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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
३४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पहला अधिकरण

(१) संस्थानामन्तेवासिनः संज्ञालिपिभिश्चारसञ्चारं कुर्युः । न चान्योन्यं संस्थास्ते वा विद्युः । (२) भिक्षुकीप्रतिषेधे द्वाःस्थपरम्परा मातापितृव्यञ्जनाः शिल्पकारिकाः कुशीलवा दास्यो वा गीतपाठचवाद्यभाण्डगूढलेख्यसंज्ञाभिर्वा चारं निर्हरेयुः । दीर्घरोगोन्मादाग्निरसविसर्गेण वा गूढनिर्गमनम् । (३) त्रयाणामेकवाक्ये सम्प्रत्ययः । तेषामभीक्ष्णविनिपाते तूष्णींदण्डः प्रतिषेधो वा । (४) कण्टकशोधनोक्ताश्चापसर्पाः परेषु कृतवेतना वसेयुः सम्पातनिश्श्रारार्थं, त उभयवेतनाः ।


( १ ) संस्थाओं ( कापटिक आदि गुप्तचरों ) के विद्यार्थी अपनी विशिष्ट संकेत-लिपि द्वारा उस सूचना को राजा तक पहुँचावें । ऐसा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि संस्था-गुप्तचरों को संचार-गुप्तचर और संचार-गुप्तचरों को संस्था-गुप्तचर बिलकुल न जानने पावें ।

( २ ) यदि अमात्य आदि के घरों में भिक्षुकी का अंतःप्रवेश निषिद्ध हो तो वह समाचार द्वारपालों के माध्यम से बाहर भिक्षुकी तक पहुँचे । यदि इसमें भी कुछ आशंका या असम्भव जान पड़े तो अंतःपुर के नौकरों के माता-पिता बनने का बहाना करके वृद्धा स्त्री-पुरुष भीतर प्रवेश करके रहस्य का पता लगायें । या तो रानियों के बाल सवाँरने वाली या नाचने-गाने वाली स्त्रियों अथवा दासियों द्वारा, अथवा निजी संकेतों वाले गीतों, श्लोकों, प्रार्थनाओं, या तो बाजों, बर्तनों, टोकरियों में गुप्त लेख रखकर, अथवा अन्य विधियों से, जैसा भी समय के अनुसार अपेक्ष्य हो, अंतःपुर के समाचारों को बाहर लाया जाय । यदि इन युक्तियों से भी सफलता न मिले तो गुप्तचर को चाहिए कि वह किसी भयङ्कर बीमारी अथवा पागलपन के बहाने से आग लगाकर या किसी को जहर देकर ( जिससे अंतःपुर में कोलाहल मच जाये ) चुपचाप बाहर निकल आवे ।

( ३ ) परस्पर अपरिचित तीन गुप्तचरों द्वारा लाये गये समाचार यदि एक ही तरह से मिलें तो उन्हें ठीक समझना चाहिए । यदि वे परस्पर विरोधी समाचारों को लायें तो उन्हें या तो नौकरी से अलग कर दिया जाय अथवा चुपचाप पिटवाया जाय ।

( ४ ) उक्त गुप्तचरों के अतिरिक्त ‘कंटकशोधन’ प्रकरण में आगे बताये गए गुप्तचरों को भी नियुक्त करना चाहिये । ऐसे गुप्तचर विदेशों में जाकर वहाँ की सरकार के वेतनभोगी नौकर बनें और उनके गुप्त रहस्यों को समझें । ये गुप्तचर मित्र-पक्ष और शत्रु-पक्ष दोनों ओर से वेतन लें ।

प्र० ७ : अ० ११ ] गुप्तचरों की नियुक्ति ३५

(१) गृहीतपुत्रदारांश्च कुर्यादुभयवेतनान् ।
तांश्चारिप्रहितान् विद्यात् तेषां शौचं च तद्विधैः ॥
(२) एवं शत्रौ च मित्रे च मध्यमे चावपेच्चरान् ।
उदासीने च तेषां च तीर्थेष्वष्टादशस्वपि ॥
(३) अन्तर्गृहचरास्तेषां कुब्जवामनषण्डकाः ।
शिल्पवत्यः स्त्रियो मूकाश्चित्राश्च म्लेच्छजातयः ॥
(४) दुर्गेषु वणिजः संस्था दुर्गान्ते सिद्धतापसाः ।
कर्षकौदास्थिता राष्ट्रे राष्ट्रान्ते व्रजवासिनः ॥
(५) वने वनचराः कार्याः श्रमणाटविकादयः ।
परप्रवृत्तिज्ञानार्थाः शीघ्राश्चारपरम्पराः ॥
(६) परस्य चैते बोद्धव्यास्तादृशैरेव तादृशाः ।
चारसञ्चारिणः संस्था गूढाश्चागूढसंज्ञिताः ॥


