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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक २७१

तृतीय लम्बक २७१ वहाँ आकर राजा ने अपने पूर्णचन्द्र के समान मुख से पूर्णिमा के चन्द्र को लजानेवाली पद्मावती को देखा। उसके शरीर पर, अपनी दिव्य माला और तिलक देखकर उसे यह चिन्ता हुई कि ये वस्तुएँ इसे कैसे प्राप्त हुई ॥७७-७८॥ तदनन्तर विवाह-वेदी पर बैठकर उसने जो पद्मावती का हाथ पकड़ा वही मानों समस्त पृथ्वी के कर-ग्रहण का प्रारम्भ था ॥७९॥ यह वासवदत्ता के अतिरिक्त दूसरी पत्नी को देखना भी नहीं चाहता मानों इसीलिए धुएं ने उसकी आँखें बन्द कर दीं ॥८०॥ अग्नि की प्रदक्षिणा के समय धूएं से लाल पद्मावती का मुख मानों इसीलिए क्रोध से तमतमाने लगा था ॥८१॥ विवाह-विधि सम्पन्न हो जाने पर, वत्सराज ने वधू के हाथ को त्याग दिया। किन्तु हृदय से वासवदत्ता को नहीं छोड़ा। विवाह के दहेज में मगध-नरेश ने राजा को इतने रत्न भेंट किय कि मालूम होता था कि समूची पृथ्वी के रत्न दुह लिये गये ॥८२-८३॥ उसी अवसर पर यौगन्धरायण ने अग्नि को साक्षी करके मगधेश्वर से यह विश्वास प्राप्त किया कि वह जामाता वत्सराज से कभी भी विरोध न करेगा ॥८४॥ विवाहोत्सव में कपडे और गहने बाँटे गये चारणों ने सुन्दर गीत गाये और वेश्याओं ने नृत्य किये ॥८५॥ पति का अभ्युदय चाहनेवाली वासवदत्ता खोई हुई की तरह एकान्त में स्थित होकर उस समय वैसी प्रतीत होती थी जैसी दिन में चन्द्रमा की कान्ति ॥८६॥ तब अन्तःपुर में वत्सराज उदयन के आ जाने पर बुद्धिमान यौगन्धरायण को आशंका हुई कि कहीं राजा वासवदत्ता को न देख ले ॥८७॥ वासवदत्ता के छिपाने का मन्त्र भंग न हो जाय इस भय से यौगन्धरायण ने मगधेश से कहा कि राजा आज ही तुम्हारे यहाँ से विदा हो जायगा ॥८८॥ मगध-नरेश ने इसे स्वीकार कर लिया उसी प्रकार वत्सराज ने भी इसे स्वीकार किया ॥८९॥ बारातियों के खाने-पीने के अनन्तर वत्सराज उदयन क्षत्रियों के साथ पद्मावती को लेकर लौट आया ॥९०॥

पद्मावत्या विसृष्टं च सुखमारुह्य वाहनम्। तयैव च समादिष्टैस्तन्महत्तरकैः सह ॥९१॥ आगाद् वासवदत्तापि गुप्तं सैन्यस्य पृष्ठतः। क्रूराङ्गपविकृतं तं पुरस्कृत्य वसन्तकम् ॥९२॥ क्रमाल्लावाणकं प्राप वत्सेशो वसतिं निजाम्। प्रविवेश समं यध्वा ववी विसतस्तु क्वस ॥९३॥ एत्य वासवदत्तापि सा गोपालकमन्दिरम्। विवक्षाथ निशीथ च परिसंस्थाप्य महत्तरान् ॥९४॥ तत्र गोपालकं दृष्ट्वा भ्रातरं दर्शितादरम्। कण्ठे जग्राह रुदती बाष्पव्याकुललोचनम् ॥९५॥ तत्क्षणं स्थितसन्निध्व तत्र यौगन्धरायणः। आययौ सप्रमम्दकस्तया देव्या कृतादरः ॥९६॥ सोऽस्याः प्रोत्साहविश्लेषद्वेषं यावद्व्यपोहति। तावत्पद्मावती-पार्श्वं प्रत्यूस्ते महत्तराः ॥९७॥ आगतावन्तिका देवि किमप्यस्मान्विहाय तु। प्रविष्टा राजपुत्रस्य गृहं गोपालकस्य सा ॥९८॥ इति पद्मावती सा तैर्विज्ञप्ता स्वमहत्तरैः। वत्सश्वराग्रे साशङ्का तानेव प्रत्यभाषत ॥९९॥ गच्छन्तावन्तिकां ब्रूध निक्षेपस्त्वं हि मे स्थिता। तदत्र किं ते यन्नाह तत्रैवागम्यतामिति ॥१००॥ तच्छ्रुत्वा तेषु यातेषु राजा पद्मावतीं रहः। पप्रच्छ मालातिलकौ केनेमौ तौ कृताविति ॥१०१॥ सावोचदथ मद्गेहे न्यस्ता विप्रेण कश्चित्। भावन्तिकाभिधा यैषा तस्याः शिल्पमिदं महत् ॥१०२॥ तच्छ्रुत्वैव स वत्सशो गोपालगृहमाययौ। नूनं वासवदत्ता सा भवेदत्रेति चिन्तयन् ॥१०३॥ प्रविवेश च गत्वा तद्द्वारस्थितमहत्तरम्। अन्तस्तद्देवीगोपालकमन्त्रिव्रयवसन्तसम् ॥१०४॥ तत्र वासवदत्तां तां ददर्श प्रोषितागताम्। उपक्तञ्जनिर्मुक्तां मूर्तिं चान्द्रमसीमिव ॥१०५॥

