहि खानी ॥ कहाँते उत्पत भये अविनाशी कहाँते उत्पन हंसा । कहाँते उत्पन ब्रह्मभयो है प्राण भयो कह अंशा ॥ शब्द पवन मन कहाँते उत्पन कहाँते प्रकटो जीऊ । सबके उत्पन मोसों भाखों केहिबिधि प्रकटो शीऊ ॥
योगजीत वचन
आदि ब्रह्मते भयो निरंजन तहाँते प्रकटो शीऊ । तौन भेद तुमसों कहो सुक्ति शिवते उपजो जीऊ ॥ जीवते उत्पत काल भयो है कालते भयो ओँकारा । ओँकारते शून्य भयो है शून्यते जोत प्रकारा ॥
( २०० )
बोधसागर
जोत ब्रह्मते सब प्रकारा अगम भेदको कहो विचारा । अखंड रूपते भयो अविनाशी अविनाशी ते हंसा ॥ शब्दते उत्पत्त पवनकी है पवनते स्वांसा अंशा ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
अन्तकाल जब आवे भाई । तन छूटे मन कहाँ समाई ॥ पवन शब्द हंसा कहाँ सिधाई । अन्तकाल कहवां ठहराई ॥ कालशून्य तब कहा समैहै । जीव शीव कहवां चल जैहै ॥ अन्त निरंजन कहो समाई । ताको भेद कहौ समुझाई ॥
योगजीत वचन
तन छूटे मन जोत समाई । पवन श्वांसमें तब खप जाई ॥ प्राण समय शब्दके माहीं । हंस ब्रह्ममें तब खपजाहीं ॥ अविनाशी शिवमाहे समाई । ब्रह्म अलखमें तब खप जाई ॥ अलख अनुपमों जाय समाना । अन्त प्रलैको भेद बखाना ॥ उत्पत्त सकल भाष हम दीना । ताको भेद लखो पवीना ॥ सत्य सत्य यह बानी जानो । आदि वचन यह तुम निर्वानो ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
हे समर्थ मैं तुम बलिहारी । खोल भेद अब कहौं बिसारी ॥ केता प्रवान लोक अस्थाना । ताको भेद कहौं निर्वाना ॥ संख्या योजन ताकी भाखो । ताकर भेद गोय जनि राखो ॥ कहाँ कौन सो पुरी रहाई । कौन अंश तहाँ आसन लाई ॥
साखी-सब उत्पत्त तुम भाषिया, भेद कहेउ समुझाय । अब मन मो निश्चय भई, आगम भेद लखाय ॥
योगजीत वचन
साखी-योजनकी मरजाद बहु, आगे जो पवीन । अंशसहित अब भाखेल, तिनको नाम बखान ॥
पञ्चमुद्रा
( २०१ )
चौपाई
अब मैं कहौ लोककी बानी । निरगुण भेद कहौ बिलछानी ॥ प्रथमहि कुम्भ रूप औतारा । पीछे सकल सृष्टि विस्तारा ॥ योजनकोट एक सुख कहिये । कोट पचास पीठ तेहि लहिये ॥ एक कोटको मस्तक जाना । कोटकोटके अन्त बखाना ॥ एक कोटपर नेत्र बताई । सोरा माथ चौसठ हाथ पाई ॥ पृथी ते दून कुम्भ है भाई । पूरबदिशि सुख बरन भुनाई ॥ उंचास कोट पृथ्वी पर्वाणा । ताके तरे कुम्भ अस्थाना ॥ बहुर अष्ट दिगपाल बखाना । कुम्भ पीठपर है अस्थाना ॥ चौसठ पुंडरीक तहां कहिये । बावन लक्षको मस्तक लहिये ॥ छयकोट ऊचे प्रमाना । कुम्भ पीठपर कीन्हों थाना ॥ ऊपर कुम्भ शेषको जाना । पंद्रह कोट ताहि प्रवाना ॥ तहां वासुककी बैठक कहिये । और वराहु तासुपर लहिये ॥ ताकी डाढ़ पृथी ठहराई । राई प्रवानसो दीखे भाई ॥ पर्वत अष्टपृथी पर जाना । मध्यपृथी सुमेर बखाना ॥ सोरह सहस्र नीचे बधाना । एता योजन तरे समाना ॥ बीस सहस्र योजन चौरासी । चार दिशा तेहि फेर रहासी ॥ चौरासी सहस्र योजन प्रवाना । इतना ऊँच सुमेर बखाना ॥ तापर चारपुरी हैं भाई । अमरपुरी पुन तहां बनाई ॥ तहां इंद्र सुखराज कराई । तीन देव अस्थान बताई ॥ तैत्तिस कोट देवता जाना । अठासी सहस्र ऋषि प्रवाना ॥ तहां कुबेर भंडारी कहिये । अलकापुरी नामसो लहिये ॥ नौ पदुम नील अठतालिस । चौत्तिस पर्व अर्ब उनतालिस ॥ सतावन कोट कहौ प्रवाना । पैंसठ लाख कहो बंधाना ॥ पञ्चानवे सहस्र और तहां कहिये । पचास एकसो योजन लहिये ॥
( २०२ )
बोधसागर
एता योजन कहो प्रमाना । पृथ्वी अकाशको अन्तर जाना ॥ एता स्याम अंड पहिचानी । आगे और अबलोक बखानी ॥ पृथीते लक्ष योजन बंधाना । तहवां सूरज देवको अस्थाना ॥ सूरजते चन्दलोक है भाई । योजन लक्ष आगे चल जाई ॥ चन्दलोकते आगे जाना । योजन लक्ष नक्षत्र बखाना ॥ योजन लक्ष आगे चलजाई । ताके आगे भौम बताई ॥ भौमके आगे बुध अस्थाना । योजन लक्ष आगे प्रवाना ॥ बुधके आगे गुरु पहिचानो । योजन लक्षमें ताहि बखानो ॥ गुरुके आगे शुक्र बताई । योजन लक्ष कहों ठहराई ॥ शुक्रके आगे शनिको जाना । लक्ष योजन आगे पहिचाना ॥ शनिके आगे अदित बखाना । योजन लक्ष कहो प्रवाना ॥ तेहिके आगे सोम कहीजै । सोमके आगे राहु लहीजै ॥ राहु केतु लोक अस्थाना । योजन लक्ष आगे बंधाना ॥ तहाँते लक्ष योजन प्रवाना । तहवां सप्तऋषीश्वर जाना ॥ तेरह लक्ष ऋषिन सो भाई । आगे विधिको लोक बताई ॥ तहाँते लक्षयोजन बंधाना । महाविष्णु आगे पर्वाणा ॥ श्रीनारायण बैठे जहँवा । सूवा ऊपर पालंग तहँवा ॥ पग अगुष्ट मुख दीन्हों सोई । बालरूप तहाँ कीन्हों जोई ॥ तहाँते गौलोक कहावे भाई । राधा सती तहाँते आई ॥ सोई नाम अर्चित कहावे । सच्चिदानन्द ताहि गोहरावे ॥ इहालंग सगुणरूप बतलाई । यही चारों वेदन गुन गाई ॥ आगेको कछु भेद न पाई । इहालंग सबही मिल गोहराई ॥ तैंतिसकोट इहालंग गावै । आगेका कछु भेद न पावै ॥ चारमुक्तका कहे बखाना । यही रूपको करे पर्वाणा ॥ बहुते तेज उहालंग जाई । प्रले समै नाश होय भाई ॥
पञ्चसुत्रा
( २०३ )
नौ औतार देहधर आवा । सो अचितके अंश कहावा ॥ जहाँलग अंश सकल पुन देखा । तहाँलग मायारूप विशेषा ॥ आगे अक्ष लोक है भाई । तहाँ गये फिर बहुरि न आई ॥
साखी-इहाँलग सरगुण रूप है, सो हम दीन्ह लखाय । जग नहि जानत तासको, निरगुणके कोधौँ आह ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