( १ ) उभयवेतनभोगी इस प्रकार के गुप्तचरों के सम्बन्ध में विजय की इच्छा रखने वाले राजा को चाहिए कि वह उनके स्त्री-बच्चों को सत्कारपूर्वक अपने आधीन रखे । शत्रु की ओर से नियुक्त इस प्रकार के उभयवेतनभोगी गुप्तचरों की भी राजा जानकारी रखे और उनके माध्यम से अपने उभयवेतनभोगी गुप्तचरों की पवित्रता की भी परीक्षा करता रहे ।

( २ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह शत्रु, मित्र, मध्यम तथा उदासीन राजाओं और उनके मन्त्री, पुरोहित, सेनापति आदि अठारह प्रकार के अधीनस्थ कर्मचारियों के निकट, सभी स्थानों पर, अपने गुप्तचरों को नियुक्त करे ।

( ३ ) इसके अतिरिक्त उन शत्रु, मित्र, मध्यम आदि राजाओं के घरों तथा उनके मन्त्री, पुरोहित आदि के घरों में भी काम करने वाले कुबड़े, बौने, नपुंसक, कारीगर स्त्रियाँ, गूँगे तथा दूसरे-दूसरे प्रकार के बहानों को लेकर म्लेच्छ जाति के पुरुषों को नियुक्त करना चाहिए ।

( ४ ) किलों में व्यापार करने वाले लोगों को, किले की सीमा पर सिद्ध तपस्वियों को, राज्य के अन्तर्गत अन्य स्थानों पर कृषक तथा उदास्थित पुरुषों को और राज्य की सीमा पर चरवाहों को, गुप्तचर वेष में नियुक्त करना चाहिये ।

( ५ ) जंगल में शत्रु की प्रत्येक गति-विधि का पता लगाने के लिए चतुर, वानप्रस्थी और जंगली लोगों को गुप्तचर नियुक्त करना चाहिए ।

( ६ ) इस प्रकार, प्रकट रूप से सामान्य स्थिति में रहते हुए ये गुप्तचर, शत्रु की ओर से नियुक्त सभी, तीक्ष्ण, कापटिक, उदास्थित आदि गुप्तचरों को अपने वर्ग के अनुसार ही चीन्हैं ।

३६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

३६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

(१) अकृत्यान् कृत्यपक्षीयैर्दर्शितान् कार्यहेतुभिः । परापसर्पज्ञानार्थं मुख्यानन्तेषु वासयेत् ॥

इति कौटलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे गूढपुरुषोत्पत्तौ सञ्चारोत्पत्तिः, गूढपुरुषप्रणिधिर्नाम एकादशोऽध्यायः ॥

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( ४ ) शत्रु के किसी प्रलोभन या बहकावे में न फँसने वाले अपने विश्वस्त पुरुषों को, शत्रु के गुप्तपुरुषों का पता लगाने के लिए, राज्य की सीमा पर नियुक्त किया जाना चाहिए और उन्हें शत्रुपक्ष के लोगों को स्ववश करने के उपाय भी बता देने चाहिए ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में ग्यारहवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ८## स्वविषये कृत्याकृत्यपक्षरक्षणम्
अध्याय १२

(१) कृतमहामात्यापसर्पः पौरजानपदानपसर्पयेत् । (२) सत्त्रिणो द्वन्द्विनस्तीर्थसभाशालापूगजनसमवायेषु विवादं कुर्युः—सर्वगुणसम्पन्नश्चायं राजा श्रूयते । न चास्य कश्चिद् गुणो दृश्यते यः पौर-जानपदान् दण्डकराभ्यां पीडयति इति । (३) तत्र येऽनुप्रशंसेयुः, तानितरस्तं च प्रतिषेधयेत्—मात्स्यन्याया-भिभूताः प्रजा मनुं वैवस्वतं राजानं चक्रिरे । धान्यषड्भागं पण्यदशभागं हिरण्यं चास्य भागधेयं प्रकल्पयामासुः । तेन भृता राजानः प्रजानां योग-क्षेमवहाः । तेषां किल्बिषं दण्डकरा हरन्ति, योगक्षेमवहाश्च प्रजानाम् ।


