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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ३८ )

बोधसागर

गुरुसीढी चढि ऊपर जाई । सुख सागरमें रहे समाई ॥ गौरी शंकर और गणेशा । उनहू लीना गुरु उपदेशा ॥ गुरुमुख सदाअटल अविनाशी । सुर नर मुनिसबध्यानधरासी ॥ गुरुमुख सब भक्त औ दासा । गुरुमहिमा उन्हीसे प्रकाशा ॥

साखी-गुरुमुख को सबही मिलै, चार पदार्थ सार ।

निगुरा को तो कुछ नहीं, वहे सो नरकहि धार ॥

गुरु विनु मुक्ति ना पावै भाई । नर्क ऊर्द्ध सुख वासा पाई ॥ गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । गुरु विनु रहीयमलोकसिधाना ॥ गुरु विनु पढे जो वेद पुराना । ताको नाहि मिलै सतज्ञाना ॥ गुरु विनु जो सो पशू कहावै । मातृ व बुधि दुर्लभ होय जावै ॥ गुरु विनु दान पुण्य जो करई । होय निष्फल सब मतसोकहई ॥ गुरु विनु भ्रम ना छूटे भाई । कोटि उपाय करे चतुराई ॥ गुरु विनु होम यज्ञ जो करई । जाय पुण्य पाप सो भरई ॥ भवसागर है अगम आगहा । गुरु विनु कैसे पावै थाहा ॥ गुरु विनु बूझे सकल अचारी । तैतीस कोटि देव सब धारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके बासी ॥

साखी-गुरु आज्ञा ग्रहणकरि, छोडे मनसुखताकाल ।

गुरु कृपा तब पावई, क्षणमें होय निहाल ॥

गुरुकी कृपा कटै यम फांसी । विलम्ब न होय मिलै अविनाशी ॥ गुरु कृपा शुक्रदेवहि पड़या । चढि विमान वैकुण्ठहि गइया ॥ गुरुकी कृपा जब नारद पयऊ । मेटि चौरासी सुखी सो भयऊ ॥ गुरुकी कृपा रामपर सोहै । जीवन मुक्ति पाई जग मोहै ॥ गुरु कृपा बामदेवहि दइया । गर्भ माहिं गुरुज्ञानहि पड़या ॥ गुरु कृपा ध्रुव जो दरसा । अटल अमान परमपदपरसा ॥ गुरु कृपा ते भये उजासी । सनक सनन्दन नारद व्यासी ॥

सुमिरनबोध

( ३९ )

गुरु कृपा ते जनक विदेही । सो गुरु माहि परमपद लेही ॥ गुरु कृपा ते जन प्रहलादा । दैत्य होइ भक्ति तिन साधा ॥ गुरु कृपा जो कोई पावै । सकलो दुरमति दूर बहावै ॥

साखी-गुरु कृपा ऐसी अहै, सुनो साधु चित देइ । ताते गुरु सुमिरण कहू, रहे कालको लेइ ॥

गुरु गुरु जाप करो मन मेरा । काल दूत नहि आवै नेरा ॥ गुरुको ध्यान धरों नर नारी । सहजे सहज तरो संसारी ॥ गुरु गुरु सुमिरो मनसे प्यारो । गुरु गुरु कहो कोटि अवतारो ॥ गुरु गुरु जाप काज सबसारे । दुर्मति कपट दूर करि तारे ॥ गुरु गुरु जाप करो मन धीरा । गुरुके नाम मिटै सब पीरा ॥ गुरु गुरु मंत्र हृदय धरीजै । तन मन धन सब अर्पण कीजै ॥ गुरुको सुमिरन निशदिन कीजै । जीवन जन्म सफल करि लीजै ॥ एक नाम गुरु देत दिखाई । सो निजनाम कलपि नहि जाई ॥ गुरु सुमिरण निज नाम विचारे । आप तरे औरनको तारे ॥ सतगुरु शब्द नाम निरधारा । भव सागरसे उतरे पारा ॥

साखी-गुरुको सुमिरण कीजिये, निशदिन ध्यान लगाय ।

गुरु लक्षण अब कहत हो, सुनहु धीर चित लाय ॥

राग द्वेष दोनों से न्यारे । ऐसा गुरु शिष्यको तारे ॥ आशा तृष्णा कुबुद्धि जलाई । तन मन वचन सबन सुखदाई ॥ निरालम्ब भ्रम रहित उदासी । निर्विकार जानो निर्वासी ॥ निरमोही निरबंध निशंका । सावधान निरवान निबंका ॥ सार याही और सरवज्ञी । संतोषी ज्ञानी सतसंगी ॥ अयाचक जन निर अभिमानी । पक्षरहित अस्थिर शुद्धवानी ॥ निस्तरंग बाही परंपंचा । निष्कर्म निरलिप्त अबंचा ॥ बोल अडोल भाखे सो सांची । कोई बात कहै नहि कांची ॥

( ४० )

