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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

(१३४)

सर्वज्ञसागर

तहाँ बैठि सब रचना कीन्ह। सोई शब्द अधार जो लीन्ह। ॥ सुख हिरदय ते कीन्ह प्रकाशा। तहाँ रूप अति भयी उजासा ॥ काया ते काया निरमाये। सुख कमल हो बाहर आये ॥ रूप सुरतिका रूप अपारा। भुंगि शब्द पारस अनुसारा ॥ भुंगिशब्द पुनि पारस दीन्ह। निःकलंकपुरुषप्रकटकरलीन्ह। ॥ रूप सुरति ते निकलंकी भयऊ। तिनको आज्ञा उत्पति दियऊ ॥ निकलंक विनती तब कीन्ह। कौन सन्धि साहब मोहि दीन्ह। ॥ कहौ भेद जेहि उत्पन होई। सोई शब्द गुरु भाषो सोई ॥ तब समरथ अस वचन उचारा। निष्कलंक सुन मता हमारा ॥ शब्द हमार दृढ हिरदय धरहू। निज सुमिरण तुम हमरा करहू ॥ जो चित सुरति तुम्हारे होई। तौन वस्तु सिसै सब कोई ॥ साखी-जो कुछ रचना चाहो करन, सुरति करत सो होई ॥ रचहु लोक तुम वेगि पुनि, दीन्ह वचन मैं सोई ॥

चौपाई

सुरति करत सबही बनि आई। इच्छा करत सन्धि होय भाई ॥ निश्चल लोक हमारो बासा। अविगति कमल कीन्ह प्रकासा ॥

साखी-जीव सृष्टि रचना करो, सकल जीव उत्पान ॥ शब्द भरोसे तुम रहो, लेउ वचन सिर मान ॥

चौपाई

तुम धर्मदास सुनो चित लाई। तब निष्कलंक सृष्टि निरमायी ॥ निःकलंक सुरति स्वास ठहरायी। सहज सुरतिको टेक बनायी ॥ दहिने अंक सो शब्द निर्मायी। सहज शब्द सुरति अंकुर उपायी ॥ सात करी विस्तार बनायी। यहि विधि रचना निरमायी ॥

सर्वज्ञसागर

( १३५ )

सात करी अंकुर ते भयऊ । भिन्न भिन्न प्रसंग सो लयऊ ॥ सीप सरूपी करी जो कीन्हा । स्वास स्वरूपी इच्छा दीन्हा ॥ सात इच्छा सात करिनमें भयऊ । स्वाति सरूप बून्दतेहि दयऊ ॥ सातो करि भयी प्रकासा । नहिं तब धरती नहीं अकाशा ॥ अर्द्ध अंकुर रहा ठहरायी । तब मुख शब्द स्थिर कहैं आयी ॥ सोरह अंस जो जन विस्तारा । इतनी दृष्टि अंकुरज पसारा ॥ तेहिमें सास करी उपजायी । ताकर मर्म काहु नहिं पायी ॥ तेहि करिन ते अण्डा भयऊ । द्योयकरी विन अण्डा रहेऊ ॥ नहिं तब धरती नहीं अकाशा । अधरहिं अघर अण्ड प्रकासा ॥ मध्य में अण्ड करे चौ चण्डा । एक अण्ड उपज्यो प्रचण्डा ॥ भिन्न भिन्न गति न्यारी कीन्हा । शिवशक्ति अण्डमहँ धरि दीन्हा ॥ नौसे निमिष अन्तर होय छूटा । तबहीं अण्ड उठचो पुनि फूटा ॥ प्रथमहिं तेज अण्ड विगस्यो भाई । तामें पांच तत्त्व निर्माई ॥ बाहर पालँग तेज अण्ड विस्तारा । तामें पांच तत्त्व भौ सारा ॥ तत्त्व स्नेह अण्ड सो कीन्हा । अस्थिर शब्द काल भल दीन्हा ॥ तबहीं श्रवण साजी वानी । तेहिंते मूल सुरति उत्पानी ॥ अबोलपरस सुरति कहि दीन्हा । सात संधि प्रकट कर लीन्हा ॥ सात सन्धि तब गुप्तहिं पेखा । पीछे सोहँ शब्द विवेखा ॥ सोहँ शब्द सत्य अनुसारा । सोहँ सुरति अजावन पसारा ॥ जावन ते पुरुष अचित निर्मायी । तेहि पुरुष अपने निकट बुलायी ॥ तेहि सो पुरुष ऐसी कही । सकल सृष्टि रचो तुम सही ॥ पुरुषको विनय कीन्ह करजोरी । हो सतगुरु विनती यक मोरी ॥ केहि विधि रचौं सो देहु बतायी । तीन भेद गुरु देउ पढायी ॥ नीकलंकी पुरुष वाच उच्चार । शब्द प्रतापकर अगम विचारा ॥ शब्द प्रताप लेओ शिर नायी । सुमिरण करौ हमहिं लौलाई ॥