अपने देश में कृत्य-अकृत्य पक्ष की सुरक्षा

(१) राजा को चाहिए कि महामंत्री, मंत्री, पुरोहित आदि के समीप गुप्तचर नियुक्त करने के पश्चात् वह अपने प्रति प्रजाजनों तथा नगरनिवासियों का अनुराग-द्वेष जानने के लिए वहाँ भी गुप्तचरों की नियुक्ति करे ।

(२) पहिले तो गुप्तचर आपस में ही लड़ने-झगड़ने लगें; और बाद में वे तीर्थस्थानों, सभा-सोसाइटियों, खाने-पीने की दूकानों, राजकर्मचारियों के बीच, तथा नाना प्रकार के लोगों में यह कहकर वाद-विवाद करें कि 'यह राजा तो सर्वगुण-संपन्न सुना जाता है; किन्तु इसमें कोई भी सद्गुण नहीं दिखाई दे रहा है । उल्टा वह नगरवासियों को दण्ड देकर एवं कर वसूली करके पीड़ा पहुँचा रहा है ।'

(३) उसके बाद सुनने वालों की उचित-अनुचित प्रतिक्रिया को ताड़ता हुआ दूसरा गुप्तचर उसके विरोध में यों कहे—'देखो, जैसे छोटी मछली बड़ी मछली को खा जाती है, पुराकाल में वैसे ही बलवान लोगों ने निर्बल लोगों का रहना दूभर कर दिया था । इस अन्याय से बचने के लिए प्रजा ने मिलकर विवस्वान् के पुत्र मनु को अपना राजा नियुक्त किया; और तभी से खेती की उपज का छठा भाग, व्यापार की आमदनी का दसवाँ भाग तथा थोड़ा-सा सुवर्ण राजा के लिए कर रूप में निर्धा-रित भी कर दिया था । प्रजा के द्वारा निर्धारित भाग को पाकर राजाओं ने प्रजा के योगक्षेम का सारा दायित्व अपने ऊपर लिया । इस प्रकार ये निर्धारित दण्ड एवं कर प्रजा के उत्पीड़नों को दूर करने में सहायक होते हैं, और प्रजा की भलाई एवं कल्याण के कारण सिद्ध होते हैं । यही कारण है कि जंगलों में एकान्त जीवन बिताने

३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

तस्मादुञ्छषड्भागमारण्यका अपि निवपन्ति—तस्यैतद् भागधेयं योऽस्मान् गोपायतीति । इन्द्रयमस्थानमेतद् राजानः प्रत्यक्षहेडप्रसादाः । तानवमन्यमानं दैवोऽपि दण्डः स्पृशति । तस्माद् राजानो नावमन्तव्याः इति क्षुद्रकान् प्रतिषेधयेत् । (१) किंवदन्तीं च विद्युः । (२) ये चास्य धान्यपशुहिरण्यान्याजीवन्ति, तैरुपकुर्वन्ति व्यसने अभ्युदये वा, कुपितं बन्धुं राष्ट्रं वा व्यावर्तयन्ति, अमित्रमाटविकं वा प्रतिषेधयन्ति, तेषां मुण्डजटिलव्यञ्जनास्तुष्टात्तुष्टत्वं विद्युः । (३) तुष्टान् भूयः पूजयेत् । अतुष्टांस्तुष्टिहेतोस्त्यागेन साम्ना च प्रसादयेत् । परस्पराद्वा भेदयेदेनान् सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धेभ्यश्च । तथाप्यतुष्यतो दण्डकरसाधनाधिकारेण वा जनपदविद्वेषं ग्राहयेत् । विद्विष्टानुपांशुदण्डेन जनपदकोपेन वा साधयेत् । गुप्तपुत्रदारानाकरकर्मान्तेषु वा वासयेत् परेषामस्पदभयात् ।


वाले ऋषि-मुनि भी दाना-दाना करके बीने हुए अन्न का छठा भाग राजा को देते हैं; यह जानकर कि राजा का इस पर सनातन हक है, जिसके बदले में वह हमारी रक्षा करता है। इन्द्र और यम के समान ये राजा लोग भी प्रजाजनों का प्रत्यक्ष निग्रह एवं उनपर अनुग्रह करने वाले होते हैं । इसलिए जो उनका तिरस्कार करता है, निश्चित ही, उस पर दैवी विपत्तियाँ टूटती हैं। यही कारण है, जिनको दृष्टि में रख कर राजा का अपमान नहीं करना चाहिए।' इत्यादि बातों को कह कर राजा की निन्दा करने वालों को रोक दें ।

