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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ४८ )

भवतारणबोध

धर्मदास तुम हो बुद्धिवन्ता । भक्ति करो पावो सतसन्ता ॥ एक पुरुष हैं अगम अपारा । सब घट व्यापक सबसों न्यारा ॥ ताको नहीं जाने संसारा । ताकी भक्ति महानिजसारा ॥ भक्ति करे जब उतरे पारा । सुर्त नृत्य कर सेवे सारा ॥ यह विधि भक्तिपदारथ पावे । मुक्ति होय भव बहुरि न आवे ॥ भवसागर ते उतरे पारा । फिरके जग नहीं ले अवतारा ॥ ऐसी भक्ति मुक्ति की दाता । जाकी गति नहीं लखै विधाता ॥ भक्तिही भक्ति भेद बहु भारी । यही भक्ति जगत ते न्यारी ॥ साखी-भक्तिपदारथ अगम फल, मुक्ति चार यहि बार । पावे पूरण पुरुष को, जग नहीं ले अवतार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कहै सुनो गुसाई । पूरण पुरुष बसे किहि ठाई ॥ केहि विधि सों सेवा कीजे । कैसे चरणकमल चितदीजे ॥ कौन भांति साधों सो भक्ती । सदगुरु मोहिं बताओ युक्ती ॥

सदगुरु वचन

पहिले प्रेम अङ्ग मैं आवे । साधु देख सन्मुख होय धावे ॥ चरण धोय चरणामृत लेवे । प्रीति सहित साधूको सेवे ॥ अन्तर छांड़ि करो सेवकाई । यहि विधि भवके दुःख मिटाई ॥ जोह साधु प्रेम गति जाने । ता साधूकी सेवा ठाने ॥ परम पुरुषकी भक्ति दृढावे । सुतैं नृप कर तहैं पहुँचावे ॥ तासों प्रीति करो चितलाई । छांड़ो दुर्मति औ चतुराई ॥ तबही परम पुरुषको पाये । भव तरके जग बहुरि न आवे ॥ भवतारन संशय नहीं तोही । दो क्षण होय तो लागे मोही ॥ कीतहु बातकी फिकर न करना । कही भक्त निश्चय कर तरना ॥

बोधसागर

( ४९ )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास बूझे चित लाई । सकल वेद मोहिं देहु बताई ॥ निर्गुण रहित तुम्हारा नाई । कैसे भक्ति करो तेहि ठाई ॥ हो स्वामी यह अचरज बाता । भक्ति करनको दाव न घाता ॥ सर्गुण भक्ति करै संसारा । निर्गुण योगेश्वर आधारा ॥ इन दोनोंके पार बतावा । तुम कैसी विधितहैं मन लावा ॥ सत्य बात मोहि कहो गुसाई । केहि विधि सुतं लगाऊँ धाई ॥ सगुणहि पार न पावत कोई । मेरे मन बर संशय होई ॥ सतगुरु संशय देहु निवारी । मैं जाऊँ तुम्हरी बलिहारी ॥ सर्गुण निर्गुण भेद बताऊँ । तीसर न्यारा मोहिं लखाऊँ ॥ मोरे मन पतयावत नाहीं । बहुत फिकर कीन्हा मनमाहीं ॥ हो समर्थ तुम सतगुरु साई । दृढ़तासे पकड़ो मम बाहीं ॥ सर्व युक्ति बतलावो मोई । अंतर कछु न राखो गोई ॥ तुम सत सत्य तुम्हारी बाता । मैं याचक तुम समरथ दाता ॥ देहु मोहिं मैं मांगो सोई । सोइ लखाव मिटे दिल दोई ॥

साखी-सत्य सत्य समरथ धनी, सत्य करहु परकाश ।

सत्य लोक पहुँचायहो, छूटै यम भव त्रास ॥

सद्गुरु-वचन चौपाई

सुन धर्मन सब कहो सँदेशा । तुमको होय न भवका लेशा ॥ भव तारण समर्थ है न्यारा । ताको नहिं जाने संसारा ॥ योगेश्वर वह गति नहिं पाई । सिद्ध साधककी कौन चलाई ॥ भक्ति होय जगतमें भारी । ध्रुव प्रहलाद सदा अधिकारी ॥ भक्तिमाहिं इन सम नहिं कोई । रामकृष्ण प्रकटे नहिं गोई ॥ दोनों जाने दो व्रत साधू । यही एक इष्ट अवराधू ॥ सतयुग भक्ति करी ध्रुवराजा । पांच वर्ष आयू तत आज्ञा ॥

नं. ७ कबीर सागर - ३

( ५० )

भवतारणबोध

निकसे गृह ते बाहर गयेऊ । नारदके उपदेशी भयेऊ ॥ छठें मास प्रकटे हरि आई । राज दिये वैकुण्ठ पठाई ॥ साठ हजार वर्ष दियो राजू । कुटुम सहित वैकुण्ठ विराजू ॥ एकदिवस जब प्रलय हूय आई । तहाँ तो पुनि ये देह गिराई ॥ पुनि सामीप्य मोक्ष कर दीन्हा । परम पुरुष गति तबहु न चीन्हा ॥ काल पुरुष राखे सब घेरी । सत्य पुरुष जग जाय न हेरी ॥ ऐसे भक्त भये जग माहीं । परम पुरुष गति पावत नाहीं ॥ भक्ति सगुण करे यहि पावे । निर्गुण माहीं नाहिं समावे ॥ जो सायुज्य होय गति पूरी । देव निरंजन जाय हजुरी ॥ ज्योनि स्वरूपी ताका नाऊँ । चारों सुक्त बसैं तेहिं ठाऊँ ॥ सालोक्यहि सामीप्य कहाई । सारूपी सायोज्य लहाई ॥ चार मुक्ति जाके घर होई । ताको पार न पावे कोई ॥ ताके परे मोर अस्थाना । कैसी भक्ति कहा कहों ज्ञाना ।

