कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २०५० )
बोधसागर
१४२
विप्र अवज्ञा कीनो हरिकी । क्रोधवन्त कमला तबसरकी ॥ विष्णुकि छाती चरण प्रहारा । सब दुःख द्रन्द्व घेर तिहि बारा ॥ रहे बेहाल काल बहु तेरे । तब प्रभु तिनिहि दयाद्वग हेरे ॥ परशुराम लीनों औतारा । ब्राह्मण कुलको पा ८नहारा ॥ विद्या बुद्धि तपोधन धारी । रूप शील बल वीरज भारी ॥ सो द्विजराज काज चित दीने । क्षत्री मारि निछत्तर कीने ॥ तथा यहूदिन विकल विचारा । तब मूसा लीनो औतारा ॥ सो फिर उनको मारि नसाया । इवरानिनको प्राण बचाया ॥ विद्या बुद्धि निपुण गुणखानी । बल वीरज शोभा सरसानी ॥ परशुराम कर फरसा जोटा । तैसे मूसाके कर सोटा ॥ जैसे ब्राह्मण तथा यहूदी । दोनों माह देखिये खूदी ॥ कुल अभिगान दोहुनमें भारी । अबिरहाम वंश तन धारी ॥ परशुराम मूसा यक सारा । दोनों विष्णु केर औतारा ॥
इति परशुराम और मूसा
अथ कृष्ण और कृष्णकी एकता—चौपाई
कृष्ण कैष्ट दोउ एक समाना । हरि औतार धरे नर बाना ॥ कैष्ट नाम ईसाको आही । अंग्रेजी बोलीके माही ॥ हिंदू कहे कृष्ण जगदीसा । ईसा इनके ईस हैं ईशा ॥ कृष्ण आगमन जबहि जनायौ । सो सुनि कंसराय भय पायौ ॥ इसा जन्म भव्य सुनि काना । तबहि रोद भूपति भय माना ॥ कृष्ण जोजन्म भयौ जेहि बारा । चहुँदिस फैल गयौ उजियारा ॥ कंसकी डर वसुदेव डेराये । मथुरासे गोकुलमें ल्याये ॥ यथा कृष्ण मथुराको त्यागे । तैसे ईसाको ले भागे ॥ गर्भसे जब ईसा प्रकटाने । चहुँदिश तबहि तेज चमकाने ॥ यूसुफ नृप हिरौद भय पाई । ले मसीहको मिश्र सिधार्ई ॥ कृष्ण जन्म सुनि कंस डेरायो । केते बालक मारि नशायो ॥
१४३
जीवधर्मबोध
( २०५१ )
ईसा भय हिरोद भूपाला । हने बहुत बालक तेहि काला ॥ रोग अनेकन कृष्ण घटाये । जीव केर दुःखद्वन्द्व हटाये ॥ मृतकहूको फेरि जिलाये । गुण अनेक कहलों बतलाये ॥ सा सबही गुण ईसा माहीं । देखि द्वैतदल दूर पराहीं ॥ इन असुरनको मारि नशाया । उन भूतन अरु प्रेत भजाया ॥ कुबरी कूबर कृष्ण सुधारा । तिमि ईसा कुबरी सुखसारा ॥ साठि हजार शिष्य संग लयऊ । दुर्वासा ऋषि आवत भयऊ ॥ चावल एक कृष्ण भंडारा । सबको तृप्त कीन तेहि वारा ॥ रोटी पांच मीन द्वै रहई । सो मसीह निज करमें गहई ॥ पांच हजार भीर नरदीसा । सबको पेट भन्यौ तेहि ईसा ॥ ज्वाला कठिन कृष्णकर घाटा । ईसा अंधकारको डाटा ॥ अर्जुन पर हरि कीनी दाय। तिहि निजरूप विराट देखाया ॥ तिमि ईसा शोभा सरसाई । निजशिष्यन निजरूप दिखाई ॥ कृष्णमें केते गुण सरसाई । तिमि कोइ गुण ईसा अधिकाई ॥ कृष्ण किष्ट दूनों यक रूपा । उभय भये भवसागर भूपा ॥ कृष्णमृत्यु जिमिप्रथम बताया । भील तीरते प्राण नसाया ॥ जगमें जगन्नाथ जग मगही । कृष्ण अस्थि हरिमेला लगही ॥ ईसा को तिमि क्रूस चढाये । जिये बहुरि निज पंथ चलाये ॥ इन गीता उत कथा इञ्जीला । दोनों विष्णु स्वरूप सुशीला ॥