सात सन्धि विषयक प्रश्न

( १३६ )

सर्वज्ञसागर

पांच अण्ड हम पहिले कीन्हा । तेहिमें सर्व तत्त्व गुण दीन्हा ॥ जो कछु इच्छा करौ दिलमाहीं । सो सब कछु पैहौ तहाँहीं ॥ शब्द प्रताप अर्चित जब लीन्हा । सकल सृष्टिसो उत्पन्न कीन्हा ॥

साखी-पुरुष अण्ड लैगये, देखा सकल पसार ॥ सद्गुरु रहे निहार तब, समरथ वचन अधार ॥

धर्मदासवचन-चौपाई

धर्मदास चरण गहे धाये । हे सतगुरु तुम अगम बताये ॥ पुरुष अर्चितके सृष्टि फरमायी । तात सन्धि कहैं राखे छिपाई ॥ कौन लोक कहैं लीन्हे वासा । सोई भेद गहौ परकासा ॥

सतगुरु वचन

जब अर्चितको सृष्टि फरमायी । तेहि पाछे यक सुरति उठायी ॥ सोरह असंख अंकुर पसारा । तेहि में पांच अण्ड विस्तारा ॥ मिहरसुरति अजर लोक बनायी । तेहि महाँसातौ सन्धि छिपायी ॥ सातौ सन्धि उहाँ लै राखा । समरथ भेद गोइ कछु भाखा ॥ सातौ सन्धि सो गुप्त छिपावा । ताकोअन्त काहु नहि पावा ॥ मिहर लोक सन्धिन कहैं दीन्हा । आपन वास निरन्तर लीन्हा ॥ निरंतर गुप्त ठिका निर्मायी । तामे सतगुरु रहे छिपायी ॥

साखी-गुप्त भेद किया इतनौ, काहु न पायो पार ॥ पुरुष अर्चितकी सृष्टिको, धर्मनि सुनो विचार ॥

चौपाई

पुरुष जब घटमें कीन्ह विचारा । प्रेम सुरति तबहीं उचारा ॥ प्रेम अनन्द उपज्यो रे भाई । तेहिते प्रेम सुरति उपजाई ॥ प्रेम सुरति भै रूप अपारा । प्रेमानन्द घट शब्द उचारा ॥ नेत्र हेर बुन्द सो ढारी । सोइ सुरति दिल माँहिनिहारी ॥

सर्वज्ञसागर

(१३७)

सुरति बुन्द तब तासों लीन्हा । सोई बुन्द अथर महँ दीन्हा ॥ ताहि बुन्दके अक्षर भयऊ । स्वर स्वासा हो बाहर गयऊ ॥ पुरुष अचिन्त आज्ञा सब दीन्हा । तेज अण्ड जो बैठक लीन्हा ॥ बारह पालंग अण्ड है सोई । तेहि में सृष्टि तुम्हारी होई ॥ अच्छर आनन्द ताहि समाया । तामें परकृति सुरति उपजाया ॥ प्रकृति तें चारि अंश निर्मायी । देखि अंश आनन्द समायी ॥ तेहि अनन्द सो निद्रा आयी । सत्तर निमिष जब गयो सिरायी ॥ चारों जने समाधि लगायी । ताको मरम कहौ समझायी ॥ तब सतगुरु एक अवगति कीन्हा । जल तत्त्व ते अण्ड तब दीन्हा ॥ जब अण्डा जलमें उतराना । तब अन्तर निद्रा विलगाना ॥ अक्षर मनमें कीन्ह विचारा । विकल भये तबहीं पगु धारा ॥ चले चले अण्डा लगि आवा । देखत अण्ड कोष उपजावा ॥ सोई कोष अण्डमें आवा । तेज शक्ति ताकर प्रभावा ॥ तेहि कारण मो फूटचो भाई । तेहिते निरंजन उपजाई ॥ कालरूप सो प्रकट प्रचण्डा । महा भयानक रूप अखण्डा ॥ अक्षर मनमें शंका आई । तब चारों सुतन कहँ लीन्ह बुलाई ॥ उनको बहुत भांति समुझाई । पृथ्वी बीज धरौ तुम जाई ॥ जग उत्पति तापै होय भाई । कूर्म शेष पृथ्वी थाह्यो जाई ॥ जाते पृथ्वी डगे नहिं भाई । साइ उपाय करौ तुम जाई ॥ धर्मराय तुम लेखा लेहू । सकल सृष्टि को लेखा देहू ॥ चारों अंश को सिखाप दीन्हा । आप वास मुक्ति दीपमें लीन्हा ॥