साखी-ध्रुवकी गति तुमसों कही, सुन धर्मदास सुजान ।

अपरम्पार न पावही, पूर्ण पद निर्वान ॥

चौपाई

सुन धर्मन एक कथा नियारी । बड़ी भक्ति प्रहलाद विचारी ॥ हिरनाकुश दोनों बलकारा । ताके घर लीन्हा अवतारा ॥ तपके हेतु गये बन माहीं । कोइ बातको संशय नाहीं ॥ गर्भवन्त होती तिहि नारी । इन्द्र आवाज सुनि अधिकारी ॥ नभवानीते भई अवाजा । इन्द्रासनको लेही राजा ॥ हिरनाकुश घर जन्म धराई । सो द्वारासन लेही भाई ॥ इन्द्रहि संशय उपजो भारी । गर्भ वातसों देहों ठारी ॥ ये छल इन्द्र कियो अधिकारी । अपने देशहिं ले गयो नारी ॥ तेहिं क्षण नारद आये तहँवाँ । इन्द्रहिको समझायो जहँवाँ ॥

बोधसागर

( ५१ )

इनको गर्भ न चौरै भाई । भक्त होय सबको सुखदाई ॥ गर्भहि मांझ ज्ञान तेहिं दीन्हौ । नारद एक काम बड़ कीन्हौ ॥ हृद कीन्हौ तेहिं गर्भके माहीं । वर्ष हजार रही तिहि ठाहीं ॥ फिर नारी अपने पुर आई । इन्द्रजीत हिरनाकुश पाई ॥ तहां जन्म लीन्हो प्रहलादा । राम रटन रसना ले स्वादा ॥ ऐसो रटन लगाये भारी । तामसभक्त न कोइ अधिकारी ॥ केतो कष्ट सहे सिर अपना । तबही दुःख न व्यापे सपना ॥ हिरनाकुशके मनमें आई । राम तेरो मोहिं देहु बताई ॥ स्वम्भ फार लीन्हौ अवतारा । हरि नरसिंह रूप तब धारा ॥ हिरनाकुश नख उदर विदारा । अपने जन प्रहलाद उबारा ॥ फिरके इन्द्रासन पहुँचाया । सर्गुण भक्तिजान सब माया ॥ ऐसे दृढ़व्रत रामहि गहिया । तेज्ज इन्द्रासन सुख लहिया ॥ ऐसे भक्त न होवे भाई । ताकी गति तुमको समुझाई ॥ इन्द्रासनको राज सुनाऊं । महा भोग बड़े सुख पाऊं ॥ सत्तर दाय चौकड़ी भुगता । बन्धन भवके होय न मुक्ता ॥ बड़े भक्त की कथा सुनाई । पूछो और कहो तोहिं भाई ॥

साखी-इन्द्र राजसुख भोगकर, फिर भवसागरमाहिं ।

यह सर्गुणकी भक्ति है, कबहुँ निर्भय नाहिं ॥

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास बूझे चित लाई । सतगुरु संशय देहु मिटाई ॥ सर्गुण भक्त मुक्त नहिं होई । है वह एकहि या है दोई ॥ यह संदेह मिटाओ मेरा । तुम सतगुरु मम बन्दी छोरा ॥ की सर्गुण को निर्गुण कहिये । भिन्न भिन्न भेद मोहिं कहिये ॥ सकल मृष्टि कहैवाते भयऊ । यही युक्ति काहु नहिं कहऊ ॥ जो मोहिं ऊपर दया तुम्हारी । सबविधिकहियेयुक्ति विचारी ॥

( ५२ )

भवतारणबोध

यह संसार कहाँसे आया । को है ब्रह्मा अरु को है माया ॥ अन्तर छोड़ि निरन्तर भाखो । मोसन अन्तर कछु न राखो ॥ भक्ति भेद कहो मोहे स्वामी । तुम सब घटके अन्तर्यामी ॥ जीव काज आये जगमाहीं । अब मोको कछु संशय नाहीं ॥ सत गुरु मैं आधीन तुम्हारा । तुम भवसागर तारन हारा ॥

साखी-निरसंशय पद कहा है, सो मोहिं कहु समुझाय । फिर भूमैं भरमो नहिं, तहाँ रहो लवलाय ॥ कहै सुनै सुख ऊपजै, जगमें आवे नाहिं । काल रहै शिर नायके, सो दीजे समझाहि ॥

