कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
| कथम्— | कैसे कहा [ सो बतलाते हैं—] |
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तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा
वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना भवितायमग्निः
सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥
महात्मा यमने प्रसन्न होकर उससे कहा—'अब मैं तुझे एक वर और भी देता हूँ । यह अग्नि तेरे ही नामसे प्रसिद्ध होगा और तू इस अनेक रूपवाली मालाको ग्रहण कर ॥ १६ ॥
| भाष्यम् | अनुवाद |
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| तं नचिकेतसमब्रवीत्प्रीयमाणः शिष्ययोग्यतां पश्यन्प्रीयमाणः प्रीतिमनुभवन्महात्माक्षुद्रबुद्धिर्वरं तव चतुर्थमिह प्रीतिनिमित्तमद्येदानीं ददामि भूयः पुनः प्रयच्छामि । तवैव नचिकेतसो नाम्नाभिधानेन प्रसिद्धो भविता मयोच्यमानोऽयमग्निः । किं च सृङ्कां शब्दवतीं रत्नमयीं मालामिमामनेकरूपां विचित्रां गृहाण स्वीकुरु । यद्वा सृङ्काम् अकुत्सितां गतिं कर्ममयीं गृहाण । अन्यदपि कर्मविज्ञानमनेकफलहेतुत्वात्स्वीकुर्वित्यर्थः ॥ १६ ॥ | अपने शिष्यकी योग्यताको देखकर प्रसन्न हुए—प्रीतिका अनुभव करते हुए महात्मा—अक्षुद्रबुद्धि यमने नचिकेतासे कहा—अब मैं प्रसन्नताके कारण तुझे फिर भी यह चौथा वर और देता हूँ । मेरेद्वारा कहा हुआ यह अग्नि तुझ नचिकेताके ही नामसे प्रसिद्ध होगा तथा तू यह शब्द करनेवाली रत्नमयी, अनेकरूपा विचित्रवर्णा माला भी ग्रहण–स्वीकार कर । अथवा सृङ्का यानी कर्ममयी अनिन्दिता गति ग्रहण कर । तात्पर्य यह है कि इसके सिवा अनेक फलका कारण होनेसे तू मुझसे कर्मविज्ञानको और भी स्वीकार कर ॥ १६ ॥ |
२२ कठोपनिषद् [ अध्याय १
२२ कठोपनिषद् [ अध्याय १
| पुनरपि कर्मस्तुतिमेवाह— | यमराज फिर भी कर्मकी स्तुति ही करते हैं— |
नाचिकेत अग्निचयनका फल
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं
त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा
निचाय्येमाँ शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥
त्रिणाचिकेत अग्निका तीन बार चयन करनेवाला मनुष्य [माता, पिता और आचार्य—इन] तीनोंसे सम्बन्धको प्राप्त होकर जन्म और मृत्युको पार कर जाता है। तथा ब्रह्मसे उत्पन्न हुए, ज्ञानवान् और स्तुतियोग्य देवको जानकर और उसे अनुभव कर इस अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है।
| त्रिणाचिकेतस्त्रिः कृत्वोऽग्निश्चितो येन स त्रिणाचिकेतस्तद्विज्ञानस्तदध्ययनस्तदनुष्ठानवान्वा। त्रिभिर्मातृपित्राचार्यैरेत्य प्राप्य सन्धिं सन्धानं सम्बन्धं मात्राद्यनुशासनं यथावत्प्राप्येत्येतत्। तद्धि प्रामाण्यकारणं श्रुत्यन्तरादवगम्यते यथा “मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्” (बृ० उ० ४।१।२) इत्यादेः। | जिसने तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन किया है उसे त्रिणाचिकेत कहते हैं। अथवा उसका ज्ञान अध्ययन और अनुष्ठान करनेवाला ही त्रिणाचिकेत है। वह त्रिणाचिकेत माता, पिता और आचार्य इन तीनोंसे सन्धि—सन्धान यानी सम्बन्धको प्राप्त होकर अर्थात् यथाविधि माता आदिकी शिक्षाको प्राप्त कर; क्योंकि एक दूसरी श्रुतिसे उनकी शिक्षा ही धर्मज्ञानकी प्रामाणिकतामें हेतु मानी गयी है; जैसा कि—“माता पिता एवं आचार्यसे शिक्षित पुरुष कहे” इत्यादि श्रुतिसे जाना जाता है। |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
| वेदस्मृतिशिष्टैर्वा प्रत्यक्षानुमानागमैर्वा । तेभ्यो हि विशुद्धिः प्रत्यक्षा । त्रिकर्मकृदिज्याध्ययनदानानां कर्ता तरत्यतिक्रामति जन्ममृत्यू । | अथवा वेद, स्मृति और शिष्ट पुरुषोंसे या प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमसे [सम्बन्ध प्राप्त करके] यज्ञ, अध्ययन और दान—इन तीन कर्मोंको करनेवाला पुरुष जन्म और मृत्युको तर जाता है—उन्हें पार कर लेता है, क्योंकि उन (वेदादि अथवा प्रत्यक्षादि प्रमाणों) से स्पष्ट ही शुद्धि होती देखी है। |