( १ ) गुप्तचरों के लिए आवश्यक है कि वे अफवाहों पर भी ध्यान दें ।

( २ ) जो लोग धान्य, पशु, हिरण्य आदि से राजा की सेवा करते हैं; विपत्ति और अभ्युन्नति के समय उसकी सहायता करते हैं; राजा के प्रति क्रुद्ध भाई तथा कुपित प्रजा को जो शान्त कर देते हैं; उनकी प्रसन्नता और उनके कोप पर भी मुण्ड एवं जटिल गुप्तचर निगाह रखें ।

( ३ ) जो लोग राजा से सन्तुष्ट हों उन्हें धन और मान द्वारा और भी सन्तुष्ट करना चाहिए । जो किसी कारण अप्रसन्न हैं, उन्हें भी प्रसन्न करने के लिए धन आदि देना चाहिए; सान्त्वना भी देनी चाहिए; न हो तो इन असंतुष्ट व्यक्तियों में आपसी कलह करा दे; सामन्त, आटविक एवं उनके सम्बन्धियों से भी इनकी फूट डाल दे । इन उपायों के बावजूद भी यदि वे असन्तुष्ट ही बने रहें तो राजा को चाहिए कि अपने दण्डसम्बन्धी या करसम्बन्धी अधिकारों द्वारा वह सम्पूर्ण राष्ट्र के साथ उनका द्वेष करा दे । जब सारा जनपद उनका द्वेषी हो जाय तब या तो चुपचाप

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में बारहवाँ अध्याय समाप्त।

प्र० ८ : अ० १२ ] कृत्य-अकृत्य पक्ष की सुरक्षा ३९

(१) क्रुद्धलुब्धभीतावमानिनस्तु परेशां कृत्याः। तेषां कार्तान्तिक-नैमित्तिकमौहूर्तिकव्यञ्जनाः परस्पराभिसम्बन्धम् अमित्रप्रतिसम्बन्धं वा विद्युः। (२) तुष्टानर्थमानाभ्यां पूजयेत्। अतुष्टान् सामदानभेददण्डैः साधयेत्। (३) एवं स्वविषये कृत्यानकृत्यांश्च विचक्षणः। परोपजापात् संरक्षेत् प्रधानान् क्षुद्रकानपि ॥

इति कौटलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे स्वविषये कृत्याकृत्यपक्षरक्षणं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥

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ही उनका वध करवा दिया जाय अथवा असन्तुष्ट जनपद से ही उनका दमन करा दिया जाय।

( १ ) इन लोगों के दमन के लिए एक दूसरा तरीका यह भी है कि राजा उनके स्त्री-बच्चों को अपने अधिकार में करले और उन्हें खदान के कार्य में भेज दिया जाय। क्योंकि ऐसा भी संभव है कि ये असन्तुष्ट लोग शत्रुपक्ष में जाकर मिल जाय। प्रायः ऐसा देखा गया है कि क्रोधी, लोभी, डरपोक और अपमानित लोग सहज ही शत्रु के वश में हो जाते हैं।

( २ ) जो व्यक्ति सन्तुष्ट हों, राजा उन्हें और भी धन-मान से सत्कृत करे। किन्तु असन्तुष्ट व्यक्तियों को साम, दाम, दण्ड, भेद जैसे भी बन पड़े, अपने वश में करे।

( ३ ) इस प्रकार बुद्धिमान् राजा को चाहिए कि अपने राज्य के छोटे-बड़े कृत्य अकृत्य लोगों को वह, किसी भी प्रकार, शत्रु के पक्ष में जाने से रोके।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में बारहवाँ अध्याय समाप्त।

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प्रकरण ९ | अध्याय १३

परविषये कृत्याकृत्यपक्षोपग्रहः

(१) कृत्याकृत्यपक्षोपग्रहः स्वविषये व्याख्यातः परविषये वाच्यः । (२) संश्रुत्यार्थान् विप्रलब्धः, तुल्यकारिणोः शिल्पे वोपकारे वा विमानितः, वल्लभावरुद्धः, समाहूय पराजितः, प्रवासोपतप्तः, कृत्वा व्यय-मलब्धकार्यः, स्वधर्माद् दायाद्याद् वोपरुद्धः, मानाधिकाराभ्यां भ्रष्टः, कुल्यैरन्तर्हितः, प्रसभाभिमृष्टस्त्रीकः, काराभिन्यस्तः, परोक्तदण्डितः, मिथ्याचारवारितः, सर्वस्वमाहारितः, बन्धनपरिक्लिष्टः, प्रवासितबन्धु-रिति क्रुद्धवर्गः । (३) स्वयमुपहतः, विप्रकृतः, पापकर्माभिख्यातः, तुल्यदोषदण्डेनो-द्विग्नः, पर्यात्तभूमिः, दण्डेनोपहतः, सर्वाधिकरणस्थः, सहसोपचितार्थः, तत्कुलीनोपाशंसुः, प्रद्विष्टो राज्ञा, राजद्वेषी चेति भीतवर्गः ।