सदगुरुवचन-चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहो परकाशा ॥ सुरत लगाय सुनहु मम वानी । छान लेव जो जिह्वा छानी ॥ सूक्ष्म गति अतिभारी झीनी । ताहि जगतमें विरला चान्ही ॥ आदि न अन्तहती नहिंमाया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥ शून्य शिखर नहिंतत्त्वनमूला । कारण सूक्ष्म नहीं अस्थूला ॥ आदि ब्रह्म नहीं ओंकारा । नहीं निरञ्जन नहिं अवतारा ॥ दश अवतार न चौविस रूपा । तब नहिं होता ज्योतिस्वरूपा ॥ पुण्य पाप काहू नहिं थापा । सोय ब्रह्म नहिं सोहं जापा ॥ नहिं तब शून्य सुमेर न भारा । कूर्म न शेष धरे अवतारा ॥ अक्षर एक न रंंकारा । त्रिगुण रूप है नहिं विस्तारा ॥ शक्ति युक्ति नहिं आदि भवानी । एक होय नहिं ज्ञान अज्ञानी ॥ शब्द न स्वांति कछु नहिं होई । कहो विचार सुनो तुम सोई ॥ नहिं है बीज नहिं अंकुरा । आदि अमी नहिं चन्द न सूरा ॥ धर्मदास समझ के रहना । कहों कहा कछु नहिं कहना ॥

बांधसागर

( ५३ )

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनहु गुसाई । इन बातन बनवे की नाई ॥ कियेउ संशय वे इक ठोरी । तुमहु हते के है कोई औरी ॥ सत्य सत्य अब मो पहँ कहिये । संशय रहित सोई पद लहिये ॥ त्रयी वाचा ले पूछी साई । साधु संत तुम आप गुसाई ॥

सद्गुरु वचन

कहै कबीर सुनहु धर्मदासा । सकल भेद मैं किया प्रकाशा ॥ जो प्रतीति हो मन महाँ तोरा । भवको मेटि शरण रहो मोरा ॥ धर्मदास छोड़ो सब माया । अस्थिर अमर अखंडित काया ॥ भक्ति मुक्ति उपजी है जासों । प्रेमहि लभ्य लगावो तासों ॥ अब मैं तोहि लखाऊं जागा । छूटै जन्म मरणको धागा ॥ जन्ममरण है अति दुख भारी । तासों तुम को लेहुँ उवारी ॥ अब आपा को थापों नहीं । देख लेहु तुम बाहर माहीं ॥

साखी अब तोहि भेद बताऊँ मैं, निर्मल ठौर नियार ॥

सर्व परे सब ऊपरहिं, देखो वहाँ अकार ॥

चौपाई

पुरुष कहो तो पुरुषहि नहीं । पुरुष हुवा आपा भू माहीं ॥ शब्द कहो तो शब्दहि नहीं । शब्द होय माया के छाहीं ॥ दो विन हो नहिं अघर अवाजा । कहो कहा यह काज अकाजा ॥ अमृत सागर वार न पारा । नहिं जानों केतिक विस्तारा ॥ तामें अघर भवन इक जागा । अक्षय नाम अक्षर इक लागा ॥ नाम कहो तो नाम न जाका । नामधरा जो काल तिहि ताका ॥ है अनाम अक्षर के माहीं । निह अक्षर कोइ जानत नाहीं ॥ धर्मदास तहाँ बास हमारा । काल अकाल न पावे पारा ॥ ताकी भक्ति करे जो कोई । भव ते छूटै जन्म न होई ॥

( ५४ )

भवतारणबोध

सारखी-भवसागर भरमों नहीं, यही प्रताप हमार । निश्चय करिके मानियो, तुरत उतरिहो पार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी यह अकथ कहानी । आगे सुनी न काहू जानी ॥ योगेश्वर नहिं पावें पारा । मैं क्या जानों जीव विचारा ॥ अचरज गुप्त तुम आय सुनाई । ताकी गम्य न काहू पाई ॥ ताकी भक्ति करैं किहि भांती । रूप अरूप न पूजा पाती ॥ कौन युक्ति सो भक्ति करीजै । अगम ठौर कैसे कर लीजै ॥ जस जानहुतस मोहिं लेचालहु । तन मन छोड़ देह सुख पालहु ॥ अब कछु मोसैं होवत नाही । सुरत समाय गई तुम माहीं ॥ यहाँ वहाँ तुम समरथ दाता । मोकहैं जान परी यह बाता ॥

सारखी-नाम कबीरा धरा क्यों, कारन कौन प्रमाण । देह धरी तुम आयके, कहिये मोहि बखान ॥

चौपाई

सत्य कबीर नाम मैं जाना । सो भवको क्यों कियो पयाना ॥ ऐसे सन्त जन्म क्यों धारा । किहि कारण लीन्हा अवतारा ॥ सत्य कहो बन्धनमें नाही । निरबन्धन कैसे जग माहीं ॥ देही धरी सबहि दुख पाया । तुमही काहि न व्यापी माया ॥ हठ हों पूछत हों गुरु बाता । रिस न करहु तुम समरथ दाता ॥

सारखी-मैं पूछत हित आपने, जीव मुक्तिके काज ।

साधु सन्त तुम सुजन हो, अब नहिं मोकों लाज ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

धरमदास कहो तुम सांची । मिथ्या नहीं सत्य सुख बांची ॥ तुम हो अंश हंस पति राजा । तुम्हरो मोह करन को काजा ॥ आदि अनादि समीपी मोरा । अब मैं काज कहुंगा तोरा ॥

