कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ४८ )
ज्ञानसागर
साखी-तासु दूत गण द्वारिका, अनिरुध अंश भुवार ॥ दोऊ उपजो मर्म अब, जस हंसनकी ज्वार ॥
चौपाई
दिवस आठ दस बीते जबही । अनिरुध कुँवर प्रगट भयो तबही ॥ बानासुर ने कोध दल साजा । अगणित बाज सम्हर कौ बाजा ॥ युद्ध करै दैत्य तहाँ जाई । अनिरुध सब कहँ मार हटाई ॥ छै प्रकार जीतो उन जबही । सातई बार भर्म भयो तबही ॥ दैत्य मार गहि समर अपारा । बाँध चपल कै कृष्ण कुँवारा ॥ कोई कहै मारो विषको मूला । शत्रु राखकै नृपकस भूला ॥ मंत्री कहई सुना भुवारा । शिव की आज्ञा मैं यह मारा ॥ नारद ऋषि तबही सुधि पाई । कृष्णहि बात जनावहु जाई ॥ चल भयो कृष्ण जो कोध अपारा । दैत्य जहाँ तहाँवा पशु धारा ॥
साखी-गरुड़ चढ़े तब कृष्ण सो, पुरही पहुँचे आय ॥ जाही नग्र अग्नि दियो, दैत्य राज तिहि ठाँयै ॥
चौपाई
आय दैत्य करै संग्रामा । हरि भेटें तेहि यम उन ग्रामा ॥ मारो हलधर अग्नित वीरा । बानासुर देख परे तेहि भीरा ॥ मोरा कृष्ण मता सुन आजू । अटल दियो महि शंकर राजू ॥ बहु विधि युद्ध दैत्य तब कीन्हा । कृष्ण चपल तेहि बाँध हिलीन्हा ॥ बाँध्यो नृप शंकर सुधि पाई । कोधित आई तब कृष्ण लराई ॥ दोनों वीर महा बल धारी । लागी होन परस्पर मारी ॥ दोनों मंत्र पुनि दीन अडाई । तारी मार मार पुन धाई ॥ दोह जुरे पुन मछ समाना । कौतुक आई निरंजन जाना ॥ दोउके समर पावक उठि जबही । आदि भवानी चलभइ तबही ॥ दोनों सुत कहँ जब बिलगावा । बादल पवनके जैसे स्वभावा ॥
ज्ञानसागर
( ४९ )
साखी-दोई सुत तब बरजी, आदि भवानी आय ॥ बर ऊषा अनिरुद्धको, शंकर दीन्ह मिलाय ॥
चोपाई
चले कृष्ण और सुत भामिनि । तासु अंग चमके जिमि दामिनि ॥ कृष्ण द्वारिका पहुँचे जाई । सो वृत्तान्त कहौं समुझाई ॥ जोपै हर हरिको व्रत धरई । प्रभु सेवक कहु काहे लरई ॥ प्रभु सेवक कहु कैसे लड़ाई । सो गति मोहि कहौ समुझाई ॥ हरि हर युद्ध सबै कोइ जाना । सहस्रनाम किमि करब बखाना ॥ यमराजा जु ठगौरी लायी । ज्ञान देख कर चेतो भायी ॥ बूझौ सब मिलि पाखंड धरमा । मैं जानौं भल कालही मरमा ॥ अदेख देख सब कहि समुझाई । ताको विरला जन पति आई ॥
साखी-शङ्कर कियो युद्ध हरिसों, तब कहु कैसो दास ॥ पंडित जन सब थापहीं, सहस्र नाम विश्वास ॥
चोपाई
चारौं वेद को मूल बताऊँ । सहस्र नाम को सार बुझाऊँ ॥ काशीमें विश्वास जनावई । विश्वनाथके मंदिर धावई ॥ विश्वनाथको भेद बतावहु । सार ग्रन्थ मोही समझावहु ॥ सबै ग्रन्थ करि आगिल कीन्हा । भक्ति तत्त्व सबै मिलि चीन्हा ॥ सब पर सहस्र नाम परवाना । जहाँ लग शास्त्र रु वेद पुराना ॥ तेहि जाने जेते सब कोई । बूझौ मरम जु विरला कोई ॥ बूझौ पंडित भेद बताई । प्रभु सेवक कहु कैसे लराई ॥ यह सब बन्ध बहुत मैं भाखी । ते यमराजा सब ठग राखी ॥ ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥ तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥
साखी-भूल परी सब दुनियाँ, पाखंडके व्यवहार ॥ मूल छाँड़ि डारे गहै, कैसे उतरे पार ॥
( ५० )
ज्ञानसागर
चौपाई
तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिलव्यवहारा ॥ पांडव पांच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥ मारन तासु को मतौ बिचारा । पांडव कौरव नृप दोह मारा ॥ दोनोंमें छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहि जाना ॥ बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहँ आई ॥ राजा दुपद स्वयम्बर ठाना । तहँ पारथ राहु संधाना ॥ दुयोंधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥ कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पांच पति भावा ॥ तेहि मारन हरि मतौ बिचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥ कौरव आई जो करहि लड़ाई । ताहि कृष्ण छलसे भरवाई ॥ मारचो करण गंगसुत द्रोना । सबको मारि कियो दल सूना ॥ मारचो दुयोंधन जो राई । अठारह शोहणी मार गिराई ॥
