कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ५८ )
भवतारणबोध
चौपाई
सुन धर्मनि सब जुगत बखानी । तुम अपने मनमहँ कछु जानी ॥ आदि अन्त सब तुम्हें लखाई । उत्पत्ति परलयकी गति पाई ॥ उत्पत्ति परलय सिरजन हारा । मेरा भेद निरंजन पारा ॥ तासे जगत न काहू माना । तातें तोहि कहां मैं ज्ञाना ॥ जो कोई मानै कहा हमारा । सो हंसा निज होय हमारा ॥ अमर करें फिर मरन न होई । ताका खूंट न पकड़ैं कोई ॥ फिरके नहिं जन्में जगमाहीं । काल अकालताहि दुख नाहीं ॥ सुखसागर सुख मूल बतावा । बड़ भागी हंसा काहू पावा ॥ अंकुरी जीव जु होय हमारा । भवसागर तें होय नियारा ॥ प्रणहि प्रतीत करो मन लाई । ताको यह पद देय लखाई ॥ सुर्तवंत साँचा जी होई । शरण तुम्हारी गहिहै सोई ॥ साखी-प्रथमहि दृढ़ प्रतीत है, होय भक्ति अंकुर ।
भाव प्रीति सेवा करे, देउ ज्ञान भरपूर ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी मैं तुमको चीन्हा । आदि अन्त भेद सब लीन्हा ॥ तुमहीं वार तुमहिं हो पारा । तुमहीं सों उपजो संसारा ॥ तुमहीं हो निज पहिले पारा । तुमहीं सकल जगत सो न्यारा ॥ गुप्त प्रकट मैं सब विधि जाना । तुम हीं हो तहैं पद निरवाना ॥ ऐसी अगम गम्य तहैं नाहीं । मैं बूझो अपने मन माहीं ॥ पूरण कृपा करी तुम साई । मेरे मन कछु संशय नाहीं ॥ भव तारण तुम संशय वारण । धर औ अघर दोनोंके धारण ॥ समर्थ सब गति पायउ तोरी । अब सब संशय भागी मोरी ॥ भयो सनाथ तव दर्शन पाये । माया छूट परम पद पाये ॥ छूटा काल निरंजन मोरा । जन्म मरणके टूटे डोरा ॥
बोधसागर
( ५९ )
अब भवमें मैं बहुरि न आऊँ । तुमरे चरणकमल चित्त लाऊँ ॥ येती युक्ति न काहू पाई । सो साहिब तुम मोहि लखाई ॥ जान परी मोहि तुम्हरी बाता । तुम सम और न कोई ताता ॥ चौरासी सो कीन्ह उबारा । बहुरि जन्म नहिं होय हमारा ॥ समझ बूझ करिहौं सिवकाई । छाँडो कुलकी लाज बड़ाई ॥ परदा तो रहिया क्षण माहीं । जगमें कोई काहू को नाहीं ॥ अपने अपने स्वारथ आई । परमारथ काहू नहिं पाई ॥ ये सब जगत निरंजन माहीं । पाँच तीन सो सब उपजाई ॥ पाँच तत्त्व तीन गुण भारी । इन ते युक्त दिखाई नारी ॥ पानी पवन पृथ्वी आकाशा । सब पर तेज किया परकाशा ॥ रज तम सत तीनों गुणजाना । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाना ॥ साखी-पाँच तीन पर अहि निरंजन, यह मायाको ठाट । तासों सब रचना करी, भांति भांतिकी घाट ॥
सद्गुरु वचन
चौपाई
कहे कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद मैं किया प्रकासा ॥ तुम सन अन्तर कछू न राखा । जो कछुहता सो कछु सब भाखा ॥ अब तुम भक्ति करो दृढ़ताई । छाँड़ि देव कुललाज बड़ाई ॥ पहिले कुल मर्यादा खोवे । भव सो रहित भक्ति तब होवे ॥ कुल की भय सबही को भारी । कहाँ को पुरुष कहाँ की नारी ॥ ताते यम को बन्धन कीन्हा । काज अकाज न काहू चीन्हा ॥ ताते परदा दूर निवारो । सेवा करो सत्य मन धारो ॥ परदा साथ काल की गांसी । यह बन्धन दुनियाँ सब फांसी ॥ राजा परजा बड़े कुलीना । परदे काल मर्म नहिं चीन्हा ॥ सेवा करो छाँड़ि मन दूजा । गिरही सेवा गिरही पूजा ॥
( ६० )
भवतारणबोध