तृतीय लम्बक २७३

तृतीय लम्बक २७३ पद्मावती के द्वारा दिये गये सुन्दर रथ पर सखी के नौकरों के साथ वासवदत्ता भी सेना के पीछे रथ बदलते हुए वसन्तक को आगे बैठाकर गुप्त रूप से चली ॥९१-९२॥ क्रमशः वत्सराज अपने निवास-स्थान लावानक नामक गाँव में पहुँचा और नवीन वधू पद्मावती के साथ राज-भवन में प्रविष्ट हुआ किन्तु वासवदत्ता के हृदय में अकेला ही प्रविष्ट हुआ ॥९३॥ वासवदत्ता भी आधी रात के समय सवारियों को ठहराकर अपने भाई गोपालक के निवास स्थान (डेरे) में चली गई ॥९४॥ सबसे पीछे आती हुई वासवदत्ता ने भी लावानक में पहुँचकर भाई गोपालक का स्वागत करते हुए देखा और रोते हुए भाई के गले से लिपटकर रोने लगी ॥९५॥ उसी समय इस योजना का नेता यौगन्धरायण रुमण्वान् के साथ आया और वासवदत्ता ने उसका स्वागत किया। इधर यौगन्धरायण उधर वासवदत्ता के कष्ट के प्रति महानुभूति प्रकट कर रहा था और उधर वासवदत्ता के पहरेदार पद्मावती के पास पहुँचे। और उन्होंने कहा 'देवि ! अवन्तिका हमलोगों के साथ आई, किन्तु यहाँ आते ही हमलोगों को छोड़कर वह राजकुमार गोपालक के घर में चली गई' ॥९६-९८॥ वत्सराज के सामने ही पहरेदारों (सवारों) द्वारा इस प्रकार निवेदित पद्मावती सशंक होकर उनसे बोली—'जाओ अवन्तिका से कहो कि तुम मेरे पास धरोहर के रूप में रखी गई हो इसलिए वहाँ तुम्हारा क्या है ? जहाँ मैं हूँ वहीं तुम भी रहो। जाओ' ॥९९-१००॥ यह सुनकर उनके चले जाने पर राजा ने एकान्त में पद्मावती से पूछा कि 'तुम्हें यह माला और तिलक किसने दिया ? ॥१०१॥ पद्मावती बोली—'किसी ब्राह्मण ने मेरे पास अवन्तिका नाम की एक कन्या धरोहर के रूप में रखी है उसी की यह कारीगरी है ॥१०२॥ यह सुनकर उदयन वहाँ से उठकर सीधे गोपालक के घर पर आया कि अवश्य ही वासवदत्ता उसके घर पर होगी ॥१०३॥ राजा पहरा लगे हुए गोपालक के द्वार पर पहुँचा। अन्दर वासवदत्ता गोपालक यौगन्धरायण रुमण्वान् और वसन्तक बैठे हुए थे। वहाँ उसने हृदय में मुख्य चन्द्र-मूर्ति के समान प्रकाश से लीपी हुई वासवदत्ता को देखा ॥१०४-१०५॥ ३५

२७४ कथासरित्सागर

२७४ कथासरित्सागर पपाताथ महीपृष्ठे स शोकद्विपविह्वलः। कम्पो वासवदत्ताया हृदये स उदपद्यत॥१०६॥ सत साप्यपतद् भूमौ गात्रैर्विरहपाण्डुरैः। विललाप च निन्दन्ती सदाचरितमात्मनः॥१०७॥ अथ तौ दम्पती शोकदीनौ रक्षितुंस्तदा। यौगन्धरायणोऽभ्यासीद् वाष्पधौतमुखो यथा॥१०८॥ तथाविधं च सङ्क्रुत्त्वा काले सोत्साहसं तदा। पद्मावत्यपि तत्रैव साकुला समुपागमत्॥१०९॥ श्रमादवगतार्था च राजवासवदत्तयोः। तुल्यावस्थय माप्यासीत्स्निग्धमुग्धा हि सन्प्रियः॥११०॥ किं जीवितेन मे कार्यं भर्तुर्दुःखप्रदायिना। इति वासंवदत्ता च जगाद रुदती मुहुः॥१११॥ मगधपसुतालाभान्नासौ साम्राज्यशंसिना। श्रुतमद्यमया न्व्वै! दय्या दोषो न कञ्चन॥११२॥ इयं स्वस्या मपत्यज्य प्रयास धीरभाषिणी। इत्युवाचाथ यत्नेन धीरो योगन्धरायणः॥११३॥ अहमत्र विनाम्यग्नावस्याः शुद्धिप्रपादनः। इति पद्मावती तत्र जगादामरगराशया॥११४॥ अहमप्यापराध्यामि मन्युत श्मृग्सानयम्। मांडो दय्यापि हि कञ्चन इति राजाप्यभाषत॥११५॥ अग्निप्रवेशः कार्यो मे रामो ह्यन्योनुदयः। इति वासवदत्ता च यभाषे बडनिश्चया॥११६॥ ततश्च कृत्तिनां धूर्यो धीमान्योगन्धरायणः। भाषम्य प्राष्टमुग णुड इति वाष्पमुद्द्मन्॥११७॥ यद्यहं शिरसाज्ञा देवी शुद्धिमन्ये यदि। शून मां मोक्षणान्गत्त यहं त्यजाम्यहम्॥११८॥ इत्युक्त्वा विरम मर्ष्मन्त्व्या वागुन्भून्दिवः। भन्दग्ध्य मुञ्च ! दस्य मन्या योगन्धरायण॥११९॥ यन्दा वासवदत्ता च भार्या प्राग्जन्मजन्निता। स एव शङ्खवत्याख्या इत्युक्त्वा वागुपारमत्॥१२०॥