हो समर्थ तुम अगम अपारा । तुम हो निरगुणके औतारा ॥ अब आगेको भेद बताई । लोक पुर्ष सब वर्ण सुनाई ॥ जहवाँ हंस जाव ठहराई । बहुर नहीं प्रलैतर आई ॥ ताकर भेद कहो समुझाई । अगम निगम सब वर्ण सुनाई ॥
साखी-सतगुरु भाषो आदिते, लोकन को पर्वान । केता अन्तर ताहिको, पुर्ष भेद निरवान ॥
योगजीत वचन--चौपाई
हेसुक्ति मैं कहां बखानी । वणौ अगम निगमकी बानी ॥ अचितलोकमें दीन्ह बताई । लोकालोक सब वर्ण सुनाई ॥ अब भाषों निरगुणको लेखा । योजन संख्या लोक विशेषा ॥ अचितके आगे लोक बखानो । तीनअंशख योजन पहिचानो ॥ सोहंगलोक तहाँ है भाई । आठ अंश तिनते उपजाई ॥ सोहंग पुरुष है अगम अपारा । जगर मगर जहाँ हैउजियारा ॥ सोहंग पुर्षके आगे जाना । मूल नाम तहाँ पुर्ष बखाना ॥ पांच असंख योजन प्रमाना । तहवाँ मूलनाम बंधाना ॥ मूलनाम तहं आमन कीन्हा । आदि पुर्षके अंश जो चीन्हा ॥ मूलपुर्ष है अगम निसानी । तास भेद मैं कहां बखानी ॥ मूलपुर्ष ते आगे जाना । अंकुर नाम तहाँ पुर्ष बखाना ॥ तीन असंख आगे है भाई । अंकुरनाम तहाँ पुरुष रहाई ॥
( २०४ )
बोधसागर
ताको उग्रलोक है भाई । तहां अंकूर उदित रहाई ॥ अंकूरलोकते आगे जाना । इक्ष नाम तहां पुर्ष बखाना ॥ चार असंख योजन प्रमानी । इक्ष्या पुर्ष तहां रजधानी ॥ सोई पुर्ष कर्ता होयं आवा । आदपुर्षके अंश कहावा ॥ प्रथम पुर्षकी इक्ष्या आई । ताते इक्ष्या नाम कहाई ॥ ताहि पुर्षको कहां ठिकाना । है सुकित तुम सत्तही माना ॥ इक्ष्या आगे लोक बखानो । सोतो अंश पुर्षको जानो ॥ नौ नील एक संख बखाना । बानी नाम पुर्ष स्थाना ॥ पुर्ष प्रथम बानी उच्चार । ताते नाम सर्व आकारा ॥ ताहि पुर्षको भेद बताई । एतो आद पुर्ष हैं भाई ॥ बानी नामते आगे जाना । सहजनाम तहां पुर्ष बखाना ॥ दशलाख एकशंख बखाना । सहज पुर्षको तहां अस्थाना ॥ तहवां सहज पुर्ष है भाई । आदिपुर्षके अंश कहाई ॥ सातपुर्ष इहांलग जाना । निरंजन अक्षर नीचे थाना ॥ अचितसौ अक्षर उपजे भाई । निरंजन अंश अक्षरते आई ॥
साखी-निरंजन और सहजलों, नौ पुर्ष प्रमान । आदिपुर्ष आगे कहां, जितने सब उत्पान ॥
सहज अंशलग जैतिक भाषा । सो रचना परलयतर राषा ॥ इहांलग प्रलैको प्रमाना । आगे अक्षैलोक अस्थाना ॥ सहज पुर्षते आगे जाई । आदिपुर्षको लोक दिखाई ॥ सहजते एक असंख प्रवाना । तहवां आदिपुर्ष निरबाना ॥ तहँवा प्रलैकालकी छाया । नहीं तहां कछु मोह और माया ॥ तहां न तीनों गुनका भेषा । ब्रह्मा विष्णु तहां न महेशा ॥ नहीं तहां जोत निरंजन राई । अक्षर अचित तहां नहि जाई ॥ तहां नहीं शिवशक्ती औतारा । नहीं तहां अक्षर ओकारा ॥
पञ्चमुद्रा
( २०५ )