गुरुओं कपटे करै चतुराई । सो हँसा जग भरमें आई ॥ ताते गुरु सों परदा नाहीं । परदा करै रहै भव माहीं ॥ गुरु है मात पिता गुरु सेवा । गुरु सम और नहीं कोई देवा ॥ गुरु है खसम और नहीं दूजा । जाने अश हंस गुरु पूजा ॥ गुरुओं परदा कबहुँ न करिये । सर्वस ले गुरु आगे धरिये ॥ साखी-गुरुकी महिमा को कहे, शिव विरंचि नहीं जाम । गुरु सतगुरु को चीन्हियां, ते पहुँचे निज धाम ॥
चौपाई
धर्मदास सुन जुगत बताऊँ । चौक आरती तोहि लखाऊँ ॥ अगर चन्दनका चौका दीजै । ज्योति बराय आरती कीजै ॥ पांच तत्व पांचों है बाती । बाहर भीतर ज्योति समाती ॥ मानिक दीपकका उजियारा । यहि बात जाती बिस्तारा ॥ श्वेतपात ले हो सुख भारी । श्वेत खटाई श्वेत सुपारी ॥ यही विधि चौका विस्तारी । मेवा अष्ट आन तहँ धारी ॥ मेवा कदलि कपूर मंगावो । कदली फल सोई ले आवो ॥ पुष्टि फूल सुगन्ध सवारो । भांति भांति व्यंजन अनुसारो ॥ तनमन धन तब अर्पण कीजै । प्रेम सहित ऐसो सुख लीजै ॥ पांच तत्व को भोजन कीजै । ब्रह्म आत्महि तुस करीजे ॥ काया माया को सुख येही । यह सुख करके मिलो विदेही ॥ मिलो विदेह देह धर नाहीं । बूझ लेहु तुम यह मन माहीं ॥ अब कष्ट कहनेको नहीं रहिया । युक्ति हती सो सब हम कहिया ॥ भव छूटन को यही उजागर । याही विधि उतरे भवसागर ॥ सत्य सत्य यह बात हमारी । जो कोई समझ करै नर नारी ॥ भक्ति करै मुक्ति फल पावे । हमरे सत्य लोकमें आवे ॥ कहे कबीर सुनहु धर्मदासा । छूटै कर्म भर्म सब फांसा ॥
बोधसागर
( ६१ )
धर्मदास वचन
साखी-कर्म भर्म भव भा सब, दिये भारमें झोंक । सतगुरुके परताप सों मिट गये सबही धोंक ॥
सदगुरु वचन
साखी-यह भव तारण ग्रन्थ है, सतगुरु का उपदेश । जो मन माने प्रीति कर, पहुँचे हमरे देश ॥
चौपाई
गुप्त भेद सुनहु धर्मदासा । आपहि आप भये परकासा ॥ मूल वस्तु बीज है भाई । उपजे विनशै आवै जाई ॥ निह अक्षर ते अक्षर भाया । अक्षर आदि अमी उपजाया ॥ आदिअमी किये सकल पसारा । फल रहा कछु नाहिं न न्यारा ॥ सोहं कला अमीके माहीं । श्वेत बीज झलके तेहि ठाहीं ॥ श्वेत बीजका मूल है माया । तासों बची सकलकी काया ॥ श्वेत बीजका सकल पसारा । तामें जीव लिया अवतारा ॥ तब अंकूर अमी ते भयऊ । पारस अंस फैल सब गयऊ ॥
साखी-उत्पति परलय बीज गति, बीजहि आवे जाय । गुप्त प्रगट जो कुछहती, सो सब दिया लखाय ॥ निह अक्षर अक्षर भया, अक्षर किया प्रकाश । मनते माया ऊपजे, मायात्रिगुणहि रूप ॥ पांच तत्त्वके मेलमें, बांधे सकल स्वरूप । माया ब्रह्म जी तत्व अरु, रज सत तम त्रिय देव ॥ इन सब ही को छोड़कर, करनिह अक्षर सेव ॥
( ६२ )
भवतारणबोध
जो चाहो सोई मिले, मानो मोर विचार । यही भेद जाने बिना, कोइ न उतरे पार ॥ भव भारी भर्मइ मिटै, संशय शूल न होय । हंसनमें जो रम रहा, शरण गहै नहिं कोय । कहै कबीर धर्मदास सों, छोड़ो तुम संसार ॥ यह मेरी परतीत कर, तारो कुल परिवार ॥ अंश वंश परिवार निज, नाद बिन्दु गुरु शिष्य । जो चाहे निह अक्षरहिं, मुक्ति अंक सोइ लिखव ॥
इति श्रीभवतारणबोध समाप्त
मुक्तिबोध (पंचदश तरंग)
सत्यपुरुषाय नमः
अथ श्रीबोधसागरे
पञ्चदशस्तरंगः
श्रीग्रन्थ मुक्तिबोध
★
सद्गुरु वचन-चौपाई
