भारतकोश
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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

ब्राह्मण २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५०३

ब्राह्मण २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०३ मुझे बलि ( भेंट ) दिया करो।' [इन्द्रियोंने कहा—] 'बहुत अच्छा' ॥ ८–१३ ॥ उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस वसिष्ठगुणसे युक्त हो।' 'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस प्रतिष्ठासे युक्त हो' ऐसा नेत्रने कहा। 'मैं जो समृद्ध हूँ, सो तुम ही उस समृद्धिसे युक्त हो' ऐसा श्रोत्रने कहा। 'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं वह आयतन हो' ऐसा मनने कहा। 'मैं जो प्रजाति हूँ, सो तुम ही उस प्रजातिसे युक्त हो' ऐसा रेतस्ने कहा। [ प्राणने कहा-] 'किंतु ऐसे गुणोंसे युक्त मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है ?' [ वागादि बोले-] 'कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गोंसे लेकर यह जो कुछ भी है, वह सब तुम्हारा अन्न है और जल ही वस्त्र है।' [ उपासनाका फल-] 'जो इस प्रकार प्राणके अन्नको जानता है, उसके द्वारा अभक्ष्य-भक्षण नहीं होता और अभक्ष्यका प्रतिग्रह (संग्रह) भी नहीं होता। ऐसा जाननेवाले श्रोत्रिय भोजन करनेसे पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजन करके आचमन करते हैं। इसीको वे उस प्राणको अनग्न (वस्त्रयुक्त) करना मानते हैं' ॥ १४ ॥ द्वितीय ब्राह्मण पञ्चाग्निविद्या और उसे जाननेका फल; त्रिविध गतिका वर्णन प्रसिद्ध है कि आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालोंकी सभामें आया । वह जीवलके पुत्र प्रवाहणके पास पहुँचा, जो [ सेवकोंसे] परिचर्या करा रहा था। उसे देखकर प्रवाहणने कहा, 'ओ कुमार !' वह बोला, 'जी !' [ प्रवाहण-] 'क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है ?' तब श्वेतकेतुने 'हाँ !' ऐसा उत्तर दिया ॥ १ ॥ 'जिस प्रकार मरनेपर यह प्रजा विभिन्न मागोंसे जाती है— सो क्या तू जानता है ?' श्वेतकेतु बोला, 'नहीं !' [राजा-] 'जिस प्रकार वह पुनः इस लोकमें आती है—सो क्या तुझे मालूम है ?' 'नहीं,' ऐसा श्वेतकेतुने उत्तर दिया। [राजा-] 'इस प्रकार पुनः-पुनः बहुतोंके मरकर जानेपर भी जिस प्रकार वह लोक भरता नहीं है—सो क्या तू जानता है ?' 'नहीं,' ऐसा उसने कहा । [ राजा-] 'क्या तू जानता है कि कितने बारकी आहुतिके हवन करनेपर आप (जल) पुरुष-शब्दवाच्य हो उठकर बोलने लगता है ?' 'नहीं,' ऐसा श्वेतकेतुने कहा। 'क्या तू देवयानमार्गका कर्मरूप साधन अथवा पितृयानका कर्मरूप साधन जानता है, जिसे करके लोग देवयानमार्गको प्राप्त होते हैं अथवा पितृयानमार्गको ? हमने तो मन्त्रका यह वचन सुना है—मैंने पितरोंका और देवोंका, इस प्रकार दो मार्ग सुने हैं, ये दोनों मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले मार्ग हैं। इन दोनों मागोंसे जानेवाला जगत् सम्यक् प्रकारसे जाता है। तथा ये मार्ग [ द्युलोक और पृथिवीरूप ] पिता और माताके मध्यमें हैं।' इसपर श्वेतकेतुने 'मैं इनमेंसे एक भी नहीं जानता,' ऐसा उत्तर दिया ॥ २ ॥ फिर राजाने श्वेतकेतुसे ठहरनेके लिये प्रार्थना की। किंतु वह कुमार ठहरनेकी परवा न करके चल दिया। वह सीधा अपने पिताके पास आया और उससे बोला, 'आपने यही कहा था न कि मुझे सब विषयोंकी शिक्षा दे दी गयी है ?' [ पिता-] 'हे सुन्दर धारणाशक्तिवाले ! क्या हुआ ?' [ पुत्र-] 'मुझसे एक क्षत्रियबन्धुने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता।' [ पिता-] 'वे कौन-से थे ?' [ पुत्र-] 'ये ये' ऐसा कहकर उसने उन प्रश्नोंके प्रतीक बतलाये ॥ ३ ॥ पिताने कहा, 'हे तात ! तू हमारे कथनानुसार ऐसा समझ कि हम जो कुछ जानते थे, वह सब हमने तुझसे कह दिया था। अब हम दोनों वहीं चलें और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उसके यहाँ निवास करेंगे।' [ पुत्र-] 'आप ही जाइये।' तब वह गौतम जहाँ जैवलि प्रवाहणकी बैठक थी, वहाँ आया। उसके लिये आसन लाकर राजाने जल मँगवाया और उसे अर्घ्यदान किया। फिर बोला, 'मैं पूज्य गौतमको वर देता हूँ।' (आप जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हैं, वह बतलाइये। मैं उसकी पूर्ति करूँगा।) उसने कहा, 'आपने मुझे जो वर देनेके लिये प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आपने कुमारसे जो बात पूछी थी, वह मुझसे कहिये।' उसने कहा, 'गौतम ! वह वर तो दैव वरोंमेंसे है, तुम मनुष्यसम्बन्धी वरोंमेंसे कोई वर माँगो' ॥ ४-६ ॥ गौतमने कहा, 'आप जानते हैं, वह तो मेरे पास है। मुझे सुवर्ण तथा गौ, अश्व, दासी, परिवार और वस्त्र भी प्राप्त है । आप महान्, अनन्त और निःसीम धनके दाता होकर मेरे लिये अदाता न हों।' [ राजा-]

५०४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ६ 'तो गौतम ! तुम शास्त्रोक्त विधिसे उसे पानेकी इच्छा करो।' [ गौतम— ] 'अच्छा, मैं आपके प्रति शिष्यभावसे उपसन्न ( प्राप्त ) होता हूँ। पहले ब्राह्मणलोग वाणीसे ही क्षत्रियादिके प्रति उपसन्न होते रहे हैं।' इस प्रकार उपसत्तिका वाणीसे कथनमात्र करके गौतम वहाँ रहने लगा [ सेवा आदिके द्वारा नहीं ]। उस राजाने कहा, 'गौतम ! जिस प्रकार तुम्हारे पितामहोंने हमारे पूर्वजोंका अपराध नहीं माना, उसी प्रकार तुम भी हमारा अपराध न मानना। इससे पूर्व यह विद्या किसी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही। उसे मैं तुम्हारे ही प्रति कहता हूँ। भला, इस प्रकार विनयपूर्वक बोलनेवाले तुमको निषेध करनेमें (विद्या देनेसे अस्वीकार करनेमें ) कौन समर्थ हो सकता है ?' ॥ ७-८ ॥ गौतम ! वह लोक ( द्युलोक ) ही अग्नि है। उसका आदित्य ही समिध् ( ईंधन ) है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गार हे, अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं। उस इस अग्निमे देवगण श्रद्धाको हवन करते हैं, उस आहुतिसे सोम राजा होता है। गौतम ! पर्जन्य- देवता ही अग्नि है। उसका संवत्सर ही समिध् है, बादल धूम हैं, विद्युत् ज्वाला है, अशनि ( इन्द्रका वज्र ) अङ्गार है, मेघ- गर्जन विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमें देवगण सोम राजाको हवन करते हैं। उस आहुतिसे वृष्टि होती है। गौतम ! यह लोक ही अग्नि है। इसकी पृथिवी ही समिध् है, अग्नि धूम है, रात्रि ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवता वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है। गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसका खुला हुआ मुख ही समिध् है, प्राण धूम है, वाक् ज्वाला है, नेत्र अङ्गार हैं, श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवगण अन्नको होमते हैं। उस आहुतिसे वीर्य होता है। गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उपस्थ ही उसकी समिध् है, लोम धूम हैं, योनि ज्वाला है, जो मैथुनव्यापार है वह अङ्गार है, आनन्दलेश विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमे देवगण वीर्य होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है। वह जीवित रहता है। जबतक कर्मशेष रहते हैं, वह जीवित रहता है, और जब मरता है, तब उसे अग्निके पास ले जाते हैं। उस ( आहुतिभूत पुरुष ) का अग्नि ही अग्नि होता है, समिध् समिध् होती है, धूम धूम होता है, ज्वाला ज्वाला होती है, अँगारे अङ्गार होते हैं और विस्फुलिङ्ग विस्फुलिङ्ग होते हैं। उस इस अग्निमे देवगण पुरुषको होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता है ॥ ९-१४ ॥ वे जो [ गृहस्थ ] इस प्रकार इस ( पञ्चाग्निविद्या ) को जानते है तथा जो [ सन्न्यासी या वानप्रस्थ ] वनमें श्रद्धायुक्त होकर सत्य ( सगुण ब्रह्म ) की उपासना करते हैं, वे ज्योतिके अभिमानी देवताओको प्राप्त होते हैं, ज्योतिके अभिमानी देवताओंसे दिनके अभिमानी देवताको, दिनके अभिमानी देवतासे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे जिन छः महीनोंमे सूर्य उत्तरकी ओर रहकर चलता है, उन उत्तरायणके छः महीनोंके अभिमानी देवताओंको [ प्राप्त होते हैं ]; पण्मासाभिमानी देवताओंसे देवलोकको, देवलोकसे आदित्यको और आदित्य- से विद्युत्सम्बन्धी देवताओंको प्राप्त होते हैं। उन वैद्युत देवोंके पास एक मानस पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकोंमें ले जाता है। वे उन ब्रह्मलोकोंमें अनन्त संवत्सरपर्यन्त रहकर [ भगवान्- को प्राप्त हो जाते ] हैं। उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती ॥१५॥ और जो [ सकाम ] यज्ञ, दान, तपके द्वारा लोकोंको जीतते हैं, वे धूम ( धूमाभिमानी देवता ) को प्राप्त होते हैं, धूमसे रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपक्षीयमाणपक्ष ( कृष्णपक्षाभिमानी देवता ) को, अपक्षीयमाणपक्षसे जिन छः महीनोमे सूर्य दक्षिणकी ओर होकर जाता है, उन छः मासके देवताओंको, छः मासके देवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। चन्द्रमामे पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। वहाँ जैसे ऋत्विक्गण सोम राजाको 'आप्यायस्व-अपक्षीयस्व' ऐसा कहकर चमसे भरकर पी जाते हैं, उसी प्रकार इन्हे देवगण भक्षण कर जाते हैं। जब उनके कर्म क्षीण हो जाते है तो वे इस आकाशको ही प्राप्त होते हैं। आकाशसे वायुको, वायुसे वृष्टिको और वृष्टिसे पृथिवीको प्राप्त होते हैं। पृथिवीको प्राप्त होकर वे अन्न हो जाते हैं। फिर वे पुरुषरूप अग्निमे हवन किये जाते हैं। उससे वे लोकके प्रति उत्थान करनेवाले होकर स्त्रीरूप अग्निमे उत्पन्न होते हैं। वे इसी प्रकार पुनः-पुनः परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन दोनों मागोंको नहीं जानते, वे कीट, पतग और डाँस मच्छर आदि होते हे ॥ १६ ॥

तृतीय ब्राह्मण

३] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०५ तृतीय ब्राह्मण मन्थविद्या और उसकी परम्परा

जो ऐसा चाहता हो कि मैं महत्त्व प्राप्त करूँ, वह उत्तरायणमें शुक्लपक्षकी पुण्य तिथिपर बारह दिन उपसद्व्रती (पयोव्रती) होकर गूलरकी लकड़ीके कस (कटोरे) या चमस- में सर्वौषध, फल तथा अन्य सामग्रियोंको एकत्रितकर, [जहाँ हवन करना हो, उस स्थानका] परिसमूहन* एव परिलेपन† करके अग्निस्थापन करता है और फिर अग्निके चारों ओर कुशा बिछाकर शास्त्रोक्त विधिसे घृतका शोधन करके, जिसका नाम पुँल्लिङ्ग हो उस [हस्त आदि] नक्षत्रमें मन्थको (औषध-फल आदिके पिण्डको) [अपने और अग्निके] बीचमें रखकर हवन करता है। [ 'यावन्तो' इत्यादि प्रथम मन्त्रका अर्थ—] हे जातवेदः ! तेरे वशवर्ती जितने देवता वक्रमति होकर पुरुषकी कामनाओंका प्रतिबन्ध करते हैं, उनके उद्देश्यसे यह आज्यभाग मैं तुझमें हवन करता हूँ। वे तृप्त होकर मुझे समस्त कामनाओंसे तृप्त करें—स्वाहा‡ । [ 'या तिरश्ची' इत्यादि द्वितीय मन्त्रका अर्थ—] 'मैं संवकी मृत्युको धारण करनेवाला हूँ' ऐसा समझकर जो कुटिलमति देवता तेरा आश्रय करके रहता है, सब साधनों- की पूर्ति करनेवाले उस देवताके लिये मे घृतकी धारासे यजन करता हूँ—स्वाहा ॥ १ ॥ 'ज्येष्ठाय स्वाहा, श्रेष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निर्म हवन करके सस्रवको (स्रुवामे बचे हुए घृतको) मन्थम डाल देता है। 'प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थम डाल देता है। 'वाचे स्वाहा, प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'चक्षुषे स्वाहा, सम्मदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमं डाल देता है। 'श्रोत्राय स्वाहा, आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थम डाल देता है। 'मनसे स्वाहा, प्रजात्यै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'रेतसे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थर्म डाल देता है ॥ २ ॥ 'अग्नये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'सोमाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें

हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'भुवः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'स्वः स्वाहा' इम मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'भूर्भुवः स्वः म्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमे टाल देता है। 'ब्रह्मणे स्वाहा' इम मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'क्षत्राय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूताय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भविष्यते स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'विश्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'सर्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'प्रजापतये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ ३ ॥ इसके पश्चात् उस मन्थको 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रद्वारा स्पर्श करता है। [मन्थद्रव्यका अधिष्ठातृदेव प्राण है, इसलिये प्राणसे एकरूप होनेके कारण वह सर्वात्मक है। 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—] तू [ प्राण- रूपसे सम्पूर्ण देहोंमें ] घूमनेवाला है, [ अग्निरूपसे सर्वत्र ] प्रज्वलित होनेवाला है, [ ब्रह्मरूपसे ] पूर्ण है, [ आकाश- रूपसे ] अत्यन्त स्तब्ध ( निष्कम्प ) है, [ सबसे अविरोधी होनेके कारण ] तू यह जगद्रूप एक सभाके समान है, तू ही [ यज्ञके आरम्भमे प्रस्तोताके द्वारा ] हिङ्कृत है, तथा [ उच्चै प्रस्तोताद्वारा यज्ञमे ] तू ही हिङ्क्रियमाण है, [ यज्ञारम्भमें उद्गाताद्वारा ] तू ही उच्च स्वरसे गाया जानेवाला उद्गीथ है और [ यज्ञके मध्यमें उसके द्वारा ] तू ही उद्गीयमान है। तू ही [ अध्वर्युद्वारा ] श्रावित और [ आग्नीध्रद्वारा ] प्रत्याश्रावित हे; आर्द्र (अर्थात् मेघ) में सम्यक् प्रकारसे दीप्त है, तू विभु (विविधरूप होनेवाला) है और प्रभु (समर्थ) है; तू [भोक्ता अग्निरूपसे] ज्योति है, [कारणरूपसे ] सबका प्रलयस्थान है तथा [ सबका सहार करनेवाला होनेसे ] सर्वगं है ॥ ४ ॥ फिर 'आम५सि आमन्धि' इत्यादि मन्त्रसे इसे ऊपर उठाता हे । [ इस मन्त्रका अर्थ—] 'आमंसि'—तू मब जानता है,

  • कुशोसे बुहारना । † गोबर और जलसे वेदीको लीपना । ‡ जहाँ-जहाँ 'स्वाहा' आये, वहाँ आहुति देनी चाहिये । उ० अ० ६४—

५०६ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ६ 'आर्माहि ते महि'—मैं तेरी महिमाको अच्छी तरह जानता उस इस मन्थका उद्दालक आरुणिने अपने शिष्य हूँ । वह प्राण राजा, ईशान ( ईश्वर ) और अधिपति है । वाजसनेय याज्ञवल्क्यको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई वह मुझे राजा, ईशान और अधिपति करे ॥ ५ ॥ इस मन्थको सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न इसके पश्चात् 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' इत्यादि मन्त्रसे इस हो जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका मन्थको भक्षण करता है । [ 'तत्सवितुः' इत्यादि मन्त्रका वाजसनेय याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य मधुक पैङ्ग्यको उपदेश अर्थ—] 'तत्सवितुर्वरेण्यम्'—सूर्यके उस वरेण्य-श्रेष्ठ पदका करके कहा था, यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें मैं ध्यान करता हूँ । 'वाता मधु ऋतायते'—पवन मधुर, शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस मन्द गतिसे बह रहा है। 'सिन्धवः मधु क्षरन्ति'—नदियों इस मन्थका मधुक पैङ्ग्यने अपने शिष्य चूल भागवित्ति को मधु-रसका स्राव कर रही हैं। 'नः ओषधीः माध्वीः सन्तु'— उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा हमारे लिये ओषधियाँ मधुर हों । 'भूः स्वाहा' [ यहाँतक- तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पत्ते निकल आवेंगे।' के मन्त्रसे मन्थका पहला ग्रास भक्षण करे । ] 'देवस्य भर्गः धीमहि'—हम सवितादेवके तेजका ध्यान करते हैं। 'नक्तमुत उस इस मन्थका चूल भागवित्तिने अपने शिष्य जानकि उषसः मधु'—रात और दिन सुखकर हों। 'पार्थिव रजः आयस्थूणको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे मधुमत्'—पृथिवीके धूलिकण उद्वेग न करनेवाले हों । 'द्यौः ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पिता नः मधु अस्तु'—पिता द्युलोक हमारे लिये सुखकर हो । पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका जानकि आयस्थूणने 'भुवः स्वाहा' [ यहाँतकके मन्त्रसे दूसरा ग्रास भक्षण अपने शिष्य सत्यकाम जाबालको उपदेश करके कहा था, 'यदि करे ] । 'धियः नः प्रचोदयात्'—जो सवितादेव कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करता है। 'नः वनस्पतिः मधुमान्'— जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका सत्यकाम हमारे लिये वनस्पति ( सोम ) मधुर रसमय हो । 'सूर्यः जाबालने अपने शिष्योंको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई मधुमान् अस्तु'—सूर्य हमारे लिये मधुमान् हो । 'गावः नः इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी माध्वीः भवन्तु'—किरणें अथवा दिशाएँ हमारे लिये सुखकर और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका, जो पुत्र या हों । 'स्वः स्वाहा' [ यहाँतकके मन्त्रसे तृतीय ग्रास शिष्य न हो, उसे उपदेश न करे ॥ ७-१२ ॥ भक्षण करे ] । इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री ( गायत्रीमन्त्र ), यह मन्थकर्म चतुरौदुम्बर ( चार औदुम्बरकाष्ठके बने 'मधु वाता ऋतायते' इत्यादि समस्त मधुमती ऋचा और पदार्थोंवाला ) है । इसमे औदुम्बरकाष्ठ ( गूलरकी लकड़ी ) 'अहमेवेद सर्वं भूयासम्' (यह सब मैं ही हो जाऊँ) 'भूर्भुवः का स्रुव, औदुम्बरकाष्ठका चमस, औदुम्बरकाष्ठका इध्म और स्वाहा'—इस प्रकार कहकर अन्तमें समस्त मन्थको भक्षण- औदुम्बरकाष्ठकी दो उपमन्थनी होती हैं। इसमें व्रीहि ( धान ), कर, दोनों हाथ धो, अग्निके पश्चिम भागमे पूर्वकी ओर सिर यव (जौ ), तिल, माष (उड़द ), अणु (सावाँ ), प्रियङ्गु करके बैठता है। प्रातःकालमें 'दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं ..... ( काँगनी ), गोधूम (गेहूँ ), मसूर, खल्व (वाल ) और भूयासम्' इस मन्त्रद्वारा आदित्यका उपस्थान ( नमस्कार ) खलकुल (कुलथी)—ये दस ग्रामीण अन्न उपयुक्त होते करता है । फिर जिस मार्गसे गया होता है, उसीसे लौटकर हैं। उन्हें पीसकर दही, मधु और घृतमे मिलाकर घृतसे हवन अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ आगे कहे जानेवाले ] वंशको करता है ॥ १३ ॥ जपता है ॥ ६ ॥ चतुर्थ सन्तानोत्पत्ति-विज्ञान ( इच्छानुसार सद्गुणयुक्त सन्तान उत्पन्न करने, सर्वथा चराचर समस्त भूतोंका रस-सार अथवा आधार पृथिवी है, न उत्पन्न करने तथा संयमयुक्त जीवन-निर्माण करनेकी युक्ति पृथिवीका रस जल है, जलका रस—उसपर निर्भर करनेवाली बतलानेके लिये इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है, मन्थाख्य ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस—सार पुष्प है, पुष्पका रस कर्मकर्ता प्राणदर्शी पुरुषका ही इसमें अधिकार है।) फल है, फलका रस—आधार पुरुष है, पुरुषका रस—सार १. दिशाओंका एक पुण्डरीक ( अर्थात् अखण्ड श्रेष्ठ ) है, मैं मनुष्योंमें एक पुण्डरीक होऊँ ।

४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०७ शुक्र है। प्रसिद्ध प्रजापतिने विचार किया कि इस शुक्रकी मन्त्रोपासक अपनी पत्नीको कामनापरायण करना चाहे तो उस उपयुक्त प्रतिष्ठाके लिये कोई आधार चाहिये, इसलिये उसने समय वह 'अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे । स स्त्रीकी सृष्टि की और उसके अधोभाग-सेवनका विधान किया। त्वमङ्गकषायोसि दिग्धविद्धमिव मादयेमाममूं मयि ।' मन्त्र- ( यहाँ यदि यह कहा जाय कि इस पाशविक क्रियामें तो प्राणि- का जप करे । मात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, इसके लिये विधान क्यों किया यदि किसी कारणवश गर्भनिरोधकी आवश्यकता हो तो गया, तो इसका उत्तर यह है कि यह विधान इसीलिये बनाया उस समय 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' मन्त्रका जाप करे । गया कि जिसमें पुरुषोंकी स्वेच्छाचारिताका निरोध हो और ऐसा करनेपर पत्नी गर्भवती नहीं होगी *। और यदि यह इच्छा इस विज्ञानसे परिचित पुरुषोंके द्वारा केवल श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्तिके हो कि पत्नी गर्भधारण करे तो उस समय 'इन्द्रियेण ते रेतसा लिये ही इसका सेवन किया जाय।) इसके लिये प्रजापतिने रेत आदधामि' इस मन्त्रका पाठ करे; इससे वह निश्चय ही प्रजनननेन्द्रियको उत्पन्न किया । अतएव इस विषयसे घृणा नहीं गर्भवती हो जायगी । करनी चाहिये। अरुणके पुत्र विद्वान् उद्दालक और नाक- यदि कभी अपनी भार्याके साथ किसी जारका सम्बन्ध हो मौद्गल्य तथा कुमारहारीत ऋषिने भी कहा है कि बहुत-से ऐसे जाय और उसे दण्ड देना हो तो पहले कच्ची मिट्टीके बरतनमें अग्नि मरणधर्मा, नामके ब्राह्मण हैं जो निरिन्द्रिय, सुकृतहीन, मैथुन- स्थापन करके समस्त कर्मोंको विपरीत रीतिसे करे और कुछ सरके विज्ञानसे अपरिचित होकर भी मैथुन-कर्ममें आसक्त होते हैं, तिनकोंके अग्रभागको घीमें भिगोकर विपरीत क्रमसे ही उनका उनकी परलोकमें दुर्गति होती है। (इससे अशास्त्रीय तथा होम करे। आहुतिके पहले 'मम समिद्धेऽहौषी. प्राणापानौ त अंधाध मैथुन-कर्मका पापहेतुत्व सूचित किया गया है।) आददेऽसौ' आदि मन्त्रोंका पाठ करके अन्तमें प्रत्येक बार इस प्रकार मन्थ-कर्म करके ब्रह्मचर्यधारणपूर्वक पुरुषको 'असौ' बोलकर उसका नाम ले। इस प्रकार करनेसे वह पुण्य- पत्नीके ऋतुकालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। यदि इस बीचमें से स्खलित होकर मृत्युको प्राप्त हो जाता है। स्वप्नदोषादिके द्वारा शुक्र क्षरण हो जाय तो उसकी पुनः प्राप्ति ऋतुमती पत्नीका त्रिरात्र ब्रह्म (तीन रात्रियोंका पृथक् तथा वृद्धिके लिये 'यन्मेऽद्य रेत पृथिवीमस्कान्त्सीद्यदोषधी- निवासादि) समाप्त होनेपर स्नान करनेके बाद उसे धान रप्यसरद्यदपः, इदमह तद्रेत आददे ।' तथा 'पुनर्मा- कूटना आदि गृहस्थीका काम करना चाहिये। तीन दिनोंतक मैत्विन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः । पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं उसे अलग रहना चाहिये, किसीका स्पर्श नहीं करना चाहिये। कल्पन्ताम् ।' इन मन्त्रोंका पाठ करे। (इससे स्वप्नदोषादि जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र गौरवर्ण हो, एक वेदका व्याधियोंका नाश होता है।) अध्ययन करनेवाला हो और पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे, यदि कदाचित् जलमें अपनी छाया दीख जाय तो 'मयि उसको दूध-चावलकी खीर बनाकर उसमें घी मिलाकर पत्नी- तेज इन्द्रियं यशो द्रविणम् सुकृतम् ।' (मुझे तेज, इन्द्रिय- सहित खाना चाहिये । जो कपिलवर्ण, दो वेदोंका अध्ययन शक्ति, यश, धन और पुण्यकी प्राप्ति हो) इस मन्त्रको पढे। ऋतु- करनेवाला और पूर्णायु पुत्र चाहता हो, उसको दहींमें चावल कालकी तीन रात बीतनेपर जब पत्नी स्नान करके शुद्ध हो जाय, पकाकर पत्नीसहित खाना चाहिये। जो श्यामवर्ण, रक्तनेत्र, तब 'स्त्रियोंमें मेरी यह पत्नी लक्ष्मीके समान है, इसलिये निर्मल वस्त्र वेदत्रयीका अध्ययन करनेवाले, पूर्णायु पुत्रकी इच्छा करता हो, पहने हुए है' यह विचारकर उस यशस्विनी पत्नीके समीप जाकर उसे जलमें चावल (भात) पकाकर घी मिलाकर पत्नीसहित 'हम दोनों सन्तानोत्पादनके लिये क्रिया करेंगे' कहकर आमन्त्रण खाना चाहिये। जो चाहता हो कि मेरे पूर्ण आयुवाली करे । लज्जा अथवा हठवश स्त्री यदि मिथुन-धर्मके लिये विदुषी कन्या हो, उसे तिल-चावलकी खिचड़ी बनाकर पत्नी- अस्वीकार करे तो उसे आभरणादिद्वारा तथा अभिशापादि- सहित खाना चाहिये। और जो चाहता हो कि मेरा पुत्र द्वारा प्रेरित करे। पुरुषके 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आददे' इस मन्त्रयुक्त अभिशापसे स्त्री अयशस्विनी—वन्ध्या हो जाती है। * आजकल गर्भनिरोधके लिये कैसी-कैसी तामसी क्रियाएं की परन्तु यदि स्त्री अपने स्वामीकी अभिलाषा पूर्ण करती है तो स्वामीके जाती हैं, पर ये होती हैं प्राय असमयकी वृद्धिके लिये । और यह 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि' इस मन्त्रपाठपूर्वक वैदिक प्रक्रिया भी अपनी धर्मपत्नीको कभी गर्भधारण न कराना हो उपगत होनेसे पत्नी निश्चय ही यशस्विनी—पुत्रवती होती है।, तो उनके लिये । सयमी पुरुष ही ऐसा कर सकते थे ।