बोधसागर

( ५५ )

वहांसे तुम्हीं दीन पठवाईं । यहां आय कर लागी कई ॥ काल पुरुष दीन्हा भरमाईं । जिन सब सृष्टि बनाके खाईं ॥ जग जीवनसों तुमहो नियारा । तुम्हरे काज लीन्ह अवतारा ॥ अवर काज मोर कछु नाहीं । हों निरंतर जगके माहीं ॥ मोहिं न व्यापे जगकी माया । कहन सुननकी है यह काया ॥ देह नहीं अरु दरशै देही । रहो सदा जहां पुरुष विदेही ॥ यह गत मोर न जाने कोई । धर्मदास तुम राखो गोईं ॥ आदि पुरुष निहअक्षर जाना । देही धर मैं प्रकटे आना ॥ गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥ जुगुन २ लीन्हा अवतारा । रहों निरन्तर प्रकट पसारा ॥ सतयुग सतसुकृत कह टेरा । त्रेता नाम सुनीन्द्रहि मेरा ॥ द्वापरमें करुना मय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥ चारों युगके चारों नाऊँ । माया रहित रहै तिहि ठाऊँ ॥ सो जागह पहुँचे नहिं कोई । सुर नर नाग रहै सुख गोईं ॥ सबसे कहां पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥ उनका दोष कछु नहिं भाईं । धर्मराय राखे अटकाईं ॥ गुप्त पसारा है अति भारी । ताहि न जाने नर अरु नारी ॥ शिव गोरख सोइ पार न पावें । और जीवकी कौन चलावें ॥ नवहिं नाम चौरासी सिद्धा । समझ बिना जगमें रहे अन्धा ॥ ऋषि मुनि और असंखन भेषा । सत्य ठौर सपने नहिं देखा ॥ जोर कहीं पतयावत नाहीं । बहुत कहीं समझा मनमाहीं ॥ कोइ योग कोइ मदके माता । कोइ कहै हम लखे विधाता ॥ कोइ मान दिशा मन लावे । मौन होयकर मूल गवावे ॥ सत्य पुरुष की युक्ति न पाईं । हृदय धरे नहिं सत्यको भाईं ॥ कोई कहै हम हैं भज नीका । काज अकाज लखै नहिं जीका ॥

( ५६ )

भवतारणबोध

कोई कहै हम पढ़े पुराना । तत्व अतत्त्व सबै कछु जाना ॥ कोई कहै विद्या आधीना । सब विचार कायामें चीन्हा ॥ कोई कहै तप वश करि राखा । तप है मूल और सब शाखा ॥ कोई कहै कर्म अधिकारा । कर्महि सो उतरे भवपारा ॥ कोई कहे भाग्य लिखा सो होई । भाग्य लिखा मेटै नहिं कोई ॥ कहै लग कहौं यही सब कहई । भेद हमार न कोई लहई ॥ सब सों हार मान मैं बैठा । ये सब जीव काल घर पैठा ॥

सारखी-सोइ काल करतार सोइ, भक्ति सुक्ति तेहि हाथ । मेरो कह्यो नहिं आदरे, परंपंची बड़ साथ ॥ मनहिं प्रपंची मनहिं निरञ्जन, मन ही है ओंकार । फन्दा है त्रयि लोक का, कोइ न भवते न्यार ॥ निरंजनहिं निर्वाण पद, कही तुम्हीं हितवन्त । योग यती संन्यास गत, कोइ न पावत अन्त ॥ सप्त सुर्त में रमि रहा, सुर्त शब्द तेहि हाथ । ऐसी अगम अपार गति, तीन लोकके नाथ ॥

चौपाई

सात शून्यका सकल पसारा । सात शून्यते कोइ न न्यारा ॥ सात सुर्तका भेद बताऊं । तामें ज्ञान सकल समुझाऊं ॥ उत्पत्ति प्रलय है वाके माहीं । इन गति सों कोइ न्यारा नाहीं ॥ प्रथमहिं अमी सुर्त निज ठौरा । तहाँ निरंजन कीन्हा दौरा ॥ वहाँ जाय अमी ले आवै । ताहाँ अजर बीज उपजावै ॥ सोइ बीज रक्त में धरहीं । यह विधि सों वह उत्पत्ति करहीं ॥ बीजहि जलका रंग कहाया । तासों रची सकलकी काया ॥ दूजी मूल सुर्त तेहि संग । घट २ माहि बनावे रंगा ॥ तीजी चमक सुर्त अंबारा । नौ नारीमें किया पसारा ॥

बोधसागर

( ५७ )