ब्रह्मजीव नहीं तत्त्वकी छाया । नहिं तहैं दशइंद्री निरमाया ॥ काम क्रोध मद लोभ न कोई । तहवां हर्ष सोग नहिं दोई ॥ नादबिंदको तहां न पानी । नहीं तहैं सृष्टि चौरासी जानी ॥ चंद सूर तारागण नाही । नहीं तहैं दिवस रैनकी छाहीं ॥ ज्ञान ध्यानको तहां न लेषा । पाप पुण्य तहवां नहीं देषा ॥ डार मूल तहां वृक्ष न छाया । जीव सीव तहांकालन काया ॥ पवन न पानी पुरुष न नारी । हृद अनहृद तहां नहीं विचारी ॥ यंत्र मंत्र तहां दरद न धोखा । नर्क स्वर्ग संशय नहिं शोका ॥ श्वेत पीत सबज नहीं लाला । मोर सोर नहीं वृद्ध ना बाला ॥ पिंड ब्रह्मांडको तहां न लेखा । लोक अलोक तहां नहीं देखा ॥ मन औ वृद्ध पवन नहीं जाना । रचना बाहिरसो अस्थाना ॥ आदि पुरुषको है तहां थाना । यह चरित्र एकौ नहीं जाना ॥ हे सुकृत मैं तुम्है लखावा । निरगुणरूप वर्ण दर्शावा ॥
सुकृत वचन
हो सतगुरु तुम आगम भाषा । वर्णैउ पेड़ पत्र अरु शाखा ॥ अब तुम कहो पुरुषको रूप । कैसी कला हे कौन स्वरूपा ॥ लोक प्रकाशको भेद बतावो । लोक प्रमान मोहि समुझावो ॥ यामैं कछु न राखो गोई । है समर्थ अब भाषो सोई ॥
सार्वी—आदि पुरुषके रूपको, कहो भेद समुझाय ।
लोक प्रमान मरजाद सब सो मोहि देहु बताय ॥
योगजीत वचन—चौपाई
प्रथम पुरुषको रूप बखानो । सो तुम रूप हृदयमें आनो ॥ पुर्षअंग छबि वर्ण सुनाई । गुप्त भेद मैं तोहि लखाई ॥ पुरुष शोभा अगम अपारा । ताको को अब बरणे पारा ॥ कोट अनन्त योजन लौ काया । कहाँ लग कहों तासुकी छाया ॥
( २०६ )
बोधसागर
कछु संक्षेप मैं देऊँ बताईं । कहाँ कहीं कछु वर्णि न जाईं ॥ कोटि कल्प युगजाय सिराईं । मुख अनन्तसो वर्णि न जाईं ॥ ये कछु सूक्ष्म रूप लखाऊँ । कछु कछु शोभा वर्णि सुनाऊँ ॥ अब मस्तकको बणों भेषा । मानों अनंत भानु शशिलेखा ॥ जगर मगर मस्तक उजियारा । वर्णत बने न रूप अपारा ॥ अब नेत्रनको कहीं प्रमाना । मानो अनन्त भान शशि जाना ॥ जिमि कोटिन दामिन लपटानी । जोत अनंतनकी जिमि खानी ॥ वर्णत बने न ताको रंगा । कहाँलग कहीं तास प्रसंगा ॥ नासारूप कहीं प्रचंडा । मानो अन्न अनन्त ब्रह्मंडा ॥ पोहप बास तहांति प्रकटाईं । ब्राण अनंत योजन लग जाईं ॥ श्रवणरूप मैं कहीं बखानी । अनंत सिंध मानो समानी ॥ ता मह कमल अनन्तन फूला । साखा पत्र डार नहीं मूला ॥ ताको शोभा वर्णि न जाईं । कमल रूप तहां अधिक सुहाईं ॥ अब मुख शोभा कहीं बखानी । पिंड ब्रह्मांड तेहिमाहिसमानी ॥ नौ शून्य जहां लग बासा । सो मुख भीतर कीन्ह निवासा ॥ लोक अनंत देखिये ताही । सर्वाकार रूप है जाही ॥ पुर्ररूपका बणों भाईं । वर्णत बने न होय दिठाईं ॥ पुरुष शोभा अगम अपारा । मुख अनंत नहीं पावे पारा ॥ चिकुर शोभा कहीं बुझाईं । कोटिन रवि शशि रोम लजाईं ॥ कोटिन चंद सूर प्रकाशा । एक एक रोम अनन्तन भासा ॥ पुरुष अंगका करौ बखाना । रचना कोट तासुमों जाना ॥ श्वेत अकार पुरुषको अंगा । फटकबर्ण देहीको रंगा ॥ शब्द स्वरूप पुरुष है भाईं । वणों कहा वर्ण नहीं जाईं ॥ जहां लग जीव बुन्द है भाईं । ताकर भेद कहीं समुझाईं ॥ जीव अनन्त बुन्द सम जानो । अमी सिन्धु पुरुष पहिचानो ॥
पञ्चसुत्रा
( २०७ )
यह प्रमान पुर्षको जाना । सो अब तनमों कहों बखाना ॥ सूक्षिम रूप गगनमों वासा । ताहि रूपको कहों प्रकासा ॥ तनभोरूप जो सूक्षिम जानो । सोई रूप बाहिर पहिचानो ॥ जो भीतर सो बाहिर कहिये । एकप्रमाण रूपसो लहिये ॥
साखी-बारूके दशअंश कर, ताकर बिस्वा बीश ।
ताहूते सूक्षिम कहो, इम प्रकटो जगदीश ॥
लोक समानो पुर्षमो, पुर्षहि लोक समान ।
पुर्ष निरंतर लोक है, लोक पुर्षमो जान ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । सर्व भेद तुम कही विचारी ॥
अब प्रभु कहो ध्यानको लेखा । जेहिते रूपहि पुर्षको देखा ॥
ताको नाम मंत्र उपदेसा । सो सत्गुरु अब कहो सँदेसा ॥
सोई मंत्र गुरु देहु बताई । जाके बल हँसा घर जाई ॥
करनी योगकी रहनी आशा । हँसा करे लोकमों वासा ॥
सोई नाम गुरु देहु बताई । मेरो हंस लेहु मुक्ताई ॥
और रहनी हँसनकी भाखो । मोसों गोय कछू जनि राखो ॥
कौन नेहते हँस कहाई । कौन नेहते लोक समाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत्य मम बानी । जैसी रहन हंस पहिचानी ॥
तास रहन अब वर्ण सुनाऊँ । नेह प्रेमकी उक्त लखाऊँ ॥
जैसे सीप स्वात करे नेहा । लागी प्रीत भूल निज देहा ॥
जैसे त्रिया पुर्षको चाहै । या विधि संत ध्यान औगाहै ॥
जैसे चात्रिक बुंद पुकारा । सोई लगन संत अधिकारा ॥
जैसे बासको भँवर लोभाई । योजन एक तहां उड़ जाई ॥
जैसे चंद चकोर हुलासा । ऐसे संत पुर्षको आसा ॥
( २०८ )
त्रोधसागर
जैसे लोहा चुंबक लग जाई । तैसे संत ध्यान लपटाई ॥ जैसे कनिका कपूरको धावै । ऐसे प्रीत संत लवलवावै ॥ जैसे पतंग दीपकको धावै । ऐसे संत ध्यान लपटावै ॥ जैसे नेह बारि औ मीना । ऐसे संत नाम लवलौना ॥ जैसे बाल बहिन महतारी । ऐसे लगन तहां संत विचारी ॥ ऐसे प्रीत करे जो कोई । सत्यपुर्णको पावै सोई ॥ ऐसे प्रीत गगन मन लावै । गुरुप्रतापते दर्शन पावै ॥ और रहन मैं देऊँ बताई । जाते बेग पुर्ण दर्शाई ॥ आपामेट आप दर्शाई । प्रेमसिंधुमें जाइ समाई ॥ बिरहरूप करुणा अधिकारी । लागी ज्वाल निरन्तर भारी ॥ जगसों नेह झूठ करजाना । मनसो सब जग मिथ्या माना ॥
