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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

आगमनिगमबोध

( ७३ )

बहुरि पौनको लेहु उठाई । अनहद चक्र भेदिके जाई ॥ प्रान अपान समाना, तीनों । कण्ठमें तिनहि मेलि तब दीनो ॥ चक्र विशुद्ध कण्ठके माही । षोडश दल है कमल तहाँही ॥ योग लंबिका ताहित करना । दूध अधार ते काया धरना ॥ सूक्ष्म बोलते कार्य कीजै । पुनि तब ऐसी उक्ति गहीजै ॥ जीभके हेटकी नस जो सगरो । मस्का संधो लोनसे रगरो ॥ जीभ दुहन पुनि प्रातहि काला । या विधि रसना करो विशाला ॥ ऐसी अपनी जीभ बढावै । ऊर्ध्व द्वारमें ताहि लगावै ॥ जरमें अमृत चूवै जोई । ताको पान करे तब सोई ॥ पीअत अमृत जागी देहा । योग लंबिका सिद्ध भो येहा ॥ बहुरि विशुद्ध चक्रकी भाना । आगेको तब करे पयाना ॥ अग्नि चक्र है त्रिकुटी थाना । द्वै दल कमल तासु परमाना ॥ ताहि तनेती किया कराई । बत्ती निज नासिका चलाई ॥ नाक शुद्ध करि बत्ती कीता । मूर्द्धा शुद्ध भो ज्ञान गहीता ॥ पुनि उद्यान महा सुख पावै । बहुरि कण्ठते पौन उठावै ॥ चक्र विशुद्ध भेद जब लावै । अग्नि चक्रमें वायू लावै ॥ तिहि औसर जिह्वा लेजाई । ऊरध द्वारे माह लगाई ॥ बन्द करे तब ऊरध द्वारा । अग्नी चक्र भेदि हो पारा ॥ चलि ब्रह्माण्ड श्वास लय होई । कुंभक करिके तनु शिथलोई ॥ काम अरु क्रोध लोभ मोहानी । तब इन सबकी सेन परानी ॥ कर ब्रह्माण्डमें योगी वासा । जबहि चढायो गगनमें श्वासा ॥ जहँ नहि द्यौस नहीं जहँ राती । नहि सूरज शशि उडुगणपाती ॥ तहँ सुषुमना वेधि ब्रह्माण्डा । गडा जाय योगीके झण्डा ॥ जब ब्रह्माण्डमें माहरम जाई । सङ्गी साथी सकल पराई ॥ सङ्गी साथी जब रहि गयऊ । निर्विकल्प योगी तब भयऊ ॥

इति षट्चक्र

( ७४ )

बोधसागर

अथ दो प्रकारकी समाधि वर्णन--चौपाई

दोय प्रकार समाधि कहीजै । सविकल्पो निर्विलप गनीजै ॥ जो सविकल्प समाधि कहावै । ज्ञाता ज्ञान ज्ञेययुत ध्यावै ॥ त्रिपुटी भान सहित जब सोई । ब्रह्म बीच वृत्ती लय होई ॥ सा सविकल्प समाधि कहावे । निर्विकल्पको अब कहि गावे ॥ त्रिपुटी भानु रहित वृत्ती जब । ब्रह्मानन्द हो निर्विकल्प तब ॥ जो सब कल्पको साधना जाने । निर्विकल्प फल तासु बखाने ॥ निर्विकल्प सूखो पति दोई । यतनो भेद दोहूमें होई ॥ निर्विकल्पमें ब्रह्मा नन्दा । सुषुप्तितमें अज्ञानको फन्दा ॥ निर्विकल्पमें चार हैं बाधक । तिहि सचेत रह चातुरसाधक ॥ प्रथमै लय विशेष बहोरी । पुनिकर अरशा स्वाद कहोरी ॥ आलस निद्रा जब सरसाना । वृत्ती होय सुषुप्ति समाना ॥ ब्रह्मानन्द भोग नहिं भोगी । सजग होहि तिहि औसर योगी ॥ आलस निद्रा दूर हटाई । फेरि वृत्ति निज लेहि जगाई ॥ द्वितिये पुनि विशेष बताई । वृत्ती जबै बहिर है जाई ॥ कछु पदार्थको कारण जाई । अन्तर वृत्ति बहिर्मुख होई ॥ हो सचेत योगी तिहि काला । वृत्ती बहिरंतर सुख बाला ॥ तृतीये राग द्वेश जो होई । नाम कषाय कहाँ लै सोई ॥ राग द्वेष विधि कहो बखानी । यक बाहर एक अन्तर जानी ॥ बाहर धन दारादिक शोचा । अन्तरकी चिंता मन पोचा ॥ भूत भव्य चिन्ता मन आई । योगीकी समाधि विनशाई ॥ चौथे रसास्वाद अब भाषो । ऐसे अर्थ तासुको राखो ॥ ब्रह्मानन्दते सुख अनुभव कर । दुख निवृत्तसे हृदय सुख भर ॥ यहू योगमें विघ्न बताई । जबलों नहिं निज प्रीतम पाई ॥ चितकी पंच भूमिका आही । प्रथमै ज्ञेय नाम कह ताही ॥