| किं च ब्रह्मजज्ञं ब्रह्मणो हिरण्यगर्भाज्जातो ब्रह्मजः। ब्रह्मजश्चासौ ज्ञश्चेति ब्रह्मजज्ञः सर्वज्ञो ह्यसौ । तं देवं द्योतनाज्ज्ञानादिगुणवन्तमीड्यं स्तुत्यं विदित्वा शास्त्रतो निचाय्य दृष्ट्वा चात्मभावेनेमां स्वबुद्धिप्रत्यक्षां शान्तिमुपरतिमत्यन्तमेत्यतिशयेनैति । वैराजं पदं ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानेन प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ | तथा 'ब्रह्मजज्ञ' ब्रह्मज—ब्रह्मा यानी हिरण्यगर्भसे उत्पन्न हुआ ब्रह्मज कहलाता है; इस प्रकार जो ब्रह्मज है और ज्ञ (ज्ञाता) भी है उसे ब्रह्मजज्ञ कहते हैं। वह सर्वज्ञ है। उस देवको—जो द्योतन आदिके कारण देव कहलाता है, और ज्ञानादि गुणवान् होनेसे ईड्य—स्तुतियोग्य है उसे शास्त्रसे जानकर और 'निचाय्य' अर्थात् आत्मभावसे देखकर अपनी बुद्धिसे प्रत्यक्ष होनेवाली इस आत्यन्तिक शान्ति—उपरतिको प्राप्त हो जाता है। अर्थात् ज्ञान और कर्मके समुच्चयका अनुष्ठान करनेसे वैराज पदको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ |
| इदानीमग्निविज्ञानचयनफलमुपसंहरति प्रकरणं च—<br>कठो० २— | अब अग्निविज्ञान और उसके चयनके फलका तथा इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— |
२४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| २४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा
य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् ।
स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८ ॥
जो त्रिणाचिकेत विद्वान् अग्निके इस त्रयको [ यानी कौन ईंटें हों, कितनी संख्यामें हों और किस प्रकार अग्निचयन किया जाय—इसको ] जानकर नाचिकेत अग्निका चयन करता है वह देहपातसे पूर्व ही मृत्युके बन्धनोंको तोड़कर शोकसे पार हो स्वर्ग लोकमें आनन्दित होता है ॥ १८ ॥
| त्रिणाचिकेतस्त्रयं यथोक्तं या इष्टका यावतीर्वा यथा वेत्येतद् विदित्वावगत्य यश्चैवमात्मरूपेण अग्निं विद्वांश्चिनुते निर्वर्तयति नाचिकेतमग्निं क्रतुं स मृत्युपाशान् अधर्माज्ञानरागद्वेषादिलक्षणान् पुरतः अग्रतः पूर्वमेव शरीरपातात् इत्यर्थः, प्रणोद्यापहाय शोकातिगो मानसैर्दुःखैर्वर्जित इत्येतत् मोदते स्वर्गलोके वैराजे विराडात्मस्वरूपप्रतिपत्त्या ॥ १८॥ | जो त्रिणाचिकेत अग्निके पूर्वोक्त त्रयको जानकर अर्थात् जो ईंटे होनी चाहिये, जितनी होनी चाहिये तथा जिस प्रकार अग्नि चयन करना चाहिये—इन तीनों बातोंको समझकर उस अग्निको आत्मस्वरूप-से जाननेवाला जो विद्वान् अग्नि—क्रतुका चयन करता—साधन करता है वह अधर्म, अज्ञान और राग-द्वेषादिरूप मृत्युके बन्धनोंको पुरतः—अग्रतः अर्थात् देहपातसे पूर्व ही अपनोदन—त्याग करके शोकसे पार हुआ अर्थात् मानसिक दुःखोंसे मुक्त हुआ स्वर्गमें यानी वैराज-लोकमें विराडात्मस्वरूपकी प्राप्ति होनेसे आनन्दित होता है ॥ १८ ॥ |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो
यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास-
स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥
हे नचिकेतः ! तूने द्वितीय वरसे जिसे वरण किया था वह यह स्वर्गका साधनभूत अग्नि तुझे बतला दिया । लोग इस अग्निको तेरा ही कहेंगे । हे नचिकेतः ! तू तीसरा वर और माँग ले ॥ १९ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एष ते तुभ्यमग्निर्वरो हे नचिकेतः स्वर्ग्यः स्वर्गसाधनो यमग्निं वरमवृणीथाः प्रार्थितवानसि द्वितीयेन वरेण सोऽग्निर्वरो दत्त इत्युक्तोपसंहारः । किञ्च तमग्निं तवैव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति जनासो जना इत्येतत् । एष वरो दत्तो मया चतुर्थस्तुष्टेन । तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व । तस्मिन्ह्यदत्त ऋणवानहमित्यभिप्रायः ॥१९॥ | हे नचिकेतः ! अपने दूसरे वरसे तूने जिस अग्निका वरण किया था—जिसके लिये तूने प्रार्थना की थी वह स्वर्गप्राप्तिका साधनभूत यह अग्निविज्ञानरूप वर मैंने तुझे दे दिया । इस प्रकार उपर्युक्त अग्निविज्ञानका उपसंहार कहा गया । यही नहीं, लोग इस अग्निको तेरे ही नामसे पुकारेंगे । यह तुझसे प्रसन्न हुए मैंने तुझे चौथा वर दिया था । हे नचिकेतः ! अब तू तीसरा वर और माँग ले, क्योंकि उसे बिना दिये मैं ऋणी ही हूँ—ऐसा इसका अभिप्राय है ॥ १९ ॥ |