साखी-मनसों त्यागे जत्तको, जान विषयकी खान । सुकित अब मैं भाषेऊँ, राजस योग प्रमान ॥ कायासों कारज करे, सकल काजकी रीत । कर्म भय सब मेटके, सत्त नामसों प्रीत ॥
अब सुन ब्रह्म ज्ञानकी वानी । ताकर रीति लेहु पहिचानी ॥ एके ब्रह्म सकल घट देखा । ऊँच नीच काहु नहिं पेखा ॥ शत्रु मित्र एक कर जानै । पाप पुण्यको भेद न आनै ॥ करै कर्म पुरुष परिवारे । अपनो करतब मन नहिं धारे ॥ सब कछु करे पुर्ण रे भाई । अपनो शीस ना भार चढाई ॥ सुख औ दुःख एककर जाने । इनको भाव मिथ्यापहिचाने ॥ झूठ वचन नहिं जीव सतावै । दया भाव सबही सो लावै ॥ इंद्रीस्वाद स्वप्न कर जाने । रूप कुरूप नाम मनो आनै ॥ वाद विवाद न जाने प्राणी । हार जीत एक समय पहिचानी ॥ उत्तम मध्यम मर्म न जाने । कर्तारूप सकल पहिचानै ॥
पञ्चसुन्दरी
( २०५ )
जात वर्ण नाहीं कछु मानै । चार अंग एक दृष्टि समानै ॥ जहां लग दृष्टिपरे जो कोई । इच्छा पुर्ष जानिये सोई ॥ सोवत जागत लखे अकारा । तहांलग कर्तारूप निहाग ॥ वारखान धरती असमाना । सो सब कर्ता माहि समाना ॥ जलथल ससदीप नौखण्डा । लोक अलोक सकल ब्रह्मण्डा ॥ गुप्तप्रकट जहांलग आकारा । सो सब कर्ता बीच निहारा ॥ भिन्नभाव कछु दृष्टि न आवै । सोई ब्रह्म ज्ञान कहलावै ॥
साखी-कर्तारूप विचारिये, जहांलग सकल अकार । इच्छा द्वैत विनास होय, रहो एक करतार ॥ प्रथमहि अविगत ब्रह्म है, तिनते ब्रह्म अनेक । सकल बुंद सिंधुहि मिलै, बहुर एकको एक ॥ द्वैत रूपको ध्यानमो, कारज लहे न कोय । आदि पुर्ष चीन्हे बिना, मुक्त कौन विध होय ॥ सुकित सुनौ सुजान, अक्षे नाम चीन्हे बिना । यमघर करे पयान, युगनयुगन भर्मत फिरे ॥ तैतिस कोट बखाना, सकल देव अब भाषिया । तिनमों तीन प्रमान, जीव सकल विस्तार है ॥ युगप्रति तन धरधर मरे, मायाको व्यवहार । अंतकाल सबको भषे, इनते पुर्ष निनार ॥ आदि पुर्ष बैठे जहां, अविगतरूप अनाद । रचनाते बाहिर रहै, तिनको भेद अगाध ॥ महाविष्णु गोलोकके, और अर्चित बखान । राा ममा जोत मह, ताको करे प्रवान ॥ पिंडमहीं ब्रह्मंड औ, नहीं लोक आकार । अनंत लोकते भिन्न है, सुकित करो विचार ॥
( २१० )
बोधसागर
निरगुण मो मन लीन रहु, करे जीव गतनाश । बहुर काल बश ना परे; अजर अमाघर बास ॥ जिन संतनको यह मता, बरनत बने न मोहि । तिन पटतर का दीजिये, कहि समुझाऊं तोहि ॥ संतकोट वारो जहाँ, ज्ञानी लक्ष अनेक । जो निरगुनमें रत सदा, सो अनंतमें एक ॥
सुक्ति बचन--चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । संतन महिमा कहो विचारी ॥ संतरूप कैसे पहिचानी । महिमा तासु कौन विधि जानी ॥ कैसे भेद तासको पावै । कैसे परम संत बस आवै ॥ और संत एक देहु बताई । तुमको आहु कहाँते आई ॥
