कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
तृतीय लम्बक २७७
तृतीय लम्बक २७७ घने मेघों के गर्जन के समान चारों दिशाओं को गुंजित करनेवाली आकाशवाणी को, मोरों के समान ऊँची गर्दन किये हुए उन सब लोगों ने सुना ॥१२१॥ गोपालक के साथ राजा उदयन ने यौगन्धरायण के कार्य की प्रशंसा की और समस्त पृथ्वी को अपने अधीन माना ॥१२२॥ परमसुखी वत्सराज मूर्तिमान् रति और निर्वृति (सुख)-स्वरूप और निरन्तर सहवास के कारण परस्पर अनुरक्त उन दोनों पत्नियों के साथ अत्यन्त सुख का अनुभव करने लगा ॥१२३॥ महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-रचित कथासरित्सागर के लावानक लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त तृतीय तरंग वत्सराज की कथा (चालू) किसी एक दिन एकान्त में वत्सराज ने वासवदत्ता और पद्मावती के साथ पान क्रीड़ा करके गोपालक रुमण्वान् और वसन्तक के साथ यौगन्धरायण को बुलाया और गुप्त गोष्ठी करने लगा ॥१-२॥ उस अवसर पर अपने विरह के प्रसंग में वत्सराज ने उन सब के सुनते रहने पर यह कथा कहना प्रारम्भ किया ॥३॥ पुरूरवा और उर्वशी की कथा प्राचीन युग में परमवैष्णव (विष्णु-भक्त) पुरूरवा नाम का राजा था। पृथ्वी के समान स्वर्ग में भी उसकी बे-रोक-टोक गति थी ॥४॥ एक बार नन्दन-उद्यान में घूमते हुए उसे उर्वशी अप्सरा ने देखा जो कामदेव के सम्मोहन नामक दूसरे अस्त्र के समान थी ॥५॥ पुरूरवा को देखते ही उर्वशी संज्ञाहीन (बेहोश) हो गई। उसके कारण रम्भा आदि उसकी सखियों का हृदय काँपने लगा ॥६॥ राजा पुरूरवा भी लावण्य-रस की निर्झरिणी के समान उर्वशी को देखकर भी जो उसका सान्निध्य प्राप्त न कर सका उस प्यास से मानो मूर्च्छित हो गया ॥७॥
२७८ कथासरित्सागर
२७८ कथासरित्सागर अथादिदेश सर्वज्ञो हरिः क्षीराम्बुधिस्थितः। नारदाख्यं मुनिवरं दर्शनायमुपागतम् ॥८॥ देवर्षे ! नन्दनोद्यानवर्ती राजा पुरूरवाः। उर्वशीहृतचित्तः सन् स्थितो विरहनिःसहः ॥९॥ तद्गत्वा मम वाक्येन बोधयित्वा शतक्रतुम्। दापय त्वरितं तस्मै राज्ञे तामूर्वशीं मुने ! ॥१०॥ इत्यादिष्टः स हरिणा तथेत्यागत्य नारदः। प्रबोध्य च तथाभूतं पुरूरवसमब्रवीत् ॥११॥ उत्तिष्ठ त्वत्कृते राजन्प्रहितोऽस्मीह विष्णुना। स हि निर्व्याजभक्तानां नैवापदमुपेक्षते ॥१२॥ इत्युक्त्वाश्वासितेनाथ स पुरूरवसा सह। जगाम देवराजस्य निकटं नारदो मुनिः ॥१३॥ हरेरादेशमिन्द्राय निवेद्य प्रणतात्मने। उर्वशीं दापयामास स पुरूरवसे ततः ॥१४॥ तदभूदूर्वशीदानं निर्जीवकरणं दिवः। उर्वश्यास्तु शवेवासीन्मृतसञ्जीवनौषधम् ॥१५॥ अथाजगाम भूलोकं समादाय पुरूरवाः। स्वर्वधू-दर्शनाश्चर्यपर्याप्तमर्त्यचक्षुषाम् ॥१६॥ ततोऽनपायिनौ तौ द्वावूर्वशी च नृपश्च सः। अन्योन्यदृष्टिपानेन नितृप्ताविव तस्थतुः ॥१७॥ एकदा दानवैः साकं प्राप्तयुद्धेन वज्रिणा। साहाय्यार्थमाहूतो ययौ नाकं पुरूरवाः ॥१८॥ तत्र तस्मिन् हते मायाधरनाम्न्यसुराधिपे। प्रनृत्तस्वर्वधूनाट्ये शक्रस्याभवदुत्सवः ॥१९॥ तत्र रम्भां नृत्यन्तीमाचार्ये तुम्बरौ स्थिते। भ्रष्टाभिनयां दृष्ट्वा जहास स पुरूरवाः ॥२०॥ ज्ञानन्मिथ्यामिदं नृत्तं किं त्वं जानासि मानुष ! इति रम्भापि तत्पार्श्वे मातृपं तमभाषत ॥२१॥
तृतीय लम्बक २७१
तृतीय लम्बक २७१ राजा को इस प्रकार सन्तप्त जानकर क्षीर-समुद्र में विश्राम करते हुए सर्वज्ञ भगवान् विष्णु ने दर्शन के लिए आये नारद मुनि को आदेश दिया ॥८॥ हे देवर्षि ! नन्दन-उद्यान में स्थित राजा पुरूरवा उर्वशी पर मोहित हो गया है और उर्वशी के विरह को सहन नहीं कर पा रहा है ॥९॥ इसलिए तुम मेरी ओर से इन्द्र के पास जाकर और उसे समझाकर उर्वशी को राजा के लिए तुरन्त दिलवा दो ॥१०॥ भगवान् हरि से इस प्रकार आज्ञापित नारद ने आकर पुरूरवा को होश में लाकर कहा— 'राजन् ! उठो तुम्हारे लिए मुझे भगवान् विष्णु ने भेजा है। वे अपने निष्कपट भक्तों के कष्ट की उपेक्षा नहीं करते ॥११ १२॥ इस प्रकार आश्वासित पुरूरवा के साथ नारद मुनि इन्द्र के पास गये और प्रणाम करते हुए इन्द्र को हरि की आज्ञा सुनाकर, उर्वशी को राजा पुरूरवा के लिए विदा दिया ॥१३-१४॥ इस प्रकार उर्वशी का दान स्वर्ग को निर्जीव करने और उर्वशी को मानों मृत-संजीवन औषधि देने के समान था ॥१५॥ स्वर्गीय पत्नी को ग्रहण करके मर्त्यलोकवासियों की आँखों को आश्चर्य में डालते हुए पुरूरवा उसे लेकर भू-लोक में आ गया ॥१६॥ इस प्रकार कभी नष्ट न होनेवाले पुरूरवा और उर्वशी—दोनों परस्पर आकृष्ट होकर बँधे हुए-से रहने लगे ॥१७॥ एक बार मायाधर नामक असुरराज के साथ इन्द्र का युद्ध होने पर इन्द्र ने अपनी सहायता के लिए पुरूरवा को बुलाया और पुरूरवा स्वर्ग को गया ॥१८॥ इस युद्ध में मायाधर के मारे जाने पर इन्द्र के यहाँ उत्सव हुआ जिसमें सभी स्वर्गीय स्त्रियों ने भाग लिया। उस उत्सव में आचार्य तुम्बुरु के उपस्थित रहते हुए रम्भा नाम की वेश्या नृत्य कर रही थी उसके नृत्य में कुछ त्रुटि होने पर पुरूरवा ने हँस दिया। उसकी हँसी से चिढ़कर रम्भा ने कहा—'यह देव-नृत्य है इसे मैं जानती हूँ। हे मनुष्य ! तू इसे क्या जाने ॥१९ २१॥