ये गुरु गम संशय करलेखो । प्रगटे ज्ञान तब वस्तु परेखो ॥ अनुभव आदिकुछ कहों बखानी । सुनिये सन्त गुरु गमबानी ॥ अनंत कोट जुग आगे चलगयेऊ । अचल अमानताहि पुनिरहेऊ ॥ साठ कोट जुग औरो बीता । सृष्टि रचनाकी इच्छा कीता ॥ वह तो अचल पुरुष है अन्ता । बिन गुरुदया न भेट भगवंता ॥ कोट कथे कथनी नहि पावा । जबलग गुरुगम नहीं बतावा ॥ सारखी पद हैं कोटन वाणी । पुरुष एककहैं सुमरो प्रानी ॥ ज्ञान सुरत औ शब्द उच्चार । यह सब दीन्ह कीन्ह संसारा ॥ अचल पुरुष को सुमिरे कोई । जीवत मुक्ति सन्तकी होई ॥ सारखी पद बोले बहु बानी । आदि नामको बिरला जानी ॥ आदि नामका भेद निनारा । त्रिना सतगुरु बूड़े संसारा ॥ सोइ जाने जाको बड़ ज्ञाना । गुप्त मता तिनहीं पहिचाना ॥
सारखी-आदि नाम निज सार है, बूझि लेहु हो हंस ।
जिन जानो निज नाम को, अमर भये ते वंश ॥
आदिनाम निजमन्त्र है, और मन्त्र सब छार ।
कहे कबीर निज नाम बिन, बूड़ मरा संसार ॥
( ६४ )
मुक्तिबोध
आदिनाम कहैं खोजहु प्राणी । जाते होय मुक्ति सहिदानी ॥ मूलमन्त्र मन्त्रन महि साचा । जोगहि जलेसोनगरहि पहुँचा ॥ आदि नाम जेहि खाजत भेटा । जरा मरन को संशय भेटा ॥ आदि नाम निःअक्षर साँचा । जाते जीव काल सों बाचा ॥ निःअक्षर धुन जहवाँ होई । ताहि जपे नर बिरला कोई ॥ जाके बल आवे संसारा । ताहि जपे नर हो भव पारा ॥ गुप्त नाम गुरु बिन नहि पावे । पूरा गुरु हो सोइ लखावे ॥ सार मन्त्र लखे जो कोई । विषधर मंडवा निर्मल होई ॥ आदि नाम मुक्तामणि साँचा । जो सुमरे जिव सबसाँ बाचा ॥ आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥ जब लग गुप्त जाप नहि जाने । तबलग काल हटा नहि माने ॥ गुप्त जाप ध्वनि जहँवाँ होई । जो जन जाने बिरला कोई ॥ गुप्त मता लै पुरुषहि चीन्हा । जबते गुरु मोहिं दिशा दीन्हा ॥ तात वरण प्रभु वरण विहीना । सकल मनुष्यनगर नहि चीना ॥ मूल मन्त्र जेहि पुरुषके पास । सोई जनको खोज ले दासा ॥ मूल मन्त्र है ओ सब साखा । कहैं कबीर मैं निजके भाखा ॥ लिखो न जाय कहै को पारा । हैं अक्षर में जो पावै निरबारा ॥ लिखो न जाय लिखामें नाहीं । गुरु बिन भेट न होवे ताहीं ॥
साखी-प्रीति विना नहि पाइये, जो नहि सुतं समान । पुरुष दीप तब पावइ, जबहीं तजै अभिमान ॥
चौपाई
परम पुरुषसों भेट न भयऊ । विन गुरु दयाप्रगटना कहेऊ ॥ धर्मदास मैं कहां समुझाई । निर्गुण भेद कोइ बिरले पाई ॥ तुम तो जीव पर बोधो जाई । जमराजा परपंच लगाई ॥
बोधसागर
( ६५ )
जीवहिं राखे फन्द फँदाईं । शब्दबान मईं मारो जाईं ॥ शब्द बान मैं तुम कहैं दीन्हा । जीवको देहु सुक्तिको चीन्हा ॥ नाम पान सों ईस बचाही । शब्द सुतं लै जुग बन्धाही ॥ जुग बांधे मारे नहीं कोई । लाख जतन चतुरा जो होई ॥ सबको मूल ताहि गहि लीजे । सुरत सम्हार ताहि चित दीजे॥ डार पत्रको जो कोई धरई । बिना मूल सो जीवन तरई ॥ गुप्त मता जो पकरे भारा । आप तरे औरन को तारा ॥ करे विवेक ताहि ठहराई । सोइ पुरुष को पावे भाई ॥ ताहि सन्त थापों परणाली । सदा भरों राखो नहीं खाली ॥ जो प्राणी लीजे ठहराई । हंसराज ते करी है भाई ॥ साखी पद बोलै सब कोई । बिन परिचये सुक्ति नहीं होई ॥ अगम अगोचर गत व्यौहारा । गहौं ताहि उत्तरी भव पारा ॥ यहि धन राख जीवनको जाई । कर बनी जी कहु टूट न आई ॥ यह पूजा है अगम अपारा । खर्चहु खाहु बहु बड़े विस्तारा॥ यह धन मिले भाग बहु केरा । जब धन सोच गाहक बहुतेरा ॥
साखी
पूजी मेरे नाम है, जाते सदा निहाल । कहै कबीर मैं पुरुष बल, चोरी करे न काल ॥
चौपाई
जो जिव है निज नाम समाना । भये सुक्त जो लोक सिधाना ॥ सोई हंस का तुम सत लेखो । अक्षर माहिं निरक्षर विवेको ॥
