कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
(१४२)
सर्वज्ञसागर
यही बनाव धरती में होई । अधर वस्तुको जाने सोई ॥ अधरही चौका चारि प्रकासा । चन्द्र सूरजको तहां निवासा ॥ प्रथम अधर अंकुरहि निशानी । पांच अण्ड कीन्हे उत्पानी ॥ दूसर अधर निकलंकी जाना । तिसरे रूप सुरति परवाना ॥ चौथे अविगति नाम धराया । पांचे सरवल्ली पुरुष कहाया ॥ चारी अंश अधर विस्तारा । धर अधर दोनोंसे न्यारा ॥
साखी-पांच तत्त्व तब ना हते, हते न हाट रु बाट ॥ लोक द्वीप तब ना हते, ना हते औघट घाट ॥
चौपाई
सुनो धर्मदास कहौ मैं तोही । जो कछु भेद पुछिहौ मोही ॥ सब अंशनके लोक बतावा । अंश वंश सब तोहि लखावा ॥ करनी करै सो लोकहि जायी । विनु करनी फिरिफिरि पछितायी ॥
साखी-सर्वज्ञसागर खोजहि, सब ग्रन्थनको सार ॥ कहैं कबीर निज मूलको, सत्य शब्द आधार ॥
इति श्रीसर्वज्ञसागरे ज्ञानखण्डवर्णनो नाम द्वितीयस्तरंगः ।
समाप्तोयं ग्रन्थः
उपसंहार-चौपाई
जेहि मानुष बुद्धि सब विधि आवै । अपनो कारज सोइ बनावै ॥ कपट कुटिलता काल नशायी । सत्य विचार रहै लौलाई ॥ जवनी भांति जिव कारज होई । लाज मिटाय करै दृढ सोई ॥ लोककाज कुलकानके मारे । भँवरि भँवरि भव रहैं विचारे ॥ जेहि यम फन्द छूटे सो करना । नाहकमें काहे पचि २ मरना ॥
सर्वज्ञसागर
( १४३ )
भली भांति सो लेहु विचारी । सकल अंचारज मतहिं सुधारी ॥ खरा खोट जो परखा नाही । अन्धा धोखे मूल नशाही ॥ प्रथम विचारहु औषध रोगा । केहिविधि शब्द हरे सब सोगा ॥ देखो शब्द प्रकाश विचारी । जाते सकल होय उजियारी ॥ गुरु एक सो कौन कहावे । जासो आवागमन नशावे ॥ सेवा अनेक करिय केहि केरा । विन जाने सब धुन्ध अन्धेरा ॥ गुरु मत मनमत करे विचारा । सो जिव निज करे निरुआरा ॥
सारखी-विन देखे नहिं देशकी, बातें कहै सो क्रूर ॥ आपै खारी खात है, बेचत फिरे कपूर ॥
चौपाई
औषध पांच राह सब करई । औषध विना न कोई सहई ॥ शब्द स्पर्श रूप रस गन्धा । द्वारा पंच औषधिकी सन्धा ॥ सबहीं द्वार बूझ रहायी । बिन बूझे नहिं कोइ ठहरायी ॥ कोइ झीना कोइ मोटा द्वारा । तैसहिं तासु भिन्न व्यवहारा ॥ झीना शब्द है पवन स्वरूपा । तासो मोटा अनलको रूपा ॥ अनलहु ते जल मोटा होई । जलते मोटी पृथ्वी है सोई ॥ पुनि प्रकाश एकते एका । थिर होइ देखे करे विवेका ॥ पृथ्वी मोटी आँख प्रकाशी । तासे मध्यम दृष्टि प्रवेशी ॥ दृष्टीसे जल झीना होई । भीतर जो है दीसे सोई ॥ जलसो झीन तेज प्रकाशा । जामे परशे धरति अकाशा ॥ रूपसो अधिक शब्द उजियारा । दृष्टिमें आवे सब संसारा ॥ भूत भविष्य जो हो वर्तमाना । शब्द भीतरे सबै समाना ॥ बूझ शब्द में पेठे जायी । शब्दके भीतर अनल रहायी ॥ अनल मध्य होयके जल देखा । जलके भीतर पृथ्वी पेखा ॥
१ आचार्य, धर्मप्रवर्तक ।