जानेऽहमुर्वशीसङ्गातद्यथेति न तुम्बुरुः। युष्मद्गुरुरपीत्येनामूचाषाथ पुरूरवाः ॥२२॥ तच्छ्रुत्वा तुम्बुरुः कोपात्तस्मै शापमथादिशत्। उर्वश्या ते वियोगः स्यादाकृष्णाराधनादिति ॥२३॥ श्रुतशापश्च गत्वैव तमुद्दश्य पुरूरवाः। अकालाशनिपातोप्रं स्ववृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥२४॥ ततोऽकस्मान्निपत्यैव निन्ये क्वाप्यपहृत्य सा। अदृष्टस्तेन भूपेन गन्धर्वैरूर्वशी किल ॥२५॥ अवधाय शापदोषं तं सोऽप्य गत्वा पुरूरवाः। हरेराराधनं चक्र ततो बदरिकाश्रमम् ॥२६॥ उर्वशी तु वियोमार्त्ता गन्धर्वविषयस्थिता। आसीन्मृतेव सुप्तेव लिखितेव विचेतना ॥२७॥ आश्चयं यच्च सा प्राज शापान्ताद्यावलम्बिनी। मुक्ता विरहदीर्घामु चक्रवाकीव रात्रिषु ॥२८॥ पुरूरवाश्च तपसा तेनाच्युतमतोषयत्। तत्प्रसादेन गन्धर्वा मुमुचुस्तस्य चोर्वशीम् ॥२९॥ शापान्तरुग्मया मुक्तं पुनरप्सरसा तया। दिब्यान् स राजा बुभुजे भोगा मृतमत्र्त्त्योऽपि ॥३०॥ इत्युक्त्वा विरते राज्ञि श्रुतोर्वश्यनुरागया। सापि सोडवियोगत्वाद्व्रीडा बासवदत्तया ॥३१॥ तां दृष्ट्वा युक्त्युपालब्धां राजा देवीं विलक्षिताम्। अथाप्यामयितुं भूपमाह यौगन्धरायणः ॥३२॥ न श्रुता यदि तन्नामन्कथेयं श्रूयतां त्वया। अस्तीह तिमिरा नाम नगरी मन्दिरं श्रियः ॥३३॥ तस्यां विहितसेनाख्यः ख्यातिमानभवन्नृपः। तस्य तेजोवतीत्यासीद् भार्या क्षितितलाप्सराः ॥३४॥ तस्याः कण्ठग्रहेऽप्याप्र स राजा स्पर्शलोलुपः। न सेहे कञ्चुकेनापि क्षिप्रामाच्छुरितं वपुः ॥३५॥ कदाचित्तस्य राज्ञश्च जज्ञे वीर्य्यज्वरामयः। यदा निवारयामासुस्तया देव्यास्य सङ्गमम् ॥३६॥
राजा ने कहा—'उर्वशी के सम्पर्क से जो कुछ मैं जानता हूँ उसे तुम्हारे गुरु तुम्बुरु भी नहीं जानते'। यह सुनकर तुम्बुरु ने क्रोध में भरकर राजा को शाप दिया कि जबतक कृष्ण की आराधना न करोगे तबतक उर्वशी से तुम्हारा वियोग हो जायगा ॥२२-२३॥
शाप को सुनकर राजा पुरूरवा ने अकास में वज्रपात के समान यह शाप उर्वशी को कह सुनाया ॥२४॥
तदनन्तर अकस्मात् गन्धर्वों ने तुम्बुरु की आज्ञा से आकर गुप्त रूप से उर्वशी का अपहरण कर लिया ॥२५॥
पुरूरवा ने इसे शाप का फल समझ कर बदरिकाश्रम में जाकर भगवदाराधन प्रारम्भ किया ॥२६॥
गन्धर्व-लोक में राजा के वियोग से सन्तप्त उर्वशी निर्जीव-सी सोई-सी चित्रलिखित-सी एवं संज्ञाहीन होकर पड़ रही। वह शाप के अन्त की आशा पर अवलम्बित विरह से लम्बी रात्रियों में चकवी के समान तड़पती-सी रहती किन्तु प्राणों से विरक्त न हुई ॥२७-२८॥
इधर पुरूरवा ने भगवान् विष्णु को तप से प्रसन्न किया। भगवान् की कृपा से गन्धर्वों ने उसकी उर्वशी को छोड़ दिया ॥२९॥
शाप के अन्त में पुनः प्राप्त हुई उर्वशी के साथ राजा भूलोक में स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करता था ॥३०॥
इस प्रकार कथा सुनाकर राजा के चुप होने पर उर्वशी की विरह-वेदना की सहन-शक्ति को जानकर वासवदत्ता मन-ही-मन लज्जित हुई ॥३१॥
राजा के द्वारा युक्तिपूर्वक उपालम्भ दी गई वासवदत्ता को कुछ लज्जित देखकर उसे आश्वासन देने के लिए यौगन्धरायण ने कहा ॥३२॥
विहितसेन और तेजस्वती की कथा
हे राजन् ! यदि तुमने यह कथा न सुनी हो तो सुनो। भू-लोक में लक्ष्मी के निवास भवन के समान तिमिश्र नाम की समृद्ध नगरी है ॥३३॥
उसमें विहितसेन नाम का राजा राज्य करता था। उसकी रानी तेजस्वती भूतल की अप्सरा थी। उसके कण्ठाश्लेष में संलग्न-हृदय वह राजा अपने शरीर पर कुरते का आवरण भी सहन नहीं करता था ॥३४-३५॥
एक बार राजा को जीर्ण ज्वर हुआ। वैद्यों ने उस रानी के साथ मिलने से मना कर दिया ॥३६॥
१६
१८४ कथासरित्सागर