साखी-पाँचों पांडव बचि रहे, औ जूझे सब झार ॥
धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥
चौपाई
चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना । शून्यआदि जहँ शशिनहिंभाना ॥ पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ । तहाँ जाइके स्तुति कियेऊ ॥ अलख निरंजन अंतर््यामी । सब ते न्यारे हो तुम स्वामी ॥ सबमें व्याप्त निरंजन राया । पाँचो तत्त्व शून्य उपजाया ॥ तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि अंत तुम देव गणेशा ॥ अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी । करहु दया तुम अंतर्यामी ॥ ततक्षण भई अकाशतें वाणी । अहो कृष्ण सबको उत्तपानी ॥ अब जो कहैं करो सो जानी । सोई वचन लेव सिर मानी ॥ तुम भेजा महि भार उतारहु । असुरनको विध्वंसके मारहु ॥
ज्ञानसागर
( ५१ )
साखी-मारहु जादव वंश कहैं, मानो वचन रसाल । गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल
कृष्ण वचन-चोपार्द
कृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना॥
निरंजन वचन
तैं मम अंश मोहिमें वासा । काल रूप संसार निवासा ॥ पातक जीव जो रहै महाबल । मारहुतिनिहीतुम अतिबल छल॥ उपजत विनसत क्षीन भइ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥ क्षीण शरीर अवधि भइ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥ जस कछु कहो कियासो चढ़िहौ । जाकौ दिया राज महिकरिहौ॥ छाड़ो महि मंडलको भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥ तजो कृष्ण अब वेग शरीरू । आये अन्न अब दास कबीरू ॥
कृष्ण वचन
साखी-सुन कियो कृष्ण अचंभो, कैसो दास कबीर ॥ सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरोर ॥
निरंजन वचन-चोपार्द
कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहिअवधि है थोरा ॥ पांडव नंदन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबहीनिवतजुआवहि॥ यज्ञ पूर्ण नहिं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहिं कोई ॥ कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू॥ तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूरण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥ या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥ बालिही राम रूप तुम मारा । ताकर होई व्याध औतारा ॥ ताकर बैर देहुँ तुम जाई । फेर जीव कछु संशय नाई ॥ सुनिकै कृष्ण चले सिरनाई । नगर द्वारिका पहुँचे आई ॥
पाण्डव यज्ञ तथा सुपच सुदर्शन कथा-वर्णन
( ५२ )
ज्ञानसागर
पांडव निवते यज्ञ पठाये । चलिये स्वामी बेग बुलाये ॥ मारन बंधु या किया लागा । तातें यज्ञ रची है रागा ॥ चल भये कृष्ण बार नहिलाये । पुर पांडव के आश्रम आये ॥ आवत समाधान नृप कीन्हा । छत्र तानि सिंहासन दीन्हा ॥ आवत कृष्णसभा सिर नावा । भोजन को तब आज्ञा पावा ॥ साखी-बैठे गन्धरव देव गण, ऋषि मुनिवर सब झार ॥ सब मिलि कीन्हा भोजन, इच्छा के अनुसार ॥
चौपाई
भोजन भये घंट नहिं बाजा । राय युधिष्ठिर को भयी लाजा ॥ अहो कृष्ण का करौं उपाई । सोमोहि स्वामी कहिये समुझाई ॥ जबहि कृष्ण अस भाव बताया । सुनहू मंत्र युधिष्ठिर राया ॥ खोजहु भक्त जो निर्गुण गावयी । सतगुण महिमा सदा बतावयी ॥ आनब ताहि यज्ञ निवताई । दीन भाव कर ताहि लिवाई ॥ कृष्ण वचन सुनि युधिष्ठिर राया । भगत बुलावन दूत पठाया ॥ सुनिके दूत चले चहुँ देशा । नहिं कोइ भक्तन भेटे वेशा ॥ चले भीम तब लागि न वारा । चहुँ दिश फिर काशी पगुधारा ॥ बैठे सुपच ताहि सों कहई । निर्गुन भक्त यहाँ कोइ रहई ॥ कहै सुपच निर्गुन को जानों । सतगुरु महिमा सदा बखानों ॥
