भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

प्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१७

सन्दोहेन प्रभूतं हिरण्यसुवर्णमृणं गृह्णीयात् । प्रतिभाण्डमूल्यं च । तदुभयं रात्रौ मोषयेत् । (१) साध्वीव्यञ्जनाभिः स्त्रीभिर्दूष्यानुन्मादयित्वा तासामेव वेश्म-स्वभिगृह्य सर्वस्वान्याहरेयुः । (२) दूष्यकुल्यानां वा विवादे प्रत्युत्पन्ने रसदाः प्रणिहिता रसं दद्युः । तेन दोषणेतरे पर्यादातव्याः । (३) दूष्यमभित्यक्तो वा श्रद्धेयापदेशं पण्यं हिरण्यनिक्षेपमृणप्रयोगं दायं वा याचेत । दासशब्देन वा दूष्यमालम्बेत । भार्यामस्य स्नुषां दुहितरं वा दासीशब्देन वा भार्याशब्देन । तं दूष्यगृहप्रतिद्वारि रात्रावुपशयानमन्यत्र वा वसन्तं तीक्ष्णो हत्वा ब्रूयात्—'हतोऽयमित्थं कामुक' इति । तेन दोषेणेतरे पर्यादातव्याः । (४) सिद्धव्यञ्जनो वा दूष्यं जम्भकविद्याभिः प्रलोभयित्वा ब्रूयात्—'अक्षयं हिरण्यं राजद्वारिकं स्त्रीहृदयमरिव्याधिकरमायुष्यं पुत्रीयं वा कर्म


पड़ोस के लोगों से माँगकर या भाड़े पर सोने-चाँदी आदि के बर्तन ले आवें या अपना माल रखकर उसके बदले में अनेक व्यक्तियों की उपस्थिति में किसी से रुपया या सोना ऋण ले आवें, और दूसरे दिन जिनसे अपनी वस्तुएँ बेचनी है उनसे प्रतिवस्तु का दाम ले आवें । इन दोनों प्रकार के लाये हुए मालों की वह रात्रि में चोरी करवा दे; इस प्रकार राजकोष को भरने का यत्न करे ।

( १ ) कुलीन वेष में रहने वाली गुप्तचर स्त्रियों के द्वारा दूष्य पुरुषों को उत्साही बनाकर उन स्त्रियों के घरों में ही उनको गिरफ्तार किया जाय और तब उनका सर्वस्व छीन लिया जाय ।

( २ ) दूष्य पुरुषों के आपसी झगड़े के समय गुप्तचरों को चाहिए कि उनके पास रहते हुए किसी एक को वे विष देकर मार दें । दूसरे दूष्य का धन अपराध में अपहरण किया जाय ।

( ३ ) कोई पदच्युत या जातिच्युत व्यक्ति माल, सोने का अमानत, ऋण अथवा दायभाग आदि को दूष्य से इस प्रकार माँगे जिससे कि लोगों को विश्वास हो जाय कि इनका आपस में घनिष्ठ संबन्ध है । अथवा वह दूष्य को दास कह कर तथा उसकी स्त्री, पुत्री आदि को दासी या पत्नी आदि कह कर गाली दे । उस रात वह उसके ही द्वार पर या अन्यत्र कहीं सो जाय; फिर तीक्ष्ण पुरुष जाकर उसको मार दें और यह अफवाह फैला दें कि 'यह कामी पुरुष दूष्य के साथ इस प्रकार झगड़ा करते हुए मारा गया ।' इसी अपराध में राजा, दूष्य का सर्वस्व हर ले ।

( ४ ) अथवा सिद्ध के वेष में गुप्तचर दूष्य को ऐसा कह कर प्रलोभन दे कि

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४१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवाँ अधिकरण

जानामि' इति । प्रतिपन्नं चैत्यस्थाने रात्रौ प्रभूतसुरामांसगन्धमुपहारं कारयेत् । एकरूपं चात्र हिरण्यं पूर्वनिखातम् । प्रेताङ्गं प्रेतशिशुर्वा यत्र निहितः स्यात् । ततो हिरण्यस्य दर्शयेदत्यल्पमिति च ब्रूयात्—'प्रभूतहिरण्यहेतोः पुनरुपहारः कर्तव्यः' इति । स्वयमेवैतेन हिरण्येन श्वोभूते प्रभूतमौपहारिकं क्रीणीहि' इति । तेन हिरण्येनौपहारिकक्रये गृह्येत् । (१) मातृव्यञ्जनया वा 'पुत्रो मे त्वया हतः' इत्यवरूपितः स्यात् । संसिद्धमेवास्य रात्रियागे वनयागे वनक्रीडायां वा प्रवृत्तायां तीक्ष्णा विशस्याभित्यक्तमतिनयेयुः । (२) दूष्यस्य वा भृतकव्यञ्जनो वेतनहिरण्ये कूटरूपं प्रक्षिप्य प्ररूपयेत् । (३) कर्मकारव्यञ्जनो वा गृहे कर्म कुर्वाणः स्तेनकूटरूपकारकोपकरणमपनिदध्यात् । चिकित्सकव्यञ्जनो वा गरमगरापदेशेन ।


'मैं अपार हिरण्य के खजाने को देखना, राजा को वश में करना, स्त्री को वश में करना, दुश्मन को बीमार करना, आयु को बढ़ाना और सन्तान को पैदा करना आदि चमत्कार जानता हूँ।' जब दूष्य राजी हो जाय तो रात में किसी देवस्थान के पास ले जाकर गुप्तचर उसको खूब मदिरा, मांस, गन्ध आदि देवता को चढ़ाने के लिए कहे; तदनन्तर जहाँ मुर्दे का कोई अङ्ग या मरा हुआ बच्चा गड़ा हो वहाँ से, पहिले गाड़ा हुआ, पुराना सिक्का निकाल कर उससे कहे कि 'यह बहुत कम है, क्योंकि तुमने कम भेंट चढ़ाई थी । यदि तुम अधिक भेंट चढ़ाना चाहते हो तो यह सोना लो और कल अधिक सामग्री लाकर देवता को अधिक से अधिक भेंट चढ़ाना । जब दूसरे दिन दूष्य उस सुवर्ण का सामान खरीदने लगे तभी उसको गिरफ्तार करके उसका सर्वस्व अपहरण किया जाय ।

( १ ) अथवा माता-पिता के भेष में कोई गुप्तचर स्त्री दूष्य पर यह दोषारोपण करे कि 'तूने मेरा लड़का मारा है' । जब दूष्य पुरुष रात्रिहवन, वनयज्ञ और वनक्रीड़ा को प्रस्थान करे तो तीक्ष्ण लोग किसी नियुक्त किए पुरुष को मारकर दूष्य के रात्रि-हवन आदि के पास उसको गाड़ दें; और इसी अपराध में दूष्य को गिरफ्तार कर उसका सर्वस्व अपहरण किया जाय ।

( २ ) अथवा दूष्य के पास नौकर के रूप में रहने वाला कोई खुफिया वेतन में जाली सिक्का मिलाकर उसकी सूचना राजा को कर दे ।

( ३ ) अथवा चारक के वेष में दूष्य के घर कार्य करता हुआ कोई खुफिया छिपे तौर पर जाली सिक्का बनाने के सब साधन वहाँ रख दे । अथवा कोई खुफिया वैद्य दूष्य को औषधि की जगह विष दे दे ।

प्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१९

(१) प्रत्यासन्नो वा दूष्यस्य सत्त्री प्रणिहितमभिषेकभाण्डममित्रशासनं च । कापटिकमुखेन आचक्षीत, कारणं च ब्रूयात् । (२) एवं दूष्येष्वधार्मिकेषु च वर्तेत । नेतरेषु । (३) पक्वं पक्वमिवारामात् फलं राज्यादवाप्नुयात् । आत्मच्छेदभयादामं वर्जयेत् कोपकारकम् ॥

इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे कोषाभिसंहरणं नाम द्वितीयोऽध्यायः, आदित एकनवतितमः ।