आगमनियमबोध

( ७५ )

द्वितिये मूढता नाश कहावै । तृतिये को विशेष बतावै ॥ चौथे पुनि एकाग्रता होई । पंचम भूमि निरोधक होई ॥ अर्थ तासु यहि भौनि जाचना । लोक वासना देव वासना ॥ शास्त्र वासना आदिक जोई । क्षेप नाम ताहीको होई ॥ निद्रा आसना तुम गुन घेरे । नाम मूढता ताको टेरे ॥ बाहर सुखवृत्ती जब होई । नाम विशेष कहावै सोई ॥ चित्त एकाग्र होय जेहि बारा । एकाग्रता नाम सो धारा ॥ ब्रह्माकार जबै है जाई । ताको नाम निरोध बताई ॥ जो योगी निज विघ्न हटावै । ब्रह्मानन्द सोई सुख पावै ॥ योगीको सब सुखसुरसावै । ज्ञान बिना पै मुक्ति न पावै ॥ केवस ज्ञान उगे जिहि बारा । तब योगी हो ब्रह्माकारा ॥ अष्ट सिद्धि नौ निद्धि विराजा । योगी संगसकलसुख साजा ॥

इति समाधि

अथ ओंकार जापको वर्णन—चौपाई

ॐकार जप सबको सारा । जिहि योगी परधामपधारा ॥ ऋद्धि सिद्धि गुण ज्ञान कहाये । ॐकार भव पार कराये ॥ जो कोई शुद्ध जाप मन लावै । सकल पदार्थ ताते पावै ॥ जाप अशुद्ध करै जो कोई । वृथा परिश्रम ताको होई ॥ पुत्र जनै जिहि औसर बाला । होय टेढ शिशुजोतिहिकाला ॥ जौ बालक सीधे नहि आवै । तौ निज मात प्रणविनशावै ॥ ॐकार जप ऐसो जानी । शुद्ध जाप बिन जिवकी हानी ॥ जब इंद्रिनको वशकरि लीजै । ताको कल्प समाधि कहीजै ॥ मन इंद्रिनको भूत कहावै । मनको बहुरि अकाश बतावै ॥ पुनि आकाश तीन विधि भाषा । चिदाकाश प्रथमै कहि राखा ॥ मनको चिदाकाश कहि गाये । नभ समान चहुँ दिशरहछाये ॥

( ७६ )

बोधसागर

जैसे नभको अन्त न कोई । तैसे मन अनंत है सोई ॥ द्वितिये मनाकाश कहि टेरे । ब्रह्माकाश नाम तिहि केरे ॥ ब्रह्माकाश कहै इमि तेही । ब्रह्म सो व्यापक है मन येही ॥ सर्वमयी जिमि ब्रह्म विराजै । तैसे यह मन सबमें गजै ॥ तृतिये भूताकाश बखाना । मन अरु ब्रह्मते करे मिलाना ॥ मनाकाश अरु भूताकाशा । ताते ब्रह्म द्योय परकाशा ॥ ब्रह्म दोउते पार बहुता । थूल देह वासनाके सूता ॥ त्रिविधि वासना कहो बखानी । सत रज तम गुन ताको जानी ॥ जब रजगुन तम गुण चल जाई । सूक्ष्म देह जीव तब पाई ॥ दोहा-यहि विधि सूक्ष्मता लहै, तन थूलता नशाथ । जिहि औसर यहि गुन गहै, जीवन सुक्त कहाय ॥ दोय प्रकार समाधि कह, यक चेतन जड एक । योगी भवसागर तरे, निज बल बुद्धि विवेक ॥