धर्मदास वचन
कहैं धर्मदास सन्त के दासा । गुरु मेटो मेरो जमको त्रासा ॥ नाम निःअक्षर कहो उतपानी । आपै तैं कैसे के जानी ॥
( ६६ )
मुक्तिबोध
सद्गुरुवचन
कहैं कबीर धर्मदास सुजानी । अकह हतो ताही कहो बखानी॥ जब नहिं लोक दीप विस्तारा । तब नहिं सुकृति करी संसारा॥ तब नहिं धरती अमर सुमेरु । तब नहिं हतो अमल औकुबेरु॥ तब नहिं सृष्टि सकल पसारा । आप अकह तब हता निनारा ॥ सकल सृष्टि उत्पन कछु नाहीं । तब सब उत्पन कहा सब नाहीं॥ हते आप तब शब्दहिं स्वाला । इच्छा भये कीन्हे उजियाला ॥ इच्छा ते अनहद ध्वनि बानी । सुरत संभार सृष्टि उत्पानी ॥ सुरत भीर तेहि माहिं समानी । इच्छा तैं अनुभव उत्पानी ॥ तब ते अक्षर भेद निनारा । साखी पद कीन्हा निरवारा ॥ अकह अचल पुरुषहिं तहां आपू । नहिं दुख सुख नहीं सन्तापू ॥ सबका मूल ताहिं सों लागी । उलट समय सोई बड़ भागी ॥ साखी-कहैं कबीर जो शब्द लखि, रहैं सुतैं लौलीन । कबीरा सुतैंके समय, निश्चय लोकको चीन ॥ जाके चित अनुराग है, ज्ञान मिले नर सोय । बिन अनुराग न पावई, कोट करे जो कोय ॥
चौपाई
सत्य शब्द जो आवे हाथा । सकलो काल नवावे माथा ॥ साखी-काल खड़ा सिर ऊपरे, काल नजर नहिं आय । कहैं कबीर बल आपने, जम से जीव छुड़ाय ॥
चौपाई
नाम अमर मल्यागिर भाई । पीवत विष अमृत हो जाई ॥ निशि दिन रहे मल्यागिर संगा । विश न लगे सो तिनके अंगा ॥ साखी-काल फिरे शिर ऊपरे, हाथों धरे कमान । कहे कबीर गहु नामको, छोड़ सकल अमान ॥
बोधसागर
( ६७ )
चौपाई
नर नारी जो गर्भहि धरहीं । नाम विना पुन नकँहि परहीं ॥ सुनो संत हौ शब्द रसाला । गहो ताहि जो हो उजियाला ॥ जाके जिव निज नाम समाना । ता कहँ काल अमर कर जाना ॥ विनती कर पूछे धर्मदासू । दोह कर जोर रहें गुरु पासू ॥ सतगुरु कहैं सुनो धर्मदासा । शब्द बान लेव हमरे पास ॥ मैं गुरु भयो शब्द मोर हाथा । सब घटवाह नवावें माथा ॥ साखी-भाग बड़े तेहि जीवके, आय मिले मो संग । पुरुष मिले वहि बाँह धर, सुख विलासे एक ॥
चौपाई
जब हम रहे पुरुष के माहीं । काहि कहों कोड दूसरे नाहीं ॥ कहे कबीर सुनो धर्मदासा । होय निःशंक मेटा जमत्रासा ॥ मेटो भर्म होय निःशंका । काय गढ़ जीत बजावे डंका ॥ भयो प्रकाश गुरु भेद बतावा । जीव बोध सतलोक पठावा ॥
साखी-जमराजा बड़ दारुण, महा विकट ब्रह्मंड ।
ताके डंका सुनत ही, भय माने नव खंड ॥
नाम खज्र दृढ़ राखहु, गहो, सुर्त सम्हार ।
काल सो जीव उबारिके, पठवहु भव जलपार ॥
चौपाई
जबते अजर पुरुषको चीन्हा । तबसों काल भये बल हीना ॥
साखी-यहाँ वहाँ कहि जीव छुड़ाये, काल रहे सिर साँध ।
सुर्तसमावे चेतन चौँकी, रहे न जमके बांध ॥
आदि नाम तेहि पुरुषके, सुनत तजहि अभिमान ।
कहे कबीर सुनो हो संतो, तजो नरककी खान ॥
( ६८ )
मुक्तिबोध
चौपाई
कासों कहों कहा नहीं जाई । मेरी गत मत बूझ न पाई ॥ हमहिं दास दासन के दासा । अगम अगोचर हमरे पास ॥ यहां वहां यदि दोनों ठाऊँ । सत्य कबीर कलिमें मोर नाऊँ ॥ जो न हते हमहीं पुन सोई । नाम विना भूले नर लोई ॥ साखी-कोटि जाय संसारमें, ताको मुक्त न होय । आदि नाम है मुक्तका, जाने बिरला कोय ॥
चौपाई