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( १ ) अथवा दूष्य के पास रहता हुआ सत्त्री नामक गुप्तचर दूष्य के घर में रखे राज्याभिषेक तथा शत्रु के लेख की सूचना कापटिक गुप्तचर के द्वारा राजा तक पहुँचा दे । उसका कारण यह सिद्ध किया जाय कि वह दूष्य राजा को मारकर उसकी जगह अपना अभिषेक कराना चाहता है । इसी अपराध में उसका सब कुछ ले लिया जाय ।

( २ ) अपने कोष की वृद्धि के लिए राजा इस प्रकार के उपायों का प्रयोग दूष्यों और अधार्मिक व्यक्ति पर ही करे, दूसरों पर नहीं ।

( ३ ) राजा को चाहिए कि वह दुष्ट पुरुषों का धन उसी प्रकार ले ले जिस प्रकार वाटिका से पके हुए फल को लिया जाता है; किन्तु धर्मात्मा पुरुषों का धन वह उसी प्रकार छोड़ दे जैसे कच्चे फल को छोड़ दिया जाता है । कच्चे फल के समान धर्मात्मा पुरुषों से वसूला गया धन प्रजा के कोप का कारण बन जाता है ।

योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में कोषाभिसंहरण नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ९१भृत्यभरणीयम्
अध्याय ३

(१) दुर्गजनपदशक्त्या भृत्यकर्म समुदयपादेन स्थापयेत् । कार्यसाधनसहेन वा भृत्यलाभेन शरीरमवेक्षेत, न धर्मार्थौ पीडयेत् । (२) ऋत्विगाचार्यमन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजराजमातृराजमहिष्योऽष्टचत्वारिंशत्साहस्राः । एतावता भरणे नानास्वाद्यत्वमकोपकं चैषां भवति । (३) दौवारिकान्तर्वंशिकप्रशास्तृसमाहर्तृसन्निधातारश्चतुर्विंशतिसाहस्राः । एतावता कर्मण्या भवन्ति । (४) कुमारकुमारमातृनायकपौरव्यावहारिककार्मान्तिकमन्त्रिपरिषद्राष्ट्रपालान्तपालाश्च द्वादशसाहस्राः । स्वामिपरिबन्धबलसहाया ह्येतावता भवन्ति ।


भृत्यों का भरण पोषण

(१) दुर्ग और जनपद की शक्ति के अनुसार नौकरों को रखा जाय और राज्य की आय का चौथा भाग उनके भरण-पोषण पर व्यय किया जाय । अथवा कार्य कुशल भृत्य जितने भी वेतन पर मिलें, उन्हें नियुक्त किया जाय, किन्तु आमदनी के स्तर पर अवश्य ध्यान रखा जाय । कहीं ऐसा न हो कि आमदनी कम और खर्चा अधिक हो जाय । ऐसा कोई भी कार्य न किया जाय जिससे धर्म और अर्थ की व्यर्थ क्षति हो ।

(२) ऋत्विक्, आचार्य, मंत्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, राजमाता और पटरानी, इन्हें प्रतिवर्ष अठतालीस हजार पण वेतन (वृत्ति) दिया जाय । इनके भरण-पोषण के लिए इतना यथेष्ट है और ऐसी स्थिति में राजा के लिए भारस्वरूप बन कर उसके कोप का कारण भी नहीं हो सकते हैं ।

(३) द्वारपाल (दौवारिक), अंतःपुर रक्षक (अन्तर्वंशिक), आयुधाध्यक्ष (प्रशास्ता), कर वसूल करने वाला अधिकारी (समाहर्त्ता) और भांडागाराध्यक्ष (सन्निधाता), इनको प्रति वर्ष चौबीस हजार पण वेतन दिया जाय । इतना वेतन देने में ये अपने कार्यों को भली भाँति करते रहेंगे ।

(४) युवराज के भाई (कुमार), उन भाइयों की मातायें या धाय (कुमार

प्र० ९१ : अ० ३ ] भृत्यों का भरण-पोषण ४२१

(१) श्रेणीमुख्या हस्त्यश्वरथमुख्याः प्रदेष्टारश्च अष्टसाहस्राः । स्वव- र्गानुकर्षणो ह्येतावता भवन्ति । (२) पत्त्यश्वरथहस्त्यध्यक्षाः द्रव्यहस्तिवनपालाश्च चतुःसाहस्राः । (३) रथिकानीकस्थचिकितसकाश्वदमकवर्धकयो योनिपोषकाश्च द्वि- साहस्राः । (४) कार्तान्तिकनैमित्तिकमौहूर्तिकपौराणिकसूतमागधाः पुरोहित- पुरुषाः सर्वाध्यक्षाश्च साहस्राः । (५) शिल्पवन्तः पादाताः संख्यायकलेखकादिवर्गाः पञ्चशताः । (६) कुशीलवास्त्वर्धतृतीयशताः । द्विगुणवेतनाश्चैषां तूर्यकराः । (७) कारुशिल्पिनो विंशतिशतिकाः । (८) चतुष्पदद्विपदपरिचारकपारिकर्मिकौपस्थायिकपालकविष्टिवन्ध- काः षष्टिवेतनाः ।


माता ), सूबेदार मेजर ( नायक ), शहर कोतवाल ( पौर ), व्यापार का अध्यक्ष ( व्यावहारिक ) कृषि आदि का अध्यक्ष ( कर्मांतिक ), मंत्रिपरिषद के पूर्वोक्त बारह सदस्य, पुलिस सुपरिटेंडेण्ट ( राष्ट्रपाल ) और सीमा-निरीक्षक ( अन्तपाल ), इनको बारह हजार पण वेतन प्रति वर्ष दिया जाय । इतना वेतन देने से ये लोग सदा राजा के अनुकूल बने रहेंगे और उसकी सहायता के लिए हर समय तैयार रहेंगे ।

( १ ) इंजीनियर ( श्रेणीमुख्य ), हाथी-घोड़े-रथों के अध्यक्ष और कंटक शोधन अधिकारी ( प्रदेष्टा ), इनको आठ सौ पण वार्षिक वेतन दिया जाय । इतना वेतन दिये जाने पर ये अपने वर्ग ( डिपार्टमेंट ) के कर्मचारियों के सदा अनुकूल बने रहेंगे ।

( २ ) पैदल सेना का अध्यक्ष, अश्वसेना, रथसेना तथा गजसेना के अध्यक्ष और लकड़ी-हाथियों के जंगल के अध्यक्षों को चार हजार पण प्रतिवर्ष वेतन दिया जाय ।

( ३ ) रथ-शिक्षक, गज-शिक्षक, चिकित्सक, अश्व-शिक्षक और मुर्गा, सूअर आदि के पालने वालों का अध्यक्ष, इन सब को दो हजार पण वार्षिक दिया जाय ।

( ४ ) सामुद्रिक ( कार्तान्तिक ), सकुन बताने वाले ( नैमित्तिक ) ज्योतिषी, कथावाचक, स्तुति-वाचक ( मागध ), पुरोहित के नौकर और सुरा आदि के अध्यक्ष, इनको एक हजार वेतन प्रतिवर्ष दिया जाय ।

( ५ ) चित्रकार, पादाता ( खिलाड़ी ), गणक ( संख्यायक ) और लेखक वर्ग के कर्मचारियों को पाँच सौ पण प्रतिवर्ष दिया जाय ।

( ६ ) कुशीलव ( नट, नर्तक, गायक ) आदि को ढाई सौ पण और उनमें जो अच्छा बाजा बजाता है, उन्हें पाँच सौ पण वेतन प्रतिवर्ष दिया जाय ।

( ७ ) दूसरे साधारण कारीगरों को एक सौ बीस पण वेतन दिया जाय ।

( ८ ) वेटनरी डाक्टर, डाक्टर या सिविल सर्जनों, परिचारक, गोरक्षक ( ग्वालों ) और वेगारियों ( विष्टिबंधक ) आदि को ६० पण वार्षिक वेतन दिया जाय ।