साखी-कहै भीम सुन हरिजन, कृपा करौं मम संग ॥ चलो जहाँ हरि बैठे, स्वामी बाल गुविन्द ॥
चौपाई
कहै सुपच प्रभु कैसे कहऊ । कालहि जान कृष्ण परिहरऊ ॥ सुनतहि भीम कोप तब कीन्हा । यामैं कहा भक्त वर चीन्हा ॥ यहि मारो तो राख रिसाई । कह्यो मंत्र राजा पर जाई ॥ तीन लोक के जे प्रभुराई । तिनको भाखै काल कसाई ॥
ज्ञानसागर
( ५३ )
कृष्णहि कहै काल की फांसी । कीन्हही आय भक्त की हांसी ॥ मारचो नहि पर तुव भय माना । यह सुनकर विहिसे भगवाना ॥
सारखी-जाव युधिष्ठिर वेग दै, तुम आनो गहि पांय ॥
आज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥
चोपाई
अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥
चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै कालू ॥
कहैं सुपच सुन पांडव राज । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥
तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥
चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठे हरषंता ॥
आवत स्वपच कृष्ण जब जाना । होय काज पूरण सनमाना ॥
राय युधिष्ठिर पखारे पांऊ । भोजन सादर आन जिवाऊं ॥
भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥
बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥
पूरण यज्ञ विष्णु जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥
सारखी-बूझो रे नर परानी, क्या सुपचे अधिकार ॥
गण गन्धर्व सुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥
चोपाई
सब के खाये घंट नहि बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥
सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं । नामहि महिमा जानत नाहीं ॥
सुपच जान भल नाम प्रभाऊ । ताते पूरण यज्ञ कराऊ ॥
कृष्ण शक्ति में सुनि ऋषि झूला । जान बूझिकै पंडित भूला ॥
बूझौ सन्तो नाम हमारा । नाम विना किमि उत्तरौ पारा ॥
कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा । तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥
गोपी लैकै जाऊं मैं जहँवा । पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥
कृष्णका स्वर्गारोहण और जगन्नाथकी स्थापना
( ५४ )
ज्ञानसागर
मथुरा तैं तुम वेग लै आवहु । जाहु तुरन्त गहर जनिलावहु ॥ चल भयो पार्थ हाथ धनु तीरा । गोपी लैन कोटिन यदुबीरा ॥ आपस में जो करे लड़ाई । इक मारे एक मरजाई ॥ छप्पन कोटि जो सबै सिरानो । सो नट षट कृष्णहि के जानो ॥ अष्ट कन्या लखी चित्रसारी । तिनकहैं कृष्णजो यहि विधि मारी ॥
साखी-मारिन सब जेती हती, कृष्ण काल बरि यान ॥ तब अपने मन में गुनौ, करो उदधि अस्थान ॥
चौपाई
वधिक देव घात संधाना । बालि बैरको भाव जो जाना ॥ जम सब प्रान घेर लै गयेऊ । मारचो कृष्ण मूर्च्छित भयेऊ ॥ निरंकार निरंजन राऊ । आपहि मारिजो ताहि नसाऊ ॥ बालि का बैर व्याधा जबलीन्हा । यह तो भेद न काहू चीन्हा ॥ तीन लोक के कृष्ण भुवारा । रहै न बैर जीव व्यवहारा ॥ जो जीव आप स्वारथहि मारा । सो जीव अपनौ किमि निस्तारा ॥ तबहि कृष्ण अस मता विचारा । तत्त्व मता अस रूप संहारा ॥ जादव रूप कृष्ण सब मारे । पारथ बान रहे सब हारे ॥ गोपी रही जो प्राणहि प्यारी । तिनको कृष्ण येहि बिधि मारी ॥ आये कृष्ण पहुँ अर्जुन बीरा । लाज न छाड़ै अत्र शरीरा ॥
साखी-कहैं कृष्ण सुन अर्जुन, छाड़ो यहि संसार ॥
हम तो जात हैं स्वर्ग को, इत परंपंच अपार ॥
गये पारथ जहँ चारौं भाई । चलौ वही जहँ यादो राई ॥ कहै सन्देश सुनौ हो राऊ । यहवाँ मोर दर्श नहि पाऊ ॥ मृत मंडल नहि मेटव मोही । छाड़ौ महि बोलों अस तोही ॥ छाड़ौ राज पाट सब भाई । पुत्र राज देख सब जाई ॥
निकलंक अवतारकी वार्ता
ज्ञानसागर
( ५५ )