कोठा तहाँ बहत्तर करई । रोम रोम युक्ति सब धरई ॥ चौथी शुन्य सुर्त है भाई । धर्मदास मै तुम्हें लखाई ॥ पंचम सुर्त श्रवण सँग होई । शुभ और अशुभ सुनावे दोई ॥ छठवें सुर्त ठिकाना भाषों । ठाँव ठाँव स्वाद तिहि चाखों ॥ सो तो रहे कण्ठके द्वारा । बाणी भाषा कहै विचारा ॥ सप्तम सुर्त रहे तन माहीं । हृदय से कहुँ न्यारे नाही ॥ ब्रह्म रूप धर तहाँ वह बैठी । गुप्त पसार सकल घट पैठी ॥ कोई न जाने ताको भरमा । ज्ञानी ध्यानी सबही भरमा ॥ सात सुर्तका कहो विचारा । धर्मदास कहुँ वार न पारा ॥ सात कमल का भेद बताऊँ । कमल २ की युक्ति लखाऊँ ॥ मूल कमल है मूलही द्वारा । चार पशुरियाँ है विस्तारा ॥ तहाँ विनायक देव विराजा । मूल द्वार कमल सुति छाजा ॥ ता ऊपर फूल है दूजा । षट दल में ब्रह्मा की पूजा ॥ तीजे कमल पांखरी आठा । नाभी माहिँ साल सो गांठा ॥ तहाँ वासुदेव द्रव्य ठाना । लक्ष्मी सहित बसैं भगवाना ॥ चौथा पद्म हृदय में होई । देव महेश बसैं तहैं सोई ॥ षोडशकमल आत्म पहिचाना । शक्ति अविद्या कहों बखाना ॥ षष्ठ कमल पशुरी है तीनी । सरस्वति वासतहाँ पुनि कीन्हौ ॥ सप्तम कमल त्रिकुटिके तीरा । द्रव्य दल माहिँ बसैं द्रव्य वीरा ॥ शशी और सूर्य प्रकाशक घटका । यह सब खेल निरंजन नटका ॥ अष्टम कमल ब्रह्मांडके माहीं । तहाँ निरंजन दूसर नाही ॥ आठ कमलका बनो ठिकाना । धर्मदास बड़ भागी जाना ॥ साखी-सप्त कर्म अरु शुन्य सत, सात सुर्त अस्थान । इक्कीसों ब्रह्मांडमें, आप निरञ्जन ज्ञान ॥ राज निरंजन देखता, ठाँव ठाँव भरपूर । रसातल रु ब्रह्मांड लगि, कहुँ निकट कहुँ दूर ॥

( ५८ )

भवतारणबोध

चौपाई

सुन धर्मनि सब जुगत बखानी । तुम अपने मनमहँ कछु जानी ॥ आदि अन्त सब तुम्हें लखाई । उत्पत्ति परलयकी गति पाई ॥ उत्पत्ति परलय सिरजन हारा । मेरा भेद निरंजन पारा ॥ तासे जगत न काहू माना । तातें तोहि कहां मैं ज्ञाना ॥ जो कोई मानै कहा हमारा । सो हंसा निज होय हमारा ॥ अमर करें फिर मरन न होई । ताका खूंट न पकड़ैं कोई ॥ फिरके नहिं जन्में जगमाहीं । काल अकालताहि दुख नाहीं ॥ सुखसागर सुख मूल बतावा । बड़ भागी हंसा काहू पावा ॥ अंकुरी जीव जु होय हमारा । भवसागर तें होय नियारा ॥ प्रणहि प्रतीत करो मन लाई । ताको यह पद देय लखाई ॥ सुर्तवंत साँचा जी होई । शरण तुम्हारी गहिहै सोई ॥ साखी-प्रथमहि दृढ़ प्रतीत है, होय भक्ति अंकुर ।

भाव प्रीति सेवा करे, देउ ज्ञान भरपूर ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी मैं तुमको चीन्हा । आदि अन्त भेद सब लीन्हा ॥ तुमहीं वार तुमहिं हो पारा । तुमहीं सों उपजो संसारा ॥ तुमहीं हो निज पहिले पारा । तुमहीं सकल जगत सो न्यारा ॥ गुप्त प्रकट मैं सब विधि जाना । तुम हीं हो तहैं पद निरवाना ॥ ऐसी अगम गम्य तहैं नाहीं । मैं बूझो अपने मन माहीं ॥ पूरण कृपा करी तुम साई । मेरे मन कछु संशय नाहीं ॥ भव तारण तुम संशय वारण । धर औ अघर दोनोंके धारण ॥ समर्थ सब गति पायउ तोरी । अब सब संशय भागी मोरी ॥ भयो सनाथ तव दर्शन पाये । माया छूट परम पद पाये ॥ छूटा काल निरंजन मोरा । जन्म मरणके टूटे डोरा ॥

बोधसागर

( ५९ )

अब भवमें मैं बहुरि न आऊँ । तुमरे चरणकमल चित्त लाऊँ ॥ येती युक्ति न काहू पाई । सो साहिब तुम मोहि लखाई ॥ जान परी मोहि तुम्हरी बाता । तुम सम और न कोई ताता ॥ चौरासी सो कीन्ह उबारा । बहुरि जन्म नहिं होय हमारा ॥ समझ बूझ करिहौं सिवकाई । छाँडो कुलकी लाज बड़ाई ॥ परदा तो रहिया क्षण माहीं । जगमें कोई काहू को नाहीं ॥ अपने अपने स्वारथ आई । परमारथ काहू नहिं पाई ॥ ये सब जगत निरंजन माहीं । पाँच तीन सो सब उपजाई ॥ पाँच तत्त्व तीन गुण भारी । इन ते युक्त दिखाई नारी ॥ पानी पवन पृथ्वी आकाशा । सब पर तेज किया परकाशा ॥ रज तम सत तीनों गुणजाना । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाना ॥ साखी-पाँच तीन पर अहि निरंजन, यह मायाको ठाट । तासों सब रचना करी, भांति भांतिकी घाट ॥