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतावद्ध्यतिक्रान्तेन विधिप्रतिषेधार्थेन मन्त्रब्राह्मणेनावगन्तव्यं यद्वरद्वयसूचितं वस्तु । | विधि-प्रतिषेध ही जिसके प्रयोजन हैं ऐसे उपर्युक्त मन्त्र-ब्राह्मणद्वारा इन दो वरोंसे सूचित इतनी ही वस्तु ज्ञातव्य है । |
२६ कठोपनिषद् [ अध्याय १
२६ कठोपनिषद् [ अध्याय १
| न आत्मतत्त्वविषययाथात्म्यविज्ञानम्। अतो विधिप्रतिषेधार्थविषयस्यात्मनि क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणस्य स्वाभाविकस्याज्ञानस्य संसारबीजस्य निवृत्त्यर्थं तद्विपरीतब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं क्रियाकारकफलाध्यारोपणलक्षणशून्यम् आत्यन्तिकनिःश्रेयसप्रयोजनं वक्तव्यमिति उत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते। तमेतमर्थं द्वितीयवरप्राप्त्याप्यकृतार्थत्वं तृतीयवरगोचरमात्मज्ञानमन्तरेण इत्याख्यायिकया प्रपञ्चयति— यतः पूर्वस्मात्कर्मगोचरात्साध्यसाधनलक्षणादनित्याद्विरक्तस्य आत्मज्ञानेऽधिकार इति तन्निन्दार्थं पुत्राद्युपन्यासेन प्रलोभनं क्रियते।<br><br>नचिकेता उवाच तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्वेत्युक्तः सन्— | आत्मतत्त्वविषयक यथार्थ ज्ञान इसका विषय नहीं है। अत्र, जो विधि-प्रतिषेधका विषय है, आत्मामें क्रिया, कारक और फलका अध्यारोप करना ही जिसका लक्षण है तथा जो संसारका बीजस्वरूप है उस स्वाभाविक अज्ञानकी निवृत्तिके लिये उससे विपरीत ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञान कहना है, जो कि क्रिया, कारक और फलके अध्यारोपरूप लक्षणसे शून्य और आत्यन्तिक निःश्रेयसरूप प्रयोजनवाला है; इसीके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। इसी बातको आख्यायिकाद्वारा विस्तृत करते हैं कि तीसरे वरसे प्राप्त होनेवाले आत्मज्ञानके बिना द्वितीय वरकी प्राप्तिसे भी अकृतार्थता ही है। क्योंकि आत्मज्ञानमें उसी पुरुषका अधिकार है जो पूर्वोक्त कर्मविषयक साध्य-साधनलक्षण एवं अनित्य फलोंसे विरक्त हो गया हो। इसलिये उनकी निन्दाके लिये पुत्रादिके उपन्याससे नचिकेताको प्रलोभित किया जाता है।<br><br>'हे नचिकेता : ! तुम तीसरा वर माँग लो' इस प्रकार कहे जानेपर नचिकेता बोला— |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
तृतीय वर—आत्मरहस्य
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये-
ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं
वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २० ॥
मरे हुए मनुष्यके विषयमें जो यह सन्देह है कि कोई तो कहते हैं 'रहता है' और कोई कहते हैं 'नहीं रहता' आपसे शिक्षित हुआ मैं इसे जान सकूँ। मेरे वरोंमें यह तीसरा वर है ॥ २० ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| येयं विचिकित्सा संशयः प्रेते मृते मनुष्ये ऽस्तीत्येकेऽस्ति शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिव्यतिरिक्तो देहान्तरसम्बन्ध्यात्मेत्येके नायम् अस्तीति चैके नायमेवंविधोऽस्तीति चैकेऽतश्चास्माकं न प्रत्यक्षेण नापि वानुमानेन निर्णयविज्ञानमेतद्विज्ञानाधीनो हि परः पुरुषार्थ इत्यत एतद्विद्यां विजानीयामहम् अनुशिष्टो ज्ञापितस्त्वया। वराणाम् एष वरस्तृतीयोऽवशिष्टः ॥ २०॥ | मरे हुए मनुष्यके विषयमें जो इस प्रकारका सन्देह है कि कोई लोग तो ऐसा कहते हैं कि शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे अतिरिक्त देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा रहता है और किन्हींका कथन है कि ऐसा कोई आत्मा नहीं रहता; अतः इसके विषयमें हमें प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे कोई निश्चित ज्ञान नहीं होता और परम पुरुषार्थ इस विज्ञानके ही अधीन है। इसलिये आपसे शिक्षित अर्थात् विज्ञापित होकर मैं इसे भली प्रकार जान सकूँ। यही मेरे वरोंमेंसे बचा हुआ तीसरा वर है ॥ २० ॥ |
२८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय. १
| २८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय. १ |
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| किमयम्रैकान्ततो निःश्रेयस-<br>साधनात्मज्ञानार्हो न वेत्येतत्प-<br>रीक्षणार्थमाह— | यह ( नचिकेता ) निःश्रेयसके<br>साधन आत्मज्ञानके योग्य पूर्णतया<br>है या नहीं—इस बातकी परीक्षा<br>करनेके लिये यमराजने कहा— |