तृतीय लम्बक २७५

तृतीय लम्बक २७५ उसे देखते ही शोक के विष से व्याकुल राजा भूमि पर अचेत होकर गिर गया और वासवदत्ता के हृदय में कम्पन होने लगा। विरह से पीन और विवश अंगोंवाली वासवदत्ता भी उसी समय अचेत होकर गिर गई और अपने किये हुए कार्य के लिए विलाप करने लगी ॥१ ९-१०७॥ इस प्रकार दोनों दम्पती शोक से विकल होकर रोने लगे। यौगन्धरायण का मुँह भी आँसुओं से मानो धुल गया ॥१ ०८॥ इधर इस प्रकार का कोलाहल सुनकर व्याकुल पद्मावती भी वहाँ पहुँच गई ॥१ ०९॥ राजा और वासवदत्ता की हालत देखकर पद्मावती भी उन्हीं के समान शोकाकुल हो गई क्योंकि अच्छी स्त्रियाँ स्नेह-युक्त और सरल होती हैं ॥११ ०॥ पति को दुःख देनेवाले मेरे जीवन का क्या प्रयोजन ! इस प्रकार वासवदत्ता रोती हुई बार-बार प्रलाप करती थी ॥१११॥ मगध-नरेश की कन्या की प्राप्ति से तुम्हें साम्राज्य का लाभ हो—यह सोचकर मैंने यह सब कांड किया इसमें महारानी का कोई भी दोष नहीं। इसके प्रवास-काल में महासती के चरित्र की साक्षी स्वयं महारानी को सौंप पद्मावती है—इस प्रकार फूटकर यौगन्धरायण ने कहा ॥११२ ११३॥ विशुद्ध हृदया पद्मावती ने कहा कि वासवदत्ता की सच्चरित्रता को सिद्ध करने के लिए मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत हूँ ॥११४॥ राजा ने कहा—'इस सारे अपराध का अपराधी एकमात्र मैं ही हूँ जिसके लिए महारानी ने इतना कष्ट-सहन किया ॥११५॥ वासवदत्ता ने दृढ़तापूर्वक कहा कि महाराजा की हृदय-शुद्धि के लिए मम अग्नि- प्रवेश करना चाहिए ॥११६॥ यह सब सुनकर धीरों में धन्य यौगन्धरायण पूर्व मुख बैठकर विशुद्ध मन से आचमन करके बोला—'हे लोकपालो ! यदि मैं राजा का हितकारी हूँ और महारानी भी सच्चरित्रा है तो आस्फोट वाणी हो नहीं तो मैं शरीर-त्याग करता हूँ ॥११७-११८॥ ऐसा कहकर यौगन्धरायण के मौन होने पर आकाशवाणी हुई—'वह राजा धन्य है, जिसके मन्त्री तुम्हारे ऐसे हैं और जिसकी स्त्री वासवदत्ता पूर्वजन्म की देवी है। इसमें कुछ भी दोष नहीं है ॥११९ १२ ० ॥

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तृतीय लम्बक २७७

तृतीय लम्बक २७७ घने मेघों के गर्जन के समान चारों दिशाओं को गुंजित करनेवाली आकाशवाणी को, मोरों के समान ऊँची गर्दन किये हुए उन सब लोगों ने सुना ॥१२१॥ गोपालक के साथ राजा उदयन ने यौगन्धरायण के कार्य की प्रशंसा की और समस्त पृथ्वी को अपने अधीन माना ॥१२२॥ परमसुखी वत्सराज मूर्तिमान् रति और निर्वृति (सुख)-स्वरूप और निरन्तर सहवास के कारण परस्पर अनुरक्त उन दोनों पत्नियों के साथ अत्यन्त सुख का अनुभव करने लगा ॥१२३॥ महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-रचित कथासरित्सागर के लावानक लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त तृतीय तरंग वत्सराज की कथा (चालू) किसी एक दिन एकान्त में वत्सराज ने वासवदत्ता और पद्मावती के साथ पान क्रीड़ा करके गोपालक रुमण्वान् और वसन्तक के साथ यौगन्धरायण को बुलाया और गुप्त गोष्ठी करने लगा ॥१-२॥ उस अवसर पर अपने विरह के प्रसंग में वत्सराज ने उन सब के सुनते रहने पर यह कथा कहना प्रारम्भ किया ॥३॥ पुरूरवा और उर्वशी की कथा प्राचीन युग में परमवैष्णव (विष्णु-भक्त) पुरूरवा नाम का राजा था। पृथ्वी के समान स्वर्ग में भी उसकी बे-रोक-टोक गति थी ॥४॥ एक बार नन्दन-उद्यान में घूमते हुए उसे उर्वशी अप्सरा ने देखा जो कामदेव के सम्मोहन नामक दूसरे अस्त्र के समान थी ॥५॥ पुरूरवा को देखते ही उर्वशी संज्ञाहीन (बेहोश) हो गई। उसके कारण रम्भा आदि उसकी सखियों का हृदय काँपने लगा ॥६॥ राजा पुरूरवा भी लावण्य-रस की निर्झरिणी के समान उर्वशी को देखकर भी जो उसका सान्निध्य प्राप्त न कर सका उस प्यास से मानो मूर्च्छित हो गया ॥७॥

२७८ कथासरित्सागर

२७८ कथासरित्सागर अथादिदेश सर्वज्ञो हरिः क्षीराम्बुधिस्थितः। नारदाख्यं मुनिवरं दर्शनायमुपागतम् ॥८॥ देवर्षे ! नन्दनोद्यानवर्ती राजा पुरूरवाः। उर्वशीहृतचित्तः सन् स्थितो विरहनिःसहः ॥९॥ तद्गत्वा मम वाक्येन बोधयित्वा शतक्रतुम्। दापय त्वरितं तस्मै राज्ञे तामूर्वशीं मुने ! ॥१०॥ इत्यादिष्टः स हरिणा तथेत्यागत्य नारदः। प्रबोध्य च तथाभूतं पुरूरवसमब्रवीत् ॥११॥ उत्तिष्ठ त्वत्कृते राजन्प्रहितोऽस्मीह विष्णुना। स हि निर्व्याजभक्तानां नैवापदमुपेक्षते ॥१२॥ इत्युक्त्वाश्वासितेनाथ स पुरूरवसा सह। जगाम देवराजस्य निकटं नारदो मुनिः ॥१३॥ हरेरादेशमिन्द्राय निवेद्य प्रणतात्मने। उर्वशीं दापयामास स पुरूरवसे ततः ॥१४॥ तदभूदूर्वशीदानं निर्जीवकरणं दिवः। उर्वश्यास्तु शवेवासीन्मृतसञ्जीवनौषधम् ॥१५॥ अथाजगाम भूलोकं समादाय पुरूरवाः। स्वर्वधू-दर्शनाश्चर्यपर्याप्तमर्त्यचक्षुषाम् ॥१६॥ ततोऽनपायिनौ तौ द्वावूर्वशी च नृपश्च सः। अन्योन्यदृष्टिपानेन नितृप्ताविव तस्थतुः ॥१७॥ एकदा दानवैः साकं प्राप्तयुद्धेन वज्रिणा। साहाय्यार्थमाहूतो ययौ नाकं पुरूरवाः ॥१८॥ तत्र तस्मिन् हते मायाधरनाम्न्यसुराधिपे। प्रनृत्तस्वर्वधूनाट्ये शक्रस्याभवदुत्सवः ॥१९॥ तत्र रम्भां नृत्यन्तीमाचार्ये तुम्बरौ स्थिते। भ्रष्टाभिनयां दृष्ट्वा जहास स पुरूरवाः ॥२०॥ ज्ञानन्मिथ्यामिदं नृत्तं किं त्वं जानासि मानुष ! इति रम्भापि तत्पार्श्वे मातृपं तमभाषत ॥२१॥