१८४ कथासरित्सागर देवी सम्पर्कहीनस्य हृदये तस्य भूभृतः। औषधोपक्रमासाध्यो व्याधिः समुदपद्यत॥३७॥ भयाच्छोकाभिघाताद् वा राज्ञो रोगः कदाचन। स्फुटेदयमितिस्माहुर्भिषजो मन्त्रिणो रहः॥३८॥ यः पुरा पृष्ठपतिते न तत्रास महोरगे। नान्तःपुरप्रविष्टेऽपि परानीके च चुक्षुभे॥३९॥ तस्यास्य राज्ञो जायेत भय सत्ववतः कथम्। नास्त्यत्रोपायबुद्धर्न किं कुर्मस्तेन मन्त्रिणः॥४०॥ इति सञ्चिन्त्य समन्त्र्य ते देव्या सह मन्त्रिणः। तां प्रच्छाद्य तमूचुश्च मृता देवीति भूपतिम्॥४१॥ तेन शोकातिभारेण मथ्यमानस्य तस्य सः। पुस्फोट हृदयव्याधिर्विद्रुतस्य महीभृतः॥४२॥ उत्तीर्णरोग-विपदे तस्मै राज्ञेऽथ मन्त्रिभिः। अर्पिता सा महादेवी सुसम्पदिवापरा॥४३॥ बहु मेने च सोऽप्येनां राजा प्राप्तप्रदामिवाम्। न पुनर्मतिमानस्यै धृक्रोधाच्छादितात्मने॥४४॥ हितैषिणा हि या पत्युः सा देवीत्वस्य कारणम्। प्रियकारित्वमात्रेण देवीशब्दो न लभ्यते॥४५॥ सा मन्त्रिता च यद्राज्यकार्यभारैकचिन्तनम्। चित्तानुवर्तनं यत्तदुपजीवकलक्षणम्॥४६॥ अतो मगधराजेन सन्धाय परिपन्थिना। पृथ्वीविजयहेतोस्ते यत्नोऽस्माभिरयं कृतः॥४७॥ तेन देव! भवद्भक्तिसोढासद्यवियोगया। दम्या नैवापराधः ते पूर्णानूपकृतिः कृता॥४८॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य यथार्थं मुख्यमन्त्रिणः। मेनेऽपराधमात्मानं वत्सराजस्तुतोष च॥४९॥ उवाच चतज्मानेऽहं देव्या युष्मत्प्रयुक्तया। आकारवत्या नीत्येव मम दत्तेयं मेदिनी॥५०॥ क्क त्वद्विप्रजयादेसग्मयोक्तमसमञ्जसम्। अनुरागाधममसां विचारसहता कृतः॥५१॥
तृतीय लम्बक २८३
तृतीय लम्बक २८३ देवी के सम्पर्क से रहित उस राजा का रोग भीतर-ही-भीतर बढ़ने लगा जो औषधियों के उपचार से असाध्य हो गया। 'भय, शोक या अभिघात से सम्भव है, राजा का रोग अच्छा हो सके'—ऐसा वैद्यों ने एकान्त में मन्त्रियों से कहा। मन्त्रियों ने सोचा कि राजा अत्यन्त जीवट वाला है। एक बार पीठ पर भीषण सर्प के गिरने पर और शत्रुओं के रनिवास तक घुस आने पर भी जो न डरा उसे किस प्रकार डराया जा सकता है। इसके लिए कोई उपाय नहीं सूझता। हमारी बुद्धि काम नहीं करती ॥४३-४४॥ इस प्रकार सोच-विचार कर मन्त्रियों ने रानी के साथ परामर्श करके और उसे कपट से ढककर राजा से कह दिया कि 'महारानी मर गईं' ॥४५॥ इस भीषण शोक-संवाद से राजा का हृदय मथित और व्यथित हो गया और शोक-विह्वल राजा का हृदय-रोग नष्ट हो गया ॥४६॥ उस रोग-रूपी विपत्ति से छूट जाने पर मन्त्रियों ने दूसरी गुप्त-सम्पत्ति के समान महारानी को राजा के लिए भेंट कर दिया ॥४७॥ उस प्राणदायिनी रानी को राजा बहुत मानने लगा और बुद्धिमान् राजा ने छिपी हुई रानी पर क्रोध भी नहीं किया ॥४८॥ पति की हितैषिता ही महारानीपन है। केवल राजा को प्रसन्न रखना ही रानीपन नहीं है ॥४९॥ मन्त्रित्व भी वही है—राज-कार्य की समुचित चिन्ता रखना। राजा की 'हाँ-में-हाँ' मिलाना तो केवल नौकरी-मात्र है ॥४९॥ इसीलिए विरोधी मगधराज से सन्धि करने तथा समस्त पृथ्वी पर विजय करने के लिए हमलोगों ने यह यत्न किया ॥४७॥ अतः आपकी भलाई के कारण उत्पन्न वियोग को सहन करनेवाली महारानी वासवदत्ता ने अपराध नहीं किया प्रत्युत बड़ा उपकार ही किया ॥४८॥ प्रधान मन्त्री के वचन सुनकर वत्सराज ने अपने को अपराधी समझा और इस घटना पर सन्तोष प्रकट किया और कहा—आरोग्य की प्राप्ति सुतीक्ष्ण औषधि के समान महारानी ने मुझे सारी पृथ्वी प्रदान की ॥४०-५१॥ मैंने जो कुछ कहा वह प्रेम के अतिशय के कारण कहा—'प्रेम से अन्ध हृदयवाले लोगों में विचार करने की शक्ति कहाँ रह जाती है? ॥५२॥
२८४ कथासरित्सागर
२८४ कथासरित्सागर इत्यादिभिः समालापैर्वत्सराजः स तद्दिनम्। लब्धोपरागं देव्याश्च सममेवापनीतवान् ॥५२॥ अन्येद्युर्मगधेशेन प्रेषितो ज्ञानवस्तुना। दूतो वत्सेशमभ्येत्य तद्वाक्येन व्यजिज्ञपत् ॥५३॥ मन्त्रिभिस्ते वयं तावद् वञ्चितास्तत्तथाधुना। कुर्याः शोकमयो यन्न जीवलोको भवेन्न नः ॥५४॥ एतच्छ्रुत्वाथ सम्मान्य वत्सेशः प्रजिघाय तम्। दूतं पद्मावतीपार्श्वं प्रतिसन्देशलम्भने ॥५५॥ सापि वासवदत्तान्वेता तत्सन्निधौ ददौ। दूतस्य दर्शनं तस्य विनयो हि सतीव्रतम् ॥५६॥ व्याजेन पुत्रि नीता त्वमन्यासक्तश्च तं पतिः। इति शोकामया लब्धं कन्याजनकताफलम् ॥५७॥ इत्युक्तपितृसन्देशं दूतं पद्मावती तदा। जगाद भद्र! विज्ञाप्यस्तातोऽम्बा च गिरा मम ॥५८॥ किं शोकेनार्यपुत्रो हि परमं सदयो मयि। देवी वासवदत्ता च सस्नेहा भगिनीव मः ॥५९॥ तत्तातेनामपुत्रस्य भाव्यं नैव विकारिणा। निजसत्यमिवार्याभ्यं मदीयं जीवितं यदि ॥६०॥ इत्युक्तं प्रतिसन्देशे पद्मावत्या यथोचिते। दूतं वासवदत्ता तं सत्कृत्य प्राहिणोत्ततः ॥६१॥ दूते प्रतिगते तस्मिन् स्मरन्ती पितृवेश्मनः। किञ्चित् पद्मावती तन्मातृत्वाच्छान्तिमना इव ॥६२॥ ततस्तस्य विनोदायमुक्तो वासवदत्तया। वसन्तकोऽस्मिलव्राज कथामित्थमवर्णयत् ॥६३॥ सोमप्रभागुहसेनयोः कथा अस्ति पाटलिपुत्राख्यं पुरं पृथ्वोविभूषणम्। तस्मिंश्च धर्मगुप्ताख्यो बभूवैको महावणिग् ॥६४॥ तस्य चन्द्रप्रभायासीद् भार्या सा च व्यपद्यत। गर्भा भून्मृगताप्य कन्या गर्भागुरुत्तरोम् ॥६५॥