साखी—यह रचना अचिन्तक, अक्षर को विस्तार ॥

निरंजन बैठे शुभ शिखर, मान सरोवर द्वार ॥

चौपाई

पुरुष अचिन्त अस चित्त विचारा । सन्धि सुरति घट में उबारा ॥

सात सन्धिका वर्णन

(१३८)

सबन्धसागर

तेहिंते चौदह मुनि उपजाये । जल अण्डते अंश बनावे ॥ चौदह मुनि चौदह दीप बैठारा । पांजी पताल उनको विस्तारा ॥ संधि छाप सौंप सब दीन्हा । अच्छर लोकमें चौका कीन्हा ॥ यहि पुरुष चौदह अंश बनावा । यहि अक्षरमें मोह समावा ॥ तब अक्षरको संशय आई । तेहि ते स्वासा छोड़े भाई ॥ स्वासा संगम उठी तब बानी । माया सुरति तब भयी उत्पानी ॥ माया सुरति अच्छर उपजायी । अष्टंगी सो कैसो शक्ती आयी ॥ अच्छर अष्टंगी सो कहई । जाब जहाँ निरंजन रहई ॥ अष्टंगी तब कहे समझाई । हम कैसे निरंजन पहुँ जाई ॥ तब अक्षर अस कहे भेऊ । निरंजने जाइ सिखापन देहू ॥ कन्या चलि निरंजन लगी आयी । आदि निरंजन मिले तब धायी ॥ देखि कला तब गये भुलाई । हे कन्या तोहिं को निर्माई ॥ काम ज्योति प्रकटी प्रचण्डा । तब चित विकल भयो नरमण्डा ॥ सकल रूप गयउ भुलाई । कामकि लहरि दोउको आई ॥ तब संयोग भयो त्रय बारा । जेठे ब्रह्मा लघु विष्णु कुमार ॥ तीजे शम्भू सबसे छोटा । ये निज भये ताहिंके ढोटा ॥ साखी-जैसे रूप निरंजन, तैसे तीनों बार ॥ प्रलय काल पैदा भये, प्रलय करत संसार ॥

धर्मदासवचन-चोपाई

धर्मदास जिव भये अनन्दा । मैं पाया पूर्ण गुरु चन्दा ॥ धन्य भाग मोहि मिलै गुसाई । आपन करि मोहि लियो सुत्ताई ॥ और एक पूछनकी आशा । चौरासी लक्ष कैसे प्रकाशा ॥ तीन प्रकार सृष्टि किन पाऊ । चौथेका मोहि भेद बताऊ ॥ साखी-धर्मदास सुख पायो, घट मो भयो अनन्द ॥ संशय मिटे प्रफुल्लित भये, ज्यों पूनोको चन्द ॥

चौरासी लक्षका प्राकट्य

सर्वज्ञसागर

( १३९ )

सतगुरु वचन—चौपाई

सुनु धर्मनि मैं कहूँ समझायी । लक्ष चौरासी योनि बनायी ॥ माया चरित्र अब तोहिँ सुनाओ । एक एक कै सब भेद बताओ ॥ चारि कला स्वरूप धरि चारी । एक एक गति कहौँ विचारी ॥ एक स्वरूप सुरति लगि रही । तीन स्वरूप भिन्न घर सही ॥ एक कला गायत्री भयञ्ज । जब पिताखोजको ब्रह्म गयञ्ज ॥ सो गायत्री ब्रह्माको दीन्हा । दूसरी कला लक्ष्मी कीन्हा ॥ मध्यो समुद्र रतन कटि आया । लक्ष्मी तबही विष्णुने पाया ॥ तिसरी कला पार्वती कीन्हा । सोइ कला शम्भु कहँ दीन्हा ॥ यह चरित्र मायाको भाई । जाकी गति मति लखी न जाई ॥ तीन शक्तिको खेल अपारा । इनही रचयो सकल संसारा ॥