५०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

५०८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ६ प्रसिद्ध पण्डित, वेदवादियोंकी सभामें जानेवाला, सुन्दर वाणी — अनुसार घीका संस्कार ( शोधन ) करके और चरुपाक बना- बोलनेवाला, सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करनेवाला और पूर्ण कर 'अग्नये स्वाहा', 'अनुमतये स्वाहा' एव 'देवाय सवित्रे आयुष्मान् हो, वह उड़द-चावलकी खिचड़ी पकाकर उसमें सत्यप्रसवाय स्वाहा' इन मन्त्रोंसे अग्निमें आहुतियाँ देनी 'उक्षन्'* अथवा 'ऋषभ'† नामक बल-वीर्यवर्द्धक ओषधि चाहिये । होम समाप्त करके चरुमें बचा हुआ भोजन करके मिलाकर घृतसहित पति-पत्नी दोनों भोजन करें । शेष पत्नीको भोजन कराना चाहिये । फिर हाथ धोकर जलका गर्भाधान करनेवालेको प्रातःकाल ही स्थालीपाकविधिके कलश भरके 'उत्तिष्ठातोविश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सह' मन्त्रके द्वारा पत्नीका तीन बार अभ्युक्षण (अभिषेचन)

  • 'उक्षन्' शब्दके कोषमें दो प्रकारके अर्थ मिलते हैं। कलकत्ते- करना चाहिये । से प्रकाशित 'वाचस्पत्य' नामक बृहत् संस्कृताभिधानमें उसे अष्ट- वर्गान्तर्गत 'ऋषभ' नामक ओषधिका पर्याय माना गया है— तदनन्तर पति अपनी कामनाके अनुसार पत्नीको भोजन 'ऋषभौषधौ च' । प्रसिद्ध अग्रेज विद्वान् सर मोनियर विलियम्सने कराके शयनके समय बुलाकर कहे कि "देखो, मैं अम ( प्राण ) अपने. बृहत् संस्कृत-अंग्रेजी कोषमें इसे 'सोम' नामक पौधेका हूँ और तुम प्राणरूप मेरे अधीन वाक् हो । मैं साम हूँ और पर्याय माना है । तुम सामका आधाररूप ऋक् हो, मैं आकाश हूँ और तुम पृथिवी † 'ऋषभ' नामक ओषधिका आयुर्वेदके अत्यन्त प्राचीन एव हो। अतएव आओ, तुम-हम दोनों मिलें, जिससे हमें पुत्र- प्रामाणिक ग्रन्थ 'सुश्रुत-संहिता' के 'सूत्रस्थान' नामक प्रथम खण्डके सन्तान और तदनुगत धनकी प्राप्ति हो । इसके पश्चात् 'द्यावा ३८ वें अध्यायमें (जो द्रव्यसङ्ग्रहणीयाध्याय भी कहलाता है) सैंतीस पृथिवी' इत्यादि मन्त्रसे सम्बोधन करके 'विष्णुर्योनि' इत्यादि द्रव्यगणोंके अन्तर्गत उल्लेख हुआ है। 'भावप्रकाश' नामक प्रसिद्ध मन्त्रके अनुसार प्रार्थना करे "भगवान् विष्णु तुम्हारी जनने- संग्रह-ग्रन्थमें उसका वर्णन इस रूपमें आया है— न्द्रियको पुत्रोत्पादनमें समर्थ करें, त्वष्टा सूर्य रूपोंको दर्शन- जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ । योग्य करें, विराट् पुरुष प्रजापति रेतस्सेचन करायें, सूत्रात्मा रसोतकन्दवत्कन्दौ नि सारौ सूक्ष्मपत्रकौ ॥ विधाता तुममे अभिन्नभावसे स्थित होकर गर्भ धारण करें। ऋषभो वृषभद्भवः । सिनीवाली नामकी अत्यन्त सुन्दर देवता तुममें अमेदरूपसे ॥ एवं पृथुष्टुका नामकी महान् स्तुतिशाली देवता भी तुममें हैं। ऋषभो वृषभो वीरो विषाणी शृङ्ग इत्यादि । मैं उनसे प्रार्थना करता हूँ कि 'हे सिनीवालि ! हे पृथुष्टुके ! तुम जीवकऋषभकौ वल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ । इस गर्भको धारण करो।' दोनों अश्विनीकुमार अथवा चन्द्र- मधुरौ पित्तदाहघ्नौ काशवातक्षयावहौ ॥ सूर्य तुम्हारे साथ रहकर इस गर्भको धारण करें।" 'जीवक और ऋषभक (ऋषभ) नामकी ओषधियाँ हिमालय- "दोनों अश्विनीकुमार हिरण्मय दो अरणियोंके द्वारा मन्थन के शिखरपर उत्पन्न होती हैं। उनकी जड़ लहसुनके सदृश होती करते हैं। मैं दसवें मासमें प्रसव होनेके लिये गर्भाधान करता है। दोनोंमें ही गूदरा नहीं होता, केवल त्वचा होती है, दोनोंमें हूँ । पृथ्वी जैसे अग्निगर्भा है, आकाश जैसे सूर्यके द्वारा गर्भ- छोटी-छोटी पत्तियाँ होती हैं। इनमेंसे ऋषभ बैलके सींगकी आकृति- वती है, दिशाएँ जैसे वायुके द्वारा गर्भवती हैं, मैं तुमको उसी का होता है। इसके दूसरे नाम हैं—वृषभ, वीर, विषाणी, शृङ्ग प्रकार गर्भ अर्पण करके गर्भवती करता हूँ।" यों कहकर आदि । जीवक और ऋषभ दोनों ही बलकारक, शीतवीर्य, गर्भाधान करे। वीर्य और कफ बढ़ानेवाले, मधुर, पित्त और दाहका शमन करने- तदनन्तर सुखपूर्वक प्रसव हो जाय, इसके लिये 'यथावायुः' वाले तथा खाँसी, वायु एव यक्ष्माको दूर करनेवाले हैं। इत्यादि मन्त्रके द्वारा आसन्नप्रसवा पत्नीका अभिषेचन करे और ऋषभकी प्रसिद्ध अष्टवर्ग नामक ओषधियोंमें गणना है। कहे—'जैसे वायु पुष्करिणीको सब ओरसे हिला देता है, वैसे भावप्रकाशकार लिखते हैं— ही तुम्हारा गर्भ भी अपने स्थानसे खिसककर जेरके साथ जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके । बाहर निकल आये। तुम्हारे तेजस्वी गर्भका मार्ग रुका हुआ अष्टवर्गोऽप्यभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ॥ है और चारों ओर जेरसे घिरा है। गर्भके साथ उस जेरको

ब्राह्मण ५ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५०९

ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०९ भी निकाल बाहर करें; और गर्भ निकलनेके समय जो मास- पेशी बाहर निकला करती है, वह भी निकल जाय।' पश्चात् पुत्रका जन्म हो जानेपर अभिख्यापन करके पुत्र- को गोदमें ले और आज्यस्थालीमें दही मिला हुआ घृत रख- कर उसे थोड़ा-थोड़ा लेकर यह कहता हुआ बार-बार अग्निमें होम करे कि 'इस अपने घरमें मैं पुत्ररूपसे बढ़कर सहस्रों मनुष्यों- का पालन करूँ, मेरे इस पुत्रके वंशमें सन्तान लक्ष्मी तथा पशु-सम्पत्ति लगातार बनी रहे; मुझमें (पितामे) जो प्राण (इन्द्रियाँ) हैं, वे सभी मन-ही मन मैं तुम्हे (पुत्रको) दे रहा हूँ; मेरे इस कर्ममें कोई न्यूनाधिकता हो गयी हो तो विद्वान् एवं वाञ्छापूरक अग्नि उसे पूर्ण कर दें।' तदनन्तर पिता बालकके दाहिने कानमें अपना मुख लगाकर 'वाक्, वाक्, वाक्' इस प्रकार तीन बार जप करे । तदनन्तर दधि, मधु और घृत मिलाकर पास ही रक्खे हुए सोनेके पात्रके द्वारा क्रमशः— 'भूस्ते दधामि', 'भुवस्ते दधामि', 'स्वस्ते दधामि', 'भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि' —यों कहकर चार बार उसे चटाये । फिर पिता उस पुत्रका 'वेदोऽसि' बोलकर 'नामकरण' करे—'वेद' यह नाम रक्खे । उसका यह नाम अत्यन्त गोपनीय होता है । इसे सर्व- साधारणमें प्रकट नहीं करना चाहिये । इसके बाद गोदमें स्थित उस शिशुको माताकी गोदमें रखकर तथा स्तन देकर इस मन्त्रका पाठ करे— 'यस्ते स्तन शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः । येन विश्वा पुष्यसि वीर्याणि सरस्वति तमिह धातवेकः।' अर्थात् 'हे सरस्वति ! तुम्हारा जो स्तन दूधका अक्षय भंडार तथा पोषणका आधार है, जो रत्नोंकी खान है तथा सम्पूर्ण धन-राशिका ज्ञाता एव उदार दानी है, और जिसके द्वारा तुम समस्त वरणीय पदार्थोंका पोषण करती हो, तुम इस सत्पुत्रके जीवन धारणार्थ उस स्तनको मेरी भार्यामें प्रविष्ट करा दो।' तदनन्तर बालककी माताको इस प्रकार अभिमन्त्रित करे— उसे सम्बोधन करके कहे, 'तुम ही स्तुतिके योग्य मैत्रा- वरुणी (अरुन्धती) हो, हे वीरे ! तुमने वीर पुत्रको जन्म देकर हमे वीरवान्—वीर पुत्रका पिता बनाया है, अतः तुम वीर- वती होओ। इसे लोग कहें—तू सचमुच अपने पितासे भी आगे बढ़ गया, तू निस्सन्देह अपने पितामहसे भी श्रेष्ठ निकला।' इस प्रकारके विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मणके जो पुत्र होता है, वह श्री, यश और ब्रह्मतेजके द्वारा सर्वोच्च स्थितिको प्राप्त कर लेता है ॥ १-२८॥ पञ्चम ब्राह्मण समस्त प्रवचनकी परम्पराका वर्णन अब वंश (परम्परा) का वर्णन किया जाता है—पौतिमापी- पुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, कात्यायनीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, गौतमी- पुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरी- पुत्रने औपस्वस्तीपुत्रसे, औपस्वस्तीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, कात्यायनीपुत्रने कौशिकीपुत्रसे, कौशिकीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे और वैयाघ्रपदीपुत्रसे, वैयाघ्रपदी- पुत्रने काण्वीपुत्रसे तथा कापीपुत्रसे, कापीपुत्रने आत्रेयीपुत्रसे, आत्रेयीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, गौतमीपुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वात्सीपुत्रसे, वात्सी- पुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, वार्कारुणी- पुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, वार्कारुणीपुत्रने आर्त्तभागीपुत्रसे, आर्त्तभागीपुत्रने शौङ्गीपुत्रसे, शौङ्गीपुत्रने साङ्कतीपुत्रसे, साङ्कती- पुत्रने आलम्बायनीपुत्रसे, आलम्बायनीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे, आलम्बीपुत्रने जायन्तीपुत्रसे, जायन्तीपुत्रने माण्डूकायनीपुत्रसे, माण्डूकायनीपुत्रने माण्डूकीपुत्रसे, माण्डूकीपुत्रने शाण्डिलीपुत्रसे, शाण्डिलीपुत्रने राथीतरीपुत्रसे, राथीतरीपुत्रने भालुकीपुत्रसे, भालुकीपुत्रने दो कौञ्चिकीपुत्रोंसे, दोनों कौञ्चिकीपुत्रोंने वैदभृती- पुत्रसे, वैदभृतीपुत्रने काशकेयीपुत्रसे, काशकेयीपुत्रने प्राचीन- योगीपुत्रसे, प्राचीनयोगीपुत्रने साञ्जीवीपुत्रसे, साञ्जीवीपुत्रने आसुरिवासी प्राश्नीपुत्रसे, प्राश्नीपुत्रने आसुरायणसे, आसुरायण- ने आसुरिसे, आसुरिने याज्ञवल्क्यसे, याज्ञवल्क्यने उद्दालक- से, उद्दालकने अरुणसे, अरुणने उपवेशिसे, उपवेशिने कुश्रिसे, कुश्रिने वाजश्रवससे, वाजश्रवाने जिह्वावान् बाध्योगसे, जिह्वावान् बाध्योगने असित वार्षगणसे, असित वार्षगणने हरित कश्यपसे, हरित कश्यपने शिल्प कश्यपसे, शिल्प कश्यपने कश्यप

५१० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ६ नैध्रुविसे, कश्यप नैध्रुविने वाक्से, वाक्ने आम्भिणीसे, आम्भिणी- ने वामकक्षायणसे, वामकक्षायणने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने ने आदित्यसे, आदित्यसे प्राप्त हुई ये शुक्लयजुः श्रुतियाँ वाजसनेय वात्स्यसे, वात्स्यने कुश्रिसे, कुश्रिने यज्ञवचा राजस्तम्बायनसे, याज्ञवल्क्यद्वारा प्रसिद्ध की गयीं । साञ्जीवी पुत्रपर्यन्त यह यज्ञवचा राजस्तम्बायनने तुर कावषेयसे, तुर कावषेयने प्रजापति- एक ही वंश है । साञ्जीवीपुत्रने माण्डूकायनिसे, माण्डूकायनि- से और प्रजापतिने ब्रह्मसे । ब्रह्म स्वयम्भू है, स्वयम्भू ब्रह्मको ने माण्डव्यसे, माण्डव्यने कौत्ससे, कौत्सने माहित्थिस, माहित्थि- नमस्कार है ॥ १-४ ॥ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥ ॥ शुक्लयजुर्वेदीय बृहदारण्यकोपनिषद् समाप्त ॥ ॥ ॐ तत्सत् ॥ शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कौषी कि णोपनिषद्

शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ ऐतरेयोपनिषद्के आरम्भमें छप चुका है ।

प्रथम अध्याय पर्यङ्क-विद्या

गर्गके प्रपौत्र सुप्रसिद्ध महात्मा चित्र यज्ञ करानेवाले थे । इसके लिये उन्होंने अरुणके पुत्र उद्दालकको प्रधान ऋत्विक्के रूपमें वरण किया । परंतु उन प्रसिद्ध उद्दालक मुनिने स्वयं न पधारकर अपने पुत्र श्वेतकेतुको भेजा और कहा—'वत्स ! तुम जाकर चित्रका यज्ञ कराओ।' श्वेतकेतु यज्ञमें पधारकर एक ऊँचे आसनपर विराजमान हुए । उन्हें आसनपर बैठे देख चित्रने पूछा—'गौतम-कुमार ! इस लोकमें कोई ऐसा आवृत्त (आवरणयुक्त) स्थान है, जिसमें मुझे ले जाकर रक्खोगे ? अथवा कोई उससे भिन्न—सर्वथा विलक्षण आवरण- शून्य पद है, जिसे जानकर तुम उसी लोकमें मुझे स्थापित करोगे ?' श्वेतकेतुने कहा—'मैं यह सब नहीं जानता । किंतु यह प्रश्न सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई है । मेरे पिता आचार्य हैं— वे शास्त्रके गूढ अर्थका ज्ञान रखते, दूसरे लोगोंको शास्त्रीय आचारमें लगाते और स्वय भी शास्त्रके अनुकूल ही आचरण करते हैं; अतः उन्हींसे यह बात पूछूँगा।' यों कहकर वे अपने पिता आरुणि (उद्दालक) के पास गये और प्रश्नको सामने रखते हुए बोले—'पिताजी ! चित्रने इस इस प्रकारसे मुझसे प्रश्न किया है । सो इसके सम्बन्धमें मैं किस प्रकार उत्तर दूँ ?' उद्दालकने कहा—'वत्स ! मैं भी इस प्रश्नका उत्तर नहीं जानता । अब हमलोग महाभाग चित्रकी यज्ञशालामें ही इस तत्त्वका अध्ययन करके इस विद्याको प्राप्त करेंगे । जब दूसरे लोग हमें विद्या और धन देते हैं तो चित्र भी देंगे ही । इसलिये आओ, हम दोनों चित्रके पास चलें।' वे प्रसिद्ध आरुणि मुनि हाथमें समिधा ले जिज्ञासुके वेषमें गर्गके प्रपौत्र चित्रके यहाँ गये । 'मैं विद्या ग्रहण करनेके लिये तुम्हारे पास आया हूँ' इस भावनाको व्यक्त करते हुए उन्होंने चित्रके समीप गमन किया । उन्हें इस प्रकार आया देख चित्रने कहा—'गौतम ! तुम ब्राह्मणोंमें पूजनीय एव ब्रह्मविद्याके अधिकारी हो; क्योंकि मेरे-जैसे लघु व्यक्तिके पास आते समय तुम्हारे मनमें अपने बड़प्पनका अभिमान नहीं हुआ है । इसलिये आओ, तुम्हें निश्चय ही इस पूछे हुए विषयका स्पष्ट ज्ञान कराऊँगा' ॥ १ ॥ सुप्रसिद्ध यज्ञकर्ता चित्रने इस प्रकार उपदेश आरम्भ किया—ब्रह्मन् ! जो कोई भी अग्निहोत्रादि सत्कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले लोग हैं, वे सब के सब जब इस लोकसे प्रयाण करते हैं तो (क्रमशः धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन आदिके अभिमानी देवताओंके अधिकारमें होते हुए अन्ततोगत्वा) चन्द्रलोक अर्थात् स्वर्गमें ही जाते हैं । उनके प्राणों (इन्द्रियों और प्राणों) से चन्द्रमा शुक्लपक्षमें पुष्टिको प्राप्त होते हैं । वे (चन्द्रमा) कृष्णपक्षमें उन स्वर्गवासी जीवोंकी तृप्ति नहीं कर पाते ।

निश्चय ही यह स्वर्गलोकका द्वार है, जो कि चन्द्रमाके नामसे प्रसिद्ध है । जो अधिकारी ( दैवी- सम्पत्तिसे युक्त होनेके कारण ) उस स्वर्गरूपी चन्द्रमाका प्रत्याख्यान कर देता है अर्थात् जहाँसे पुनः नीचे गिरना पड़ता है, ऐसा स्वर्गलोक मुझे नहीं चाहिये—इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके जो निष्काम धर्मका अनुष्ठान करते हुए चन्द्रलोकको त्याग देता है, उस पुरुषको उसका वह शुभ संकल्प चन्द्रलोकसे भी ऊपर नित्य ब्रह्मलोकमे पहुँचा देता है । परंतु जो स्वर्गीय सुखके प्रति ही आसक्त होनेके कारण उस चन्द्रलोकको अस्वीकार नहीं करता, उस सकामकर्मी स्वर्गवासी- को, उसके पुण्य भोगकी समाप्ति होनेपर, देववर्ग वृष्टिके रूपमें परिणत करके इस लोकमें ही पुनः बरसा देता है।

वह वर्षाके रूपमें यहाँ आया हुआ अनुशयी जीव अपनी पूर्व-वासनाके अनुसार कीट अथवा पतङ्ग या पक्षी, अथवा व्याघ्र या सिंह अथवा मछली, या साँप-बिच्छू अथवा मनुष्य या दूसरा कोई जीव होकर इनके अनुकूल शरीरोंमें अपने कर्म और विद्या—उपासनाके अनुसार जहाँ-कहाँ उत्पन्न होता है।

( इस प्रकार संसारकी स्वर्ग-नरकरूपा दुर्गतिको समझ- कर जो उससे विरक्त हो चुका है और ज्ञानोपदेशके लिये गुरुदेवकी शरणमें आया है ) उस अपने समीप आये हुए शिष्यसे दयालु एवं तत्त्वज्ञ गुरु इस प्रकार पूछे—'वत्स ! तुम कौन हो ?' गुरुके इस प्रकार प्रश्न करनेपर शिष्य ( अपनेको देहादि-सङ्घातरूप मानकर ) यों उत्तर दे—'हे देवगण ! जो पञ्चदशकलात्मक—शुक्ल और कृष्णपक्षके हेतुभूत, श्रद्धाद्वारा प्रकट, पितृलोकरूप स्वरूप एवं नाना प्रकारके भोग प्रदान करनेमें समर्थ है, उन चन्द्रमाके निकटसे प्रादुर्भूत होकर पुरुषरूप अग्निमें स्थापित हुआ जो श्रद्धा, सोम, वृष्टि और अन्नका परिणाम- भूत वीर्य है, उस वीर्यके ही रूपमें स्थित हुए मुझ अनुशयी जीवको तुमने वीर्याधान करनेवाले पुरुषमें प्रेरित किया । तत्पश्चात् गर्भाधान करनेवाले पुरुष (पिता) के द्वारा तुमने मुझे माताके गर्भमें भी स्थापित करवाया । कुछ सम्वत्सरोंतक जीवन धारण करनेवाले पिताके साथ मैं एकताको प्राप्त हुआ था । मैं स्वयं भी कुछ सम्वत्सरोंतक ही जीवन धारण करनेवाला होकर ब्रह्मज्ञान अथवा उसके विपरीत मिथ्याज्ञानके निमित्त योनिविशेष- में शरीर धारण करके स्थित हूँ। इसलिये अब मुझे अमृतत्वकी प्राप्तिके साधनभूत ब्रह्मज्ञानके लिये अनेक ऋतुओं ( वर्षों ) तक अक्षय रहनेवाली दीर्घ आयु प्रदान करें—ब्रह्मसाक्षात्कार- पर्यन्त मेरे दीर्घजीवनके लिये चिरस्थायिनी आयुकी पुष्टि करें।

क्योंकि यह जानकर मैं देवताओंसे प्रार्थना करता हूँ, अतः उसी सत्यसे, उसी तपस्यासे, जिनका मैं अभी उल्लेख कर आया हूँ, मैं ऋतु हूँ—संवत्सरादिरूप मरणधर्मा मनुष्य हूँ । आर्तव हूँ—ऋतु अर्थात् रज-वीर्यसे उत्पन्न देह हूँ। यदि ऐसी बात नहीं है तो आप ही कृपापूर्वक बतायें, मैं कौन हूँ ? क्या जो आप हैं, वही मैं भी हूँ ?' उसके इस प्रकार कहनेपर संसार-भयसे डरे हुए उस शिष्यको गुरु ब्रह्मविद्याके उपदेश- द्वारा भवसागरसे पार करके बन्धनमुक्त कर देता है ॥ २ ॥

वह परब्रह्मका उपासक पूर्वोक्त देवयान-मार्गपर पहुँचकर पहले अग्निलोकमें आता है, फिर वायुलोकमें आता है; वहाँसे वह सूर्यलोकमें आता है, तदनन्तर वरुणलोकमें आता है; तत्पश्चात् वह इन्द्रलोकमें आता है, इन्द्रलोकसे प्रजापति- लोकमें आता है तथा प्रजापतिलोकसे ब्रह्मलोकमें आता है। इस प्रसिद्ध ब्रह्मलोकके प्रवेश-पथपर पहले 'आर' नामसे प्रसिद्ध एक महान् जलाशय है। (यह उस मार्गका विघ्न है, काम- क्रोधादि अरियों—शत्रुओं द्वारा निर्मित होनेसे ही उसका नाम 'आर' पड़ा है ।) उस जलाशयसे आगे मुहूर्ताभिमानी* देवता हैं, जो काम-क्रोध आदिकी प्रवृत्ति उत्पन्न करके ब्रह्म- लोक-प्राप्तिके अनुकूल की हुई उपासना और यज्ञ-यागादिके पुण्यको नष्ट करनेके कारण 'येष्टिहा' कहलाते हैं। उससे आगे विजरा नदी है, जिसके दर्शनमात्रसे जराव्यवस्था दूर हो जाती है। (यह नदी उपासनारूपा ही है ।) उससे आगे 'इल्य' नामक वृक्ष है। 'इला' पृथिवीका नाम है, उसका ही स्वरूप होनेसे उसका नाम 'इल्य' है। उससे आगे अनेक देवताओं- द्वारा सेव्यमान उद्यान, बावली, कुएँ, तालाब और नदी आदि भाँति-भाँतिके जलाशयोंसे युक्त एक नगर है, जिसके एक ओर तो विरजा नदी है और दूसरी ओर प्रत्यञ्चाके आकारका ( अर्द्धचन्द्राकार ) एक परकोटा है। उसके आगे ब्रह्माजीका निवासभूत विशाल मन्दिर है, जो 'अपराजित' नामसे प्रसिद्ध है। सूर्यके समान तेजोमय होनेके कारण वह कभी किसीके द्वारा पराजित नहीं होता । मेघ और यज्ञरूपसे उपलक्षित वायु और आकाशरूप इन्द्र और प्रजापति उस ब्रह्म-मन्दिरके द्वाररक्षक हैं।

वहाँ 'विभुप्रमित' नामक सभामण्डप है ( जो अहङ्कार- स्वरूप है )। उसके मध्यभागमें जो वेदी ( चबूतरा ) है, वह 'विचक्षणा' नामसे प्रसिद्ध है। (बुद्धि और महत्तत्त्व आदि

  • दो घड़ी ( ४८ मिनट) के कालको मुहूर्त कहते हैं। † य ईष्टं घ्नन्ति ( जो इष्ट वस्तुकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचाते हैं।