शत्रुदेश के कृत्य-अकृत्य पक्ष को मिलाना

( १ ) अपने देश में कृत्य-अकृत्य पक्ष को किस प्रकार सुरक्षित अथवा संगठित रखना चाहिए, इसका प्रतिपादन किया जा चुका है। शत्रुदेश के कृत्य-अकृत्य पक्ष को किस प्रकार अपने वश में करना चाहिए, अब इसका वर्णन किया जाता है।

( २ ) जिसको धन देने की प्रतिज्ञा करके धन न दिया गया हो; किसी शिल्प या उपकार सम्बन्धी कार्यों को समान रूप से करने वाले दो व्यक्तियों में से एक का तो सम्मान किया गया हो और दूसरे की अवमानना की गई हो; राजा के विश्वस्त कर्मचारियों ने जिसको राजभवन में प्रवेश करने से रोक दिया हो; स्वयं बुलाकर जिसका तिरस्कार किया गया हो; राजाज्ञा से प्रवासित होने के कारण दुःखित; व्यय करके भी जिसका अभीष्ट कार्य पूरा न हुआ हो, जिसको अपने धर्म तथा अधि-कार से रोका गया हो; सम्मानित तथा अधिकारपूर्ण पद से जिसको च्युत किया गया हो; राजपुरुषों द्वारा जिसको बदनाम किया गया हो; जिसकी स्त्री को जबरदस्ती छीन लिया गया हो; जिसको जेल में ठूंस दिया गया हो; दूसरे के कहने मात्र से जिसको दण्ड दिया गया हो; झूठा इलजाम लगाकर जिस पर धार्मिक प्रतिबन्ध लगा दिया हो; जिसका सर्वस्व अपहरण किया गया हो; अशक्त कार्यों पर नियुक्त करके जिसको पीडित किया गया हो और जिसके बन्धु-बान्धवों को देश-निकाला दिया गया हो—इस प्रकार के सभी लोग 'क्रुद्धवर्ग' कहलाते हैं।

( ३ ) किसी लोभ के कारण हिंसा करके जो दूषित हो चुका हो; पाप कर्मों को करने में जो कुख्यात हो; अपने समान अपराधी को दण्डित हुआ देखकर जो

प्र० ९ : अ० १३ ] कृत्य-अकृत्य पक्ष को मिलाना ४१

(१) परीक्षीणोऽत्यात्सवः कदर्यो व्यसन्यत्याहितव्यवहारश्चेति लुब्धवर्गः ।
(२) आत्मसम्भावितो मानकामः शत्रुपूजामर्षितो नीचैरुपहितस्तीक्ष्णः साहसिको भोगैनासन्तुष्ट इति मानिवर्गः ।
(३) तेषां मुण्डजटिलव्यञ्जनैर्यो यद्भक्तिः कृत्यपक्षीयस्तं तेनोप-जापयेत् ।
(४) यथा मदान्धो हस्ती मत्तोनाधिष्ठितो यद्यदासादयति तत् सर्वं प्रमृद्गात्येवमयम् अशास्त्रचक्षुरन्धो राजाऽन्धेन मन्त्रिणाऽधिष्ठितः, पौरजान-पदवधायाभ्युत्थितः । शक्यमस्य प्रतिहस्तिप्रोत्साहनेनापकर्तुम् । अमर्षः क्रियताम्-इति क्रुद्धवर्गमुपजापयेत् ।
(५) यथा लीनः सर्पो यस्माद् भयं पश्यति तत्र विषमुत्सृजत्येवमयं राजा जातदोषाशङ्कस्त्वयि पुरा क्रोधविषमुत्सृजति । अन्यत्र गम्यताम्-इति भीतवर्गमुपजापयेत् ।


घबड़ा गया हो; भूमि का अपहरण करने वाला; जो दण्ड के द्वारा वश में किया गया हो; सभी राजकीय विभागों पर जिसका अधिकार हो; अपनी कार्यक्षमता से जिसने प्रभूत धन एकत्र कर लिया हो; जो राजा के किसी वंशज हिस्सेदार के निकट कुछ कामना से रहता हो; जिससे राजा शत्रुता रखता हो और जो राजा से शत्रुता रखता हो—इस प्रकार से सभी लोग 'भीतवर्ग' कहलाते हैं ।