( १४४ )
सर्वज्ञसागर
साखी-रैन समानी भानुमें, भानु अकाशे माहिं ॥ अकाश समाना शब्दमें, शब्द रहा कछु नाहिं ॥
चौपाई
पांचो औषध करै विचारा । मोटा झीना जो व्यवहारा ॥ औषध अन्न जल पेट समाही । जाते क्षुधा औ प्यास नसाही ॥ बहुत प्रकार लादके रोगू । सो सब जाय भोजन संयोगू ॥ गन्ध कपाले पहुँचे जायी । गुण औगुण सब अंग समायी ॥ लेपै गुण सब ले पहुँचावै । गुण औगुण सबमाहिं समावै ॥ आंखिकी राह रूप गहि लेई । शीत उष्ण सब अंगमें देई ॥ शब्द औषधी कानके द्वारा । बूझ समय करे निरुआरा ॥ हर्ष विषाद यंत्र औ मन्त्रा । व्यापै सबै कोइ कोइ स्वतन्त्रा ॥ मर्म सबै द्वाराको बूझे । विना शब्द निर्णय नहिं सूझे ॥ स्पर्श रूप इत्यादिक चारी । सो सब मोट स्थूल अधिकारी ॥ पुनि अस्थूल सो थिर न रहारी । तैसहिं औषध ताहि समायी ॥ अंग अंगको देश है जैसा । अल्पे गहिये औषध जैसा ॥ शब्द अति झीना बूझविचारा । जाते होय सकल निरुआरा ॥ शब्द विना कोइ पार न पावै । विन गुरु कौन जो दाव लखावै ॥ सर्व देश सर्वज्ञ है सोई । तेहि विनु कारज सघे न काई ॥
साखी-शब्द विना श्रुति आंधरी, कहो कहाँको जाय ॥ द्वार न पावे शब्दका, फिरि फिरि भटका खाय ॥ गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ॥ गुरु सदा सो वंदिये, शब्द बनावे दाव ॥ फेर परा नहिं अंगमें, नहिं इंद्रिनकी माहिं ॥ फेरा परा कछु बूझमें, सो निरबारचो नाहिं ॥
सर्वज्ञसागर
(१४५)
चौपाई
यहि संसार बहु वैद्य विराजे । नाना भाँति औषधी साजे ॥ साच एक झूठा बहुतेरा । विना साँच नहिं होय निवेरा ॥ एक असल पर नकल अनेका । अनेक नकल नहिं पावे एका ॥ बहुविधि ठग सब करे ठगाई । यमके फन्दा रहे अरुझाई ॥ बूझि समझिके औषध कीजै । मिथ्यामें जिव काहेको दीजै ॥
मसला
गुरु कीजिये जानिके, पानी पीजै छानिके ॥
चौपाई
वेद पुराण किताब कुराना । दोहा साखी शब्द परमाना ॥ अनन्त भाँतिका शब्द पसारा । विनु जाने नहिं होय सुधारा ॥ सो सब औषध बहु विधि जाचे । यम फन्दासे तबही बांचे ॥ पक्ष वाणीको मन मत कहिये । जाते द्रन्द सबै घर लहिये ॥ निर्णय वाणी गुरु मत होई । पक्षा पक्ष जाते सब खोई ॥ जब निर्णयकी वाणी आवै । झूठा खोटा आपु लजावै ॥ निर्णय सो सबके हितकारी । जेहि परसे जिव होय सुखारी ॥ सार शब्द निर्णयको नामा । जाते होय जीवको कामा ॥ गुरु एक जो निर्णय करई । झगरा कबहुँ परे न परई ॥ जो कोइ निर्णय आश्रित भयऊ । सेवा करि निज कारज कियऊ ॥ सो सब सेवा शिष्य कहावै । मन मत सो जो और बतावै ॥ जग बुद्धि कहे मम गुरु एका । जेहि तेहि सेवा करे अनेका ॥ पुनि जाको इन गुरु ठहराई । ताको दूसर गुरु सहाई ॥ तेहिकी सेवा करे लौ लाई । सो सेवा पद कैसे कहाई ॥
( १४६ )
सर्वज्ञसागर