४२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण

४२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण

(१) आर्ययुक्तारोहकमाणवकशैलखनकाः सर्वोपस्थायिन आचार्या विद्यावन्तश्च पूजावेतनानि यथार्हं लभेरन् पञ्चशतावरं सहस्रपरम् । (२) दशपणिको योजने दूतो मध्यमः । दशोत्तरे द्विगुणवेतन आयोजन-शतादिति । (३) समानविद्येभ्यस्त्रिगुणवेतनॊ राजा राजसूयादिषु ऋतुषु राज्ञः सारथिः साहस्रः । (४) कापटिकोदास्थितगृहपतिकवैदेहकतापसव्यञ्जनाः साहस्राः । (५) ग्रामभृतकसत्रीतीक्ष्णरसदभिक्षुक्यः पञ्चशताः । (६) चारसञ्चारिणोऽर्धतृतीयशताः । प्रयासवृद्धवेतना वा । (७) शतवर्गसहस्रवर्गाणामध्यक्षा भक्तवेतनलाभमादेशं विक्षेपं च कुर्युः । अविक्षेपे राजपरिग्रहदुर्गराष्ट्ररक्षावेक्षणेषु च नित्यमुख्याः स्युरनेकमुख्याश्च ।


( १ ) आर्य ( सत्पुरुष ), युक्तारोहक ( विगड़ैल घोड़े का सवार ), माणवक ( वेदाध्यायी विद्यार्थी ) शैलखनक ( पत्थर आदि पर नक्काशी करने वाला ), सर्वोपस्थायिन आचार्य ( निपुण गायनाचार्य ) और विद्वान्, इन लोगों को योग्यतानुसार पाँच सौ से हजार पण तक वेतन प्रति वर्ष दिया जाय ।

( २ ) मध्यगति से एक योजन तक जाने-आने वाले दूत को दस पण वेतन दिया जाय । दस योजन से सौ योजन तक चलने वाले को बीस पण वेतन दिया जाय ।

( ३ ) राजा को चाहिए कि वह राजसूय आदि यज्ञों पर मंत्री, पुरोहित आदि को उनके निर्धारित वेतन से तिगुना वेतन दे; इसी प्रकार राजा को यज्ञ स्थान में लाने वाले सारथि को एक हजार पण वेतन दिया जाय ।

( ४ ) कापटिक, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक, और तापस आदि के वेश में कार्य करने वाले गुप्तचरों को प्रतिवर्ष हजार पण वेतन दिया जाय ।

( ५ ) धोबी, नाई आदि गाँव के नौकर, गाँव के मुखिया, खत्री, तीक्ष्ण तथा भिक्षुकी आदि के वेश में काम करने वाले गुप्तचरों को पाँच सौ पण वेतन दिया जाय ।

( ६ ) गुप्तचरों को इधर-उधर भेजने वाले कर्मचारियों को ढाई सौ पण वेतन दिया जाय । अथवा मेहनत के अनुसार सबको अधिक वेतन दिया जाय ।

( ७ ) शतवर्ग के या सहस्रवर्ग के अध्यक्षों को चाहिए कि वे नौकरों को यथोचित वेतन दिलायें, उनसे राजाज्ञा का पालन करायें, और आवश्यकतानुसार उनकी नियुक्ति तथा उनका स्थानान्तरण ( विक्षेप ) करायें । विभागीय अध्यक्षों को चाहिए कि वे जिस विभाग में ठीक तरह से कार्य न होता हो, वहाँ के लिए अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति करें; और प्रत्येक विभाग के कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपने

प्र० ९१ : अ० ३ ] भृत्यों का भरण-पोषण ४२३

(१) कर्मसु भृतानां पुत्रदारा भक्तवेतनं लभेरन् । बालवृद्धव्याधिताश्चैषामनुग्राह्याः । प्रेतव्याधितसूतिकाकृत्येषु चैषामर्थमानकर्म कुर्यात् । (२) अल्पकोशः कुप्यपशुक्षेत्राणि दद्यात् । अल्पं च हिरण्यम् । शून्यं वा निवेशयितुमभ्युत्थितो हिरण्यमेव दद्यात्, न ग्रामं ग्रामसञ्जातव्यवहारस्थापनार्थम् । (३) एतेन भृतानामभृतानां च विद्याकर्मभ्यां भक्तवेतनविशेषं च कुर्यात् । षष्टिवेतनस्याढकं कृत्वा हिरण्यानुरूपं भक्तं कुर्यात् । (४) पत्त्यश्वरथद्विपाः सूर्योदये बहिः सन्धिदिवसवज्र्जं शिल्पयोग्याः कुर्युः । तेषु राजा नित्ययुक्तः स्यात् । अभीक्ष्णं चैषां शिल्पदर्शनं कुर्यात् । कृतनरेन्द्राङ्कं शस्त्रावरणमायुधागारं प्रवेशयेत् । अशस्त्राश्चरेयुरन्यत्र मुद्रानुज्ञातात् । नष्टं विनष्टं वा द्विगुणं दद्यात् । विध्वस्तगणनां च कुर्यात् ।

अध्यक्ष के अनुशासन में रह कर ठीक तरह से कार्यों को करें । अध्यक्ष भी अनेक होने चाहिए ।

( १ ) यदि कार्य करते हुए किसी कर्मचारी की मृत्यु हो जाय तो उसका वेतन उसके पुत्र-पत्नी ले लें । अपने मृत कर्मचारियों के बालकों, वृद्धों और बीमार परिजनों पर राजा कृपा-दृष्टि बनाये रखे । उनके घरों पर मृत्यु; बीमारी या बच्चा हो जाने पर उसकी आर्थिक तथा मौखिक सहायता करता रहे ।

( २ ) यदि खजाने में कमी हो तो आर्थिक सहायता की जगह राजा कुप्य, पशु तथा जमीन आदि से अपने कृपार्थियों की सहायता करे । ऐसी अवस्था में वह सुवर्ण आदि बहुत थोड़ी मात्रा में दे किन्तु राजा यदि निर्जन मैदानों को आबाद करना चाहे तो सुवर्ण ही अधिक दे, जमीन आदि न दे, जिससे बसे हुए गाँव के मूल्य आदि का निर्णय, व्यवहार की स्थापना के लिए ठीक तौर पर किया जा सके ।

( ३ ) इसी प्रकार स्थायी या अस्थायी कर्मचारियों की योग्यता और कार्यक्षमता के अनुसार कम या ज्यादा वेतन भत्ता दिया जाय । सामान्यतया साठ पण वेतन पाने वालों को एक आढक भर अन्न दिया जाय । इसी क्रम से भक्त भत्ता न्यून या अधिक दिया जाय ।

( ४ ) अमावस्या-पूर्णमासी आदि संधिदिनों को छोड़कर सूर्योदय के बाद पैदल, अश्वारोही, रथारोही और गजारोही सेनाओं को कवायद (शिल्पदर्शन) सिखायी जाय । राजा को चाहिए कि वह सेनाओं पर बराबर ध्यान रखे और उनकी कवायद का भी निरीक्षण करता रहे । उसके बाद हथियारों और कवचों को राजमुद्रा से चिह्नित करके ही आयुधागार में प्रविष्ट किया जाय । लाइसेंस ( मुद्रानुज्ञात ) सुदा हथियार-बंदों के अलावा कोई भी सिपाही हथियार लिये इधर-उधर न घूमें । जिससे जो हथि-

४२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण

(१) सार्थिकानां शस्त्रावरणमन्तपाला गृह्णीयुः, समुद्रमवचारयेयुर्वा । यात्रामभ्युत्थितो वा सेनामुद्योजयेत् । ततो वैदेहकव्यञ्जनाः सर्वपण्यान्यायुधीयेभ्यो यात्राकाले द्विगुणप्रत्यादेयानि दद्युः । एवं राजपण्यविक्रयो वेतनप्रत्यादानं च भवति । (२) एवमवेक्षितायव्ययः कोशदण्डव्यसनं नावाप्नोति । (३) इति भक्तवेतनविकल्पः । (४) सत्रिणश्चायुधीयाना वेश्याः कारुकुशीलवाः । दण्डवृद्धाश्च जानीयुः शौचाशौचमतन्द्रिताः ॥

इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे भृत्यभरणीयं नाम तृतीयोऽध्यायः, आदितः त्रिनवतितमः ।

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यार खो जाय या टूट जाय उससे उसका दुगुना मूल्य वसूल किया जाय । आयुधागार में टूटे एवं नष्ट हुए हथियारों का पूरा रिकार्ड रहना चाहिए ।

(१) विदेश से आने वाले व्यापारियों के हथियार सीमा-निरीक्षक अंतपाल ले ले । जिनके पास लाइसेंस हों उन्हें हथियार साथ रखकर प्रविष्ट होने दे । चढ़ाई करने वाले राजा को चाहिए कि अपनी सेना को वह संगठित कर ले । युद्ध के समय व्यापारियों के वेष में फौजियों को दुगुने दाम पर रसद दी जाय । इस प्रकार सरकारी वस्तुएँ भी विक जायेंगी और सिपाहियों को दिये गए वेतन में से कुछ धन खजाने में वापिस मिल जायेगा ।

(२) इस प्रकार आय-व्यय पर ध्यान रखने वाले राजा पर कभी भी आर्थिक या सैनिक आपत्तियाँ नहीं आ पातीं ।

(३) यहाँ तक भत्ता व वेतन के संबंध में बारीकी से विचार किया गया ।

(४) सत्री, वेश्या, कारीगर और वृद्ध सिपाहियों को चाहिए कि वे पूरी सावधानी के साथ सैनिकों के अच्छे बुरे कार्यों का सदा निरीक्षण करते रहें ।

योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में भृत्यभरणीय नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ९२
अध्याय ४

अनुजीविवृत्तम्

(१) लोकयात्राविद् राजानमात्मद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नं प्रियहितद्वारेणा- श्रयेत् । यं वा मन्येत–यथाहमाश्रयेप्सुरेवमसौ विनयेप्सुरभिगामिकगुणयुक्त इति, द्रव्यप्रकृतिहीनमप्येनमाश्रयेत । (२) न त्वेवानात्मसम्पन्नम् । अनात्मवान् हि नीतिशास्त्रद्वेषादनर्थ- संयोगाद्वा प्राप्यापि महदैश्वर्यं न भवति । (३) आत्मवति लब्धावकाशः शास्त्रानुयोगं दद्यात् । अविसंवादाद्धि स्थानस्थैर्यमवाप्नोति । मतिकर्मसु पृष्टः तदात्वे च आयत्यां च धर्मार्थ- संयुक्तं समर्थं प्रवीणवदपरिषद्भीरुः कथयेत् । ईप्सितः पणेत—धर्मार्थानु- योगम् अविशिष्टेषु बलवत्संयुक्तेषु दण्डधारणं मत्संयोगे तदात्वे च दण्ड-

राजकर्मचारियों का राजा के प्रति व्यवहार

( १ ) जो व्यक्ति सांसारिक व्यवहारों में कुशल हों उनको चाहिए कि वे राजा के प्रिय एवं हितैषी व्यक्तियों के द्वारा, सत्कुलीन, बुद्धिमान् एवं योग्य अमात्यों से सम्पन्न राजा का आश्रय प्राप्त करें । यदि ऐसा राजा न मिले तो योग्य व्यक्तियों की तलाश करने वाले आत्मसम्पन्न राजा का आश्रय ग्रहण करें ।

( २ ) भले ही आत्म-सम्पन्न राजा के सुयोग्य आमात्य न हों, तब भी उसी का आश्रय लेना चाहिए, किन्तु सुयोग्य अमात्य आदि से सम्पन्न आत्मसंपत्तिरहित राजा का आश्रय कदापि न लेना चाहिए ! क्योंकि आत्म-संपत्ति शून्य राजा नीतिशास्त्र को न जानने के कारण अथवा अनर्थकारी मृगयाद्यूत आदि का व्यसनी होने के कारण, या इस प्रकार के लोगों की संगति करने के कारण पितृ-पितामह के उपलब्ध महान् ऐश्वर्य को भी नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ।

( ३ ) यदि राजा आत्मसम्पन्न हो तो अवसर आने पर उसको शास्त्रानुकूल संमति दी जाय । शास्त्र के साथ संमति का मिलान जानकर उसको यह विश्वास हो जाता है कि अमुक व्यक्ति नीतिज्ञ है, और तब उसकी नियुक्ति किसी अधिकार पद पर कर दी जाती है । अति आवश्यक विषयों के सम्बन्ध में राजा जब उससे कुछ प्रश्न पूछे तो उस समय या किसी भी समय वह धर्मार्थविद् अति निपुण लोगों की भाँति निर्भीकता-पूर्वक भरी सभा में उत्तर दे । यदि राजा उसको अमात्य पद पर नियुक्त करना चाहे तो राजा के सामने वह इस प्रकार की शर्तें रखे : जो लोग साधारण बुद्धि के हों और धर्म तथा अर्थ के तत्त्वों को न समझते हों, जिज्ञासा के तौर पर भी उनसे कभी भी

४२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण

धारणमिति न कुर्याः । पक्षं वृत्तिं गुह्यं च मे नोपहन्याः । संज्ञया च त्वां कामक्रोधदण्डनेषु वारयेयम् इति ।

(१) आयुक्तप्रदिष्टायां भूमावनुज्ञातः प्रविशेत् । उपविशेच्च पार्श्वतः सन्निकृष्टविप्रकृष्टः । वरासनं विगृह्यकथनमसभ्यमप्रत्यक्षमश्रद्धेयमनृतं च वाक्यमुच्चैरनर्मणि हासं वातष्ठीवने च शब्दवती न कुर्यात् । मिथः कथनमन्येन, जनवादे द्वन्द्वकथनं, राज्ञो वेषमुद्धतकुहकानां च, रत्नातिशयप्रकाशाभ्यर्थनम्, एकाक्ष्योष्ठनिर्भोगं, भ्रुकुटीकर्म, वाक्यावक्षेपं च ब्रुवति । बलवत्संयुक्तविरोधं स्त्रीभिः स्त्रीदर्शिभिः सामन्तदूतैर्द्वेष्यापक्षावक्षिप्तार्थैश्च प्रतिसंसर्गमेकार्थचर्यां सङ्घातं च वर्जयेत् ।

(२) अहीनकालं राजार्थं स्वार्थं प्रियहितैः सह । परार्थं देशकाले च ब्रूयाद् धर्मार्थसंहितम् ॥


इस विषय में कुछ न पूछा जाय, बलवान् या बलवान् सहायकों वाले शत्रु पर आक्रमण न किया जाय, मेरे सम्बन्ध में भी सहसा दण्ड-प्रयोग न किया जाय, मेरे पक्ष को, मेरे व्यवहार या मेरे जीविका के रहस्यों को कदापि भी न खोला जाय न तो नष्ट ही किया जाय, काम-क्रोध के वशीभूत अनुचित दण्ड देने को प्रस्तुत आपको जब मैं इशारों से वारित करूँगा, तो बुरा न मानते हुए इसका ध्यान रखा जाय । मेरी इन शर्तों को पूरा करना होगा ।

( १ ) जिस अधिकार पद पर राजा उसे नियुक्त करे उसी पर वह कार्य करे और राजा के समीप अगल-बगल में, न तो अधिक दूर और न अधिक नजदीक ही यथोचित आसन पर बैठकर वह कार्य करे । आक्षेप लगाकर, असभ्य, परोक्ष विषयक, अविश्वसनीय और झूठी बात वह कदापि न बोले । बेमौके ऊँची आवाज से न बोले । बोलते हुए खकार या डकार कभी न करे । इसके अतिरिक्त राजा की उपस्थिति में किसी दूसरे से बातचीत करना, किसी अफवाह को निश्चित रूप से हाँ या ना कहना, राजा का या पाखण्डियों का वेष धारण करना, राजा के धारण करने योग्य रत्नों के लिए खुले तौर पर प्रार्थना करना, एक आँख या एक ओठ टेढा करके बोलना, भौं चढ़ाना, राजा की बात को बीच में ही काट देना, बलवान् के सम्बन्धी से झगड़ा करना, स्त्रियों के साथ, स्त्रियों को चाहने वालों के साथ, विदेशी दूतों के साथ एवम् राजा के दुश्मनों-या अनर्थकारी व्यक्तियों के साथ सम्पर्क रखना, एक ही बात को करते रहना, और गुटबाजी बनाकर रहना, इत्यादि सभी कार्यों का परित्याग कर दे ।