सारखी-माया परबल सबनमें, जो चाहे सो होय ॥

लख चौरासी इन रची, मरम न जाने कोय ॥

माया सृष्टि माया रची, जीव अनेक बनाइ ॥

उनते सब कहु होत है, कहै कबीर समझाइ ॥

इति श्रीसर्वज्ञसागरे सृष्टिखण्डवर्णनोनाम प्रथमस्तरंगः ।

अथ द्वितीयस्तरंगः

ज्ञानखण्ड वर्णन

धर्मदास वचन—चौपाई

धरमदास पूछे चितलायी । उत्पति भेद सकल हम पायी ॥ अब जिव कारज कहौ विचारा । जेहि करनीसो हंस उबारा ॥ सो विधि ज्ञान कहो समझायी । जाहि ज्ञान से लोकहि पायी ॥ जीव उबारन ज्ञान सुनाओ । हे सादेब ! मोहि नाहि दुराओ ॥

(१४०)

सवज्ञसागर

साखी-सत्यसार बतावहु जाते कारज होय ॥ चौदह कोटि ज्ञान जो, सो हम देखि विलोय ॥

सतगुरुवचन-चौपाई

सुनु सुकृत मोर प्राण अधारा । तुमसे कहौँ अब सकल पसारा ॥ ऋग्वेद भेद मूलको पाया । चारि सुखको मर्म लखाया ॥ प्रथमहिं चारि वेद है सारा । चारि धाम पर मुक्ति पसारा ॥ सेवक शब्द सुमिरन चित लावे । सब सुख पृथ्वी पर भुक्तावे ॥ कोइ सिद्ध कोइ पण्डित होई । कोइ रूप पावै पुनि सोई ॥ जौँ लगि दान पुण्यकी आशा । तब लगि है वैकुण्ठ निवासा ॥ कोइ विद्या कोइ वेदको पावै । फिरिकै देह संसार धरावै ॥ अब सुनु साम वेद विचारा । विष्णु ध्यान वैकुण्ठ सिधारा ॥

साखी-बीते पुण्य भोग सो कीन्हे, आइ धरे जग देह ॥

जब लग दान पुण्य का आशा, तब लग सुरपुर नेह ॥

चौपाई

तिखरी मुक्तिको सुनो विचारा । सब मुनि योगी शून्य सिधारा ॥ सायुज्य मुक्ति चौथी है भाई । अक्षर ध्यान मानिकपुर जाई ॥ पचई जीवन मुक्ति है भाई । जहाँ देह धरे विन रहै समाई ॥ कहि निज उत्तम पुरुष बतावा । परम धाम सब संतन गावा ॥ पुरुष भक्ति जाके घट आई । एक ब्रह्म राखे ठहराई ॥ परम धाम सोइ पहुँचे जायी । जिन परमात्मा चीन्हो भाई ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास पूछे कर जोरी । एक भेद प्रभु कहौँ बहोरी ॥

सर्वज्ञसागर

(१४१)

काहे पर वह कहिये भामा । जहां जीव पावे विश्रामा ॥ करनी लोक मुक्तिको भेदा । तुमसे कहौ मैं सुन्यो निखेदा ॥ सो सब भेद अहौ मोहि साई । संशय सब विधि देहु मिटाई ॥

साखी-काहे पर सुमेरु है, काहेपर कैलास ॥

काहे ऊपर शून्य है, कहैं अक्षरको वास ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

सुनुधर्मदासतोहिकहौंविचारा । यह भेद अगमगति भारा ॥ सोरह नाल पुरुष निरमायी । लोकनको थम्भन नाल रहायी॥ कदली नाल लोकते आई । सात शाख भइ ताकी भाई ॥ सुवरण रंग नाल है सोई । एकहि वर्ण नाल सब होई ॥ प्रथमहि गुप्त नाल है भाई । तहां परवत पुनि नाम धराई ॥ तापर परम धाम बनाया । तेहि में पुरुष तत्त्व रहाया ॥ दुसरी मंजुम नाल जो आवा । मानिक पर्वत नाम धरावा ॥ तेहि पर मानिक दीप बसाया । अक्षर पुरुष दीप सो पावा ॥ तिसरी सुरंग नाल है भाई । तापर झझरी दोष रहाई ॥ तहैंवा रहै निरंजन राई । तीन देव तिनही निर्माई ॥ चौथी नाल क्रांति रह सोई । ता ऊपर वैकुण्ठ जो होई ॥ पंच शिखर सुमेरु सँवारी । एकपै इन्द्र एक कुबेर भंडारी॥ यकपै ध्रुव एक पैयम विस्तारी । मध्यमें विष्णु सकल व्रतधारा॥ पांच ये नाल जो रचि राखा । ताकर नाम कैलास असभाखा॥ तहवों शंकरको है बासा । याग समाधिकी लावे आसा ॥ छठयें नाल उमंग ठहरायी । अघाचलही नाम सो पायी ॥ सतय त्रिकुटी ब्रह्म अस्थाना । तरंग नाल पारस है ठाना ॥ कलकी नालकी सातों साखा । सातों दस यहां लों राखा ॥