टहल करे टहलू कहलावे । तासो पद सेवा बनि आवै ॥ सोइ सेवक जो सेवा करई । विना विचार बूझ न परई ॥ अपने अपने गुरुमत माने । और सब मन मत अनुमाने ॥ विलु निर्णय सो द्रन्द न जाई । पचि पचि मरहिं करहिं लडाई ॥ जहैं झगडा तहैं गुरुमत नाही । जहैं गुरुमत तहैं द्रन्द नसाहीं ॥
सार्वी-पक्षा पक्षके कारणे, सब जग रहा भुलान ॥ निपक्ष होइके हरि भजे, सोई संत सुजान ॥
शब्द शब्द बहु अंतरा, सार शब्द मथि लीजे ॥ कहैं कबीर जहैं सार शब्द नहीं, धृग जीवन सो जीजे ॥
चौपाई
खरा खोट परखहु बहु भांती । तबहीं होय जीव कुशलाती ॥ जेहि गुरु ज्ञान न छूटत केरा । बहुत अनुमान सो भ्रम बौढेरा ॥ भवसागर दुस्तर कठिनाई । नौका नाम तहैं सत्य दिढाई ॥ बूढ़े भवकी धार न सूझे । सुए सुक्ति ऐसी दृढ़ बूझे ॥ जहैंसे उपजे तहां समाना । कसर विकार मूल नहि जाना ॥ भरमैं आप जीव भरमावे । नाटक चाटक सुयश बढावे ॥ करामात करतूत बखाने । नास्तिक ज्ञान सोइ सत्यकै माने ॥ ऋद्धि सिद्धि सब जात नसाई । नास्ति ज्ञान नाही कुशलाई ॥ त्यर्थ ऐश्वर्य नास्तिन माहीं । जाके पीछे जिव बौराहीं ॥ आपु गये यजमानहु खोये । भांति भांति फन्दा अरुझोये ॥ रोगी वैद्य दोनों एक ठाऊँ । औषध कही कल्पनाके गाऊँ ॥ जेहि कारण नर साई जो देई । सो सौदा जँचि काहे न लेई ॥ ठग भरमावे बहु विधि लूटे । यम धन्धासे कबहुँ न छूटे ॥ मोटि अविद्या छुड़ावन लागे । झीनी महा अविद्या पागे ॥ झनी माटे दोउ कष्ट से रूपा । कारण नास्ति परे त्यहि कृपा ॥
सर्वज्ञसागर
(१४७)
पूरा धनी पूरा सो सौदा । परखत मेंटे कालको फन्द । ॥ संधि लखावहि कारण रोग । मेंटहिंसब विधि संधिकसोग । ॥ नहि सन्देह न यमके त्रासा । सदा मुखारी परख विलासा ॥ धन्य सोबूझि समुझि पग धरई । अँधरन भटक भटक भवपरई ॥
साखी-बलिहारी तेहि पुरुषकी, पर चित परखनहार ॥ सार्ई दीन्हों खांडको, खारी बूझ गवॉर ॥ करु बन्दगी विवेक की, भेष धरे सब कोय ॥ सो बन्दगी वहि जानदे, जहँ शब्द विवेक न होय ॥ मानुष देही पाइके, चूके अबकी घात ॥ जाइ परे भवचक्रमें, सहे घनेरी लात ॥
इति । मानुष विचारसे.
इति तृतीयखण्ड समाप्त
A black and white botanical illustration of a flowering plant, possibly a daisy or sunflower, with a central flower head, a bud, and several leaves, centered within a decorative border.
भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी) द्वारा संशोधित
लेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई
संस्करण : अप्रैल २०१९, संवत् २०७६
मूल्य : १०० रुपये मात्र ।
© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
मुद्रक एवं प्रकाशक:
खेमराज श्रीकृष्णदास TM
अध्यक्ष : श्रीवेकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
मुंबई - ४०० ००४.