( २ ) राजा के मतलब की बात तत्काल ही राजा से कह देनी चाहिए, अपने मतलब की बात राजा के प्रिय तथा हितकारी व्यक्तियों से कहनी चाहिए, दूसरे के मतलब की बात उचित समय एवं स्थान देखकर करनी चाहिए, और जो कुछ भी कहे वह धर्म-अर्थ से समन्वित होना चाहिए ।

प्र० ९२ : अ० ४ ] राजकर्मचारियों का व्यवहार ४२७

(१) पृष्टः प्रियहितं ब्रूयान्न ब्रूयादहितं प्रियम् ।
अप्रियं वा हितं ब्रूयाच्छृण्वतोऽनुमतो मिथः ॥
(२) तूष्णीं वा प्रतिवाक्ये स्याद् द्वेष्यादींश्च न वर्णयेत् ।
अप्रिया अपि दक्षाः स्युस्तद्भावाद् ये बहिष्कृताः ॥
अनर्थ्याश्च प्रिया दृष्टाश्चित्तज्ञानानुवर्तिनः ।
अभिहास्येष्वभिहसेद् घोरहासांश्च वर्जयेत् ॥
(३) परात् संक्रामयेद् घोरं न च घोरं स्वयं वदेत् ।
तितिक्षेतात्मनश्चैव क्षमावान् पृथिवीसमः ॥
(४) आत्मरक्षा हि सततं पूर्वं कार्या विजानता ।
अग्नाविव हि सम्प्रोक्ता वृत्ती राजोपजीविनाम् ॥
एकदेशं दहेदग्निः शरीरं वा परङ्गतः ।
सपुत्रदारं राजा तु घातयेद् वर्धयेत वा ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे अनुजीविवृत्तं नाम चतुर्थोऽध्यायः
आदितस्त्रिनवतितमः ।

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( १ ) राजा के पूछने पर उसकी अनुमति से प्रिय एवं हितकारी बात को कह देनी चाहिए, प्रिय होती हुई भी अहितकारी बात को न कहना चाहिए, किन्तु हितकारी बात अप्रिय भी हो तब भी कह देनी चाहिए ।

( २ ) उत्तर देते समय यदि अप्रिय बात सुनाने में डर मालूम हो तो चुप हो जाना चाहिए, राजा के द्वेष्य पुरुषों से सम्बन्ध भी नहीं रखना चाहिए, क्योंकि राजा की इच्छा पर न चलने वाले निपुण लोग भी राजा के अप्रिय बन जाते हैं । इसके विपरीत राजा के इच्छानुसार चलने वाले अनर्थकारी लोग भी राजा के प्रिय होते देखे गये हैं । राजा के हँसने पर, काठ की तरह खड़ा न रहकर, हँसना चाहिये, किन्तु अट्टहास पर सदा नियन्त्रण रखना चाहिए ।

( ३ ) किसी भयावह संदेश को स्वयं न कहकर किसी के द्वारा राजा को कहलावे । यदि अपने ही ऊपर ऐसी किसी बात का दायित्व आ जाय तो पृथ्वी के समान क्षमाशील बनकर उसके परिणाम को सहन करे ।

( ४ ) इसलिए समझदार राजकर्मचारी को चाहिए कि सर्वप्रथम वह अपनी रक्षा की सोचे, क्योंकि राज्याश्रित व्यक्तियों की स्थिति आग में खेल करने से बढ़कर खतरनाक कही गई है । क्योंकि अग्नि तो शरीर के एक अङ्ग या पूरे शरीर को ही जलाती है, किन्तु राजा समस्त परिवार को भस्म कर सकता है, और यदि अनुकूल हो गया तो सर्व सम्पन्न भी कर देता है ।

योगवृत्त नामक पञ्चम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ९३
अध्याय ५

समयाचारिकम्


(१) नियुक्तः कर्मसु व्ययविशुद्धमुदयं दर्शयेत् । (२) आभ्यन्तरं बाह्यं गुह्यं प्रकाश्यमात्ययिकमुपेक्षितव्यं वा कार्यम् 'इदमेवम्' इति विशेषयेच्च । (३) मृगयाद्यूतमस्त्रीषु प्रसक्तं चानुवर्तेत प्रशंसाभिः । आसन्नश्चास्य व्यसनोपघाते प्रयतेत । परोपजापातिसन्धानोपधिभ्यश्च रक्षेत् । (४) इङ्गिताकारौ चास्य लक्षयेत् । कामद्वेषहर्षदैन्यव्यवसायभयद्वन्द्व-विपर्यासमिङ्गिताकाराभ्यां हि मंत्रसंवरणार्थमाचरन्ति प्रज्ञाः । (५) दर्शने प्रसीदति । वाक्यं प्रतिगृह्णाति । आसनं ददाति । विविक्ते दर्शयते । शंकास्थाने नातिशंकते । कथायां रमते । परज्ञाप्येष्वपेक्षते । पथ्य-


व्यवस्था का यथोचित पालन

( १ ) अपने अपने कार्यों पर नियुक्त हुए कर्मचारियों को चाहिए कि वे खर्चे को घटाकर शुद्ध आमदनी ( उदय ) राजा को दिखायें ।

( २ ) कर्मचारियों को चाहिए कि दुर्ग में होने वाले तथा बाहर होने वाले कार्यों का, खुले रूप में तथा छिपकर होने वाले कार्यों का, विघ्नयुक्त एवं उपेक्षायुक्त कार्यों का विवरण स्पष्टरूप में राजा के सामने पेश करें और उन सभी बातों का लेखा रजिस्टर में दर्ज कर दें ।

( ३ ) यदि राजा शिकार, जुआ या स्त्रियों में आसक्त हो तो उसका अनुगामी बन कर, उसकी खुशामद या प्रशंसा करके उसको दुर्व्यसनों से विमुख करने का यत्न करना चाहिए । इसी प्रकार शत्रु के भेदियों, ठगों और विष देने वाले लोगों से भी राजा की रक्षा की जानी चाहिए ।

( ४ ) राजा की चेष्टाओं और आकार-प्रकारों को बड़ी कुशलता से हृदयंगम करना चाहिए, क्योंकि बुद्धिमान् लोग अपने रहस्य को छिपाये रखने के लिए काम, द्वेष, हर्ष, दैन्य; व्यवसाय, भय और सुख-दुःख को चेष्टाओं द्वारा तथा विशेष आकृतियों से ही प्रकट किया करते हैं ।

( ५ ) राजा की प्रसन्नता को इन बातों से भांपना चाहिए : वह देखने पर ही प्रसन्न हो जाता है; बात को बड़े ध्यान एवं आदर से सुनता है, बैठने के लिये उचित

प्र० ९३ : अ० ५ ] राजा के प्रति व्यवहार ४२९

मुक्तं सहते । स्मयमानो नियुङ्क्ते । हस्तेन स्पृशति । श्लाघ्ये नोपहसति । परोक्षे गुणं ब्रवीति । भक्ष्येषु स्मरति । सह विहारं याति । व्यसनेऽभ्यवपद्यते । तद्भक्तीन् पूजयति । गुह्यमाचष्टे । मानं वर्धयति । अर्थं करोति । अनर्थं प्रतिहन्ति । इति तुष्टज्ञानम् ।