बोधसागर

जेहि विधि कारज जिवका होई । निर्णय वाक्य उचारे सोई ॥ झाई सन्धि कालका फेरा । पारख लाई करे निबेरा ॥

सार्वी-जाति बड़ाई आश्रमहि, मानबड़ाई खोय ।

जो सतगुरु के पल लगे, सांच शिष्य है सोय ॥

गुरु आगे राखे माथ । करै बिनय दुख मेटो नाथ ॥ अहौ अधीन तुम्हारे दासा । देहू अपने चरनन बासा ॥ यह तन मैं तोहि भेट चढायो । अपनी इच्छा कुछ न रखायो ॥ जो चाहो सो तुम अब करो । या भांडको जेहि विधि भरो ॥ भावै धूप छांहमें डारो । भावै बोरो भावै तारो ॥ गुण पौरुष कछु ओ नहिं मेरो । सब विधि शरण गही गुरु तेरो ॥ मैं अब बैठा नाव तुम्हारी । आशा नदी सो करिये पारी ॥ अपना कीजै गहिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गोसाई ॥ बहु विधि बिनती गुरुसे करई । मान मोह हृदय नहिं धरई ॥ देखि बिनयगुरु होहि अनन्दा । तब पावै सिख परमानन्दा ॥

सार्वी-गुरुके आगे जायके, ऐसी बोले बोल ।

कूर कपट राखे नहीं, अरज करै मन खोल ॥

देखि प्रसन्नता गुरुकी भाई । गुरुते कहिये शीश नवाई ॥ ऋद्धि सिद्धि फलमैं कछु नहिं चाहूँ । जगत कामनाको नहिं लाहूँ ॥ चौरासी मैं बहु दुख पायो । ताते शरण तुम्हरी आयो ॥ मुक्त होनेको मनमें आवे । अवागमन सो जीव डरावे ॥ सत्य भक्ति की चाह हमारे । ताते पकन्यो चरण तिहारे ॥ सत्य ज्ञानते हृदया भीजै । यही दान दाता मोहि दीजै ॥ मैंहूँ दास सो लेहु उबारी । हौ मच्छी तुम मिष्ट सुपारी ॥ हौ पतंग मैं तुम हौ डोरा । मैं तो फिरूँ तुम्हारे जोरा ॥ होहु दयाल दया अब कीजे । बूडत भव में बाहँ गहीजे ॥

सुमिरनबोध

( ४१ )

काल संधि झाँईके जाला । पडिकेहुःखित भयो विहाला ॥

साखी-दया होय गुरु देवकी, छुटे अविद्याभान ।

मिथ्या माया सब मिटे, पावे अविचल ज्ञान॥

सारशब्द गुरुते पावे । जाते जीव काज बनि आवे ॥

पूछ गुरुसे सब अरथाई । सारशब्दको निर्णय भाई ॥

जाते होय जीवको काजा । पाछे सोई होय निव्याजा ॥

त्रिविधि शब्दको पारख बूझे । सत्य पदारथ तबहीं सूझे ॥

सार शब्दको अङ्ग विचारे । मानुष लक्ष भले निरुआरे ॥

पशुवत धर्मको रूप लखावे । करि निरुआर सबगुरु बतावे ॥

हंस स्वरूपहु लीजे जानी । सबहि बतावे सतगुरु ज्ञानी ॥

साँच झूठका निर्णय करे । सत्य होय सो हिरदै धरे ॥

पक्का सौदा गुरुसे लेवे । देखि अधीन गुरु सब देवे ॥

गुरु सो देव सब कछु भाई । क्षणमें भेटे काल कलाई ॥

साखी-काल जालसे छूटिकै, मोक्ष मिलनकी चाह ।

सत्य मिलनकी युक्ति सब, गुरु बतावे राह ॥

गुरुसे पूछे ब्रह्मस्वरूपा । गुरुसे पूछे प्रकृति अनूपा ॥

गुरुसे पूछे सूक्ष्म तत्ता । गुरुसे पूछे त्रिगुण सत्ता ॥

गुरुसे पूछे महाकारण देही । गुरुसे पूछे तुरिया लेही ॥

गुरुसे पूछे पाच तनमात्रा । गुरुसे पूछे पंचकी यात्रा ॥

गुरुसे पूछे सूक्ष्म कारण । गुरुसे पूछे स्थूल सवारन ॥

गुरुसे पूछे ज्ञान अरु कर्मा । दशों इन्द्री सहित स्वधर्मा ॥

गुरुसे पूछे त्रिकुटी भाई । चौदह यम सब देइ बनाई ॥

गुरुसे पूछे चतुर्दश स्थाना । चौदह देव तबे मनमाना ॥

चौदह पूछि करे प्रवेशा । तबही पावे ब्यालिस वेशा ॥

पंचकोश सो गुरु से जाने । आतम ज्ञान तबही मनमाने ॥

( ४२ )