तृतीय लम्बक २७१

तृतीय लम्बक २७१ राजा को इस प्रकार सन्तप्त जानकर क्षीर-समुद्र में विश्राम करते हुए सर्वज्ञ भगवान् विष्णु ने दर्शन के लिए आये नारद मुनि को आदेश दिया ॥८॥ हे देवर्षि ! नन्दन-उद्यान में स्थित राजा पुरूरवा उर्वशी पर मोहित हो गया है और उर्वशी के विरह को सहन नहीं कर पा रहा है ॥९॥ इसलिए तुम मेरी ओर से इन्द्र के पास जाकर और उसे समझाकर उर्वशी को राजा के लिए तुरन्त दिलवा दो ॥१०॥ भगवान् हरि से इस प्रकार आज्ञापित नारद ने आकर पुरूरवा को होश में लाकर कहा— 'राजन् ! उठो तुम्हारे लिए मुझे भगवान् विष्णु ने भेजा है। वे अपने निष्कपट भक्तों के कष्ट की उपेक्षा नहीं करते ॥११ १२॥ इस प्रकार आश्वासित पुरूरवा के साथ नारद मुनि इन्द्र के पास गये और प्रणाम करते हुए इन्द्र को हरि की आज्ञा सुनाकर, उर्वशी को राजा पुरूरवा के लिए विदा दिया ॥१३-१४॥ इस प्रकार उर्वशी का दान स्वर्ग को निर्जीव करने और उर्वशी को मानों मृत-संजीवन औषधि देने के समान था ॥१५॥ स्वर्गीय पत्नी को ग्रहण करके मर्त्यलोकवासियों की आँखों को आश्चर्य में डालते हुए पुरूरवा उसे लेकर भू-लोक में आ गया ॥१६॥ इस प्रकार कभी नष्ट न होनेवाले पुरूरवा और उर्वशी—दोनों परस्पर आकृष्ट होकर बँधे हुए-से रहने लगे ॥१७॥ एक बार मायाधर नामक असुरराज के साथ इन्द्र का युद्ध होने पर इन्द्र ने अपनी सहायता के लिए पुरूरवा को बुलाया और पुरूरवा स्वर्ग को गया ॥१८॥ इस युद्ध में मायाधर के मारे जाने पर इन्द्र के यहाँ उत्सव हुआ जिसमें सभी स्वर्गीय स्त्रियों ने भाग लिया। उस उत्सव में आचार्य तुम्बुरु के उपस्थित रहते हुए रम्भा नाम की वेश्या नृत्य कर रही थी उसके नृत्य में कुछ त्रुटि होने पर पुरूरवा ने हँस दिया। उसकी हँसी से चिढ़कर रम्भा ने कहा—'यह देव-नृत्य है इसे मैं जानती हूँ। हे मनुष्य ! तू इसे क्या जाने ॥१९ २१॥

जानेऽहमुर्वशीसङ्गातद्यथेति न तुम्बुरुः। युष्मद्गुरुरपीत्येनामूचाषाथ पुरूरवाः ॥२२॥ तच्छ्रुत्वा तुम्बुरुः कोपात्तस्मै शापमथादिशत्। उर्वश्या ते वियोगः स्यादाकृष्णाराधनादिति ॥२३॥ श्रुतशापश्च गत्वैव तमुद्दश्य पुरूरवाः। अकालाशनिपातोप्रं स्ववृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥२४॥ ततोऽकस्मान्निपत्यैव निन्ये क्वाप्यपहृत्य सा। अदृष्टस्तेन भूपेन गन्धर्वैरूर्वशी किल ॥२५॥ अवधाय शापदोषं तं सोऽप्य गत्वा पुरूरवाः। हरेराराधनं चक्र ततो बदरिकाश्रमम् ॥२६॥ उर्वशी तु वियोमार्त्ता गन्धर्वविषयस्थिता। आसीन्मृतेव सुप्तेव लिखितेव विचेतना ॥२७॥ आश्चयं यच्च सा प्राज शापान्ताद्यावलम्बिनी। मुक्ता विरहदीर्घामु चक्रवाकीव रात्रिषु ॥२८॥ पुरूरवाश्च तपसा तेनाच्युतमतोषयत्। तत्प्रसादेन गन्धर्वा मुमुचुस्तस्य चोर्वशीम् ॥२९॥ शापान्तरुग्मया मुक्तं पुनरप्सरसा तया। दिब्यान् स राजा बुभुजे भोगा मृतमत्र्त्त्योऽपि ॥३०॥ इत्युक्त्वा विरते राज्ञि श्रुतोर्वश्यनुरागया। सापि सोडवियोगत्वाद्व्रीडा बासवदत्तया ॥३१॥ तां दृष्ट्वा युक्त्युपालब्धां राजा देवीं विलक्षिताम्। अथाप्यामयितुं भूपमाह यौगन्धरायणः ॥३२॥ न श्रुता यदि तन्नामन्कथेयं श्रूयतां त्वया। अस्तीह तिमिरा नाम नगरी मन्दिरं श्रियः ॥३३॥ तस्यां विहितसेनाख्यः ख्यातिमानभवन्नृपः। तस्य तेजोवतीत्यासीद् भार्या क्षितितलाप्सराः ॥३४॥ तस्याः कण्ठग्रहेऽप्याप्र स राजा स्पर्शलोलुपः। न सेहे कञ्चुकेनापि क्षिप्रामाच्छुरितं वपुः ॥३५॥ कदाचित्तस्य राज्ञश्च जज्ञे वीर्य्यज्वरामयः। यदा निवारयामासुस्तया देव्यास्य सङ्गमम् ॥३६॥

राजा ने कहा—'उर्वशी के सम्पर्क से जो कुछ मैं जानता हूँ उसे तुम्हारे गुरु तुम्बुरु भी नहीं जानते'। यह सुनकर तुम्बुरु ने क्रोध में भरकर राजा को शाप दिया कि जबतक कृष्ण की आराधना न करोगे तबतक उर्वशी से तुम्हारा वियोग हो जायगा ॥२२-२३॥