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा
न हि सुज्ञेयमणुरेष धर्मः ।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥
पूर्वकालमें इस विषयमें देवताओंको भी सन्देह हुआ था, क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म सुगमतासे जानने योग्य नहीं है । हे नचिकेताः ! तू दूसरा वर माँग ले, मुझे न रोक । तू मेरे लिये यह वर छोड़ दे ॥ २१ ॥
| देवैरप्यत्रैतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं संशयितं पुरा पूर्वं न हि सुज्ञेयं सुष्ठु ज्ञेयं श्रुतमपि प्राकृतैर्जनैर्यतोऽणुः सूक्ष्म एष आत्माख्यो धर्मोऽतोऽन्यमसंदिग्धफलं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मां मोपरोत्सीरुपरोधं मा कार्षीरधमर्णम् इवोत्तमर्णः । अतिसृज विमुञ्च एनं वरं मा मां प्रति ॥ २१ ॥ | इस आत्मतत्त्वके विषयमें पहले—पूर्वकालमें देवताओंने भी विचिकित्सा—संशय किया था । साधारण पुरुषोंके लिये यह तत्त्व सुने जानेपर भी सुज्ञेय—अच्छी तरह जानने योग्य नहीं है, क्योंकि यह 'आत्मा' नामवाला धर्म बड़ा ही अणु—सूक्ष्म है । अतः हे नचिकेताः ! कोई दूसरा निश्चित फल देनेवाला वर माँग ले । जैसे धनी ऋणीको दबाता है उसी प्रकार तू मुझे न रोक । इस वरको तू मेरे लिये छोड़ दे ॥ २१ ॥ |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
नचिकेताकी स्थिरता
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल
त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२ ॥
[ नचिकेता बोला—] हे मृत्यो ! इस विषयमें निश्चय ही देवताओंको भी सन्देह हुआ था तथा इसे आप भी सुगमतासे जानने योग्य नहीं बतलाते । [इसीसे वह मुझे और भी अधिक अभीष्ट है] तथा इस धर्मका वक्ता भी आपके समान अन्य कोई नहीं मिल सकता और न इसके समान कोई दूसरा वर ही है ॥ २२ ॥
| देवैरत्राप्येतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं किलेति भवत एव नः श्रुतम् । त्वं च मृत्यो यद्यस्मान्न सुज्ञेयमात्मतत्त्वमात्थ कथयसि अतः पण्डितैरप्यवेदनीयत्वाद् वक्ता चास्य धर्मस्य त्वादृक्त्वत्तुल्यः अन्यः पण्डितश्च न लभ्यः अन्विष्यमाणोऽपि । अयं तु वरो निःश्रेयसप्राप्तिहेतुः । अतो नान्यो वरस्तुल्यः सदृशोऽस्त्येतस्य कश्चिदप्यनित्यफलत्वादन्यस्य सर्वस्यैवेत्यभिप्रायः ॥ २२ ॥ | यह बात हमने अभी आपहीसे सुनी है कि इस विषयमें देवताओंने भी सन्देह किया था । और हे मृत्यो ! आप भी इस आत्मतत्त्वको सुगमतासे जानने योग्य नहीं बतलाते । अतः पण्डितोंसे अज्ञातव्य होनेके कारण इस धर्मका कथन करनेवाला आपके समान कोई और पण्डित ढूँढ़नेसे भी नहीं मिल सकता । और यह वर भी निःश्रेयसकी प्राप्तिका कारण है । अतः इसके समान और कोई भी वर नहीं है, क्योंकि और सभी वर अनित्य फलयुक्त हैं—यह इसका अभिप्राय है ॥ २२ ॥ |
३० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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यमराजका प्रलोभन
| एवमुक्तोऽपि पुनः प्रलोभ- <br> यन्नुवाच मृत्युः— | नचिकेताके इस प्रकार कहनेपर <br> भी मृत्यु • उसे प्रलोभित करता <br> हुआ फिर बोला— |
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शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व<br> बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् ।<br>भूमेर्महदायतनं वृणीष्व<br> स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥
हे नचिकेता ! तू सौ वर्षकी आयुवाले बेटे-पोते, बहुत-से पशु, हाथी, सुवर्ण और घोड़े माँग ले, विशाल भूमण्डल भी माँग ले तथा स्वयं भी जितने वर्ष इच्छा हो जीवित रह ॥ २३ ॥
| शतायुषः शतं वर्षाण्यायूंषि एषां ताञ्शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व । किं च गवादिलक्षणान् बहून्पशून् हस्तिहिरण्यं हस्ती च हिरण्यं च हस्तिहिरण्यम् अश्वांश्च किं च भूमेः पृथिव्या महद्विस्तीर्णमायतनमाश्रयं मण्डलं राज्यं वृणीष्व । किं च सर्वमप्येतद् अनर्थकं स्वयं चेदल्पायुरित्यत आह—स्वयं च जीव त्वं जीव धारय शरीरं समग्रेन्द्रियकलापं शरदो वर्षाणि यावदिच्छसि जीवितुम् ॥ २३ ॥ | जिनकी सौ वर्षकी आयु हो ऐसे शतायु पुत्र और पौत्र माँग ले। तथा गौ आदि बहुत-से पशु, हाथी और सुवर्ण तथा घोड़े और पृथिवी-का महान् विस्तृत आयतन—आश्रय—मण्डल अर्थात् राज्य माँग ले । परन्तु यदि स्वयं अल्पायु हो तो ये सब व्यर्थ ही हैं—इसलिये कहते हैं—तू स्वयं भी जितना जीना चाहे उतने वर्ष जीवित रह; अर्थात् शरीर यानी समग्र इन्द्रिय-कलापको धारण कर ॥ २३ ॥ |