योगजीत बचन
हो सुक्ति मैं कहों बखाना । तुमसों भेद कहों निर्बाना ॥ अपनी उत्पत्त देहु बताई । तुम्है भेद कछु नाहे दुराई ॥ आदि भेद अब कहों बुझाई । तुम सुक्ति सुनियो चितलाई ॥ प्रथमहि पुर्ष आप निबाना । तब नहि रचना अश बखाना ॥ जबै पुर्ष मन इच्छा आई । षोडश अंश तबै उपजाई ॥ चौदह सुत तहाँ रहे छिपाई । तिनको भेद कोई नहीं पाई ॥ सक्त निरंजन तब उपराजा । जिन सब कियो मृष्टिको साजा ॥ तिनसों त्रिगुनरूप प्रकटाया । जिनसों भई सबनकी काया ॥ तिन पुन चारों वेद बखाना । तामें जीव सबे लपटाना ॥ चारखान तब प्रकट कीन्हा । तेहिमें फाँस जक्त सब लीन्हा ॥ फिर पुत चउदह यम उपराजा । तब चौरासी कीन्ह समाजा ॥ तीरथ व्रत औ नेम अचारा । दान पुण्य जप मंत्र विचारा ॥ इतना करे जगतमें कोई । यमकी त्रास न छूटे सोई ॥
पञ्चमुद्रा
( २११ )
यामह सकल जीव उरझाई । अंतकाल पुन धरधर खाई ॥ स्वर्गलोकमह जो चले गयेऊ । तेतो आके देह फिर धरेऊ ॥ तेहुना यमकी छूटे त्रासा । भांत अनेक जीवनको फाँसा ॥ जबै पुर्ष अस देखेउ भावा । सत्तपुर्ष एक रुयाल बनावा ॥ सत्तपुर्ष इच्छा उपजाई । पुहुप नाम तब अंश बनाई ॥ तिन्है पुर्ष अस आहा कीन्हा । भौसागरको आयसु दीन्हा ॥
साखी-पोहोप नाम तबही चले, पुर्षहि शीस नवाय ।
भौसागरमों प्रकटभो, अबिगत रूपबनाय ॥
चौराई
अबिगतरूप छांड हम दीन्हा । संत स्वरूप भेष गहि लीन्हा ॥ शब्दस्वरूप बनाये सोई । तिनकी देहन छाया होई ॥ पाँच तत्त्व तीनोंगुन नाही । धरी देह तब बसत युगमाहीं ॥ सत्तनाम हम नाम धरावा । सब जीवनको संध लखावा ॥ या विध अजदेह धर लीन्हा । सबको आय सिखावन दीन्हा ॥ तब पुन जगमों संध लखाई । निरगुन मता सबै समुझाई ॥ जो जिव संध शब्दकी पाई । जीव असंखन लोक पठाई ॥ प्रथमहि सतयुगमैं हम आये । सत्त नाम तब नाम धराये ॥ तब हम जीव असंखन तारे । यमको मार तब जीव उबारे ॥ त्रेतामाहि बहुर हम आये । मुनिकह बोध मुनींद्र कहाये ॥ कोटिन जीवको संध लखाये । एतिक जीवको तब मुक्ताये ॥ तीजे फिर द्वापरयुग आई । मुनि करुनामे नाम धराई ॥ कोटिन जीव तबै हम तारे । महाकालते जीव उबारे ॥ फिर कलियुगको आयेउ भाई । योग जीत तब नाम धराई ॥ कालहिं जीत हंस मुक्ताये । सत्य शब्दकी संध लखाये ॥ जीव असंखन तारेउं आई । सत्तपुर्षकी दर्श कराई ॥
( २१२ )
बोधसागर
सारखी-चारो युग हम आइया, कीन्हेउ हंस उबार ॥
कलयुग नाम बखानऊँ, योग जीत उच्चार ॥
चौपाई