(१) एतदेव विपरीतमतुष्टस्य । भूयश्च वक्ष्यामः—सन्दर्शने कोपः, वाक्यस्याश्रवणप्रतिषेधौ, आसनचक्षुषोरदानं, वर्णस्वरभेदः, एकाक्षिभ्रुकुटचोष्ठनिर्भोगः, स्वेदश्च, श्वासस्मितानामस्थानोत्पत्तिः, परिमन्त्रणम्, अकस्माद् व्रजनम्, वर्धनम् अन्यस्य, भूमिगात्रविलेखनम्, अन्तस्योपतोदनम्, विद्यावर्णदेशकुत्सा, समनिन्दा, प्रतिदोषनिन्दा, प्रतिलोमस्तवः, सुकृतानवेक्षणम्, दुष्कृतानुकीर्तनम्, पृष्ठावधानम्, अतित्यागः, मिथ्याभिभाषणम् । राजदर्शिनां च तद्वृत्तान्यत्वम् ।


आसन देता है, एकान्त में या अंतःपुर में ले जाकर मिलता है, विश्वास के कारण शंकित नहीं होता है, वार्तालाप में रुचि लेता है, समझी हुई बात में भी सलाह करने की इच्छा रखता है, मुस्कुराता हुआ कार्य पर नियुक्त करता है, हितकर कठोर बात को भी सहन करता है, बात करने में हाथ से छू लेता है, प्रशंसा योग्य कार्यों पर प्रसन्न होता है, गुणों की प्रशंसा परोक्ष में करता है, भोजन के समय स्मरण करता है, यात्रा, विहार में साथ में रहता है, दुःख दूर करने में पूरी सहायता देता है, अनुराग रखने वालों का सम्मान करता है, अपने गुप्त रहस्यों को बता देता है, मान-सत्कार बढ़ाता है, इच्छित आर्थिक सहायता देता है और अनर्थ का निवारण करता है ।

( १ ) यदि उक्त सभी बातें राजा में उल्टी पायी जाँय तो समझना चाहिए कि वह क्रुद्ध है । इसके अतिरिक्त राजा की अप्रसन्नता को इन बातों से भाँपना चाहिए, वह देखते ही कुपित हो उठता है, कही गई बात को नहीं सुनता या बीच ही में रोक देता है, बैठने के लिए स्थान नहीं देता, उसकी ओर आँख नहीं उठाता, मुख चढ़ाकर एवं आवाज बदल कर बोलता है; आँख-भौ चढ़ाकर या आँख सिकोड़ कर बोलता है, उसे पसीना आ जाता है, साँस फूलने लगती है, अकस्मात् ही मुस्कुराने लगता है, दूसरे के साथ बात करने लगता है, बीच ही में उठकर चला जाता है, दूसरा ही प्रसंग छेड़ देता है, भूमि एवं शरीर को नाखून से कुरेदने लगता है, किसी को मारने लगता है, विद्या, वर्ण तथा देश की निन्दा करने लगता है, दूसरे समान व्यक्ति के दोष की निन्दा करने लगता है, व्याज-स्तुति करने लगता है, अच्छी तरह किये गये कार्य की भी परवाह नहीं करता है, बिगड़े हुए कार्य को सर्वत्र कह डालता है, लौटते

४३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

४३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) वृत्तिविकारं चावेक्षेताप्यमानुषाणाम् । (२) अयमुच्चैः सिंचतीति कात्यायनः प्रवव्राज । (३) क्रौंचोऽपसव्यम् इति कणिङ्को भारद्वाजः । (४) तृणमिति दीर्घश्चारायणः । (५) शीता शाटीति घोटमुखः । (६) हस्ती प्रत्यौक्षीदिति किंजल्कः । (७) रथाश्वं प्राशंसीदिति पिशुनः । (८) प्रतिरवणे शुनः पिशुनपुत्रः इति । (९) अर्थमानावक्षेपे च परित्यागः । स्वामिशीलमात्मनश्च किल्बिष- मुपलभ्य वा प्रतिकुर्वीत । मित्रमुपकृष्टं वास्य गच्छेत् ।


समय उसको पीछे बड़े ध्यान से देखता है, पास आये तो दूर हटा देता है, उसके साथ व्यर्थ की बातें करता है और अन्य राजकर्मचारियों और उसके व्यवहार में भेद डालता है ।

( १ ) मनुष्यों के अतिरिक्त पशु-पक्षियों के भी मानसिक विकारों एवं चेष्टाओं का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना चाहिए ।

( २ ) 'यह जल सींचने वाला आज ऊपर से जल सींच रहा है'—यह देखकर मन्त्री कात्यायन अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ३ ) 'क्रौंचपक्षी आज वाँई ओर से उड़ गया'—यह देखकर भारद्वाजगोत्रीय कणिक नाम का मन्त्री अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ४ ) तृण को देखकर आचार्य दीर्घ चारायण, राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ५ ) 'कपड़ा ठंडा है'—यह सुनकर आचार्य घोटमुख अपने राजा को छोड़ कर चला गया था ।

( ६ ) हाथी को ऊपर पानी डालता देख कर किंजल्क नामक आचार्य अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ७ ) रथ के घोड़े की तारीफ सुनकर आचार्य पिशुन अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ८ ) कुत्ते के भूंकने पर आचार्य पिशुन का पुत्र अपने राजा को छोड़कर चला गया था ।

( ९ ) संपत्ति और सत्कार को नष्ट कर देने वाले राजा को भी त्याग देना चाहिए । अथवा राजा के स्वभाव और अपने अपराध पर विचार करके राजा को न छोड़ने की इच्छा होने पर, राजा का प्रतीकार करना चाहिए । या राजा के निकटवर्ती सम्बन्धी अथवा मित्र का आश्रय लेकर राजा को प्रसन्न करना चाहिए ।

प्र० ९३ : अ० ५ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३१

(१) तत्रस्थो दोषनिर्घातं मित्रैर्भर्तरि चाचरेत् ।
ततो भर्तरि जीवेद् वा मृते वा पुनराव्रजेत् ॥

इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे समयाचारिकं नाम पञ्चमोऽध्यायः,
आदितः पञ्चनवतितमः ।

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( १ ) राजा के पास रहते हुए ही उसके मित्रों द्वारा अपने अपराध की सफाई करानी चाहिए और तब राजा के प्रसन्न हो जाने पर उसके आश्रय में बना रहना चाहिए या जब उसकी मृत्यु हो जाय तब वापिस आना चाहिए ।

योगवृत्त नामक चतुर्थ अधिकरण में समयाचारिक नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ९४-९५ | अध्याय ६

राज्यप्रतिसन्धानमेकैश्वर्यं च


(१) राजव्यसनमेवममात्यः प्रतिकुर्वीत । प्रागेव मरणाबाधभयाद्राज्ञः प्रियहितोपग्रहेण मासद्विमासान्तरं दर्शनं स्थापयेद् । 'देशपीडापहममित्राप-हमायुष्यं पुत्रीयं वा कर्म राजा साधयति' इत्यपदेशेन राजव्यंजनमनुरूप-वेलायां प्रकृतीनां दर्शयेत् । मित्रामित्रदूतानां च । तैश्च यथोचितां सम्भा-षाम् अमात्यमुखो गच्छेत् । दौवारिकान्तर्वंशिकमुखश्च यथोक्तं राजप्रणिधि-मनुवर्तयेत् । अपकारिषु च हेडं प्रसादं वा प्रकृतिकान्तं दर्शयेत् । प्रसाद-मेवोपकारिषु ।

(२) आप्तपुरुषाधिष्ठितौ दुर्गप्रत्यन्तस्थौ वा कोशदण्डावेकस्थौ कार-येत् । कुल्यकुमारमुख्यांश्चान्यापदेशेन ।

(३) यश्च मुख्यः पक्षवान् दुर्गाटवीस्थो वा वैगुण्यं भजेत तमुपग्राह-येत् । बह्वबाधां वा यात्रां प्रेषयेत् मित्रकुलं वा ।


