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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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[खण्ड ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५९९


ब्रह्म विकल्पसे शून्य है। वास्तवमें परमात्मा अविकल्प भी मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता रहता है। इसलिये यह अद्वितीय, -नहीं है; क्योंकि उसमें कोई भेद नहीं है (भेदकी सत्ता होने- स्वयंप्रकाश और महानन्दमय तत्त्व आत्मा ही है। यह ब्रह्म पर ही सविकल्प और अविकल्प आदि भेद हो सकते हैं)। अमृतस्वरूप है, यह ब्रह्म सर्वथा भयसे रहित है। ऐसी प्रसिद्धि इस परमात्मामें कोई भी भेद उपलब्ध नहीं होता। इसमें है कि ब्रह्म भयसे शून्य ही है। जो इस प्रकार जानता है, वह जो भेद-सा मानता है, वह सैकड़ों और सहस्रों प्रकारसे भेद- भयशन्य ब्रह्म ही हो जाता है। ऐसा इस प्रकरणका गूढ़ को प्राप्त होकर—सहस्रों भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेकर रहस्य है।


नवम खण्ड

प्रणवके द्वारा आत्माको जानकर साक्षिरूपसे स्थित होनेकी विधि

निश्चय ही उन प्रसिद्ध देवताओने प्रजापतिसे कहा— भगवन् ! हमें उस ॐकारके लक्ष्यार्थभूत आत्माका ही उपदेश करें । 'तथास्तु' कहकर प्रजापति बोले—'उपद्रष्टा (समीप रहकर देखनेवाला साक्षी) और अनुमन्ता (अपनेमें ही अध्यक्षत प्राण और शुद्धि आदिको संनिधानमात्रसे केवल अनुमति देनेवाला) यह आत्मा 'सिंह' अर्थात् बन्धननाशक परमात्मा ही है, चिन्मवरूप ही है, निर्विकार है और सर्वत्र साक्षिमात्र है। अतएव द्वैतकी सिद्धि नहीं होती; केवल आत्मा ही सिद्ध होता है—एकमात्र आत्माकी ही सत्ता प्रमाणित होती एव अनुभवमें आती है आत्मा अद्वितीय है—उससे भिन्न किसी दूसरी वस्तुकी सत्ता नहीं है। मायासे ही अन्य वस्तुकी प्रतीति-सी होती है। निश्चय ही वह उपद्रष्टा आदिके रूपमें बतलाया हुआ यह आत्मा साक्षात् परमात्मा ही है। यह माया ही सम्पूर्ण द्वैत प्रपञ्चके रूपमें भासित होती है। ठीक ऐसी ही बात है। वही यह माया प्राज्ञमें अविद्यारूपसे स्थित होकर उसके स्वरूपपर आवरण डालती है। वही सम्पूर्ण जगत्के रूपमें भासती है। आत्मा तो विशुद्ध परमात्मा ही है। यद्यपि यह स्वप्रकाश (अपने ही प्रकाशमें प्रकाशित होनेवाला) एव सर्वज्ञ है, तथापि यहाँ सुषुप्तावस्थामें जानते हुए भी अपने और दूसरेको पृथक्-पृथक् नहीं जानता, क्योंकि उस समय वह अविषयरूप है, सत्तामात्रसे भिन्न किसी भी विषयका उसके साथ सम्बन्ध नहीं है। इसी प्रकार वह अज्ञानरूप भी है अर्थात् भेद-ज्ञानको ग्रहण करनेवाले अन्तःकरणके साथ उसका सम्बन्ध नहीं है। यह बात अनुभवसिद्ध है तथा यह तमोमयी (अज्ञानस्वरूपा) माया भी अनुभवमे ही जानी जाती है। इसलिये जड-मोहात्मक, प्रवाहरूपमे अनन्त और अत्यन्त तुच्छ यह दृश्यमान जगत् ही उसका स्वरूप है। यह माया ही इस पुरुषके समक्ष 'इदम्' रूपमे प्रतीत होनेवाले इस दृश्य-प्रपञ्चको अभिव्यक्त करनेवाली ह। यद्यपि यह नित्य निवृत्त है, ढूंढनेपर कहीं भी इसकी सत्ता उपलब्ध नहीं होती, तथापि अविवेकी पुरुषोंको यह आत्माकी भाँति अपना स्वरूप ही दिखायी देती है। यह इस चेतन आत्माकी सत्ता और असत्ताका भी दर्शन कराती है (मायाद्वारा प्रकट हुए जगत्का कोई चेतन आत्मा साक्षी अवश्य होना चाहिये—इस युक्तिसे आत्माकी सत्ताका अनुभव होता है, तथा यह माया स्वय ही आवरण बनकर आत्माके स्वरूपको छिपा देती है, इसलिये उसकी असत्ता सी प्रतीत होती है)। सिद्धता और असिद्धता तथा स्वतन्त्रता और अस्वतन्त्रताके कारण भी यह आत्माकी सत्ता और असत्ताका भान कराती है।* वही यह प्रसिद्ध माया साधारण वट-बीजकी भाँति एक होकर भी अनेक वटवृक्षोंके समान असंख्य जीवोंके उत्पादनकी शक्तिका केन्द्र है। यह कैसे ? सो बतलाते हैं। जैसे एक साधारण वट-बीज अपनेसे अभिन्न अनेका वट वृक्षोंको बीजसहित उत्पन्न करके उन सब-में अपनी पूरी शक्तिके साथ मौजूद रहता है, उसी प्रकार यह माया अपनेमें अभिन्न एव परिपूर्ण क्षेत्रों (शरीरों) को दिखाकर आभासद्वारा चेतन आत्माको जीव और ईश्वरके भेदमें प्रतिष्ठित कर देती है। यह स्वय ही माया और अविद्या बन जाती है। यह प्रसिद्ध माया अति विचित्र, अत्यन्त दृढ, अनेक अङ्कुरोंवाली, म्वय तीन गुणोंम विभक्त होकर अङ्कुरों-


* अपनी महिमामें स्थित निर्विकल्प चैतन्यस्वरूप आत्मा, अविद्यामे सम्बन्ध होनेपर, उसके साधकरूपसे प्रकट होता है। अत उसके स्वरूपकी सिद्धि होनेमे उसकी सत्ता प्रमाणित होती है। तथा प्रकृतिस्थ होनेपर आसक्तिवश जब वह जडप्रधान हो जाता है, तब उसके स्वरूपकी सिद्धि न होनेसे उसकी सत्ता उपलब्ध नहीं होती। इसी प्रकार वह मायाका भी शामक और अधिष्ठाता होनेके कारण स्वतन्त्र है और अविद्यावश जब अपने स्वरूपको भूल जाता है, तब मायापरवश होनेके कारण अस्वतन्त्र हो जाता है, स्वतन्त्रता उसकी सत्ताका और अस्वतन्त्रता उसकी असत्ताका भान कराती है।

६०० ------------------ श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् ---------------- [खण्ड ९ मे भी त्रिगुणमय स्वरूपसे स्थित रहनेवाली, सर्वत्र ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपमें उपस्थित और आत्म-चैतन्यसे उदीप्त रहने- वाली है। इसलिये सर्वत्र जो गुण भेदसे त्रिविध स्वरूपकी उपलब्धि होती है, वह आत्माका ही स्वरूप है। कारणरूपमे भी वही स्थित है। मायाके कारण ही जीव और ईश्वरका भेद है। शरीरमे अभिमान रखनेवाला चेतन जीव कहलाता है और उसपर नियन्त्रण रखनेवाला ईश्वर कहा गया है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अर्थात् समष्टि शरीरमे अभिमान रखनेवाले जीवका नाम ही 'हिरण्यगर्भ' है। गुण भेदसे उसके भी तीन रूप है। ईश्वरकी भाँति उसमे भी आत्म चैतन्यका बोध स्वत. प्रकट होता है। यह हिरण्यगर्भ सर्वव्यापी ईश्वर है, क्रिया एव ज्ञानस्वरूप है। सम्पूर्ण क्षेत्र समुदाय सर्वमय है (क्योकि वह सर्वात्मक मायासे उत्पन्न है)। सब अवस्थाओं- मे (छोटे बड़े सभी रूपोंमे) प्रकट हुए सम्पूर्ण जीव भी सर्वमय है। तथापि अल्प शरीरसे अभिमान रखनेके कारण वे अल्प कहलाते है। वही यह परमात्मा सम्पूर्ण भूतों, इन्द्रियों, विराट् ब्रह्माण्ड, इन्द्रियाधिष्ठाता देवों तथा अन्नमय आदि पाँच कोशोंकी सृष्टि करके उनमे प्रवेश करता है और प्रवेश करके मूढ न होते हुए भी मूढकी भाँति व्यवहार करता रहता है। यह सब कुछ मायासे ही होता है। (अत. मायाका कार्य होनेसे यह जगत् और तत्सम्बन्धी व्यवहार सब के-सब मिथ्या ही हैं।) इसलिये यह आत्मा एकमात्र अद्वितीय ही है। यह सन्मात्रस्वरूप, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सत्य, मुक्त, निरञ्जन (मायातीत), विभु (सर्वव्यापक), अद्वैत, आनन्दमय, पर (सर्वोत्कृष्ट) तथा प्रत्यगेकरस (आत्मामे ही एकमात्र रस की उपलब्धि करनेवाला) है। इन प्रत्यक्ष आदि तथा सत्, चित्, आनन्दकी उपलब्धि आदि प्रमाणोंद्वारा इसका ज्ञान होता है। यह सब कुछ सत्तामात्र ही है। इस कार्य कारणमय जगत्के पूर्वसे केवल सस्वरूप ब्रह्म ही स्वतःसिद्ध है (श्रुति भी कहती है—'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्')। इस ब्रह्ममें उससे भिन्न दूसरी किसी वस्तुका अनुभव नहीं होता। ब्रह्ममें अविद्या भी नहीं है, क्योंकि वह ज्ञानस्वरूप, स्वयम्प्रकाश, सबका साक्षी, निर्विकार और अद्वितीय है। यहाँ इस जगत्मे भी देखो—जो कुछ भी है, वह सन्मात्र है। जो सत्से भिन्न है, वह असत् है। इस प्रकार सम्पूर्ण कल्पनाओंके साक्षीरूपसे सत्यस्वरूप ब्रह्मकी ही पहलेसे उपलब्धि होती है। वास्तवमे कार्यकी सत्ता न होनेसे यह परमात्मा कारणरूप भी नहीं है। यह सद्-स्वरूप ब्रह्म अपने आत्मामें ही स्थित, आनन्दमय, चिद्धनस्वरूप एवं स्वतःसिद्ध है। निश्चय ही किन्हीं अन्य प्रमाणोंसे इसकी सिद्धि नहीं होती। वही विष्णु, वही शिव और वही ब्रह्मा है। अन्य सब रूपोमे भी वही उपलब्ध होता है। वह सर्वग (सर्वत्र व्यापक) एव सर्वस्वरूप है। अतएव नित्य-शुद्ध है। उसके स्वरूपका कभी बाघ नहीं होता। वह बुद्ध (ज्ञानस्वरूप), सुखरूप आत्मा है। यह सम्पूर्ण जगत् निरात्मक (आत्मासे शून्य) नहीं हे, तथा निरपेक्ष आत्मा भी नहीं है, क्योंकि स्वतन्त्र आत्मा तो इस जगत्‌की उत्पत्तिके पहलेसे ही स्वतःसिद्ध है। यह सब जगत् कदापि सत्य नहीं है। आत्मा अपनी ही महिमामे स्थित, सर्वथा निरपेक्ष, एकमात्र साक्षी और स्वयम्प्रकाश है।' देवताओने पूछा—'वह नित्य, शुद्ध बुद्ध एव आत्मभूत तत्त्व क्या है ?' प्रजापतिने कहा—'वही आत्मा है। उस ब्रह्मके आत्मा होनेमे किसी प्रकारका सशय नहीं करना चाहिये। यह आत्मस्वरूप ब्रह्म ही इस मम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करता हे। यह द्रष्टाका भी द्रष्टा, निर्विकार, साक्षी, नित्य सिद्ध और अविधारहित है; क्योकि यह बाहर और भीतर है तथा कार्य और कारणका भी निरीक्षण करनेवाला है। यह पहलेमे ही भलीभाँति प्रकाशित है तथा अज्ञानरूप अन्धकारसे सर्वथा परे है।' इतना उपदेश देकर प्रजापतिने पूछा-देवताओ ! बताओ तो सही, मेरे द्वारा उपदेश दिये हुए आत्माके स्वरूपका तुम्हे साक्षात्कार हुआ कि नहीं ? देवता बोले—हमने आत्माके स्वरूपका साक्षात्कार ता किया; किंतु वह अव्यवहार्य (व्यवहारमे न आनेयोग्य ) तथा अल्प है। यह सुनकर प्रजापतिने कहा—'नहीं, आत्मा अल्प नही है। वह सबका साक्षी है, निर्विशेष है। उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। वह सुख और दुःख दोनोंसे रहित हे। अद्वितीय परमात्मा है। सर्वज्ञ है, अनन्त है, अभिन्न है तथा द्वैतरहित है । मायाके कारण ही उसकी सदा सम्यक् प्रकारसे उपलब्धि नही होती। परतु वास्तवमे वह प्रकाशित न होनेवाला नही है। कारण कि वह स्वय- प्रकाश है। माया और अज्ञान भी आत्मामें ही कल्पित होनेके कारण आत्मासे भिन्न नहीं हैं । तुम्हीं सब लोग आत्मा हो।' इतना कहकर पुनः प्रश्न किया—'क्या अब भी तुम्हें आत्म-तत्त्वका दर्शन हुआ ? यदि हुआ तो अद्वैतरूपसे या द्वैतरूपसे ?' देवताओने कहा—हमें तो द्वैतका ही दर्शन होता है। प्रजापतिने कहा—'नही, तुम्हें द्वैतरूपमें आत्माका दर्शन नहीं होता; क्योंकि आत्मा तो तुम्हीं हो। यह तुमखे

खण्ड ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६०१

भिन्न नहीं है।' तब देवताओंने कहा- भगवन् ! अभी पुनः उपदेश कीजिये। प्रजापतिने कहा- 'तुम स्वयं ही आत्मा हो। तुमसे पृथक् द्वैतका कहीं दर्शन नहीं होता। यदि तुम्हें द्वैत दिखायी देता है तो तुम आत्मज्ञ नहीं हो; क्योंकि यह आत्मा असङ्ग है। (जो असङ्ग है, उसका द्वैतके साथ सम्बन्ध न होनेके कारण उसे द्वैतका दर्शन भी नहीं हो सकता।) तुम अपनेको-आत्माको द्वैतदर्शी मानते हो, इसलिये तुम्हें आत्माका ज्ञान नहीं है।'