शाप को सुनकर राजा पुरूरवा ने अकास में वज्रपात के समान यह शाप उर्वशी को कह सुनाया ॥२४॥

तदनन्तर अकस्मात् गन्धर्वों ने तुम्बुरु की आज्ञा से आकर गुप्त रूप से उर्वशी का अपहरण कर लिया ॥२५॥

पुरूरवा ने इसे शाप का फल समझ कर बदरिकाश्रम में जाकर भगवदाराधन प्रारम्भ किया ॥२६॥

गन्धर्व-लोक में राजा के वियोग से सन्तप्त उर्वशी निर्जीव-सी सोई-सी चित्रलिखित-सी एवं संज्ञाहीन होकर पड़ रही। वह शाप के अन्त की आशा पर अवलम्बित विरह से लम्बी रात्रियों में चकवी के समान तड़पती-सी रहती किन्तु प्राणों से विरक्त न हुई ॥२७-२८॥

इधर पुरूरवा ने भगवान् विष्णु को तप से प्रसन्न किया। भगवान् की कृपा से गन्धर्वों ने उसकी उर्वशी को छोड़ दिया ॥२९॥

शाप के अन्त में पुनः प्राप्त हुई उर्वशी के साथ राजा भूलोक में स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करता था ॥३०॥

इस प्रकार कथा सुनाकर राजा के चुप होने पर उर्वशी की विरह-वेदना की सहन-शक्ति को जानकर वासवदत्ता मन-ही-मन लज्जित हुई ॥३१॥

राजा के द्वारा युक्तिपूर्वक उपालम्भ दी गई वासवदत्ता को कुछ लज्जित देखकर उसे आश्वासन देने के लिए यौगन्धरायण ने कहा ॥३२॥

विहितसेन और तेजस्वती की कथा

हे राजन् ! यदि तुमने यह कथा न सुनी हो तो सुनो। भू-लोक में लक्ष्मी के निवास भवन के समान तिमिश्र नाम की समृद्ध नगरी है ॥३३॥

उसमें विहितसेन नाम का राजा राज्य करता था। उसकी रानी तेजस्वती भूतल की अप्सरा थी। उसके कण्ठाश्लेष में संलग्न-हृदय वह राजा अपने शरीर पर कुरते का आवरण भी सहन नहीं करता था ॥३४-३५॥

एक बार राजा को जीर्ण ज्वर हुआ। वैद्यों ने उस रानी के साथ मिलने से मना कर दिया ॥३६॥

१६

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर देवी सम्पर्कहीनस्य हृदये तस्य भूभृतः। औषधोपक्रमासाध्यो व्याधिः समुदपद्यत॥३७॥ भयाच्छोकाभिघाताद् वा राज्ञो रोगः कदाचन। स्फुटेदयमितिस्माहुर्भिषजो मन्त्रिणो रहः॥३८॥ यः पुरा पृष्ठपतिते न तत्रास महोरगे। नान्तःपुरप्रविष्टेऽपि परानीके च चुक्षुभे॥३९॥ तस्यास्य राज्ञो जायेत भय सत्ववतः कथम्। नास्त्यत्रोपायबुद्धर्न किं कुर्मस्तेन मन्त्रिणः॥४०॥ इति सञ्चिन्त्य समन्त्र्य ते देव्या सह मन्त्रिणः। तां प्रच्छाद्य तमूचुश्च मृता देवीति भूपतिम्॥४१॥ तेन शोकातिभारेण मथ्यमानस्य तस्य सः। पुस्फोट हृदयव्याधिर्विद्रुतस्य महीभृतः॥४२॥ उत्तीर्णरोग-विपदे तस्मै राज्ञेऽथ मन्त्रिभिः। अर्पिता सा महादेवी सुसम्पदिवापरा॥४३॥ बहु मेने च सोऽप्येनां राजा प्राप्तप्रदामिवाम्। न पुनर्मतिमानस्यै धृक्रोधाच्छादितात्मने॥४४॥ हितैषिणा हि या पत्युः सा देवीत्वस्य कारणम्। प्रियकारित्वमात्रेण देवीशब्दो न लभ्यते॥४५॥ सा मन्त्रिता च यद्राज्यकार्यभारैकचिन्तनम्। चित्तानुवर्तनं यत्तदुपजीवकलक्षणम्॥४६॥ अतो मगधराजेन सन्धाय परिपन्थिना। पृथ्वीविजयहेतोस्ते यत्नोऽस्माभिरयं कृतः॥४७॥ तेन देव! भवद्भक्तिसोढासद्यवियोगया। दम्या नैवापराधः ते पूर्णानूपकृतिः कृता॥४८॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य यथार्थं मुख्यमन्त्रिणः। मेनेऽपराधमात्मानं वत्सराजस्तुतोष च॥४९॥ उवाच चतज्मानेऽहं देव्या युष्मत्प्रयुक्तया। आकारवत्या नीत्येव मम दत्तेयं मेदिनी॥५०॥ क्क त्वद्विप्रजयादेसग्मयोक्तमसमञ्जसम्। अनुरागाधममसां विचारसहता कृतः॥५१॥