विपत्तिकाल में राजपुत्र का अभिषेक और एकछत्र राज्य की प्रतिष्ठा

(१) अमात्य को चाहिए कि वह राजा पर आई हुई आपत्तियों का प्रतीकार इन तरीकों से करे—राजा की आसन्न मृत्यु समझ कर राजा के मित्रों एवं हितैषियों की सलाह लेकर महीने-दो महीने बाद राजा के दर्शन की तिथि निश्चित कर दे और यह बहाना बनाये कि आजकल राजा देश की पीड़ा दूर करने वाले, शत्रुनाशक, आयुवर्द्धक और पुत्र देने वाले कर्म का अनुष्ठान कर रहा है । राजा के दर्शन की निश्चित तिथि पर राजा के वेष में किसी दूसरे पुरुष को प्रजा के सामने खड़ा कर दे । मित्रों, शत्रुओं और दूतों को भी उस बनावटी राजा के दर्शन करा दे । उन लोगों के साथ वह राजा अमात्य के माध्यम से ही उचित वार्तालाप करे । पूर्व प्रकाशित राजकार्यों के संबंध में द्वारपाल तथा अंतःपुर रक्षकों के द्वारा ही कहलाये । अपकार करने वाले लोगों पर अमात्य की राय से ही कोप या प्रसन्नता प्रकट करे । उपकार करने वाले लोगों पर सदा प्रसन्न ही बना रहे ।

(२) दुर्ग तथा सीमान्त प्रदेशों की सेना और कोष को किसी बहाने किसी विश्वस्त व्यक्ति की देख-रेख में इकट्ठा करा दिया जाय । किसी दूसरे ही बहाने से राज के सगे-संबंधियों, राजकुमार और अन्य राजप्रमुखों को एकत्र कराया जाय ।

(३) दुर्ग या अटवी में स्थित कोई प्रधान राजकर्मचारी यदि किसी की सहायता

प्र० ९४-९५ : अ० ६ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३३

(१) यस्माच्च सामन्तादाबाधं पश्येत्, तमुत्सवविवाहहस्तिबन्धनाश्व-पण्यभूमिप्रदानापदेशेन अवग्राहयेत्। स्वमित्रेण वा। ततः सन्धिमदूष्यं कारयेत्।

(२) आटविकामित्रैर्वा वैरं ग्राहयेत्। तत्कुलीनमवरुद्धं वा भूम्येक-देशेनोपग्राहयेत्।

(३) कुल्यकुमारमुख्योपग्रहं कृत्वा वा कुमारमभिषिक्तमेव दर्शयेत्। दाण्डकर्मिकवद् वा राज्यकण्टकानुद्धृत्य राज्यं कारयेत्।

(४) यदि वा कश्चिन्मुख्यः सामन्तादीनामन्यतमः कोपं भजेत्, तम् ‘एहि राजानं त्वा करिष्यामि’ इत्यावाहयित्वा घातयेत्। आपत्प्रतीकारेण वा साधयेत्।

(५) युवराजे वा क्रमेण राज्यभारमारोप्य राजव्यसनं ख्यापयेत्।


लेकर राजा के विरुद्ध हो जाय तो उसे किसी उपाय से अपने अनुकूल बनाया जाय। अथवा उस समय उसे किसी बाधाबहुल युद्ध में भेज दिया जाय। अथवा सहायता माँगने के बहाने किसी मित्र राजा के पास भेज दिया जाय।

( १ ) यदि किसी समीप के सामन्त राजा से बाधा का भय हो तो उसे उत्सव, विवाह, हाथी, घोड़ा, अन्य माल या भूमि देने के बहाने अपने पास बुलाकर अपने अनुकूल बना लिया जाय। अथवा अपने मित्र के द्वारा ही उसको अनुकूल बनाया जाय और तब उसके साथ निर्वैर ( अदूष्य ) संधि कर ले।

( २ ) अथवा उस सामंत को आटविक तथा अपने शत्रु के साथ लड़ा दे। अथवा उस सामंत-परिवार के किसी व्यक्ति को भूमि देकर अपने वश में कर ले और फिर उसके द्वारा सामन्त का दमन कराये।

( ३ ) राजा के मर जाने के बाद अमात्य को चाहिए कि वह राज-परिवार के कुमार और राज्य के प्रमुख कर्मचारियों की अनुकूल स्थिति को देखकर अभिषिक्त राजकुमार को ही प्रजा के सामने खड़ा करे, वह दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट रीति से राज्य के विरोधियों का निर्मूल कर निष्कंटक राज्य करे।

( ४ ) यदि सामंतमुख्यों में से कोई एक इस बात से कुपित हो जाय तो उससे 'यह बालक तो राज्य के लिए सर्वथा अयोग्य है, आप यहाँ आवें, आपको ही मैं राजा बना दूँगा' ऐसा कह कर अपने यहाँ बुलाया जाय और फिर उसका वध करा दिया जाय। यदि वह आये नहीं तो आपत्प्रतीकार प्रकरण में निर्दिष्ट तरीकों से उसको सीधा किया जाय।

( ५ ) युवराज पर धीरे-धीरे राज्य का भार सौंप कर फिर राजा की विपत्ति को सबके सामने प्रकट करे।

२६ कौ०

४३४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण

(१) परभूमौ राजव्यसने मित्रेणामित्रव्यञ्जनेन शत्रोः सन्धिमवस्थाप्यापगच्छेत् । सामन्तादीनामन्यतमं वास्य दुर्गे स्थापयित्वापगच्छेत् । कुमारमभिषिच्य वा प्रतिव्यूहेत । परेणाभियुक्तो वा यथोक्तमापत्प्रतीकारं कुर्यात् ।

(२) एवमेकैश्वर्यममात्यः कारयेदिति कौटिल्यः ।

(३) नैवमिति भारद्वाजः । प्रम्रियमाणे वा राजन्यमात्यः कुल्यकुमारमुख्यान् परस्परं मुख्येषु वा विक्रामयेत् । विक्रान्तं प्रकृतिकोपेन घातयेत् । कुल्यकुमारमुख्यानुपांशुदण्डेन वा साधयित्वा स्वयं राज्यं गृह्णीयात् । राज्यकारणाद्धि पिता पुत्रान् पुत्राश्च पितरमभिद्रुह्यन्ति; किमङ्ग पुनरमात्यप्रकृतिर्ह्येकप्रग्रहो राज्यस्य । तत् स्वयमुपस्थितं नावमन्येत । स्वमारूढा हि स्त्री त्यज्यमानाभिशपतीति लोकप्रवादः ।

(४) कालश्च सकृदभ्येति यं नरं कालकांक्षिणम् । दुर्लभः स पुनस्तस्य कालः कर्म चिकीर्षतः ॥


(१) यदि राजा की कहीं दूसरे देश में मृत्यु हो जाय तो अमात्य को चाहिए कि वह बनावटी दुश्मन बने हुए मित्र के साथ शत्रु की संधि कराकर अपने देश में चला आवे । अथवा सामन्त आदि में से किसी एक को उसके दुर्ग में नियुक्त करके चला आये और राजकुमार का राज्याभिषेक करके फिर शत्रु के साथ अभियास्यत्कर्म प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा बाहरी-भीतरी आपत्तियों से बचने के लिए प्रतीकार करे ।

(२) इस प्रकार अमात्य एकैश्वर्य राज्य का पालन कराये—यह आचार्य कौटिल्य का मत है ।

(३) किन्तु आचार्य भारद्वाज का मत है कि अमात्य इस प्रकार राजपुत्र को एकछत्र राज्य न कराये, बल्कि उचित तो यह है कि राजा की आसन्न मृत्यु समझ कर अमात्य, राजा के वंशज, राजकुमार और मुख्य व्यक्तियों को परस्पर या दूसरे मुख्यों के साथ भिड़ा दे और फिर प्रजा या राजप्रकृति के कुपित होने के कारण इनको मरवा डाले । अथवा उन राज-वंशज, राजकुमार और मुख्य व्यक्तियों को चुपचाप ( उपांशुदण्ड ) मरवा दे और स्वयं ही संपूर्ण राज्य का स्वामी बन जाय । क्योंकि राज्य के लिए पिता-पुत्र परस्पर अभिद्रोह करते हुए देखे गये हैं । फिर वह अमात्य यदि ऐसा करे, जो सारे राज्य की बागडोर है, तो कुछ भी अनुचित नहीं है । इसलिए स्वयं हाथ में आये हुए राज्य का तिरस्कार न करे, क्योंकि लोक-प्रसिद्धि है कि संभोग की इच्छा लेकर स्वयं ही आई हुई स्त्री को यदि छोड़ दिया जाय तो वह शाप दे देती है ।