अतः तुम्हीं लोग स्वप्रकाश आत्मा हो-तुम स्वयं ही द्वैतरूपमें भासित होते हो, वास्तवमें अद्वैत आत्मा ही हो। यह जो कुछ दिखायी देता है, सब सत्वरूप आत्मा ही है, क्योंकि सब कुछ संवित् (ज्ञान)-स्वरूप है। इसलिये तुम्हीं सत् एव संविद्रूप आत्मा हो (किंतु इस समय ससङ्ग हो रहे हो-मिथ्या द्वैतके प्रति तुम्हारे मनमे आसक्ति हो रही है)। यह सुनकर वे प्रसिद्ध देवता बोले- 'नहीं, ऐसी बात नहीं है। अहो ! हम तो असङ्ग ही हैं-हमारी कहीं भी आसक्ति नहीं है।' तब उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा- 'यदि तुम असङ्ग हो तो तुम्हे द्वैत कैसे दिखायी देता है?' देवता बोले- 'हम नहीं जानते कैसे हमे द्वैत दिखायी देता है।' 'तब तो तुम स्वय ही द्वैतरूपमें प्रकाशित हो रहे हो। (क्योंकि असङ्ग होनेके कारण आत्माको अपनेसे भिन्न किसी द्वैतका दर्शन नहीं हो सकता। जो कुछ दिखायी देता है, वह आत्मामें ही अध्यस्त है, अतः उससे भिन्न नहीं है)' -यों निश्चयपूर्वक प्रजापतिने कहा । (यदि आपने हमें ससङ्ग, सत्-संविद्रूप बताया है तो ससङ्ग, सत् और संवित् असङ्ग आत्माके लक्षण कैसे हो सकते हैं? ऐसी शङ्का होने- पर कहते हैं-) 'तुम ससङ्ग, सत्विद्रूप नहीं हो, (तब आपने हमें सत् और संवित्-स्वरूप बताया क्यों ?' देवताओं- के इस प्रश्नपर प्रजापति बोले- 'हमने सत् और संवित्‌के लक्ष्यभूत आत्मस्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिये ही तुम्हें सत् और संवित् बताया है।) सत् और संवित्-ये दोनों शब्द उसी आत्मतत्त्वको लक्ष्य कराते हैं, जो सृष्टिके पहलेसे ही भलीभाँति प्रकाशित है। वह अव्यवहार्य (व्यवहारमें न ला सकने योग्य) होता हुआ ही अद्वितीय है। देवताओ ! क्या अब भी तुमने आत्माको समझा ?' देवता बोले-'हाँ, भलीभाँति समझ लिया, आत्मा विदित और अविदित- दोनोंसे परे है । (मन-बुद्धिका विषय न होनेके कारण तो वह विदितसे परे है और स्वप्रकाश, चिन्मय होनेके कारण अविदितसे परे है।) तब उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा- वही यह अद्वय ब्रह्म है। वह बृहत् (महान्से भी महान् ) होनेके कारण नित्य है, शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वरूप है, सत्य, सूक्ष्म, सब ओरसे पूर्ण, द्वैतरहित, सत्यस्वरूप, आनन्दरूप तथा चिन्मात्र आत्मा ही है। किसी भी दूसरेके द्वारा वह व्यवहार्य (वाच्य) नहीं है।

"यद्यपि आत्माको दृष्टि आदिका विषय न होनेके कारण तुम देख नहीं पाते, तथापि इस ब्रह्मको, जो प्रणवका वाच्यार्थ होनेके कारण प्रणवरूप ही है, अपने आत्मरूपमें देखो । वही यह सत्य है। आत्मा ब्रह्म ही है और ब्रह्म आत्मा ही है। निश्चय ही इस विषयमें संशय नहीं करना चाहिये। हाँ, अवश्य ही यह सत्य है। इस सत्यको विवेकशील विद्वान् ही देख पाते हैं। यह ब्रह्म या आत्मतत्त्व न शब्द है न स्पर्श है, न रूप है न रस है, और न गन्ध ही है। न वाणी- द्वारा बोलनेयोग्य है और न हाथसे ग्रहण करनेयोग्य । वह पैरोंसे पहुँचनेयोग्य स्थान भी नहीं है। गुदाद्वारा त्यागने अथवा उपस्थ इन्द्रियद्वारा विषयानन्दके रूपमें अनुभव करने- योग्य भी नहीं है । मनसे मनन करनेयोग्य और बुद्धिसे जाननेयोग्य भी नहीं है। अहङ्कारका और चित्तका भी विषय नहीं है। प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान-इन पाँचों प्राणोंका भी विषय नहीं है। वह न इन्द्रियरूप है न विषयरूप । उसके न करण हैं न लक्षण है। वह असङ्ग, निर्गुण, निर्विकार, अनिर्देश्य, सत्त्व, रज एव तमोगुणसे रहित तथा मायासे शून्य है। वह उपनिषदोंके द्वारा ही लक्षणासे जाननेयोग्य है । भलीभाँति प्रकाशित है । सदा एकरस प्रकाशमय है। इस सम्पूर्ण कार्य-कारणमय जगत्‌के पहलेसे ही भलीभाँति प्रकाशित है। उस अद्वय तत्त्वको 'मैं वह हूँ और वह मेरा स्वरूप है' इस प्रकार देखो।" योँ कहकर वे प्रसिद्ध प्रजापति बोले- देवताओ ! क्या इस आत्माको तुमने देखा अथवा नहीं देखा ? देवताओने कहा- 'देखा, वह विदित और अविदितसे परे है। अहो ! यह माया कहाँ चली गयी ? और कैसे इस स्वप्रकाश आत्मामें पहले रह सकी ?' प्रजापतिने कहा- उससे क्या ? (क्या इस बातको न जानने- से तुमसे कोई न्यूनता आ जाती है?) नहीं, कुछ भी नहीं-देवताओने कहा । प्रजापति बोले- 'इस मायाके लिये आश्चर्य करनेकी आवश्यकता नहीं, तुम स्वयं ही आश्चर्यस्वरूप हो। (क्योंकि तुम्हारे ही आश्रित रहकर माया विचित्र कार्य करनेकी शक्ति पाती है।) परंतु वास्तवमें तुम भी आश्चर्य-

६०२ * श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड ९ रूप नहीं हो (क्योंकि स्वरूपभूत सत्तामात्रसे ही तुम माया- की आश्चर्यरूपतामें हेतु बनते हो, विकारको प्राप्त होकर नहीं, अतः सर्वदा एकरूप होनेके कारण तुम्हें आश्चर्य रूप भी नहीं कहा जा सकता)'-प्रजापतिने कहा । "जो कुछ बताया गया, इसे 'हाँ' कहकर 'अनुज्ञा' रूपसे स्वीकार करो और इस आत्माके विषयमे बताओ।" आत्मा ज्ञात भी है और अज्ञात भी, देवताओने उत्तर दिया और कहा- वह ऐसा भी (ज्ञात-अज्ञात भी) नहीं है। 'फिर भी उसके आत्मसिद्ध स्वरूपको तो बताओ ही।' प्रजापतिने जब यो कहा, तब देवता बोले- 'भगदन् ! हम केवल देखते ही हैं, फिर भी नहीं देखते, हम उसे कहकर बता नहीं सकते। भगवन् ! आपको नमस्कार है, हमपर प्रसन्न होइये ।' देवताओंका यह कथन सुनकर प्रजापति बोले- डरो मत, पूछो, क्या जानना चाहते हो ? देवता बोले- भगवन् ! यह अनुज्ञा क्या है ? 'यह आत्मा ही अनुज्ञा है,' प्रजापतिने कहा । तब देवता बोले-भगवन् ! आपको नमस्कार है, हम आपके ही हैं। इस प्रकार उन प्रसिद्ध प्रजापतिने देवताओंको उपदेश दिया, उपदेश दिया। इस विषयमें यह श्लोक है- ओतमोतेन जानीयादनुज्ञातारमान्तरम् । अनुज्ञामद्वयं लब्ध्वा उपद्रष्टारमाव्रजेत् । उपद्रष्टारमाव्रजेत् ॥ 'ओत (व्यापक) आत्माको ओत (प्रणव) के द्वारा जाने । फिर अनुज्ञातारूप प्रणवके द्वारा अनुज्ञाता आत्माको जाने। तत्पश्चात् अनुज्ञा-प्रणवके द्वारा अनुज्ञारूप आत्माको जाने तथा अविकल्परूप प्रणवद्वारा अविकल्परूप आत्माको जानकर उपद्रष्टा भावको प्राप्त हो-साक्षीरूपसे स्थित हो जाय।' (इस श्लोकमें आठवें और नवें खण्डोंका संक्षेपमे सार आ गया है। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थ-समाप्ति सूचित करनेके लिये है।) ॥ नवम खण्ड समाप्त ॥ ९ ॥ ॥ अथर्ववेदीय श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः ! ! शान्तिः ! ! ! सत्यकी जय है सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ (मुण्डक० ३।१।६) सत्यकी ही जय होती है, असत्यकी नहीं, वह देवयानमार्ग सत्यसे ही व्याप्त है, जिससे पूर्णकाम ऋषिगण गमन करते हैं, जहाँ उस सत्यस्वरूप परमात्माका परमधाम है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ सामवेदीय महोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम अध्याय सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन अब यहाँपे महोपनिषद्का व्याख्यान किया जाता है। उस समय निश्चयपूर्वक एक नारायण थे; न ब्रह्मा थे न रुद्र, न जल था न अग्नि और न सोम थे, न ये द्युलोक और भूलोक थे, न नक्षत्र थे और न सूर्य थे, न चन्द्रमा ही थे। उन्होंने एकाकी रहना पसंद नहीं किया। उन परम पुरुषका अन्तःस्थ सङ्कल्परूपी व्यान यज्ञस्तोम (महान् यज्ञ) कहलाया। उससे उत्पन्न हुए चौदह पुरुष और एक कन्या। दस इन्द्रिय, ग्यारहवाँ तेजस्वी मन, बारहवाँ अहङ्कार, तेरहवाँ प्राण तथा चौदहवाँ आत्मा—ये ही चौदह पुरुष हैं और पन्द्रहवीं बुद्धि ही कन्या है। इनके अतिरिक्त पाँच सूक्ष्मभूतरूपी तन्मात्राएँ तथा पाँच महाभूत—इन पचीस तत्त्वोंका एक पुरुष (विराट् शरीर) बना। उसमें विराट् पुरुषने प्रवेश किया। इन पचीस तत्त्वोंवाले पुरुषसे प्रधान संवत्सर नहीं उत्पन्न होते। कालरूपी संवत्सरसे ही इस पुरुषके संवत्सर उत्पन्न हुए। पश्चात् उन प्रसिद्ध नारायणने अन्य कामनासे मनमें ध्यान किया, उन अन्त.स्थ ध्यान करनेवालेके ललाटसे तीन नेत्रोंवाला, हाथमें त्रिशूल लिये हुए पुरुष उत्पन्न हुआ। उस श्रीसम्पन्न पुरुषके अङ्गमें यश, सत्य, ब्रह्मचर्य, तप, वैराग्य, स्वाधीन मन, ऐश्वर्य और प्रणवके साथ व्याहृतियाँ, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद तथा सारे छन्द समाश्रित थे। इसी हेतु वह महान् देवता 'ईशान' और 'महादेव' कहलाया। पश्चात् पुनः नारायणने अन्य कामनासे मनमें ध्यान किया। उन अन्त'स्थ ध्यानीके ललाटसे स्वेद गिरा, वह पसीना फैलकर जल बन गया। उस जलसे हिरण्यमय तेजके रूपमें अण्ड उत्पन्न हुआ, उससे चतुर्मुख ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। उन्होंने ध्यान किया। पूर्व दिशाकी ओर मुख करके भूः व्याहृति, गायत्री छन्द, ऋग्वेद एवं अग्नि देवताका ध्यान किया। पश्चिमकी ओर मुख करके भुवः व्याहृति, त्रिष्टुप् छन्द, यजुर्वेद एवं वायु देवताका ध्यान किया। उत्तरकी ओर मुख करके स्वः व्याहृति, जगती छन्द, सामवेद एवं सूर्य देवताका ध्यान किया। दक्षिणकी ओर मुँह करके महः व्याहृति, अनुष्टुप् छन्द, अथर्ववेद, तथा सोम देवताका ध्यान किया। सहस्रों सिरवाले देवताका, जिनके सहस्रों नेत्र हैं, जो सब प्रकारके कल्याणके हेतु हैं, जो सर्वतः व्याप्त हैं, परात्पर हैं, नित्य हैं, सर्वरूप हैं—उन हरि नारायणका ब्रह्माने ध्यान किया। ये परम पुरुष ही विश्वरूप हैं; इन पुरुषपर ही विश्वका जीवन अवलम्बित है, उन विश्वके स्वामी, विश्वरूप, विश्वेश्वरको— क्षीरसागरमें शयन करनेवाले देवताको ब्रह्माने ध्यानमें देखा। पद्मकोशके समान, सम्यक्रूपसे कोशके आकारमें लम्बाय- मान अधोमुख जो हृदय है, जिससे निरन्तर सीत्कार-शब्द निकल रहा है, उसके मध्यमें एक महान् ज्वाला प्रज्वलित हो रही है, जो विश्वको प्रकाशित करनेवाली दीपशिखाके समान दसों दिशाओंमें प्रकाश वितरण करती है, उस ज्वालके मध्यमें थोड़ी दूर ऊपर उठी हुई एक पतली वह्निशिखा व्यवस्थित है। उस शिखाके बीचमें परमात्माका निवास है, वे ही ब्रह्मा हैं, वे ही ईशान हैं, वे ही इन्द्र हैं, वे ही अक्षर परम स्वराट् हैं। ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय

ॐ द्वितीय अध्याय शुकदेवजीको आत्माके सम्बन्धमें जनकका उपदेश जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका स्वरूप शुक नामके एक महातेजस्वी मुनीश्वर थे, जो निरन्तर आत्मानन्दके आस्वादनमे तत्पर रहते थे। उन्होंने उत्पन्न होते ही सत्यकी, तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति की । इसलिये उन महामना शुकदेवजीने अपने विवेकसे स्वयं—बिना किसी उपदेशके चिरकालतक विचारकर आत्मस्वरूपका निश्चय किया ॥१-२॥ अनिर्वचनीय होनेके कारण, अगम्य होनेके कारण और मनरूपी षष्ठ इन्द्रियमें स्थित होनेके कारण यह आत्मा अणु-परिमाण है, चिन्मात्र है, आकाशसे भी अत्यन्त सूक्ष्म है । इस परम चिद्रूपी अणुके भीतर कोटि कोटि ब्रह्माण्डरूपी रेणुकाएँ शक्ति क्रमसे उत्पन्न और स्थित होकर विलीन होती रहती हे । बाह्यशून्यताके कारण आत्मा आकाश स्वरूप है और चिदृढ़ताके कारण अनाकाशस्वरूप है, उसका निर्देश नही किया जा सकता, अतएव वह अवस्तुरूप है, उसकी सत्ता है, अतः वह वस्तुरूप है, प्रकाशात्मक होनेके कारण वह चेतन है और वेदनाका विषय न होनेके कारण वह शिलाके समान है, अपने अन्तःस्थ आत्माकाशमे वह चित्र विचित्र— नाना प्रकारके जगत्‌का उन्मेष करता है। यह विश्व उसका आत्म- प्रकाशमात्र है, अतएव उससे पृथक् नहीं है। जगद्‌भेद भी आत्मा- मे ही भासित हो रहा है, अतएव वह भेद भी आत्ममय ही है । वह सबसे सम्बद्ध है, इस दृष्टिसे उसकी सर्वत्र गति है, और उसमें गति न होनेके कारण वह कहीं जाता नहीं । उसका कोई आश्रय न होनेके कारण वह 'नास्ति' रूप है, तथा सत्वरूप होनेके कारण 'अस्ति'-रूप हे । धनदाताकी परम गति है । जो ब्रह्म आनन्द और विज्ञानस्वरूप है, चित्तके द्वारा सारे सङ्कल्पोंका परित्याग ही जिसका ग्रहण है, जाग्रत् अवस्थाकी प्रतीतिके अभावको ही जिसकी प्रतीति बुद्धिमान् लोग बतलाते हैं, जिसके सङ्कोच और विकाससे जगत्‌का प्रलय और सृजन होता है, वेदान्त वाक्योंकी जो निष्ठा है तथा वाणीके लिये जो अगोचर है, वही सच्चित्- परमानन्दस्वरूप ब्रह्म मैं हूँ, दूसरा नहीं हूँ—इस प्रकार अपनी ही सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा श्रीशुकदेव मुनिको सब कुछ ज्ञात हो गया । स्वय प्राप्त हुए परतत्त्वमें वे अविश्रान्त-निरन्तर सलग्न मनसे स्थित हुए । 'यही वस्तु है, वह नहीं' इस प्रकारका विश्वास आत्मतत्त्वमें उनको प्राप्त हुआ और तब, जिस प्रकार जलदके धाराप्रपातसे तृप्त हुए चातकका चापल्य दूर हो जाता है, उसी प्रकार नाना प्रकारके भोगोंसे उत्पन्न होनेवाले विषय तापत्रयसे विरत होकर उनका चित्त कैवल्य अवस्थाको प्राप्त हो गया ॥ ३-१३ ॥ एक बार उन विगल प्रसादानन् शुकदेवजीने मेरु पर्वतपर एकान्तमें स्थित हो अपन पिता श्रीकृष्णद्वैपायन मुनिसे भक्ति- पूर्वक प्रश्न किया—'मुनीश्वर । यह जगत् प्रपञ्च कैसे उत्पन्न हुआ, किस प्रकार विलीन होता है ? यह क्या है, किसका है, कब हुआ है ? बतलाइये ।' इस प्रकार पूछनेपर आत्मज्ञानी व्यासजी भगवान्‌ने शुकको यथावत् सारी बातें बतलायीं, किंतु 'ये सब बाते तो मुझे पहलेसे ही ज्ञात है' यो समझकर शुकदेवजीने पिताकी बातोंको अपनी बुद्धिमे वैसा आदर नहीं दिया । इस प्रकार शुकदेवजीके अभिप्राय- को समझकर भगवान् व्यासजीने शुकदेव मुनिसे कहा, 'मैं तत्त्वतः इन बातोको नहीं जानता । मिथिलापुरीमे जनक नामके एक राजा है, वे इन सब बातोंको भलीभाँति जानते हैं, पुत्र ! तुम उनसे सब कुछ प्राप्त कर सकते हो ।' पिताके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर श्रीशुकदेवजीने सुमेरु पर्वतसे उतरकर भूतलकी ओर प्रयाग किया ओर वे जनकके द्वारा परिपालिक्त विदेहनगरीमे जा पहुँचे ॥ १४-२० ॥ जब द्वारपालोंने महात्मा जनकको यह समाचार दिया कि 'राजन् ! राजद्वारपर महर्षि व्यासके पुत्र श्रीशुकदेव मुनि उपस्थित है,' तब शुककी परीक्षाके लिये राजाने अवज्ञापूर्वक केवल इतना ही कहा कि 'वे वही ठहरें' इसके बाद राजा सात दिन चुप रहे । तदनन्तर राजा जनकने शुकदेवजीको राज प्राङ्गणमे बुलवाया। वहाँ भी राजा सात दिनोंतक उसी प्रकार उदासीन रहे । तदनन्तर राजाने उनको अन्त:पुरके आँगनमे बुलवाया, और वहाँ भी सात दिनोंतक राजा शुकदेवजीके सामने नही आये । महाराज जनकने अन्त:पुरमे युवती स्त्रियों, नाना प्रकारके भोजन तथा भोग्य-पदार्थोंके द्वारा सौम्यवदन शुकदेवजीका आदर-सत्कार किया। वे भोग और भोज्य पदार्थ व्यास पुत्र श्रीशुकदेवके मनको उसी प्रकार नहीं हर सके, जिस प्रकार मन्द पवन दृढतापूर्वक स्थित हुए पर्वतको चलायमान नहीं कर सकता । शुकदेवजी असङ्ग, समभावापन्न, निर्विकार, मौन और प्रसन्नचित्त होकर निर्मल पूर्णचन्द्रके समान स्थित रहे ॥ २१-२७ ॥

अध्याय २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६०५

अध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६०५ जब राजा जनकने इस प्रकार श्रीशुकदेवजीके स्वभावकी परीक्षा कर ली, तब उन्हे पास बुलाया और प्रसन्नचित्त देखकर उन्हें प्रणाम किया। उनका स्वागत करते हुए राजाने कहा—'आपने अपने सांसारिक कृत्योंको नि शेष कर दिया है, आपको सारे मनोरथ प्राप्त हैं ऐसी स्थितिमें आपकी क्या अभिलाषा है ?' श्रीशुकदेव मुनि बोले—'गुरुवर ! मुझे शीघ्र और ठीक ठीक बतलाइये कि यह जागतिक प्रपञ्च कैसे उत्पन्न होता है और किस प्रकार विलीन होता है ?' महात्मा जनकने श्रीशुकदेवजीसे सारी बातें यथावत् बतलायीं, उन्हीं बातोंको उनके परम ज्ञानी पिता पहले ही बतला चुके थे। (इसपर शुकदेवजीने कहा—) 'मैने स्वय ही विशेषरूपसे इसे जाना था, पूछनेपर मेरे पिताजीने भी यही बाते मुझको बतलायीं। ज्ञानिश्रेष्ठ ! आपने भी यही बात बतलायी और यही विषय शास्त्रोंमें भी दिखलायी देता है। मनके विकल्पसे प्रपञ्च उत्पन्न होता है और उस विकल्पके नाश होनेपर इसका नाश हो जाता है। निन्दनीय संसार निःसार है, यह निश्चित है। तब हे महाभाग ! यह है क्या वस्तु ? मुझे सत्य बात बतलाइये। जगत्‌के सम्बन्धमें भ्रान्त हुआ मेरा चित्त आपके द्वारा ही शान्तिको प्राप्त कर सकता है' ॥ २८-३५ ॥ राजा जनकने कहा—'शुकदेवजी ! तुम सुनो, मै सारे ज्ञान विस्तारको कहता हूँ—जो समस्त ज्ञानका सार तथा रहस्यों- का भी रहस्य है, एव जिसके जाननेसे पुरुष शीघ्र ही मुक्तिको प्राप्त हो जाता है। दृश्य जगत् है ही नहीं—यह बोध हो जानेपर मनकी दृश्य विषयसे परिशुद्धि हो जाती है। जब यह बोध परिपक्व हो जाता है, तब उससे निर्वाणरूपी परमा शान्ति प्राप्त होती है। वासनाओका जो निःशेष परित्याग होता है, वही श्रेष्ठ त्याग है, उसी विशुद्ध अवस्थाको साधुजनोंने मोक्ष कहा है। पुन., जो शुद्ध वासनाओसे युक्त हैं तथा जिनका जीवन अनर्थोसे शून्य है एव जिन्हें ज्ञेयतत्त्व ज्ञात है, महाबुद्धि- मान् शुकदेवजी ! वे पुरुष जीवन्मुक्त कहलाते हैं। पदार्थ- भावनाकी दृढता ही बन्ध कहलाती है और ब्रह्मन् ! वासनाओं- की क्षीणताको ही मोक्ष कहा जाता है ॥ ३६-४१ ॥ 'बिना तप.साधन आदिके, स्वभावत. ही जिसे जगत्‌के भोग अच्छे नहीं लगते, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। यथासमय प्राप्त होनेवाले सुखों और दु खोंमें अनासक्त हुआ जो न प्रसन्न होता है और न दुःखी होता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। हर्ष, अमर्ष (उद्वेग), भय, क्रोध, काम और कार्पण्य(शोक)की दृष्टिसे जिसका अन्तःकरण अछूता रहता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहङ्कारमयी वासनाको सहज ही त्याग करके स्थित होता है, वह चित्तावलम्बनका सम्यक् त्याग करनेवाला जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसकी दृष्टि सदा अन्तर्मुखी रहती है, जिसको न किसी पदार्थकी आकाङ्क्षा होती है और न उपेक्षा, जो सुषुप्तिके समान स्थितिमे विचरण करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सदा आत्मामे रत है, जिसका मन पूर्ण और पवित्र है, परमश्रेष्ठ शान्त अवस्थाको प्राप्त कर जो ससारमे किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करता, जो किसीके प्रति आसक्ति न रखता हुआ उदासीन विचरण करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका हृदयाकाश सवेद्य पदार्थोंके द्वारा तनिक भी लिपायमान नहीं होता, तथा चेतन संवित् ही जिसका स्वरूप है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। राग द्वेष, सुख-दुःख, धर्माधर्म, फलाफलकी अपेक्षा न करके जो काम करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहम्भावको छोड़कर, मान और मत्सर त्यागकर, निरुद्वेग और सङ्कल्पहीन होकर कार्य करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सर्वत्र स्नेहरहित होकर साक्षीके समान अवस्थित रहता है, तथा बिना किसी इच्छाके कर्तव्यमें लगा रहता है, वह जीवन्मुक्त है। जिसने धर्म और अधर्मको, जगत्‌के चिन्तनको तथा सारी इच्छाओंको अन्तःकरणसे परित्याग कर दिया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। यह सारा दृश्य प्रपञ्च, जो देखनेमे आता है—इसको जिसने भलीभाँति त्याग दिया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। चरपरे, खट्टे, नमकीन, कड़वे, स्वादिष्ट तथा स्वादहीनको जो एक समान समझकर खाता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। बुढापा, मृत्यु, विपत्ति, राज्य और दारिद्र्य—सबको रम्य मानकर जो उपभोग करता है, वह जीवन्मुक्त है। धर्म और अधर्म, सुख-दुःख, तथा जन्म और मरण—इनको जिसने हृदयसे पूर्णतः त्याग दिया है, वह जीवन्मुक्त है। जो समत्वपूर्ण तथा स्वच्छ बुद्धिसे, उद्वेग और आनन्दसे रहित होकर न शोक करता है न उत्साहित होता है, वह जीवन्मुक्त है। सारी इच्छाओ, सारी शङ्काओं, सारी कामनाओं और सारे निश्चयोंका जिसने मनसे परित्याग कर दिया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जन्म, स्थिति और विनाशमें, उच्चतितथा अवनतिमें—सदा जिसका मन एक समान रहता है, वह जीवन्मुक्त है। जो न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है, जो प्रारब्धप्राप्त भोगोंका उपभोग करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने ससारका चिन्तन छोड़ दिया है, जो कलावान् होकर

६०६ महोपनिषद् [ अध्याय २

६०६ * महोपनिषद् * [ अध्याय २ भी निष्कल रहता है, चित्तके होते हुए भी निश्चित्त रहता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सम्पूर्ण अर्थ-जालके मध्य व्यवहार करता हुआ उनसे उसी प्रकार निःस्पृह रहता है, जैसे पराये धनके विषयमें मनुष्य निःस्पृह रहता है, तथा जो आत्मामे ही पूर्णताका अनुभव करता है, वह जीवन्मुक्त है॥ ४२-६२॥ 'शरीरके काल कवलित होनेपर वह जीवन्मुक्त अवस्थाको छोड़कर गतिहीन पवनके समान विदेहमुक्त अवस्थाको प्राप्त होता है। विदेहमुक्त अवस्थामें जीवकी न उन्नति होती है न अवनति होती है और न उसका लय ही होता है' वह अवस्था न सत् है, न असत् है और न दूरस्थ है। उसमें न अहम्भाव है और न परायाभाव है। विदेहमुक्ति गम्भीर, स्तब्ध अवस्था होती है; उसमें न तेज व्याप्त होता है और न अन्धकार। उसमें अनिर्वचनीय, और अभिव्यक्त न होनेवाला एक प्रकारका सत् अवशिष्ट रहता है। वह न शून्य होता है न आकारयुक्त होता है, न दृश्य होता है और न दर्शन होता है। उसमे ये भूत और पदार्थोंके समूह नहीं होते-केवल सत् अनन्तरूपमें अवस्थित होता है। वह ऐसा अद्भुत तत्त्व होता है कि जिसके स्वरूपका निर्देश नहीं किया जा सकता। उसकी आकृति पूर्णसे भी पूर्णतर होती है। वह न सत् होता है न असत्, और न सत्-असत् दोनों होता है; न भाव होता है और न भावना, वह चेतनामात्र होता हैपरन्तु चित्तविहीन होता है, अनन्त होता है। अजर होता है परंतु शिवस्वरूप, कल्याणकारी होता है। उसका आदि, मध्य और अन्त नहीं होता। वह अनादि तथा दोषहीन होता है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीमे वह केवल दर्शनस्वरूप माना जाता है । शुकदेव मुनि ! इस विषयमें इसके अतिरिक्त कोई दूसरा निश्चय नहीं किया जा सकता । तुमने इस तत्त्व- को स्वय ही जान लिया है तथा, अपने पितासे भी सुना है कि जीव अपने सङ्कल्पसे ही बन्धनमे पड़ता है और सङ्कल्पहीन होनेपर मुक्त हो जाता है। अतएव तुमने स्वय उस तत्त्वको जान लिया, जिसको जान लेनेपर इस संसारमें महात्माओं- को समस्त दृश्योंसे अथवा भोगोंसे विरति उत्पन्न हो जाती है। तुमने पूर्ण चेतनाम स्थिति लाभकर समस्त प्राप्तव्य वस्तुको प्राप्त कर लिया है। तुम तपःस्वरूपमे स्थित हो। ब्रह्मन् ! तुम मुक्त हो, भ्रान्तिको छोड़ो । शुकदेवजी ! बाहर तथा अत्यन्त बाहर, अन्तःकरणमें तथा उसके भी भीतर देखते हुए भी तुम नहीं देखते, तुम पूर्ण कैवल्य-स्थितिमे साक्षि- मात्र रहते हो' ॥ ६३-७३ ॥ तदुपरान्त श्रीशुकदेवजी शोक, भय और श्रमसे रहित होकर, संशयहीन और निष्काम हो, परतत्त्वस्वरूप आत्मामें स्थित होकर चुपचाप विश्रामको प्राप्त हुए । अखण्ड समाधि- के लिये वे सुमेरु पर्वतके शिखरकी ओर लौट गये । वहाँ सहस्रों वर्षोंतक, स्नेहहीन दीपकके समान उन्होंने आत्मदेशमे स्थित हो निर्विकल्प समाधिके द्वारा शान्तिलाभ किया । सङ्कल्परूपी दोषोंसे रहित, शुद्धस्वरूप, पवित्र और निर्मल आत्मपदमें वे महात्मा शुकदेवजी वासनाविहीन होकर उसी प्रकार एकत्वको प्राप्त हुए, जिस प्रकार सलिल-कण समुद्रमें विलीन होकर उसमें एकताको प्राप्त होता है ॥ ७४-७७ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥

तृतीय अध्याय

ॐ तृतीय अध्याय निदाघके वैराग्यपूर्ण उद्गार

निदाघ नामके एक मुनीश्वर बालक अपने पितासे आज्ञा प्राप्तकर अकेले तीर्थयात्राके लिये निकले । साढे तीन करोड़ तीर्थोंमें स्नान करके अपने घर लौटे तथा घर लौटकर उन महायशस्वीने अपने पिता ऋभु मुनिसे अपना सब समाचार कह सुनाया । [ उन्होंने कहा— ] 'पिताजी ! साढे तीन करोड़ तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो पुण्य हुआ है, उसके फलस्वरूप मेरे मनमें इस प्रकारके विचार प्रकट हुए हैं । संसार उत्पन्न होता है, नष्ट हो जाता है और नष्ट होता है पुनः उत्पन्न होनेके लिये । समस्त चर और अचर प्राणियोंकी चेष्टाके साथ यह प्रपञ्च अस्थिर है, क्षणस्थायी है । ऐश्वर्यकी भूमिमें ( उत्पन्न होनेवाले ) ये पदार्थ सारी आपदाओंके हेतु हैं । लोहेकी सलाईके समान एक दूसरेसे अलग रहते हुए ये पदार्थ केवल इस मानसिक कल्पनारूपी चुम्बकके द्वारा एकत्र होते हैं । जिस प्रकार पथिकको मरुस्थलमें चलते- चलते विरति हो जाती है, उसी प्रकार मेरी इन पदार्थोंमें अरति हो गयी है। ये जागतिक पदार्थ मुझे दुःखमय प्रतीत होने लगे हैं । अब इस दुःखका शमन कैसे होगा—यह सोच- सोचकर मेरा हृदय सन्तप्त हो रहा है। ये धन, जिनके पीछे चिन्ताओंके समूह चक्रके समान भ्रमण करते रहते हैं, मुझे आनन्द नहीं प्रदान करते । स्त्री पुत्रादि मानो उग्र आपदाओं- के निकेतन हैं । मुनीश्वर ! संसारमें उदार रूपमें स्थित, अत्यन्त कोमलाङ्गी जो ये श्रीलक्ष्मीजी हैं, वे भी परम मोह- की ही हेतु हैं। निश्चय ही वे भी आनन्द प्रदान करनेवाली नहीं हैं । मनुष्यकी आयु पल्लवके कोणके अग्रभागमें लटकते हुए जलकणके समान क्षणभङ्गुर है । इस तुच्छ शरीरको असमय ही छोड़कर उन्मत्तके समान मुझे जाना ही पड़ेगा । विषयरूपी सर्पके सङ्गसे जिनका चित्त जर्जर हो गया है, तथा जिनको प्रौढ आत्मविवेक नहीं हुआ है, उनके लिये जीवन कष्टका ही हेतु बनता है । वायुको लपेटना बनता है, आकाशको खण्ड-खण्ड करना बनता है, लहरोंको गूँथना बनता है, परंतु जीवनमे आस्था रखना नहीं बनता । जिसके द्वारा प्राप्य वस्तुको सम्यक् रीतिसे प्राप्त कर लिया जाता है, जिसके कारण पुनः शोक नहीं करना पड़ता, जिसमें परा शान्ति प्राप्त कर ली जाती है, वही जीवन कहलाता है । यों तो वृक्ष भी जीते हैं, मृग और पक्षी भी जीते हैं; किंतु वस्तुतः वही जीता है, जिसका मन आत्मचिन्तनमें लगा हुआ है। इस संसारमें उत्पन्न हुए उन्हीं जीवोंका जीवन श्रेष्ठ है, जो पुनः आवागमनमें नहीं पड़ते, शेष तो बूढ़े गधेके समान हैं। ज्ञानी पुरुषके लिये शास्त्र भारस्वरूप हैं, रागी पुरुषके लिये ज्ञान भारस्वरूप है, अशान्त पुरुषका मन भारस्वरूप होता है, और जो आत्मज्ञ नहीं हैं, उनके लिये यह शरीर भाररूप है। अहङ्कारके कारण विपत्ति आती है, अहङ्कार- के कारण दुष्ट मनोव्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। अहङ्कारके कारण कामनाएँ उत्पन्न होती हैं। अहङ्कारसे बढ़कर मनुष्यका कोई दूसरा शत्रु नहीं है। अहङ्कारके वश होकर चर और अचर- रूप जिन-जिन भोगोंको मैंने भोगा है, वे सब-के-सब अवस्तु अर्थात् मिथ्या भ्रमरूप थे। वस्तु तो केवल अहङ्कारशून्यता ही है। यह मन व्यग्र होकर इधर-उधर व्यर्थ ही दौड़ता है, व्यर्थ ही दूर-दूरतक जाता है, इसका ढग गाँवमें घूमनेवाले कुत्तेके-जैसा है। तृणारूपी कुतियाके पीछे-पीछे भटकनेवाले कुत्तेके समान इस मूढ़ मनके वशीभूत होकर मैं जड हो गया था। ब्रह्मन् ! अब मैं उसकी दासतासे मुक्त हो गया हूँ। ब्रह्मन् ! चित्तका निग्रह करना समुद्र-पानसे भी कठिन है, सुमेरु-पर्वतको उखाड़ फेंकनेसे भी दुष्कर है तथा अग्नि- भक्षणसे भी विषम कार्य है। बाह्य तथा आभ्यन्तर विषयोंका हेतु चित्त है, उसके आधारपर ही जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों प्रकारके जगत्की स्थिति है। चित्तके क्षीण होनेपर संसार क्षीण हो जाता है। अतएव प्रयत्नपूर्वक चित्तकी ही चिकित्सा होनी चाहिये ॥ १—२१ ॥ 'मुनीश्वर ! जिन-जिन श्रेष्ठ गुणोंका मैं आश्रय लेता हूँ, मेरी तृष्णा उन-उन गुणोंको उसी प्रकार काट डालती है, जैसे दुष्ट चुहिया वीणाके तारको काट डालती है । यह तृष्णा चञ्चल बदरीके समान अलङ्घनीय स्थलमें भी अपना पैर जमाना चाहती है, तृप्त होनेपर भी विविध फलांकी इच्छा करती है, एक स्थानपर चिरकालतक नहीं ठहरती । क्षणमात्रमें पाताल पहुँचती है और क्षणभरमें आकाशकी सैर करती है, क्षणभरमे दिशा- रूपी कुञ्जोंमें घूमने लगती है, यह तृष्णा हृदय-कमलमें विचरण करनेवाली भ्रमरी है । संसारके सारे दुःखोंमें यह तृष्णा ही दीर्घ दुःख देनेवाली है, जो अन्तःपुरमें रहनेवालोंको भी। अत्यन्त सङ्कटमें डाल देती है । तृणारूपी महामारीका नाश !

६०८ महोपनिषद् [ अध्याय ३

६०८ * महोपनिषद् * [ अध्याय ३


करनेवाला मन्त्र है—चिन्ताका त्याग करना । ब्राह्मण ! थोड़ा भी चिन्ताका त्याग करनेसे आनन्दकी प्राप्ति होती है और थोड़ी भी चिन्ता करनेसे दुःख प्राप्त होता है। शरीरके समान गुणहीन, नीच तथा शोचनीय वस्तु कोई नहीं है। अहङ्कार- रूपी गृहस्थका यह शरीर महागृह है। पिताजी ! यह नष्ट हो जाय या चिरकालतक रहे—इससे मुझे क्या ? इन्द्रियरूपी पशु जिसमे पक्तिमे बँधे हुए हैं, जिस घरके प्राङ्गणमे तृष्णा चलती फिरती है, चित्तवृित्तिरूपी भृत्यजनोँसे जो समाकीर्ण है—ऐसा यह शरीररूपी गृह मुझे इष्ट नहीं, प्रिय नहीं। यह मुखरूपी द्वार जिह्बारूपी वदरीसे आक्रान्त होकर भयानक बन रहा है। जिसके द्वारपर दाँतरूपी हड्डीके टुकड़े दिखलायी पड़ रहे हैं—ऐसा यह शरीररूपी गृह मुझे इष्ट नहीं, प्रिय नहीं। हे मुनीश्वर ! भीतर और बाहर रक्त और माससे व्याप्त, केवल विनाशशील इस शरीरमें रम्यता कहाँ है, बतलाइये तो ? शरत्कालीन बादलोँकी बिजलीमें तथा गन्धर्वनगरीमें यदि किसीने स्थिरता निश्चित की है, तो वह इस शरीरकी स्थिरतामें विश्वास कर सकता है। बाल्यावस्थामें गुरुसे, माता-पितासे, बड़े लड़कोँसे तथा अन्य लोगोँसे डर लगता है, अतएव शैशव भयका घर है । (युवावस्था मे) अपने चित्तरूपी गुफामे रहनेवाले, नाना प्रकारके भ्रमोमे डालनेवाले इस कामरूपी पिशाचसे बलात् विवश होकर मनुष्य पराजित हो जाता है। बुढ़ापेमें उन्मत्तके समान काँपते हुए मनुष्यको देखकर दास, पुत्र और स्त्रियाँ, बन्धु तथा मित्रगण हँसा करते हैं। बुढ़ापेमें असमर्थताके कारण लालसा बहुत अधिक बढ़ जाती है। यह बुढ़ापा हृदयमे दाह प्रदान करनेवाली सारी आपदाओंकी प्रिय सहेली है। ससारमे जिस सुखकी भावना की जाती है, वह कहाँ है ? आयुको तृणके समान पाकर काल उसे काटता ही जा रहा है। छोटेसे तृण तथा रजःकणको महेन्द्र तथा स्वर्णमय सुमेरु पर्वतको सर्षप (सरसोँ) बना देनेवाला यह सर्वसहारी काल अपना पेट भरनेके लिये सबको आत्मसात् करनेको उद्यत है । तीनो लोक कालके द्वारा आक्रान्त है ॥ २२-३८ ॥

‘यन्त्रके समान चञ्चल अङ्गरूपी पिंजरेमें मासकी पुतलीके समान, स्नायु तथा अस्थिकी ग्रन्थियोँसे निर्मित स्त्रीके शरीरमें कौन-सी वस्तु है, जिसे सुन्दर कहा जाय ? नेत्रमे स्थित त्वचा, मास, रक्त, आँसू—इनको अलग-अलग करके देखो, इनमें कौन-सी वस्तु रम्य है ? फिर व्यर्थ ही क्यो मोहको प्राप्त हो रहे हो। मेरु-पर्वतके शिखरोँके तटसे समुल्लसित होनेवाली गङ्गाजीकी चञ्चल गतिके समान, हे मुनि ! मुक्ताहारका सम्यक् उल्लास जिसमे देखा गया है, काल आनेपर उस ललनाके स्तनको श्मशानके कोनेमे मासके छोटे पिण्डके रूपमें कुत्ते खाया करते हैं! केश और काजल धारण करनेवाली तथा देखनेमे प्रिय लगनेवाली होनेपर भी जिनका स्पर्श दुःखदायी होता है, वे दुष्कृतिरूप अग्निकी शिखाके समान नारियाँ पुरुषको तृणके सदृश जला डालती है। स्त्रियाँ बहुत दूरपर जलनेवाली नरकाग्नियोंकी सुन्दर और दारुण इन्धनस्वरूपा हैं; वे सरस प्रतीत होनेपर भी वस्तुतः नीरस ह । काम नामके किरातने पुरुषरूपी मृगोके अङ्गोको बन्धनमे बाँधनेके लिये स्त्रीरूपी जाल फैला रक्खा है। पुरुष जो जीवनरूपी तलैयाके मत्स्य हैं और चित्तरूपी कीचडमें विचरण करते हैं, उनको फँसानेके लिये नारी दुर्वॉसनारूपी रज्जुमें बँधी बलीशं पिण्डिका (चारे)- के समान है। यह सारे दोषरूपी रत्नोँको उत्पन्न करनेवाला समुद्र ही है। यह दुःखोंकी श्रृङ्खला हमसे सदा दूर ही रहे। जिसके स्त्री है, उसे भोगेच्छा उत्पन्न होती है। जिसे स्त्री नहीं, उसके लिये भोगका हेतु क्या हो सकता ह ? जिसने स्त्रीको छोड़ दिया, उसका ससार छूट गया और ससारको छोड़कर ही मनुष्य सुखी बन सकता है ॥ ३९-४८ ॥

‘दिशाएँ भी नहीं दीख पड़र्ती, देश भी दूसरेके लिये उपदेशप्रद बन जाते है, अर्थात् काल-कवलित हो जाते है; पर्वत भी चूर-चूर हो जाते है, तारे भी टूक टूक होकर गिर जाते हैं । समुद्र भी सूख जाते हैं, ध्रुव नक्षत्रका जीवन भी अस्थायी होता है। सिद्ध पुरुष भी नाशको प्राप्त होते हैं, दानवादि भी जरायस्त हो जाते है। चिरकालस्थायी ब्रह्मा तथा अजन्मा विष्णुभगवान् भी अन्तर्धान हो जाते हैं। सारे भाव अभावको प्राप्त होते है, दिशाओके अधिपति भी जीर्ण शीर्ण हो जाते है। बड़े-बड़े देवता तथा सारे प्राणिवर्ग, जैसे जल वडवानलकी ओर दौड़ता है, उसी प्रकार विनाशकी ओर दौड़ते हैं। क्षणभरमें आपदाएँ आ घेरती हैं और क्षणमें सम्पदाएँ आ जाती है। क्षणभरमें जन्म होता है और क्षणमें ही मृत्यु हो जाती है। यह समस्त प्रपञ्च नश्वर है। इस विश्वमें कायर पुरुषके द्वारा शूरवीर मारे जाते हैं। एकके द्वारा सैकड़ोँका विनाश होता है। विषय-वासनाके कारण चित्तकी विपन्नता ही विष है, विष विष नहीं कहलाता; क्योँकि विष एक जन्मका विनाश करता है और विषय जन्म-जन्मान्तरको नष्ट कर देते हैं। इस समय इस दोषरूपी दावानलसे दग्ध मेरे चित्तमें ऐसा भान हो रहा है। मृगतृष्णा- के सरोवरमे खड़े होनेपर भी मुझमें भोगाशाकी स्फुरणा नहीं होती । अतएव हे गुरुवर ! आप तत्त्वज्ञानके द्वारा मुझे शीघ्र ही बोध प्रदान कीजिये । नहीं तो मान और मत्सरको छोड़- कर, चित्तमें भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए मैं चित्र- लिखितकी भाँति रहकर मौन धारण कर लूँगा’ ॥ ४९-५७ ॥

॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥

चतुर्थ अध्याय

ॐ चतुर्थ अध्याय निदाघके प्रति उनके पिता ऋभुका उपदेश निदाघ मुनिकी बात सुनकर उनके पिता ऋभु मुनि बोले—'ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ निदाघ मुनि ! तुम्हारे लिये अब कुछ अन्य ज्ञातव्य नहीं रह गया है । तुम ईश्वरकी कृपासे अपनी प्रज्ञासे ही सब कुछ जान गये हो । तथापि चित्तकी मलिनतासे उत्पन्न तुम्हारे भ्रमको, हे मुनि ! मैं दूर करूँगा । मोक्षद्वारके चार द्वारपाल बतलाये गये हैं—शम, विचार, सन्तोष और चौथा सत्सङ्ग । पूर्ण यत्नपूर्वक सब कुछ छोड़कर इनमें एकका भी आश्रय पकड़ ले। एकको वशमें करनेसे शेष तीनों वशमें हो जाते हैं । पहले संसार-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये शास्त्रोंके द्वारा, तप और दमके द्वारा तथा सत्सङ्गके द्वारा अपनी प्रज्ञाको बढ़ाये । आत्मानुभव, शास्त्र तथा गुरुके वचनोंकी एकवाक्यताके अभ्याससे निरन्तर आत्मचिन्तन किया जाता है । यदि निरन्तर तुम सङ्कल्प और आगाके अनुसन्धानका त्याग करते हो तो तुम्हें वह पवित्र अचित्तत्व—कैवल्य प्राप्त ही है । चित्तका जो अकर्तृत्व है, वही चित्तकी वृत्तियोंका निरोध अर्थात् समाधि कहलाता है । यही केवल अवस्था है और यही परम कल्याणरूपा परा शान्ति कहलाती है । संसारके समस्त पदार्थोंमें आत्मभावनाका भलीभाँति मनसे परित्याग करके तुम संसारमें गूँगे, अंधे और बहिरे-से होकर रहो । 'सब कुछ प्रशान्त है, एक है, अजन्मा है, आदि- मध्य-हीन है, सब ओर प्रकाशयुक्त है, केवल अनुभवरूप है, अचित्त है, सब कुछ प्रशान्त है'—इत्यादि जो शब्दमयी दृष्टि है, वह व्यर्थ है । आत्मबोधमें बाधक ही है । जो कुछ भी यह दृश्य प्रपञ्च है, तत्त्वतः सब प्रणवरूप है । जो कुछ भी दृश्य यहाँ दिखलायी देता है, वह चिद्-जगत्में दिखलायी देता है । वह चित्‌के निष्पन्दका एक अंशमात्र है । अतएव चित्‌से अतिरिक्त कुछ नहीं है—ऐसी भावना करो । तुम नित्य प्रबुद्धचित्त होकर सांसारिक कार्योंको करते हुए भी आत्माके एकत्वको जानकर प्रशान्त महासिन्धुके समान निश्चल बने रहो ॥१-११॥ 'वासनारूपी तृणका दग्ध करनेवाला अग्नि यह आत्म- ज्ञान ही है । इसे ही 'समाधि' शब्दसे लक्षित करते हैं । चुपचाप बैठे रहना समाधि नहीं है। जिस प्रकार रत्नके इच्छारहित होकर पड़े रहनेपर भी लोग उसकी ओर आकर्षित होते हैं, उसी प्रकार सत्तामात्र परतत्त्वकी ओर सारा जगत् आकर्षित होता है। अतएव हे मुनि ! आत्मामे कर्तृत्व और अकर्तृत्व दोनों हैं । इच्छारहित होनेके कारण आत्मा अकर्ता है और सन्निधिमात्रसे वह कर्ता है। मुनि ! कर्तृत्व और अकर्तृत्व—ये दोनों ब्रह्ममें पाये जाते हैं । जिसमें यह चमत्कार है, उसका आश्रय लेकर स्थिर हो जाओ । अतएव 'मैं नित्य ही अकर्ता हूँ' इस प्रकारकी प्रबल भावनासे युक्त होनेपर केवल परम अमृता नामकी समता ही अवशिष्ट रहती है। निदाघ ! सुनो; जो मत्त्वमें स्थित होकर इस लोकमें जन्मे हैं, वे महान् गुणी हैं । उनकी सदा ही उन्नति होती है तथा वे आकाशमें चन्द्रमाओंके समान सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ १२-१७ ॥ 'सत्त्वस्थ पुरुष रात्रिमें स्वर्णकमलकी भाँति विपत्तिमें कुम्हलाते नहीं । वे प्राप्त भोगके सिवा अन्य वस्तुकी आकाङ्क्षा नहीं करते और शास्त्रोक्त मार्गमें विचरण करते हैं। वे स्वभावतः ही मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा प्रभृतिगुणोंसे सुशोभित रहते हैं । सौम्य ! वे समभावमे रहते हुए निरन्तर साधुवृत्तिमें एकरस बने रहते हैं । समुद्रके समान मर्यादाको छोड़कर वे विशालहृदय हो जाते हैं । वे महात्मा सूर्यनारायण- के समान नियति-पथपर ( नियमानुकूल ) चलते रहते हैं । 'मै कौन हूँ, यह विस्तृत जगत्प्रपञ्च कैसे उत्पन्न हुआ'— संतजनोंके साथ प्राज्ञपुरुष यत्नपूर्वक इन प्रश्नोंपर विचार करे। वह अकार्यमे न लगे, तथा अनार्य पुरुषका सङ्ग न करे; सबका सहार करनेवाले मृत्युको उपेक्षाकी दृष्टिसे न देखे । शरीर, अस्थि, मास तथा रक्त आदिको घृणास्पद समझकर उनकी उपेक्षा करे तथा प्राणिसमुदायरूपी मोतियोंकी लड़ियोंमें सूत्रके समान पिरोये हुए चिदात्मापर ही दृष्टि रक्खे । उपादेय वस्तुकी ओर दौड़ना तथा हेयवस्तुका सर्वथा त्याग कर देना—यह जो मनका स्वरूप है, वह बाह्य है, आभ्यन्तर नहीं, इसको जान लो । चिद्घनके विषयमे गुरु और शास्त्रके द्वारा बतलाये हुए मार्गसे तथा अपनी अनुभूतिसे 'मैं ब्रह्म ही हूँ'—यों जानकर मुनि शोकविहीन हो जाय । इस अवस्थामें शतशः तीक्ष्ण कृपाणके आघात कमलके कोमल आघातके समान सह्य हो जाते हैं, अग्निके द्वारा दाह हिम- उ० अ० ७७-७८-

६१० महोपनिषद् [ अध्याय ४

६१० * महोपनिषद् * [ अध्याय ४ ज्ञानके समान सह्य हो जाता है, अँगारोंपर लोटना चन्दनके लेपके समान शीतल लगता है, निरन्तर वाणोंके समूहका शरीरपर गिरना गर्मीको शान्त करनेवाले धारागृह (फव्वारे) के जलकणों- की वर्षाके समान मनोरञ्जक बन जाता है, अपने सिरका काटा जाना सुखप्रद निद्राके समान, (जीभ आदि काटकर) गूँगा कर दिया जाना मुखके मूँद दिये जानेके समान तथा बधिरता महान् उन्नतिके समान लगती है; पर यह अवस्था उपेक्षासे नहीं प्राप्त होती । दृढ वैराग्यजन्य आत्मज्ञानसे यह प्राप्त होती है । गुरुके उपदेशानुसार स्वानुभूति आदिके द्वारा जो अन्तःकरणकी शुद्धि होती है, उसके अभ्यासद्वारा निरन्तर आत्मसाक्षात्कार किया जाता है। जिस प्रकार दिग्भ्रमके नष्ट हो जानेपर पहलेके समान ही दिशाका बोध होने लगता है, उसी प्रकार विज्ञानके द्वारा विध्वस्त हो जानेपर जगत् नहीं रहता—इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये । न धनसे पुरुषका उपकार होता है, न मित्रोंसे और न बान्धवोंसे । न शारीरिक क्लेशके दूर होनेपर और न तीर्थस्थानमें वास करनेसे पुरुष उपकृत होता है । केवल चिन्मात्रमें विलीन होनेपर ही परम पद प्राप्त हो सकता है ॥ १८-२८ ॥ ‘जितने दुःख हैं, जितनी तृष्णाएँ हैं तथा जितनी दुःसह दुश्चिन्ताएँ हैं, शान्तचित्त पुरुषोंमें वे सब उसी प्रकार नष्ट हो जाती हैं, जिस प्रकार रवि-किरणोंमें अन्धकार नष्ट हो जाता है । इस संसारमें शमसे युक्त पुरुषका कठोर और मृदु—सभी प्राणी उसी प्रकार विश्वास करते हैं जैसे माताका पुत्र विश्वास करते हैं । अमृतके पान करनेसे तथा लक्ष्मीके आलिङ्गनसे वैसा सुख नहीं प्राप्त होता, जैसा सुख मनुष्य मनकी शान्तिसे पाता है । शुभाशुभको सुनकर, स्पर्श करके, भोजन करके, देखकर तथा जानकर जिसे न हर्ष होता है और न दुःख होता है, वह शान्त कहलाता है । चन्द्रमण्डलके समान जिसका मन स्वच्छ है तथा मृत्यु, उत्सव तथा युद्धमें जिसका मन अधीर नहीं होता, वह शान्त कहलाता है। तपस्वियोंमे, बहुश्रुतोंमे, यज्ञ करने- वालोंमें, राजाओंमें, वनवासियोंमे तथा गुणीजनोंमें शमशील ही सुशोभित होता है। सन्तोषरूपी अमृतका पान करके जो शान्त एव तृप्त हो जाते हैं, वे ही आत्मामे रमण करनेवाले महात्मा परमपदको प्राप्त होते हैं । जो अप्राप्त वस्तुके लिये चिन्ता नहीं करता तथा सम्प्राप्त वस्तुमें सम रहता है, जिसने दुःख और सुखको नहीं देखा है—वही सन्तुष्ट कहलाता है। जो अप्राप्त वस्तुकी कामना नहीं करता, और प्राप्त वस्तुका ही यथेच्छ भोग करता है, वह सौम्य और समान भावसे आचरण करनेवाला पुरुष सन्तुष्ट कहलाता है । अन्तःपुरके आँगनमे ही जिस प्रकार साध्वी स्त्री प्रसन्न रहती है, उसी प्रकार यथाप्राप्तमे ही जब बुद्धि रमने लगती है, तब वह स्वरूपानन्द प्रदान करनेवाली जीवन्मुक्तावस्था कहलाती है । समयानुसार, कालानुसार देशानुसार, सुखपूर्वक, जहाँ- तक हो सके सत्सङ्गमे विचरण करते हुए इस मोक्षपथके क्रमका तबतक बुद्धिमान् पुरुष विचार करे, जबतक उसे आत्मविश्रान्ति प्राप्त न हो जाय । गृहस्थ हो या सन्यासी, जो तुरीयावस्थाकी विश्रान्तिसे युक्त है तथा ससार-सागरसे निवृत्त हो चुका है, वह चाहे जागतिक जीवनमें रहे या न रहे, उसे करने अथवा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं। श्रुति स्मृतिके भ्रमजालसे उसे कोई मतलब नहीं । मन्दराचलसे विहीन ( क्षोभरहित ) समुद्रके समान वह आत्मस्थ होकर स्थित रहता है ॥ २९-४१ ॥ ‘जब त्वात्मक दृश्यको आत्मरूप देखनेवाली शुद्ध सर्वात्मवेदना उदय होती है, तब दिशा और कालमे फैला हुआ सारा बाह्य जगत् चिद्रूपात्मक प्रतीत होता है। इस प्रकार जहाँ जिस रूपमें आत्मा समुल्लसित होता है, वहाँ शीघ्र उसी रूपमे वह स्थित हो जाता है और तद्रूपमें ही विराजमान होता है। जो कुछ यह समस्त स्थावर और जङ्गमात्मक जगत् दिखलायी देता है, वह प्रलयकालमे उसी प्रकार विनाशको प्राप्त हो जाता है, जैसे सुषुप्तिमे स्वप्न विलीन हो जाता है । आत्मा ऋत (यज्ञ) स्वरूप है, परब्रह्म है, सत्यस्वरूप है—इत्यादि सञ्ज्ञाएँ महात्माओं तथा ज्ञानीजनोंने व्यवहारके लिये कल्पित की हैं। जिस प्रकार ‘कङ्कण’ शब्द और उसका अर्थ स्वर्णसे पृथक् कोई सत्ता नहीं रखता, तथा कङ्कणमें स्थित स्वर्ण कङ्कणसे पृथक् सत्ता नहीं रखता, उसी प्रकार ‘जगत्’ शब्दका अर्थ परब्रह्म ही है । उस परब्रह्मने जगत्के रूपमे यह इन्द्रजाल फैलाया है। द्रष्टाका दृश्यके अन्तर्भूत होकर रहना ही बन्धन कहलाता है। दृश्यके वशमे होनेसे द्रष्टा बद्ध होता है और दृश्यके अभावमें वह मुक्ति प्राप्त करता है। जगत् और मैं-तू इत्यादिरूप जो सृष्टि है, वह दृश्य कहलाती है। ससारमें सारा प्रपञ्चरूपी इन्द्रजाल मनके द्वारा ही फैलता है, जबतक मनकी यह कल्पना चलती रहती है, तबतक मोक्षके दर्शन नहीं होते । यह विश्व स्वयम्भू ब्रह्माकी मानसिक सृष्टि है, अतएव यावत् परिदृश्यमान जगत् मनोमय ही है। बाहर अथवा हृदयके भीतर, कहीं भी मन सद्रूपमे अवस्थित नहीं है। जो विषयोंका भान होना है, वही मन कहलाता है। सङ्कल्प करना ही मनका लक्षण है, मन सङ्कल्परूपमें ही रहता