तृतीय लम्बक २८३

तृतीय लम्बक २८३ देवी के सम्पर्क से रहित उस राजा का रोग भीतर-ही-भीतर बढ़ने लगा जो औषधियों के उपचार से असाध्य हो गया। 'भय, शोक या अभिघात से सम्भव है, राजा का रोग अच्छा हो सके'—ऐसा वैद्यों ने एकान्त में मन्त्रियों से कहा। मन्त्रियों ने सोचा कि राजा अत्यन्त जीवट वाला है। एक बार पीठ पर भीषण सर्प के गिरने पर और शत्रुओं के रनिवास तक घुस आने पर भी जो न डरा उसे किस प्रकार डराया जा सकता है। इसके लिए कोई उपाय नहीं सूझता। हमारी बुद्धि काम नहीं करती ॥४३-४४॥ इस प्रकार सोच-विचार कर मन्त्रियों ने रानी के साथ परामर्श करके और उसे कपट से ढककर राजा से कह दिया कि 'महारानी मर गईं' ॥४५॥ इस भीषण शोक-संवाद से राजा का हृदय मथित और व्यथित हो गया और शोक-विह्वल राजा का हृदय-रोग नष्ट हो गया ॥४६॥ उस रोग-रूपी विपत्ति से छूट जाने पर मन्त्रियों ने दूसरी गुप्त-सम्पत्ति के समान महारानी को राजा के लिए भेंट कर दिया ॥४७॥ उस प्राणदायिनी रानी को राजा बहुत मानने लगा और बुद्धिमान् राजा ने छिपी हुई रानी पर क्रोध भी नहीं किया ॥४८॥ पति की हितैषिता ही महारानीपन है। केवल राजा को प्रसन्न रखना ही रानीपन नहीं है ॥४९॥ मन्त्रित्व भी वही है—राज-कार्य की समुचित चिन्ता रखना। राजा की 'हाँ-में-हाँ' मिलाना तो केवल नौकरी-मात्र है ॥४९॥ इसीलिए विरोधी मगधराज से सन्धि करने तथा समस्त पृथ्वी पर विजय करने के लिए हमलोगों ने यह यत्न किया ॥४७॥ अतः आपकी भलाई के कारण उत्पन्न वियोग को सहन करनेवाली महारानी वासवदत्ता ने अपराध नहीं किया प्रत्युत बड़ा उपकार ही किया ॥४८॥ प्रधान मन्त्री के वचन सुनकर वत्सराज ने अपने को अपराधी समझा और इस घटना पर सन्तोष प्रकट किया और कहा—आरोग्य की प्राप्ति सुतीक्ष्ण औषधि के समान महारानी ने मुझे सारी पृथ्वी प्रदान की ॥४०-५१॥ मैंने जो कुछ कहा वह प्रेम के अतिशय के कारण कहा—'प्रेम से अन्ध हृदयवाले लोगों में विचार करने की शक्ति कहाँ रह जाती है? ॥५२॥

२८४ कथासरित्सागर

२८४ कथासरित्सागर इत्यादिभिः समालापैर्वत्सराजः स तद्दिनम्। लब्धोपरागं देव्याश्च सममेवापनीतवान् ॥५२॥ अन्येद्युर्मगधेशेन प्रेषितो ज्ञानवस्तुना। दूतो वत्सेशमभ्येत्य तद्वाक्येन व्यजिज्ञपत् ॥५३॥ मन्त्रिभिस्ते वयं तावद् वञ्चितास्तत्तथाधुना। कुर्याः शोकमयो यन्न जीवलोको भवेन्न नः ॥५४॥ एतच्छ्रुत्वाथ सम्मान्य वत्सेशः प्रजिघाय तम्। दूतं पद्मावतीपार्श्वं प्रतिसन्देशलम्भने ॥५५॥ सापि वासवदत्तान्वेता तत्सन्निधौ ददौ। दूतस्य दर्शनं तस्य विनयो हि सतीव्रतम् ॥५६॥ व्याजेन पुत्रि नीता त्वमन्यासक्तश्च तं पतिः। इति शोकामया लब्धं कन्याजनकताफलम् ॥५७॥ इत्युक्तपितृसन्देशं दूतं पद्मावती तदा। जगाद भद्र! विज्ञाप्यस्तातोऽम्बा च गिरा मम ॥५८॥ किं शोकेनार्यपुत्रो हि परमं सदयो मयि। देवी वासवदत्ता च सस्नेहा भगिनीव मः ॥५९॥ तत्तातेनामपुत्रस्य भाव्यं नैव विकारिणा। निजसत्यमिवार्याभ्यं मदीयं जीवितं यदि ॥६०॥ इत्युक्तं प्रतिसन्देशे पद्मावत्या यथोचिते। दूतं वासवदत्ता तं सत्कृत्य प्राहिणोत्ततः ॥६१॥ दूते प्रतिगते तस्मिन् स्मरन्ती पितृवेश्मनः। किञ्चित् पद्मावती तन्मातृत्वाच्छान्तिमना इव ॥६२॥ ततस्तस्य विनोदायमुक्तो वासवदत्तया। वसन्तकोऽस्मिलव्राज कथामित्थमवर्णयत् ॥६३॥ सोमप्रभागुहसेनयोः कथा अस्ति पाटलिपुत्राख्यं पुरं पृथ्वोविभूषणम्। तस्मिंश्च धर्मगुप्ताख्यो बभूवैको महावणिग् ॥६४॥ तस्य चन्द्रप्रभायासीद् भार्या सा च व्यपद्यत। गर्भा भून्मृगताप्य कन्या गर्भागुरुत्तरोम् ॥६५॥

तृतीय लम्बक २८५

तृतीय लम्बक २८५ इस प्रकार वत्सराज ने महायज्ञी की इच्छा और उस दिन को एक साथ ही समाप्त कर दिया ॥५२॥ दूसरे ही दिन समाचार जानकर मगध-नरेश ने दूत भेजा। उसने वत्सराज से उसका सन्देश कहा कि तुम्हारे मन्त्रियों ने हमें धोखा दिया। इसलिए ऐसा न करना कि हमारा संसार शोक-मय हो जाय ॥५३-५४॥ यह सुनकर वत्सराज ने उस दूत को पद्मावती के पास भेज दिया। वासवदत्ता के सम्मुख नम्रता प्रकट करती हुई पद्मावती ने भी उसी के पास आकर सन्देश सुनाने के लिए उस दूत का दर्शन दिया। नम्रता ही सती स्त्रियों का व्रत है॥५५-५६॥ दूत ने राजा का सन्देश कहा—'बेटी ! छल-कपट से वत्सराज तुम्हें विवाह करके ले गये तुम्हारा पति दूसरी स्त्री में अधिक अनुराग रखता है'इस शोक से मैंने कन्या के पिता होने का फल पा लिया। इस प्रकार पिता का सन्देश सुनाते हुए दूत से पद्मावती ने कहा—'हे भद्र ! मेरे वचन से पिता और माता को निवेदन करना कि आपलोग शोक क्या करते हैं। आर्यपुत्र (मेरे पति) मुझ पर अत्यन्त दया और स्नेह रखते हैं। वासवदत्ता भी बहिन के समान मुझमें स्नेह रखती है। यदि अपने सत्त्व के समान मेरे जीवन की रक्षा चाहते हो तो तुम्हें आर्यपुत्र (उदयन) के प्रति वैमनस्य न रखना चाहिए ॥५७-६०॥ इस प्रकार पद्मावती के द्वारा पिता के प्रति सन्देश दिये जाने पर, वासवदत्ता ने आतिथ्य-सत्कार करके दूत को विदा किया ॥६१॥ दूत के चले जाने पर पद्मावती अपने पितृगृह की बातों का स्मरण करके कुछ अनमनी-सी हो गई। उसे अनमनी देखकर वासवदत्ता के द्वारा बुलाये गये विदूषक वसन्तक ने वहाँ आकर कहानी कहना प्रारम्भ किया ॥६२-६३॥ सोमप्रभा और गुहसेन की कथा पृथ्वी का अलंकार पाटलिपुत्र नाम का एक नगर है। वहाँ पर धर्मगुप्त नाम का एक धनी व्यापारी वैश्य रहता था। ॥६४॥ उसकी चन्द्रप्रभा नाम की पत्नी एक बार गर्भवती हुई और उसने एक सर्वाङ्ग सुन्दरी कन्या उत्पन्न की ॥६५॥