(४) चिर-प्रतीक्षित मौका एक बार ही हाथ आता है । उसको चूक जाने पर

प्र० ९४-९५ : अ० ६ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३५

(१) प्रकृतिकोपकमधर्मिष्ठमनैकान्तिकं चैतदिति कौटिल्यः। राजपुत्र-मात्मसम्पन्नं राज्ये स्थापयेत्। सम्पन्नाभावे व्यसनिनं कुमारं राजकन्यां गर्भिणीं देवीं वा पुरस्कृत्य महामात्रान् सन्निपात्य ब्रूयात्-‘अयं वो निक्षेपः, पितरमस्यावेक्षध्वं सत्त्वाभिजनमात्मनश्च, ध्वजमात्रोऽयं, भवन्त एव स्वा-मिनः, कथं वा क्रियताम्' इति।

(२) तथा ब्रुवाणं योगपुरुषा ब्रूयुः-‘कोऽन्यो भवत्पुरोगादस्माद् राज्ञ-श्चातुर्वर्ण्यमर्हति पालयितुम् इति' । तथेत्यमात्यः कुमारं राजकन्यां गर्भिणीं देवीं वाधिकुर्वीत, बन्धुसम्बन्धिनां मित्रामित्रदूतानां च दर्शयेत् ।

(३) भक्तवेतनविशेषममात्यानामायुधीयानां च कारयेत् । भूयश्चायं वृद्धः करिष्यतीति ब्रूयात् । एवं दुर्गराष्ट्रमुख्यानाभाषेत, यथार्हं च मित्रा-


फिर वैसा अवसर हाथ नहीं आता है। साँप के निकल जाने पर लकीर पीटने से कोई लाभ नहीं होता।

( १ ) किन्तु भरद्वाज के उक्त मत से कौटिल्य सहमत नहीं है। उसका कथन है कि इस प्रकार की कार्यवाही प्रजा के लिए कष्टकर, अधर्मयुक्त और अनित्य है। इसलिए आत्मसंपन्न राजकुमार को ही अभिषिक्त करना चाहिए। यदि आत्मसंपन्न राजकुमार न मिले तो व्यसनी राजकुमार को, राजकन्या को या गर्भिणी महारानी को आगे करके राष्ट्र के सभी महान् व्यक्तियों के सामने कहा जाय कि 'यह आप लोगों की ही धरोहर है, इसकी रक्षा का भार आप लोगों पर ही है, इस राजकुमार की वंशपरंपरा और अपने दायित्वों की ओर गौर करें। यह राजकुमार तो एक पताका के समान है, जो सबसे ऊँचा रहता हुआ फहराता है, किन्तु इसके राज्य का सारा प्रबन्ध आप ही लोगों पर निर्भर है। अब बतलाइये इस संबंध में क्या करना चाहिए ?'

( २ ) अमात्य के इस प्रकार कहने पर राष्ट्र के वे सम्मानित व्यक्ति कहें 'आपके नेतृत्व के अतिरिक्त इस राजकुमार का दूसरा अवलंब कौन है, जो इस चातु-र्वर्ण्य प्रजा का पालन कर सकने में समर्थ हो ?' 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर अमात्य उस राजकुमार या राजकन्या अथवा गर्भिणी महारानी को सिंहासन पर अभिषिक्त कर कर दे। उसके बाद उसके भाई, बन्धु, संबंधी, मित्र, शत्रु तथा दूतों को यह सूचित कर दे कि आज से वही राजा है।

( ३ ) राजा को चाहिए कि वह अमात्यों तथा सैनिकों के भत्ते और वेतन में वृद्धि कर दे। उस समय अमात्य यह कहे कि 'बड़ा होकर यह और भी वेतन वृद्धि

४३६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पाँचवां अधिकरण

मित्रपक्षम् । विनयकर्मणि च कुमारस्य प्रयतेत । कन्यायां समानजातीयादपत्यमुत्पाद्य वाभिषिञ्चेत् । मातृश्चित्तक्षोभभयात् कुल्यमल्पसत्त्वं छात्रं च लक्षण्यमुपनिदध्यात् । ऋतौ चैनां रक्षेत् । न चात्मार्थं कञ्चिदुत्कृष्टमुपभोगं कारयेत् । राजार्थं तु यानवाहनाभरणवस्त्रस्त्रीवेश्मपरिवापान् कारयेत् ।

(१) यौवनस्थं च याचेत विश्रमं चित्रकारणात् ।
परित्यजेददुष्यन्तं तुष्यन्तं चानुपालयेत् ॥
(२) निवेद्य पुत्ररक्षार्थं गूढसारपरिग्रहान् ।
अरण्यं दीर्घसत्रं वा सेवेतारुच्यतां गतः ॥
(३) मुख्यैरवगृहीतं वा राजानं तत्प्रियाश्रितः ।
इतिहासपुराणाभ्यां बोधयेदर्थशास्त्रवित् ॥


करेगा' । यही आश्वासन वह दुर्ग तथा राज्य के अन्य कर्मचारियों को भी दे, और मित्र तथा शत्रुपक्ष के लोगों से भी यथोचित वार्तालाप करे । राजकुमार की विद्या, विनय और दूसरी प्रकार की शिक्षाओं का भी वह यथोचित प्रबंध करे । अथवा किसी समानजातीय पुरुष से राजकन्या में पुत्र उत्पन्न कराके उसे राज्यसिंहासन पर बैठाये । यदि वह महारानी हो तो उसका चित्त खिन्न न हो, इस अर्थ उसके पास कुलीन, अल्पवयस्क, सौम्य वेदाध्यायी व्यक्ति को नियुक्त कर दे, जिससे कि वह धर्मशास्त्र तथा पुराणों की बातों को सुनाकर उसके ( महारानी के ) चित्त को शान्त बनाये रखे । ऋतुकाल ( मासिक धर्म ) में उसकी पूरी रक्षा की जाय । अमात्य को चाहिए कि वह अपने लिए किसी प्रकार की उत्तम सामग्री संचित न करे । राजा के लिए रथ, घोड़े, आभूषण, वस्त्र, स्त्री, मकान और बढ़िया शयनागार का प्रबन्ध करे ।

( १ ) जब राजकुमार युवा हो जाय और राज्यभार संभाल सके तब उसके मनोभावों को जानने के लिए अमात्य उससे अपना मंत्रिपद छोड़ने के लिए कहे । यदि वह स्वीकार कर ले तो अमात्य को वहाँ से चला जाना चाहिए । यदि वह न जाने को कहें तो फिर उसी के पास रहकर पूर्ववत् राजकाज की व्यवस्था करता रहे ।

( २ ) अमात्य पद पर कार्य करने की इच्छा न होने पर अथवा राजा की ओर से कुछ मन-मुटाव हो जाने पर अमात्य को चाहिए कि वह राजा के पूर्वजों द्वारा स्थापित गुप्तचरों और खजाना आदि राजकुमार को बताकर तपस्या करने के लिए जंगल में चला जाय, अथवा दीर्घकाल तक चलने वाले यज्ञकर्मों का अनुष्ठान करे ।

( ३ ) अथवा मामा, फूफा, आदि मुख्य संबंधियों के वश में हुए राजकुमार को उसके हितेच्छु पुरुषों के आश्रित रहता हुआ ही, तत्त्वविद् अमात्य इतिहास और पुराणों के द्वारा धर्म-अर्थ के तत्त्वों को समझाता रहे ।