चारेउ पांडव काल बड़ा भयेऊ । रायशुधिष्ठिर सदेह तब गयेऊ ॥ ता कहैं बड़ शासन जो कीन्हा । नाम विना देखो अस चीन्हा ॥ देखत कृष्ण अपन तन त्यागा । चिता तासु की रचन जो लागा ॥ चन्दन काष्ठ तासु तन जारा । चल भयो काष्ठ समुद्र मझारा ॥ इंद्र देवन हरि सपना दयेऊ । तिन पुनि काष्ठ आन धरि लयेऊ ॥ सुंधायो द्वार काहु नहि जाना । ठक २ उठै दिन रात प्रवीना ॥ शिशुपाल भुजा चार रहो जाही । मारचो कृष्ण जो भक्ष्यो ताही ॥
साखी-सबै अंग सम्पूर्ण हैं, जगन्नाथ को भाव ॥
शिशुपाल की भुजा उखारी, ताको वैर दिवाव ॥
चौपाई
दोह भुजा काष्ठ जेहि उरेहा । वैर न छूटे सो गहि देहा ॥ जो काइ जीव जोर कर मारा । तासु जन्म किमिहो निस्तारा ॥ राम कृष्ण तैं को बड़ आही । वैर घात तासों न रहाही ॥ कृषी करै किसान जस भाऊ । ऐसी दसों जनम निर्माऊ ॥ दसों जनम ऐसे ही बीते । तासों कहै कि सुक्ति करीते ॥ बूझो नहि चरित्र भगवाना । तीन जुग गये काल नियराना ॥ है बड़ ठाकुर ज्योति स्वरूपा । तिन सब रच्यो मही औ भूपा ॥ आप स्वार्थी तिनहु मारे । ज्यों नकटी विश्वासहि वारे ॥
साखी-जिस सिरदार मही को, करै चरित्र भुवार ॥
जहैं तहैं शील पटावै, मछ बली तब धार ॥
चौपाई
कलियुग अन्त मलेच्छ व्यवहारा । तब हरि निष्कलंक अवतारा ॥ मारहि मलेच्छ सबै पुर कैसे । पावक मध्य तृण है जैसे ॥ पावक रूपनि कलंक अवतारा । तृण समान मलेच्छ संहारा ॥ बहुर कलंकी ज्योति समाई । कौतुक करै निरंजन राई ॥ ऐसे दसों जन्म निर्माये । निरंकार पुनि ताहि सताये ॥
उत्पत्ति परलयका लेखा
( ५६ )
ज्ञानसागर
धर्मदास वचन
धर्मदास कहैं सुनौं गुसाई । दसों जन्म कहि मोहि सुनाई ॥ कलप अनेक निरंजन राजा । आगे कैसा करि है साजा ॥ सो सब स्वामी मोहि जनाओ । उत्पति प्रलय भाव बताओ ॥ उत्पति प्रलय सुनौं तुम पाही । कहौ सबै जो संशय जाही ॥
साहिब कबीर वचन
चारौं युग हैं रहट स्वभाऊ । सो अब तोहि कहौं समुझाऊँ ॥ चारौं युग अंत जब होई । वषैं अग्नि निरंजन सोई ॥ पृथ्वी जार करै सब पानी । रहै स्वर्ग सो कहौ निशानी ॥ रहै जो देव तैंतीस करोरी । रहै जब तपसी तपकी जोरी ॥ चन्द्र सूर्य तारागण झारी । जबही देह तजै सुख चारी ॥ विष्णु बीतही दस अवतारा । नहिं शिव बीत योग जो धारा ॥ यहि विधि बहत रचौकड़ी जाई । सेवा फल पावै अन्याई ॥ उत्पति करै पुन प्रथम स्वभाऊ । ऐसे भवसागर निर्माऊ ॥
छंद-महा प्रलय जब किया निरंजन अग्नि सेवत ना रहो । लोमस ऋषितबहोय अंतहि शशि भानु पानी सब गयो ॥ तीन गुन पांच तत्त्व बीते दस चार सुत आकाश हो । महा देवी आदि कन्या ताही करै वह गरास हो ॥ सोरठा-सब भक्षे निरंजन राय, आदि अंत ना कछु रहै । शिव कन्यानाम विहाय, सब जी राखै आपमें ॥
चौपाई
सतगुरु दया जाहि पर होई । नाम प्रताप बाचे जन सोई ॥ निज घर हंसा करहि पयाना । और सकल जीवतहां समाना ॥ जाई रहैं जहां धर्महि द्वीपा । प्रथम करी जो लोक समीपा ॥ उत्पति कारण सेवा करहीं । पुनियहि भांति सृष्टि अनुसरहीं ॥
कृत्ययुगमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना
ज्ञानसागर
( ५७ )
भक्त अभक्त सबै पुनि खाई । सबको भक्षै निरंजन राई ॥ सो पुनि महिमा वेद बखाने । वेद पढे पर भेद ना जाने ॥
छंद-जेहि को भरोसा सोई चुरावै कहो तब कैसी वने । सेवा करै जेहि पुरुषकी सो भक्षण प्रति दिन करै ॥ जानी कै बूझै नहिं केतो कहो समुझाय हो । आदि अंत सबै यसै अस निरंजन राय हो ॥
सोरठा-काल सबनको खाय, हरि हर ब्रह्मासे सबै । वाचै कौन उपाय, एक नाम जाने बिना ॥
धर्मदासवचन-जीपाई
धर्मदास टेके गहि पाऊ । हे स्वामी मोहि भेद बताऊ ॥ कैसे आयो यहि संसारा । सो कहिये मोसों ध्यवहारा ॥
साहब कवीर वचन
सत्य युगमें कवीर साहबका पृथ्वी पर प्रगट होना
सुन धर्मनि मै तोहि बताउं । लोक छोड़ि मै इहँवां आउं ॥ सतयुग सत सुकृत मम नाउं । सोई सबै तोहि समझाउं ॥ हंस उवारन आयेउ जबही । मथुरा नगरहि पहुँचे तबही ॥ गुरुमठमांझ जो आसन कीन्ह। रक्षा अंत मोहि काहु न चीन्ह। ॥ कहौं भक्ति बहु भाति हटाई । बिन अंकूर न जीव जगाई ॥ बिबसी नाम रहै इक नांरी । ज्ञानवंत औ वरण कुँमारी ॥ तासों कहो भक्ति परमाना । बिबसी सुनै अचंभौ माना ॥