बोधसागर

साखी-पंचकोशमत प्रकट जग, वेद कहे सत सोइ । परख बुद्धि निज दृष्टि बल, गुरु कृपा करे जब होइ ॥ द्वैताद्वैत का करे विचारा । शुद्धाद्वैतका करे उपचारा ॥ विशिष्टाद्वैत भली बिधि जाने । पूछत पूछत सबै मन मानै ॥ कर्मोपासना करै विचारा । ज्ञान विज्ञानका पावे सारा ॥ अर्थ धर्म मोक्ष रू कामा । सबका पूछे असली धामा ॥ नवधा भक्तिको रूप पिछाने । योगक्रियाको भली बिधि जाने ॥ राजयोग हठयोग स्वरूपा । सबही आसन सिद्धि अनूपा ॥ ब्रह्म जीव अरु प्रकृतिका भेदा । द्वैतज्ञानका करे अच्छेदा ॥ नाना मत जग आहि जो भाई । सबका भेद जो गुरुसे पाई ॥ आस्तिकनास्तिक मन अनुहारा । सबही फंदा करे विचारा ॥ पूछि गुरुसे सबही सुधारै । गुरुके पारख काल फन्द टारै ॥

साखी-संसाररी पारख बिना, कैसे पावे ठौर । विध युक्ति अनमिल सबै, भोग वहीँ औरके और ॥ कालजालकी विकट है चाला । जीव विकल तेहिमध्ये विहाला ॥ पारख यथारथ प्रभु प्रकाशू । कठिन महात्म काल विनाशू ॥ काल चक्र चक्की कठिनाई । पारख पाये जात बिलाई ॥ पारख बल बहियाँ भौजेही । सबहीविधि चीन्ह पडाखलतेही ॥ गुरु प्रसाद पारख हठ पाये । विकट कला यम जालछुडाये ॥ एक एक पारखे जेहि फाँसा । सो संक्षेप करे प्रकाशा ॥ जाते जीव बचे यमफाँसा । शरणागत हठ परख विलासा ॥ भक्तिभाव प्रेमहि अधिकाई । परख लहत बल काल नशाई ॥ कालकला नहि पावे ताको । भक्ति भाव गुरु पारख जाको ॥ परम पारखी जीवन मुकता । नहि पावे तेही कालक उकता ॥ साखी-बिनु शरणागति परख गुरु, नहि जीवन निस्तार । सरवोपरि गुरु परख हैं, लहै तो होय उबार ॥

सुभिरनबोध

( ४३ )

गुरु से दीक्षा लीजे भाई । सदा गुरुकी कीजे सेवकाई ॥ दीक्षा लेई जले जो आडा । सात जनम सो सिरजे पाडा ॥ सतगुरुकी जो आज्ञा लोपे । ता ऊपर यम राजा कोपे ॥ सतगुरु की जो अदब न राखे । ताको दोजख शास्तर भाखे ॥ सतगुरु की न लाये विश्वास । ताको काल करत है आसा ॥ गुरुसेती गूमान जानावै । जनम जनम सो यमपुरजावै ॥ गुरुसङ्ग आडी टेढी बोलै । स्थान होइ सो घरघर डोलै ॥ गुरुसङ्ग ज्ञान गर्व दिखावे । कोटि जनम क्रूर को पावै ॥ गुरुसे बाद करे नरनारी । कोटि जनम सो नरक मँझारी ॥ गुरुको शब्द मेटि पग धरई । यम किंकर के फन्दे परई ॥

साखी- गुरुसीढीते उत्तरे, शब्द विद्वान होय ।

ताको काल घसीटि है, राखी सकै नहिं कोय ॥

सतगुरु की मरयाद न धरई । लख चौरासी कुण्डमें परई ॥ गुरुको शब्द न सुने अज्ञानी । भवसागर डूबे अभिमानी ॥ गुरुको देखि धरत अभिमाना । ब्यास बचन पड नरकनिधाना ॥ गुरुको ज्ञान मेटि मत थापी । तीन लोकमें बडो ते पापी ॥ गुरुको मेटि बखानत आपा । धरती भार मरत तेहि पापा ॥ गुरुसे सो ऊंचा चढि बैठे । सात कुण्ड नरकमें पैठे ॥ गुरुसे उलटा बचन सुनावै । सात जनम कोढी को पावै ॥ गुरुको उलट सुनावे बैना । सात जनम अन्धा होय सो नैना ॥ गुरुको छोड देव जो पूजे । बादुर होय दिवस नहिं सूझे ॥ गुरु को छोड अनत जो जावे । उलूक होय सो जन्म गँवावे ॥

साखी- शिवपूजामें बैठिके, गुरुसे करि अभिमान ।

काकभुशुण्ड शिवशापते, पडचो चौरासीखान ॥

गुरुनिन्दा जाके मुख उपजे । कोटि जनम गद्दा हो निपजे ॥

( ४४ )