(१) जिसका सब धन-वैभव नष्ट हो गया; जो कायर, व्यसनी और अपव्ययी हो, वह 'लुब्धवर्ग' कहलाता है ।

(२) अपने को महान् समझनेवाला; आत्मश्लाघी; शत्रु के सम्मान को सहन न करनेवाला; नीच लोगों द्वारा प्रशंसित; तीक्ष्णप्रकृति; साहसी और भोग्य-पदार्थों से कभी सन्तुष्ट न होनेवाला वर्ग ही 'मानिवर्ग' कहलाता है ।

(३) उक्त क्रुद्ध, लुब्ध, भीत आदि कृत्यपक्ष के लोगों में से जिस मुण्ड या जटिल गुप्तचर के जो-जो भक्त हों उसको वही गुप्तचर अपने वश में करें ।

(४) गुप्तचर, क्रुद्धवर्ग के लोगों को उनके स्वामी से यह कह कर फोड़े, 'देखो, जैसे उन्मत्त पीलवान से चलाया गया मतवाला हाथी अपने सामने जो-कुछ भी देखता है, उसे कुचल डालता है, उसी प्रकार शास्त्ररूपी आँखों से हीन, अपने अंधे मंत्री के साथ रहता हुआ यह राजा राष्ट्र और प्रजा को नष्ट करने के लिए उद्यत है । ऐसी अवस्था में इस राजा से शत्रुता रखने वाले लोगों को उभाड़ देने से उसका अपकार किया जा सकता है । इस राजा के प्रति तुम्हें कुपित होना चाहिए ।' यह कहकर क्रुद्धवर्ग को राजा से फोड़ दे ।

(५) भीतवर्ग को अपने वश में करने के लिए गुप्तचर ऐसा कहे—'देखो, जैसे डरा हुआ साँप जिससे भय खाता है उसी पर अपना विष उगल देता है, उसी प्रकार यह राजा भी तुमसे शंकित है और सर्वप्रथम यह तुम्हारे ऊपर क्रोधरूपी विष उगलने

४२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [पहला अधिकरण

(१) यथा श्वगणिनां धेनुः श्वभ्यो दुग्धे न ब्राह्मणेभ्यः, एवमयं राजा सत्त्वप्रज्ञावाक्यशक्तिहीनेभ्यो दुग्धे नात्मगुणसम्पन्नेभ्यः । असौ राजा पुरुषविशेषज्ञः सेव्यताम्—इति लुब्धवर्गमुपजापयेत् ।

(२) यथा चण्डालोदपानश्चण्डालानामेवोपभोग्यो नान्येषामेवमयं राजा नीचो नीचानामेवोपभोग्यो न त्वद्विधानामार्याणाम् । असौ राजा पुरुषविशेषज्ञः, तत्र गम्यताम्—इति मानिवर्गमुपजापयेत् ।

(३) तथेति प्रतिपन्नांस्तान् संहितान पणकर्मणा ।
योजयेत यथाशक्ति सापसर्पान् स्वकर्मसु ॥

(४) लभेत सामदानाभ्यां कृत्यांश्च परभूमिषु ।
अकृत्यान् भेददण्डाभ्यां परदोषांश्च दर्शयेत् ॥

इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे परविषये कृत्याकृत्यपक्षोपग्रहः त्रयोदशोऽध्यायः ॥

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वाला है। तुम्हारे लिए यही उचित है कि तुम इस स्थान को छोड़ कर कहीं अन्यत्र चले जाओ।' यह कह कर भीतवर्ग का भेदन करे ।

( १ ) लुब्धवर्ग को वश में करने के लिए गुप्तचर यों कहे, 'देखो जैसे चाण्डालों की गाय चाण्डालों के लिए ही दूध देती है, ब्राह्मणों के लिए नहीं, उसी प्रकार राजा भी बल, बुद्धि और वाक्शक्ति से हीन लोगों के लिए लाभदायक है, सर्वगुण-सम्पन्न लोगों के लिए नहीं। इसके विपरीत अमुक राजा बड़ा गुणज्ञ है, तुम्हें उसी के आश्रय में रहना चाहिए।' इस प्रकार लुब्धवर्ग को मिलाये ।

( २ ) मानीवर्ग का भेदन करने के लिए गुप्तचर कहे 'देखो, जैसे चाण्डालों का कुंआ अकेले उन्हीं के लिए उपयोगी है, उसी प्रकार नीच राजा भी नीच लोगों के लिए ही सुखकर है, तुम्हारे जैसे श्रेष्ठ पुरुषों के लिए नहीं । किन्तु वह अमुक नाम का राजा स्वयं गुणी और गुणज्ञों का आदर करनेवाला है । तुम्हें उसी के आश्रम में जाकर रहना चाहिए।' इस प्रकार मानीवर्ग को उसके स्वामी से अलग करे ।