इति

अथ अथर्वण वेद योगतत्त्व उपनिषद-चौपाई

सबते श्रेष्ठ विष्णु कहलावै । सोऊ योग समाधि लगावै ॥ सदा योग मारग आचरही । परम पुरुष ध्यान सो करही ॥ सो प्रकाश सब घट घटमाहीं । तिहि चितवनी करें नर नाहीं ॥ भूलिविषय रति प्रभुहिविसारी । यही अचंभौ मो मन भारी ॥ वस्तु अनित्य जासु मन भावै । महा सूठ सो जीव कहावै ॥ पुत्र हो दूध जाय थन पीये । तरुण सुखीतिहिकरगहिलीये ॥ यद्यपि जान भिन्न तिय देही । तद्यपि जान पयोधर येही ॥ जाहि द्वारते बाहर आवत । ऐसो दुख सदा नर पावत ॥ तामें पुनि पैठत सुख माना । कैसे भूले नर बिन ज्ञाना ॥ जाहि रूपको जननी कहते । सोई निज दारा करि कहते ॥

आगमनिगमबोध

( ७७ )

कबहुँ जिहि निजपिता पुकारी । साई रूप निज भरता भारी ॥ निजु मन माह विचारिके देखो । पिता सोइ प्रकटा सुद लेखो ॥ रहटा कृष डोलची जैसे । आवे जाय जक्त यह तैसे ॥ यक भरि आवै दूजा रीते । ऐसी भूल माह जग बीते ॥ मुक्तिके मारगको नहि दूँढा । चर्खा गाह परा जग मूँढा ॥ ओंशन्द हरि भजनके काजा । तामें अक्षर तीन विराजा ॥ तिहि अक्षर तिहुँ लोक बखानो । तीनों वेद त्रिवेद हि मानो ॥ अर्थ रेफ अनुनासिक होई । सबसे सार जानिये सोई ॥ तनमें प्राण परवानमें सोना । तिलमें तेल घृत दूधसे होना ॥ फूलमें यथा सुगन्ध समाई । तैसे सार ताहि बतलाई ॥ ऊँकारके अक्षर चारी । ताको कहिये अर्थ विचारी ॥ प्रथम अकार हि ब्रह्मा जानो । द्वितिये ओंकार विष्णु पहिचानो ॥ रुद्रहि जान मकार स्वरूपा । ना निर्वचनसो ज्योति स्वरूपा ॥ बहुरि अकार ऋग वेद अहाँ । यजुर्वेद ओंकारहि कहई ॥ सामवेद कह जान मकारो । अनिर्वचन नन्ना चित धारो ॥ तृतिये जाग्रत जान अकारा । स्वप्न अवस्था भाष ओंकारा ॥ फेरि मकार सुषुप्ती गई । नन्ना रूप जान तुरियाई ॥ चौथे पुनि अकार मृत लोका । मध्य लोक ओंकार बिलोका ॥ स्वर्गको लोक मकार प्रमाना । तिहुँते परे नकार बखाना ॥ पँचथे मन कई जान अकारा । ओ चितना बुद्ध माहंकारा ॥ पुनि छठयें ब्रह्मचर्य अकारा । ओ गृहस्थको नाम पुकारा ॥ मम्मा वानप्रस्थ प्रकाशा । नन्ना जानि लेहु संन्यासा ॥ सतयें अकारहरिजगुन भनिये । ओ सतमाको तमगुन गनिये ॥ अठयें अकार ज्ञान थीरता । तीनि ओकार मकार वीरता ॥ नन्ना न्याय कियो परमाना । नवम अकार कम करि माना ॥