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं
वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि
कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥
इसीके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे, अथवा धन और चिरस्थायिनी जीविका माँग ले । हे नचिकेतः ! इस विस्तृत भूमिमें तू वृद्धिको प्राप्त हो । मैं तुझे कामनाओंको इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ ॥ २४ ॥
| एतत्तुल्यमेतेन यथोपदिष्टेन सदृशमन्यमपि यदि मन्यसे वरं तमपि वृणीष्व । किं च वित्तं प्रभूतं हिरण्यरत्नादि चिरजीविकां च सह वित्तेन वृणीष्वेत्येतत् । किं बहुना महत्यां भूमौ राजा नचिकेतस्त्वमेधि भव । किं चान्यत्कामानां दिव्यानां मानुषाणां च त्वा त्वां कामभाजं कामभागिनं कामार्हं करोमि सत्यसंकल्पो ह्यहं देवः ॥ २४ ॥ | इस उपर्युक्त वरके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे भी माँग ले । यही नहीं, धन अर्थात् प्रचुर सुवर्ण और रत्न आदि तथा उस धनके साथ चिरस्थायिनी जीविका भी माँग ले । अधिक क्या, हे नचिकेतः ! इस विस्तृत भूमिमें तू राजा होकर वृद्धिको प्राप्त हो । और तो क्या, मैं तुझे दैवी और मानुषी सभी कामनाओंका कामभागी अर्थात् इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ, क्योंकि मैं सत्य-संकल्प देवता हूँ ॥ २४ ॥ |
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके
सर्वान्कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।
३२ कठोपनिषद् [ अध्याय १
३२ कठोपनिषद् [ अध्याय १
इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥
मनुष्यलोकमें जो-जो भोग दुर्लभ हैं उन सब भोगोंको तू स्वच्छन्दता-पूर्वक माँग ले । यहाँ रथ और बाजोंके सहित ये रमणियाँ हैं । ऐसी स्त्रियाँ मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं होतीं । मेरे द्वारा दी हुई इन कामिनियोंसे तू अपनी सेवा करा । परन्तु हे नचिकेता ! तू मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ ॥ २५ ॥
| ये ये कामाः प्रार्थनीया दुर्लभाश्च मर्त्यलोके सर्वांस्तान् कामांश्छन्दत इच्छात्तः प्रार्थयस्व । किं चेमा दिव्या अप्सरसो रमयन्ति पुरुषानिति रामाः सह रथैर्वर्तन्त इति सरथाः सतूर्याः सवादित्रास्ताश्च न हि लम्भनीयाः प्रापणीया ईदृशा एवंविधा मनुष्यैर्मर्त्यैरस्मदादिप्रसादमन्तरेण । आभिर्मत्प्रत्ताभिर्मया दत्ताभिः परिचारिणीभिः परिचारयस्व आत्मानं पादप्रक्षालनादिशुश्रूषां कारयात्मन इत्यर्थः । नचिकेतो | इस मर्त्यलोकमें जो-जो कामनाएँ—प्रार्थनीय वस्तुएँ दुर्लभ हैं उन सबको छन्दतः—इच्छानुसार माँग ले । इसके सिवा ये रामा—जो पुरुषोंके साथ रमण करती हैं उन्हें 'रामा' कहते हैं, ऐसी ये दिव्य अप्सराएँ सरथा—रथोंके सहित और सतूर्या—तूर्यों ( बाजों ) के सहित मौजूद हैं । हम-जैसे देवताओंकी कृपाके बिना ये अर्थात् ऐसी स्त्रियाँ मरणधर्मा मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं हैं । मेरे द्वारा दी हुई इन परिचारिकाओंसे तू अपनी परिचर्या अर्थात् पादप्रक्षालनादि सेवा करा; किन्तु हे नचिकेता ! मरण अर्थात् |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
| मरणं मरणसंबद्धं प्रश्नं प्रेतेऽस्ति नास्तीति काकदन्तपरीक्षारूपं मानुप्राक्षीमैवं प्रष्टुमर्हसि ॥२५॥ | मरनेके पश्चात् जीव रहता है या नहीं—ऐसा कौएके दाँतोंकी परीक्षाके समान मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ, तुझे ऐसा प्रश्न करना उचित नहीं है ॥ २५ ॥ |
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| एवं प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता महाह्रदवदक्षोभ्य आह— | इस प्रकार प्रलोभित किये जानेपर भी नचिकेताने महान् सरोवरके समान अक्षुब्ध रहकर कहा— |