बिबसी वचन
साखी-अचरज कही तुम स्वामी, लोक वर्ण उजियार ॥ पहिले लोक दिखाओ, पीछे हो इतबार ॥
१ रानी-ऐसा भी पाठ है । २-बिश्वास
त्रेतामें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना
( ५८ )
ज्ञानसागर
चोपाई
तब हम मता अस कीन्हा । ताके शीश हाथ जो दीन्हा ॥ परसत शीश ताकर भय भागा । शून्य मंदिरमें सुहरा जागा ॥ देखत सुरति निरति सौ लोका । बिबसीका मेटचो सब धोखा ॥ हे स्वामी अब कीजे दाय। यमके घरसे जीव मुक्ताया ॥ बार अनेक विनय तिन कीन्हा । तब हम नाम लखाई दीन्हा ॥ भक्ति भावसों करै अनंदा । ज्यों चकोर पाये निशि चन्दा ॥ ताके गृह निंदक सब रहई । बिबसी देखत ही पर हरई ॥ साखी-जाके पाछे हंस जो उबरे, तिनहिको जो बताव ॥ हंस ग्यारह आयऊ, गुरुसे कीन्ह भिट्ठाब ॥
चोपाई
तिन कह सत् शब्द जो दीन्हा । परम पुरुषके दर्शन कीन्हा ॥ तब उठि गयो पुरुषके ठाऊँ । सतयुग सत सुकृत मम नाऊँ ॥ आवत जात लखे नहिं कोई । आज्ञा पुरुषकी जापर होई ॥
त्रेतायुगमें कबीर साहबका प्राकट्य
चोपाई
त्रेतायुग आयो पुनि जबही । युग अनुमान चलो मैं तबही ॥ नाम मुनींद्र धरो निःशंका । प्रथम जाय देखेउ गढ़लंका ॥ द्वारपाल सों कहि समुझाई । राजाको ले आव बुलाई ॥ सुन प्रतिहार कह अस वानी । रावन मरम सिद्ध नहिं जानी ॥ महा गर्व कछु गिने न आनो । शिवके बल कछु शंक न मानो ॥ मारहि मोहि कहाँ जो जाई । गर्व प्रहारी है रावन राई ॥
मुनींद्रववन
जाहु तुरत कहा सुन मोरा । बार बंक नहिं होवहिं तोरा ॥ प्रतीहार जब बात सुनाई । सिद्ध एक है ठाढ़ गुसाई ॥ सुनिनुपक्रोध अनल समकीन्हा । प्रतीहार तुम मति अति हीना ॥ भिक्षुक एक जो मोहि बुलावै । शिव सुत मार दरशनहिं पावै ॥
ज्ञानसागर
( ५१ )
साखी-कहा रूप तेहि ऋषीकर, मोहि कहो समझाय ॥ जो मांगे सो देव वहि, लेइ बहुर घर जाय ॥
चौपाई
हे प्रभु आहि सेत जो भाऊ । सेत अंग जैसे शशि गऊ ॥ माला तिलक बदन है सेता । कहै नृपति कोई आहि अजेता ॥ मन्दोदरि कहै सुनो हो राजा । ऐसा रूप और नहि छाजा ॥ सेत रूप महिमा मैं जानौं । निश्चय है कोई पुरुष पुरानो ॥ जार्ई तुरन्त गहौ तुम पाऊ । होऊ अकल सुन रावन राऊ ॥ दस सिर बचन सुनत पर जरेऊ । जगत हुताशन जनु वृत्त परेऊ ॥ चलि भयो असुर अनिल समचीन्हा । बहुत वेग मनमें अस कीन्हा ॥ सत्तरवार खड़ सो चलावा । तब हम ओट तृणकी लावा ॥
साखी-तृण ओट जेहि कारणे, गर्व परिहरौ राव ॥ तृण जवही ना टूटयो, राजहि शोक जनाव ॥
चौपाई
कह मन्दोदरि गहि मम पाऊ । गर्व न छाड़ रावन राऊ ॥ शिवकी सेव करै मन मानी । अटल राज दीन्हा तिन ठानी ॥ तब चलत हम कही अस बाणी । मृदु नृपति तुम मर्म न जानी ॥ सुनु रावण जो लंक मझारा । सब कहैं रामचन्द्र जो मारा ॥ काहू मुक्ति गम्य नहि पाई । ताते मैं कछु कहां बुझाई ॥ तो कहैं भक्षहि काल अन्याई । काचा मास स्वान जिमि खाई ॥ काल भक्ष जिव सबहि निदाना । अधिक तोर कछु मरदै माना ॥ अगिला जन्म तोर होइ जवही । भक्षी कृष्ण देख पुन तबही ॥ उनसे करिहौ बहु अभिमाना । ताकर तोहि कहा परवाना ॥ तृण नहि टूटो बल तुम बूझा । आगै कहा तोह बल सूझा ॥ वालि नाम इक कपि जो होई । रख छह मास तोहि कहैं गोई ॥ तिनकी कांख रहिहौ छै मासा । ऐसा कहैं पग कौन्ह प्रकाशा ॥
( ६० )
ज्ञानसागर
सार्वी-रावणको अपमान करि, अवध नगर चलि आय। दशा सन्त की जान कै, मधुकर पकरै पाय ॥
प्रसंग-चौपाई
नमस्कार कर गहि लिये पाऊं । बाल गोपाल चरण तर नाऊं ॥ ताकी प्रीति नीक मैं जाना । तासों लोक संदेश बखाना ॥ तिन कीन्ही विन्ती बहुवानी । हे प्रभु देखों लोक सहिदानी ॥ लैकर चले पंथ तेहि जहँवा । पांजी एक रहे धर्म तहँवा ॥ देखि ताहि दौरे यम दूता । कहाँ ले चले विप्रको पूता ॥ कहैं सुनींद्र सुनो यमराई । इनको जिन रोकौ तुम आई ॥ जाकर दूत जाव तेहि पास। पाछे करो वैर की आशा ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव आज्ञा देही । तीन लोक महाँ जिव गहि लेही ॥