तृतीय लम्बक २८५
तृतीय लम्बक २८५ इस प्रकार वत्सराज ने महायज्ञी की इच्छा और उस दिन को एक साथ ही समाप्त कर दिया ॥५२॥ दूसरे ही दिन समाचार जानकर मगध-नरेश ने दूत भेजा। उसने वत्सराज से उसका सन्देश कहा कि तुम्हारे मन्त्रियों ने हमें धोखा दिया। इसलिए ऐसा न करना कि हमारा संसार शोक-मय हो जाय ॥५३-५४॥ यह सुनकर वत्सराज ने उस दूत को पद्मावती के पास भेज दिया। वासवदत्ता के सम्मुख नम्रता प्रकट करती हुई पद्मावती ने भी उसी के पास आकर सन्देश सुनाने के लिए उस दूत का दर्शन दिया। नम्रता ही सती स्त्रियों का व्रत है॥५५-५६॥ दूत ने राजा का सन्देश कहा—'बेटी ! छल-कपट से वत्सराज तुम्हें विवाह करके ले गये तुम्हारा पति दूसरी स्त्री में अधिक अनुराग रखता है'इस शोक से मैंने कन्या के पिता होने का फल पा लिया। इस प्रकार पिता का सन्देश सुनाते हुए दूत से पद्मावती ने कहा—'हे भद्र ! मेरे वचन से पिता और माता को निवेदन करना कि आपलोग शोक क्या करते हैं। आर्यपुत्र (मेरे पति) मुझ पर अत्यन्त दया और स्नेह रखते हैं। वासवदत्ता भी बहिन के समान मुझमें स्नेह रखती है। यदि अपने सत्त्व के समान मेरे जीवन की रक्षा चाहते हो तो तुम्हें आर्यपुत्र (उदयन) के प्रति वैमनस्य न रखना चाहिए ॥५७-६०॥ इस प्रकार पद्मावती के द्वारा पिता के प्रति सन्देश दिये जाने पर, वासवदत्ता ने आतिथ्य-सत्कार करके दूत को विदा किया ॥६१॥ दूत के चले जाने पर पद्मावती अपने पितृगृह की बातों का स्मरण करके कुछ अनमनी-सी हो गई। उसे अनमनी देखकर वासवदत्ता के द्वारा बुलाये गये विदूषक वसन्तक ने वहाँ आकर कहानी कहना प्रारम्भ किया ॥६२-६३॥ सोमप्रभा और गुहसेन की कथा पृथ्वी का अलंकार पाटलिपुत्र नाम का एक नगर है। वहाँ पर धर्मगुप्त नाम का एक धनी व्यापारी वैश्य रहता था। ॥६४॥ उसकी चन्द्रप्रभा नाम की पत्नी एक बार गर्भवती हुई और उसने एक सर्वाङ्ग सुन्दरी कन्या उत्पन्न की ॥६५॥
९८६ कथासरित्सागर
९८६ कथासरित्सागर सा कन्या जातामात्रैव कान्तिद्योतितवासका। चक्रे सम्यक्तमालाप' मुत्थायोपविवेश च ॥६६॥ ततो विस्मितवित्रस्त स्त्रीजन जातवेश्मनि। दृष्ट्वा स धर्मगुप्तोऽथ सभयः स्वयमाययौ ॥६७॥ पप्रच्छ कन्यकां तां च प्रणतस्तत्क्षणं रहः। भगवत्यवतीर्णासि का त्वं मम गृहेष्विति ॥६८॥ साप्यवादीत्सया नैव देया कस्मैचिदप्यहम्। गृहस्थिता शुभाहं ते पृष्टेनान्येन तात ! किम् ॥६९॥ इत्युक्तः स तया भीतो धर्मगुप्तः स्वमन्दिरे। गुप्तं तां स्थापयामास भृतिरिति स्यापिता बहिः ॥७०॥ सतं सोमप्रभा नाम सा कन्या ववृधे क्रमात्। मानुषेण शरीरेण रूपकान्त्या तु दिव्यया ॥७१॥ एकदा तु प्रमोदेन मधूत्सवविलोकिनीम्। हर्म्यस्थां गुहचन्द्राख्यो वणिक्पुत्रो ददर्श ताम् ॥७२॥ स मनोभवभल्लेयेव सद्यो हृदयलग्नया। तया मुमूच्छैवं त्वा कृच्छाच्च गृहमाययौ ॥७३॥ स्मरार्तिविधुरस्तत्र पित्रोरस्वास्थ्यकारणम्। निर्बन्धपृष्टो वक्ति स्म स्ववयस्यमुखेन सः ॥७४॥ ततोऽस्य गुहसेनाख्यः पिता स्नेहेन याचितुम्। तां कन्यां धर्मगुप्तस्य वणिजो भवनं ययौ ॥७५॥ सद्य तं कृतयाच्ञं स गुहसेनं स्नुषार्थिनम्। कन्या कुतो मे मूढेति धर्मगुप्तो निराकरोत् ॥७६॥ निह्नुतां तत्र कन्यां तां मत्वा गत्वा गृहे सुतम्। दृष्ट्वा स्मरज्वराक्रान्तं गुहसेनो व्यचिन्तयत् ॥७७॥ राजानं प्रप्स्याम्यत्र स हि मे पुत्रमीप्सितं । दापयत्यपि पुत्राय स बन्द्यां तां मुमूर्षवे ॥७८॥ इति निश्चित्य गत्वा च दत्वाराज्ञे रत्नमुत्तमम्। भूपं विज्ञापयामास स वणिक्स्याभिकांक्षितम् ॥७९॥ १ ग सद्योज्ञताय बालस्य भाषणं महत्त्वशंसनम्।
तृतीय लम्बक २८७
तृतीय लम्बक २८७ अपनी अनुपम कान्ति से प्रसूति-गृह को आलोकित करती हुई वह कन्या उत्पन्न होते ही स्पष्ट वाणी में वार्तालाप करने लगी और उठने-बैठने लगी ॥६६॥ कन्या की इस स्थिति से चकित और व्याकुल स्त्रियों का कोलाहल सुनकर डरता हुआ धर्मगुप्त प्रसूतिगृह में आया। धर्मगुप्त ने आकर प्रणाम करने के अनन्तर उसी समय एकान्त में उस कन्या से पूछा—'हे देवि ! तू कौन मेरे घर में अवतीर्ण हुई है ? ॥६७-६८॥ वह कन्या बोली—'तू मुझे किसी को देना नहीं मैं तेरे घर में रहकर ही कल्याण करता रहूँगी' ॥६९॥ यह सुनकर भयभीत बनिये ने उस कन्या को घर में ही छिपाकर रख दिया और बाहर उसके मर जाने की घोषणा कर दी। इस प्रकार सोमप्रभा नाम की वह कन्या मनुष्य-शरीर और दिव्य कान्ति के साथ क्रमशः घर में ही बढ़ने लगी ॥७०॥ अपने घर की खिड़की से एक बार प्रमत्तता के कारण बसन्तोत्सव देखती हुई उस कन्या का मुकुटभद्र नामक वैश्यपुत्र ने देख लिया ॥७१॥ लगे हुए कामदेव के भाले की नोक के समान हृदय में धँसी हुई उसे देखकर वह मूर्च्छित-सा हो गया और अत्यन्त कठिनता से घर पहुँच सका ॥७२॥ काम-वेदना से अत्यन्त अस्वस्थ उस मुकुटभद्र ने अत्यन्त आग्रह करने पर, अपनी अस्वस्थता के कारण अपने मित्र के द्वारा माता-पिता को कहवाया ॥७३॥ तब उसका पिता पुत्र-स्नेह के कारण उस कन्या की मँगनी करने के लिए धर्मगुप्त के घर पर गया ॥७४॥ इस प्रकार अपनी बहू बनाने के लिए कन्या की प्रार्थना करते हुए शूरसेन को धर्मगुप्त ने यह कहकर निराश कर दिया कि 'मेरे यहाँ कन्या कहाँ है ? वह तो होकर मर गई' ॥७५॥ शूरसेन ने कन्या को घर में छिपाये हुए धर्मगुप्त को और कामज्वर से पीड़ित अपने पुत्र को देखकर शूरसेन ने सोचा—'मैं इस विषय में राजा से सहायता लेता हूँ, उसे प्रेरित करता हूँ क्योंकि मैं बहुत राजा की सेवा कर चुका हूँ। राजा अवश्य ही मेरे मरणासन्न पुत्र को कन्या दिला देगा ॥७६-७८॥ ऐसा निर्णय करके और एक उत्कोच राजा को भेंट करके उसने राजा से अपनी इच्छा प्रकट की ॥७९॥
१८८ कथासरित्सागर
१८८ कथासरित्सागर
नृपोऽपि प्रीतिमानस्य साहाय्ये नगराधिपम्। ददौ तेन समं चासौ धर्मगुप्तगृहं ययौ॥८०॥ रुरोध च गृहं तस्य धर्मगुप्तस्य तद्बलैः। असुभिः कण्ठलग्नैश्च सर्वनाशविशङ्किनः॥८१॥ ततः सोमप्रभा सा तं धर्मगुप्तमभाषत। देहि मां तात माऽभूत्ते मन्निमित्तमुपद्रवः॥८२॥ आरोपणीया शय्यायां नाहं भर्त्रा कदाचन। ईदृक्तु वाचा नियमो ग्राह्यः सम्बन्धिनां त्वया॥८३॥ इत्युक्तः स तया पुत्र्या वासु तां प्रत्यपद्यत। धर्मगुप्तस्तवाभाष्य शय्यारोपणवर्जनम्॥८४॥ गुहसेनोऽनुमेने च सान्तर्हासस्तथैव तत्। विवाहो मम पुत्रस्य तावदस्त्विति चिन्तयन्॥८५॥ अथादाय कृतोद्वाहां तां स सोमप्रभां वधूम्। गुहसेनसुतः प्रायाद् गुहचन्द्रो निजं गृहम्॥८६॥ सायं तं पितावादीत् पुत्र! शय्यामिमां वधूम्। आरोपय स्वभार्या हि कस्याङ्कशय्या भविष्यति॥८७॥ तच्छ्रुत्वा श्वशुरं तं सा वधूः सोमप्रभा रुषा। विक्षोभ्य भ्रामयामास यमाज्ञामिव तर्जनीम्॥८८॥ तां दृष्ट्वावाङ्मुखिस्तस्याः स्नुषायास्तस्य तत्क्षणम्। वणिजः प्रययुः प्राणा मन्येषामाययौ भयम्॥८९॥ गुहचन्द्रोऽपि सम्प्राप्ते तस्मिन् पितरि पञ्चताम्। मारी मम गृहं भार्या प्रविष्टेति व्यचिन्तयत्॥९०॥ अतश्चानुपभुञ्जानो भार्यां तां गृहवर्तिनीम्। सिषेवे गुहचन्द्रोऽसावासिधारामिव व्रतम्॥९१॥ तद्दुःख दह्यमानोऽन्तर्विरक्तो भोगसम्पदि। ब्राह्मणान् भोजयामास प्रत्यहं स कृतव्रतः॥९२॥ तद्भार्यापि च सा तेभ्यो विप्रेभ्यो मौनधारिणी। भुक्तवद्भ्यो ददौ नित्यं दक्षिणां दिव्यरूपधृत्॥९३॥ एकदा ब्राह्मणो वृद्धस्तामेको भोजनागतः। ददर्श जगदाश्चर्यजननीं रूपसम्पदा॥९४॥ सकामुको द्विजोप्राक्षीद् गुहचन्द्रं रहस्ततः। का ते भवति बालेयं त्वया मे कथ्यतामिति॥९५॥
तृतीय लम्बक २८९
तृतीय लम्बक २८९ राजा का भी उसके प्रति स्नेह था अतः उसने नगर के कोतवाल को गुहसेन के साथ कर दिया और उसने उसके साथ धर्मगुप्त का घर घेर लिया तथा साथ ही सर्वनाश की शंका से भयभीत धर्मगुप्त के प्राणों ने उसके गले को घेर लिया॥८०-८१॥ पिता की इस स्थिति को देखकर सोमप्रभा ने उससे कहा कि 'तुम मुझे दे दो मेरे लिये यह उपद्रव हो रहा है किन्तु यह शर्त लगा दो कि मेरा पति मुझे शैया पर कभी न चढ़ाये'। ऐसी मौखिक शर्त तुम समधी से करा लो॥८२-८३॥ कन्या के इस प्रकार कहने पर धर्मगुप्त ने शर्त के साथ कन्या का देना स्वीकार कर लिया। गुहसेन ने मन-ही-मन हँसते हुए उसकी शर्त स्वीकार कर ली कि किसी प्रकार मेरे लड़के का विवाह तो हो फिर देखा जायगा॥८४-८५॥ तदनन्तर गुहसेन का पुत्र गुहचन्द्र विवाह करके सोमप्रभा को लेकर अपने घर आ गया॥८६॥ सायंकाल होने पर गुहसेन ने अपने पुत्र से कहा कि 'बेटा तुम इसे शैया पर चढ़ा लो। किसकी पत्नी शैया पर नहीं चढ़ती॥८७॥ श्वसुर की ऐसी बात सुनकर सोमप्रभा ने क्रोध से अपनी तर्जनी अंगुली को यमराज की आज्ञा के समान घुमाया॥८८॥ बहु की उस घूमती हुई उंगली को देखकर ससुर के प्राण उसी समय निकल गये। पिता के मरने पर गुहचन्द्र ने भी समझा कि यह स्त्री महामारी के रूप में मेरे घर आ गई है॥८९ १ ॥ अतः उसका सेवन न करके घर में रहती हुई भी उससे दूर रहकर मानो असिधारा-व्रत का पालन करता था॥९१॥ उस दुःख से दुःखी गुहचन्द्र सांसारिक भोगों से विरक्त होकर प्रतिदिन व्रत करता और ब्राह्मणों को भोजन कराता था॥९२॥ उसकी दिव्यरूप-धारिणी स्त्री भी मौनव्रत धारण करती हुई भोजन किये हुए ब्राह्मणों को दक्षिणा देती थी॥९३॥ एक दिन भोजन के लिए आये हुए एक बूढ़े ब्राह्मण ने संसार को चकित करनेवाले अनुपम सौन्दर्यशालिनी उस स्त्री को देखा। और एकान्त में गुहचन्द्र से पूछा कि यह बालिका तुम्हारी कौन है? मुझे बताओ'॥९४ ९५॥ ३७