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नचिकेताकी निरीहता
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैत-
त्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव
तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥
हे यमराज ! ये भोग 'कल रहेंगे या नहीं'—इस प्रकारके हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके तेजको जीर्ण कर देते हैं। यह सारा जीवन भी बहुत थोड़ा ही है। आपके वाहन और नाच-गान आपके ही पास रहें [ हमें उनकी आवश्यकता नहीं है ] ॥ २६ ॥
| श्वो भविष्यन्ति न भविष्यन्ति वेति संदिह्यमान एव येषां भावो भवनं त्वयोपन्यस्तानां भोगानां ते श्वोभावाः। किं च मर्त्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो यदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तज्जरयन्ति अपक्षयन्त्यप्सरःप्रभृतयो भोगाः | आपने जिन भोगोंका उल्लेख किया है वे तो श्वोभाव हैं—जिनका भाव अर्थात् अस्तित्व 'कल रहेंगे या नहीं' इस प्रकार सन्देहयुक्त हो उन्हें श्वोभाव कहते हैं। बल्कि हे अन्तक—हे मृत्यो ! ये अप्सरा आदि भोग तो मनुष्यका जो यह सम्पूर्ण इन्द्रियोंका तेज है उसे |
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३४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अनर्थायैवैते धर्मवीर्यप्रज्ञातेजोयशःप्रभृतीनां क्षपयितृत्वात् । यां चापि दीर्घजीविकां त्वं दित्ससि तत्रापि शृणु । सर्वं यद्ब्रह्मणोऽपि जीवितमायुरल्पमेव किमुतास्मदादिदीर्घजीविका । अतस्तवैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयः तथा नृत्यगीते च ॥ २६ ॥ | जीर्ण—क्षीण ही कर देते हैं, अतः धर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज और यश आदिका क्षय करनेवाले होनेसे ये अनर्थके ही कारण हैं । और आप जो दीर्घजीवन देना चाहते हैं उसके विषयमें भी सुनिये । ब्रह्माका जो सम्पूर्ण जीवन—आयु है वह भी अल्प ही है, फिर हम-जैसोंके दीर्घजीवनकी तो बात ही क्या है ? अतः आपके रथादि वाहन और नाच-गान आपके ही रहें ॥ २६ ॥ |
| किं च— | इसके सिवा— |
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो
लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा ।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं
वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥
मनुष्यको धनसे तृप्त नहीं किया जा सकता । अब यदि आपको देख लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे । जबतक आप शासन करेंगे हम जीवित रहेंगे; किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥
| न प्रभूतेन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः । न हि लोके वित्तलाभः कस्यचित्तृप्तिकरो दृष्टः | मनुष्यको अधिक धनसे भी तृप्त नहीं किया जा सकता है । लोकमें धनकी प्राप्ति किसीको भी तृप्त करनेवाली नहीं देखी गयी । |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३५
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३५
| यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्याल्लप्स्यामहे प्राप्स्यामह इत्येतद्वित्तमद्राक्ष्म दृष्टवन्तो वयं चेत्त्वा त्वाम्। जीवितमपि तथैव। जीविष्यामो यावद्याम्ये पदे त्वम् ईशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः कथं हि मर्त्यस्त्वया समेत्याल्पधनायुर्भवेत्। वरस्तु मे वरणीयः स एव यदात्मविज्ञानम् ॥ २७ ॥ | अब, जब कि हम आपको देख चुके हैं तो, यदि हमें धनकी लालसा होगी तो, उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे। इसी प्रकार दीर्घजीवन भी पा लेंगे। जबतक आप याम्यपदपर शासन करेंगे तबतक हम भी जीवित रहेंगे। भला कोई भी मनुष्य आपके सम्पर्कमें आकर अल्पायु या अल्पधन कैसे रह सकता है ? किन्तु वर तो वह जो आत्मविज्ञान है वही हमारा वरणीय है ॥ २७ ॥ |
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| यतश्च— | क्योंकि— |
अजीर्यताममृतानामुपेत्य<br>जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।<br>अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदा-<br>नतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥
कभी जराग्रस्त न होनेवाले अमरोंके समीप पहुँचकर नीचे पृथिवी-पर रहनेवाला कौन जराग्रस्त विवेकी मनुष्य होगा जो केवल शारीरिक वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले [ स्त्रीसम्भोग आदि ] सुखोंको [ अस्थिर रूपमें ] देखता हुआ भी अति दीर्घ जीवनमें सुख मानेगा ? ॥ २८ ॥
| अजीर्यतां वयोहानिमप्राप्नुवताममृतानां सकाशमुपेत्य उपगम्यात्मन उत्कृष्टं प्रयोजनान्तरं प्राप्तव्यं तेभ्यः प्रजानन् | वयोहानिरूप जीर्णताको प्राप्त न होनेवाले अमरों—देवताओं-की सन्निधिमें पहुँचकर उनसे प्राप्त होने योग्य अपने अन्य उत्कृष्ट प्रयोजनको—प्राप्तव्यको जानता—प्राप्त करता हुआ भी |
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३६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| उपलभमानः स्वयं तु जीर्यन्मर्त्यो जरामरणवान्क्वधःस्थः कुः पृथिवी अधश्चान्तरिक्षादिलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठतीति क्वधःस्थः सन् कथमेवमविवेकिभिः प्रार्थनीयं पुत्रवित्तहिरण्याद्यस्थिरं वृणीते । <br><br> क्व तदास्थ इति वा पाठान्तरम् । अस्मिन्पक्षे चाक्षरयोजना । तेषु पुत्रादिष्वास्था आस्थितिः तात्पर्येण वर्तनं यस्य स तदास्थः ततोऽधिकतरं पुरुषार्थं दुष्प्रापमपि प्रापिषयिषुः क्व तदास्थो भवेन्न कश्चित्तदसारज्ञस्तदर्थी स्याद् इत्यर्थः। सर्वो ह्युपर्युपर्य्येव बुभूषति लोकस्तस्मान्न पुत्रवित्तादिलोभैः प्रलोभ्योऽहम् । किं चाप्सरःप्रमुखान्वर्णरतिप्रमोदाननवस्थित- | जो स्वयं जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है अर्थात् जरामरणशील है ऐसा क्वधःस्थ—'कु' पृथिवीको कहते हैं, वह अन्तरिक्षादि लोकोंकी अपेक्षा अधः—नीची [होनेके कारण 'क्वधः' कहलाती] है, उसपर जो स्थित होता है वह क्वधःस्थ कहा जाता है; ऐसा होकर भी—इस प्रकार अविवेकियोंद्वारा प्रार्थनीय पुत्र, धन और सुवर्ण आदि अस्थिर पदार्थोंको कैसे माँगेगा ? <br><br> कहीं 'क्वधःस्थः' के स्थानमें 'क्व तदास्थः' ऐसा भी पाठ है । इस पक्षमें अक्षरोंकी योजना इस प्रकार करनी चाहिये । उन पुत्रादिमें जिसकी आस्था—आस्थिति अर्थात् तत्परतापूर्वक प्रवृत्ति है वह 'तदास्थ' है । जो उनसे भी उत्कृष्टतर और दुष्प्राप्य पुरुषार्थको पानेका इच्छुक है वह पुरुष उनमें आस्था करनेवाला कैसे होगा ? अर्थात् उन्हें असार समझनेवाला कोई भी पुरुष उनका अर्थी (इच्छुक) नहीं हो सकता, क्योंकि सभी लोग उत्तरोत्तर उन्नत ही होना चाहते हैं; अतः मैं पुत्र-धन आदि लोभोंसे प्रलोभित नहीं किया जा सकता । तथा वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले अप्सरा आदि सुखोंकी अस्थिररूपमें भावना करता |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
| रूपतयाभिध्यायन्निरूपयन्यथावत् अतिदीर्घे जीविते को विवेकी रमेत ॥ २८ ॥ | हुआ; उन्हें यथावत् ( मिथ्यारूपसे ) समझता हुआ कौन विवेकी पुरुष अति दीर्घ जीवनमें प्रेम करेगा ? ॥ २८ ॥ |
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| अतो विहायानित्यैः कामैः प्रलोभनं यन्मया प्रार्थितम्— | अतः मुझे इन मिथ्या भोगोंसे प्रलोभित करना छोड़कर जिसके लिये मैंने प्रार्थना की है और— |
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यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२९॥
हे मृत्यो ! जिस ( परलोकगत जीव ) के सम्बन्धमें लोग 'है या नहीं हैं' ऐसा सन्देह करते हैं तथा जो महान् परलोकके विषयमें [ निश्चित विज्ञान ] है वह हमसे कहिये । यह जो गहनतामें अनुप्रविष्ट हुआ वर है इससे अन्य और कोई वर नचिकेता नहीं माँगता ॥ २९ ॥
| यस्मिन्प्रेत इदं विचिकित्सनं विचिकित्सन्ति अस्ति नास्तीत्येवंप्रकारं हे मृत्यो साम्पराये परलोकविषये महति महत्प्रयोजननिमित्ते आत्मनो | हे मृत्यो ! जिस परलोकगत जीवके विषयमें ऐसा सन्देह करते हैं कि मरनेके अनन्तर 'रहता है या नहीं रहता' उस महान्—महान् प्रयोजनके निमित्तभूत साम्पराय—परलोकके सम्बन्धमें उस आत्माका जो निश्चित विज्ञान |
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३८ कठोपनिषद् [ अध्याय १
३८ कठोपनिषद् [ अध्याय १