९८६ कथासरित्सागर

९८६ कथासरित्सागर सा कन्या जातामात्रैव कान्तिद्योतितवासका। चक्रे सम्यक्तमालाप' मुत्थायोपविवेश च ॥६६॥ ततो विस्मितवित्रस्त स्त्रीजन जातवेश्मनि। दृष्ट्वा स धर्मगुप्तोऽथ सभयः स्वयमाययौ ॥६७॥ पप्रच्छ कन्यकां तां च प्रणतस्तत्क्षणं रहः। भगवत्यवतीर्णासि का त्वं मम गृहेष्विति ॥६८॥ साप्यवादीत्सया नैव देया कस्मैचिदप्यहम्। गृहस्थिता शुभाहं ते पृष्टेनान्येन तात ! किम् ॥६९॥ इत्युक्तः स तया भीतो धर्मगुप्तः स्वमन्दिरे। गुप्तं तां स्थापयामास भृतिरिति स्यापिता बहिः ॥७०॥ सतं सोमप्रभा नाम सा कन्या ववृधे क्रमात्। मानुषेण शरीरेण रूपकान्त्या तु दिव्यया ॥७१॥ एकदा तु प्रमोदेन मधूत्सवविलोकिनीम्। हर्म्यस्थां गुहचन्द्राख्यो वणिक्पुत्रो ददर्श ताम् ॥७२॥ स मनोभवभल्लेयेव सद्यो हृदयलग्नया। तया मुमूच्छैवं त्वा कृच्छाच्च गृहमाययौ ॥७३॥ स्मरार्तिविधुरस्तत्र पित्रोरस्वास्थ्यकारणम्। निर्बन्धपृष्टो वक्ति स्म स्ववयस्यमुखेन सः ॥७४॥ ततोऽस्य गुहसेनाख्यः पिता स्नेहेन याचितुम्। तां कन्यां धर्मगुप्तस्य वणिजो भवनं ययौ ॥७५॥ सद्य तं कृतयाच्ञं स गुहसेनं स्नुषार्थिनम्। कन्या कुतो मे मूढेति धर्मगुप्तो निराकरोत् ॥७६॥ निह्नुतां तत्र कन्यां तां मत्वा गत्वा गृहे सुतम्। दृष्ट्वा स्मरज्वराक्रान्तं गुहसेनो व्यचिन्तयत् ॥७७॥ राजानं प्रप्स्याम्यत्र स हि मे पुत्रमीप्सितं । दापयत्यपि पुत्राय स बन्द्यां तां मुमूर्षवे ॥७८॥ इति निश्चित्य गत्वा च दत्वाराज्ञे रत्नमुत्तमम्। भूपं विज्ञापयामास स वणिक्स्याभिकांक्षितम् ॥७९॥ १ ग सद्योज्ञताय बालस्य भाषणं महत्त्वशंसनम्।

तृतीय लम्बक २८७

तृतीय लम्बक २८७ अपनी अनुपम कान्ति से प्रसूति-गृह को आलोकित करती हुई वह कन्या उत्पन्न होते ही स्पष्ट वाणी में वार्तालाप करने लगी और उठने-बैठने लगी ॥६६॥ कन्या की इस स्थिति से चकित और व्याकुल स्त्रियों का कोलाहल सुनकर डरता हुआ धर्मगुप्त प्रसूतिगृह में आया। धर्मगुप्त ने आकर प्रणाम करने के अनन्तर उसी समय एकान्त में उस कन्या से पूछा—'हे देवि ! तू कौन मेरे घर में अवतीर्ण हुई है ? ॥६७-६८॥ वह कन्या बोली—'तू मुझे किसी को देना नहीं मैं तेरे घर में रहकर ही कल्याण करता रहूँगी' ॥६९॥ यह सुनकर भयभीत बनिये ने उस कन्या को घर में ही छिपाकर रख दिया और बाहर उसके मर जाने की घोषणा कर दी। इस प्रकार सोमप्रभा नाम की वह कन्या मनुष्य-शरीर और दिव्य कान्ति के साथ क्रमशः घर में ही बढ़ने लगी ॥७०॥ अपने घर की खिड़की से एक बार प्रमत्तता के कारण बसन्तोत्सव देखती हुई उस कन्या का मुकुटभद्र नामक वैश्यपुत्र ने देख लिया ॥७१॥ लगे हुए कामदेव के भाले की नोक के समान हृदय में धँसी हुई उसे देखकर वह मूर्च्छित-सा हो गया और अत्यन्त कठिनता से घर पहुँच सका ॥७२॥ काम-वेदना से अत्यन्त अस्वस्थ उस मुकुटभद्र ने अत्यन्त आग्रह करने पर, अपनी अस्वस्थता के कारण अपने मित्र के द्वारा माता-पिता को कहवाया ॥७३॥ तब उसका पिता पुत्र-स्नेह के कारण उस कन्या की मँगनी करने के लिए धर्मगुप्त के घर पर गया ॥७४॥ इस प्रकार अपनी बहू बनाने के लिए कन्या की प्रार्थना करते हुए शूरसेन को धर्मगुप्त ने यह कहकर निराश कर दिया कि 'मेरे यहाँ कन्या कहाँ है ? वह तो होकर मर गई' ॥७५॥ शूरसेन ने कन्या को घर में छिपाये हुए धर्मगुप्त को और कामज्वर से पीड़ित अपने पुत्र को देखकर शूरसेन ने सोचा—'मैं इस विषय में राजा से सहायता लेता हूँ, उसे प्रेरित करता हूँ क्योंकि मैं बहुत राजा की सेवा कर चुका हूँ। राजा अवश्य ही मेरे मरणासन्न पुत्र को कन्या दिला देगा ॥७६-७८॥ ऐसा निर्णय करके और एक उत्कोच राजा को भेंट करके उसने राजा से अपनी इच्छा प्रकट की ॥७९॥