गुप्त जाप है अगम अपारा । ताहि जपै नर उत्तरे पारा ॥ मुक्ति न होवे नाचे गाये । मुक्ति न होई मृदंग बजाये ॥ मुक्ति न हो साखी पद बोले । मुक्ति न हो तीरथके डोले ॥ गुप्त जाप जाने जब कोई । कहे कबीर मुक्ति भल होई ॥ संत सुभाग गुरु दायी कीन्ह। आदि नाम हंसनको दीन्ह ॥ साखी-सोई नाम संसार में, उदित अमोल अपार । ताहि नाम विन मुक्ति नहीं, बूझि मुआ संसार ॥
चौपाई
कथा कीर्ति कई गदगद बानी । मुक्ति न होय विना सहिदानी ॥ केता कहो कहा नहीं जाई । नाम गहेसो पुरुष मिल जाई ॥ सार शब्द परवाना देहै । जीव जुडाय काल सो लेहै ॥ साखी-फनपति बीरन देखके, राखे बनहिं सकोर । बीरा देखे नामके, काल रहे सुख मोर ॥
चौपाई
सोहं शब्द निरक्षर वासा । ताहि भिन्न कर जपिये दासा ॥ साखी-जो जन हैहै जौहरी, सो धन लेहै गाय । सोहं जाप सब जगतए, मिथ्या जन्म गमाय ॥
बोधसागर
( ६९ )
साखी पद संसार में, कहन सुननको कीन । चीठी आई पुरुष की, सो धन लैहो चीन ॥ जो जन हूहै जौहरी, तो कहनेका जोग । बिन सतगुरु ना पावई, भटक सुये सब लोग ॥
चौपाई
जब बानी मुख बाहर आवा । भाग बड़े तिनही पुनि पावा ॥ कोट जतनकै जीव ससुझावा । बिना भागते नाम न पावा ॥ गुरु गम लहैं सन्तके पास । सो नहिं परें कालके फांसा ॥ जो कहैं पुरुष अपन कर जाना । सोई भक्त अन्तर्गत ठाना ॥
धर्मदास वचन
धरमदास कहैं कर जोरी । बंदी छोड़ बिनती सुन मोरी ॥ तब साहब अस बोले बाती । लेउँ छुड़ाय राखों निजसाती ॥ तुमको दीन्हौं भक्ति अपारा । नाम जपो तुम अजर हमारा ॥ जो ना बूझे कहा न करई । मुक्ति न होय नरकमें परई ॥ श्रवण माह कहैं दीन्हैं भाई । तौ न विवेकै आ बैठाई ॥ नाम सुने मोर मो कहैं पावैं । जाम जालिम तेहि देख डरावैं ॥
साखी-सब कहैं नाम सुनावहू, जो आवे तुव पास ।
शब्द हमारा सत कहत हों, दृढ़ मानो विश्वास ॥
चौपाई
जो जन गृह तजि ले वैरागी । जहां जाय तहां संगे लागी ॥
साखी-मूल के कान जो लागे, रहे रहन ठहराय ।
वह साधू भर्मै नहीं, सो नहिं नरकै जाय ॥
कहै कबीर तज भर्म पिटारी, नान्ह होयके पीव ।
तज अभिमान गहो गुरुचरण, जमसों वाचे जीव ॥
( ७० )
मुक्तिबोध
चौपाई
आदि नाम निःअक्षर नीरा । तौन नाम लै जीवहि तीरा ॥ आदि नाम लै पंच चलाई । सोइ सन्त प्रमान कहाई ॥ थापो ताहिं दऊं ठकुराई । जबलग रहही मोर दोहाई ॥ गहिमोर नाम मोहिमाहिं समावे । और नामते मोहि न पावे ॥ सोई नाम सन्तन सहिदानी । आप मिलै लेवै पाहिंचानी ॥ उदितनाम निरभय उजियारा । ताहि नाम सो जीव उबारा ॥ कहैं धर्मदास सतगुरु सुनलीजे । अगम पंथ को कैसे दीजे ॥
सद्गुरु वचन
कहैं कबीर पूछेउ भल आई । अगम पन्थगम कहौं बुझाई ॥ अगम पन्थ है विकट विकारा । तासों कबहुँ न होवे पारा ॥ शीतल शब्द लेहिं सहिदानी । उत्तर जाहि कछु शंक न मानी ॥ जाय मिले पुरुषाहिं के पाहीं । जेतिक जीव तुम्हारे बाहीं ॥
धर्मदास वचन
अनहद शब्द बहुत विस्तारा । कैसे पैहैं भेद तुम्हारा ॥
सद्गुरु वचन
आदि नाम पुन तहवाँ होई । नो धत बूझे बिरला कोई ॥ सुरत परम होवे गलताना । ताको मिले निजपद निर्वाना ॥ सुरत बांध जब गुरुहिं समावे । वस्तु अगोचर तबहिं पावे ॥ तज अभिमान मिले जब आई । ताको दीजे ऐन दिढाई ॥ सब तज रहै रहन ठहराई । औ छांड़े सब लोक बड़ाई ॥ ताको दीजे वस्तु अपारा । कहैं कबीर सुन शब्द हमारा ॥ गलत गरीब रहनसे भारै । तन मन धन सन्तनपर वारै ॥ लोक लाज कुल तजे बड़ाई । तब पग परस भर्म मिटजाई ॥ विन विश्वास भक्ति परकाशा । प्रीति बिना नाहिं दुविधा नाशा ॥