अध्याय १] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५१३

अध्याय १] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५१३ नामोंसे भी उसका प्रतिपादन होता है।) वह अत्यन्त विलक्षण है। जिसके बलका कोई माप नहीं है, वह 'अमितौजाः' प्राण ही ब्रह्माजीका सिंहासन-पलँग है। मानसी (प्रकृति) उनकी प्रिया है। वह मनकी कारणभूता अथवा मनको आनन्दित करनेवाली होनेसे ही मानसी कहलाती है। उसके आभूषण भी उसीके स्वरूपभूत हैं। उसकी छायामूर्ति 'चाक्षुषी' नामसे प्रसिद्ध है। वह तैजस नेत्रोंकी प्रकृति होनेके कारण अत्यन्त तेजोमयी है। उसके आभूषणादि भी उसीके समान तेजोमय हैं। जरायुज, स्वेदज, अण्डज और उद्भिज-इन चतुर्विध प्राणियोंका नाम जगत् है। यह सम्पूर्ण जगत्- जड-चेतन-समुदाय ब्रह्माजीकी वाटिकाके पुष्प तथा उनके धौत एवं उत्तरीयसूप युगल वस्त्र हैं। वहाँकी अप्सराएँ- साधारण युवतियाँ 'अम्बा' और 'आम्बायवी' नामसे प्रसिद्ध हैं। जगज्जननी श्रुतिरूपा होनेसे वे 'अम्बा' कहलाती हैं। तथा 'अम्ब' (अधिक) और अयव (न्यून) भावसे रहित बुद्धि- रूपा होनेसे उनका नाम 'आम्बायवी' है। इसके सिवा वहाँ 'अम्बया' नामकी नदियाँ बहती हैं। अम्बक (नेत्र) रूप ब्रह्मज्ञानकी ओर ले जानेके कारण उनकी 'अम्बया' (अम्बम्- अम्बकम् लक्षीकृत्य यान्ति) संज्ञा है। उस ब्रह्मलोकको जो इस प्रकार जानता है, वह उसीको प्राप्त होता है। उसे जब कोई अमानव पुरुष आदित्यलोकसे ले आता है, उस समय ब्रह्माजी अपने परिचारकों और अप्सराओंसे कहते हैं- 'दौड़ो, उस महात्मा पुरुषका मेरे यशके-मेरी प्रतिष्ठाके अनुकूल स्वागत करो, मेरे लोकमें ले आनेवाली उपासना आदिसे निश्चय ही यह उस विजरा नदीके समीपतक आ पहुँचा है, अवश्य ही अब यह कभी जरावस्थाको नहीं प्राप्त होगा' ॥ ३ ॥ ब्रह्माजीका यह आदेश मिलनेपर उसके पास स्वागतके लिये पाँच सौ अप्सराएँ जाती हैं। उनमेंसे सौ अप्सराएँ तो हाथोंमें हल्दी, केसर और रोली आदिके चूर्ण लिये रहती हैं। सौके हाथोंमें भाँति भाँतिके दिव्य वस्त्र एव अलङ्कार होते हैं। सौ अप्सराएँ हाथोंमें फल लिये होती हैं। सौके हाथोंमें नाना प्रकारके दिव्य अङ्गराग होते हैं। तथा सौ अप्सराएँ अपने हाथोंमें भाँति-भाँतिकी मालाएँ लिये होती हैं। वे उस महात्माको ब्रह्मोचित अलङ्कारोंसे अलङ्कृत करती हैं। वह ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्माजीके योग्य अलङ्कारोंसे अलङ्कृत हो ब्रह्माजीके स्वरूपको ही प्राप्त कर लेता है। फिर वह 'आर' नामक जलाशयके पास आता है और उसे मनके द्वारा- सङ्कल्पसे ही लाँघ जाता है। उस जलाशयतक पहुँचनेपर भी अज्ञानी मनुष्य उसमें डूब जाते हैं। फिर वह ब्रह्मवेत्ता मुहूर्ताभिमानी 'येष्टिह' नामक देवताओंके पास आता है, किंतु वे विघ्नकारी देवता उसके पाससे भाग खड़े होते हैं। तत्पश्चात् वह विजरा नदीके तटपर आता है और उसे भी सङ्कल्पसे ही पार कर लेता है। वहाँ वह पुण्य और पापोंको झाड़ देता है। जो उसके प्रिय कुटुम्बी होते हैं, वे तो उसका पुण्य पाते हैं, और जो उससे द्वेष करनेवाले होते हैं, उन्हें उसका पाप मिलता है। उस विषयमें यह दृष्टान्त है। रथसे यात्रा करने- वाला पुरुष रथको दौड़ाता हुआ रथके दोनों चक्कोंको देखता है; उस समय रथचक्रोंका जो भूमिसे संयोग-वियोग होता है, वह उस द्रष्टाको नहीं प्राप्त होता। इसी प्रकार वह ब्रह्मवेत्ता रात और दिनको देखता है, पुण्य और पापको देखता है, तथा अन्य समस्त द्वन्द्वोंको देखता है; द्रष्टा होनेके कारण ही उसका इनसे सम्बन्ध नहीं होता। अतएव यह पुण्य और पापसे रहित होता है। फलतः वह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मको ही प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ तब वह इल्य वृक्षके पास आता है, उसकी नासिकामें ब्रह्मगन्धका प्रवेश होता है। (वह गन्ध इतनी दिव्य है कि उसके सामने अन्य लोकोंकी सुगन्ध दुर्गन्धवत् प्रतीत होती है।) फिर वह सालज्य नगरके समीप आता है, वहाँ उसकी रसनामें उस दिव्यातिदिव्य ब्रह्मरसका प्रवेश (अनुभव) होता है, जिसका उसे पहले कभी अनुभव नहीं हुआ रहता। फिर वह 'अपराजित' नामक ब्रह्म-मन्दिरके समीप आता है, वहाँ उसमें ब्रह्मतेज प्रवेश करता है। तत्पश्चात् वह द्वार-रक्षक इन्द्र और प्रजापतिके पास आता है; वे उसके सामनेसे मार्ग छोड़कर हट जाते हैं। तदनन्तर वह 'विभुप्रमित' नामक सभा-मण्डपमें आता है; वहाँ उसमें ब्रह्मयश प्रवेश करता है। फिर वह 'विचक्षणा' नामक वेदीके पास आता है। 'वृहत्' और 'रथन्तर'-ये दो साम उसके दोनों अगले पाये हैं और 'श्यैत' एव 'नौधस' नामक साम उसके दोनों पिछले पाये हैं। 'वैरूप' और 'वैराज' नामक साम उसके दक्षिण और उत्तर पार्श्व हैं तथा 'शाक्कर' और 'रैवत' साम उसके पूर्व एव पश्चिम पार्श्व हैं। वह समष्टि-बुद्धिरूपा है। वह ब्रह्मवेत्ता उस बुद्धिके द्वारा विशेष दृष्टि प्राप्त कर लेता है। फिर वह 'अमितौजाः' नामक पलँग (या सिंहासन) के पास आता है, वह पर्यङ्क प्राणस्वरूप है। भूत और भविष्य-ये दोनों काल उसके अगले पाये हैं और श्रीदेवी एव भूदेवी-ये दोनों उसके पिछले पाये हैं। उसके दक्षिण-उत्तर भागमें जो 'अनूच्य' नामके दीर्घ खटवाङ्ग हैं, वे 'बृहत्' और 'रथन्तर' नामक साम हैं और पूर्व- उ० अं० ६५-

५१४ • कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् १ [ अध्याय १

५१४ • कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् १ [ अध्याय १ पश्चिम भागमें जो छोटे खट्वाङ्ग हैं, जिनपर मस्तक और पैर रक्खे जाते हैं, वे 'भद्र' और 'यज्ञायज्ञीय' नामक साम है। (सिरकी ओरका भाग ऊँचा और पैरकी ओरका भाग कुछ नीचा है।) पूर्वसे पश्चिमको जो बड़ी-बड़ी पाटियाँ लगी हैं, वे स्रुक् और सामके प्रतीक ह। तथा दक्षिण-उत्तरकी ओर जो आड़ी-तिरछी पाटियाँ हैं, वे यजुर्वेदस्वरूपा हैं। चन्द्रमाकी कोमल किरणें ही उस पलँगका नरम-नरम गद्दा है। उद्गीथ ही उसपर बिछी हुई उपश्री (श्वेत चादर) है। लक्ष्मीजी तकिया हैं। ऐसे दिव्य पर्यङ्कपर ब्रह्माजी विराजमान होते हैं। इस तत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मवेत्ता उस पलँगपर पहले पैर रखकर चढ़ता है। तब ब्रह्माजी उससे पूछते हैं—'तुम कौन हो?' उनके प्रश्नका वह इस प्रकार उत्तर दे—॥ ५ ॥ 'मैं वसन्त आदि ऋतुरूप हूँ। ऋतुसम्बन्धी हूँ। कारण- भूत अव्याकृत आकाश एवं स्वयंप्रकाश परब्रह्म परमात्मासे उत्पन्न हुआ हूँ। जो भूत (अतीत), भूत (यथार्थ कारण), भूत (जडचेतनमय चतुर्विध सर्ग) और भूत (पञ्चमहाभूतस्वरूप) है, उस संवत्सरका तेज हूँ। आत्मा हूँ। आप आत्मा हैं, जो आप हैं, वही मैं हूँ।' इस प्रकार उत्तर देनेपर ब्रह्माजी पुनः पूछते हैं—'मैं कौन हूँ?' इसके उत्तरमे कहे—'आप सत्य हैं।' 'जो सत्य है, जिसे तुम सत्य कहते हो, वह क्या है?' ऐसा प्रश्न होनेपर उत्तर दे—'जो सम्पूर्ण देवताओ तथा प्राणोंसे भी सर्वथा भिन्न—विलक्षण हो, वह 'सत्' है और जो देवता एव प्राणरूप है, वह 'त्य' है। वाणीके द्वारा जिसे 'सत्य' कहते हैं, वह यही है। इतना ही यह सब कुछ है। आप यह सब कुछ हैं, इसलिये सत्य हैं" ॥ ६ ॥ यही बात ऋक्सम्बन्धी मन्त्रद्वारा भी बतायी गयी है—"यजुर्वेद जिसका उदर है, सामवेद मस्तक है तथा ऋग्वेद सम्पूर्ण शरीर है, वह अविनाशी परमात्मा 'ब्रह्म' के नामसे जाननेयोग्य है। वह ब्रह्ममय—ब्रह्मरूप महान् ऋषि है।'" तदनन्तर पुनः ब्रह्माजी उस उपासकसे पूछते हैं—'तुम मेरे पुरुषवाचक नामोंको किससे प्राप्त करते हो?' वह उत्तर दे—'प्राणसे।' (प्र०) 'स्त्रीवाचक नामोंको किससे ग्रहण करते हो?' (उ०) 'वाणीसे।' (प्र०) 'नपुंसकवाचक नामोंको किससे ग्रहण करते हो?' (उ०) 'मनसे।' (प्र०) 'गन्धका अनुभव किससे करते हो?' (उ०) 'प्राणसे—घ्राणेन्द्रियसे।' इस प्रकार कहे। (प्र०) 'रूपोंको ग्रहण किससे करते हो?' (उ०) 'नेत्रसे।' (प्र०) 'शब्दोंको किससे सुनते हो?' (उ०) 'कानोंसे।' (प्र०) 'अन्नके रसोंका आस्वादन किससे करते हो?' (उ०) 'जिह्वासे।' (प्र०) 'कर्म किससे करते हो?' (उ०) 'हाथोंसे।' (प्र०) 'सुख-दुःखोंका अनुभव किससे करते हो?' (उ०) 'शरीरसे।'* (प्र०) 'रतिका परिणामस्वरूप आनन्द, रति (मैथुनका आनन्द) और प्रजोत्पत्तिका सुख किससे उठाते हो?' (उ०) 'उपस्थ- इन्द्रियसे' यों कहे। (प्र०) 'गमनकी क्रिया किससे करते हो?' (उ०) 'दोनों पैरोंसे।' (प्र०) 'बुद्धि-वृत्तियोंको, ज्ञातव्य विषयोंको और विविध मनोरथोंको किससे ग्रहण करते हो?' (उ०) 'प्रज्ञासे' यों कहे। तब ब्रह्मा उससे कहते हैं—'जल आदि प्रसिद्ध पाँच महाभूत मेरे स्थान हैं; अतः यह मेरा लोक भी जलादि-तत्त्व- प्रधान ही है। तुम मुझसे अभिन्न मेरे उपासक हो, अतः यह तुम्हारा भी लोक है।' वह जो ब्रह्माजीकी सुप्रसिद्ध विजय (सबपर नियन्त्रण करनेकी शक्ति) तथा सर्वत्र व्याप्ति—सर्वव्यापकता है, उस विजयको तथा उस सर्वव्यापकताको भी वह उपासक प्राप्त कर लेता है, जो इस प्रकार जानता (उपासना करता) है। अर्थात् ब्रह्माजीकी भाँति ही वह सबका शासक एव सर्वव्यापक बन जाता है॥ ७ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

  • यद्यपि सुख-दुःखका ज्ञान अन्त करणके द्वारा ही होता है, तथापि 'मेरे पैरमें पीड़ा है, सिरमें दर्द है' इत्यादि प्रतीतिके अनुसार 'शरीरसे' यह उत्तर दिया गया है।

द्वितीय अध्याय

ॐ द्वितीय अध्याय प्राणोपासना 'प्राण ब्रह्म है' यह सुप्रसिद्ध ऋषि कौषीतकि* कहते हैं । उन प्रसिद्ध प्राणमय ब्रह्मकी यहाँ राजाके रूपमें कल्पना की गयी है । उनका मन ही दूत है, वाणी परोसनेवाली स्त्री (रानी) है, चक्षु संरक्षक (मन्त्री) है, श्रोत्रेन्द्रियसंदेश सुनाने- वाला द्वारपाल है । उन सुप्रसिद्ध प्राणमय ब्रह्मको बिना माँगे ही ये सम्पूर्ण इन्द्रियाभिमानी देवतागण भेंट समर्पित करते हैं—उनके अधीन होकर रहते हैं । इसी प्रकार जो इस प्रकार जानता है, उसको भी सम्पूर्ण चराचर प्राणी बिना माँगे ही भेंट देते हैं । उस प्राणोपासकके लिये यह गूढ व्रत है कि 'वह किसीसे कुछ भी न माँगे'—ठीक उसी तरह, जैसे कोई भिक्षु गाँवमें भीख माँगनेपर भी जब कुछ नहीं पाता तो हताश होकर बैठ रहता और कुपित होकर यह प्रतिज्ञा कर लेता है कि 'अबसे इस गाँववाले लोगोंके देनेपर भी यहाँका अन्न नहीं खाऊँगा।' तात्पर्य यह कि वह भिक्षु जिस दृढतासे अपनी बात- पर डटा रहता है, उसी प्रकार उसको भी अपने व्रतपर अटल रहना चाहिये। जो लोग पहले इस पुरुषको कुछ देनेसे अस्वीकार कर चुके होते हैं, वे ही कुछ न माँगनेका निश्चय कर लेनेपर इसे देनेके लिये निमन्त्रित करते हैं और कहते हैं, 'आओ, हम तुम्हें देते हैं।' दीनतापूर्वक दूसरोंके सामने प्रार्थना करना— यह याचकका धर्म होता है । अर्थात् याचना करनेवालेको ही दैन्य-प्रदर्शन करना पड़ता है । याचना और दैन्य-प्रदर्शनसे दूर रहनेपर ही उसे लोग यों निमन्त्रण देते हैं कि 'आओ, हम तुम्हें देंगे' ॥ १ ॥ 'प्राण ब्रह्म है'—प्रसिद्ध महात्मा पैङ्ग्य भी यही कहते हैं। उन प्रसिद्ध प्राणमय ब्रह्मके लिये वाणीसे परे चक्षु-इन्द्रिय है, जो वागिन्द्रियको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है । ( अतः चक्षु वागिन्द्रियकी अपेक्षा आन्तरिक है, क्योंकि जैसा कहा गया हो, वैसा ही नेत्रसे भी देख लिया जाय तो विवादकी सम्भावना नहीं रहती—वह वस्तु यथार्थ समझ ली जाती है । ) चक्षुसे परे श्रवणेन्द्रिय है, जो चक्षुको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है, (क्योंकि चक्षुसे कहीं-कहीं भ्रान्त-दर्शन भी होता है, जैसे सीपमें चाँदीका दर्शन । परंतु कानसे विद्यमान अथवा प्रस्तुत वचनका ही श्रवण होता है । ) श्रवणेन्द्रियसे परे मन है, जो श्रवणेन्द्रियको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है, क्योंकि मनके सावधान रहनेपर ही श्रवणेन्द्रिय सुन पाती है । मनसे परे प्राण है, जो मनको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है । ( प्राण ही मनको बाँध रखनेवाला है—यह बात प्रसिद्ध है । प्राण न रहे तो मन भी नहीं रह सकता, अतः सबकी अपेक्षा पर एवं आन्तरिक आत्मा होनेके कारण प्राणका ब्रह्म होना उचित ही है । ) उस प्राणमय ब्रह्मको ये सम्पूर्ण देवता उसके न माँगनेपर भी उपहार समर्पित करते हैं । इसी प्रकार जो यों जानता है, उस उपासकको भी सम्पूर्ण प्राणी बिना माँगे ही भाँति-भाँतिके उपहार भेंट करते हैं । उसका यह गूढ व्रत है कि वह किसीसे याचना न करे । इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है—कोई भिक्षु गाँवमें भीख माँगनेपर भी जब कुछ नहीं पाता तो हताश होकर बैठ रहता और यह प्रतिज्ञा कर लेता है कि 'अब यहाँ किसीके देनेपर भी अन्न ग्रहण नहीं करूँगा ।' ऐसी प्रतिज्ञा कर लेनेपर जो लोग पहले उसे कुछ देनेसे अस्वीकार कर चुके होते हैं, वे ही उसे यों कहकर निमन्त्रित करते हैं कि 'आओ, हम तुम्हें देते हैं' ॥ २ ॥ ( प्राणोपासकको धन प्राप्तिकी इच्छा होनेपर उसके लिये कर्तव्यका उपदेश करते हैं—) अब एकमात्र धन ( प्राण ) के निरोधकी बात बतायी जाती है। यदि एकमात्र धनका ( अथवा प्राणका ) चिन्तन करे तो पूर्णिमाको या अमावास्याको अथवा शुक्ल या कृष्णपक्षकी किसी भी पुण्य-तिथिको पवित्र नक्षत्रमें अग्निकी स्थापना, (वेदीका) परिसमूहन (संस्कार), कुशोंका आस्तरण (बिछाना ), मन्त्रपूत जलसे अग्नि-वेदी आदिका अभिषेक तथा अग्निपर रक्खे हुए पात्रस्थ घृतका उत्पवन (शोधन) करके दाहिना घुटना पृथ्वीपर टेककर स्रुवासे, चमससे अथवा काँसेकी करछुल आदिसे निम्नाङ्कित मन्त्रोंद्वारा घृतकी ये आहुतियाँ दे— वाङ् नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मात् ( ) इदम् अवरुन्धा तस्यै स्वाहा । अर्थात् 'वाक्' नामसे प्रसिद्ध देवी अवरोधिनी— उपासककी अभीष्टसिद्धि करनेवाली है, वह मुझ प्राणोपासकके लिये अमुक व्यक्तिसे इस अभीष्ट अर्थकी सिद्धि कराये, उसके लिये यह घृतकी आहुति सादर समर्पित है । ( उपर्युक्त