२१० कथासरित्सागर
२१० कथासरित्सागर
विनयपृष्टः सोऽप्यस्मै गुहचन्द्रो द्विजन्मने। शशंस तद्गतं सर्वं वृत्तान्तं खिन्नमानसः ॥९६॥ तद्बुद्ध्वा स ततस्तस्मै सानुकम्पो द्विजोत्तमः। अग्नेराराधनं मन्त्रं ददावीप्सितसिद्धये ॥९७॥ तेन मन्त्रेण तस्याग्नेर्जपं रहसि कुर्वतः। उदभूद् गुहचन्द्रस्य पुरतो वह्निमध्यतः ॥९८॥ स चाग्निर्द्विजरूपी तं जगाद परमानतम्। अद्याहं त्वद्गृहे भोक्ष्ये रात्रौ स्थास्यामि तत्र च ॥९९॥ दर्शयित्वा च तत्त्वं ते साधयिष्यामि वाञ्छितम्। इत्युक्त्वा गुहचन्द्रं स ब्राह्मणस्तद्गृहं ययौ ॥१००॥ तत्रान्यतिप्रवद् भुक्त्वा गुहचन्द्राऽन्तिके च सः। सिषेवे शयनं रात्रौ याममात्रमतन्द्रितः ॥१०१॥ तावच्च ससुप्तजनात् सा तस्मात्तस्य मन्दिरात्। निर्ययौ गुहचन्द्रस्य भार्या सोमप्रभा निशि ॥१०२॥ तत्कालं ब्राह्मणः सोऽथ गुहचन्द्रमबोधयत्। एहि स्वभार्यावृत्तान्तं पश्यत्येनमुवाच च ॥१०३॥ योगेन भृङ्गरूपं च कृत्वा तस्यात्मनस्तथा। निर्गत्यान्वगमत्तस्य भार्या तां गृहनिर्गताम् ॥१०४॥ सा जगाम सुदूरं च सुन्दरी नगराद् बहिः। गुहचन्द्रेण साकं च द्विजोऽप्यनुजगाम ताम् ॥१०५॥ ततस्तत्र महाभोगं सच्छायस्कन्धसुन्दरम्। गुहचन्द्रो ददर्शानेकं न्यग्रोधपादपम् ॥१०६॥ तस्याधस्ताच्च शुश्राव वीणावेणुरवान्वितम्। उल्लसद्गीतमधुरं दिव्यं सङ्गीतध्वनिम् ॥१०७॥ स्कन्धदेशे च तस्यैकां स्वभार्यासदृशाकृतिम्। अपश्यत् कन्यकां दिव्यामुपविष्टां महासने ॥१०८॥ निकान्तिजितज्योत्स्नां शुक्लचामरवीजिताम्। इन्दोर्लावण्यसर्वस्व-कोषस्येवाधिदेवताम् ॥१०९॥ अत्रावान्तरवृत्ते च तस्या अर्धसने तथा। उपविष्टां स्वभार्यां तां गुहचन्द्रो ददर्श सः ॥११०॥
तृतीय लम्बक २९१
तृतीय लम्बक २९१ आग्रहपूर्वक बार-बार पूछने पर गृहचन्द्र ने कुञ्जित मन से उस सोमप्रभा का सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥१९६॥ सारा समाचार सुनकर उस पर दयालु ब्राह्मण ने उसे कहा कि मैं तुम्हें अग्नि की उपासना का मन्त्र देता हूँ जिससे तुम्हारी कामना पूरी होगी ॥१९७॥ इस प्रकार एकान्त में जप करते हुए गृहचन्द्र के सम्मुख अग्नि के मध्य से एक पुरुष निकला ॥१९८॥ वह ब्राह्मण-रूपी अग्नि देवता चरण में पड़े हुए गृहचन्द्र से बोला— आज मैं तुम्हारे घर में भोजन करूँगा और रात में यहीं रहूँगा और तुम्हें तत्त्व बताकर तुम्हारा कार्य सिद्ध करूँगा ॥१९९ ॥ इस प्रकार दूसरे ब्राह्मणों की भाँति गृहचन्द्र के यहाँ भोजन करके वह ब्राह्मण उसी के पास सावधानता से एक पहर तक सोया। कुछ समय के अनन्तर घर के सब लोगों के गाढ़ी निद्रा में सो जाने पर गृहचन्द्र की स्त्री सोमप्रभा रात में घर से निकली ॥१ १ २॥ उसी समय उस ब्राह्मण ने गृहचन्द्र को जगाया और कहा कि जाओ अपनी स्त्री का हाल देखो। योगशक्ति से उसे और अपने को भौंरे का रूप बनाकर उसके घर से निकली हुई उसकी स्त्री को दिखाया ॥१ १ ३॥ वह सुन्दरी घर से निकलकर, नगर के बाहर दूर तक चली गई। वह ब्राह्मण भी गृह चन्द्र के साथ उसके पीछे-पीछे चला ॥१ १ ५॥ नगर के बाहर गृहचन्द्र ने विशाल विस्तृत तनोबाले तथा छायावाली शाखाओ से युक्त और निकलती हुई मधुर संगीत-ध्वनि से युक्त एक वट-वृक्ष को देखा। उस वृक्ष के नीचे उसने वीणा और बाँसुरी के मधुर स्वर से युक्त दिव्य संगीत-ध्वनि सुनी। उस वृक्ष की एक विशाल शाखा पर अपनी पत्नी (सोमप्रभा) के समान आकृतिवाली दिव्यकन्या को एक ऊँचे आसन पर बैठे हुए देखा। वह दिव्यकन्या अपनी उज्ज्वल कान्ति से चाँदनी को जीत रही थी और उसके दोनों ओर चवल चँवर डुल रहे थे। वह कन्या मानो चन्द्रमा के लावण्य-कोष (खजाने) की अधिष्ठात्री देवी थी ॥१ १-१ ॥ गृहचन्द्र ने देखा कि उसकी पत्नी सोमप्रभा भी वृक्ष पर चढ़कर उसी प्रकार उसके साथ आसन पर जा बैठी ॥१२१ ॥
२१२ कथासरित्सागर
२१२ कथासरित्सागर
तत्काल तुल्यारूपी त गच्छते दिव्यकन्यके । पश्यतस्तस्य भासि स्म सा त्रिक्षन्द्रय यामिनी ॥११२॥ ततः स कौतुकाविष्टः क्षणमेवमचिन्तयत् । किं स्वप्नोऽयमुत भ्रान्तिरियत्सत्यमथा द्वयम् ॥११३॥ या सम्पागतरूपा विद्रुमद्रुति-मञ्जरी । अहो पुण्योद्गतेस्तस्या ममाप्येतत्त्वगोचरो ॥११४॥ इति चिन्तयति स्वैरं तस्मिंस्तद् दिव्ययोः । भुक्त्वा निजोचितं भोग्यं दिव्यं सानुरागवत् ॥११५॥ अद्यागतो महान्तो द्विज चात्रेव गुहू न । तस्माद् भगिनि ! पत्तो मे वहिर्न तद् व्रजाम्यहम् ॥११६॥ इत्युक्त्वा तामपामन्त्र्य द्वितीयां दिव्याङ्गनाम् । गुहप्रख्य गृहिणी तरोरभ्यन्तरे गता ॥११७॥ तद्दृष्ट्वा भृशम्प्येतो गुहगुप्तं निजञ्च यः । प्रत्यागच्छत्प्रभा गह् पूर्ववच्चाप्यनुदिनि ॥११८॥ ततः सा दिव्यपार्श्वि गुहप्रख्यस्य गृहिणी । भाग्यपार्याप्तमात्रेव प्रविश्यन् स्वमन्दिरम् ॥११८॥ तदा स ब्राह्मणः प्राह गुहप्रख्यसहायः । दृष्ट्व त्वया समानीता भार्या दिव्या न मानुषी ॥१२०॥ द्वितीया सापि चैतस्या दृष्टाय भगिनी मया । दिव्या स्त्री तु मनुष्येण कथमित्थं निगृह्यतम् ॥१२१॥ तदविगणय्य मम द्वाराभ्यर्थ्य हतासि सा । मन्योऽन्यस्त्री बाधा मूर्ति चारिताभाग्यम् ॥१२२॥ सिद्धोऽपि गन्धर्वनिर्वाणायाम् तु का कथा । एवं महाप्रभावेण किं पुनर्विणगुह्य ॥१२३॥ एतच्छ्रुत्वा गुहप्रख्यः एतत् प्राह विजानता । ज्योतिषं न सा यस्मि प्रभाते न विरच्यते ॥१२४॥ इत्यवादीत् प्राचीनं गुहप्रख्यार्जुनः सखः । यस्य पुष्यप्रभावेण गतः दक्षिण पराभवम् ॥१२५॥ गत्वा स गङ्गा समपन्नं दद्याद्भिः सम्प्रार्थितः । कृतः परः पश्चात्तापः सम्प्रार्थितश्च ससूनुना ॥१२६॥ तदनुप्रवेशं लब्धाय यस्य मन्दिरम् गताः । त्वां स्तुवन्ति च प्राप्य सखी सा चित्तसंभ्रमात् ॥१२७॥ अतो दन्तुररूपश्च वा दारपदः श्रो । वस्तुरूपं तुसञ्चिन्त्य तवगोचरं न च दुराशयः ॥
तृतीय लम्बक २१५
तृतीय लम्बक २१५ उस समय एक समान सौन्दर्यवाली उन दोनों कन्याओं को एक साथ बैठे देखकर गुहचन्द्र को वह रात तीन चन्द्र वाली दीखती थी॥१११॥ इस दृश्य को देखकर गुहचन्द्र सोचने लगा कि 'क्या यह स्वप्न है या भ्रम है अथवा दोनों हैं। मेरे सन्मार्ग-वृक्ष की जो विदुषत्सङ्गति-रूपी मंजरी है, उसी में यह उचित फल देने वाला पुष्पोद्गम हुआ है'। वह जब ऐसा सोच ही रहा था कि उन दोनों दिव्य कन्याओं ने अपने योग्य भोजन करके आसव (मद्य) का पान प्रारम्भ किया। 'बहिन ! आज मेरे घर में कोई अति तेजस्वी ब्राह्मण आया है। इस कारण मैं शंकित हो रही हूँ। अतः शीघ्र ही घर जाती हूँ। ऐसा कहकर सोमप्रभा दूसरी से पूछकर वृक्ष पर से नीचे उतरी ॥११२-११६॥ यह सब कुछ देखते हुए भ्रमर के रूप में विद्यमान गुहचन्द्र और ब्राह्मण पहले ही घर पर आकर रात में पहले के समान सो गये ॥११७-११८॥ तब उस ब्राह्मण ने प्रसन्नतापूर्वक गुहचन्द्र से कहा कि 'देखा तुमने यह तुम्हारी पत्नी देव-जाति की है मनुष्य-जाति की नहीं। उसकी दूसरी बहिन को भी तुमने देख लिया अतः दिव्य स्त्री मनुष्य के साथ संबंध कैसे चाहेगी ? इसलिए इसकी सिद्धि के लिए मैं तुम्हें द्वार पर लिखने योग्य मन्त्र बताता हूँ। उसका प्रभाव बढ़ानेवाले बाहरी उपचार (उपाय) भी तुम्हें बताता हूँ। जैसे आग अकेले ही जलती है और जलाने की शक्ति रखती है, यदि उसे वायु मिल जाय तो क्या कहना ? उसी प्रकार अकेला मन्त्र ही सिद्धि प्रदान करता है यदि उसके साथ और उपाय भी किये जायें तो फिर क्या कहना है? ऐसा कह कर, गुहचन्द्र को मन्त्र बताकर और उसकी युक्ति समझाकर वह ब्राह्मण प्रातःकाल ही अन्तर्धान हो गया ॥११९-१२३॥ गुहचन्द्र ने भी पत्नी के गृह-द्वार पर वह मन्त्र लिख दिया और सायंकाल ब्राह्मण के बताये उपाय का प्रयोग किया। तदनन्तर गुहचन्द्र अपनी पत्नी के देखते-ही-देखते खूब सजधज के साथ किसी वेश्या से वार्तालाप करने लगा ॥१२४-१२५॥ उस वेश्या को देखकर मन्त्र के प्रभाव से भीत सोमप्रभा ने गुहचन्द्र को बुलाकर ईर्ष्या के साथ पूछा कि यह कौन है ? गुहचन्द्र ने उससे झूठ ही कहा कि 'यह एक वेश्या है जो मुझसे प्रेम करती है और मैं भी इससे प्रेम करता हूँ अब उसी के घर जा रहा हूँ' ॥१२६-१२७॥
२९४ कथासरित्सागर
२९४ कथासरित्सागर तत साचीकृतवध्वा मुखेन वस्मितभ्रुवा। दृष्ट्वा निवार्य वामेन करेण तमूवाच सा॥१२८॥ हुं शान्तमेतदर्थोऽय वपस्तत्र च मा स्म गाः। किं सया मामुपैहि त्वमहं हि तव गेहिनी॥१२९॥ इत्युक्तः पुल्कोत्कम्पसलोभाकुलया तया। आविष्टयेव तन्मन्त्रदूतदुद्रुह्यापि सः॥१३०॥ प्रविश्य वासक सञ्चस्तयश्च सममन्वभूत्। मर्त्योऽपि दिव्यसम्भोगमसस्पृष्ट मनोरथः॥१३१॥ इत्थ तां प्राप्य सप्रेमां मन्त्रसिद्धिप्रसाधिताम्। त्यक्तदिव्यस्थितिं तस्थौ गृह्यन्त्रो यथासुखम्॥१३२॥ एवं यागप्रदानादिसुकृतेः शुभकर्मणाम्। दिव्याः शापच्युता नायस्तिष्ठन्ति गृहिणीपदे॥१३३॥ देवद्विजसपर्या हि कामधेनुर्मता सताम्। किं हि न प्राप्यते तस्याः कृपा सामानिबन्धनम्॥१३४॥ भुङ्क्त रवयि दिव्यानामप्युच्चपदजं मनाम्। प्रवातमिक पुष्यानामधःपातक्तकारणम्॥१३५॥ इत्युक्त्वा राजपुत्र्याः स पुमराह् वसन्तकः। किं चात्र यहसत्याया वृत्तं तच्छ्रूयतामिदम्॥१३६॥ अहल्याकथा पुरामूद् गौतमो नाम त्रिकालज्ञो महामुनिः। अहल्याति च तस्यासीद् भार्या रूपजिताप्सराः॥१३७॥ एकदा रूपमुग्धस्तामिन्द्रः प्रार्थितवान् रहः। प्रभूणां हि विभूत्यन्धा भ्रावन्त्यविषय मतिः॥१३८॥ सानुमेग च स मूढा रूपस्यन्ती शचीपतिम्। तच्च प्रभावतो बुद्धवा तत्रागाद् गौतमो मुनिः॥१३९॥ मार्जाररूप चक्रे च मयादिन्द्रोऽपि तत्क्षणम्। कः स्थितोऽत्रेति सोऽपृच्छदहल्यामथ गौतमः॥१४०॥ एसो' ठिओ सु मज्जारो इत्यपभ्रष्टवक्तया। गिरा सत्यानुरोधिन्या सा तं प्रत्यब्रवीत्त्वविम्॥१४१॥ १ 'एषस्थितः खलु मार्जार' इतिच्छाया।