इति श्रीकृष्ण और कृष्णकी एकता
अथ राजा और पण्डितकी एकता चौपाई
राजा पंडित एक समाना । जगमें श्रेष्ठ दोहूका जाना ॥ राज पाये इनके मद भारी । विद्या मद उनके अधिकारी ॥ ये बस करे सेन ले लोहा । अमृत वचन ते मेमन मोहा ॥ ये धन हरबे मनको हरते । हुकुम दोहूको जगमें बरते ॥ इन धन अरु दर्प घनेरा । उनके विद्या धन बहुतेरा ॥
( २०५२ )
बोधसागर
१४४
दिग विजयी दोनों तन धारी । विषयानंद अहै संसारी ॥ इनकी तृष्णा न धनते हटई । वह दिन दिन विद्यामें डटई ॥ धन विद्या बन माह भुलाने । ताते नहीं सतपदको जाने ॥ दोना जो विषयनको तजई । है निरद्वंद जो हरि पद भजई ॥ जत्कमें उत्तम देखो जैसे । भक्तमें श्रेष्ठ होहि सो तैसे ॥ विद्या भक्तिको अंग विचारी । तासु दृष्टि पांडितको भारी ॥ ताते बुध नृपते बड़ अहई । वेद प्रमान शास्त्र अस कहई ॥ विद्याधन सब धनन बड़ेरा । अंग सद्ग ताको नित हेरा ॥ राजकर्म पंडित आधीना । बिन पंडित हो महीप मलीना ॥
इति एकता
अथ भवसागर वर्णन
दोहा-भवसागर वर्षा न करो, सुनो सयाने सन्त । जामें गोता खात जिव, लहै न कोई अन्त ॥ सोरठा-भाँति भाँतिके जीव, चौरासी लख योनि जग । विलग विलग कर पीव, खानि-खानि बिलगायके ॥
चौपाई
यह भव उदधि अपार बखाना । गोता खाहि जीव विधि नाना ॥ चौरासी लख योनि भ्रमावै । बूढ़े उछले पार न पावै ॥ जेते जीव भवनधि तन धारी । मानुष देह मुक्ति अधिकारी ॥ सो मानुष तन दुर्लभ कैसे । जैन धर्म वर्णन कर ऐसे ॥ यह दृष्टांत सुनाये सोई । अस चौड़ा सागर जो होई ॥ कोटिन योजनकी चौड़ाई । भवनधि थूल कहा कहिजाई ॥ बैल केर जूवा गहि लीजै । जूवा डंडा अलग करीजै ॥ तेहि समुद्रके एक किनारे । जूवाको डंडा गहि डारे ॥ जूवा डारे दूजे छोरा । मारे वायूको झकझोरा ॥ बहुत फिरे डंडा अरु जूवा । बहै सदा इत उत सो हूवा ॥
१४५
जीवधर्मबोध
( २०५३ )
जो संयोग कबहु गह सोई । जूवा दंड यकठे होई ॥ आपै आप मिले जो आई । पैठे ताहि छिद्रमें जाई ॥ बिन सहाय जूवामें पैठे । पहिली ठौर ठेकाने बैठे ॥ ऐसी दुर्लभ मानुष देही । चौरासी भ्रम पावै येही ॥ धर्म महम्मद बहुरि बतावै । एक बार मानुष तन पावै ॥ सूसा ईसा मतमें सोई । फेर नहीं मानुष तन होई ॥ वेद करे पुनि ऐसे वर्णन । पुनि पुनि जीव लहै मानुष तन ॥ आठ लक्ष योनी भ्रमि आवै । पुनि गह जीव मनुष तन पावै ॥ सत्यकबीर जो बचन उचारा । अति दुर्लभ मानुष औतारा ॥ नरतनु पाये न भक्ति विचारा । सो पापी आतम हत्यारा ॥ सुरदुर्लभ यह मानुष देही । सो तन लहै भजु परम सनेही ॥ चार खानिके जीव अपारा । जो थावर जंगम तन धारा ॥ कोइ दीर्घ कोइ सूक्ष्म देखो । भारी थूल हरु लघु लेखो ॥ नाना वर्ण और गुणधारी । पूरि रहे भवसागर झारी ॥ युगन प्रजंत काहु थित गाई । अतिसै लघु आयू कोइ पाई ॥ स्वर्ग नर्क चौरासी लाखा । सो सब अंड पिंडकी साखा ॥ भवसागर त्रिदेव भे राजा । सब जिव तिनके देठ विराजा ॥ सोई सुर सुरपति शिरताजा । तिनके हाथ है काज अकाजा ॥ भवसागरमें द्वै तट जानो । एक लोक यक वेद बखानो ॥ वेद कूलपर मन आसीना । लोकछोर माया गहि लीना ॥ मध्यमें तीन देव गुणधारी । महा अपर्बल पाँच शिकारी ॥ भ्रमसागर कहिये भवसागर । दश दिश काल मचायौ झागर ॥ भव पुनि भगको नाम कहावै । तामें सब जिव आवै जावै ॥ भव शिव नाम भवानी पतिको । जीव लखै को ताकी गतिको ॥ तीनों लोक वसै भग माही । बिन गुरु कृपा न बाहर जाही ॥ कोटिन योग युक्ति जो करिये । भग मारग पुनि पुनि पग धरिये ॥
( २०५४ )
बोधसागर
१४६
चौरासी लख मीन बनाये । मन मछुवा सब तिनहि फसाये॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
तन झौपडी मन बसै महरवा ।
नान्हेनान्हे डोभवन बीनै महजरवाडारि दिये नियक भरमसगरवा ।
गहिरैमें महरा पैठि न सकै विन बूड़े नहि मिलत सिकरवा ॥
यक ओर महरा यक ओर महरी मारि लिहे नियक मोहमछरवा ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो ताकि लिहे नियक अमर सहरवा ॥
चौपाई
तीन देवमें विष्णु बड़ेरे । तिनको हुकुम फिरे चहुँ फेरे ॥
तीन लोक भवसागर माही । तीन देव तहाँ राज कराही ॥
तीन लोकको सूत्र बखानो । जामें सकल जीव भरमानो ॥
प्रथमहि विष्णु सर्व शिरमौरा । तासु हेठ सुरगण सब औरा ॥
दुतिये पौरी विद्याधर है । नहीं देवता नहिं सो नर है ॥
सुर नर माह जान यह सीढी । भाषो बहुरि तीसरी पीढी ॥
नर वानर यक लेखे कहिये । यक व्यौहार दोहमें लहिये ॥
दोनों बीच भेद अति थोरा । पशु अरु मानुषमें यह डोरा ॥
विन दुम नर कपि पूछ समेता । नर वानर यक गुण कह केता ॥
औरैंग औटैंग वानर जोई । नर आकार सर्व सो होई ॥
अंगरेजीके ग्रंथन माहीं । विना पूछ वानर यह आहीं ॥
दोनों पगते नर ज्यों चाले । दोनों हाथ काममें डाले ॥
वानर इतर जाति बहु तेरे । भिन्नभेद क्रम क्रमसे हेरे ॥
अंगरेजी अखबार बखाने । द्वै मानुष दुमदार लखाने ॥
हवशदेशको जंगल जहँवा । द्वै मानुष दुम युत रह तहँवा ॥
डेढ़ हाथकी पूछ सो गहई । मादमें पशु समान सो रहई ॥
एक जाति मानुषको आही । रहे हिमालय पर्वत माही ॥
ऐसो निकट छोड़ तनधारी । पंछिन संग मचावै रारी ॥
१४७
जीवधर्मबोध
( २०५५ )