नं. १० बोधसागर - ९

( ७८ )

बोधसागर

पुनि कह ओ उपासना सारा । मम्मा ज्ञान नन्ना सब पारा ॥ ऊँ कारको अर्थ अनंतो । वर्णन कौन सकै करि संतो ॥ प्रवण आदि सबहीको भाषा । ताते और अनेकन शाखा ॥ मन स्वरूप अस जो उरबासी । अधरकमल समताद्विकप्रकाशी ॥ कमल नाल ऊपरको राखा । हेठको ताके मुखको भाषा ॥ ताके बीच माह मन रहई । पावन होय प्रणव जब कहई ॥ प्रथम हि अक्षरके उच्चारै । मनकी उज्ज्वलता जिव धारै ॥ द्वितिये अक्षरते दिल खिलता । अनहद शब्द गगनसुनिसिलता ॥ चौथे अर्ध बिंदु बतलाई । ताते ज्योति माह मिलजाई ॥ जब यह मन मलते बिलगाना । होय शुद्ध बिछौर समाना ॥ सूरते अधिक नूर जग मगई । परम प्रकाशमान तब लगई ॥

दोहा—कोध आलस निद्रा बहुत, बहु भोजन बहु जाग ।

फाका करनो कर्म षट्, योगी दीजै त्याग ॥

चौपाई

यहि विधि तीन मास जब साधै । अंतर परे न मनको बाधै ॥ तृतिये मास हो सह गति वाकी । देव दृष्टि सब आवै ताकी ॥ मास पांचमें यह गुन पावै । देव स्वरूप आप हौ जावै ॥ छठयें मास मिले हरि माही । प्रणव साधना सदा कराही ॥

अथ अथर्वण वेद योगसुखा उपनिषद—चौपाई

प्रथम हि पद्म आसनको मारै । बैठि एकांत ध्यानसो धारै ॥ द्वितिये नासा आगे देखै । टरै न दृष्टि ध्यान करि लेखै ॥ तृतिये दोउ कर पग कह जोरी । चौथे मनको लेहु बटोरी ॥ विषय बिकल्प अरु संशय कोई । मनके निकट न आवै सोई ॥ पंचम पावन प्रणव को ध्याई । छठयें नामी सुरति लगाई ॥ सप्तम निजु मन माह बिचारी । अशुचि बस्तु मानुष तनधारी ॥

आगमनिगमबोध

( ७९ )

तीन देह तू भौन बताये । तामें थम्भा चार लगाये ॥ एक बड तीन थंभ लछु साजे । पांच देवता नौ द्रवाजे ॥ पृष्ठ अस्थि बड़ थंभ पुकारी । ताके निकट सुषुम्ना नारी ॥ लछु थम्भा जो तीन कहाये । सो सत रज तम गुन बतलाये ॥ पंच प्रवण सुर पांच उचारी । तेहि देह जिव गेह सवारी ॥ मनके रंभ माहचित धारो । सूर्य मंडलाकार निहारो ॥ तेहि रविमंडल प्रणव सिरखो । प्रणवमें दीप शिखा पुनि देखो ॥ दीप शिखा ऊरध दिश जानी । ज्योति स्वरूप ताहि अलुमानी ॥ ताहीमें निज ध्यान हटाई । इमि योगी तन तजि तहँ जाई ॥ रवि मंडल भनि सूक्ष्मनि नारी । गेह पन्थ ब्रह्म रंभको फारी ॥ तन तजिके योगी इमि जाही । परम पुरुषके रूप समाही ॥ ऐसी युक्ति गहे सुख पागी । आलस निद्रा वश दुर्भागि ॥ छन छन ऐसी युक्तिको गहिये । यही उनिषद देखत रहिये ॥ जो यह युक्ति न हरदम होई । निश्चय तीन काल कर सोई ॥ भोर मध्य दिन सायंकाला । नितप्रतिगहि लीजै यह चाला ॥