१८८ कथासरित्सागर

१८८ कथासरित्सागर

नृपोऽपि प्रीतिमानस्य साहाय्ये नगराधिपम्। ददौ तेन समं चासौ धर्मगुप्तगृहं ययौ॥८०॥ रुरोध च गृहं तस्य धर्मगुप्तस्य तद्बलैः। असुभिः कण्ठलग्नैश्च सर्वनाशविशङ्किनः॥८१॥ ततः सोमप्रभा सा तं धर्मगुप्तमभाषत। देहि मां तात माऽभूत्ते मन्निमित्तमुपद्रवः॥८२॥ आरोपणीया शय्यायां नाहं भर्त्रा कदाचन। ईदृक्तु वाचा नियमो ग्राह्यः सम्बन्धिनां त्वया॥८३॥ इत्युक्तः स तया पुत्र्या वासु तां प्रत्यपद्यत। धर्मगुप्तस्तवाभाष्य शय्यारोपणवर्जनम्॥८४॥ गुहसेनोऽनुमेने च सान्तर्हासस्तथैव तत्। विवाहो मम पुत्रस्य तावदस्त्विति चिन्तयन्॥८५॥ अथादाय कृतोद्वाहां तां स सोमप्रभां वधूम्। गुहसेनसुतः प्रायाद् गुहचन्द्रो निजं गृहम्॥८६॥ सायं तं पितावादीत् पुत्र! शय्यामिमां वधूम्। आरोपय स्वभार्या हि कस्याङ्कशय्या भविष्यति॥८७॥ तच्छ्रुत्वा श्वशुरं तं सा वधूः सोमप्रभा रुषा। विक्षोभ्य भ्रामयामास यमाज्ञामिव तर्जनीम्॥८८॥ तां दृष्ट्वावाङ्मुखिस्तस्याः स्नुषायास्तस्य तत्क्षणम्। वणिजः प्रययुः प्राणा मन्येषामाययौ भयम्॥८९॥ गुहचन्द्रोऽपि सम्प्राप्ते तस्मिन् पितरि पञ्चताम्। मारी मम गृहं भार्या प्रविष्टेति व्यचिन्तयत्॥९०॥ अतश्चानुपभुञ्जानो भार्यां तां गृहवर्तिनीम्। सिषेवे गुहचन्द्रोऽसावासिधारामिव व्रतम्॥९१॥ तद्दुःख दह्यमानोऽन्तर्विरक्तो भोगसम्पदि। ब्राह्मणान् भोजयामास प्रत्यहं स कृतव्रतः॥९२॥ तद्भार्यापि च सा तेभ्यो विप्रेभ्यो मौनधारिणी। भुक्तवद्भ्यो ददौ नित्यं दक्षिणां दिव्यरूपधृत्॥९३॥ एकदा ब्राह्मणो वृद्धस्तामेको भोजनागतः। ददर्श जगदाश्चर्यजननीं रूपसम्पदा॥९४॥ सकामुको द्विजोप्राक्षीद् गुहचन्द्रं रहस्ततः। का ते भवति बालेयं त्वया मे कथ्यतामिति॥९५॥

तृतीय लम्बक २८९

तृतीय लम्बक २८९ राजा का भी उसके प्रति स्नेह था अतः उसने नगर के कोतवाल को गुहसेन के साथ कर दिया और उसने उसके साथ धर्मगुप्त का घर घेर लिया तथा साथ ही सर्वनाश की शंका से भयभीत धर्मगुप्त के प्राणों ने उसके गले को घेर लिया॥८०-८१॥ पिता की इस स्थिति को देखकर सोमप्रभा ने उससे कहा कि 'तुम मुझे दे दो मेरे लिये यह उपद्रव हो रहा है किन्तु यह शर्त लगा दो कि मेरा पति मुझे शैया पर कभी न चढ़ाये'। ऐसी मौखिक शर्त तुम समधी से करा लो॥८२-८३॥ कन्या के इस प्रकार कहने पर धर्मगुप्त ने शर्त के साथ कन्या का देना स्वीकार कर लिया। गुहसेन ने मन-ही-मन हँसते हुए उसकी शर्त स्वीकार कर ली कि किसी प्रकार मेरे लड़के का विवाह तो हो फिर देखा जायगा॥८४-८५॥ तदनन्तर गुहसेन का पुत्र गुहचन्द्र विवाह करके सोमप्रभा को लेकर अपने घर आ गया॥८६॥ सायंकाल होने पर गुहसेन ने अपने पुत्र से कहा कि 'बेटा तुम इसे शैया पर चढ़ा लो। किसकी पत्नी शैया पर नहीं चढ़ती॥८७॥ श्वसुर की ऐसी बात सुनकर सोमप्रभा ने क्रोध से अपनी तर्जनी अंगुली को यमराज की आज्ञा के समान घुमाया॥८८॥ बहु की उस घूमती हुई उंगली को देखकर ससुर के प्राण उसी समय निकल गये। पिता के मरने पर गुहचन्द्र ने भी समझा कि यह स्त्री महामारी के रूप में मेरे घर आ गई है॥८९ १ ॥ अतः उसका सेवन न करके घर में रहती हुई भी उससे दूर रहकर मानो असिधारा-व्रत का पालन करता था॥९१॥ उस दुःख से दुःखी गुहचन्द्र सांसारिक भोगों से विरक्त होकर प्रतिदिन व्रत करता और ब्राह्मणों को भोजन कराता था॥९२॥ उसकी दिव्यरूप-धारिणी स्त्री भी मौनव्रत धारण करती हुई भोजन किये हुए ब्राह्मणों को दक्षिणा देती थी॥९३॥ एक दिन भोजन के लिए आये हुए एक बूढ़े ब्राह्मण ने संसार को चकित करनेवाले अनुपम सौन्दर्यशालिनी उस स्त्री को देखा। और एकान्त में गुहचन्द्र से पूछा कि यह बालिका तुम्हारी कौन है? मुझे बताओ'॥९४ ९५॥ ३७