सद्गुरु वचन

चौपाई

कहे कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद मैं किया प्रकासा ॥ तुम सन अन्तर कछू न राखा । जो कछुहता सो कछु सब भाखा ॥ अब तुम भक्ति करो दृढ़ताई । छाँड़ि देव कुललाज बड़ाई ॥ पहिले कुल मर्यादा खोवे । भव सो रहित भक्ति तब होवे ॥ कुल की भय सबही को भारी । कहाँ को पुरुष कहाँ की नारी ॥ ताते यम को बन्धन कीन्हा । काज अकाज न काहू चीन्हा ॥ ताते परदा दूर निवारो । सेवा करो सत्य मन धारो ॥ परदा साथ काल की गांसी । यह बन्धन दुनियाँ सब फांसी ॥ राजा परजा बड़े कुलीना । परदे काल मर्म नहिं चीन्हा ॥ सेवा करो छाँड़ि मन दूजा । गिरही सेवा गिरही पूजा ॥

( ६० )

भवतारणबोध

गुरुओं कपटे करै चतुराई । सो हँसा जग भरमें आई ॥ ताते गुरु सों परदा नाहीं । परदा करै रहै भव माहीं ॥ गुरु है मात पिता गुरु सेवा । गुरु सम और नहीं कोई देवा ॥ गुरु है खसम और नहीं दूजा । जाने अश हंस गुरु पूजा ॥ गुरुओं परदा कबहुँ न करिये । सर्वस ले गुरु आगे धरिये ॥ साखी-गुरुकी महिमा को कहे, शिव विरंचि नहीं जाम । गुरु सतगुरु को चीन्हियां, ते पहुँचे निज धाम ॥

चौपाई

धर्मदास सुन जुगत बताऊँ । चौक आरती तोहि लखाऊँ ॥ अगर चन्दनका चौका दीजै । ज्योति बराय आरती कीजै ॥ पांच तत्व पांचों है बाती । बाहर भीतर ज्योति समाती ॥ मानिक दीपकका उजियारा । यहि बात जाती बिस्तारा ॥ श्वेतपात ले हो सुख भारी । श्वेत खटाई श्वेत सुपारी ॥ यही विधि चौका विस्तारी । मेवा अष्ट आन तहँ धारी ॥ मेवा कदलि कपूर मंगावो । कदली फल सोई ले आवो ॥ पुष्टि फूल सुगन्ध सवारो । भांति भांति व्यंजन अनुसारो ॥ तनमन धन तब अर्पण कीजै । प्रेम सहित ऐसो सुख लीजै ॥ पांच तत्व को भोजन कीजै । ब्रह्म आत्महि तुस करीजे ॥ काया माया को सुख येही । यह सुख करके मिलो विदेही ॥ मिलो विदेह देह धर नाहीं । बूझ लेहु तुम यह मन माहीं ॥ अब कष्ट कहनेको नहीं रहिया । युक्ति हती सो सब हम कहिया ॥ भव छूटन को यही उजागर । याही विधि उतरे भवसागर ॥ सत्य सत्य यह बात हमारी । जो कोई समझ करै नर नारी ॥ भक्ति करै मुक्ति फल पावे । हमरे सत्य लोकमें आवे ॥ कहे कबीर सुनहु धर्मदासा । छूटै कर्म भर्म सब फांसा ॥

बोधसागर

( ६१ )

धर्मदास वचन

साखी-कर्म भर्म भव भा सब, दिये भारमें झोंक । सतगुरुके परताप सों मिट गये सबही धोंक ॥

सदगुरु वचन

साखी-यह भव तारण ग्रन्थ है, सतगुरु का उपदेश । जो मन माने प्रीति कर, पहुँचे हमरे देश ॥

चौपाई

गुप्त भेद सुनहु धर्मदासा । आपहि आप भये परकासा ॥ मूल वस्तु बीज है भाई । उपजे विनशै आवै जाई ॥ निह अक्षर ते अक्षर भाया । अक्षर आदि अमी उपजाया ॥ आदिअमी किये सकल पसारा । फल रहा कछु नाहिं न न्यारा ॥ सोहं कला अमीके माहीं । श्वेत बीज झलके तेहि ठाहीं ॥ श्वेत बीजका मूल है माया । तासों बची सकलकी काया ॥ श्वेत बीजका सकल पसारा । तामें जीव लिया अवतारा ॥ तब अंकूर अमी ते भयऊ । पारस अंस फैल सब गयऊ ॥

साखी-उत्पति परलय बीज गति, बीजहि आवे जाय । गुप्त प्रगट जो कुछहती, सो सब दिया लखाय ॥ निह अक्षर अक्षर भया, अक्षर किया प्रकाश । मनते माया ऊपजे, मायात्रिगुणहि रूप ॥ पांच तत्त्वके मेलमें, बांधे सकल स्वरूप । माया ब्रह्म जी तत्व अरु, रज सत तम त्रिय देव ॥ इन सब ही को छोड़कर, करनिह अक्षर सेव ॥

( ६२ )