( ३ ) इस प्रकार राजा अपने पक्ष में किये गए पुरुषों को शपथ, संधि आदि से विश्वास दिला कर उन्हें उन्हीं कार्यों में नियुक्त करे, जिन पर वे नियुक्त थे; किन्तु उनके पीछे गुप्तचरों को अवश्य रखे ।

( ४ ) इस प्रकार राजा, शत्रुदेश में कृत्यपक्ष के पुरुषों को साम तथा दाम के द्वारा अपनी ओर मिलावे । परन्तु अकृत्यपक्ष के पुरुष उन्हें भेद तथा दण्ड के द्वारा अपनी ओर करते रहें और उनके सामने शत्रु के दोषों की बराबर चर्चा करते रहें ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में परविषयक कृत्याकृत्यपक्षोपग्रह नामक तेरहवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १०मन्त्राधिकारः
अध्याय १४

(१) कृतस्वपक्षपरपक्षोपग्रहः कार्यारम्भांश्चिन्तयेत् । मन्त्रपूर्वाः सर्वारम्भाः । (२) तदुद्देशः संवृतः कथानामनिःस्रावी पक्षिभिरप्यनालोक्यः स्यात् । श्रूयते हि शुकशारिकाभिर्मन्त्रो भिन्नः श्वभिरन्यैश्च तिर्यग्योनिभिः । तस्मान्मन्त्रोद्देशमनायुक्तो नोपगच्छेत् । उच्छिद्येत मन्त्रभेदी । (३) मन्त्रभेदो हि दूतामात्यस्वामिनामिङ्गिताकाराभ्याम् । इङ्गितमन्यथावृत्तिः । आकृतिग्रहणमाकारः । (४) तस्य संवरणम् आयुक्तपुरुषरक्षणमाकार्यकालादिति । तेषां हि


मंत्राधिकार

(१) अपने देश और शत्रुदेश के कृत्य-अकृत्य पक्ष को वश में करने के उपरान्त विजय की इच्छा रखने वाले राजा को चाहिए कि वह अपने देश में दुर्ग आदि तथा शत्रुदेश के सम्बन्ध में संधि-विग्रह आदि कार्यों पर विचार करे । इस प्रकार के सभी कार्यों को गम्भीर विचार-विनिमय के अनन्तर ही आरम्भ करना चाहिए ।

(२) जिस स्थान पर बैठकर मन्त्रणा की जाय वह चारों ओर से इस प्रकार बन्द होना चाहिए कि जिससे वहाँ पक्षी तक न झाँक सके और कोई शब्द बाहर न सुनाई दे, क्योंकि अनुश्रुति है कि पुराकाल में किसी राजा की गुप्त मंत्रणा को तोता और मैना ने सुनकर बाहर प्रकट कर दिया था । इसी प्रकार कुत्ते तथा अन्य पशु-पक्षियों के सम्बन्ध में भी सुना जाता है । इसलिए राजा की आज्ञा के बिना कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थिति में मंत्रणास्थल पर न जावे । यदि गुप्त मन्त्रणा के भेद को कोई फोड़ दे तो तत्काल ही उसको मरवा देना चाहिए ।

(३) कभी-कभी बिना कहे ही दूत, अमात्य तथा राजा के हाव-भाव एवं मुद्रा द्वारा भी गुप्त भेद प्रकट हो जाते हैं । स्वाभाविक क्रियाओं के विपरीत भिन्न चेष्टाएँ 'इंगित' कहलाती हैं । चेष्टाओं को प्रकट करनेवाले अंग 'आकार' या 'आकृति' कहलाते हैं ।

(४) इसलिए विजिगीषु राजा को चाहिए कि जब तक विचारित कार्यों के आरम्भ करने का समय नहीं आता तब तक अपने गुप्त भावों को दबाकर रखे ।

४४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [पहला अधिकरण

प्रमादमदसुप्तप्रलापकामादिरुत्सेकः प्रच्छन्नोऽवमतो वा मन्त्रं भिनत्ति । तस्माद् रक्षेन्मन्त्रम् ।