(१४२)

सर्वज्ञसागर

यही बनाव धरती में होई । अधर वस्तुको जाने सोई ॥ अधरही चौका चारि प्रकासा । चन्द्र सूरजको तहां निवासा ॥ प्रथम अधर अंकुरहि निशानी । पांच अण्ड कीन्हे उत्पानी ॥ दूसर अधर निकलंकी जाना । तिसरे रूप सुरति परवाना ॥ चौथे अविगति नाम धराया । पांचे सरवल्ली पुरुष कहाया ॥ चारी अंश अधर विस्तारा । धर अधर दोनोंसे न्यारा ॥

साखी-पांच तत्त्व तब ना हते, हते न हाट रु बाट ॥ लोक द्वीप तब ना हते, ना हते औघट घाट ॥

चौपाई

सुनो धर्मदास कहौ मैं तोही । जो कछु भेद पुछिहौ मोही ॥ सब अंशनके लोक बतावा । अंश वंश सब तोहि लखावा ॥ करनी करै सो लोकहि जायी । विनु करनी फिरिफिरि पछितायी ॥

साखी-सर्वज्ञसागर खोजहि, सब ग्रन्थनको सार ॥ कहैं कबीर निज मूलको, सत्य शब्द आधार ॥

इति श्रीसर्वज्ञसागरे ज्ञानखण्डवर्णनो नाम द्वितीयस्तरंगः ।

समाप्तोयं ग्रन्थः

उपसंहार-चौपाई

जेहि मानुष बुद्धि सब विधि आवै । अपनो कारज सोइ बनावै ॥ कपट कुटिलता काल नशायी । सत्य विचार रहै लौलाई ॥ जवनी भांति जिव कारज होई । लाज मिटाय करै दृढ सोई ॥ लोककाज कुलकानके मारे । भँवरि भँवरि भव रहैं विचारे ॥ जेहि यम फन्द छूटे सो करना । नाहकमें काहे पचि २ मरना ॥

सर्वज्ञसागर

( १४३ )

भली भांति सो लेहु विचारी । सकल अंचारज मतहिं सुधारी ॥ खरा खोट जो परखा नाही । अन्धा धोखे मूल नशाही ॥ प्रथम विचारहु औषध रोगा । केहिविधि शब्द हरे सब सोगा ॥ देखो शब्द प्रकाश विचारी । जाते सकल होय उजियारी ॥ गुरु एक सो कौन कहावे । जासो आवागमन नशावे ॥ सेवा अनेक करिय केहि केरा । विन जाने सब धुन्ध अन्धेरा ॥ गुरु मत मनमत करे विचारा । सो जिव निज करे निरुआरा ॥

सारखी-विन देखे नहिं देशकी, बातें कहै सो क्रूर ॥ आपै खारी खात है, बेचत फिरे कपूर ॥

चौपाई

औषध पांच राह सब करई । औषध विना न कोई सहई ॥ शब्द स्पर्श रूप रस गन्धा । द्वारा पंच औषधिकी सन्धा ॥ सबहीं द्वार बूझ रहायी । बिन बूझे नहिं कोइ ठहरायी ॥ कोइ झीना कोइ मोटा द्वारा । तैसहिं तासु भिन्न व्यवहारा ॥ झीना शब्द है पवन स्वरूपा । तासो मोटा अनलको रूपा ॥ अनलहु ते जल मोटा होई । जलते मोटी पृथ्वी है सोई ॥ पुनि प्रकाश एकते एका । थिर होइ देखे करे विवेका ॥ पृथ्वी मोटी आँख प्रकाशी । तासे मध्यम दृष्टि प्रवेशी ॥ दृष्टीसे जल झीना होई । भीतर जो है दीसे सोई ॥ जलसो झीन तेज प्रकाशा । जामे परशे धरति अकाशा ॥ रूपसो अधिक शब्द उजियारा । दृष्टिमें आवे सब संसारा ॥ भूत भविष्य जो हो वर्तमाना । शब्द भीतरे सबै समाना ॥ बूझ शब्द में पेठे जायी । शब्दके भीतर अनल रहायी ॥ अनल मध्य होयके जल देखा । जलके भीतर पृथ्वी पेखा ॥

१ आचार्य, धर्मप्रवर्तक ।

( १४४ )

सर्वज्ञसागर

साखी-रैन समानी भानुमें, भानु अकाशे माहिं ॥ अकाश समाना शब्दमें, शब्द रहा कछु नाहिं ॥