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प्रारंभिक पृष्ठ (बोधसागर प्रथम भाग)
बोधसागर प्रथमभागकी अनुक्रमणिका
3
★
इसमें तीन तरंग हैं जिनमेंसे प्रथम तरंग ज्ञानप्रकाश पृष्ठ ९ से आरम्भ होकर पृष्ठ ६५ पर समाप्त हुआ है।
दूसरा तरंग अमरसिंह बोध है जो पृष्ठ ६९ से आरम्भ होकर पृष्ठ ९२ पर समाप्त हुआ है।
तीसरा तरंग वीरसिंह बोध है जो पृष्ठ ९७ से आरम्भ होकर पृष्ठ १२७ पर समाप्त हुआ।
अब तीनों तरंगकी विषयानुक्रमणिका नीचे देते हैं।
ज्ञानप्रकाशकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|
| कबीर साहबका जिन्दा रूपसे मयूरामें धर्मदास साहबको प्रथमवार मिलना | |
| ५ कबीर साहबका गुप्त हो जाना (धर्म-दासजीकी विरह) | ९ |
| छठे दिन कबीर साहबका धर्मदास साहबसे दूसरी बार मिलना | १४ |
| धर्मदासजी का गुरु रूपदासजीके निकट जाकर ज्ञान पूछना | २० |
| धर्मदासजीका साहबसे मिलनेकी चिन्ता करना और सद्गुरुका जिन्दा रूपसे तीसरीबार दर्शन देना और धर्मदास साहबका रसोई बनाने हुए चाँटीके जलनेसे डूबी होना और साहबको पहचानना | २१ |
| त्रिगुण जालका वर्णन | २२ |
| सत्यनामकी महिमा | २३ |
| धर्मदाससाहबको सद्गुरुसे शिष्य करने के लिये प्रार्थना और उत्तर | २९ |
| कबीर साहबका तीसरी बार गुप्त हो जाना और धर्मदास साहबका व्याकुल होना | |
| ३१ धर्मदास साहबका सद्गुरुसे मिलनेके लिये भंडारा करना और चौथीबार सद्गुरुका मिलना | ३१ |
| बेब भता वर्णन | ३१ |
| विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|
| धर्मदासजीका सद्गुरुसे दीक्षा देनेकी प्रार्थना करना तथा रतनासे मिलना | ३३ |
| धर्मदाससाहबका चौका आरती कराके गुरुमंत्र लेना | ३४ |
| धर्मदाससाहबका प्रतिमाके विषयमें प्रश्न करना और सद्गुरुका रहनी बतलाना | |
| ३१ धर्मदासजीका अपने पिछले जन्मका हाल पूछना और सद्गुरुका बतलाना ! | ३६ |
| सर्वानन्दकी कथा | ३८ |
| आरती विधि | ५० |
| कबीर साहबका चौथीबार अन्तर्धान होना और धर्मदास साहबका व्याकुल होना | |
| और पांचवीबार फिर मिलना | ५५ |
| धर्मदासजीको सत्यलोक दिखाना | ५६ |
| हंसरहनीवर्णन | ६१ |
| पठित मूर्खका वर्णन | ६३ |
| कांसिजर देशका बुसांत | ६३ |
| साधन वर्णन | ६४ |
| समाप्ति | ६५ |
| इति। |
(४)
बोधसागर प्रथमभागकी अनुक्रमणिका
विषय
पृष्ठ.
अथ अमरसिंहबोधकी
अनुक्रमणिका
धर्मदास साहबका सद्गुणसे युगकमोदका | ---|--- वृत्तान्त पृष्ठना और सद्गुणका उत्तर । | राजा अमर सिंहकी कथा आरंभ .. | ७० कबीर साहबका अमर पुरोमें जाना और | अमर सिंहका मिलना । और कबीर | साहबका गुप्त हो जाना फिर राजाकी | विकलताका वर्णन .. .. | ७१ पांच दिन पीछे फिर कबीर साहबका राजा | अमरसिंहको मिलना .. | ७२ राजाका रानीको गुरुपदेश लेनेको कहना । | राजा रानीकी वार्तालाप .. .. | ७२ रानीका साहबकी शरणमें आना .. | राजाको सत्यलोक देखना .. .. | ७३ नरका वर्णन .. .. | ७७ चित्र गुप्तसे वार्तालाप .. .. | ८४ बंकुच्छका वर्णन .. .. | ८५ राजाका कबीर साहबकी आलासे चौका | आरती करना .. .. | ८९ राजारानीका सत्यलोक जाना .. .. | ९०
इति
अथ ब्रिर्सिंहबोधकी अनुक्रमणिका
कबीर साहबका काशीमें जाना और भक्तों | ---|--- के साथ वार्तालाप करना .. .. | ९८ कबीर साहबका वेध स्वरूप देखकर बीर- | सिंहका कबीर साहबके पास आना .. | ९९ राजाबीरसिंह और कबीर साहबकी | वार्तालाप .. .. | १००
विषय.