  • जिसकी दृष्टिमें सांसारिक सुख अत्यन्त हेय हो, उसे 'कुपीतक' (कुत्सित सीत यस्य स ) कहते हैं और कुपीतकके पुत्रको 'कौषीतकि' कहते हैं ।

५१६ * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [अध्याय २ मन्त्रका उच्चारण करके 'अमुष्मात्'के आगे दिये हुए कोष्ठकमे उस व्यक्तिके नामका उल्लेख करे, जिससे अभीष्ट अर्थ प्राप्त करना है। तथा 'इदम्'के स्थानपर अभीष्ट अर्थका उच्चारण करे। आगेके मन्त्रोंका अर्थ भी इसी प्रकार समझना चाहिये।) प्राणो नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मात् इदम् अवरुन्धां तस्यै स्वाहा। चक्षुर्नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मात् इदम् अवरुन्धां तस्यै स्वाहा। श्रोत्रं नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मात् इदम् अवरुन्धां तस्यै स्वाहा। मनो नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मात् इदम् अवरुन्धां तस्यै स्वाहा। प्रज्ञा नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मात् इदम् अवरुन्धां तस्यै स्वाहा। इस प्रकार आहुतियाँ देनेके पश्चात् धूमगन्धको सूँघकर होमावशिष्ट घृतके लेपसे अपने अङ्गोंका अनुमार्जन (लेपन) करके मौनभावसे धनस्वामीके पास जाय और अभीष्ट अर्थके विषयमें कहे कि 'इतने धनकी मुझे आवश्यकता है, सो आपके यहाँसे मिल जाना चाहिये।' अथवा यदि धनस्वामी दूर हो तो उक्त सन्देश कहलानेके लिये उसके पास दूत भेज दे। यों करनेसे निश्चय ही वह अभीष्ट धन प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥ (इस प्रकार धन-प्राप्तिका उपाय बताकर अब उपासकके लिये वशीकरणका उपाय बतलाते हैं—) अब इसके बाद वाक् आदि देवताओंद्धारा साध्य मनोरथकी सिद्धिका प्रकार बताया जाता है। जिस किसीका प्रिय होना चाहे, निश्चय ही उन सबका प्रिय होनेके लिये पहले प्राणोपासकको वाक् आदि देवताओंका ही प्रिय बनना चाहिये। किसी एक पर्वके दिन पूर्वोक्त रीतिसे शुभ पुण्यतिथि एवं मुहूर्त्तमें पहले बताये अनुसार ही अग्निकी स्थापना, परिसमूहन, कुशोंका आस्तरण, अग्निवेदी आदिका अभिषेक, घृतका उत्पवन आदि करके निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे ये घृतकी आहुतियाँ दे— वाचं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। (इस मन्त्रका उच्चारण करनेके पहले उस व्यक्तिका नाम लेना चाहिये, जिसको वशमें करना हो, यथा—'अमुकगोत्रस्य अमुकनामधेयस्य राज्ञः, अमुकगोत्राया अमुकनामधेयाया राज्ञ्या वा वाचं ते मयि जुहोमि असौ स्वाहा' यों कहकर घृतकी आहुति डालनी चाहिये। 'असौ'के बाद कार्यका उल्लेख करना आवश्यक है—'यथा असौ कामः सिद्ध्येत्—स्वाहा')। मन्त्रार्थ—मैं तुम्हारी वाक् इन्द्रियका अपनेमें हवन करता हूँ, मेरा अमुक कार्य सिद्ध हो जाय—इस उद्देश्यसे यह आहुति है। (इसी प्रकार अन्य मन्त्रोंका भी अर्थ समझना चाहिये।) प्राणं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। चक्षुस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। श्रोत्रं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। मनस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। प्रज्ञां ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा। इसके बाद होम धूमकी गन्ध सूँघकर होमावशिष्ट घृतके लेपसे अपने अङ्गोंका अनुमार्जन (लेपन) करके मौनभावसे अभीष्ट व्यक्तिके पास गमन करे और उसके संपर्कमें जानेकी इच्छा करे। अथवा ऐसी जगह खड़ा रहकर वार्तालाप करे, जहाँ वायुकी सहायतासे उसके शब्द अभीष्ट व्यक्तिके कानोंमें पड़ें। फिर तो निश्चय ही वह उसका प्रिय हो जाता है। इतना ही नहीं, उस स्थानसे हट जानेपर वहाँके लोग उसका सदा स्मरण करते हैं ॥ ४ ॥ आध्यात्मिक अग्निहोत्र अब इसके बाद दिवोदासके पुत्र प्रतर्दनद्वारा अनुष्ठित, अतएव 'प्रातर्दन' नामसे विख्यात और संयमसे पूर्ण होनेसे 'सायमन' कहलानेवाले आध्यात्मिक अग्निहोत्रका वर्णन करते हैं। निश्चय ही मनुष्य जबतक कोई वाक्य बोलता है, तबतक पूर्णतया श्वास नहीं ले सकता। उस समय वह प्राणका वाणीरूप अग्निमें हवन कर देता है। जबतक पुरुष श्वास खींचता है, तबतक बोल नहीं सकता, उस समय वह वाणीका प्राणरूप अग्निमें हवन कर देता है। ये वाक् और प्राणरूप दो आहुतियाँ अनन्त एव अमृत हैं। (वाक् और प्राणके व्यापारोंका जीवनमें कभी अन्त नहीं होता, इसलिये ये अनन्त हैं। तथा इनके व्यापारोंका जो एक-दूसरेमें लय होता है, उसमें अग्निहोत्र-बुद्धि हो जानेसे ये आहुतियाँ अमृतत्वरूप फलको देनेवाली होती हैं; इसलिये इन्हें 'अमृत' कहा गया है।) जाग्रत् और स्वप्नकालमें भी पुरुष सदा अविच्छिन्नरूपसे इन आहुतियोंका होम करता रहता है। इसके शिवा अर्थात् वाक्-प्राणरूपा आहुतियोंके अतिरिक्त जो दूसरी द्रव्यमयी आहुतियाँ हैं, वे कर्ममयी हैं

अध्याय २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५१७

अध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५१७ (बायाँ स्तम्भ) (स्वरूपसे और फलकी दृष्टिसे भी कृत्रिम हैं, वे पूर्वोक्त आहुतियोंकी भाँति अनन्त एवं अमृत नहीं हैं।) यह प्रसिद्ध है कि इस रहस्यको जाननेवाले पूर्ववर्ती विद्वान् केवल कर्ममय अग्निहोत्रका अनुष्ठान नहीं करते थे ॥ ५ ॥ 'उक्थ (प्राण) ब्रह्म है'—यह बात सुप्रसिद्ध महात्मा शुष्कमृङ्गार कहते हैं। वह उक्थ 'ऋक्' है, इस बुद्धिसे उपासना करे। जो प्राणरूप उक्थमें ऋग्बुद्धि कर लेता है, उसकी सम्पूर्ण प्राणी श्रेष्ठताके लिये—श्रेष्ठ बननेके लिये अर्चना करते हैं। वह उक्थ 'यजुर्वेद' है, इस बुद्धिसे उपासना करे। इससे सम्पूर्ण प्राणी श्रेष्ठताके लिये उसके साथ सहयोग करते हैं। वह उक्थ 'साम' है, इस बुद्धिसे उपासना करे। उस उपासकके समक्ष सम्पूर्ण प्राणी श्रेष्ठताके लिये मस्तक झुकाते हैं। वह उक्थ 'श्री' है, इस बुद्धिसे उपासना करे। वह 'यश' है, इस भावसे उपासना करे। वह 'तेज' है, इस भावसे उपासना करे। इस विषयमें यह दृष्टान्त है—जैसे यह दिव्य धनुष सम्पूर्ण आयुधोंमें अत्यन्त श्रीसम्पन्न, परम यशस्वी और परम तेजस्वी होता है, उसी प्रकार जो इस प्रकार जानता है वह विद्वान् सम्पूर्ण भूतोंमें सबसे अधिक श्रीसम्पन्न, परम यशस्वी तथा परम तेजस्वी होता है। (जो यहाँ ईंटोंकी बनी हुई वेदी अथवा कुण्डमें स्थापित किया गया है, वह यज्ञकर्मका साधनभूत अग्नि भी प्राणस्वरूप ही है, क्योंकि प्राण ही ऋग्वेदादिरूप है। यह प्राण ही ऋग्वेदादि- साध्य कर्मोंका निष्पादक तथा मुझ अध्वर्युका भी स्वरूप है। इसलिये ऋग्वेदादिस্বরূপ सर्वात्मा प्राण मैं हूँ, यह अग्नि भी मेरा ही स्वरूप है—इस बुद्धिसे अध्वर्यु अपना सत्कार करता है। इसी अभिप्रायसे कहते हैं—) इस प्राणको तथा ईंटोंकी वेदीपर संचित कर्ममय अग्निको भी अभिन्न एवं आत्मस्वरूप मानकर अध्वर्यु नामक ऋत्विक् अपना सत्कार करता है। उस प्राणमें ही वह यजुर्वेदसाध्य कर्मोंका विस्तार करता है। यजुर्वेदसाध्य कर्म-वितानमें होता ऋग्वेदसाध्य कर्मोंका विस्तार करता है। ऋग्वेदसाध्य कर्म-वितानमें उद्गाता सामवेदसाध्य कर्मोंका विस्तार करता है। वह अध्वर्युंरूप यह प्राण सम्पूर्ण त्रयी-विद्याका आत्मा- है। यह प्रत्यक्षगोचर प्राण ही इस त्रयी-विद्याका आत्मा बताया गया है। जो इस प्राणको इस रूपमें जानता है, वह भी प्राणरूप हो जाता है ॥ ६ ॥ विविध उपासनाओंका वर्णन अब सर्वविजयी कौषीतकिके द्वारा अनुभवमें लायी हुई तीन बार की जानेवाली उपासना बतायी जाती है। यज्ञोपवीतको (दायाँ स्तम्भ) सव्यभावसे—बायें कंधेपर रखकर, आचमन करके जलपात्रको तीन बार शुद्ध-स्वच्छ जलसे पूर्णतः भरकर उदयकालमें भगवान् सूर्यका उपस्थान करे, उनकी आराधनाके लिये खड़ा होकर अर्घ्य दे (अर्घ्य देते समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—) 'वर्गोऽसि पाप्मानं मे वृङ्ग्धि।' (आत्मज्ञान होनेके कारण सम्पूर्ण जगत्‌को आप तृणकी भाँति त्याग देते हैं, इसलिये 'वर्ग' कहलाते हैं; मेरे पापको मुझसे दूर कीजिये।) इसी प्रकार मध्याह्नकालमें भी भगवान् सूर्यका उपस्थान करे। (उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—) 'उद्वर्गोऽसि पाप्मानं मे उद्वृङ्ग्धि।' (इस मन्त्रका अर्थ भी पूर्ववत् ही है।) फिर इसी प्रकार सायंकालमें अस्त होते हुए भगवान् सूर्यका निम्नाङ्कित मन्त्रसे उपस्थान करे— 'संवर्गोऽसि पाप्मानं मे संवृङ्ग्धि।' इस उपासनाका फल यह है कि मनुष्य दिन और रातमें जो पाप करता है, उसका पूर्णतः परित्याग कर देता है ॥ ७ ॥ अब दूसरी उपासना बतायी जाती है। प्रत्येक मासकी अमावास्या तिथिको, जब सूर्यके पश्चिमभागमें उनकी सुषुम्णा नामक किरणमें चन्द्रमा स्थित दिखायी देते हैं (लौकिक नेत्रोंसे न दिखायी देनेपर भी शास्त्रतः देखे जाते हैं), उस समय उनका पूर्वोक्त प्रकारसे ही उपस्थान करे। विशेषता इतनी ही है कि अर्घ्यपात्रमें दो हरी दूबके अङ्कुर भी रख ले और उससे अर्घ्य देते हुए चन्द्रमाके प्रति 'यत्ते' इत्यादि मन्त्ररूपा वाणीका प्रयोग करे। (वह मन्त्र इस प्रकार है—) यत्ते सुसीमं हृदयमधि चन्द्रमसि श्रितं तेनामृतत्वस्येशानं माहं पौत्रमघ रुदम्। 'हे सोममण्डलकी अधिष्ठात्री देवि ! जिसकी सीमा बहुत ही सुन्दर है, ऐसा जो तुम्हारा हृदय—हृदयस्थित आनन्दमय स्वरूप चन्द्रमण्डलमें विराजित है, उसके द्वारा तुम अमृतत्व (परमानन्दमय मोक्ष) पर भी अधिकार रखती हो। ऐसी कृपा करो, जिससे मुझे पुत्रके शोकसे न रोना पड़े।' (पुत्रका पहलेसे ही अभाव होना, पुत्रका पैदा होकर मर जाना या रुग्ण रहना अथवा पुत्रका कुपुत्र हो जाना आदिके कारण जो घोर दुःख होता है, यही पुत्र शोक है, इन सबसे छूटनेके लिये इस मन्त्रमें प्रार्थना की गयी है।) यों करनेवाले उपासकको यदि पुत्र प्राप्त हो चुका हो तो उसके उस पुत्रकी उससे पहले मृत्यु नहीं होती। यदि उसके कोई पुत्र न हुआ हो, तो वह भी पहलेकी ही भाँति