बोधसागर

गुरु निन्दा जाके सुख होई । ताको सुख ना देखो कोई ॥ अपने सुख गुरु निन्दा करई । शूकर भान जनम सो धरई ॥ गुरु की निन्दा सुने जो काना । सो तो पावे नरक निधाना ॥ गुरु निन्दा सुने जो श्रवण सुनयी । अपने हाथ प्राख निज हनयी ॥ गुरु निन्दक नारायण होई । वाको सुख ना देखौ कोई ॥ गुरु निन्दक धरती पग चम्पे । ताके भार धरनि अति कम्पे ॥ गुरु निंदक अवनी पर सोवे । धरती धरत शेष अति रोवे ॥ गुरु निंदक जब ही सुख बोले । धरती गगन मेरु ग्रह डोले ॥ गुरु निन्दक जो बचन सुनावे । ज्ञानी कान मूँदिके जावे ॥

साखी-गुरु निन्दा छाडो सुजन, गुरु स्तुति मन धारि ।

गुरुको राखो शीश पर, सब विधि करे गुहारि ॥

सतगुरु मिले परम सुखदाई । जनम जनम का दुःख नशाई ॥ सतगुरु मिले तो अगम बतावे । यमकी आँच ताहिनिहिं आवे ॥ सुख सम्पति अपनो नहिं प्राणी । समझि देखु तुमनिश्चय जानी ॥ तीरथ वरत और सब पूजा । गुरु बिनु होवे सबही लूँजा ॥ धारा दोई भल जग माहीं । गृह वैराग बिन औरन आहीं ॥ दोऊ गुरुकी कृपासे पावे । गुरु बिनु भेदसोकौन बतावे ॥ करि त्याग सब गुरुको दीजे । पारख पाइ सदा सुख लीजे ॥ गिरही रही भगति अनुसारै । तन मन धनअर्पण करि डारे ॥ दशवां अंश गुरु को दीजै । जीवन जन्म सुफल करलीजै ॥ सतगुरुके सब आगे धरिये । शीश नाइ गुरुदंडवत करिये ॥

साखी-गुरु सो भेद जो लीजिये, शीश दीजिये दान ।

बहुतक भोढ़ पचिमुये, राखि जीव अभिमान ॥

गुरुसे रहे सदा मन जोरी । जैसे नटुवा चढ़त है डोरी ॥ पारख तार चढी भयनिहिं पावे । छेडे पारख चूर होइ जावे ॥

सुमिरनबोध

( ४५ )

लोपे नहीं सतगुरुका बाचा । सो सतगुरुका सेवक सांचा ॥ सोइ शिष पावै पारख घाटा । सोइ पावे सत्य सो बाटा ॥ निर्माही सतगुरु की रीती । सांचा सेवक लावै प्रीती ॥ मिलि पारखसबभयमिटिजावै । गुरुमुख शब्द सदालौ लावै ॥ देखि दुसह दुख जीवन केरी । दया करी पारख प्रभु प्रेरी ॥ निज पद जानि दया सोकरई । बन्धन जीव छुटावन लहई ॥ केतिक पारख प्रभुके पाये । जरा मरण यम जाल मिटाये ॥ जिन्ह जिवलहे पारखप्रभु केरा । महाराज यम जीव निवेरा ॥ सारखी-गुरु महिमा पूरण भई, सतगुरु किरपा कीन ।

संतनकी वाणी बहुत, यामें संग्रह लीन ॥

पाठफल वर्णन

गुरुमहिमा सबते अधिकाई । शिव शिवाप्रति यही दृढाई ॥ ब्यास वचन औ वेदे गाया । गुरुसे अधिक नहीं रघुराया ॥ सत्यगुरु कबीरहु परखाये । धर्मदास गुरु महिमा गाये ॥ रामहरस जू पूरण दासा । सबही गुरु महिमा परकाशा ॥ जेते भये जग बुद्धिमति धारी । सब गुरुमहिमा कीन उचारी ॥ सबका सार यामधि पढ़े । अब याकी महिमा सुन लइये ॥ तीनों संध्या जो यहि पढ़यी । छोड़ि कुमारग सतपथ लहयी ॥ सांची श्रद्धा मनमें लाई । बूझि बूझिके पाठ कराई ॥ बिन बूझे सो धुन्द अँधेरा । परि अभिमानखायजग फेरा ॥ गुरुके लक्षण भलिविधि यांचे । यम फन्दाते तबही बांचे ॥

सारखी-बूझ विवेक सह जो पढ़े, गुरुमहिमा यक बार ।

कबीर दीनदयाल तेही, तुरत उतारे पार ॥

योग यज्ञ अरु जप तप अहई । पढ़ि गुरुमहिमा सबफल लहई ॥ विष्णु सहस्र अरु भगवद्गीता । भागवत आदिक आठपुनीता ॥

( ४६ )