अध्याय ४ ] - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६११

अध्याय ४ ] *- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६११ है, अतएव जो सङ्कल्प है, वही मन है—यह जान लेना चाहिये । किसीने कभी सङ्कल्प और मनको पृथक् नहीं किया, सारे सङ्कल्पोंके गल जानेपर केवल आत्मस्वरूप ही अवशिष्ट रहता है । म, तू और जगत् इत्यादि दृश्य-प्रपञ्चके प्रशान्त हो जानेपर, दृश्य उस सत्ताको (परतत्त्वको) प्राप्त होता है, तभी वैसा कैवल्य प्राप्त होता है। जब महाप्रलयके समय समस्त दृश्य सत्ताहीन हो जाता है, उस समय सृष्टिके पूर्वकालम केवल शान्त आत्मा ही अवशिष्ट रहता है। जो आत्मसूर्य कभी अस्त नहीं होते, जो जन्मरहित तथा सर्वदोषविवर्जित देव हैं, सर्वदा सर्वकर्ता तथा सर्वस्वरूप हैं, जहाँ वाणी जाकर लौट आती है, जिन्हें मुक्त पुरुष ही जानते हैं, तथा जिनकी आत्मा आदि सञ्ज्ञाएँ कल्पित हैं स्वाभाविक नहीं, वे ही परमात्मा कहलाते हैं ॥ ४२-५७ ॥ 'चित्ताकाश, चिदाकाश और तीसरा (भौतिक) आकाश है। हे मुनि ! आकाश और चित्ताकाशमे भी सूक्ष्मतर चिदाकाश- को जानो । मुनिपुङ्गव ! एक देशसे दूसरे देशमे जानेपर जो बीचमें चित्तका व्यवधान है, उस (बाध) का निमेष होनेपर चिदाकाश ही अवशिष्ट रहता है, यह जानना चाहिये । उस चिदाकाशमें यदि समस्त सङ्कल्पोंको निरस्त करके स्थित होते हो तो निःसन्देह सर्वात्मक शान्त पदको प्राप्त होओगे। चिदाकाशमें स्थित होनेपर जो सुन्दर औदार्य और वैराग्य-रससे युक्त आनन्दमयी अवस्था प्राप्त होती है उसे समाधि कहते हैं। दृश्य पदार्थोंकी सत्ता ही नहीं है—जब इस प्रकारका बोध होता है तथा राग द्वेषादि दोष क्षीण हो जाते हैं, उस समय अभ्यास- बलसे जो एकाग्र-मति उत्पन्न होती है, उसे समाधि कहते हैं। दृश्यकी सत्ताका अभाव जब बोधमें आता है, तब वही निश्चय- पूर्वक ज्ञानका स्वरूप है। वही चिदात्मक ज्ञेयतत्त्व है, वही केवलीभाव अर्थात् आत्मकैवल्य है उसके अतिरिक्त अन्य सब कुछ मिथ्या है। जिस प्रकार उन्मत्त ऐरावत हाथीका सरसोंके एक कोनेके छिद्रमे बाँधा जाना संभव नहीं, सिंहोंके साथ एक धूलिकणके कोटरम मच्छरोंका युद्ध करना असम्भव है तथा कमलकी पखड़ीमे स्थापित सुमेरु पर्वतका भ्रमरशिशुके द्वारा निगला जाना असम्भव कथा है, उसी प्रकार निदाघ ! इस जगत्का अस्तित्वमे आना सम्भव नहीं, इसे तुम केवल भ्रमात्मक जानो । राग-द्वेष आदि क्लेशोंसे दूषित चित्त ही ससार है, वही चित्त जब दोषोंसे विनिर्मुक्त हो जाता है, तब इसे संसारका अन्त अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति कहते हैं। मनसे शरीरकी भावना करनेपर ही आत्मा शरीरी बनता है, जब वह देहवासनासे मुक्त होता है, तब देहके धर्मोंसे लिप्तायमान नहीं होता । मन कल्पको क्षण बना देता है और क्षणमे कल्पत्वको आभासित करता है। यह संसार केवल मनोविलास मात्र है—यह मेरी निश्चित मति है ॥ ५८—६८ ॥ 'जो दुश्चरितमे विरत नहीं हुआ है, जो अशान्त है, समाहित (एकाग्रचित्त) नहीं है तथा जिसका चित्त शान्त नहीं हुआ है, ऐसे मनुष्यको आत्मबोध नहीं होता। प्रकृष्ट कैवल्यज्ञानके द्वारा ही आत्मसाक्षात्कार किया जा सकता है। उस आनन्दमय, द्वन्द्वातीत, निर्गुण, सत्वरूप, चिद्धन ब्रह्मको अपना स्वरूप समझ लेनेपर पुरुष कदापि भयको नहीं प्राप्त होता। जो श्रेष्ठमे भी श्रेष्ठतर, महान्सेभी महान्, तेजोमय स्वरूपवाला, शाश्वत, शिव- स्वरूप (कल्याणकारी), सर्वज्ञ, पुराणपुरुष, सनातन, सर्वेश्वर, एव सब देवताओंके द्वारा उपास्य है, वह ब्रह्म मैं हूँ—इस प्रकारका निश्चय महात्माओके लिये मोक्षका हेतु बनता है। बन्ध और मोक्षके दो ही कारण बनते हैं, ममता और ममताशून्यता । ममतासे प्राणी बन्धनमे पड़ता है और ममतारहित होनेपर मुक्त हो जाता है। जीव और ईश्वररूपसे, ईक्षण (ब्रह्मके सङ्कल्प) से लेकर मङ्गल्यके त्यागतक, सारी जड तथा चेतनात्मक सृष्टि ईश्वरके द्वारा कल्पित हुई है। जाग्रदवस्थासे लेकर मोक्षकी प्राप्तितक समस्त ससार जीवके द्वारा कल्पित है। कठोपनिषद्के त्रिणाचिकैताग्निसे लेकर श्वेताश्वतरके योगतक- के ज्ञान ईश्वरीय भ्रान्तिके आश्रित हैं। लोकायत अर्थात् चार्वाक सिद्धान्तसे लेकर कपिलके साख्यसिद्धान्ततकका दार्शनिक ज्ञान जीवभ्रान्तिके आश्रित है। अतएव मुमुक्षु पुरुषको जीव और ईश्वरके वाद-विवादमे बुद्धि नहीं लगानी चाहिये, बल्कि दृढ होकर ब्रह्मतत्त्वका विचार करना चाहिये । जो पुरुष समस्त दृश्य-जगत्‌को निर्विशेष चित्स्वरूप समझता है, वही अपरोक्ष ज्ञानवान् है । वही शिव है, वही ब्रह्मा है, वही विष्णु है। विषयोका त्याग दुर्लभ है, तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति दुर्लभ है तथा सद्गुरुकी कृपाके बिना सहजावस्थाकी प्राप्ति दुर्लभ है । जिसकी बोधात्मिका शक्ति जाग्रत् हो गयी है, जिसने सारे कर्मोंका त्याग कर दिया है, ऐसे योगीको सहजावस्था स्वयमेव प्राप्त हो जाती है । जबतक पुरुषको इसमे तनिक भी अन्तर जान पड़ता है, तबतक उसके लिये भय है—इसमें संशय नहीं। सर्वमय सचिदानन्द- को ज्ञानचक्षुसे देखा जाता है, जिसे ज्ञानचक्षु नहीं, वह परब्रह्म- को उसी प्रकार नहीं देख सकता, जैसे अंधेको प्रकाशमान

[ अध्याय ४

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  • महोपनिषद् * [ अध्याय ४ सूर्यनारायण नहीं दीखते । वह ब्रह्म प्रज्ञानस्वरूप ही है, सत्य ही प्रज्ञानका लक्षण है । अतएव ब्रह्मके परिज्ञानसे ही मर्त्य जीव अमरत्वको प्राप्त होता है । उस कार्य-कारणरूप ब्रह्मका साक्षात्कार हो जानेपर पुरुषके हृदयकी गाँठें खुल जाती हैं, सारे संशय दूर हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ६९-८२ ॥ 'अनात्माको त्यागकर, जागतिक स्थितिमें निर्विकार होकर, अनन्यनिष्ठासे अन्त.स्थ सवितृ अर्थात् आत्मचैतन्यमें ही लीन रहो । मरुभूमिमें भ्रमसे दीखनेवाला सारा जल जैसे मरुस्थल मात्र ही रहता है, उसी प्रकार जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिरूप यह समस्त जगत् आत्मविचारसे चिन्मय ही है । जो लक्ष्य बुद्धि तथा अलक्ष्य-बुद्धिका त्याग करके केवल आत्मनिष्ठ होकर रहता है, वह श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी स्वयं साक्षात् शिव है । जगत्‌का अधिष्ठान अनुपम है, वाणी और मनकी पहुँचके परे है, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म और अव्ययस्वरूप है । यह संसार सर्वशक्तिमान् महेश्वरका मनोविलास मात्र है । संयम और असंयमके द्वारा जागतिक प्रपञ्च शान्तिको प्राप्त होता है ॥ ८३-८७ ॥ 'मनोव्याधिकी चिकित्साके लिये तुमको मैं उपाय बतलाता हूँ । जिन-जिन वस्तुओंकी ओर मन जाता है, उन उनका त्याग करता हुआ मनुष्य मोक्षको प्राप्त करता है । आत्माधीन होना, एकान्तप्रियता तथा अभिलषित जागतिक वस्तुके त्यागकी भावना जिसके लिये दुष्कर हो जाती है, उस पुरुष कीटको धिक्कार है । केवल अपने प्रयत्नसे सिद्ध होनेवाले अपनी अभिलषित वस्तुके त्यागरूप मनःशान्तिके अतिरिक्त दूसरी शुभ गति नहीं है । सङ्कल्पहीनताके खड्गसे जब इस चित्तको काट दिया जाता है, तब सर्वस्वरूप, सर्वान्तर्यामी, शान्त परब्रह्मकी प्राप्ति होती है । प्रपञ्च- की भावनासे मुक्त होकर, महान् बुद्धिसे युक्त होकर, चित्तका निरोध करके स्थिरभावसे अपनको चिन्मात्रमें स्थित करो । श्रेष्ठ पौरुष अर्थात् अभ्यास और वैराग्यका आश्रय लेकर, तथा चित्तको अचित्तावस्था अर्थात् निरुद्धावस्थामें ले जाकर हृदयाकाशमें ध्यान करते हुए बारबार चेतनमें लगे हुए चित्त- रूपी चक्रकी धारसे मनको मार दो । तब तुम निःशङ्क हो जाओगे और कामादिरूपी शत्रु तुम्हें बाँध न सकेंगे । यह वह है, मैं यह हूँ, वे पदार्थ मेरे हैं—यह भावना ही मन है, इन भावनाओंके त्यागरूपी दावसे मनका नाश किया जाता है । जिस प्रकार शरद्के आकाशमें छिन्न-भिन्न बादलोंके समूह वायुके वेगसे विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार विचारके द्वारा ही मन अन्तर्हित हो जाता है। चाहे प्रलयकालीन उनचास पवन बहें, अथवा सारे समुद्र मिलकर एकार्णवरूप हो जायें, बारहो आदित्य तपने लगे, तथापि मनोविहीन पुरुषकी कोई क्षति नहीं हो सकती । केवल सङ्कल्पहीनतारूपी एक साम्यसे समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, तत्पदका आश्रय लेकर सङ्कल्प- हीनताके विस्तृत साम्राज्यमें स्थित हो जाओ । कहीं भी अचञ्चल मन नहीं दिखलायी देता । चञ्चलता मनका धर्म है, जैसे अग्निका धर्म उष्णता है । यही चञ्चला स्पन्दन- शक्ति चित्तत्त्वमें स्थित है अर्थात् चित्तका धर्म है, इसी मानसिक शक्तिको जगत् प्रपञ्चका स्वरूप समझना चाहिये । जो मन चञ्चलताहीन हो जाता है, वह अमृतरूप कहलाता है, वही तप है । उसे ही शास्त्रीय सिद्धान्तमें मोक्ष कहते हैं । मन- की जो चञ्चलता है, वह अक्रिया है, वासना उसका स्वरूप है । शत्रुरूपिणी उस वासनाको विचारके द्वारा नष्ट करना चाहिये ॥ ८८-१०२ ॥ 'निष्पाप मुनि ! पुरुषार्थके द्वारा जिस लक्ष्यम मनको लगाओ, उसे प्राप्तकर अर्थात् सविकल्प समाधिमें स्थित हो निर्विकल्प समाधिको प्राप्त करो । अतएव प्रयत्नपूर्वक चित्तको चित्त- के द्वारा वशमें करके, शोकहीन अवस्थाके आश्रयसे आतङ्क- से मुक्त होकर शान्ति लाभ करे । मनका पूर्ण निरोध करनेमें विषयविहीन मन ही समर्थ होता है । राजाको पराजित करनेके कार्यमें राज्यविहीन राजा ही समर्थ होता है । जिन्हें तृष्णारूपी ग्राहने पकड़ रक्खा है, जो संसार-समुद्रमें गिरे हुए हैं, भँवरोंके जालमें पड़कर लक्ष्यसे दूर भटक रहे हैं, उनको बचानेके लिये अपना विषयविहीन मन ही नौकारूप है । ऐसे मनके द्वारा इस भारी बन्धनरूप मनके जालको काट डालो, और स्वयं संसारसागरके पार हो जाओ; दूसरेके द्वारा यह समुद्र पार नहीं किया जाता । अन्त करणको वासित (आच्छादित) करनेवाली मन-नामकी वासना जब-जब उदित हो, तब तब प्राज्ञ (बुद्धिमान्) पुरुष उसका त्याग करे । इससे अविद्याका नाश होता है । एक भोगवासनाका पहले त्याग करो, उसके बाद भेद-वासनाका त्याग करो, उसके बाद भावाभाव दोनोंका त्याग करके विकल्पहीन होकर सुखी हो जाओ । इस मनका नाश ही अविद्यानाश कहलाता है । मनके द्वारा जो कुछ भी अनुभवमें आता हो, उस-उसमें आस्था न होने दो । आस्थाका त्याग कर देना ही निर्वाण है, और आस्थाको पकड़े रहना ही दुःख है । जो प्रज्ञाविहीन हैं, उन्हींमें अविद्या विद्यमान रहती

अध्याय ४ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६१३

अध्याय ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१३

है। सम्यक् प्रज्ञावान् पुरुष नाममात्रके लिये भी कहीं अविद्या- को अङ्गीकार नहीं करते। इस दुःख-कण्टकसे आकीर्ण संसाररूपी भ्रमजालमें तभीतक अविद्या अपने साथ शरीरीको निरन्तर भ्रमाती है, जबतक इसको नष्ट करनेवाली मोहनाशिनी आत्मसाक्षात्कारकी इच्छा स्वयं उत्पन्न नहीं होती। अविद्या जब परतत्त्वकी ओर अवलोकन करती है, तब इसका अपने- आप विनाश हो जाता है। सर्वात्मबोध दृष्टिगत होनेपर अविद्या स्वयं ही विलीन हो जाती है। इच्छामात्र अविद्याका स्वरूप है, इच्छाके पूर्णतः नाशको ही मोक्ष कहते हैं और मुनि ! इच्छाका नाश सङ्कल्परहित होनेपर ही सिद्ध होता है ॥ १०३-११६ ॥

'चित्ताकाशमे वासनारूपी रजनीके तनिक भी क्षीण होने पर, चेतनारूपी सूर्यके प्रकाशसे कलिरूपी तम क्षीणताको प्राप्त हो जाता है। चित्त जब विषयोंके पीछे नहीं पड़ता तथा सामान्यतः सर्वगामी बन जाता है, तब चित्तकी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्था ही आत्मा और परमेश्वरनामसे अभिहित होती है। यह सब कुछ निश्चय ही ब्रह्म है। वह नित्य और चिद्धनस्वरूप है। वह अव्यय है। इसके सिवा जो दूसरी मन नामकी कल्पना है, वह कहीं है ही नहीं। केवल भ्रममात्र है। इस त्रिलोकीम न कोई जन्मता है न मरता है। ये जो भावविकार दीख पड़ते हैं, इनका कहीं अस्तित्व नहीं है। एकमात्र, केवल आभासरूप, सर्वव्यापी, अव्यय और चित्तके विषयोंके पीछे न दौड़नेवाले केवल चिन्मात्रकी ही सत्ता यहाँ है। उस नित्य, व्यापक, शुद्ध, चिन्मात्र, उपद्रवशून्य, शान्त, शमस्वरूपमें स्थित निर्विकार चिदात्मामें स्वयं चित् ही जो स्वभावानुसार सङ्कल्प करके दौड़ता है, वह चैत्य अर्थात् चित्की सङ्कल्पावस्था स्वयं दोषरहित होते हुए भी मनन करनेके कारण मन कहलाती है।

अतएव सङ्कल्पके द्वारा सिद्ध मन सङ्कल्पके द्वारा ही विनाश- को प्राप्त होता है ॥ ११७-१२३ ॥