चील्ह गीध गहि गगन उड़ाही । तेहि मानुषको धरि धरि खाही॥ तब सो नर गण जोरि सहाई । पंछिके संग करे लड़ाई ॥ ऐसे विविधि भांति नरजाती । तिनकी कथा न कथे सिराती ॥ नानारूप बरण गुणधारी । जहाँ तहाँ पृथ्वी माह विहारी ॥ चार लक्ष मानुषकी जाती । तिनकी कथा कथे बहु भांती ॥ जलमानुष थलमानुष देखो । वनमानुष आदिक बहु लेखो ॥ पशुमानुष कहु मिश्रित होई । अकथकथा कहि जात न कोई ॥ बहुरि कहो मानुष पशु ख्याला । सब परिवार जो करे उगाला ॥ भोजन पीछे पागुर करही । बिन उगाल तिनको दुःखधरही ॥ पशु नर नरपशु एक सो हेरी । देखहु कुदरत करता केरी ॥ छायारूपी नर कहु सरसै । चेष्टा दीख रूप नहिं दुरसै ॥ रचना विविधि भांति कहि गार्ई । ताको लेख लिखो नहिं गार्ई ॥ चौथो सूत्र बहुरि कहि गावो । जलचर मानुष मेल मिलावो ॥ रह समुद्रमें गर्गन मच्छी । अर्थ है मीन अर्थ तिय अच्छी ॥ कटिके ऊपर सुन्दर नारी । अर्थहेट मच्छी तनधारी ॥ कबहुके सागर तीर सुरखारी । कबहुके जलमें गोता मारी ॥ भुंगी ऋषि शिर सींग बताई । मुखमें सुण्ड गणेश गोसाई ॥ पंचम पौरी करो बखाना । पशुपंछीको मेल मिलाना ॥ चाम सुन्दरी वाको कहई । दोनों रंग ढंग गुण गहई ॥ सो नहिं खग अंडजकी जाती । चाम गूदरी है बहु भांती ॥ नहिं पशु नहिं खग मध्यम थापू । सुरगी एकसै परसे टापू ॥ वृद्ध नारि सो सुख है जाको । जब कोइ दुःख देत है वाको ॥ रुदन विलाप करे जस नारी । केते पशु खग नरगुण धारी ॥ दाडुर एक अमेरिका देश ! रुदन करे जब लहे कलेशा ॥ छठी पौरी बरणो सोई । जो चेतन रूप जड़ होई ॥
( २०५६ )
बोधसागर
१४८
लजवंयक पौधा चेतन । पशु पंछी सम चेत तासु तन ॥ जड़ चेतन गुण दोहू गहावै । पशु पौधाको मेल मिलावै ॥ सतई पौरीको अर्थावो । जो चेतन जड़ सम स्थिलावो ॥ पलपी तारा दोनों मछरी । सो सम चेतनते अति पछरी ॥ जड़ समान यक ठौर गहाई । हले न चले गहे थिरताई ॥ पलपी देह दाग बहुताई । जो कोइ ताको काटै जाई ॥ जैसे माली कलम लगावै । फूल बेलको काटि बनावै ॥ जेतनो टूक करें कोइ ताको । होहि पालपी सबही वाको ॥ जेतनी दाग रहे तब माही । सो सबही पलपी है जाही ॥ जड़ चेतन दोऊ ता ढंगा । जड़समान चेतनको अंगा ॥ अष्टम पौरी कहो बखानी । जड़मय योनि गोदजिव जानी ॥ नर नारकी लोक जिव पौरी । जड़सम सदा रहै एक ठौरी ॥ नर्कहेत नारकसो नाही । जैन मते दुख देखो नाही ॥ तीन लोकको सत जो भाषा । काया तरुकी पह सब साषा ॥ जैसो कर्म जीव जो कर्ता । तैसो तनधरि जगमें वर्ता ॥ सब जिव पुण्य पापकी आसा । पुनि पुनि कर योगिनमें वासा ॥ इति जीवधर्मबोध समाप्त
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The emblem is centered on a red background. It consists of a golden teardrop-shaped frame containing the Devanagari word 'प्रेमी' (Premi). Below this frame is a golden ribbon or banner with the text 'खेमराज श्रीकृष्णदास' (Khemraj Shri Kunnadas) written in Devanagari script. The entire emblem is surrounded by a wide, ornate golden border with a repeating pattern of stylized floral and geometric motifs.
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.