सार्वी-छोड़ देव यह मारग, तुम अब आहु कौन ॥ यहां कोई नहीं आवे, तुम कह करत हो गौन ॥
चौपाई
तव सुनींद्र अस बोले लीन्हा । होहु दूत तुम सब बलहीना ॥ शब्द प्रमाण न होई बल थोड़ा । दूतन जीत गये महि ओरा ॥ तिनको दिव्य दृष्टि कर दीन्हा । तहँवा जाय लोक तिन चीन्हा ॥ देखि स्वरूप सुरंग अपारा । झलके जोत जहां उजियारा ॥ देखत मधुकर बहुत प्रतीती । हे स्वामी तुम यम कहैं जीती ॥ मो कहैं दीजै शब्द दृढाई । जेहिते हम परम पद पाई ॥ अति आधीन देखा मैं जबहीं । नाम दृढाय दियो तेहि तबहीं ॥ अति आधीन जो बोलस्वभाऊ । मोरे गृह अब धारो पाऊ ॥ ताके गृह आयो मैं जबहीं । सोरा जीव शरण भये तबहीं ॥
सार्वी-मधुकर जेते जीव सब, लोकहि कीन्ह पयान ॥ तातैं नाम सुनींद्र कहि, जीव सत्त दियो दान ॥
द्वापरमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना
ज्ञानसागर
( ६१ )
चोपाई
तब हम गये आप सुख सागर । अभय पक्ष जहाँ नाम उजागर ॥ विन्ती दंडवत कीन्ह अनेका । पुहुप द्वीप द्वीपन को थेगा ॥ कीडा विनोद होत बहु भावा । द्वापर युग धर्म न नियराया ॥
द्वापरमें कबीर साहिबका प्राकट्य
आज्ञा पुरुष दीन्ह मोहिं सारा । ताते बहुरि नाम उर धारा ॥ करूणा मय मम नाम प्रकासा । बहु जीवन कहैं छुड़ायो फांसा ॥ आयो जहाँ चन्दबिज बड़राऊ । गढ़ गिरनार नगर तेहि ठाऊ ॥ ताकी नारि रहे ब्रतधारी । पूजै साधु कुल लाज विसारी ॥ तिन पुनि सुधि सो हमारी पाई । लैगयी बहु विधि तुरत लिवाई ॥ आई चेरि विन्ती कीन्हा । तुव दर्शन रानी चित दीन्हा ॥ मैं नहिं राजा रावकर जाऊं । उठ रानी आपहि चलि आऊ ॥ नमस्कार कै कहि अस बानी । मोरे गृह पगु धारौं ज्ञानी ॥ ताकी प्रीति नीक मैं जाना । राजा गृह तब कीन्ह पयाना ॥ रानी कह उपदेश जो दीन्हा । राजा कर कछु शंक न कीन्हा ॥
साखी-एक दिवस जो रानी, बूझा मता अपार ॥ कहा मता तुम ज्ञानी, सो कछु कहो विचार ॥
रानी इन्दुमतीका कबीर साहबसे ज्ञान चर्चा करना-चोपाई
तासो कह्यो सुनौं हो रानी । अथरहिं रहौं नाम मम ज्ञानी ॥ जो कोइ माने कहा हमारा । ताको पठऊं जम सों न्यारा ॥ कहे रानी मोहि कीजे दाय। जातैं नहिं हते यमराया ॥ बहुत भांति तत्त्व जो चीन्हा । बहु विधि विन्ती मुक्ति अधीना ॥
कृष्ण-विष्णु-म्यवहार
सोवत कृष्ण स्वप्न इक देखा । बहु वैकुंठ सेत जनु रेखा ॥ उग्यो बादल सेतहिं फूला । सपना देख कृष्ण मन भूला ॥
( ६२ )
ज्ञानसागर
अहो ब्रह्मा मैं सपना देखा । बादल उमंग पड्डप की रेखा ॥ सोवत देखा पुरमें अपना । ब्रह्मा वेद देख कहु सपना ॥ रास वर्ग गनि मोहि बताओ । जेहि ते जीवका भर्म मिटाओ ॥ तब पुनि ब्रह्मा वेद विचारा । पुनि भाष्यो ताकर उपचारा ॥ सुनो विष्णु समझाऊं तोही । यही आज्ञा भयीं सो मोही ॥
साखी—है कोई ज्ञानी जीव बड़ा, तेहि कारण प्रभु आव ॥ दूत ताहि नहि पावई, सत्त पुरुष सुन नाव ॥
चोपाई
सुनिके विष्णु अचरज मन कीन्हा । ब्रह्मा सों तब बोले लीन्हा ॥ सोइ करौ जो जीव न जाई । राखौ ताहि महि भरमाई ॥ सुनिके ब्रह्मा मतौ विचारा । तक्षक रूप दूत पगु धारा ॥ यह सब भेद जबै हम जानी । इन्दुमती सो आज्ञा ठानी ॥ काल रूप तक्षक को आही । डस है तोहि जो कष्ट जनाई ॥ विरहुलि शब्द गहो मन लाई । यमको दूत जीत नहि जाई ॥ रानी शब्द विरहुली पाई । ता कहैं तब प्रतीति मन लाई ॥ बहुविधि सुमरै शब्द अघाई । काल घरी निकटै है आई ॥ चारौ दूत पठाव यम राऊ । गढ़ गिरनार बेग चल आऊ ॥
साखी—रानी भक्ती लीन्ह मन, काल न पावै दाव ॥ साध चले घर आपने, रानी मस्तक नाव ॥
चोपाई