भवतारणबोध

जो चाहो सोई मिले, मानो मोर विचार । यही भेद जाने बिना, कोइ न उतरे पार ॥ भव भारी भर्मइ मिटै, संशय शूल न होय । हंसनमें जो रम रहा, शरण गहै नहिं कोय । कहै कबीर धर्मदास सों, छोड़ो तुम संसार ॥ यह मेरी परतीत कर, तारो कुल परिवार ॥ अंश वंश परिवार निज, नाद बिन्दु गुरु शिष्य । जो चाहे निह अक्षरहिं, मुक्ति अंक सोइ लिखव ॥

इति श्रीभवतारणबोध समाप्त


मुक्तिबोध (पंचदश तरंग)

सत्यपुरुषाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

पञ्चदशस्तरंगः

श्रीग्रन्थ मुक्तिबोध

सद्गुरु वचन-चौपाई

ये गुरु गम संशय करलेखो । प्रगटे ज्ञान तब वस्तु परेखो ॥ अनुभव आदिकुछ कहों बखानी । सुनिये सन्त गुरु गमबानी ॥ अनंत कोट जुग आगे चलगयेऊ । अचल अमानताहि पुनिरहेऊ ॥ साठ कोट जुग औरो बीता । सृष्टि रचनाकी इच्छा कीता ॥ वह तो अचल पुरुष है अन्ता । बिन गुरुदया न भेट भगवंता ॥ कोट कथे कथनी नहि पावा । जबलग गुरुगम नहीं बतावा ॥ सारखी पद हैं कोटन वाणी । पुरुष एककहैं सुमरो प्रानी ॥ ज्ञान सुरत औ शब्द उच्चार । यह सब दीन्ह कीन्ह संसारा ॥ अचल पुरुष को सुमिरे कोई । जीवत मुक्ति सन्तकी होई ॥ सारखी पद बोले बहु बानी । आदि नामको बिरला जानी ॥ आदि नामका भेद निनारा । त्रिना सतगुरु बूड़े संसारा ॥ सोइ जाने जाको बड़ ज्ञाना । गुप्त मता तिनहीं पहिचाना ॥

सारखी-आदि नाम निज सार है, बूझि लेहु हो हंस ।

जिन जानो निज नाम को, अमर भये ते वंश ॥

आदिनाम निजमन्त्र है, और मन्त्र सब छार ।

कहे कबीर निज नाम बिन, बूड़ मरा संसार ॥

( ६४ )

मुक्तिबोध

आदिनाम कहैं खोजहु प्राणी । जाते होय मुक्ति सहिदानी ॥ मूलमन्त्र मन्त्रन महि साचा । जोगहि जलेसोनगरहि पहुँचा ॥ आदि नाम जेहि खाजत भेटा । जरा मरन को संशय भेटा ॥ आदि नाम निःअक्षर साँचा । जाते जीव काल सों बाचा ॥ निःअक्षर धुन जहवाँ होई । ताहि जपे नर बिरला कोई ॥ जाके बल आवे संसारा । ताहि जपे नर हो भव पारा ॥ गुप्त नाम गुरु बिन नहि पावे । पूरा गुरु हो सोइ लखावे ॥ सार मन्त्र लखे जो कोई । विषधर मंडवा निर्मल होई ॥ आदि नाम मुक्तामणि साँचा । जो सुमरे जिव सबसाँ बाचा ॥ आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥ जब लग गुप्त जाप नहि जाने । तबलग काल हटा नहि माने ॥ गुप्त जाप ध्वनि जहँवाँ होई । जो जन जाने बिरला कोई ॥ गुप्त मता लै पुरुषहि चीन्हा । जबते गुरु मोहिं दिशा दीन्हा ॥ तात वरण प्रभु वरण विहीना । सकल मनुष्यनगर नहि चीना ॥ मूल मन्त्र जेहि पुरुषके पास । सोई जनको खोज ले दासा ॥ मूल मन्त्र है ओ सब साखा । कहैं कबीर मैं निजके भाखा ॥ लिखो न जाय कहै को पारा । हैं अक्षर में जो पावै निरबारा ॥ लिखो न जाय लिखामें नाहीं । गुरु बिन भेट न होवे ताहीं ॥

साखी-प्रीति विना नहि पाइये, जो नहि सुतं समान । पुरुष दीप तब पावइ, जबहीं तजै अभिमान ॥

चौपाई

परम पुरुषसों भेट न भयऊ । विन गुरु दयाप्रगटना कहेऊ ॥ धर्मदास मैं कहां समुझाई । निर्गुण भेद कोइ बिरले पाई ॥ तुम तो जीव पर बोधो जाई । जमराजा परपंच लगाई ॥

बोधसागर

( ६५ )

जीवहिं राखे फन्द फँदाईं । शब्दबान मईं मारो जाईं ॥ शब्द बान मैं तुम कहैं दीन्हा । जीवको देहु सुक्तिको चीन्हा ॥ नाम पान सों ईस बचाही । शब्द सुतं लै जुग बन्धाही ॥ जुग बांधे मारे नहीं कोई । लाख जतन चतुरा जो होई ॥ सबको मूल ताहि गहि लीजे । सुरत सम्हार ताहि चित दीजे॥ डार पत्रको जो कोई धरई । बिना मूल सो जीवन तरई ॥ गुप्त मता जो पकरे भारा । आप तरे औरन को तारा ॥ करे विवेक ताहि ठहराई । सोइ पुरुष को पावे भाई ॥ ताहि सन्त थापों परणाली । सदा भरों राखो नहीं खाली ॥ जो प्राणी लीजे ठहराई । हंसराज ते करी है भाई ॥ साखी पद बोलै सब कोई । बिन परिचये सुक्ति नहीं होई ॥ अगम अगोचर गत व्यौहारा । गहौं ताहि उत्तरी भव पारा ॥ यहि धन राख जीवनको जाई । कर बनी जी कहु टूट न आई ॥ यह पूजा है अगम अपारा । खर्चहु खाहु बहु बड़े विस्तारा॥ यह धन मिले भाग बहु केरा । जब धन सोच गाहक बहुतेरा ॥