| निर्णयविज्ञानं यत्तद्ब्रूहि कथय<br>नोऽस्मभ्यम्। किं बहुना योऽयं<br>प्रकृत आत्मविषयो वरो गूढं<br>गहनं दुर्वि्वेचनं प्राप्तोऽनुप्रविष्टः<br>तस्माद्वरादन्यमविवेकिभिः प्रार्थ-<br>नीयमनित्यविषयं वरं नचिकेता<br>न वृणीते मनसापीतिश्रुतेर्वचन-<br>मिति ॥ २९ ॥ | है वह हमसे कहिये। अधिक क्या,<br>यह जो आत्मविषयक प्रकृत वर है<br>वह बड़ा ही गूढ—गहन है और<br>दुर्वि्वेचनीयताको प्राप्त हो रहा है।<br>उस वरसे अन्य अविवेकी पुरुषोंद्वारा<br>प्रार्थनीय कोई और अनित्य वस्तु-<br>विषयक वर नचिकेता मनसे भी नहीं<br>माँगता—यह श्रुतिका वचन है॥२९॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ १ ॥
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
द्वितीया वल्ली
श्रेय-प्रेयविवेक
| परीक्ष्य शिष्यं विद्यायोग्यतां चावगम्याह— | इस प्रकार शिष्यकी परीक्षा कर और उसमें विद्या-ग्रहणकी योग्यता जान यमराजने कहा— |
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अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय-
स्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु-
र्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥
श्रेय (विद्या) और है तथा प्रेय (अविद्या) और ही है। वे दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले होते हुए ही पुरुषको बाँधते हैं। उन दोनोंमेंसे श्रेयको ग्रहण करनेवालेका शुभ होता है और जो प्रेयको वरण करता है वह पुरुषार्थसे पतित हो जाता है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
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| अन्यत्पृथगेव श्रेयो निःश्रेयसं तथान्यदुताप्येव प्रेयः प्रियतरमपि । ते प्रेयःश्रेयसी उभे नानार्थे भिन्नप्रयोजने सती पुरुषमधिकृतं वर्णाश्रमादिविशिष्टं सिनीतो बध्नीतस्ताभ्यामात्मकर्त्तव्यतया प्रयुज्यते सर्वः पुरुषः। श्रेयःप्रेयसोर्ह्यभ्युदयामृतत्वार्थी | श्रेय अर्थात् निःश्रेयस अन्यत्—भिन्न ही है तथा प्रेय यानी प्रियतर वस्तु भी अन्य ही है। वे श्रेय और प्रेय दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले होनेपर भी अधिकारी यानी वर्णाश्रमादिविशिष्ट पुरुषका बन्धन कर देते हैं; अर्थात् सब लोग उन्हींके द्वारा अपने [विद्या-अविद्यासम्बन्धी] कर्त्तव्यसे युक्त हो जाते हैं। अभ्युदयकी इच्छावाला पुरुष प्रेयसे और अमृतत्वका |
४० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ४० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| पुरुषः प्रवर्तते। अतः श्रेयःप्रेयः-प्रयोजनकर्तव्यतया ताभ्यां बद्ध इत्युच्यते सर्वः पुरुषः। <br><br> ते यद्यप्येकैकपुरुषार्थसम्बन्धिनौ विद्याविद्यारूपत्वाद्विरुद्धे इत्यन्यतरापरित्यागेनैकेन पुरुषेण सहानुष्ठातुमशक्यत्वात् तयोर्हित्वाविद्यारूपं प्रेयः श्रेय एव केवलमाददानस्योपादानं कुर्वतः साधु शोभनं शिवं भवति। यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते वियुज्यतेऽस्मादर्थात् पुरुषार्थात् पारमार्थिकात्प्रयोजनान्नित्यात् प्रच्यवत इत्यर्थः। कोऽसौ य उ प्रेयो वृणीत उपादत्त इत्येतत् ॥ १ ॥ | इच्छुक श्रेयसे प्रवृत्त होता है। अतः श्रेय और प्रेय इन दोनोंके प्रयोजनोंकी कर्तव्यताके कारण सब लोग उनसे बद्ध कहे जाते हैं। <br><br> वे यद्यपि एक-एक पुरुषार्थसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं तो भी विद्या और अविद्यारूप होनेके कारण परस्पर विरुद्ध हैं, अतः एकका परित्याग किये बिना एक पुरुषद्वारा उन दोनोंका साथ-साथ अनुष्ठान न हो सकनेके कारण उनमेंसे अविद्यारूप प्रेयको छोड़कर केवल श्रेयको ही स्वीकार करनेवालेका साधु—शुभ यानी कल्याण होता है। जो मूढ़ दूरदर्शी नहीं है वह इस अर्थ—पुरुषार्थ अर्थात् परमार्थसम्बन्धी नित्य प्रयोजनसे च्युत हो जाता है; वह कौन है? वही जो कि प्रेयको वरण करता है—यह इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥ |
| यद्युभे अपि कर्तुं स्वायत्ते पुरुषेण किमर्थं प्रेय एवादत्ते बाहुल्येन लोक इत्युच्यते— | यदि श्रेय और प्रेय इन दोनोंहीका करना मनुष्यके स्वाधीन है तो लोग अधिकतासे प्रेयको ही क्यों स्वीकार करते हैं? इसपर कहा जाता है— |