५१८ कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् [अध्याय २

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५१८ * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [अध्याय २ सब कार्य करके अर्घ्यपात्रमें दो हरी दूबके अङ्कुर भी रख ले —यों कहकर अपनी दाहिनी बाँहका अन्वावर्तन करे— और निम्नाङ्कित ऋचाओंका जप करे— बारबार घुमाये । तत्पश्चात् बाँह खींच ले ॥ ८ ॥ ‘समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यं भवा वाजस्य संगथे ।'१ अथ अन्य प्रकारकी उपासना बतायी जाती है—पूर्णिमाको ‘सं ते पयांसि समु यन्तु वाजा संवृष्ण्यान्यभिमातिषाह.। सायंकालमें जब प्राची दिशाके अङ्कमें चन्द्रदेवका दर्शन होने आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्तमानि धिष्व ॥'२ लगे, उस समय इसी रीतिसे (जो पहले बतायी गयी है ) 'यमादित्या अंशुमाप्याययन्ति यमक्षितमक्षितयः पिबन्ति । चन्द्रमाका उपस्थान करे—उन्हें अर्घ्य प्रदान करे । उपस्थानके तेन नो राजा वरुणो बृहस्पतिराप्याययन्तु भुवनस्य गोपाः ॥'३ समय निम्नाङ्कित मन्त्रोंका पाठ भी करे— —इन तीन ऋचाओंका जप करनेके पश्चात् चन्द्रमाके सोमो राजासि विचक्षणः पञ्चमुखोऽसि प्रजापति- सम्मुख दाहिना-हाथ उठाये और निम्नाङ्कित मन्त्रका र्ब्राह्मणस्त एकं मुखं तेन मुखेन राज्ञोऽत्सि तेन मुखेन मामन्नादं पाठ करे— कुरु । राजा त एकं मुखं तेन मुखेन विशोऽत्सि तेन मुखेन मास्माकं प्राणेन प्रजया पशुभिराप्याययिष्ठा योऽस्मान् मामन्नादं कुरु । श्येनस्त एकं मुखं तेन मुखेन पक्षिणोऽत्सि द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तस्य प्राणेन प्रजया पशुभिराप्याययस्व तेन मुखेन मामन्नादं कुरु । अग्निष्ट एकं मुखं तेन मुखेनेमं इति दैवीमावृतमावर्त आदित्यस्यावृतमन्वावर्ते इति । ४ लोकमत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु । त्वयि पञ्चमं मुखं १ हे स्त्रीरूप सोम ! तुम पुरुषरूप सूर्यके तेजसे वृद्धिको प्राप्त तेन मुखेन सर्वाणि भूतान्यत्सि तेन मुखेन मामन्नाद कुरु । होओ । पुरुषकी उत्पत्तिका हेतुभूत जो वीर्य—अग्निसम्बन्धी तेज है, मास्माकं प्राणेन प्रजया पशुभिरवक्षेष्ठा योऽस्मान् द्वेष्टि वह तुममें स्थापित हो । ( तुम अन्न आदि ओषधियोंके भी स्वामी हो; यं च वयं द्विष्मस्तस्य प्राणेन प्रजया पशुभिरवक्षीयस्वेति, दैवी- अत ) सब ओरसे अन्नकी प्राप्तिमें निमित्त बनो । मावृतमावर्तं, आदित्यस्यावृतमन्वावर्ते ।५ २.हे सोम ! तुम सोममयी प्रकृति हो, तुम्हारा उत्तम दुग्ध अथवा इस प्रकार मन्त्रपाठ करते हुए दाहिनी बाँहका अन्वावर्तन जल (जो माताके स्तनोंमें दुग्धरूपसे, चन्द्रमण्डलमें सोमरस अथवा करे ॥ ९ ॥ सुधारूपसे तथा मेघमण्डलमें स्वादिष्ट जलके रूपमें स्थित है ) पुरुष- इस तरह सोमकी प्रार्थनाके पश्चात् ( गर्भाधानके लिये ) मात्रके लिये अत्यन्त उपकारक है तथा उसका सेवन करनेवाले पुरुषोंको पुष्टि प्रदान करके उनके शत्रुओंका पराभव करानेमें भी समर्थ है । ५. विश्वकी स्त्री-पुरुषरूपा प्रकृति—उमाके साथ वर्तमान तुम वे दुग्ध और जल अन्नसे जीवन-निर्वाह करनेवाले—निरामिषभोजी सोम राजा हो । विचक्षण—सम्पूर्ण लौकिक, वैदिक कार्योंके साधनमें जीवोंको सुगमतापूर्वक प्राप्त होते रहें । आग्नेय तेजसे आह्लादको प्राप्त कुशल हो । तुम पञ्चमुख—पाँच मुखवाले हो । प्रजापति—समस्त होते हुए तुम अमृतत्वकी प्राप्तिमें सहायक बनो और स्वर्गलोकमें प्रजाका पालन करनेवाले हो । ब्राह्मण तुम्हारा एक मुख है, उस उत्तम यशको धारण करो । मुखसे तुम क्षत्रियोंका भक्षण करते हो—दमन करते हो, उस मुखके ३ द्वादश आदित्यरूप पुरुष जिस स्त्री-प्रकृतिमय अमूर्तांश द्वारा तुम मुझे अन्नको खाने और पचानेकी शक्तिमे सम्पन्न बनाओ । सोमको अपने तेजसे आह्लाद प्रदान करते हैं तथा स्वय अक्षीण रह- क्षत्रिय तुम्हारा एक मुख है, उस मुखसे तुम वैश्योंका भक्षण— कर कभी क्षीण न होनेवाले जिस सोमका (दुग्ध और जलके रूपमें ) शासन करते हो, उस मुखसे तुम मुझे अन्नका भक्षण करने और उसे पान करते हैं, उस सोममय अश्रुसे, त्रिभुवनकी रक्षा करनेवाले पचानेकी शक्तिसे सम्पन्न बनाओ । बाज तुम्हारा एक मुख है, उस राजा वरुण और बृहस्पति हमलोगोंको आनन्द एव पुष्टि प्रदान करें। मुखसे तुम पक्षियोंका भक्षण—सहार करते हो, उस मुखसे मुझे ४ 'हे सोम ! तुम हमारे प्राण, सतान और पशुओंसे अपनी अन्नका भोक्ता बनाओ । अग्नि तुम्हारा एक मुख है, उस मुखसे तुम पुष्टि एव तृप्ति न करो, अपितु जो हमसे द्वेष रखता है, अतएव इस लोकका भक्षण करते हो, उस मुखसे मुझे भी अन्नका भोक्ता हम भी जिससे द्वेष रखते हैं, उसके प्रागसे, सतानसे और पशुओसे बनाओ। पाँचवाँ मुख तो तुममें ही है, उस मुखसे तुम सम्पूर्ण प्राणियोंका अपनी पुष्टि एव तृप्ति करो । इस प्रकार इस मन्त्रके अर्थभूत देवतासे भक्षण—सहार करते हो, उस मुखसे मुझे भी अन्नका भोक्ता बनाओ। सम्पादित होनेवाली सचरण-क्रियाका मै अनुवर्तन करता हूँ— तुम प्राण, सतान और पशुओंसे हमें क्षीण न करो, अपितु जो हमसे उसीका चलाया हुआ चलता हूँ । अग्नीषोमात्मक सोम ! मै तुम्हारी द्वेष रखता है, अतएव हम भी जिससे द्वेष रखते हैं, उसे प्राण, सचरणक्रियाका अनुवर्तन करता हूँ, अर्थात् तुम्हारी ही गतिका सतान एव पशुओसे क्षीण करो । ( शेष मन्त्रका अर्थ ऊपरकी अनुसरण करता हूँ।' तरह समझना चाहिये ।)

अध्याय २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५१९

अध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५१९ पत्नीके समीप बैठनेसे पूर्व उसके हृदयका स्पर्श करे। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करना चाहिये— यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्त प्रजापतौ। मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं तेन माहं पौत्रमघं रुदम्। 'हे सुन्दर सीमन्त (माँग) वाली सुन्दरी! तुम सोममयी हो, तुम्हारा हृदय (स्तन-मण्डल) प्रजा-संततिका पालक (पोषक) है; उसके भीतर जो चन्द्रमण्डलकी ही भाँति अमृतराशि निहित है, उसे मैं जानता हूँ, अपनेको उसका जाननेवाला मानता हूँ। इस सत्यके प्रभावसे मैं कभी पुत्र-सम्बन्धी शोकसे रोदन न करूँ (मुझे पुत्रशोक कभी देखना न पड़े)।' इस प्रकार प्रार्थना करनेसे उस उपासकके पहले उसकी संतानकी मृत्यु नहीं होती ॥ १० ॥ अथ दूसरी उपासना बतायी जाती है—परदेशमें रहकर वहाँसे लौटा हुआ पुरुष पुत्रके मस्तकका स्पर्श करे और इस मन्त्रको पढ़े— अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादधिजायसे। आत्मा त्वं पुत्र * माऽऽविथ स जीव शरदः शतम् असौ ॥ 'अमुक नामवाले पुत्र! तुम नरकसे तारनेवाले हो। मेरे अङ्ग-अङ्गसे प्रकट हुए हो। मेरे हृदयसे तुम्हारा आविर्भाव हुआ है। तुम मेरे अपने ही स्वरूप हो। तुमने मेरी (नरकसे) रक्षा की है। तुम सौ वर्षोंतक जीवित रहो।' यहाँ 'असौ' के स्थानपर पुत्रका नाम उच्चारण करना चाहिये और नामोच्चारणके समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़ना चाहिये— अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव। तेजो वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम् असौ।' † यहाँ पुनः 'असौ' के स्थानपर पुत्रका नाम लेना चाहिये। साथ ही निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ भी करना चाहिये— 'येन प्रजापतिः प्रजा. पर्यगृह्णादरिष्टयै तेन त्वा परिगृह्णामि असौ। ॐ यहाँ भी 'असौ' के स्थानपर पुत्रका नामोच्चारण करे। तत्पश्चात् पुत्रके दाहिने कानमें इस मन्त्रका जप करे— अस्मै प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्, इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि घेहि। † फिर इसी मन्त्रको बायें कानमें भी जपे। तदनन्तर पुत्रका मस्तक सूँघे और इस मन्त्रको पढ़े— माच्छिथा मा व्यथिष्ठा. शतं शरद आयुषो जीव पुत्र ते नाम्ना मूर्धानमवजिघ्रामि, असौ। 'बेटा! संतान-परम्पराका उच्छेद न करना। मन, वाणी और शरीरसे तुम्हें कभी पीड़ा न हो। तुम सौ वर्षोंतक जीवित रहो। मैं तुम्हारा अमुक नामसे प्रसिद्ध पिता तुम्हारा नाम लेकर तुम्हारे मस्तकको सूँघ रहा हूँ।' (यहाँ 'असौ' के स्थानपर पिता अपना नाम ले।) इस मन्त्रको पढ़कर तीन बार पुत्रका मस्तक सूँघना चाहिये। इसके बाद नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर मस्तकके सब ओर तीन बार हिंकार ('हिम्' शब्दका) उच्चारण करे। मन्त्र इस प्रकार है— गवां त्वा हिंकारेणाभि हिंकरोमि। 'वत्स! गौएँ अपने बछड़ेको बुलानेके लिये जैसे रँभाती हैं, उसी प्रकार—वैसे ही प्रेमसे मैं भी तुम्हारे लिये हिङ्कार करता हूँ—हिङ्कारद्वारा तुम्हें अपने पास बुलाता हूँ' ॥ ११ ॥