तृतीय लम्बक २९५
तृतीय लम्बक २९५ तब भौंहें चढ़ाकर आँखें तिरछी करके और बायें हाथ से उसे रोक कर सोमप्रभा ने कहा—'हूँ! अब मैंने समझा वेश्या के यहाँ जाने के लिए तुमने यह रूप पहना है, अब तुम वहाँ न जाओ मेरे पास आओ मैं तुम्हारी पत्नी हूँ' ॥१२८-१२९॥ रोमांच कंपन और व्याकुलता से भरी एवं मन्तरूपी दूत द्वारा प्रेरित उस सोमप्रभा के ये वचन सुनकर गुहचन्द्र उसके कमरे में जाकर मन से भी दुर्लभ दिव्य मानकर सुख अनुभव करने लगा ॥१३०-१३१॥ इस प्रकार मन्त्र-द्वारा सिद्ध की गई सप्रेम और दिव्य स्थिति को छोड़कर रहती हुई सोमप्रभा को उसे प्राप्त कर गुहचन्द्र सुखपूर्वक रहने लगा ॥१३२॥ इस प्रकार यज्ञ दान आदि शुभ कर्मों के प्रभाव से दिव्यता को प्राप्त कर शाप-भ्रष्ट होने के कारण स्त्रियाँ गृहिणी का पद प्राप्त करती हैं ॥१३३॥ देवता और ब्राह्मणों की पूजा सज्जनों के लिए कामधेनु के समान है। उससे क्या प्राप्त नहीं होता ? अर्थात् सब कुछ प्राप्त होता है। जिस प्रकार आँधी अत्यन्त ऊँचे दिव्य स्थान पर जन्म लेनेवाले पुष्पों के अधःपात का कारण होती है, उसी प्रकार तुम्हारे लिए पाप-कर्म अधःपात के कारण होते हैं॥१३४-१३५॥ राजकुमारी से इस प्रकार कहा गया विदूषक वसन्तक बोला—इस प्रसंग में मैंने अहल्या की कथा सुनी है सुनो ॥१३६॥ इन्द्र और अहल्या की कथा प्राचीन युग में त्रिकालज्ञ गौतम नामक एक महामुनि थे। अप्सराओं से भी अधिक रूपवती अहल्या नाम की उनकी पत्नी थी ॥१३७॥ एक बार उसकी सुन्दरता पर मोहित हो इन्द्र ने उससे एकान्त की प्रार्थना की क्योंकि वैभव से अन्धे राजाओं की बुद्धि अनुचित कार्यों की ओर दौड़ जाती है। इन्द्र को चाहती हुई उस मूर्खा ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया तप के प्रभाव से इस बात को जानकर गौतम मुनि उसी समय वहाँ आ गये। उनके भय से इन्द्र ने उसी समय मार्जार (बिल्ली) का रूप धारण कर लिया तदनन्तर गौतम ने अहल्या से पूछा कि यहाँ कौन है? उसने अपभ्रंश भाषा में सत्य का ध्यान रखते हुए कहा यह 'मज्जार' है। हँसते हुए मुनि ने कहा कि सचमुच यह तुम्हारा जार है ऐसा कहकर मुनि ने उसे शाप दिया परन्तु उसने सत्य का ध्यान रखते हुए छल से कहा था इसलिए मुनि ने उसके शाप का अन्त भी कहा ॥१३८-१४१॥ १ अपभ्रंश भाषा में मार्जार (बिल्ली) का रूप 'मज्जार' होता है और संस्कृत में उसका अर्थ; 'मत् = मेरा, जार = यार यह अर्थ होता है। अतः अहल्याने अपभ्रंश भाषा में जो असत्य कहा था संस्कृत भाषा में वह सत्य होगया कि 'मेरा जार' है ॥
२१६ कथासरित्सागर
२१६ कथासरित्सागर सत्यं त्वज्जार इत्युक्त्वा विहसन्स ततो मुनिः । सत्यानुरोधक्लृप्तान्तं शापं तस्यामपातयत् ॥१४२॥ पापशीले ! शिलाभावं भूरिकालमवाप्नुहि ! आ वनान्तरसञ्चारिरामवालोकनादिति ॥१४३॥ वराङ्गलुब्धस्याङ्गं १ ते तत्सहस्रं भविष्यति । दिव्यं स्त्रीं विश्वकर्मा यां निर्मास्यति तिलोत्तमाम् ॥१४४॥ तां विलोक्य तदैवाक्ष्णां सहस्रं भविता च तत् । इतीन्द्रमपि तत्कालं शपति स्म स गौतमः ॥१४५॥ दत्तशापो यथाकामं तपसे स मुनिर्ययौ । अहल्यापि शिलाभावं दारुणं प्रत्यपद्यत ॥१४६॥ इन्द्रोऽप्यावृतसर्वाङ्गो वराङ्गैरभवत्ततः । अशील कस्य नाम स्यान्न खलीकारकारणम् ॥१४७॥ एवं कुकर्म सर्वस्य फलत्यात्मनि सर्वदा । यो यद् वपति बीजं हि लभते सोऽपि तत्फलम् ॥१४८॥ तस्मात्परविरुद्धेषु नोत्सहन्ते महाशयाः । एतदुत्तमसत्त्वानां विधिसिद्धं हि सव्रतम् ॥१४९॥ युवां पूर्वभगिन्यौ च देव्यौ शापच्युते उभे । तद्वदस्योन्यहितकृन्निर्गूढं हृदयं हि वाम् ॥ १५० ॥ एतद्वसन्तकाच्छ्रुत्वा मिथो वासवदत्तया । पद्मावत्या च सुतरामीर्ष्यालिशोच्यमुज्झितम् ॥१५१॥ देवी वासवदत्ता च कृत्वा साधारणं पतिम् । आत्मनीव प्रियं चक्रे पद्मावत्यां हितोन्मुखी ॥१५२॥ तस्या महानुभावत्वं तत्तादृङ्मगधेश्वरः । श्रुत्वा पद्मावतीसृष्टदूतेभ्योऽपि सुतोष सः ॥१५३॥ अभ्युपेत्य वत्सेशं मन्त्री यौगन्धरायणः । उपेत्य सन्निधौ देव्याः स्थितेऽन्यदवभाषत ॥१५४॥ उद्योगायाधुना देव कौशाम्बीं किं न गम्यते । नाशङ्का मगधेशाच्च विद्यते वञ्चितादपि ॥१५५॥ १ वराङ्ग—स्त्रियः प्रजननेन्द्रियम् । २ भग सहस्रमित्यर्थः।