बोधसागर

एकबार गुरु महिमा पठयी । सोफल सबही क्षणमें लहयी ॥ काशी क्षेत्र बहुबिधि दाने । गया प्रयाग पुष्कर असनाने ॥ सो फल सबही यामधि पावे । श्रद्धासहित जो पाठ करावे ॥ निर्मल होय पाठ जो करई । सो नर सहजे भवनिधि तरई ॥ वेद पुराण अरु शास्त्र विलोई । जाह्निकस्योगुरुमहिमासोई ॥ गुरु महिमा सारको सारी । गिरिजाप्रति भाष्योत्रिपुरारी ॥ गुरु महिमा गुरुगमसे गाया । चढि सत पारख नादबजाया ॥ सत्तकबीर जब दाय़ा कीनी । गुरुमहिमा तब वर्णन कीनी ॥ साखी-गुरुमहिमा गुरु गम अहै, जाने सन्त सुजान ।

पढे विचारे मन करे, पावै मोक्ष निदान ॥

गुरुमहिमा शतक यहि नामा । पाठ किये पूरे सब कामा ॥ सो चौपाई यामहि आही । बीस दोहरा साख सदाई ॥ दो चौपाई दुइ सो साखी । फल वर्णन महाँ पुनि राखी ॥ पांच चौपाई यक सो दोहा । संख्या तिथि वर्णनमहाँ जोहा ॥ या विधि पूर्ण भयोयहग्रन्था । जाते जिव पावे सत पंथा ॥ याको पाठ करे जो कोई । उभय आनन्दफल पावे सोई ॥ गुरुसंतन पाऊँतिन शिर नाऊँ । मातु पिताके बलिबलि जाऊँ ॥ सत्य कबीर सत्य गुरु राई । जिनकी कृपा परख पद पाई ॥ धर्मदास गुरु जग आये । करि उपदेश जगजीवचिताये ॥ राम रहस पूरण गुरु राई । सबको वन्दो शीश नवाई ॥

साखी-नभ रस निधि चन्द्र कह, पौष पूर्णिमा जान ।

बिक्रम सम्बत जानिये, रविवासर दिन मान ॥

इति श्रीगुरुमहिमा शतक समाप्त

सुमिरनबोध

( ४७ )

अथ गुरु उपदेशमहिमायोग प्रारम्भः

दोहा—गुरु संत वन्दन कहूं, ऐहै सुखको पूर ।

गुरुमाहिमा बरनन कहूं, शिर धरि पदरजधूर ॥

सन्त सबै शिर ऊपरे, निस्पृही निज नाम ।

सबके मस्तक मुक्ति गुरु, पूरवे मनके काम ॥

चौपाई

परब्रह्मको आदि मनाऊँ । तिनकी कृपा गुरुचरनन पाऊँ ॥

गुरु सोई सब सिरजन हारा । गुरुकी कृपा होय भवपारा ॥

गुरु बिन होम यज्ञ नहीं कीजे । गुरुकी आज्ञा माहि रहीजे ॥

गुरु संतनके चरण मनायो । ताते बुद्धि उत्तम मैं पायो ॥

सब इष्टनमें सतगुरु सारा । सो सुमिरावे पुरुष हमारा ॥

शरण होय शिष आवै कोई । सहज पदारथ पावै सोई ॥

गुरु सुरतरु सुरधेनु समाना । आवै चरण मुक्ति परवाना ॥

मन बाँधित फल पावै सोई । प्रीति सहित जो सुमिरे कोई ॥

तन मन धन आर्पि गुरु सेवै । होय गलतान उपदेशहि लेवै ॥

गुरु बिन पदारथ और नजानै । आज्ञा मेटि और नहीं मानै ॥

सतगुरुकी गति हिरदय धारै । और सकल बकवाद निवारै ॥

गुरुके सन्मुख बचन न कहै । सो शिष रहनिगहनि मुखलहै ॥

गुरुसे बैर करै शिष जोई । भजन नाश अरु बहुत विगोई ॥

पीढ़ि सहित नरकमें परिहै । गुरु आज्ञा शिषलोपन करिहै ॥

चेलो अथवा उपासक होई । गुरु सन्मुख ले झूठ संजोई ॥

निश्चय नरक परै शिष सोई । वेद पुराण भनत सब कोई ॥

सनमुख गुरुकी आज्ञा धारै । अरु पाछे तैं सकल निवारै ॥

सो शिष घोर नरकमें परिहै । रुधिर राध पीवै नहीं तरिहै ॥

मुखपर बचन करै परमाना । घर पर जाय करै विज्ञाना ॥

( ४८ )

बोधसागर

जहाँ जावै तहाँ निंदा करई । सो शिष कोध अगिन ते जरई ॥ ऐसे शिषको ठौर जो नाही । गुरु रुख लोपत है मनमाहीं ॥ वेद पुराण कहै सब साखी । साखी शब्द सबै यों भाखी ॥ मानुष जन्म पायकर खोवै । सतगुरु विमुखा युगयुग रोवै ॥ ताते सतगुरु शरना लीजै । कपट भाव सब दूर करीजै ॥ योग यज्ञ तप दान करावै । गुरु विमुख फल कबहु न पावै ॥ गुरुही जपतप तीरथ कहिये । गुरुही सांच अरु मिथ्या पहिये ॥ सतगुरु बिना मुक्ति नहिं कोई । ऊंच नीच भावै जो होई ॥ आतम ब्रह्म गुरु ते मेरा । ताके शरणों आयो मैं चेरा ॥ चार युगन जे संतहि भयऊ । ब्रह्मरूप होय पारहि गयऊ ॥ सो जानहु गुरु संग प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन पराऊ ॥