दैवपरिमररूपमें प्राणकी उपासना

अब इसके बाद देव-सम्बन्धी 'परिमर' का वर्णन किया जाता है। (यहाँ अग्नि और वाक् आदि ही देवता हैं, ये देवता प्राणके सब ओर मृत्युको प्राप्त होते हैं, अतः ब्रह्मस्वरूप प्राणको ही यहाँ 'परिमर' कहा गया है।) यह जो प्रत्यक्ष रूपमें अग्नि प्रज्वलित है, इस रूपमें ब्रह्म ही देदीप्यमान हो रहा है। जब अग्नि प्रज्वलित नहीं होती, उस अवस्था में यह मर जाती है—बुझ जाती है। उस बुझी हुई अग्निका तेज सूर्यमे ही मिल जाता है और प्राण वायुमें प्रवेश कर जाता है।

* पुत्रका अर्थ ही है—पुत् नामके नरकसे रक्षा करनेवाला (पुन्नाम्न नरकात् त्रायते)। † मन्त्रार्थ इस प्रकार है—'वत्स! तुम पत्थर बनो, कुठार बनो और विछा हुआ सुवर्ण बनो (अर्थात् तुम्हारा शरीर पत्थरके समान सुगठित, बलवान्, स्वस्थ एवं नीरोग हो। तुम कुठारकी भाँति शत्रुओंका नाश करनेवाले बनो और सब ओर फैली हुई सुवर्णराशिकी भाँति सबके प्रिय बनो। समस्त अङ्गोंका सारभूत, संसार-वृक्षका बीजरूप जो तेज है, वह तुम्हीं हो, तुम सैकड़ों वर्ष जीवित रहो।' * वरन 'प्रजापति ब्रह्माजी अपनी सृष्टिको विनाशसे बचानेके लिये उसे जिस तेजसे सम्पन्न करके परिगृहीत अथवा अनुगृहीत करते हैं, उसी तेजसे सम्पन्न करके मैं तुम्हें सब ओरसे ग्रहण करता हूँ। † मघवन् ! आप सरल भावका अवलम्बन करके इस पुत्रकी रक्षा करें। इन्द्र! इसे श्रेष्ठ धन प्रदान करें।

५२० कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् [ अध्याय २

५२० * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [ अध्याय २ यह जो सूर्य दृष्टिगोचर होता है, निश्चय ही इस रूपमें ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं दिखायी देता, तब मानो मर जाता है। उस समय उसका तेज चन्द्रमाको ही प्राप्त होता और प्राण वायुमें मिल जाता है। यह जो चन्द्रमा दिखायी देता है, निश्चय ही इसके रूपमें ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। फिर जब यह नहीं दिखायी देता, तब मानो यह मर जाता है। उस समय उसका तेज विद्युत्को ही और प्राण वायुको प्राप्त हो जाता है। यह जो बिजली कौंधती है, निश्चय ही इसके रूपमें यह ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। फिर जब यह नहीं कौंधती, तब मानो मर जाती है; उस समय उसका तेज वायुको प्राप्त होता है और प्राण भी वायुमें ही प्रवेश कर जाता है। वे प्रसिद्ध अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा तथा विद्युत्-स्वरूप सम्पूर्ण देवता वायुमें ही प्रवेश करके स्थित होते हैं। वायु (आधिदैविक प्राण) में विलीन होकर वे विनष्ट नहीं होते; क्योंकि पुनः उस वायुसे ही उनका प्रादुर्भाव होता है। इस प्रकार आधिदैविक दृष्टि है। अब आध्यात्मिक दृष्टि बतायी जाती है ॥ १२ ॥ मनुष्य वाणीसे जो बातचीत करता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं बोलता, उस समय मानो यह वाक्-इन्द्रिय मर जाती है। उस समय वाणीका तेज नेत्रको प्राप्त हो जाता है और प्राण प्राणवायुमें मिल जाता है। यह मनुष्य नेत्रद्वारा जो देखता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब नेत्रसे नहीं देखता, उस समय मानो नेत्रेन्द्रिय मर जाती है। उस समय नेत्रका तेज श्रवणेन्द्रियको प्राप्त हो जाता है तथा प्राण प्राणमें ही मिल जाता है। यह जो श्रवणद्वारा सुनता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है, जब यह नहीं सुनता, तब मानो श्रवणेन्द्रिय मर जाती है। उस समय उसका तेज मनको ही प्राप्त हो जाता है और प्राण प्राणमें मिल जाता है। यह जो मनसे ध्यान (चिन्तन) करता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब चिन्तन नहीं करता, तब मानो मन मर जाता है। उस समय उसका तेज प्राण- को ही प्राप्त हो जाता है और प्राण भी प्राणमें ही मिल जाता है। इस प्रकार ये सम्पूर्ण वाक् आदि देवता प्राणमें ही प्रवेश करके स्थित होते हैं। प्राणमें लीन होकर वे नष्ट नहीं होते। अतएव पुनः प्राणसे ही उनका प्रादुर्भाव होता है। उस दैव परिमर (प्राण) का सम्यग्ज्ञान हो जानेपर यदि वे ज्ञानी पुरुष ऐसे दो ऊँचे पर्वतोंको, जो भूमण्डलके उत्तरी सिरेसे लेकर दक्षिणी सिरेतक फैले हों, अपनी इच्छाके अनुसार चलनेको प्रेरित करें तो वे पर्वत इन ज्ञानी महापुरुषोंकी हिंसा—उनकी आज्ञाका परित्याग अर्थात् उनकी अवहेलना नहीं कर सकते। इसके सिवा, जो लोग इस 'दैवपरिमर' के ज्ञाता पुरुषसे द्वेष करते हैं, अथवा वह स्वयं जिन लोगोंसे द्वेष रखता हो; वे सब-के-सब सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥ मोक्षके लिये सर्वश्रेष्ठ प्राणकी उपासना इसके पश्चात् अब मोक्ष-साधनके गुणसे विशिष्ट सर्वश्रेष्ठ प्राणकी उपासना बतायी जाती है। एक समय वाक् आदि सम्पूर्ण देवता अहङ्कारवश अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये विवाद करने लगे। वे सब प्राणके साथ ही इस शरीरसे निकल गये। उनके निकल जानेपर वह शरीर काठकी भाँति निश्चेष्ट होकर सो गया। तदनन्तर उस शरीरमें वाक् इन्द्रियने प्रवेश किया। तब वह वाणीसे बोलने तो लगा, परंतु उठ न सका, सोया ही रह गया। तत्पश्चात् चक्षु-इन्द्रियने उस शरीरमे प्रवेश किया। तथापि वह वाणीसे बोलता और नेत्रसे देखता हुआ भी सोता ही रहा, उठ न सका। तब उस शरीरमे श्रवण-इन्द्रियने प्रवेश किया। उस समय भी वह वाणीसे बोलता, नेत्रसे देखता और कानोंसे सुनता हुआ भी सोता ही रहा; उठकर बैठ न सका। तदनन्तर उस शरीरमे मनने प्रवेश किया। तब भी वह शरीर वाणीसे बोलता, नेत्रसे देखता, कानसे सुनता और मनसे चिन्तन करता हुआ भी पड़ा ही रहा। तत्पश्चात् प्राणने उस शरीरमें प्रवेश किया। फिर तो उसके प्रवेश करते ही वह शरीर उठ बैठा। तब उन वाक् आदि देवताओंने प्राणमें ही मोक्ष-साधनकी शक्ति जानकर तथा प्रज्ञारूप प्राणको ही सब ओर व्याप्त समझकर इन प्राण-अपान आदि समस्त प्राणोंके साथ ही इस शरीररूप लोकसे उत्क्रमण किया। वे वायुमें—आधिदैविक प्राणमें स्थित हो आकाशस्वरूप होकर स्वर्गलोकमें गये—अपने अधिष्ठातृ-देवता अग्नि आदिके स्वरूपको प्राप्त हो गये। उसी प्रकार इस रहस्यको जाननेवाला विद्वान् सम्पूर्ण भूतोंके प्राणको ही प्रज्ञात्मरूपसे प्राप्तकर इन प्राण-अपान आदि समस्त प्राणोंके साथ इस शरीरसे उत्क्रमण करता है। तथा वह वायुमे प्रतिष्ठित हो आकाशस्वरूप होकर स्वर्गलोकको गमन करता है। वह विद्वान् वहाँ उस सुप्रसिद्ध प्राणका स्वरूप हो जाता है जिसमें कि ये वाक् आदि देवता स्थित होते हैं। उस प्राणस्वरूपको प्राप्तकर वह विद्वान् प्राणके उस अमृतत्व-गुणसे युक्त हो

अध्याय २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५२१

अध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५२१

[बायाँ स्तम्भ] जाता है, जिस अमृतत्व-गुणसे वे वाक् आदि देवता भी संयुक्त होते हैं ॥ १४ ॥ प्राणोपासकका सम्प्रदान-कर्म अब इसके पश्चात् पिता-पुत्रका सम्प्रदान-कर्म बतलाते हैं ( पिता पुत्रको अपनी जीवन-शक्ति प्रदान करता है; अतएव इसको पितापुत्रीय सम्प्रदान-कर्म कहते हैं ) । पिता यह निश्चय करके कि अब मुझे इस लोकसे प्रयाण करना है, पुत्रको अपने समीप बुलाये । नूतन कुश-कास आदि तृणोंसे अग्निशालाको आच्छादित करके विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करे । अग्निके उत्तर या पूर्वभागमें जलसे भरा हुआ कलश स्थापित करे । कलशके ऊपर धान्यसे भरा हुआ पात्र भी होना चाहिये । स्वय भी नवीन धौत ( धोती ) और उत्तरीय धारण करे । इस प्रकार श्वेत वस्त्र और माला आदिसे अलङ्कृत हो घरमें आकर पुत्रको पुकारे । जब पुत्र समीप आ जाय तो सब ओरसे उसके ऊपर पड़ जाय अर्थात् उसे अङ्कमें भर ले और अपनी इन्द्रियोंसे उसकी इन्द्रियोंका स्पर्श करे ( तात्पर्य यह कि नेत्रसे नेत्रका, नाकसे नाकका तथा अन्य इन्द्रियोंसे उसकी अन्य इन्द्रियोंका स्पर्श करे ) । अथवा केवल पुत्रके सम्मुख बैठ जाय और उसे अपनी वाक्-इन्द्रिय आदिका दान करे । पिता कहे—‘वाचं मे त्वयि दधानि' ( बेटा ! मैं तुममें अपनी वाक्-इन्द्रिय स्थापित करता हूँ ) । पुत्र उत्तर दे—'वाच ते मयि दधे' ( पिताजी ! मैं आपकी वाक्-इन्द्रियको अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'प्राणं मे त्वयि दधानि' ( मैं अपने प्राणको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'प्राणं ते मयि दधे' ( आपके प्राण—घ्राणेन्द्रियको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'चक्षुर्मे त्वयि दधानि' ( अपनी चक्षु-इन्द्रियको तुममे स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'चक्षुस्ते मयि दधे' ( आपके चक्षुको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'श्रोत्रं मे त्वयि दधानि' ( अपने श्रोत्रको तुममें स्थापित करता हूँ ) । उ० अं० ६६—

[दायाँ स्तम्भ] पुत्र—'श्रोत्रं ते मयि दधे' ( आपके श्रोत्रको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'अन्नरसान्मे त्वयि दधानि' ( अपने अन्नके रसोंको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'अन्नरसांस्ते मयि दधे' (आपके अन्नरसोंको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'कर्माणि मे त्वयि दधानि' ( अपने कर्मोंको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'कर्माणि ते मयि दधे' ( आपके कर्मोंको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'सुखदुःखे मे त्वयि दधानि' ( अपने सुख और दुःखको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'सुखदुःखे ते मयि दधे' ( आपके सुख और दुःखको अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'आनन्दं रतिं प्रजातिं मे त्वयि दधानि' ( मैथुन-जनित आनन्द, रति और सन्तानोत्पत्तिकी शक्ति तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'आनन्दं रतिं प्रजातिं ते मयि दधे' ( आप- की वह शक्ति मैं अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'इत्या मे त्वयि दधानि' ( अपनी गतिशक्ति मैं तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'इत्यास्ते मयि दधे' ( आपकी गतिशक्ति अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'धियो विज्ञातव्य कामान् मे त्वयि दधानि' ( अपनी बुद्धि-वृत्तियोंको, बुद्धिके द्वारा ज्ञातव्य विषयको तथा विशेष कामनाओंको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'धियो विज्ञातव्यं कामास्ते मयि दधे' ( आपकी बुद्धि-वृत्तियोंको, बुद्धिके द्वारा ज्ञातव्य विषयोंको तथा कामनाओं- को मैं अपनेमें धारण करता हूँ ) । तदनन्तर पुत्र पिताकी प्रदक्षिणा करते हुए पूर्व दिशाकी ओर पिताके समीपसे निकलता है । उस समय पिता पीछेसे पुत्रको सम्बोधित करके कहते हैं— 'यशो ऽब्रह्मवर्चसमन्नाद्य कीर्तिस्त्वा जुषताम् ।'

५२२ ⁕ कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् ⁕ [ अध्याय :

५२२ ⁕ कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् ⁕ [ अध्याय : 'यश, ब्रह्मतेज, अन्नको खाने और पचानेकी शक्ति तथा इसके बाद यदि पिता नीरोग हो तो वह पुत्रके प्रभुत्वमें उत्तम कीर्ति—ये समस्त सद्गुण तुम्हारा सेवन करें।' ही वहाँ निवास करे (पुत्रको घरका स्वामी समझे और पिताके यों कहनेपर पुत्र अपने बायें कन्धेकी ओर दृष्टि अपनेको उसके आश्रित माने)। अथवा सब कुछ त्यागकर घुमाकर देखे और हाथसे ओट करके अथवा कपड़ेसे आड़ घरसे निकल जाय—सन्यासी हो जाय। अथवा यदि वह करके पिताको उत्तर दे— परलोकगामी हो जाय तो जिन-जिन वाक् आदि इन्द्रियोंको 'स्वर्गान् लोकान् कामान् अवाप्नुहि' उसने पुत्रमें स्थापित किया था, उन सभीकी शक्तियोंका वह 'आप अपनी इच्छाके अनुसार कमनीय स्वर्गलोक तथा पुत्र उसी प्रकार आश्रय हो जाता है। वे सभी शक्तियाँ उसे वहाँके भोगोंको प्राप्त करें।' प्राप्त होती हैं (यही सच्चा उत्तराधिकार है) ॥ १५ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