राजा रानी दोई शिष्य मोरा । रानी लीन्ह राव मति भोरा ॥ तब यमदूत मता अस कीन्हा । चित्रसारमें पहुँचे लीन्हा ॥ रानी चली सिज्या पर जबहीं । तक्षक ग्रास भर्म भयो तबहीं ॥ रानी कहे डस्यो मोहि सांपा । राजा कियो कठिन संतापा ॥ मंत्री गुणी सब तुरत बुलाये । राजा आज्ञा सों सब आये ॥
ज्ञानसागर
( ६३ )
रानी शब्द विरहुली भाखा । दूर दूर सबदिन को राखा ॥ रानी क्रोध बहुत तब कीन्हा । बहुत होय नृप अति आधीना ॥ अरे भाई मम प्राण प्यारी । यही बार तुम लेव सम्हारी ॥ सृष्टित रानी सब चलि आये । जाग्रत जान के सबै सिधाये ॥ तक्षक विष नहि लाग्यो नारी । अंतक दूत रहे सब हारी ॥
साखी-रानी उठि ठाढ़ी भई, राजहि हरष अपार ॥ सुमिरन हम को कियो, धन्य है गुरु हमार ॥
चोपाई
तक्षक राव तब आये जहवां । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर तहवां ॥ विष को तेज शब्द सों जांता । सुनिके विष्णुहिं भयी तब चिंता ॥ धर्मराय का तुरत हंकारा । यम दूतन को जो सिरदारा ॥ ताका हरि अस मता सुनावा । करियो सबै तुम सेतहि भावा ॥ आने छलिकैं जो नृप नारी । निश्चय आज्ञा आहि हमारी ॥ सुनिके दूत भेष कियो रंगा । अपन कीन्ह सब सेतहि अङ्गा ॥ आये दूत नगर नियरावा । रानी ऐसा सपना पावा ॥ आये गुरु ज्ञानी जो हमारे । बोलत अमृत वचन सुधारे ॥
ज्ञानी वचन
सुन रानी तोहि भेद बताऊं । काल चरित्र सब तोहि सुनाऊं ॥ छलबे अइहैं ताहि सम्हारो । सेत रूप जिन भाव विचारो ॥ साखी-मस्तक ऊंचा कालका, चित्तमें गुणका रंग ॥ यही चिह्न तुम चीन्हियो, और सेत सब अंग ॥
चोपाई
भये प्रभात काल तब आवा । सेत रूप सब अंग बनावा ॥ आये जहां तहां नृप नारी । तिनसौं ऐसो बचन उचारी ॥ चीन्हत है कै नाही रानी । मरदन काल आइस मैं ज्ञानी ॥
( ६४ )
ज्ञानसागर
मैं तो तोकहँ दीक्षा दीन्हा । तक्षक डसै तोहि कहँ लीन्हा ॥ तब तोहि मंत्र दियो मैं सोई । कालको अजय जाहिते होई ॥ तँ पुनि तैसो तत्त्व विचारा । हर्षत भये तब धनी तुम्हारा ॥ बेगी चलो गहर जिन लाओ । प्रभु को दरस तुरत तुम पाओ ॥ इंडु मती सपना जो देखा । बैसो देखो ताकर रेखा ॥ तीनों गुण चक्षु मैं राता । और पुन देखो ऊंचा माथा ॥ और स्वेत सब देख्यो अंगा । पाइ प्रतीत स्वप्न परसंगा ॥ अरे काल तँ क्या ठग मोही । हंस रूप नहि छाजै तोही ॥ यह छल मता न लागु तुम्हारा । है समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥
साखी- मम गुरुकी परतीत यह, धरनी धरै न पांव ॥ काग न होय मराल सम, यह छति तोहि न भाव ॥
चोपाई
सुनिके दूत कीन्ह तब रोषा । इन्दुमती को दीन्ह सो दोषा ॥ तिन पुनि सुमरे अपने स्वामी । भक्त हेतु चले अन्तर्यामी ॥ ज्ञानी आवत काल पराना । ता कहँ लै पुनि लोक सिधाना ॥ धन्य भाग तिन रानी केरा । ज्ञानी आय काल सों फेरा ॥ रानी मानसरोवर आई । अमी सरोवर ताहि दिखाई ॥ कबीरके सागर पांव परो जबही । सुरति सागरे पहुँची तबही ॥ पहुँचत तासु हंस हरषाने । सबमिलिकीन्हतासु सन्माने ॥ सतगुरु दायी कीन्ही जबही । पोडशा भानु रूप भयो तबही ॥ भयो हर्ष रानी अति शोभा । राजा लग्यो करन अति क्षोभा ॥ हे सतगुरु मे तुम बलिहारी । राजहि आनो पतहि हमारी ॥ सतगुरु कहैं सुन संत सुजाना । राजा भाव भक्ति नहि जाना ॥ आ तोहि भयो हंसको रूपा । कारण कवन चहै तू भूपा ॥
ज्ञानसागर
( ६५ )
साखी-राजा भक्ति न जानही, तातें हंस न आव ॥ विना तत्त्व नहिं हिरम्बर, हंस न होय भुक्ताव ॥
चौपाई
हे स्वामी मैं भव जब रहिया । राजा भक्ति न वरजै कहिया ॥ है संसार का ऐसा भाऊ । पुरुष पराय ध्यान नहिं आऊ ॥ जो कोइ राते त्रिया बिरानी । ताकी करै सवै मिलि हानी ॥ छोटे बड़े को यह व्यवहारा । धन्यनृपति जिन ज्ञान विचारा ॥ करों साथ सेवा मैं जबही । राजा मोहि न वरजै कबही ॥ जो राजा अटकावत मोहीं । कैसे भेटत तब मैं तोहीं ॥ धन्यनृपति जिन भक्ति हटावा । आनिय ताहि हंस पति रावा ॥ सुनि ज्ञानी ताही की वाता । चले तबहि तहँही बिहँसाता ॥ आये भवसागर जब ज्ञानी । यहाँ नृपति की अवध खुटानी ॥ आये लेन ताहि यमदूता । राजहि कष्ट जो देत बहुता ॥
साखी-हंस ताको नहिं पावे, घेर रहो जो राव ॥
राजा परो अगाध में, सतगुर को गुहराव ॥
चौपाई
राजा तत्त्व मता नहिं चीन्हा । ताते यम राजन दुख दीन्हा ॥ पावे यम नहिं छाड़े ताही । भक्ति योग जो ऐसो आही ॥ तब ज्ञानी आये तेहि ठाई । देखत जीव बहुत संकाई ॥ ज्ञानी लीन्ह जीव कर आगे । देखत दूत ताहि सब भागे ॥ दूत चहुँ दिशि देखत जावैं । मरकट दृष्टि पक्षि नहिं पावैं ॥ जस आकाश कहैं जाय पखेरू । मरकट दृष्टि आये सत हेरू ॥ ऐसे ताहि दूत गुहरावैं । नहिं जब देखैं तब पछतावैं ॥ जहाँ लगि गम तहैं लग हेरा । आगे देखा धुन्ध कुहेरा ॥ हंस गये जब लोक द्वारा । रूप अनूप देख उजियारा ॥ गये नृपति हंसन की पांती । ता मध्ये पुन जइस अजाती ॥
( ६६ )
ज्ञानसागर
साखी-रानी चीन्हौ नृपति को, आन धरे तब पांव ॥ नृप मन में बहु संकुंचै, लज्जा ताहि जनाव ॥
चौपाई
कह रानी सुन साधु भुवारा । चीन्ह नृपति मैं हौ तुम दारा ॥ इन्दुमती है मेरा नाऊँ । यहि कारण टेक्यो तुव पाऊँ ॥ राव कहे कि म करो प्रमाना । बर्ण तुम्हारो हंस समाना ॥ शोभा बहु देखौ तुम अंगा । कैसे तोहि कहौ अर्धगा ॥ हंस करुणामय वचन उचारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥ हंस रूप होवे नर नारी । जिन भवसागर भक्ति विचारी ॥ नृप को भयो हंस का भावा । जिन पुनि ऐसी शोभा पावा ॥ भुई में रहै जो अंतक दूता । तिन पुनि विस्मय कीन्ह बहुता ॥ दूत चलि गये जहैं त्रिय राऊ । तिनसों जाय कहचो सत भाऊ ॥ स्वामी श्वेत वरण यक आवा । रानी नृप लेह लोक सिधावा ॥ कैसो लोक ब्रह्मा पर जरेऊ । जरत हुताशन जनु घृत परेऊ ॥ चलो हरी हर संग हमारे । जहँवा राजा रानी सिधारे ॥ चले वेग तब तीनों भाई । बाहन साज चले तिय राई ॥
साखी-सुम्मेरते ऊँचे गये, तब देखा अँधियार ॥ नव खंड महि तब छाँड़िके, आगे को पगधार ॥
चौपाई
पहुँचे विषम सरोवर जाई । बिजुली हुओ ह्यां अन्याई ॥ ब्रह्मा शिव बाहन थकि गयऊ । सतगुन तेज विष्णु का भयऊ ॥ अलख निरंजन भयो तिहिठाऊँ । औ देवी तें आशिष पाऊँ ॥ तेहि ते विष्णु गो अँमर जहँवा । कामिनि मान सरोवर तहँवा ॥ देखत रूप विष्णु मन भूला । श्वेत पुष्प पद्म जस फूला ॥ कामिनि मान सरोवर राजै । जुत्थ जुत्थ जोड़ भल साजै ॥
कलियुग में कबीरसाहबका प्रगट होना
ज्ञानसागर
( ६७ )
न अध्यान तहाँ तिन्ह लागी । सत्त सुकृत बोले अनुरागी ॥ सब मिलि भयो अचंभो वाता । ऐसा अचरज नरको वाता ॥ कोइ कहे नर देख पखेरू । ऊँची दृष्टि सबै मिलि हेरू ॥ वेग निकारी यहाँते आजू । रहन न पावे करौ सो काजू ॥
साखी-दोई सठहार जो भेजे, नर से कहो बुझाय ॥ छांढौ मान सरोवर; यहाँ नहीं तुव ठाय ॥
चोपाई
प्रतिहारन तब आज्ञा कीन्हा । तिनसोंहरि अस बोलन लीन्हा ॥ देखा चाहों तुम पुर पाटन । हे प्रभु भेद कहो कछु आपन ॥ तब प्रतिहार कहैं समझाई । नरको रूप दरश नहिं पाई ॥ जौ लग बीरा नाम नहिं पावे । सो जीव कैसे लोक सिधावे ॥ भयो जो बड़ो निरंजन राऊ । तेऊ यहाँ रहन नहिं पाऊ ॥ जा तू विष्णु कहा सुन मोरा । नातर चक्षु हीन होय तोरा ॥ चले विष्णु तब लागि न बारा । हरि कमलासो मंत्र विचारा ॥ यह कछु बात अचंभो आही । कहत न बने रूप मोहि पाही ॥ देख सठिहारन बेग निकारा । चले जीव जहाँ राज तुम्हारा ॥ अचरज बात कही नहिं जाई । धन्य पुरुष जिन लोक बनाई ॥ जब मैं ध्यान धरा प्रभु केरा । अलख रूप देखौ बहुतेरा ॥ ऐसा रूप कहुं नहिं देखा । अचरज भयो नजाय विशेषा ॥
साखी-चले ब्रह्मा हरि शंकर, छाडि लोकके खोज ॥ बस शशि के परभावतें, सकुचन होत सरोज ॥
कलियुगमें कबीर साहिबका प्राकट्य-चोपाई
सतयुग त्रेता बीत जब गयऊ । कलियुगको प्रभाव तब भयऊ ॥ छाडयो लोक लोककी काया । प्रथमहि मान सरोवर आया ॥