चौपाई

पांचो औषध करै विचारा । मोटा झीना जो व्यवहारा ॥ औषध अन्न जल पेट समाही । जाते क्षुधा औ प्यास नसाही ॥ बहुत प्रकार लादके रोगू । सो सब जाय भोजन संयोगू ॥ गन्ध कपाले पहुँचे जायी । गुण औगुण सब अंग समायी ॥ लेपै गुण सब ले पहुँचावै । गुण औगुण सबमाहिं समावै ॥ आंखिकी राह रूप गहि लेई । शीत उष्ण सब अंगमें देई ॥ शब्द औषधी कानके द्वारा । बूझ समय करे निरुआरा ॥ हर्ष विषाद यंत्र औ मन्त्रा । व्यापै सबै कोइ कोइ स्वतन्त्रा ॥ मर्म सबै द्वाराको बूझे । विना शब्द निर्णय नहिं सूझे ॥ स्पर्श रूप इत्यादिक चारी । सो सब मोट स्थूल अधिकारी ॥ पुनि अस्थूल सो थिर न रहारी । तैसहिं औषध ताहि समायी ॥ अंग अंगको देश है जैसा । अल्पे गहिये औषध जैसा ॥ शब्द अति झीना बूझविचारा । जाते होय सकल निरुआरा ॥ शब्द विना कोइ पार न पावै । विन गुरु कौन जो दाव लखावै ॥ सर्व देश सर्वज्ञ है सोई । तेहि विनु कारज सघे न काई ॥

साखी-शब्द विना श्रुति आंधरी, कहो कहाँको जाय ॥ द्वार न पावे शब्दका, फिरि फिरि भटका खाय ॥ गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ॥ गुरु सदा सो वंदिये, शब्द बनावे दाव ॥ फेर परा नहिं अंगमें, नहिं इंद्रिनकी माहिं ॥ फेरा परा कछु बूझमें, सो निरबारचो नाहिं ॥

सर्वज्ञसागर

(१४५)

चौपाई

यहि संसार बहु वैद्य विराजे । नाना भाँति औषधी साजे ॥ साच एक झूठा बहुतेरा । विना साँच नहिं होय निवेरा ॥ एक असल पर नकल अनेका । अनेक नकल नहिं पावे एका ॥ बहुविधि ठग सब करे ठगाई । यमके फन्दा रहे अरुझाई ॥ बूझि समझिके औषध कीजै । मिथ्यामें जिव काहेको दीजै ॥

मसला

गुरु कीजिये जानिके, पानी पीजै छानिके ॥

चौपाई

वेद पुराण किताब कुराना । दोहा साखी शब्द परमाना ॥ अनन्त भाँतिका शब्द पसारा । विनु जाने नहिं होय सुधारा ॥ सो सब औषध बहु विधि जाचे । यम फन्दासे तबही बांचे ॥ पक्ष वाणीको मन मत कहिये । जाते द्रन्द सबै घर लहिये ॥ निर्णय वाणी गुरु मत होई । पक्षा पक्ष जाते सब खोई ॥ जब निर्णयकी वाणी आवै । झूठा खोटा आपु लजावै ॥ निर्णय सो सबके हितकारी । जेहि परसे जिव होय सुखारी ॥ सार शब्द निर्णयको नामा । जाते होय जीवको कामा ॥ गुरु एक जो निर्णय करई । झगरा कबहुँ परे न परई ॥ जो कोइ निर्णय आश्रित भयऊ । सेवा करि निज कारज कियऊ ॥ सो सब सेवा शिष्य कहावै । मन मत सो जो और बतावै ॥ जग बुद्धि कहे मम गुरु एका । जेहि तेहि सेवा करे अनेका ॥ पुनि जाको इन गुरु ठहराई । ताको दूसर गुरु सहाई ॥ तेहिकी सेवा करे लौ लाई । सो सेवा पद कैसे कहाई ॥

( १४६ )

सर्वज्ञसागर

टहल करे टहलू कहलावे । तासो पद सेवा बनि आवै ॥ सोइ सेवक जो सेवा करई । विना विचार बूझ न परई ॥ अपने अपने गुरुमत माने । और सब मन मत अनुमाने ॥ विलु निर्णय सो द्रन्द न जाई । पचि पचि मरहिं करहिं लडाई ॥ जहैं झगडा तहैं गुरुमत नाही । जहैं गुरुमत तहैं द्रन्द नसाहीं ॥

सार्वी-पक्षा पक्षके कारणे, सब जग रहा भुलान ॥ निपक्ष होइके हरि भजे, सोई संत सुजान ॥

शब्द शब्द बहु अंतरा, सार शब्द मथि लीजे ॥ कहैं कबीर जहैं सार शब्द नहीं, धृग जीवन सो जीजे ॥