पृष्ठ.
राजाका रानीसे कबीर साहबको गुस्बना- | ---|--- नेकी बात चलाना और रानीका राजा | को नीति समझाना .. | १०३ नामदेव आदि भक्तोंका कबीर साहबकी | ईर्षा करना और उनका समाधान .. | १०४ राजाका शिकार खेलने जाना । पानी न | मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर | साहबका बाग प्रगट करके राजाका | सेनासहित प्राण बचाना .. .. | १०५ राजाका कबीर साहबका शिष्य होना .. | ११० राजा बीरसिंहका गुरुस्तुति करना .. | ११३ कबीर साहबका परलोकके मार्गका वृत्तान्त | राजासे कहना .. .. | ११४ राजाका अगर नाम चौका करनेके लिये | ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना उसके | वस्त्र न देकर जगन्नाथको चढ़ाने जाना | फिर बहोंसे दर्शन न होनेके | कारण कबीर साहबके पास आना | २४ अजर चौका वर्णन .. .. | ११६ कबीर साहबका मगहर में बिजुलीखों के | घर शरीर छोड़ना और राजा बीर- | सिंहका फौज लेकर बिजुलीखों से | युद्धको जाना .. .. | १२० पान देकर रानियोंको परलोक ले जानेके | समयके मार्गका वर्णन । .. .. | १२२ नाम महात्म्य .. .. | १२५ इति |
इति
श्री-बोधसागर
भारतपथिक कबीरपंथी—
स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा सशोधित
A decorative horizontal line with a central star-like or floral motif, flanked by symmetrical horizontal lines.
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई
1911-12
1912-13
1913-14
1914-15
1915
सत्यनाम
A black and white woodcut-style illustration of a bearded man, likely a saint or guru, seated cross-legged on a raised platform. He wears a tall, pointed hat and a long robe, holding a mala. A large, ornate umbrella is held over him. A small pot sits on the ground to his left. The entire scene is framed by a double-line border.
श्री कबीर साहिब
ॐ नमः शिवाय
शिवो नमः शिवाय
कबीर साहबका जिन्दा रूपसे मथुरामें धर्मदास साहबको प्रथमवार मिलना और कबीर साहबका गुप्त हो जाना
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी, धर्मदास, चूरामणि नाम, मुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रमोध, गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाक नाम, प्रगट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दया नामकी दया, वंशव्यालीसकी दया
★
श्री बोधसागर
अथ प्रथमस्तरंगः
धर्मदासबोध-ज्ञानप्रकाश
सत्य सुकृत सतगुरु सतनामा । सत्यपुरुष सन्तन सुखधामा ॥ सत्यपुरुष सतलोक निवासी । दुखनाशक अविचलसुखरासी ॥ अमी अमान सो सत्य कहाये । अभै विद्यमान कहि गाये ॥ अविगति अलख अनाम सरूपा । अगह अडोल अबोल अत्रुपा ॥ अजर अजावन सो निःस्वादी । निःकामी निरमोह अनादी ॥ निःकोधी निरवैर निशङ्का । गुणातीत निर्द्वन्द निकलङ्का ॥
(१०)
ज्ञान प्रकाश