'मैं ब्रह्म नहीं हूँ, इस सङ्कल्पके सुदृढ हो जानेसे मन बन्धन- में पड़ता है, तथा 'सब कुछ ब्रह्म ही है' इस सङ्कल्पके सुदृढ होने- पर मन मुक्त हो जाता है। 'मैं दुबला हूँ, दुःखग्रस्त हूँ, मैं हाथ-पैरवाला हूँ'—इस भावके अनुकूल व्यवहारसे जीव बन्धनमें पड़ता है। 'मैं दुःखी नहीं हूँ, मेरा शरीर नहीं, आत्मतत्त्वमे स्थित मुझको बन्ध कहाँ !'—इस प्रकारके व्यवहारसे लीन मन मुक्त हो जाता है। 'मै मास नहीं, मे अस्थि नहीं, मै देहसे परे दूसरा ही तत्त्व हूँ'—इस प्रकार का निश्चय कर लेनेपर जिसके अन्तःकरणसे अविद्या क्षीण हो गयी है, वह मुक्तिको प्राप्त होता है। अनात्म पदार्थमे आत्मभावना होनेसे यह अविद्या कल्पनामात्रा है। परम पुरुषार्थ अर्थात् अभ्यास और वैराग्यका आश्रय लेकर बहुत बुद्धिमत्तापूर्वक, यत्नसे भोगकी इच्छाका दूरसे ही त्याग करके निर्विकल्प होकर सुखी हो जाओ। 'मेरा पुत्र, मेरा धन, मै वह हूँ, यह हूँ, यह मेरा है'—यह सब वासना ही इन्द्रजाल फैलाकर विविध खेल कर रही है। तुम अज्ञ मत बनो, तुम ज्ञानी बनो, सासारिक भावनाको नष्ट कर दो। अनात्म पदार्थमे आत्मभावना करके क्यों मूर्खकी भाँति रो रहे हो। यह मासका पिण्ड, अपवित्र, मूक, जड शरीर तुम्हारा कौन है, जिसके लिये बलात् दुःख सुखसे अभिभूत हो रहे हो ? अहा ! कितने आश्चर्यकी बात हे कि जो ब्रह्म सत्य है, उसे मनुष्योंने भुला दिया है। तुम कर्तव्य-कर्मोमे रत रहते हुए मनको कभी उनके प्रति रागानुरञ्जित मत होने दो। अहा ! कैसी आश्चर्यकी बात है कि कमलनालके तन्तुओंसे पर्वत बाँध दिये गये हैं। जो अविद्या है ही नहीं, उसीके द्वारा यह विश्व अभिभूत हो रहा है। उस अविद्याके कारण तृणके समान तुच्छ जाग्रत् आदि तीनों जगत् वज्रवत् हो रहे हैं' ॥ १२४-१३४ ॥

॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अध्याय

ॐ पञ्चम अध्याय ऋभुका उपदेश चालू अज्ञान एवं ज्ञानकी सात भूमिकाएँ महर्षि ऋभु बोले—'तात ! इसके आगे मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे ठीक-ठीक सुनो । अज्ञानकी सात भूमिकाएँ होती हैं, और ज्ञानकी भी सात भूमिकाएँ होती हैं। इनके बीच असख्य दूसरी भूमिकाएँ उत्पन्न होती हैं। स्वरूपमें अवस्थित होना मुक्ति है। अहम्भावना ही स्वरूपसे च्युत होना है। शुद्ध सत्तामात्र संवित् ही आत्माका स्वरूप है, उससे जो विचलित नहीं होते, उनमें अज्ञानसे उत्पन्न राग-द्वेष आदि दूषित भाव नहीं होते । स्वरूपसे च्युत होकर वासनार्थ जो चित्तमें डूबना है, उससे बढकर कोई दूसरा मोह न हुआ है और न होगा । एक विषयसे दूसरे विषयको जाते समय जो मध्यमे स्थिति होती है, वह ध्वस्तमननके आकारवाली स्वरूपस्थिति कहलाती है। सारे सङ्कल्पोंकी सम्यक् शान्तिसे शिलाके समान जो निश्चेष्ट स्थिति होती है, जो जाग्रत्-अवस्था तथा स्वप्नावस्थामे विनिर्मुक्त होती है, वह परा स्वरूपस्थिति कहलाती है। अहंताके क्षीण हो जानेपर, शान्त, चेतन तथा भेदभावसे शून्य जो चित्तकी अवस्था होती है, वह स्वरूपस्थिति कहलाती है ॥ १-७ ॥ 'मोह सात प्रकारका होता है—प्रथम बीज-जाग्रत् अवस्था, दूसरा जाग्रत् अवस्था, तीसरा महाजाग्रत् अवस्था, चौथा जाग्रत्स्वप्न अवस्था, पाँचवाँ स्वप्नावस्था, छठा स्वप्नजाग्रत् अवस्था और सातवाँ सुषुप्ति अवस्था । फिर, ये एक दूसरेसे श्लिष्ट होकर अनेक रूप धारण करते हैं। अब इनके पृथक्- पृथक् लक्षण सुनो। प्रथम, जो नामरहित निर्मल चेतनमें चित्की आगे होनेवाली चित्त, जीव आदि नाम, शब्द तथा अर्थकी पात्रतासे युक्त अवस्था होती है, वह बीजरूपमें स्थित जाग्रत्-अवस्था बीजजाग्रत् कहलाती है। यह ज्ञाताकी नवीन अवस्था होती है, अब तुम जाग्रत्की सम्यक् स्थितिकी बात सुनो। बीज-जाग्रत् अवस्थाके बाद 'यह मै हूँ, यह मेरा है'- अपने भीतर जो ऐसी प्रतीति होती है, वह अतिरिक्त भावनाओंसे पहले होनेवाली मोहकी दूसरी जाग्रत् अवस्था कहलाती है। 'यह वह पुरुष है, मैं यह हूँ, वह मेरी वस्तु है' यह पूर्वजन्मों- का उदित हुआ पुष्ट प्रत्यय महाजाग्रत् कहलाता है। अरूढ अथवा रूढ, सर्वथा मनोमय, जो मनकी काल्पनिक सृष्टि जाग्रदवस्थामें होती है, उसे जाग्रत्स्वप्न कहते हैं। एक चन्द्रमें दो चन्द्रोंका भान होना, शुक्ति ( सीप ) मे रजतका भान होना, मृगतृष्णामें जलका भान होना—इत्यादि भेदसे अभ्यासको प्राप्त हुआ जाग्रत्स्वप्न अनेक प्रकारका होता है। थोडी देरतक मैंने देखा, अब यह दृष्टिगत नहीं हो रहा है— जिस अवस्थासे जागनेपर मनुष्यको इस प्रकारका परामर्श (स्मृति) होता है, वह स्वप्न कहलाता है। चिरकालतक साक्षात्कार न होनेके कारण जो पूर्ण विकासको नहीं प्राप्त हुआ, बड़ी-बड़ी बातोंवाला, देरतक टिकनेवाला स्वप्न जाग्रत्के समान ही उदित होता है, वह जाग्रत् अवस्थामें भी परिस्फुरित होनेवाला स्वप्न स्वप्नजाग्रत् कहलाता है। इन छः अवस्थाओंका परित्याग कर जीवकी जो जडात्मक अवस्थिति होती है, वह आनेवाले दुःखबोधसे युक्त अवस्था सुषुप्ति कहलाती है। उस अवस्थामें जगत् अन्तस्तममें लीन हो जाता है। ब्रह्मन् ! मैंने अज्ञानकी इन सात भूमिकाओंको बतलाया । इनमें एक-एक सैकड़ों प्रकारकी विविध ऐश्वर्योंसे युक्त अवस्थाओंका रूप धारण करती है। अब हे निष्पाप पुत्र ! ज्ञानकी जो सात भूमिकाएँ हैं, उनको सुनो, जिनको जान लेनेपर पुरुष पुनः मोह-पङ्कमें नहीं पड़ता ॥ ८—२१ ॥ 'सिद्धान्तवादी लोग योग-भूमिकाओंके बहुतसे भेद बतलाते हैं, परन्तु मुझे तो ये ही कल्याणप्रद सात भूमिकाएँ अभीष्ट हैं। इस प्रकार इन सात भूमिकाओंमें होनेवाले अवबोधको 'ज्ञान' कहते हैं, और इन भूमियोंके पश्चात् होनेवाली मुक्ति 'ज्ञेय' कही जाती है। शुभेच्छा नामकी पहली ज्ञानभूमि कहलाती है। दूसरी विचारणा कहलाती है। तीसरी तनुमानसी, चौथी सत्त्वापत्ति, उसके बाद पाँचवीं असंसक्ति, षष्ठी पदार्थाभावना तथा सप्तमी तुर्यगा है। इनके अन्तर्गत वह मुक्ति है, जिसे प्राप्तकर पुनः शोक नहीं करना पड़ता । अब तुम इन भूमिकाओंकी परिभाषा सुनो । 'मैं मूढ बनकर क्यों बैठा हूँ ? शास्त्र तथा सज्जनोंसे मैं जिज्ञासा करूँगा'—इस प्रकारकी वैराग्य-

अध्याय ५ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६१५

अध्याय ५ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१५ से पूर्व जो इच्छा होती है, उसे ज्ञानीजन शुभेच्छा कहते हैं। शास्त्र तथा सज्जनोंके सम्पर्कके कारण अभ्यास और वैराग्यके साथ- साथ जो सदाचरणकी प्रवृत्ति है, वह विचारणा कहलाती है। विचारणा और शुभेच्छाके द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंमें अनुरक्ति जब क्षीणताको प्राप्त होती है, तब वह तनुमानसी अवस्था कहलाती है। इन तीनों भूमियोंके अभ्याससे वैराग्यके वशीभूत हो जब चित्त शुद्ध सत्त्वस्वरूपमें स्थित होता है, तब उसे सत्त्वापत्ति कहते हैं। इन चारों भूमियोंके अभ्याससे सत्त्वारूढ होकर चमकनेवाली जो असंगहीन कला है, वह असंसक्ति कहलाती है। इन पाँचों भूमियोंके अभ्यासके फलस्वरूप दृढ़तापूर्वक अपने आत्मामें ही रमण करते रहनेसे तथा आन्तर और बाह्य पदार्थोंकी भावना नष्ट हो जानेसे जिसमें दूसरोंके द्वारा चिरकालतक प्रयत्न करानेपर बाह्यभान होता है, वह पदार्थाभावना नामकी षष्ठ भूमिका है। इन छ भूमियोंमें चिरकालतक अभ्यास करनेके बाद भेदबुद्धिका अभाव हो जानेके कारण जो आत्मभावमें एकनिष्ठा हो जाती है, वह तुर्यगा स्थिति कहलाती है। यही तुर्यावस्था जीवन्मुक्त पुरुषकी होती है। इसके पश्चात् जो तुर्यातीत अवस्था है, वह विदेहमुक्तिका विषय है। निदाघ ! जो महा- भाग्यवान् पुरुष सप्तमी भूमिकाका आश्रय ले चुके हैं, वे आत्मामें रमण करनेवाले महात्मा महान् पदको प्राप्त हो गये हैं। जीवन्मुक्त पुरुष सुख दु खके अनुभवकी स्थितिमें नहीं पड़ते। वे कभी कर्त्तव्य-कर्मोंमें लगे रहते हैं और कभी उनमें अलग हो जाते हैं। अपने पासके लोगोंके द्वारा चेताये जानेपर सोकर जगे हुएके समान उठकर, सनातन आचारोंका आचरण करने लगते हैं। ये सात भूमिकाएँ बुद्धिमान् पुरुषोंकी ही ज्ञात होती हैं। इन ज्ञानावस्थाओंको प्राप्तकर जो पशु, म्लेच्छ आदि हैं, वे भी देह रहते या देह त्यागनेके बाद मुक्तिको प्राप्त करते हैं- इसमें सन्देह नहीं है। हृदयकी गाँठोंका खुल जाना ही ज्ञान है, और ज्ञान होनेपर ही मुक्ति होती है ॥ २२-४० ॥ 'मृगतृष्णामें जलकी भ्रान्तिके समान अनात्ममे आत्मबुद्धि आदि अविद्याकी शान्ति ही मुक्ति है, जो मोहसागरसे पार हो गये हैं, उन्होंने ही परम पदको प्राप्त किया है। वे आत्मसाक्षात्कार- की प्राप्तिमे लगे हुए पुरुष इन भूमिकाओंमे स्थित होते हैं। मनकी पूर्णत शान्तिके उपायको योग कहते हैं। उस योगकी सात भूमिकाएँ हैं और उन भूमिकाओंको ऊपर बतला आये हैं। इन भूमिकाओंका लक्ष्य है ब्रह्मपदकी प्राप्ति- जहाँ तू, मैं, अपने और परायेका कोई भाव नहीं रहता, न कोई भावात्मक बुद्धि होती है और न भावाभावका चिन्तन होता है। सब शान्त, आलम्बनशून्य, आकाशस्वरूप, शाश्वत, शिव, दोषरहित, भासमान न होनेवाला, अनिर्वचनीय, कारण- हीन, न सत् न असत्, न मध्य न अन्त, सम्पूर्ण नहीं और सम्पूर्ण भी, मन और वाणीके द्वारा अग्राह्य, पूर्णसे पूर्ण, सुखसे सुखतरस्वरूप, संवेदनमें न आनेवाला, पूर्ण शान्त, आत्मसाक्षात्कारस्वरूप तथा व्यापक ब्रह्मका स्वरूप है। समस्त जागतिक पदार्थोंकी सत्ता आत्मसंवेदनके अतिरिक्त दूसरी कुछ नहीं है ॥ ४१-४७ ॥ 'द्रष्टा और दृश्यका सम्बन्ध होनेपर बीचमें दृष्टिका जो स्वरूप होता है, वह द्रष्टा, दृश्य तथा दर्शनकी त्रिपुटीसे वर्जित साक्षात्काररूप स्थिति होती है। चित्त जब एक देशसे दूसरे देशको जाता है, तब बीचमे जो चित्तकी स्थिति होती है, उस जाड्यविहीन सच्चिद्रूप मननमे सदा तन्मय रहो। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिसे परे जो तुम्हारा सनातन स्वरूप है, उस जड़ चेतनरहित स्थितिमे सदा तन्मय रहो। एक जड़ताको छोड़कर - क्योंकि वह पत्थरका हृदय है, पाषाणरूपताकी प्राप्ति है-उससे रहित जो अमनस्क स्थिति है, सदा उसमे तन्मय रहो। चित्तको दूरसे त्यागकर जिस किसी स्थितिमे हो, उसीमें स्थिर रहो। परमात्मतत्त्वसे पहले मन निकला। तत्पश्चात् मनसे ही विश्वजालसे पूर्ण यह जगत् विस्तृत हुआ। हे विप्र ! शून्यसे भी शून्य उत्पन्न होता है, जैसे आकाश शून्य है और उससे सुन्दर लगनेवाली नीलिमा उल्लसित होती है। सङ्कल्पके नाश हो जानेके कारण जब चित्त गलित हो जाता है, तब संसारके मोहका कुहासा भी गल जाता है। तब शरद्के आनेपर स्वच्छ आकाशके सदृश वह अजन्मा, सबका आदि और अनन्त एक चिन्मात्र विभासित हो उठता है। बिना कर्ताके और बिना रंगके आकाशमें चित्र उठ आया। बिना द्रष्टाके, स्वानुभव, निद्राविहीन स्वप्नदर्शन हो रहा है। साक्षीस्वरूप, समानरूपसे स्वच्छ, निर्विकल्प, दर्पण-जैसे चिदात्मामें बिना इच्छाके तीनों जगत् प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। ब्रह्म एक है, चिदाकाशरूप है, सर्वस्वरूप है और अखण्डित है- चित्त चाञ्चल्यकी शान्तिके लिये यत्नपूर्वक यह भावना करनी चाहिये। जिस प्रकार एक मोटी शिलापर रेखाएँ और उपरेखाएँ खिंची होती हैं, उसी प्रकार त्रैलोक्यसे खचित एक ब्रह्मको देखना चाहिये। किसी दूसरे कारणके न होनेपर यह जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ। अब मैने जो जानना था, उसे जान लिया; जो अद्भुत देखना था, उसे देख लिया। चिरकालका