चौपाई

खरा खोट परखहु बहु भांती । तबहीं होय जीव कुशलाती ॥ जेहि गुरु ज्ञान न छूटत केरा । बहुत अनुमान सो भ्रम बौढेरा ॥ भवसागर दुस्तर कठिनाई । नौका नाम तहैं सत्य दिढाई ॥ बूढ़े भवकी धार न सूझे । सुए सुक्ति ऐसी दृढ़ बूझे ॥ जहैंसे उपजे तहां समाना । कसर विकार मूल नहि जाना ॥ भरमैं आप जीव भरमावे । नाटक चाटक सुयश बढावे ॥ करामात करतूत बखाने । नास्तिक ज्ञान सोइ सत्यकै माने ॥ ऋद्धि सिद्धि सब जात नसाई । नास्ति ज्ञान नाही कुशलाई ॥ त्यर्थ ऐश्वर्य नास्तिन माहीं । जाके पीछे जिव बौराहीं ॥ आपु गये यजमानहु खोये । भांति भांति फन्दा अरुझोये ॥ रोगी वैद्य दोनों एक ठाऊँ । औषध कही कल्पनाके गाऊँ ॥ जेहि कारण नर साई जो देई । सो सौदा जँचि काहे न लेई ॥ ठग भरमावे बहु विधि लूटे । यम धन्धासे कबहुँ न छूटे ॥ मोटि अविद्या छुड़ावन लागे । झीनी महा अविद्या पागे ॥ झनी माटे दोउ कष्ट से रूपा । कारण नास्ति परे त्यहि कृपा ॥

सर्वज्ञसागर

(१४७)

पूरा धनी पूरा सो सौदा । परखत मेंटे कालको फन्द । ॥ संधि लखावहि कारण रोग । मेंटहिंसब विधि संधिकसोग । ॥ नहि सन्देह न यमके त्रासा । सदा मुखारी परख विलासा ॥ धन्य सोबूझि समुझि पग धरई । अँधरन भटक भटक भवपरई ॥

साखी-बलिहारी तेहि पुरुषकी, पर चित परखनहार ॥ सार्ई दीन्हों खांडको, खारी बूझ गवॉर ॥ करु बन्दगी विवेक की, भेष धरे सब कोय ॥ सो बन्दगी वहि जानदे, जहँ शब्द विवेक न होय ॥ मानुष देही पाइके, चूके अबकी घात ॥ जाइ परे भवचक्रमें, सहे घनेरी लात ॥

इति । मानुष विचारसे.

इति तृतीयखण्ड समाप्त

A black and white botanical illustration of a flowering plant, possibly a daisy or sunflower, with a central flower head, a bud, and several leaves, centered within a decorative border.

भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी) द्वारा संशोधित

लेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई

संस्करण : अप्रैल २०१९, संवत् २०७६

मूल्य : १०० रुपये मात्र ।

© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदास TM

अध्यक्ष : श्रीवेकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

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प्रारंभिक पृष्ठ (बोधसागर प्रथम भाग)

बोधसागर प्रथमभागकी अनुक्रमणिका

3

इसमें तीन तरंग हैं जिनमेंसे प्रथम तरंग ज्ञानप्रकाश पृष्ठ ९ से आरम्भ होकर पृष्ठ ६५ पर समाप्त हुआ है।