साखी

पूजी मेरे नाम है, जाते सदा निहाल । कहै कबीर मैं पुरुष बल, चोरी करे न काल ॥

चौपाई

जो जिव है निज नाम समाना । भये सुक्त जो लोक सिधाना ॥ सोई हंस का तुम सत लेखो । अक्षर माहिं निरक्षर विवेको ॥

धर्मदास वचन

कहैं धर्मदास सन्त के दासा । गुरु मेटो मेरो जमको त्रासा ॥ नाम निःअक्षर कहो उतपानी । आपै तैं कैसे के जानी ॥

( ६६ )

मुक्तिबोध

सद्गुरुवचन

कहैं कबीर धर्मदास सुजानी । अकह हतो ताही कहो बखानी॥ जब नहिं लोक दीप विस्तारा । तब नहिं सुकृति करी संसारा॥ तब नहिं धरती अमर सुमेरु । तब नहिं हतो अमल औकुबेरु॥ तब नहिं सृष्टि सकल पसारा । आप अकह तब हता निनारा ॥ सकल सृष्टि उत्पन कछु नाहीं । तब सब उत्पन कहा सब नाहीं॥ हते आप तब शब्दहिं स्वाला । इच्छा भये कीन्हे उजियाला ॥ इच्छा ते अनहद ध्वनि बानी । सुरत संभार सृष्टि उत्पानी ॥ सुरत भीर तेहि माहिं समानी । इच्छा तैं अनुभव उत्पानी ॥ तब ते अक्षर भेद निनारा । साखी पद कीन्हा निरवारा ॥ अकह अचल पुरुषहिं तहां आपू । नहिं दुख सुख नहीं सन्तापू ॥ सबका मूल ताहिं सों लागी । उलट समय सोई बड़ भागी ॥ साखी-कहैं कबीर जो शब्द लखि, रहैं सुतैं लौलीन । कबीरा सुतैंके समय, निश्चय लोकको चीन ॥ जाके चित अनुराग है, ज्ञान मिले नर सोय । बिन अनुराग न पावई, कोट करे जो कोय ॥

चौपाई

सत्य शब्द जो आवे हाथा । सकलो काल नवावे माथा ॥ साखी-काल खड़ा सिर ऊपरे, काल नजर नहिं आय । कहैं कबीर बल आपने, जम से जीव छुड़ाय ॥

चौपाई

नाम अमर मल्यागिर भाई । पीवत विष अमृत हो जाई ॥ निशि दिन रहे मल्यागिर संगा । विश न लगे सो तिनके अंगा ॥ साखी-काल फिरे शिर ऊपरे, हाथों धरे कमान । कहे कबीर गहु नामको, छोड़ सकल अमान ॥

बोधसागर

( ६७ )

चौपाई

नर नारी जो गर्भहि धरहीं । नाम विना पुन नकँहि परहीं ॥ सुनो संत हौ शब्द रसाला । गहो ताहि जो हो उजियाला ॥ जाके जिव निज नाम समाना । ता कहँ काल अमर कर जाना ॥ विनती कर पूछे धर्मदासू । दोह कर जोर रहें गुरु पासू ॥ सतगुरु कहैं सुनो धर्मदासा । शब्द बान लेव हमरे पास ॥ मैं गुरु भयो शब्द मोर हाथा । सब घटवाह नवावें माथा ॥ साखी-भाग बड़े तेहि जीवके, आय मिले मो संग । पुरुष मिले वहि बाँह धर, सुख विलासे एक ॥

चौपाई

जब हम रहे पुरुष के माहीं । काहि कहों कोड दूसरे नाहीं ॥ कहे कबीर सुनो धर्मदासा । होय निःशंक मेटा जमत्रासा ॥ मेटो भर्म होय निःशंका । काय गढ़ जीत बजावे डंका ॥ भयो प्रकाश गुरु भेद बतावा । जीव बोध सतलोक पठावा ॥

साखी-जमराजा बड़ दारुण, महा विकट ब्रह्मंड ।

ताके डंका सुनत ही, भय माने नव खंड ॥

नाम खज्र दृढ़ राखहु, गहो, सुर्त सम्हार ।

काल सो जीव उबारिके, पठवहु भव जलपार ॥

चौपाई

जबते अजर पुरुषको चीन्हा । तबसों काल भये बल हीना ॥

साखी-यहाँ वहाँ कहि जीव छुड़ाये, काल रहे सिर साँध ।

सुर्तसमावे चेतन चौँकी, रहे न जमके बांध ॥

आदि नाम तेहि पुरुषके, सुनत तजहि अभिमान ।

कहे कबीर सुनो हो संतो, तजो नरककी खान ॥