सुकृत सुनो भेद निर्वाना । अपनी उतपत कहा बखाना ॥ अब संतनको कहाँ संदेशा । जेहि विध लखोतासको भेसा ॥ तिनकी रहन अब देउँ बताई । जाते तुमही संत लखाई ॥ निरगुण चाल चले पुनसोई । सोई संत शिरोमणि होई ॥ तीरथव्रत औ नेम अचारा । इतने रहैं संतसो न्यारा ॥ दानपुण्य जगवतैं धर्मा । एतो जक्त जानिये कर्मा ॥ पूजा जाप ना दुतिया राखै । सत्तनाम हदे अभिलाखै ॥ तैंतीसकोट देवगण भारी । ये सब माया रूप निहारी ॥ दुतिया ध्यान अनित्य विचारै । अक्षै नाम हदेमों धारै ॥ सोई निरगुण संत कहाई । ताकी परख मैं देऊँ बताई ॥ रहे विरक्त होय जगमों सोई । विरही संत सोइ पुन होई ॥
सारखी-यह तो विस्वा धर्म है, दुतिया जप तप ध्यान ।
पतिव्रता इनमों नहीं, मगके रोरा जान ॥
अक्षय नामको गहि रहे, तजे द्वैतके आस ।
सत्तपुर्षको पावई, पूरण पर्म विलास ॥
रहो एकता चित्तमों, दुतिया उसको जान ।
गगनमगन निशिदिन रहै, निरगुणसो पहिचान ॥
चौपाई
सुकृत सुनो ज्ञान अब सोई । निरगुण संत कैसे बसहोई ॥
प्रथम संतको पावे जाही । प्रेम प्रीत तब कीजे ताही ॥
करे बंदगी शीस नवाई । निज गृह तबे ताहि लैजाई ॥
चंदन घसे धामको छावै । तापर बस्तर श्वेत बिछावै ॥
पञ्चमुद्रा
( २१३ )
चरन परवार चरनारज लीजै । बहुत भांतसो भोजन दीजै ॥ महाप्रसाद तासुको लीजै । पीछे औपुन पूजा कीजै ॥ प्रथम बंदगी कायक जाना । मायक बायक फिर पहिचाना ॥ तीनों बंदगी करे बनाई । अनेक भांतिसो ताहे रिझाई ॥ द्रव्य देनको लोभ न कीजै । चरन तरे ताहि धरदीजै ॥ अष्टधातको काया जाना । सो उद्धार कैसे पहिचाना ॥ काया भार उतारके लीजै । चउदह रतन तब गुरुको दीजै ॥ आरती करे बहुभांत बनाई । काया भार तब ताको जाई ॥ यहविध भक्त करो चितलाई । यमको डंड छूट तब जाई ॥
साखी—आरती कीजै पुष्पको, बहुत दीनता लाय ।
कागाते हँसा भयो, सत्त भक्तको पाय ॥
इतनी प्रीत संत जब जाना । तबे संतसो निज मत ठाना ॥ क्रिया करै तबहीमुख बोलै । तबे संत दिल पर्दा खोलै ॥ तबे बस्तु निज देहि लखाई । तासो हंस समाध लगाई ॥ सोई करनी कछुदिन करई । आदिब्रह्म अंतर लख परई ॥ पुर्णलोकमें रहे समाई । तबही बुंद सिंध मिलजाई ॥ इतना खोज करे पुन जबही । अजर अमर घर पावे तबही ॥ निरगुण संतको भेद बतायो । निजमत खोलमें तुम्हैं लखायो ॥ अब एक आगम तुमसों भाषों । सुकृत गोय कछू नहिं राषों ॥
साखी—निरगुणको औतार है, सो प्रकटे जग आय ।
ऋषिमुनि ताको ना लखे, गुप्तसो रहो छिपाय ॥
ताको भेद अब देहुँ बताई । संत रूपसौ जगमें आई ॥ बालक होय पुन जगमें आवै । कमलपत्र पर आसन लावै ॥ निरूनाम जुलहा कहाई । भक्तेहत ताके गृह जाई ॥ खान पान कछु करि हैं नाहीं । दिनदिन अंग बढ़त पुन जाहीं ॥