दोहा—गुरु आज्ञा जिन जिन लही, सन्यो सकल विधि काज ॥ नरक रूप जग दूर धरयो, श्रीगुरु महाराज ॥

उपदेश प्राप्ति लक्षण—चौपाई

दोउ कर जोरि गुरुके आगे । करि बहु विन्ती चरनन लागे ॥ अति शीतल बोलै सब वैना । मेटे सकल कपके वैना ॥ हे गुरु तुम हो दीनदयाला । मैं हूँ दीन करो प्रतिपाला ॥ तुम बन्दी छोर अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥ दै उपदेश गुरु मंत्र सुनाओ । जनम मरन भवदुःख छुडाओ ॥ यो अधीन होय शिष जबहीं । शिषपर कृपा करै गुरु तबहीं ॥ गुरुसे शिष जब दीक्षा मांगै । मन कम वचन धरै धन आगै ॥ ऐसी प्रीति देखै गुरु जबही । गुप्त मंत्र सुनावै तबही ॥ अरु भक्तिमुक्तिको पंथ बतावै । बुरो होय को पंथ छुडावै ॥ ऐसे शिष उपदेशी पावै । होय दिव्य दृष्टि पुरुषपेजावै ॥

सुभिरनबोध

( ४९ )

गुरुसेवा माहात्म्य

गंगा यमुना बद्दीश समेते । जगन्नाथादि धाम हैं तेते ॥ सेवे फल प्राप्त होय न जेतो । गुरुसेवामें पावै फल तेतो ॥ गुरु महात्म को वार न पारा । वरणेशिवसनकादिक अवतारा ॥ गुरु महिमा मोपै वरणि न जाई । महिमा अनन्तममम तिलघुताई ॥

गुरु भावना

गुरुको पुरुष ब्रह्मकर जाने । और भाव कबहुँ नहि आने ॥ काम क्रोध रहितगुरु मेरा । पाप पुण्यका करत निवेरा ॥ काम क्रोध लोभ समाना । तो शिष जानहु तीन समाना ॥ यही दृष्टिसे गुरुको सबै । तबतन मन धन गुरु सबको देवै ॥ तनकरि टहल करै गुरु सेवा । सो शिष लहै मुक्तिको मेवा ॥ बचन उचारे पुढुम सम वाणी । द्रव्य लगावै गुरुहित जानी ॥ ऊँच नीच सबही सुन लीजै । कबीर बचन प्रमाण करीजै ॥ मेरे और कछु नहि चहिये । गुरु भावना गुरुहिय लहिये ॥

दोहा—सात द्रौप नौ खण्डमें, औ इकीस ब्रह्मण्ड ।

सतगुरु विना न बाचिहौ, काल बढ़ो परचंड ॥

यही भाव भक्तिका लक्षण कहिये । गुरुके भाव विन भव जल बहिये ॥ जिन बातनसे गुरु दुख पावे । तिन बातनको दूर बहावे ॥ वेद पुराण सबै मिलि गावै । नेमी धर्मौ चौरासि न जावै ॥ अष्ट अङ्गसों दंड परनामा । संध्या प्रात करै निषकासा ॥ गुरुको शिष ऐसे नहि मानै । सो त्रयताप जरत चारो खानै ॥ योगी यती तपी आशरमा । बिनु गुरु कोउ न जानै मरमा ॥

गुरुचरणोदक माहात्म्य

कोटिक तीरथ सब करआवै । गुरु चरणा फल तुरतहि पावै ॥ कदाचित् चरणा मृत पावै । चौरासी गत सतलोक सिधावै ॥

( ५० )

बोधसागर

कोटिक जप तप करै करावै । वेद पुराण सबै मिलि गावै ॥ गुरुपद रज मस्तक पर देवै । सो फल तत्कालहि लेवै ॥

दोहा—गुरु चरणोदक अनन्त फल, हमते कही न जाय ।

मनकी पुरवै कामना, जो लेवे चित्त लगाय ॥

सतगुरु समान को हिन्तु, अन्तर करो विचार ।

कागा सो हंसा करै, दरसावै ततसार ॥

गुरु महिमा ग्रंथ यह, कहैं कबीर समझाय ।

पाप ताप सबही हरे, अमरलोक लै जाय ॥

इति श्रीगुरु उपदेश महिमायोग समाप्त


[कबीर पंथी भारत पथिक स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत और संशोधित कबीर दर्शन लाइब्रेरीसे संपादित]

सुमिरनबोध

( ५१ )