धर्मराय सिर अञ्जन 'सोई । आपुहि तात मातु नहिं कोई ॥ नहीं तीनि पाँच तनुधारै । रहै अमान नरकसों न्यारे ॥ ताके निशि दिन शिर नाऊँ । गुप्त प्रकट वाको गुण गाऊँ ॥ उनके ढिगसो हम चलि आये । जिव निस्तारन हमहिं पठाये ॥ सत्यपुरुष सत्यगुरु सो आहीं । गुरुगम सत्यगुरु नाम समाहीं ॥ सत्यगुरु ध्यान जाहि पहुँ होई । सो हँसा नहिं जाहिं विगोई ॥ सत्यगुरु शब्द गहे सो हँसा । मेटै जन्म मरण भौ संसा ॥
छंद-सत्यनाम सतगुरु ध्यान सतपद वासी हंस हो ॥
सत्यलोक अशोक निर्मोह पहुँचे गहे अविचल कंत हो ॥
जीव लहै सुमिरण सत्यबीरा अङ्क अविचल जोग है ॥
सत्यनाम सुमिरण काल डरपै मुछित यम न्यारा रहै ॥
सारखी-कहाँ सँदेश सत्य पुरुषको, समझत रङ्ग नरेश ॥
कहैं कबीर सो अमर हो, जो गह मम उपदेश ॥
सोरठा-चीन्हहु किर्तिम आदि, सत्य असत्य विचारहु ॥
छाँडि देहु बकवादि, खोजहु अविचल पुरुष कह ॥
चौपाई
यहि जग देखों अनकठ रीती । तजहीं साँच झूठ सो प्रीती ॥
जो धोखा तेहि साँचके मानैं । सत्य सार तेहि नहिं पहिचानैं ॥
आदि ब्रह्मकहैं खोजहि नाहीं । कृतिम कला जो सेवहि ताहीं ॥
निज स्वामीके मत ना गहहीं । जरा मरण घर संकट सहहीं ॥
जो रक्षक तेहि गहे न कोई । जो भक्षक तेहि धावहि लोई ॥
कर्म भर्म वसि तीर्थ नहाहीं । पुण्य पाप वसि आवहिं जाहीं ॥
दयाहीन नर पढ़हि पुराना । पढ़िगुणिके अरथावहि ज्ञाना ॥
अन्धा अगुवा तिहुँपुर माहीं । बहु अन्धा तेहि पाछे जाहीं ॥
अगुवा सहित कूप महाँहीं । कासो कहूँ कोई बूझै नाहीं ॥
बोधसागर
(११)
छन्द-गुरुज्ञान हीन मलीन पण्डित शब्द शास्त्र पढ़ै घनो ॥ अगम निगम विरञ्चि प्रमोघैँ सकल जग यहि सखा बनो ॥ जो काल जीवनको सतावै तासु भक्ति हृदावहीं ॥ विष्णु आदिक शिवसनकादि अजसुर कालके गुण गावहीं ॥ साखी-बिन बूझै करुआइ अस, लगिहै वचन हमार ॥ जब बूझै तब मीठि हो, कहैं कबीर पुकार ॥ सोरठा-जस नीम जग माहिँ, नासि व्याधि करु दूरि प्रथम ॥ तेहि दुख चम्पै नाहिँ, जो चारै सुरि अमर ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
अहो साधु तुम को धौँ अहहू । अनकट बात बहुत तुम कहहू ॥ ताते तब नहिँ बोल बढायो । जाते हरि सेवा चित लायो ॥ विष्णु इष्ट देवन्ह के देवा । तुम्ह तेहि कहहु करहि यम सेवा ॥ विष्णु ते अधिक और कोइ नाहीं । जमरा विष्णु कै चेरा आहीं ॥
सतगुरु वचन
अहो धर्मनि जो ऐसन कहहू । तो हम कहै सो चित महाँ धरहू ॥ विष्णु कथा तोहिँ कही सुनाओं । अगम अगोचर ज्ञान चिन्हाओं ॥ तुम्ह भाषो यह वचन सँजोई । विष्णु ते अधिक ओर नहि कोई ॥ हमरी शब्द कहैं देखहु साहू । अपनी हृदया जनि कदराहू ॥ आपुहि विष्णु धनी जो रहेऊ । तो किमि योनि जठरदुख सहेऊ ॥ जो यम होत विष्णु के दासा । तो नहिं करते विष्णु गरासा ॥ सेवक हाथ न स्वामिहि चालै । जो विगरे तौ होइ तेहि कालै ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादिक । मुनि मुनीश नारद शेषादिक ॥ सब कहैं यम धरि करहि अहारा । लूटहि सबहि काल बरियारा ॥ तीन लोक जेते कोई आहे । काल निरञ्जन सब कहैं डाहे ॥ तुम खोजहु अब सो घर भाई । जेहि घर यम सो बाचहु जाई ॥ अहो साधु के सूत सयाना । एती कहेऊ सब सुनेहु पुराना ॥ पठि पुराण नहिं समझेहु भेता । बिनु जाने भर्महु आचेता ॥