६१६ महोपनिषद् [ अध्याय ५

६१६ * महोपनिषद् * [ अध्याय ५ थका सा विश्रामको प्राप्त हुआ । चिन्मात्रके अतिरिक्त और कुछ है नहीं, इस प्रकार समझो । इस समस्त जागतिक लीलासे विरत होकर तथा असन्दिग्ध भावसे चिन्मात्रको देखो ॥ ४८-५९ ॥ 'जिन्होंने सङ्कल्प-जालको निरस्त कर दिया है, जो चित्तत्व- हीन परम पदको प्राप्त है, वे ही समस्त दोषोंसे निवृत्त हो ब्रह्म- को प्राप्त करते हैं, जो विमनस्कताको प्राप्त हो चुके हैं, वे शान्त चित्तवाले महाबुद्धिमान् हैं। वेदान्तविचारशील प्राणी, जिनके चित्तकी वृत्तियाँ क्षीण हो गयी हैं, मनश्चिन्तनके त्यागका अभ्यास करते-करते जिनका मन कुछ परिपक्व हो गया है, जो मोक्षका उपाय खोजनेवाले पुरुष हेय तथा उपादेय- दोनों प्रकारके दृश्योंका त्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मतत्त्वके साक्षात्कारमे लगे हैं तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्चको नहीं देखते, जो विशेषरूपसे ज्ञातव्य परम तत्त्वमें जागरूक होकर जीवन धारण कर रहे हैं, जो रसमय तथा रस- हीन पदार्थोंमें अत्यन्त परिपक्व वैराग्यके कारण घने मोहसे युक्त संसार-पथमें सोये हुए हैं, वैराग्यकी तीव्रताके कारण पक्षीके जालके समान जिनका संसार-वासनाका जाल टूट गया है तथा हृदयकी ग्रन्थि शिथिल हो गयी है, ऐसे साधकोंका स्वभाव विज्ञानके द्वारा उसी प्रकार सशुद्ध हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फलके द्वारा जल स्वच्छ हो जाता है। मन जब रागादिहीन, अनासक्त, द्वन्द्वातीत तथा निरालम्ब हो जाता है, तब वह पिंजड़ेसे छूटे हुए पक्षीके समान मोहजालसे बाहर निकल जाता है । सन्देहरूप दुरात्मापन जिनका शान्त हो गया है, जो प्रपञ्चात्मक कुतूहलसे विरत हैं, उनका चित्त सब प्रकारसे पूर्ण होकर पूर्णचन्द्रके समान सुशोभित होता है ॥ ६०-६८ ॥ 'न मैं हूँ और न यहाँ दूसरा कुछ है, मैं सब दोषोंसे रहित ब्रह्मस्वरूप हूँ- जो इस प्रकार सत् और असत्के मध्यसे देखता है, वही वस्तुतः देखता है । जिस प्रकार सहज ही प्राप्त हुए दर्शन, द्रष्टा तथा दृश्योंमें मन बिना रागके ही जाता है, उसी प्रकार धीर बुद्धिवाले कर्तव्य कर्मोंमें बिना आसक्तिके ही लगे रहते हैं। भलीभाँति जानकर भोगा गया भोग उसी प्रकार तुष्टिका कारण बनता है, जिस प्रकार जानकर सेवा किया गया चोर चोरी छोड़कर मैत्रीका ही निर्वाह करता है। जिसकी मनमें शङ्का भी नहीं है, ऐसे गाँवके मार्गमे आ जानेपर पथिक जिस दृष्टिसे उसे देखता है, उसी दृष्टिसे ज्ञानी पुरुष भोगके ऐश्वर्योको देखते है। निग्रह किया हुआ मन अनायास प्राप्त हुए थोड़े-से भी भोगको, जो विस्तार- को नहीं प्राप्त हुआ है, क्लेशदायक होनेके कारण, बहुत अधिक समझता है । बन्धनसे मुक्त हुआ राजा भोजनके एक ग्रासमात्रसे सन्तुष्ट हो जाता है, परन्तु वह यदि शत्रुके द्वारा आबद्ध न हो तथा आक्रान्त न हो तो राष्ट्र भी उसके लिये उपेक्षणीय हो जाता है। हाथसे हाथको समर्दितकर, दाँत से दाँत पीसकर तथा अङ्गोंसे अङ्गोंको दबाकर, अर्थात् अपने सम्पूर्ण पराक्रम और उत्साहसे, पहले मनपर विजय प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । इस संसार-समुद्रमे मनपर विजय करनेके अतिरिक्त कोई दूसरी गति नहीं है । इस महानरकके साम्राज्यमे दुष्कृतरूपी मतवाले हाथी घूम रहे हैं। आशारूपी बाणो और बरछोंसे सजे- धजे इन्द्रियरूपी शत्रुओका जीतना दुष्कर है। जिन्होंने चित्तके दर्पको नष्ट कर दिया है तथा इन्द्रियरूपी शत्रुओको वशमें कर लिया है, उनकी भोग वासना उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे हेमन्त ऋतुमें कमलका पौधा नष्ट हो जाता है। रात्रिमें बेतालके समान हृदयमें वासनाका तभीतक निवास है, जबतक एकाग्रताके अभ्यासद्वारा मनको जीत नहीं लिया जाता। विवेकी पुरुषका मन अभीष्ट कार्य करनेके कारण भृत्यके समान है, सारे प्रयोजनोंको सिद्ध करनेके कारण मन्त्रीरूप है और मेरे विचारसे समस्त इन्द्रियोको वशमे करनेके कारण सामन्तरूप है। मेरे विचारसे मनीषी पुरुषका मन लालन करनेके कारण स्नेहशील ललनास्वरूप है तथा पालन करनेके कारण पालन करनेवाला पिता है। मनरूपी पिता शास्त्रदृष्टिसे तथा आत्मप्रकाश, आत्मबुद्धि एव आत्मानुभवके द्वारा परम सिद्धिको प्रदान करता है । अत्यन्त हृष्ट, अत्यन्त दृढ, स्वच्छ, भलीभाँति वशमें किया हुआ, भलीभाँति जाग्रत्, आत्मगुणोंसे तेजस्वी बनाया हुआ मनोरम मनरूपी मणि हृदयमें सुशोभित होता है । ब्रह्मन् ! भाँति-भाँतिके पङ्कोंसे मलिन इस मनरूपी मणिको सिद्धिके लिये विवेकरूपी जलसे धोकर आलोकवान् बनो । श्रेष्ठ विवेकका आश्रय लेकर बुद्धिसे सत्यका साक्षात् (निश्चय) करके, इन्द्रियरूपी शत्रुओंको पूर्णतः छिन्नकर संसार-सागर- से पार हो जाओ ॥ ६९-८४ ॥ 'केवल आस्थाको-संसारकी आशाको ही अनन्त दुःखोंका कारण जानो, और सर्वत्र केवल अनास्थाको सुखका घर समझो । वासनाके सूत्रसे बँधा हुआ यह संसार बारबार होता है। वह प्रसिद्ध वासना अत्यन्त दुःखका कारण बनती है और मनका

५] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१७


उन्मूलन करनेके लिये आती है। जीव चाहे धीर हो, अत्यन्त बहुश्रुत हो, कुलीन हो, महान् हो, फिर भी वह तृष्णासे उसी प्रकार बँध जाता है, जैसे शृङ्खलासे सिंह बँध जाता है। परम पुरुषार्थका आश्रय लेकर और भलीभाँति उद्यम करते हुए शास्त्रानुसार शान्तिपूर्वक आचरण करता हुआ कौन पुरुष सिद्धिको नहीं प्राप्त करता । 'मैं ही अखिल विश्वरूप हूँ, मैं अच्युत परमात्मस्वरूप हूँ, मेरे सिवा और कुछ नहीं है'—इस प्रकारके ज्ञानद्वारा होनेवाला अहम्भाव ही श्रेष्ठ है। 'मैं समस्त प्रपञ्चसे अतीत हूँ, बालके अग्रभागसे भी सूक्ष्म हूँ'—ब्रह्मन् ! इस प्रकारके ज्ञानसे जो अहङ्कार होता है, वह दूसरा शुभप्रद अहम्भाव है और वह मोक्षका कारण बनता है, बन्धनका नहीं । ऐसा अहम्भाव जीवन्मुक्त पुरुषोंको ही होता है । 'हाथ-पैर आदिसे युक्त यह शरीरमात्र मैं हूँ'—इस प्रकारका निश्चय तीसरा लौकिक अहङ्कार है और यह अत्यन्त तुच्छ है । यह अहङ्कारात्मक दुरात्मा जीव ही संसाररूपी दुःखद वृक्षका मूल है। इससे मारा गया प्राणी अधःपतनकी ओर ही दौड़ता है । इस दुःखद अहङ्कारको त्यागकर और चिरकालतक शुभ अहङ्कारकी भावनामें लगा हुआ प्राणी शमयुक्त होकर मुक्तिको प्राप्त होता है। पहले कहे गये दो अलौकिक अहङ्कारोंको अङ्गीकार करके तीसरे दुःखद लौकिक अहङ्कारको त्याग देना चाहिये । पश्चात् उनको भी छोड़कर जो सब प्रकारके अहङ्कारोंसे रहित होकर स्थित है, वही उच्च पदको प्राप्त होता है ॥ ८५-९६ ॥

'भोगकी इच्छामात्र ही बन्धन है और उसका त्याग ही मोक्ष कहलाता है । मनकी उन्नति उसके विनाशमे है। मनोनाश महाभाग्यवान्‌का लक्षण है। ज्ञानी पुरुषके मनका नाश हो जाता है । अज्ञानीके लिये मन बन्धनरूप है । ज्ञानीका मन न आनन्दरूप है न आनन्दरहित है, न चल है, न अचल और न स्थिर ही है; वह न सद्रूप है, न असद्रूप ही और न इनके बीचकी ही स्थितिमें रहता है। जैसे चित्‌से प्रकाशित होनेवाला आकाश सूक्ष्मताके कारण दिखलायी नहीं देता, उसी प्रकार अखण्ड चेतनसत्ता सर्वव्यापी होते हुए भी दृष्टिगोचर नहीं होती । सारे सङ्कल्पोंसे रहित, सारी सजातोंसे शून्य यह चिदात्मा अविनाशी तथा स्वात्मा आदि नामोंसे व्यक्त किया जाता है । जो ज्ञानियोंकी दृष्टिमें आकाशसे भी सौगुनी स्वच्छ, निर्मल तथा निष्कल-रूप (अवयवरहित) है, एव जो सकल एव निर्मल संसारके रूपमे एकमात्र अपना ही दर्शन कराती है—इस प्रकारकी चित्, चेतनसत्ता न अस्त होती है न उदय होती है, न उठती है न स्थिर रहती है, न जाती है न आती है; न यहाँ है और न यहाँ नहीं है। वह चित् अर्थात् चेतनसत्ता विकल्परहित, निरालम्ब और निर्मल स्वरूपवाली है। गुरुको चाहिये कि प्रारम्भमें शम-दम आदि गुणोंके द्वारा शिष्यके अन्तःकरणको शुद्ध करे । पश्चात् 'यह सब कुछ ब्रह्मरूप है और तुम शुद्ध ब्रह्मस्वरूप हो' ऐसा बोध प्रदान करे । अज्ञानी पुरुषको तथा जो अर्द्ध-जाग्रत् है, उसे जो कहता है कि 'सब ब्रह्म ही है', वह उसे महानरकजालमें ढकेल देता है । जिसकी बुद्धि जाग्रत् हो गयी है, भोगकी इच्छा नष्ट हो गयी है, तथा जो सर्वथा आकाङ्क्षारहित हो गया है—ऐसे पुरुषको प्राज्ञ गुरु वेदान्तका यह उपदेश दे कि अविद्यारूप मल है ही नहीं । जिस प्रकार दीपकके होनेपर ही प्रकाश होता है, सूर्यनारायणके होनेपर ही दिन होता है, पुष्पके होनेपर ही सुगन्ध होती है, उसी प्रकार चित्-चेतनके ऊपर ही जगत्‌की स्थिति है । यह जगत् वास्तवमे है नहीं, केवल भासता है । जब तुम्हारी ज्ञान-दृष्टि निर्मल—आवरणशून्य हो जायगी, ज्ञानका सब ओर प्रकाश हो जायगा तथा तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओगे, तभी तुम मेरे उपदेशके बलाबलको ठीक ठीक जान सकोगे ॥ ९७-१०७ ॥

'स्वार्थनाशके लिये उद्यम करना ही जिसका एकमात्र प्रयोजन है, ऐसी श्रेष्ठ अविद्याके द्वारा ही, ब्रह्मन् ! सब दोषोंको हर लेनेवाली विद्याकी प्राप्ति होती है। अस्त्रके द्वारा अस्त्रका शमन होता है तथा मलके द्वारा मल धोया जाता है, विषके द्वारा विषका शमन होता है, शत्रुके द्वारा शत्रु मारा जाता है । इसी प्रकारकी यह भूतमाया है, जो अपने नाशसे ही हर्ष प्रदान करती है । इसका स्वरूप दिखलायी नहीं देता, दिखलायी देते ही यह नष्ट हो जाती है। परमार्थतः यह माया है ही नहीं—इस प्रकारकी दृढ भावनाके साथ 'सब ब्रह्म ही है'—ऐसी जो अन्तर्भावना होती है, वही मुक्ति प्रदान करती है । यह भेददृष्टि ही अविद्या है। इसका सर्वथा त्याग करना चाहिये ॥ १०८-११३ ॥

मुने ! (मायाके द्वारा) जो नही प्राप्त होता है, वह अक्षयपद कहलाता है । द्विज ! यह माया किससे उत्पन्न हुई—यह तुम्हें नहीं विचारना है । 'मैं इसे किस प्रकार नष्ट करूँ'—यही तुम्हें विचार करना है । इसके क्षीण होकर नष्ट हो जानेपर तुम उस अक्षयपदको जान सकोगे । जहाँसे यह प्रकट होती है, जैसा इसका स्वरूप है, जिस प्रकार यह नष्ट होगी—अर्थात् निदान, लक्षण और शमनके