दूसरा तरंग अमरसिंह बोध है जो पृष्ठ ६९ से आरम्भ होकर पृष्ठ ९२ पर समाप्त हुआ है।

तीसरा तरंग वीरसिंह बोध है जो पृष्ठ ९७ से आरम्भ होकर पृष्ठ १२७ पर समाप्त हुआ।

अब तीनों तरंगकी विषयानुक्रमणिका नीचे देते हैं।

ज्ञानप्रकाशकी अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठ.
कबीर साहबका जिन्दा रूपसे मयूरामें धर्मदास साहबको प्रथमवार मिलना
५ कबीर साहबका गुप्त हो जाना (धर्म-दासजीकी विरह)
छठे दिन कबीर साहबका धर्मदास साहबसे दूसरी बार मिलना१४
धर्मदासजी का गुरु रूपदासजीके निकट जाकर ज्ञान पूछना२०
धर्मदासजीका साहबसे मिलनेकी चिन्ता करना और सद्गुरुका जिन्दा रूपसे तीसरीबार दर्शन देना और धर्मदास साहबका रसोई बनाने हुए चाँटीके जलनेसे डूबी होना और साहबको पहचानना२१
त्रिगुण जालका वर्णन२२
सत्यनामकी महिमा२३
धर्मदाससाहबको सद्गुरुसे शिष्य करने के लिये प्रार्थना और उत्तर२९
कबीर साहबका तीसरी बार गुप्त हो जाना और धर्मदास साहबका व्याकुल होना
३१ धर्मदास साहबका सद्गुरुसे मिलनेके लिये भंडारा करना और चौथीबार सद्गुरुका मिलना३१
बेब भता वर्णन३१
विषय.पृष्ठ.
धर्मदासजीका सद्गुरुसे दीक्षा देनेकी प्रार्थना करना तथा रतनासे मिलना३३
धर्मदाससाहबका चौका आरती कराके गुरुमंत्र लेना३४
धर्मदाससाहबका प्रतिमाके विषयमें प्रश्न करना और सद्गुरुका रहनी बतलाना
३१ धर्मदासजीका अपने पिछले जन्मका हाल पूछना और सद्गुरुका बतलाना !३६
सर्वानन्दकी कथा३८
आरती विधि५०
कबीर साहबका चौथीबार अन्तर्धान होना और धर्मदास साहबका व्याकुल होना
और पांचवीबार फिर मिलना५५
धर्मदासजीको सत्यलोक दिखाना५६
हंसरहनीवर्णन६१
पठित मूर्खका वर्णन६३
कांसिजर देशका बुसांत६३
साधन वर्णन६४
समाप्ति६५
इति।

(४)

बोधसागर प्रथमभागकी अनुक्रमणिका

विषय

पृष्ठ.

अथ अमरसिंहबोधकी

अनुक्रमणिका

धर्मदास साहबका सद्गुणसे युगकमोदका | ---|--- वृत्तान्त पृष्ठना और सद्गुणका उत्तर । | राजा अमर सिंहकी कथा आरंभ .. | ७० कबीर साहबका अमर पुरोमें जाना और | अमर सिंहका मिलना । और कबीर | साहबका गुप्त हो जाना फिर राजाकी | विकलताका वर्णन .. .. | ७१ पांच दिन पीछे फिर कबीर साहबका राजा | अमरसिंहको मिलना .. | ७२ राजाका रानीको गुरुपदेश लेनेको कहना । | राजा रानीकी वार्तालाप .. .. | ७२ रानीका साहबकी शरणमें आना .. | राजाको सत्यलोक देखना .. .. | ७३ नरका वर्णन .. .. | ७७ चित्र गुप्तसे वार्तालाप .. .. | ८४ बंकुच्छका वर्णन .. .. | ८५ राजाका कबीर साहबकी आलासे चौका | आरती करना .. .. | ८९ राजारानीका सत्यलोक जाना .. .. | ९०

इति

अथ ब्रिर्सिंहबोधकी अनुक्रमणिका

कबीर साहबका काशीमें जाना और भक्तों | ---|--- के साथ वार्तालाप करना .. .. | ९८ कबीर साहबका वेध स्वरूप देखकर बीर- | सिंहका कबीर साहबके पास आना .. | ९९ राजाबीरसिंह और कबीर साहबकी | वार्तालाप .. .. | १००

विषय.

पृष्ठ.

राजाका रानीसे कबीर साहबको गुस्बना- | ---|--- नेकी बात चलाना और रानीका राजा | को नीति समझाना .. | १०३ नामदेव आदि भक्तोंका कबीर साहबकी | ईर्षा करना और उनका समाधान .. | १०४ राजाका शिकार खेलने जाना । पानी न | मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर | साहबका बाग प्रगट करके राजाका | सेनासहित प्राण बचाना .. .. | १०५ राजाका कबीर साहबका शिष्य होना .. | ११० राजा बीरसिंहका गुरुस्तुति करना .. | ११३ कबीर साहबका परलोकके मार्गका वृत्तान्त | राजासे कहना .. .. | ११४ राजाका अगर नाम चौका करनेके लिये | ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना उसके | वस्त्र न देकर जगन्नाथको चढ़ाने जाना | फिर बहोंसे दर्शन न होनेके | कारण कबीर साहबके पास आना | २४ अजर चौका वर्णन .. .. | ११६ कबीर साहबका मगहर में बिजुलीखों के | घर शरीर छोड़ना और राजा बीर- | सिंहका फौज लेकर बिजुलीखों से | युद्धको जाना .. .. | १२० पान देकर रानियोंको परलोक ले जानेके | समयके मार्गका वर्णन । .. .. | १२२ नाम महात्म्य .. .. | १२५ इति |

इति

श्री-बोधसागर

भारतपथिक कबीरपंथी—

स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा सशोधित

A decorative horizontal line with a central star-like or floral motif, flanked by symmetrical horizontal lines.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई