कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भवतारणबोध (चतुर्दश तरंग)
सत्यपुरुषाय नमः
अथ श्रीबोधसागरे
चतुर्दशस्तरंगः
ग्रन्थ भवतारणबोध
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धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बिनवै कर जोरी । सद्गुरु सुनिये विनती मोरी ॥ भवसागर कवनहिं विधि छूटे । यमबंधन कवनहिं विधि टूटे ॥ भव दरियाका वार न पारा । ता मई अँटके सब संसारा ॥ सो दरियाव कौन विधि थाहूँ । परम पुरुषको कैसे पाहूँ ॥ करों भक्तिके योग कमावों । देओं दानके तीर्थ नहावों ॥ करों यज्ञ के इन्द्री साधों । बाहर फिरों के मतको बांधों ॥ जो तुम कहो मैं करिहों । वचन तुम्हारे हृदये धरिहों ॥ भवसागर दुख मेटो मोरा । दूटै जन्म मरनको ठौरा ॥ संशय रहित करहु मोहिं स्वामी । तुम सब घटके अन्तर्यामी ॥
सद्गुरु वचन
सुन धर्मदास मैं सत्य बताऊँ । भवसागरका भरम मिटाऊँ ॥ संशय रहित सदा तुम होऊँ । तुम्हरी राह न रोकै कोऊ ॥ करो भक्ति औ बंधन काटो । जन्म मरणका संशय पाटो ॥ भाव भक्ति करिये चित लाई । सेवहु साधु तजि मान बढ़ाई ॥ सुन धर्मदास भक्तिपद ऊचा । इन सीढ़ी कोई नहिं पहुँचा ॥ योगी योगसाधना करई । भवसागरते नाहीं तरई ॥ दान देय सोई फल पावे । भवसागर भुक्तनको आवे ॥ तीर्थ नहाये जो कछु होहीं । सो सब भाषा सुनाऊँ तोहीं ॥
बोधसागर
( ४३ )
जन्म लेय उज्ज्वल तन पावे । सम्पति है जगमें पुनि आवे ॥ ऊंचे घरसे ले अवतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यवहारा ॥ इन्द्री साधन है यह नीका । विना भक्ति जानों सब फीका ॥ इन्द्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥ क्रोध किये गति सुक्ति न पावे । भक्ति महात्महाथ नहिं आवे ॥ बरत एक भक्तिका पूरा । और बरत कीजै सब दूरा ॥ और बरत सब यम की फांसी । भक्ति बरत मिलही अविनासी ॥ हर अवराधन की सुनु बाता । कहा भेद सुनिये तुम ज्ञाता ॥ हरि हर नाम सदा शिव केरा । तासों दूर होत भव फेरा ॥ बहुत प्रीतिसों शिवको ध्यावे । रिधि सिद्धि द्रव्य बहुत सुख पावे ॥ मन जिसके निश्चय कर धरहीं । गिरि कैलासमें वासा करहीं ॥ फिरके काल झपेटे बाहीं । डार देय भवसागर माहीं ॥ ताते संशय छूटे नाहीं । भवसागरमें जीव जो जाहीं ॥ शिवकी साधन है यह गती । निर्भय पद पावे नहिं रती ॥ जाके सुमिरे योगी यती । चौरासी भरमें उत्पती ॥ हरि हरकी यह कथा सुनाई । आगे और सुनाऊ भाई ॥
सारखी-शिवसाधनकी यह गती, शिव हैं भवके रूप ।
विन समझे ये जगत सब, परे महा भ्रम रूप ॥
नरक वासमें मनु परे, ऐसी शिवकी मौज ।
कहे कबीर विचारिके, मिटे न यमकी फौज ॥
चौपाई
हरि हरि नाम विष्णुका होई । विष्णु विष्णु भाषे सब कोई ॥ विष्णुहिं को कर्ता बतलावे । कहो जीव कैसे फल पावे ॥ सब घट माहीं विष्णु विराजे । खान पानमें विष्णुहि गाजे ॥ सकल भोग विष्णु जो लेही । भोग करे जग भरमें देही ॥
( ४४ )
भवतारणबोध
हरि हरि नाम विष्णुका भाषा । शुभ और अशुभ कर्म दोहराया ॥ इनमें करें कलोल सदाई । करें भोग जीवन भरमाई ॥ बहुत प्रीतिसो विष्णुहि ध्यावे । सो जिव विष्णुपुरीको जावे ॥ विष्णु पुरीमें निर्भय नाहीं । फिरके डार देय भूमाहीं ॥ हरि हरि नाम विष्णुका भाषा । हरिकी और सुनो अब साखा ॥ साखी-हरि नाम है विष्णुका, जिन कीन्हा सब जेर । चौरासी भरमे सदा, मिटै न भवका फेर ॥
चौपाई
सुनहु धर्मदास तुम हो साधू । इनको कबहुँ मत अवराधू ॥ हरि हर ब्रह्मा को है नाऊँ । रज गुण व्यापक है सब ठाऊँ ॥ जगत् कहै ब्रह्मा है करता । मर्म माहिँ सब बह बह मरता ॥ ब्राह्मण को पूजे ससारा । जीव होय नहि भवते न्यारा ॥ पढ़ पढ़ विद्या जग भर्मावे । भक्ति पदार्थ कैसे पावे ॥ पोथी पाठ पढ़ै दिनराती । ये केवल भ्रमके उत्पाती ॥ आप भरम ते निर्भय नाहीं । बहे जात हैं भ्रमके माहीं ॥ औरनको शिक्षा सब देही । ताते मिलै न परम सनेही ॥ पाप पुण्य का लेखा करही । विना भक्ति चौरासी परही ॥ यह ब्राह्मणकी यह करतूती । ब्राह्मण पूजे होय न सुक्ती ॥
साखी-त्रिगुण भक्ति है जगकी, निर्गुण लखै न कोय ।
सर्गुण निर्गुण दोह मिटै, भक्ति रहित घर होय ॥
इह त्रिगुणहि कि भक्तिमें, जिन भूलो धर्मदास ।
ऊपर निर्गुण जानिये, जहाँ योगीका बास ॥
चौपाई
धर्मदास सुनसन्त सुजाना । नर्गुण सों अब करो बखाना ॥ निर्गुण नाम निरंजन भाई । जिन सारी उत्पत्ति बनाई ॥
बोधसागर
( ३६ )
निर्गुण सों जु भया ओंकारा । तासों तीनों गुण विस्तारा ॥ निर्गुण सो मन भये प्रचण्डा । ताको बास सकल ब्रह्मण्डा ॥ ओङ्कार मन आप निरञ्जन । नाना विधिके कीये व्यञ्जन ॥ भौंति भौंतिके घाट सवारा । कहैलंग गिनों वार नहि पारा ॥ ताके अंश सकल अवतारा । राम कृष्ण तामैं सरदारा ॥ पूरण आप निरञ्जन होई । इनके फेर फार नहि कोई ॥ सर्गुण निर्गुणहुकी करे सेवा । भक्ति करे अरु पूजे देवा ॥ कर आचार विचार न जाने । सो मेरे मन कभी न माने ॥ मन बोधे मन माहि समावे । निज पदको कोई नहि पावे ॥ मन को बोध करे जो कोई । मन पहुँचावे पहुँचै सोई ॥ जाप निरञ्जन माहि समाई । आगे गम्य न काहू पाई ॥ ऐसे तीन लोक सब अटके । खरे सयाने ते सब भटके ॥ ऋषिसुनि गणगन्धर्व रु देवा । सब मिल करें निरञ्जन सेवा ॥ साधक सिद्ध साधु जो भयेऊ । इनके आगे कोई न गयेऊ ॥ बहुत प्रीति सो भक्ति विचारी । मिलन २ लीला अधिकारी ॥ जाय निरञ्जन सो हो भेटा । काल रूप धर करै समेटा ॥ वही निरञ्जन का विस्तारा । तामैं उरझो सब संसारा ॥ जिधर तिधर राखै बिलमाई । रचना अनन्त अपार बनाई ॥ धर्मदास तुम भक्ति सनेही । इन मैं मत अटकावे देही ॥ जन्म धरे छूटै नहि भाई । ताते आप कहो गुहराई ॥ भक्ति गुप्त जाने नहि कोई । तुर्त सनेही पावै सोई ॥ साखी-इन्ते भक्ती गुप्त है, सुन धर्मदास सुजान । भक्ति करो भरमो नहीं, सोई भक्ति प्रमाण ॥
धर्मदास-वचन चौपाई
हे स्वामी मैं हूँ अज्ञानी । गुप्त भक्ति मोहिं कहो बखानी ॥ तुम यह भक्ति कहाँ सों आनी । सोई बात मोहिं कहो बखानी ॥
( ४६ )
भवतारणबोध
तुम्हारी भक्ति कौन विधि पावे । कौन भांति की भक्ति कहावे ॥ भक्ति कहींजे कौन प्रकारा । ताको स्वामी कहो विचारा ॥ भक्ति २ सब जगत बखाने । भक्ति भेद कैसी विधि जाने ॥ सो निश्चय मोहिं कहो बखानी । केहि विधि छूटै भवकी बानी ॥ जाते सब संशय मिट जाई । तातें आप देहु समझाई ।
साखी-भव वाणीभ्रम दुख बढ़ै सुख कर सत गुरु देव ।
भक्ति करो निष्कपट होय, सदा तुम्हारी सेव ॥
कबीर-वचन चौपाई
कहैं कबीर सुनो मम बानी । भक्ति सार मैं कहौं बखानी ॥ आगे भक्त भये बहु भाई । करी भक्ति पै युक्ति न पाई ॥ आदि भक्ति शिव योगीं केरी । राखी गुप्त न जग में फेरी ॥ योग करे औ भक्ति कमावै । अधर एक नामै ध्वनि लावै ॥ सौ अक्षर है रंकारा । तासों उपजे सकल पसारा ॥ रहे अधर ब्रह्मांड के माहीं । शिव जानतको जानत नाही ॥ तासन मेरी भक्ति नियारी । जाको क्या जाने संसारी ॥ ताको योगेश्वर नहीं पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥ शिवसों अधिक न कोऊ जाने । ऐसी भांति छान बिलछाने ॥ सोउ जीव आगे नहीं आवे । तीन लोक प्रभुता उठ जावे ॥ ठौर हमारो कैसे पावे । वहाँ गये बहुरिहु नहीं आवे ॥ धर्मदास कहु वर्णन अपना । ब्रह्म पुत्र सेवे तिहिं चरना ॥ सनक सनन्दन सनत्कुमारा । सनकादिकसे चारों अवतारा ॥ पांच वर्ष काया नित रहई । ब्रह्म लीन कोह पार न लरई ॥ केते ब्रह्म होय होय गयऊ । सनकादिकसे निश्चय भयऊ ॥ ध्यान जु करे निरञ्जन माहीं । निरञ्जनसों न्यारा कोउ नाही ॥ निरञ्जन अंश हंस अवतारा । सकल मृष्टि है ताहि मँझारा ॥
बोधसागर
( ३७ )
यहाँ ताहि कोई बिरला जाने । आगे कहो कौन विधि माने ॥ इनकी भक्ति करे नर सोई । हमरी भक्ति न जानत कोई ॥ भक्त अनेक भये जग माहीं । निर्भय घर को पावत नाहीं ॥ भक्ति करै तब भक्त कहावे । भगते रहित न कोई पावे ॥ भग भुगते फिर फिर भग आवे । भगते बचपन कोई पावे ॥ चौदह लोक बसै भगमाहीं । भगते न्यारा कोई नाहीं ॥ न्यारी युक्ति मैं तुमहिं दिखाई । तहाँ सुतं रहै साध कहाई ॥ भुगते भग औ भक्त कहावे । फिर फिर योनी संकट आवे ॥ मेरी भक्ति युक्ती जाना । ताका आवागमन नशाना ॥ भक्ति करै तब सुत्तिको होई । नहिं तो बाना जाय विगोई ॥ भक्ति भेद बहुतक है भाई । निर्मल भक्ति न काहूँ पाई ॥ तुम जो बूझो भक्ति प्रकारा । ताका भेद सुनो अब न्यारा ॥ भक्ति होय नहिं नाचे गाये । भक्ति होय नहिं घंट बजाये ॥ भक्ति होय नहिं मूरत पूजा । पाहन सेवे क्या तोहि सूझा ॥ विमल विमल गावें अरु रोवें । क्षण एक परम जन्म को खोवें ॥ ऐसा साहिब मानत नाहीं । ये सब काल रूप के छाहीं ॥ मन ही गावे मन ही रोवे । मन ही जागे मन ही सोवे ॥ जब लग भीतर लग्न न लागे । तब लग सुतं न कबहुँ जागे ॥ सत्य नाम की खबर न पाई । कां कर भक्ति करौं रे भाई ॥ ठौर ठिकाना जानत नाहीं । झूठे मग्न रहैं मन माहीं ॥ कहन सुनन कां भक्त कहावें । भक्ति भेद कितहुँ नहिं पावें ॥ लग्न प्रेम बिन भक्ति न होई । सङ्गति को पावे नहिं कोई ॥ अपने साहिबको नहिं जाना । बिन देखे किहि कियो बखाना ॥ ऐसे भूल परे संसारा । कैसे उतरे भव जल पारा ॥ सत्य भक्तिको नाहीं लागा । ऐसे हैं सब जीव अभागा ॥
( ४८ )
भवतारणबोध
धर्मदास तुम हो बुद्धिवन्ता । भक्ति करो पावो सतसन्ता ॥ एक पुरुष हैं अगम अपारा । सब घट व्यापक सबसों न्यारा ॥ ताको नहीं जाने संसारा । ताकी भक्ति महानिजसारा ॥ भक्ति करे जब उतरे पारा । सुर्त नृत्य कर सेवे सारा ॥ यह विधि भक्तिपदारथ पावे । मुक्ति होय भव बहुरि न आवे ॥ भवसागर ते उतरे पारा । फिरके जग नहीं ले अवतारा ॥ ऐसी भक्ति मुक्ति की दाता । जाकी गति नहीं लखै विधाता ॥ भक्तिही भक्ति भेद बहु भारी । यही भक्ति जगत ते न्यारी ॥ साखी-भक्तिपदारथ अगम फल, मुक्ति चार यहि बार । पावे पूरण पुरुष को, जग नहीं ले अवतार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहै सुनो गुसाई । पूरण पुरुष बसे किहि ठाई ॥ केहि विधि सों सेवा कीजे । कैसे चरणकमल चितदीजे ॥ कौन भांति साधों सो भक्ती । सदगुरु मोहिं बताओ युक्ती ॥
सदगुरु वचन
पहिले प्रेम अङ्ग मैं आवे । साधु देख सन्मुख होय धावे ॥ चरण धोय चरणामृत लेवे । प्रीति सहित साधूको सेवे ॥ अन्तर छांड़ि करो सेवकाई । यहि विधि भवके दुःख मिटाई ॥ जोह साधु प्रेम गति जाने । ता साधूकी सेवा ठाने ॥ परम पुरुषकी भक्ति दृढावे । सुतैं नृप कर तहैं पहुँचावे ॥ तासों प्रीति करो चितलाई । छांड़ो दुर्मति औ चतुराई ॥ तबही परम पुरुषको पाये । भव तरके जग बहुरि न आवे ॥ भवतारन संशय नहीं तोही । दो क्षण होय तो लागे मोही ॥ कीतहु बातकी फिकर न करना । कही भक्त निश्चय कर तरना ॥
बोधसागर
( ४९ )
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बूझे चित लाई । सकल वेद मोहिं देहु बताई ॥ निर्गुण रहित तुम्हारा नाई । कैसे भक्ति करो तेहि ठाई ॥ हो स्वामी यह अचरज बाता । भक्ति करनको दाव न घाता ॥ सर्गुण भक्ति करै संसारा । निर्गुण योगेश्वर आधारा ॥ इन दोनोंके पार बतावा । तुम कैसी विधितहैं मन लावा ॥ सत्य बात मोहि कहो गुसाई । केहि विधि सुतं लगाऊँ धाई ॥ सगुणहि पार न पावत कोई । मेरे मन बर संशय होई ॥ सतगुरु संशय देहु निवारी । मैं जाऊँ तुम्हरी बलिहारी ॥ सर्गुण निर्गुण भेद बताऊँ । तीसर न्यारा मोहिं लखाऊँ ॥ मोरे मन पतयावत नाहीं । बहुत फिकर कीन्हा मनमाहीं ॥ हो समर्थ तुम सतगुरु साई । दृढ़तासे पकड़ो मम बाहीं ॥ सर्व युक्ति बतलावो मोई । अंतर कछु न राखो गोई ॥ तुम सत सत्य तुम्हारी बाता । मैं याचक तुम समरथ दाता ॥ देहु मोहिं मैं मांगो सोई । सोइ लखाव मिटे दिल दोई ॥
साखी-सत्य सत्य समरथ धनी, सत्य करहु परकाश ।
सत्य लोक पहुँचायहो, छूटै यम भव त्रास ॥
सद्गुरु-वचन चौपाई
सुन धर्मन सब कहो सँदेशा । तुमको होय न भवका लेशा ॥ भव तारण समर्थ है न्यारा । ताको नहिं जाने संसारा ॥ योगेश्वर वह गति नहिं पाई । सिद्ध साधककी कौन चलाई ॥ भक्ति होय जगतमें भारी । ध्रुव प्रहलाद सदा अधिकारी ॥ भक्तिमाहिं इन सम नहिं कोई । रामकृष्ण प्रकटे नहिं गोई ॥ दोनों जाने दो व्रत साधू । यही एक इष्ट अवराधू ॥ सतयुग भक्ति करी ध्रुवराजा । पांच वर्ष आयू तत आज्ञा ॥
नं. ७ कबीर सागर - ३
( ५० )
भवतारणबोध
निकसे गृह ते बाहर गयेऊ । नारदके उपदेशी भयेऊ ॥ छठें मास प्रकटे हरि आई । राज दिये वैकुण्ठ पठाई ॥ साठ हजार वर्ष दियो राजू । कुटुम सहित वैकुण्ठ विराजू ॥ एकदिवस जब प्रलय हूय आई । तहाँ तो पुनि ये देह गिराई ॥ पुनि सामीप्य मोक्ष कर दीन्हा । परम पुरुष गति तबहु न चीन्हा ॥ काल पुरुष राखे सब घेरी । सत्य पुरुष जग जाय न हेरी ॥ ऐसे भक्त भये जग माहीं । परम पुरुष गति पावत नाहीं ॥ भक्ति सगुण करे यहि पावे । निर्गुण माहीं नाहिं समावे ॥ जो सायुज्य होय गति पूरी । देव निरंजन जाय हजुरी ॥ ज्योनि स्वरूपी ताका नाऊँ । चारों सुक्त बसैं तेहिं ठाऊँ ॥ सालोक्यहि सामीप्य कहाई । सारूपी सायोज्य लहाई ॥ चार मुक्ति जाके घर होई । ताको पार न पावे कोई ॥ ताके परे मोर अस्थाना । कैसी भक्ति कहा कहों ज्ञाना ।
साखी-ध्रुवकी गति तुमसों कही, सुन धर्मदास सुजान ।
अपरम्पार न पावही, पूर्ण पद निर्वान ॥
चौपाई
सुन धर्मन एक कथा नियारी । बड़ी भक्ति प्रहलाद विचारी ॥ हिरनाकुश दोनों बलकारा । ताके घर लीन्हा अवतारा ॥ तपके हेतु गये बन माहीं । कोइ बातको संशय नाहीं ॥ गर्भवन्त होती तिहि नारी । इन्द्र आवाज सुनि अधिकारी ॥ नभवानीते भई अवाजा । इन्द्रासनको लेही राजा ॥ हिरनाकुश घर जन्म धराई । सो द्वारासन लेही भाई ॥ इन्द्रहि संशय उपजो भारी । गर्भ वातसों देहों ठारी ॥ ये छल इन्द्र कियो अधिकारी । अपने देशहिं ले गयो नारी ॥ तेहिं क्षण नारद आये तहँवाँ । इन्द्रहिको समझायो जहँवाँ ॥
बोधसागर
( ५१ )
इनको गर्भ न चौरै भाई । भक्त होय सबको सुखदाई ॥ गर्भहि मांझ ज्ञान तेहिं दीन्हौ । नारद एक काम बड़ कीन्हौ ॥ हृद कीन्हौ तेहिं गर्भके माहीं । वर्ष हजार रही तिहि ठाहीं ॥ फिर नारी अपने पुर आई । इन्द्रजीत हिरनाकुश पाई ॥ तहां जन्म लीन्हो प्रहलादा । राम रटन रसना ले स्वादा ॥ ऐसो रटन लगाये भारी । तामसभक्त न कोइ अधिकारी ॥ केतो कष्ट सहे सिर अपना । तबही दुःख न व्यापे सपना ॥ हिरनाकुशके मनमें आई । राम तेरो मोहिं देहु बताई ॥ स्वम्भ फार लीन्हौ अवतारा । हरि नरसिंह रूप तब धारा ॥ हिरनाकुश नख उदर विदारा । अपने जन प्रहलाद उबारा ॥ फिरके इन्द्रासन पहुँचाया । सर्गुण भक्तिजान सब माया ॥ ऐसे दृढ़व्रत रामहि गहिया । तेज्ज इन्द्रासन सुख लहिया ॥ ऐसे भक्त न होवे भाई । ताकी गति तुमको समुझाई ॥ इन्द्रासनको राज सुनाऊं । महा भोग बड़े सुख पाऊं ॥ सत्तर दाय चौकड़ी भुगता । बन्धन भवके होय न मुक्ता ॥ बड़े भक्त की कथा सुनाई । पूछो और कहो तोहिं भाई ॥
साखी-इन्द्र राजसुख भोगकर, फिर भवसागरमाहिं ।
यह सर्गुणकी भक्ति है, कबहुँ निर्भय नाहिं ॥
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास बूझे चित लाई । सतगुरु संशय देहु मिटाई ॥ सर्गुण भक्त मुक्त नहिं होई । है वह एकहि या है दोई ॥ यह संदेह मिटाओ मेरा । तुम सतगुरु मम बन्दी छोरा ॥ की सर्गुण को निर्गुण कहिये । भिन्न भिन्न भेद मोहिं कहिये ॥ सकल मृष्टि कहैवाते भयऊ । यही युक्ति काहु नहिं कहऊ ॥ जो मोहिं ऊपर दया तुम्हारी । सबविधिकहियेयुक्ति विचारी ॥
( ५२ )
भवतारणबोध
यह संसार कहाँसे आया । को है ब्रह्मा अरु को है माया ॥ अन्तर छोड़ि निरन्तर भाखो । मोसन अन्तर कछु न राखो ॥ भक्ति भेद कहो मोहे स्वामी । तुम सब घटके अन्तर्यामी ॥ जीव काज आये जगमाहीं । अब मोको कछु संशय नाहीं ॥ सत गुरु मैं आधीन तुम्हारा । तुम भवसागर तारन हारा ॥
साखी-निरसंशय पद कहा है, सो मोहिं कहु समुझाय । फिर भूमैं भरमो नहिं, तहाँ रहो लवलाय ॥ कहै सुनै सुख ऊपजै, जगमें आवे नाहिं । काल रहै शिर नायके, सो दीजे समझाहि ॥
सदगुरुवचन-चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहो परकाशा ॥ सुरत लगाय सुनहु मम वानी । छान लेव जो जिह्वा छानी ॥ सूक्ष्म गति अतिभारी झीनी । ताहि जगतमें विरला चान्ही ॥ आदि न अन्तहती नहिंमाया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥ शून्य शिखर नहिंतत्त्वनमूला । कारण सूक्ष्म नहीं अस्थूला ॥ आदि ब्रह्म नहीं ओंकारा । नहीं निरञ्जन नहिं अवतारा ॥ दश अवतार न चौविस रूपा । तब नहिं होता ज्योतिस्वरूपा ॥ पुण्य पाप काहू नहिं थापा । सोय ब्रह्म नहिं सोहं जापा ॥ नहिं तब शून्य सुमेर न भारा । कूर्म न शेष धरे अवतारा ॥ अक्षर एक न रंंकारा । त्रिगुण रूप है नहिं विस्तारा ॥ शक्ति युक्ति नहिं आदि भवानी । एक होय नहिं ज्ञान अज्ञानी ॥ शब्द न स्वांति कछु नहिं होई । कहो विचार सुनो तुम सोई ॥ नहिं है बीज नहिं अंकुरा । आदि अमी नहिं चन्द न सूरा ॥ धर्मदास समझ के रहना । कहों कहा कछु नहिं कहना ॥
बांधसागर
( ५३ )
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनहु गुसाई । इन बातन बनवे की नाई ॥ कियेउ संशय वे इक ठोरी । तुमहु हते के है कोई औरी ॥ सत्य सत्य अब मो पहँ कहिये । संशय रहित सोई पद लहिये ॥ त्रयी वाचा ले पूछी साई । साधु संत तुम आप गुसाई ॥
सद्गुरु वचन
कहै कबीर सुनहु धर्मदासा । सकल भेद मैं किया प्रकाशा ॥ जो प्रतीति हो मन महाँ तोरा । भवको मेटि शरण रहो मोरा ॥ धर्मदास छोड़ो सब माया । अस्थिर अमर अखंडित काया ॥ भक्ति मुक्ति उपजी है जासों । प्रेमहि लभ्य लगावो तासों ॥ अब मैं तोहि लखाऊं जागा । छूटै जन्म मरणको धागा ॥ जन्ममरण है अति दुख भारी । तासों तुम को लेहुँ उवारी ॥ अब आपा को थापों नहीं । देख लेहु तुम बाहर माहीं ॥
साखी अब तोहि भेद बताऊँ मैं, निर्मल ठौर नियार ॥
सर्व परे सब ऊपरहिं, देखो वहाँ अकार ॥
चौपाई
पुरुष कहो तो पुरुषहि नहीं । पुरुष हुवा आपा भू माहीं ॥ शब्द कहो तो शब्दहि नहीं । शब्द होय माया के छाहीं ॥ दो विन हो नहिं अघर अवाजा । कहो कहा यह काज अकाजा ॥ अमृत सागर वार न पारा । नहिं जानों केतिक विस्तारा ॥ तामें अघर भवन इक जागा । अक्षय नाम अक्षर इक लागा ॥ नाम कहो तो नाम न जाका । नामधरा जो काल तिहि ताका ॥ है अनाम अक्षर के माहीं । निह अक्षर कोइ जानत नाहीं ॥ धर्मदास तहाँ बास हमारा । काल अकाल न पावे पारा ॥ ताकी भक्ति करे जो कोई । भव ते छूटै जन्म न होई ॥
( ५४ )
भवतारणबोध
सारखी-भवसागर भरमों नहीं, यही प्रताप हमार । निश्चय करिके मानियो, तुरत उतरिहो पार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी यह अकथ कहानी । आगे सुनी न काहू जानी ॥ योगेश्वर नहिं पावें पारा । मैं क्या जानों जीव विचारा ॥ अचरज गुप्त तुम आय सुनाई । ताकी गम्य न काहू पाई ॥ ताकी भक्ति करैं किहि भांती । रूप अरूप न पूजा पाती ॥ कौन युक्ति सो भक्ति करीजै । अगम ठौर कैसे कर लीजै ॥ जस जानहुतस मोहिं लेचालहु । तन मन छोड़ देह सुख पालहु ॥ अब कछु मोसैं होवत नाही । सुरत समाय गई तुम माहीं ॥ यहाँ वहाँ तुम समरथ दाता । मोकहैं जान परी यह बाता ॥
सारखी-नाम कबीरा धरा क्यों, कारन कौन प्रमाण । देह धरी तुम आयके, कहिये मोहि बखान ॥
चौपाई
सत्य कबीर नाम मैं जाना । सो भवको क्यों कियो पयाना ॥ ऐसे सन्त जन्म क्यों धारा । किहि कारण लीन्हा अवतारा ॥ सत्य कहो बन्धनमें नाही । निरबन्धन कैसे जग माहीं ॥ देही धरी सबहि दुख पाया । तुमही काहि न व्यापी माया ॥ हठ हों पूछत हों गुरु बाता । रिस न करहु तुम समरथ दाता ॥
सारखी-मैं पूछत हित आपने, जीव मुक्तिके काज ।
साधु सन्त तुम सुजन हो, अब नहिं मोकों लाज ॥
सद्गुरु वचन-चौपाई
धरमदास कहो तुम सांची । मिथ्या नहीं सत्य सुख बांची ॥ तुम हो अंश हंस पति राजा । तुम्हरो मोह करन को काजा ॥ आदि अनादि समीपी मोरा । अब मैं काज कहुंगा तोरा ॥
बोधसागर
( ५५ )
वहांसे तुम्हीं दीन पठवाईं । यहां आय कर लागी कई ॥ काल पुरुष दीन्हा भरमाईं । जिन सब सृष्टि बनाके खाईं ॥ जग जीवनसों तुमहो नियारा । तुम्हरे काज लीन्ह अवतारा ॥ अवर काज मोर कछु नाहीं । हों निरंतर जगके माहीं ॥ मोहिं न व्यापे जगकी माया । कहन सुननकी है यह काया ॥ देह नहीं अरु दरशै देही । रहो सदा जहां पुरुष विदेही ॥ यह गत मोर न जाने कोई । धर्मदास तुम राखो गोईं ॥ आदि पुरुष निहअक्षर जाना । देही धर मैं प्रकटे आना ॥ गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥ जुगुन २ लीन्हा अवतारा । रहों निरन्तर प्रकट पसारा ॥ सतयुग सतसुकृत कह टेरा । त्रेता नाम सुनीन्द्रहि मेरा ॥ द्वापरमें करुना मय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥ चारों युगके चारों नाऊँ । माया रहित रहै तिहि ठाऊँ ॥ सो जागह पहुँचे नहिं कोई । सुर नर नाग रहै सुख गोईं ॥ सबसे कहां पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥ उनका दोष कछु नहिं भाईं । धर्मराय राखे अटकाईं ॥ गुप्त पसारा है अति भारी । ताहि न जाने नर अरु नारी ॥ शिव गोरख सोइ पार न पावें । और जीवकी कौन चलावें ॥ नवहिं नाम चौरासी सिद्धा । समझ बिना जगमें रहे अन्धा ॥ ऋषि मुनि और असंखन भेषा । सत्य ठौर सपने नहिं देखा ॥ जोर कहीं पतयावत नाहीं । बहुत कहीं समझा मनमाहीं ॥ कोइ योग कोइ मदके माता । कोइ कहै हम लखे विधाता ॥ कोइ मान दिशा मन लावे । मौन होयकर मूल गवावे ॥ सत्य पुरुष की युक्ति न पाईं । हृदय धरे नहिं सत्यको भाईं ॥ कोई कहै हम हैं भज नीका । काज अकाज लखै नहिं जीका ॥
( ५६ )
भवतारणबोध
कोई कहै हम पढ़े पुराना । तत्व अतत्त्व सबै कछु जाना ॥ कोई कहै विद्या आधीना । सब विचार कायामें चीन्हा ॥ कोई कहै तप वश करि राखा । तप है मूल और सब शाखा ॥ कोई कहै कर्म अधिकारा । कर्महि सो उतरे भवपारा ॥ कोई कहे भाग्य लिखा सो होई । भाग्य लिखा मेटै नहिं कोई ॥ कहै लग कहौं यही सब कहई । भेद हमार न कोई लहई ॥ सब सों हार मान मैं बैठा । ये सब जीव काल घर पैठा ॥
सारखी-सोइ काल करतार सोइ, भक्ति सुक्ति तेहि हाथ । मेरो कह्यो नहिं आदरे, परंपंची बड़ साथ ॥ मनहिं प्रपंची मनहिं निरञ्जन, मन ही है ओंकार । फन्दा है त्रयि लोक का, कोइ न भवते न्यार ॥ निरंजनहिं निर्वाण पद, कही तुम्हीं हितवन्त । योग यती संन्यास गत, कोइ न पावत अन्त ॥ सप्त सुर्त में रमि रहा, सुर्त शब्द तेहि हाथ । ऐसी अगम अपार गति, तीन लोकके नाथ ॥
चौपाई
सात शून्यका सकल पसारा । सात शून्यते कोइ न न्यारा ॥ सात सुर्तका भेद बताऊं । तामें ज्ञान सकल समुझाऊं ॥ उत्पत्ति प्रलय है वाके माहीं । इन गति सों कोइ न्यारा नाहीं ॥ प्रथमहिं अमी सुर्त निज ठौरा । तहाँ निरंजन कीन्हा दौरा ॥ वहाँ जाय अमी ले आवै । ताहाँ अजर बीज उपजावै ॥ सोइ बीज रक्त में धरहीं । यह विधि सों वह उत्पत्ति करहीं ॥ बीजहि जलका रंग कहाया । तासों रची सकलकी काया ॥ दूजी मूल सुर्त तेहि संग । घट २ माहि बनावे रंगा ॥ तीजी चमक सुर्त अंबारा । नौ नारीमें किया पसारा ॥
बोधसागर
( ५७ )
कोठा तहाँ बहत्तर करई । रोम रोम युक्ति सब धरई ॥ चौथी शुन्य सुर्त है भाई । धर्मदास मै तुम्हें लखाई ॥ पंचम सुर्त श्रवण सँग होई । शुभ और अशुभ सुनावे दोई ॥ छठवें सुर्त ठिकाना भाषों । ठाँव ठाँव स्वाद तिहि चाखों ॥ सो तो रहे कण्ठके द्वारा । बाणी भाषा कहै विचारा ॥ सप्तम सुर्त रहे तन माहीं । हृदय से कहुँ न्यारे नाही ॥ ब्रह्म रूप धर तहाँ वह बैठी । गुप्त पसार सकल घट पैठी ॥ कोई न जाने ताको भरमा । ज्ञानी ध्यानी सबही भरमा ॥ सात सुर्तका कहो विचारा । धर्मदास कहुँ वार न पारा ॥ सात कमल का भेद बताऊँ । कमल २ की युक्ति लखाऊँ ॥ मूल कमल है मूलही द्वारा । चार पशुरियाँ है विस्तारा ॥ तहाँ विनायक देव विराजा । मूल द्वार कमल सुति छाजा ॥ ता ऊपर फूल है दूजा । षट दल में ब्रह्मा की पूजा ॥ तीजे कमल पांखरी आठा । नाभी माहिँ साल सो गांठा ॥ तहाँ वासुदेव द्रव्य ठाना । लक्ष्मी सहित बसैं भगवाना ॥ चौथा पद्म हृदय में होई । देव महेश बसैं तहैं सोई ॥ षोडशकमल आत्म पहिचाना । शक्ति अविद्या कहों बखाना ॥ षष्ठ कमल पशुरी है तीनी । सरस्वति वासतहाँ पुनि कीन्हौ ॥ सप्तम कमल त्रिकुटिके तीरा । द्रव्य दल माहिँ बसैं द्रव्य वीरा ॥ शशी और सूर्य प्रकाशक घटका । यह सब खेल निरंजन नटका ॥ अष्टम कमल ब्रह्मांडके माहीं । तहाँ निरंजन दूसर नाही ॥ आठ कमलका बनो ठिकाना । धर्मदास बड़ भागी जाना ॥ साखी-सप्त कर्म अरु शुन्य सत, सात सुर्त अस्थान । इक्कीसों ब्रह्मांडमें, आप निरञ्जन ज्ञान ॥ राज निरंजन देखता, ठाँव ठाँव भरपूर । रसातल रु ब्रह्मांड लगि, कहुँ निकट कहुँ दूर ॥
( ५८ )
भवतारणबोध
चौपाई
सुन धर्मनि सब जुगत बखानी । तुम अपने मनमहँ कछु जानी ॥ आदि अन्त सब तुम्हें लखाई । उत्पत्ति परलयकी गति पाई ॥ उत्पत्ति परलय सिरजन हारा । मेरा भेद निरंजन पारा ॥ तासे जगत न काहू माना । तातें तोहि कहां मैं ज्ञाना ॥ जो कोई मानै कहा हमारा । सो हंसा निज होय हमारा ॥ अमर करें फिर मरन न होई । ताका खूंट न पकड़ैं कोई ॥ फिरके नहिं जन्में जगमाहीं । काल अकालताहि दुख नाहीं ॥ सुखसागर सुख मूल बतावा । बड़ भागी हंसा काहू पावा ॥ अंकुरी जीव जु होय हमारा । भवसागर तें होय नियारा ॥ प्रणहि प्रतीत करो मन लाई । ताको यह पद देय लखाई ॥ सुर्तवंत साँचा जी होई । शरण तुम्हारी गहिहै सोई ॥ साखी-प्रथमहि दृढ़ प्रतीत है, होय भक्ति अंकुर ।
भाव प्रीति सेवा करे, देउ ज्ञान भरपूर ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी मैं तुमको चीन्हा । आदि अन्त भेद सब लीन्हा ॥ तुमहीं वार तुमहिं हो पारा । तुमहीं सों उपजो संसारा ॥ तुमहीं हो निज पहिले पारा । तुमहीं सकल जगत सो न्यारा ॥ गुप्त प्रकट मैं सब विधि जाना । तुम हीं हो तहैं पद निरवाना ॥ ऐसी अगम गम्य तहैं नाहीं । मैं बूझो अपने मन माहीं ॥ पूरण कृपा करी तुम साई । मेरे मन कछु संशय नाहीं ॥ भव तारण तुम संशय वारण । धर औ अघर दोनोंके धारण ॥ समर्थ सब गति पायउ तोरी । अब सब संशय भागी मोरी ॥ भयो सनाथ तव दर्शन पाये । माया छूट परम पद पाये ॥ छूटा काल निरंजन मोरा । जन्म मरणके टूटे डोरा ॥
बोधसागर
( ५९ )
अब भवमें मैं बहुरि न आऊँ । तुमरे चरणकमल चित्त लाऊँ ॥ येती युक्ति न काहू पाई । सो साहिब तुम मोहि लखाई ॥ जान परी मोहि तुम्हरी बाता । तुम सम और न कोई ताता ॥ चौरासी सो कीन्ह उबारा । बहुरि जन्म नहिं होय हमारा ॥ समझ बूझ करिहौं सिवकाई । छाँडो कुलकी लाज बड़ाई ॥ परदा तो रहिया क्षण माहीं । जगमें कोई काहू को नाहीं ॥ अपने अपने स्वारथ आई । परमारथ काहू नहिं पाई ॥ ये सब जगत निरंजन माहीं । पाँच तीन सो सब उपजाई ॥ पाँच तत्त्व तीन गुण भारी । इन ते युक्त दिखाई नारी ॥ पानी पवन पृथ्वी आकाशा । सब पर तेज किया परकाशा ॥ रज तम सत तीनों गुणजाना । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाना ॥ साखी-पाँच तीन पर अहि निरंजन, यह मायाको ठाट । तासों सब रचना करी, भांति भांतिकी घाट ॥
सद्गुरु वचन
चौपाई
कहे कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद मैं किया प्रकासा ॥ तुम सन अन्तर कछू न राखा । जो कछुहता सो कछु सब भाखा ॥ अब तुम भक्ति करो दृढ़ताई । छाँड़ि देव कुललाज बड़ाई ॥ पहिले कुल मर्यादा खोवे । भव सो रहित भक्ति तब होवे ॥ कुल की भय सबही को भारी । कहाँ को पुरुष कहाँ की नारी ॥ ताते यम को बन्धन कीन्हा । काज अकाज न काहू चीन्हा ॥ ताते परदा दूर निवारो । सेवा करो सत्य मन धारो ॥ परदा साथ काल की गांसी । यह बन्धन दुनियाँ सब फांसी ॥ राजा परजा बड़े कुलीना । परदे काल मर्म नहिं चीन्हा ॥ सेवा करो छाँड़ि मन दूजा । गिरही सेवा गिरही पूजा ॥
( ६० )
भवतारणबोध
गुरुओं कपटे करै चतुराई । सो हँसा जग भरमें आई ॥ ताते गुरु सों परदा नाहीं । परदा करै रहै भव माहीं ॥ गुरु है मात पिता गुरु सेवा । गुरु सम और नहीं कोई देवा ॥ गुरु है खसम और नहीं दूजा । जाने अश हंस गुरु पूजा ॥ गुरुओं परदा कबहुँ न करिये । सर्वस ले गुरु आगे धरिये ॥ साखी-गुरुकी महिमा को कहे, शिव विरंचि नहीं जाम । गुरु सतगुरु को चीन्हियां, ते पहुँचे निज धाम ॥
चौपाई
धर्मदास सुन जुगत बताऊँ । चौक आरती तोहि लखाऊँ ॥ अगर चन्दनका चौका दीजै । ज्योति बराय आरती कीजै ॥ पांच तत्व पांचों है बाती । बाहर भीतर ज्योति समाती ॥ मानिक दीपकका उजियारा । यहि बात जाती बिस्तारा ॥ श्वेतपात ले हो सुख भारी । श्वेत खटाई श्वेत सुपारी ॥ यही विधि चौका विस्तारी । मेवा अष्ट आन तहँ धारी ॥ मेवा कदलि कपूर मंगावो । कदली फल सोई ले आवो ॥ पुष्टि फूल सुगन्ध सवारो । भांति भांति व्यंजन अनुसारो ॥ तनमन धन तब अर्पण कीजै । प्रेम सहित ऐसो सुख लीजै ॥ पांच तत्व को भोजन कीजै । ब्रह्म आत्महि तुस करीजे ॥ काया माया को सुख येही । यह सुख करके मिलो विदेही ॥ मिलो विदेह देह धर नाहीं । बूझ लेहु तुम यह मन माहीं ॥ अब कष्ट कहनेको नहीं रहिया । युक्ति हती सो सब हम कहिया ॥ भव छूटन को यही उजागर । याही विधि उतरे भवसागर ॥ सत्य सत्य यह बात हमारी । जो कोई समझ करै नर नारी ॥ भक्ति करै मुक्ति फल पावे । हमरे सत्य लोकमें आवे ॥ कहे कबीर सुनहु धर्मदासा । छूटै कर्म भर्म सब फांसा ॥
बोधसागर
( ६१ )
धर्मदास वचन
साखी-कर्म भर्म भव भा सब, दिये भारमें झोंक । सतगुरुके परताप सों मिट गये सबही धोंक ॥
सदगुरु वचन
साखी-यह भव तारण ग्रन्थ है, सतगुरु का उपदेश । जो मन माने प्रीति कर, पहुँचे हमरे देश ॥
चौपाई
गुप्त भेद सुनहु धर्मदासा । आपहि आप भये परकासा ॥ मूल वस्तु बीज है भाई । उपजे विनशै आवै जाई ॥ निह अक्षर ते अक्षर भाया । अक्षर आदि अमी उपजाया ॥ आदिअमी किये सकल पसारा । फल रहा कछु नाहिं न न्यारा ॥ सोहं कला अमीके माहीं । श्वेत बीज झलके तेहि ठाहीं ॥ श्वेत बीजका मूल है माया । तासों बची सकलकी काया ॥ श्वेत बीजका सकल पसारा । तामें जीव लिया अवतारा ॥ तब अंकूर अमी ते भयऊ । पारस अंस फैल सब गयऊ ॥
साखी-उत्पति परलय बीज गति, बीजहि आवे जाय । गुप्त प्रगट जो कुछहती, सो सब दिया लखाय ॥ निह अक्षर अक्षर भया, अक्षर किया प्रकाश । मनते माया ऊपजे, मायात्रिगुणहि रूप ॥ पांच तत्त्वके मेलमें, बांधे सकल स्वरूप । माया ब्रह्म जी तत्व अरु, रज सत तम त्रिय देव ॥ इन सब ही को छोड़कर, करनिह अक्षर सेव ॥