गुरुमहिमा प्रारंभः

प्रथम खण्ड

चौपाई

गुरुकी शरणा लीजै भाई । जाते जीव नरक नहिं जाई ॥ गुरु मुख हो परम पद पावे । चौरासीमें बहुरि न आवे ॥ गुरु पद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहबकी होई ॥ गुरु विनु मुक्ति न पावे भाई । नरक उर्द्धमुख वासा पाई ॥ गुरुको कृपा कटे यम फांसी । विलम्बनहोयमिलेअविनाशी ॥ गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । ज्यों थोथा भुसछडेकिशाना ॥ गुरु महिमा शुक्र देवजो पाई । चढि विमान वैकुंठे जाई ॥ गुरु विनु पढै जो वेद पुराना । ताको नाहिं मिलै भगवाना ॥ गुरु सेवा जो करे सुभागा । माया मोह सकलभ्रम त्यागा ॥ गुरुकी नाव चढे जो प्राणी । खेद उतारे सतगुरु ज्ञानी ॥ तीरथ वरत और सब पूजा । गुरु विन देवता और न दूजा ॥ नौ नाथ चौरासो सिद्धा । गुरुके चरण सेवे गोविन्दा ॥ गुरु विनु प्रेत जनम सब पावै । वर्ष सहस्र गर्भ मांहि रहावै ॥ गुरु विनु दान पुण्य जो करही । मिथ्या होय कबहुँनहिंफलही ॥ गुरु विनु भरम न छूटै भाई । कोटि उपाय करै चतुराई ॥ गुरु विनु होम यज्ञ जो साधे । औरो मन दश पातक बाधे ॥ सतगुरु मिले तो अगम बतावै । यमकी आंचताहिं नहिं आवै ॥ गुरुके मिले कटे दुख पापा । जनम जनमको मिटै संतापा ॥ गुरुके चरण सदा चित दीजै । जीवनजन्म सुफल करलीजै ॥ गुरुके चरण सदा चित जानो । क्यों भूले तुम चतुर स्थानो ॥ गुरु भगता मन आतम सोई । वाके हिरदे रहों समोई ॥

( ५२ )

बोधसागर

गुरु मुख ज्ञान ले चेतो भाई । मानुष जन्म बहुरिनहिं पाई ॥ सुख संपति आपन नहिं प्राणी । समझि देखु तुमनिश्वयजानी ॥ चौविस गुरु हरि आपहि धरिया । गुरु सेवा हरि आपहि करिया ॥ गुरुकी निंदा सुनै जो काना । ताको निश्वय नरक निदाना ॥ दशवां अंश गुरुको दीजै । जीवन जनम सुफल कर लीजै ॥ गुरु मुख प्राणी काहे न हूजै । हृदय नाम सदा रस पीजै ॥ गुरु सीढी चढ़ि ऊपर जाई । सुखसागरमें रहे समाई ॥ अपने मुख निंदा जो करई । शूकर स्थान जन्म सो धरई ॥ निगुरु करै करै मुक्ति आशा । कैसे पावै मुक्ति निवासा ॥ औरो सुकृत देह जो पावे । सतगुरु विन मुक्ती नहिं आवे ॥ गौरी शंकर और गणेशा । सबही लीन्हा गुरु उपदेशा ॥ शिव विरंचि गुरु सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा भुवको दीन्हा ॥ सतगुरु मिले परम सुखदायी । जनम जन्मका दुःख नसाई ॥ जबगुरु किया अटल अविनाशी । सुर नर मुनि सब सेवक रासी ॥ भवजन नदिया अगम अपारा । गुरु विनु कैसे उतरे पारा ॥ गुरु विनु आत्म कैसे जाने । सुख सागर कैसे पहिचाने ॥ भक्ति पदार्थ कैसे पावे । गुरु विनु कीन जो राह बतावे ॥ गुरु मुख नाम देव रैदासा । गुरु महिमा उनहूँ परकासा ॥ तैतिस कोटि देव त्रिपुरारी । गुरु विनु भूले सकल अचारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके वासी ॥ गुरु विनु पशु जनम सो पावै । फिर २ गर्भ बासमें आवै ॥ गुरु विमुख सोई दुख पावे । जनम जनम सोई डहकावै ॥ गुरु सेवे जो चतुर स्थाना । गुरु पटतर कोई और न आना ॥ गुरुकी सेवा मुक्ति निज पावे । बहुरि न हंसा भवजल आवे ॥ भवजल छूटन यही उपाई । गुरुकी सेवा करो सब धाई ॥

सुमिरनबोध

( ५३ )

सारखी-सतगुरु दीन दयाल है, देवे भक्ति सुकाम । मनसा वाचा कर्मना, सुमिरो सतगुरु नाम ॥ सत्य शब्द के पटतरे, देवेको कछु नाहिं । कहले गुरु संतोषिये, हवस रही मन माहिं ॥ अति उण्डा गहरा घना, बुद्धिवन्त मति धीर । सो धोखा विरचे नहीं, सतगुरु मिलहि कबीर ॥ इति श्री प्रथमखण्ड गुरुमहिमा समाप्त

अथ गुरुदेवकी महिमा प्रारंभः

द्वितीय खण्ड

गुरुदेवकी महिमा बरणौ । जे गुरु देव तुम्हारी शरणों ॥ गावत जे गुण पार न पावे । ब्रह्मा शंकर शेष गुण गावे ॥ प्रथमहि रगुण ऐसा कीन्हा । तारक मंत्र रामको दीन्हा ॥ माता तिलक दिया सरूपा । जाको बन्दे राजा औ भूपा ॥ ज्ञानगुरु उपदेश बताया । दया धर्मकी राह चिन्हाया ॥ जीव दया घटहीमें होई । जीव दया ब्रह्म है सोई ॥ गुरुसे आधीन चेला बोले । खरा शब्द उर अन्तर खोले ॥ स्वारा मिशरी बचने स्वमें । गुरुके चरणों चेला रमें ॥ भीतर हिरदे गुरुसों भले । ताके पीछे रामहिं मिले ॥ गुरु रीझेसो कीजे कामा । ताके पीछे रामहिं रामा ॥ शिष सरस्वतीगुरु यमुना अङ्गा । राम मिले सब सरिता गङ्गा ॥ चेला गुरुमें गुरुमें राम । भक्ति महातम न्यारा नाम ॥ गुरु आज्ञा निरबाहें नेम । तब पावे सरवज्ञी प्रेम ॥ सरवज्ञी राम सकल घट सारा । है सबही में सब सों न्यारा ॥ ऐसी जाने मनमें रहै । खोजे बूझे तासो कहै ॥

( ५४ )

बोधसागर

गुरुकी महिमा संक्षेप भनी । गुरुकी महिमा अनंत घनी ॥ औतार धरी हरि गुरु करे । गुरु किये तब नारद तरे ॥ साख पुरातम ऐसी सुनी । बात हमारी गुरु चरणों बनी ॥ कीड़ी जैसा मैं हों दासा । पडा रहा गुरु चरणों पास ॥ गुरु चरणों राखों विश्वास । गुरुहि पुरावे मनकी आसा ॥ सारखी-गुरु गोविन्द अरु शिष मिलि, कीन्हा भक्ति विवेक ॥

तिरबेनी धारा बही, आगै गङ्गा एक ॥

गुरुकी महिमा अनंत है, मोसो कही न जाय ।

तन मन गुरुको सौंपिकै, चरणों रहों समाय ॥

इति श्रीद्वितीय खण्ड गुरु महिमा समाप्त

अथ गुरुमहिमा प्रारंभः

तृतीयखण्ड

गुरु सतपद भजु अमृतबानी । गुरु बिनु नहीं रे प्राणी ॥ गुरु हैं आदि अन्तके दाता । गुरु हैं मुक्ति पदके दाता ॥ गुरु गङ्गा काशिहि स्थाना । चारवेद गुरुगमसे जाना ॥ अरसठ तीरथ भ्रमि २ आवे । सो फल गुरुके चरणों पावे ॥ गुरुको तजै भजै जो आना । ता पशु याको फोकट ज्ञाना ॥ गुरु पारस परसे जो कोई । लोहाते जिव कश्चन होई ॥ शुक्र गुरु किये जनकरुवैदेही । वो भै गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु प्रहलाद पढाये । भक्तिहेतु जिन दर्शन पाये ॥ काकभुशुंडि शंभु गुरु कीन्हा । अगम निगम सब कहि दीन्हा ॥ ब्रह्मा गुरु अग्निको कियेऊ । होम यज्ञ जिन यज्ञ दियेऊ ॥ वशिष्ठ मुनिगुरुकियेरघुनाथा । पाये दर्शन भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा शरणा । पाये भक्ति जब तारन तरना ॥

प्रारंभिक पृष्ठ (कबीर चरित्र बोध)

सुमिरनबोध

( ५५ )

नारद उपदेश धिमरसे पाये । चौरासीसे तुरत बचाये ॥ गुरु कह सोई है सांचा । बिलु परचे सेवक है काँचा ॥ गुरु सामरथ सबके पारा । गहे शरण उतरे भवपारा ॥ कहैं कबीर गुरु आप अकेला । दशो औतार गुरूका चेला ॥

सारखी-राम कृष्णसों को बड़ा, तिनहू तो गुरु कीन्ह ।

तीन लोकके वे धनी, सो गुरु आगे अधीन ॥

हरिसेवा युगचार हैं गुरु सेवा पल एक ।

तासु पटतर ना तुले, संतन किया विवेक ॥

अथ प्रचलित गुरुमहिमा कबीर दर्शन लाइब्रेरीके संस्थापक कबीरपंथी भारतपथिक स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत संशोधित और सम्पादित ।

इति श्रीतृतीय खण्ड गुरुमहिमा समाप्त

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श्रीः

बोध—सागर

( कबीर चरित्र बोध प्रारंभ )

भारतपथिक कबीर पंथी—

स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन,

बम्बई-४

नं. ११ बोधसागर