इति

अथ अष्टसिद्धियोंके नाम चौपाई

प्रथमै अणिमा नाम कहावे । ताहि लहे लछु देह बनावे ॥ द्वितिये महिमा कहो बखानी । निज तनकी दीरघता ठानी ॥ तृतिये लघिमा जो लहिपावै । सो अपनो तन हर्क बनावै ॥ चौथे गरिमा नाम भनीजै । जो लहि निज तन भारी कीजै ॥ पंचम प्राप्ती नाम बतावो । सो लहि जहँ चाहो चलजावो ॥ पुनि प्रकामिका छठयें अहई । जाते निज मनोर्थ सब लहई ॥ सतयें ईशता नामक होई । जापर चहै आप बड होई ॥

( ८० )

बोधसागर

अठयै वशियौ नाम कहाई । जेहि चाहे तिहि देत भ्रमाई ॥ आठों सिद्धिमें भेद अनेका । जानहि योगी सहित विवेका ॥

इति

अथ नव निधियोंके नाम

दोहा-महापद्म अरु पद्म कह, कच्छप मकर मुकुंद । खर्ब शंख अरु नील कह, नवम कहावे कुंद ॥

इति

अथ योगी भेष वर्णन-चौपाई

शैली सिंगी मुद्रा काना । भगवौ वल्ल विभूत है बाना ॥ योग युक्ति साधन भल राखा । अजपा जाप जपे गति भाषा ॥

क० भा० प्रकाशसे

इति श्री आगमनिगमबोध समाप्त

श्रीबोधसागरे-

सुमिरनबोध

भारतपथिक कबीरपंथी

स्वामी श्रीशुगलानन्द द्वारा संगृहीत

मुद्रक व प्रकाशक-

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर” स्टीम-प्रेस, कल्याण-बम्बई.


मुद्रणकारि वर्षाधिकार “बीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणवन्नालवाटवदके मबीन है।

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

A faint, stylized illustration of a seated deity, possibly Lord Venkateswara, holding a conch shell and a lotus flower, with a crown-like structure above the head.

venkateswara

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्तपुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्कनाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

सुमिरनबोध प्रारंभः

(छोटा)

चतुर्विंशस्तरङ्गः

प्रथम बोध

( नित्य कर्म षट्कर्म विधि वर्णन ) सुमिरन आदि गायत्री आदिगायत्री सुमिरण सार । सुमिरन हंस उतारे पार ॥ कोटि अठासी घाट हैं, यम बैठे तहाँ रोक । आदि गायत्री सुमिरिके हंसा होय निशोक ॥

( २ )

बोधसागर

घाटी नाकहि आगे तब जाई । सकल दूत रहे पछताई ॥ आगे मकरतार है डोरी । जहाँ यम रहे मुख मोरी ॥

ओहं सोहं नामके, आगे करै पयान ।

अजर लोक बासा करे, जगमग दीप स्थान ॥

मुख सागर स्नान करी, होय हंसका रूप ।

जाय पुरुष दर्शन करै जिस दिन परम आनन्द ॥

आदि गायत्री सुमिरिके, आवागमन नसाय ।

सत्य लोक बासा करे, कहैं कबीर समझाय ॥

सुमिरन प्रभात गायत्री

आदिगायत्री अम्बर अस्थान । सोहंतत्त्व ले हंसालोक समान ॥

सत गायत्री अजपा जाप । कहैं कबीर अमर घर बास ॥

सत्य है अमर सत्य है शून्य । सत्यहिमें कछु पाप न पुण्य ॥

कहैं कबीर सुनो धर्मदास । यह गायत्री करो प्रकाश ॥

सुमिरण मध्याह्न गायत्री

अचित्त पुरुष हिरम्ब छाया । नाद बिन्द होय कर्ता आया ॥

यमसो जीता लोक पढाया । सुरति स्नेही हंस कहाया ॥

अचिन्त पुरुषी गायत्री, दीन्ह कबीर बताय ।

निशिदिन सुमिरण जो करै, करम भरम मिटि जाय ॥

सुमिरण सन्ध्या गायत्री

बारह जोजन कोट, यन्त्र जहैं पल्ले छूटे ।

यहि विधि सन्ध्या जपे, भर्मको आगम टूटे ॥

गायत्री ब्रह्मा जपे, जपे देव मदेश ।

गायत्री गोविन्द पढे, सतगुरुके उपदेश ॥

ताको काल न खाय, जो संज्ञा चीन्हे ।

घटमें रही अलोप, काठि हम बाहर कीन्हे ॥

सुमिरनबोध

( ३ )