बोधसागर
( ७१ )
गुरु से शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नरकमें जाई ॥ संतन वारे तन मन धामा । सोई संत मरे मम नामा ॥ साखी-होय विवेक शब्दके, जाल मिले परवार । नाम गहे सो पहुँच है, मानो कहा हमार ॥
चौपाई
नाम उदित सो संत पियारा । मारों काल होय जर छारा ॥ जिन जिन नाम सुने हैं काना । नर्क न परे होय सुक्ति निदाना ॥ आदिनाम जेहि श्रवणन नाहीं । निश्चयसो जिव जम घर खाहीं ॥ सुमरौ पुरुष काल डर कंपा । भौमाने नाहीं सिर चंपा ॥ नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥
साखी-आदि नाम हैं पारस, मन हैं मैला लोह । पारस परस उजियार भये, छूटे बंधन मोह ॥
चौपाई
कहैं लग कहौं कहन नहीं पारा । नाम गहे सो संत हमारा ॥ आदि नाम जस सार के गौसी । लागे बान ठाव रहै वैसी ॥
साखी-सतगुरु मारे बान भर, डोले नहीं शरीर । का चाबुक वह कर सके, सुख लागे वह तीर ॥ गौसी लागे सुख भये, मरे न जीवे कोय । कहें कबीर अमर सो प्राणी, जो नहीं मृतक होय ॥
चौपाई
लागे जहाँ वस्तु सो पावा । विन लागे को भेद बतावा ॥ नाम अमर रस चाखें कोई । ताको जरा मरन नहीं होई ॥ अक्षर गुप्त सोई मैं भाषा । और शब्द स्वाल अभिलाषा ॥ साठ सुन्नके सुने जो भेऊ । यह गति जाने बिरला केऊ ॥ पाताल सुन्न है बारह खंडा । बारह सुन्न कहौं ब्रह्मंडा ॥
( ७२ )
मुक्तिबोध
बारह सुन्न आकाश बताईं । बारह सुन्न पुरुष के ठाईं ॥ बारह सुन्न कहो अनुमाना । कहैं कबीर गुरुसे हम जाना ॥ सारखी-अकह मूल सब सुन्नके, सुन्न सकल ब्रह्मंड । तहवां से बस्ती भई, सात द्वीप नव खंड ॥
चौपाई
चार पदारथ एक पथ माहीं । बिन गुरु नर कहैं बूझे नाहीं ॥ अदेख देखे कथा जो कथई । आप परस दोऊ ता मथई ॥ कथनी कथे प्रतीत हदाईं । मथनी शब्द अभय पद पाईं ॥ जब देखे औरै नहिं माने । तज पाखंड सत्यको जाने ॥ तहां संत को लैं जमरावे । जाके जीवसहिदानी पावे ॥ सो जाने पुन हमार ठिकाना । ता कहैं दीजे निज सहिदाना ॥ नाम अमर रस मनुवा पागे । होय लौलीन तहां सो लागे ॥ गहि पकरे नर सुर्तकी डोरी । तासों काल करे नहिं चोरी ॥ हठ के मनवां आदि जो थीरा । कहैं कबीर सो सांच फकीरा ॥ सत्य समोय झूठ परहरई । दाग न लागे सत्य सो तरईं ॥ जाकहैं गुरु आपन कर लीन्हा । नाम नेति हंसनको दीन्हा ॥ जे तन गुरुके नाम समाना । भक्ति हेत सोई सब जाना ॥ जबलग भक्ति अंग नहिंआवा । सार शब्द कैसे के पावा ॥ सत्य नाम श्रवणन में वोषे । ज्यों माता बालक कहैं पोषे ॥ जहां गुरु भक्त तहां लौ लावे । सुने जु वाह मुक्तिगत पावे ॥
सारखी-सुर्तसमानी नाम है, जगमें रहे उदास ।
कहैं कबीर निज नामही, हठ राखे विश्वास ॥
चौपाई
जाके उर विश्वास न आवे । भक्ति अंग सो कैसे पावे ॥ सुरत हठाय निसदिन तहैं जागे । मुक्त होय कछु बार न लागे ॥
बोधसागर
( ७३ )
चढ़ी निशंक मन मगन रहा था । सो नहिं करै कालके हाथा ॥ जो जिव माया सों लौ लावा । गहे काल मुख बात न आवा ॥ सोई सन्त समाधी मारी । जाके जीव सहिदानी डारी ॥ साखी-गुरुके शब्द साधुकी पूँजी, बणिज जाने जो कोय । कहें कबीर तो बड़े सवाई, हानि न कबहुँ होय ॥
चौपाई
जबलग सार नाम नहिं आवे । तबलग प्राणिमुक्ति ना पावे ॥ सार नाम बिन सौपके मोती । उपजे बहुत बिना हर खेती ॥ साखी-येहि विधि करे किसानी, पोता तल बल होय । भक्त मिले कोइ वीरला, दाम देय सब कोय ॥ मूलहा मोर नाम हैं, दरगाहे गुरु मान । सब सन्तोसों लिये फकीरी, डार सकल अभिमान ॥