(१२)
ज्ञानप्रकाश
ब्रह्मा गये असंख सिराई । विष्णु कोटि यमरा धरि खाई ॥ चाँद औ सूर्य तारागण लोई । कहै कबीर फिर रहे न कोई ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
अहो साधु अचरज तब बाता । कहे न बने तुमहिं विरुयाता ॥ गीता भागवत पुस्तक बहुताना । निसिदिन सुनो जपों भगवाना ॥ विप्र भेष औ छव दर्शन कै । महिमा सबै कहैं त्रिभुवन कै ॥ सबै विष्णुकै भक्ति हृदुवैं । त्रय देव सब श्रेष्ठ बतावैं ॥ तुम खण्डहु हरि और न कोई । अहो साधु यह अचरज होई ॥
सतगुरु वचन
छन्द-सुनु सन्त सुबुद्ध सयान सुनि ज्ञान हृदय बिचारहु ॥ गहि शब्द परख करि दिये मम बानि निरुआरहु ॥ सो कहत वेद बहु विविध पुराण त्रिगुण तेरा पार धनी ॥ यह मायाजाल है जगत फन्दा त्रिविधि काल कला बनी ॥
साखी-त्रिगुण ध्यान ते रहित नहीं, सुनहु सन्त चित लाय ॥ अस्थिर घर तब पावई, चौथे पदहिं समाय ॥
सोरठा-चौथा पद निरबान, पुण्य भाग ते पाइये । कहैं कबीर प्रमान, सत्य शब्द बिनु नहि तरे ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे साहब हमसे भल कहहु । तिहुँ पुर प्रलय कहाँ तब रहहु ॥ तीन देव सब परलय तर आई । तुम कौने विधि बाँचहु भाई ॥
सतगुरु वचन
अहो सन्त हम तहाँ रहाहीं । यम प्रवेश जहँ सपनेहुँ नाहीं ॥ जाके डर कम्पत यमराई । अहो सन्त हम ताको गुण गार्ई ॥ तीनि लोक यह परलय होई । चौथा लोक सुख सदा समोई ॥ तीन देवके पिता निरञ्जन । ते यम दारुण वंशके अञ्जन ॥
बोधसागर
(१३)
सवा लाख जिव नित सो खाहीं । सुर नर सुनि कोइ छँडिे नाहीं ॥ सत्यपुरुष सत्य लोक निवासी । सकल जीवके पीव अविनासी ॥ तिन्ह पुनि षोडश सुत निर्माया । षोडशमें एक काल सुभाया ॥ पुनि तेहिमहँ एक काल कहाया । ज्योति स्वरूप निरञ्जन राया ॥ जाकहँ नाहि सोइ यम जाना । धूर्तमता तिन लोकमहँ आना ॥ एक अण्ड दीन्हा तिन लोका । निरंकार है निष्काम अशोका ॥ निरंकार तीन सुत उपराजू । आपु गुप्त पुत्रन दिय राजू ॥ तीनहुँ तीन लोक ठगि राखा । आपन आपन महिमा भाखा ॥ अरुझिरहा जिव तिरगुन फाँसा । भूलि परा निज घर तब नासा ॥ जीवन्ह काल बहुत सन्तावै । बार बार यम जीव नचावै ॥ सत्य पुरुष तब मोहि पठाये । जिवसुक्ता वन हमहिँ चलि आये ॥
धर्मदास बचन
हे साहब कछु पूछौं तोही । जो पूछहुँ सो भाषहु मोही ॥ निरङ्कार निरंजन राई । धूर्तमता तिन्ह काकिय भाई ॥ जाते इन उहाँ रहै न पाई । सो चरित्र मोहिँ वरणि सुनाई ॥
सतगुरु बचन
अहो सन्त जो पूछहु मोहीं । समुझहु चरित्र बुझावों तोहीं ॥ सत्य पुरुष सुत षोडश कीन्हा । अष्टगीन एक कन्या रचिलीन्हा ॥ सो कन्या इन्ह कीन्ह गरासा । ताते भौ यहि लोक निकासा ॥ पुरुष दरश इन्ह बहुरि न पावा । तीन लोक महँ आनि रहावा ॥ एक अण्ड सत्यपुरुष तेहि दीन्हा । अशंख अण्ड लोक महँ कीन्हा ॥ पुरुष रूप का बरणौ भाई । मोसो वरणत वरणि न जाई ॥ तेहि साहब का हौ शठिहारा । जीव सुकाजको करों पुकारा ॥ जो समुझे सुनि हेला मोरी । काटौं ताकी कर्मकी डोरी ॥
धर्मदासका विरह
यहि कहि गुप्त भये प्रभु राई । धर्मदास महि खसेसुझाई ॥