इन पर ले सिद्धौ भनी, देव पूजा गो शरीर । ब्रह्मा बाचा पुत्र दासा, चपलान उग्र हंसनी शरीर ॥ शब्द पाय हिरदय धरे अस कथिक है कबीर ।

सुमिरन मध्याह्न गायत्री

कहैं कबीर अजपा घटे सूझे । निगम नाम मोहि जो बूझे ॥ तन मन धनहिं निछावर करै । सार नाम गहिभौ जल तरै ॥ अष्ट सिद्धिनौनिद्विमांगेसोदेऊँ । खुरासानखुरवेदमुखगंगाप्रवाहु ॥ रिप सिप मार गर तराई । नौगुनघरजासुरतिप्रकटहोवसूझे ॥ खौजो सुरति कमलके तीर । सतगुरु मिल गये सत्य कबीर ॥

सुमिरन सोनेका

संयम नाम सदा चितलाई । जासों काल दगा मिटिजाई ॥ काल दगा धरि आवे भेखा । जीव चुके धरतीकी रेखा ॥ सोवत समय जो मारे तारी । सत सुकृत करै रखवारी ॥ कहै कबीर बंकेज बुझाई । सोवत जीव नष्ट नहिं जाई ॥ अमर पिछौरी ओढिकै, सुख मण्डलमें सोय । कबीर ऐसे गुरु पाइके, कहा मुक्तिको रोय ॥ उत्तर करो सिराना, पश्चिम कीजै पीठ । कहैं कबीर धर्मदाशसों, यमकी लंगै न दीठ ॥

सुमिरन प्रातः उठनेका

जो स्वर चले प्रात संचारी । सोय पग धरि उठो संभारी ॥ दिवस समस्त हर्ष सो बीते । जहाँ जाय सो कारय जीते ॥ पुढुभीमें पग दीजिये, सुनो सन्त मति धीर । कर जोरे बिन्ती करो, दर्शन देहु कबीर ॥

सुमिरन दिशा जानेका

अन्न सकल तन पोख, शब्द सुरति सो पेख । सूक्ष्म लगन उतारो, काया निर्मल होय हमार ॥

( ४ )

बोधसागर

कहैं कबीर यही तत्सार । चौरासी सो जीव उबार ॥

सुमिरन मलद्वार धोनेका

सुरतिसंतोषसूमसजबभयाउतार । बांयेकर परसै जलद्वार ॥

सतगुरु शब्द गहोमति धीर । कहैं कबीर होय पाक शरीर ॥

सुमिरनजलपात्रका

धर्मराज मैं तुम्हैं बुझाऊँ । जल पत्रका भेद बताऊँ ॥

जलपात्रको गहिके, उत्तम करो बनाय ।

कहैं कबीर निर्मल भये, संशय भ्रम मिटिजाय ॥

सुमिरन तूँबा प्रक्षालनेका

तत्तत्तत्का तूँबा, शब्दे लियो समोय ।

कहैं कबीर धर्मदाससों, तूँबा निरमल होय ॥

सुमिरन हाथ मटिआवनेका

माटी खाक माटी पाक । माटी मैं माटी गर्पाक ॥

कहैं कबीर हम शब्द सनेही । सत्त शब्दसों पाक होय देही ॥

मृत्तिका लेव हाथ लगाई । अजर नाम सुमिरो चितलाई ॥

मृत्तिका लीन्हों हाथमें, निर्मल भया शरीर ।

कर्म भ्रम सब मेटिके, सुमिरो सत्य कबीर ॥

सुमिरन दातौन तोरनको

धन्य वृक्ष जिन दातौन दीन्ह। साधु संतपर दाया कीन्ह। ॥

दाया कीन्ह भया प्रकाश । रक्षा करें कबीर धर्मदास ॥

सुमिरन दातौन करनेका

सत्तकी दातौन संतोषकी झारी । सत्त नामले घसो विचारी ॥

किया दतौन भया प्रकाश । अजर नाम गहो विश्वास ॥

अमी नामते पहुँचे आय । कहैं कबीर सतलोक सिधाय ॥

सुमिरनबोध

( ५ )

सुमिरन दातौन फारनेका

फटी दतौन भया प्रकाश । अजर अमर कबीर धर्मदास ॥

सुमिरन मुख धोनेका

मुख परसे मुक्तायनि वासा । जिनके परसत लोक निवासा ॥

लैं जल मुख माहि चढावे । अम्बुन नाम हिरदे लौलावे ॥

कहैं कबीर सुनो धर्मदास । सो हंसा सतलोक निवास ॥

सुमिरन अमरि उतारनेका

अमरी अमर लोक सो आई । तीन लोकमें निर्भय भई ॥

तन शोधो मन राखो धीर । अमरी उतारो स्वारी नीर ॥

कहैं कबीर अमर भई काया । निज शब्द अमीका आया ॥

सुमिरन जलमें पैठनेका

जो साहब दाया कर पाऊँ । कर वन्दी जल मांझ समाऊँ ॥

पान निहपान सतगुरु शब्द प्रमान

सुमिरन स्नान करनेका

अमी सरोवर ज्ञान जल, हंसा पैठ नहाय ।

काया कंचन मन मगन, कर्म भर्म मिटिजाय ॥

पिंडे सो ब्रह्मंडे जान । मान सरोवर कर ज्ञान ॥

सोहं हंसा ताको जाप । कहैं कबीर पुन्य नहिं पाप ॥

ऐसी विधि करे ज्ञान । सोहंसा सतलोक समान ॥

सुमिरन ज्ञान करके बन्दगीको

नहाय खोरके शीश नवाई । अलख पुरुषके दर्शन पाई ॥

अमी शब्दको कीजे जाप । कहैं कबीर अमरघर बास ॥

सुमिरन कोपीन पहिरनेका

पारा राखे गुरु हमारा ।

बारह बरष की कन्या आई । उलटा पारा रह्यो समाई ॥

( ६ )

बोधसागर

ऊपर बन्दी छोर विराजे । पारा खसे तो सतगुरु लाजे ॥ सत्तकी कोपीन ब्रजका धागा । गुरु प्रतापसो बन्धन लगा ॥ कहैं कबीर तजो अभिमान । पारा खसेतो सतगुरुकी आन ॥

सुमिरन जल भरनेका

जीव जन्तु सब दूर पराऊ, भरिहौ निर्मल नीर । हत्या पाप लागे नहीं, रक्षा करै कबीर ॥

सुमिरन जल छाननेका

अमृत जल निर्मल कर छाना । सतगुरु साहबके मन माना ॥ कहैं कबीर भरम सब भागा । टूटचो जबै पुरानो धागा ॥

सुमिरन तिलक करनेका

तत्त्व तिलक तिहुँ लोकमें, सत् नाम निज सार ।

जन कबीर मस्तक दिये, शोभा अगम अपार ॥

पार कोई विरले पावै । पार पावै सो संत कहावै ॥

योगी संकट बहुरि न आवै । कहैं कबीर सतलोक सिधवै ॥

सुमिरन दर्पण देखनेका

दर्पणमें मुख देखिये, कबहीं न होय चितभंग ।

गुरुको बचन संतकी सेवा, चढे सवाया रंग ॥

सुमिरन चरणामृत महाप्रसाद पानेका

चरणामृत महाप्रसाद जोलीन्हौ । सत्य शब्दका सुमिरन कीन्हौ ॥

अर्ध उर्ध मध्य धर ध्याना । कहैं कबीर सो संत सुजाना ॥

सुमिरन चरणामृत देनेका

हो साहब मैं बिन्ती लाऊँ । कौन नामते पग पखराऊँ ॥

दहिने पग प्रथम ही जलनावे । बल हमार सो पग पखरावे ॥

शब्द सार निर्मौलिक सारा । पग पखराओ हंस हमारा ॥

यहि विधि पग पखराओ भाई । दगा धोख सब दूर पराई ॥

सुमिरनबोध

( ७ )

साखी-अजर नामको सुमिरन, चीन्हे हंस हमार ।

कहैं कबीर धर्मदास सो, शीश न आवे भार ॥

सुमिरनमहाप्रसाद देनेका

पके अन्नको त्रासन कीजै । पांच तत्त्वको भोजन दीजै ॥

जबे जीव मांगे प्रसाद । अजर नामको कीजै याद ॥

एक रवा हाथमें लेवे । महाप्रसाद दासको देवे ॥

महाप्रसाद एक धनीको, जाको सब विस्तार ।

मूरख लेख न पावै । कहैं कबीर बिचार ॥

सुमिरन महाप्रसाद पानेका

एक रवा हाथमें लीन्हा । उग्रनामका सुमिरन कीन्हा ॥

महाप्रसाद ऐसी विधि पावै । यमकी दसी निकट नहिं आवै ॥

उग्र नाम हृदय लौलाई । ऐसी विधि प्रसाद जो पाई ॥

साखी-कहैं कबीर धर्मदाससो, महाप्रसाद जो लेय ।

काल दसी सब टूटे, यमहि चुनौटी देय ॥

सुमिरन चरणामृत पानेका

चरणामृत शिष्य जो लेई । अम्बुज नाम हृदय चित देई ॥

लागे नहीं कालकी छाहीं । चरणोदक जो होय सहाई ॥

ऐसी विधि चरणोदक लेई । यमहिं चुनौटी निसिदिन देई ॥

ले चरणोदक माथ नवावै । तीन दण्डवत तब पहुँचावै ॥

साखी-कहैं कबीर धर्मदाससो, यह शिष्यको व्यवहार ।

दगा धोख सब मेटो, हंस उतारो पार ॥

सुमिरन जलपीनेका

उत्तम शीतल निर्मल नीर । अमृत पिय तिरषा गई दूर ॥

सत्यगुरु मिल गये सत्यकबीर । भागो काल विषमके तीर ॥

( ८ )

बोधसागर

सुमिरन घर बुहारनेका

सुमति बुहारी कर गहि लीना । कचरा कुमति दूर कर दीना ॥ बावन लाख दगा मिटि जाई । साहबकबीरकी फिरी दुहाई ॥

सुमिरन घर पोतनेका

हरियर गोबर निर्मल पानी । चौका पोते सुकृत ज्ञानी ॥ सवा लाख चूक बकसाये । चौका पोत जेवनार चढाये ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदास । हंसा पहुँचे पुरुषके पास ॥

सुमिरन चूल्हामें अग्नि बारनेका

चूल्हा हमारे चौहटे, सब घर तपे रसोइ । सत सुकृत भोजन करे, हमको छूत न होइ ॥

सुमिरन रसोई बनानेका

सुत सुकृत कीन्हा जेवनारा । ताते करत न लागे बारा ॥ सतघरी दो पहरि यां सांझा । लक्ष्मी बैठी रसोई मांझा ॥ सत् पकवान लक्ष्मी करे । तीनलोकका उदर भरे ॥ कहैं कबीर लक्ष्मी समुझाय । संत सुहेला बैठे आय ॥

सुमिरन थारी परोसनेका

चन्दन चौका कंचन थारी । हीरालाल पडुमकी झारी ॥ बहुत भांति जेवनार बनाये । प्रेमप्रीति सो पारस कराये ॥ संत सुहैला भोजन पाई । सत्सुकृत सतनाम गुसाई ॥

सुमिरन प्रसाद अर्पणेका

संत समाज धरती स्थूला । प्रसाद चढावें धर्म निर्मूला ॥ ओढे साल क्षमाके दीन्हा । सोई शब्द जो पावै चीन्हा ॥ नीर निरंतर अन्तर नेह । शब्द अगाध जो लागे देह ॥ कहैं कबीर चितजित जनि डरो । नाम सुमिरि जल अर्पण करो ॥