चौपाई
आदि नाम जे संतनमाहीं । जमका करे निशंक डरनाहीं ॥ आदि नाम है अक्षर माहीं । गुरु विन नर्क पुन छूटे नाहीं ॥ सोहं मैं निः अक्षर रहाही । विन गुरुके कौन देह लखाई ॥ चीन्हे परे आवे विश्वासा । लोक वेदकी छूटे आसा ॥ चीन्हे आदि निः अक्षर वानी । छूटे भर्म होय ब्रह्म ज्ञानी ॥ कहें कबीर सन्त सोइ भागी । जाके सुर्त निरंतर लागी ॥ नाम चिन्ह पै कहों पुकारी । नातर बूड़े गैल मझधारी ॥ कहों शब्द मानो नर लोई । आदि नाम बिनमुक्ति नहोई ॥ गुरुके कहे मैं कहों संदेश । नाम लेवे सो पहुँचे देशा ॥ गुरुके शब्द जो माने नाहीं । मुक्ति न हो बूड़े भवमाहीं ॥ साखी-जम आसे बल बांधे, कहों पुकार पुकार । गुरुकी त्रास न होती तो, खाते उनको फार ॥
( ७४ )
मुक्तिबोध
चौपाई
जाको होय गुरुको विश्वासा । निश्चय जाय पुरुषके पास ॥ नर प्राणी कीजे इतबारा । गुरुके कहे मैं करें पुकारा ॥ कहे कबीर मिलन बिन आशा । मिलन भये भेटे विश्वासा ॥ निशिदिनरहे निजनामसमाना । तब जाने भजनी परवाना ॥ यह सब कहों परमारथ काजा । यही पाखंड नर अरुझेबाजा ॥ अक्षर आदि निजनाम सुनाऊँ । जरा मरनके भर्म मिटाऊँ ॥ सोहं के संग आये संसारा । सो गुरु दीजे मोहिं उपचारा ॥ ताको भर्म जान जो पावा । सो साधू जगमें नहिं आवा ॥ साखी-यह अवसर नहिं पावहीं, पलमें लेहु उबार । भवसागर तर जायंगे, क्षणमें लेहि उबार ॥
चौपाई
गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज वैरागी होई ॥ अकह वस्तु तब निज के पाई । तब पाखण्ड कछू नहिं आई ॥ अजर पुरुषको खोजहु प्राणी । कहे कबीर कोई सन्तसमानी ॥ आदि नाम सो सुरत समावे । निरभय मुक्ति अमरपद पावे ॥ गुरुके शब्द जीव हृद करई । सोई सन्त भवसागर तरई ॥ मनके सुख बूझे भर्म फांसा । बुझ जाय न हो सुख बासा ॥ सुरत सम्हार कहत हम तोहीं । पीछे दोष न आवे मोहीं ॥ आदि नाम जो अमीरस चाखे । पांच पचीस बांधके राखे ॥ साखी-प्रेम पन्थ जे पगु धरे, देत न शीश डराय । सपने मोह न व्यापे, ताको जन्म नसाय ॥
चौपाई
तन मन धन सन्तन परवारा । सोई सन्त निज हितू हमारा ॥ का कहैं अमर भरी मैं देऊँ । तेहि सन्तनको निकट बोलाऊँ ॥
बोधसागर
( ७६ )
सोइ संत सतगुरु सुखदासा । अजरपुरुषजहांअजरप्रकाशा॥ अनन्तकोटजाकोपार न पावे । को अस दूसरे गुरु कहावे ॥ हम तुम नारि पुर्ण सब मांहीं । जहां है सोहं तहां हम नाहीं ॥ ताहि खसम चीन्हे नर लोई । तन धर प्रगटे पुरुष न होई ॥ अकह अमान पुरुष जब रहेऊ । नाम निःअक्षर तासों भयेऊ ॥ ताहि नाम को सुमरे कोई । सुर नर मुनि इन्द्री वस होई ॥ अधर पियाला पियरस सांचा । ऐसी रहन रहे सो सांचा ॥ पियत अमीरस अधिक सुहाये । अधिक पिये पुनित्रास नसाये ॥
साखी-पांच पचीसों तीन गुण, एक मिहलमें राख ।
आदिनाम अनभय उच्चरो, तन मन धन सो चाख ॥
धन परखे धनवन्त जो, ज्ञान दृष्टि जो होय ।
आंघे गुरु विन ना सुझे, कोटकरे जो कोय ॥
चौपाई
कहे कबीर भर्म जब छूटे । मुक्ति भली सांची कर लूटे ॥
कहेऊं उपचार कछु परदा नाहीं । विन गुरु नरको सूझे नाहीं ॥
कथनी कथे कथे का होई । गुरु विन मुक्ति न कबहुं सोई ॥
शब्द रूप हमहीं होय आये । हमहीं होय कडिहार कहाये ॥
हमहीं नाम प्राण यह माहीं । हमहीं सन्त मर्द तेहि पाहीं ॥
साखी-ज्ञानदीपक सुरतकी वाती, दीनो संतन हाथ ।
दीपकलेके खोलिये, निस दिन सतगुरु साथ ॥
ज्ञान दीपक प्रकाशके, भीतर भवन उजाल ।
तहां बैठ पुरुषको सुमरो, सहजै होय निहाल ।
चौपाई
सो भजनी सबसी से ऊँचा । जोई अमर औ मतका ऊँचा ॥
यहि विधि भजन करे जो कोई । तीन लोकमें वास न होई ॥
( ७६ )
मुक्तिबोध
लोक वेद कर्म भरम नसावे । होय सुदृष्टि प्यासको पावे ॥ यह संसार अस कर जाने । सत्य पुरुषको जो पहचाने ॥ कहैं कबीर या तनको सोधो । पांच पर्चास तीनको बोधो ॥ एक नाम विन जग जस शवाना । कोट करे नहिं मुक्ति निदाना ॥ साखी-कहैं कबीर ये सब सुए, लहिं विषधरकी धार । जो जीव सतगुरु पावैं, ते जीव जगसे उबार ॥
चौपाई
बिरला जन कोई भक्तिहिलहई । जो थिर होय तो भक्तिही कहई ॥ आपही पुरुष और सब नारी । सेवक भये सकल देहधारी ॥ अचल अमान जो अकह कहावा । ताकी गत बिरला जन पावा ॥ आदि पुरुष को बिरला पावा । ब्रह्मा विष्णु शिव पार न पावा ॥ साखी-अमृत वरण ये मूरत, ताहि कहों गुण पेश । गुरुकी दाय़ा सो लखे, सुरत निरतकर देख ॥
चौपाई
निः अक्षर निर्गुण सो जाने । और सकल जग गुण नहिं आने ॥ तीनों गुण लै सर्गुण बोले । निर्गुण तनके माहीं डोले ॥ आदि नामसों सब जग वांधा । आदि नाम जाने सो साधा ॥ आदि नाम तहाँ अक्षर धारा । ताहि नाम लै सब विस्तारा ॥ आदि नाम देव शंकर भयऊ । और नाम है नरके सुभाऊ ॥ पद साखी निश्चै कर जाने । आदि नाम कहैं मूल बखाने ॥ मूल मंत्र जाने सो कोई । ताको आवागमन न होई ॥ भूलै लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥ प्रेम अभागी मूल नहिं जाने । डार पत्रमें पुरुष बखाने ॥
साखी-अचर पुरुष एकै रहे, अजर दीप है स्थान । कहै कबीर सर्वांग विराजे, ताहि पुरुषको जान ॥
बांधसागर
( ७७ )
चौपाई
निःअक्षर पावे नहीं सोई । कैसे कै स्थिर प्राणी होई ॥ जब लग गुरुओं करे न नेहा । तबलग प्राणी प्रेतकी देहा ॥ आदि नाम अमृत तन पावा । जाति पांति कुलधर्म नसावा ॥ आदि नाम है गुप्त संसारा । जो पावे सो होय हमारा ॥ संत कुल तोर भर्म कुल तोरे । संत साधु सों नाता जोरे ॥ तज पाखण्ड वैरागी होई । अपने पिया को पावे कोई ॥ सार्वी-कहो काल का कर सके, पुरुष नाम जेहि पास ॥ निर्गुण निंदक पच सुए, गुरुका नहीं विश्वास ॥
चौपाई
पुरुष नाम जेहि परिचय होई । सब भेषन में गुरु है सोई ॥ ताकी महिमा अगम अपारा । लोक वेद तज भये नियारा ॥ अचल पुरुष जो अचल है देशा । आदि नाम लेकर परवेशा ॥ जाहि वस्तु में मिटे दुख द्वंद्व । सुख सागर तहां प्रेम अनंद ॥ अगुण सगुण होइ झगरा बाजे । दोष दलतजिके पुरुष विराजे ॥ कहें कबीर या भक्ति के मूला । अकह अमान अचल अस्थूला ॥ अब्रण वरण सो भेद निनारा । घट घट वसे लिप्त तनधारा ॥ ताहि पुरुष को चीन्हें प्राणी । घटमें रहे निकस ना जानी ॥ तबही कहिये खसम खुदाई । कौन कपट से आवे जाई ॥ कौन पुरुष में रहे समाई । सो प्रभु है संतन सुखदाई ॥ यह सब धन अनुभवकी वानी । खोजी होकै सो पावे प्रानी ॥ देख परख आवे विश्वासा । अगुन सगुन के सबै तमाशा ॥ सत्य शब्द कहि दीन्ह सँदेशा । जरा मरण का मिटे अँदेशा ॥ संत संदेशा गुरु मोही दीन्हा । जे जन होय ताहिको चीन्हा ॥ कहै कबीर है वस्तु अपारा । ताहि वस्तु गहि उतरे पारा ॥