(१) मन्त्रभेदो ह्ययोगक्षेमकरो राज्ञस्तदायुक्तपुरुषाणां च । तस्माद् गुह्यमेको मन्त्रयेतेति भारद्वाजः । मन्त्रिणामपि हि मन्त्रिणो भवन्ति । तेषामप्यन्ये । सैषा मन्त्रिपरम्परा मन्त्रं भिनत्ति ।

(२) तस्मान्नास्य परे विद्युः कर्म किञ्चिच्चिकीर्षितम् । आरब्धारस्तु जानीयुरालब्धं कृतमेव वा ॥

(३) नैकस्य मन्त्रसिद्धिरस्तीति विशालाक्षः । प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः । अनुपलब्धस्य ज्ञानमुपलब्धस्य निश्चयबलाधानमर्थद्वैधस्य संशयच्छेदनमेकदेशदृष्टस्य शेषोपलब्धिरिति मन्त्रिसाध्यमेतत् । तस्माद् बुद्धिवृद्धैः सार्धमासीत मन्त्रम् ।


मंत्रियों की असावधानी के कारण या मद्यपान की बेहोशी में अथवा सोते समय आकस्मिक प्रलाप द्वारा या विषय-भोग की लालसा से अथवा अभिमान के भाव से गुप्त मंत्रणाएँ समय से पहिले ही प्रकट हो जाती हैं । आड़ में छिपकर सुननेवाले अथवा मन्त्रणाकाल में मूर्ख कहकर अपमानित हुआ व्यक्ति भी मन्त्र के भेद को फोड़ देता हैं । इसलिए इन सभी बातों को दृष्टि में रखकर राजा को चाहिए कि वह अपने गुप्त रहस्यों की सावधानी से रक्षा करे ।

( १ ) आचार्य भारद्वाज का सुझाव है कि 'मन्त्र के प्रकट हो जाने पर राजा और उसके सलाहकारों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। इसलिए इस प्रकार की गुप्त मन्त्रणाओं पर राजा अकेला ही विचार करे; क्योंकि मन्त्रियों के भी अपने सलाहकार होते हैं । उनके भी दूसरे लोग परामर्शदाता होते हैं इसलिए इस मन्त्रि-परम्परा के कारण गुप्त बातों के प्रकट हो जाने का भय बना रहता है ।

( २ ) 'इसलिए गुप्त मन्त्रणाओं को राजा के अतिरिक्त कोई न जानने पावे । केवल कार्यारम्भ करनेवाले व्यक्ति ही उसके आभास को जान सकें और उन्हें भी उसका परिणाम कार्य की समाप्ति के बाद ही ज्ञात हो ।'

( ३ ) आचार्य विशालाक्ष कुछ संशोधन के साथ अपना विचार प्रकट करते हैं । उनका कहना है कि 'एक ही व्यक्ति द्वारा सोचा-विचारा हुआ मन्त्र सिद्धिदायक नहीं हो सकता । सभी राजकार्य प्रत्यक्ष और परोक्ष दो प्रकार के होते हैं; उनके लिए मन्त्रियों की अपेक्षा होती है । न जाने हुए कार्य को जानना, जाने हुए कार्य का निश्चय करना, निश्चित कार्य को दृढ़ करना, किसी कार्य में सन्देह उत्पन्न हो जाने पर विचार-विमर्श द्वारा उस संशय का निराकरण करना, आंशिक कार्य को पूरी तरह

प्र० १० : अ० १४ ] मंत्राधिकार ४५

(१) न कञ्चिदवमन्येत सर्वस्य शृणुयान्मतम् । बालस्याप्यर्थवद् वाक्यमुपयुञ्जीत पण्डितः ॥

(२) एतन्मन्त्रज्ञानं नैतन्मन्त्ररक्षणमिति पाराशराः । यदस्य कार्यमभिप्रेतं तत्प्रतिरूपकं मन्त्रिणः पृच्छेत्—कार्यमिदमेवमासीदेवं वा यदि भवेत् तत् कथं कर्तव्यमिति । ते यथा ब्रूयुः तत् कुर्यात् । एवं मन्त्रोपलब्धिः संवृतिश्च भवतीति ।

(३) नेति पिशुनः । मन्त्रिणो हि व्यवहितमर्थं वृत्तमवृत्तं वा पृष्टमनादरेण ब्रुवन्ति प्रकाशयन्ति वा । स दोषः । तस्मात् कर्मसु ये येष्वभिप्रेतास्तैः सह मन्त्रयेत् । तैर्मन्त्रयमाणो हि मन्त्रबुद्धिं गुप्तिं च लभत इति ।


विचारना इत्यादि सभी बातें मन्त्रियों में सहयोग से ही पूरी की जा सकती हैं । इसलिए विजिगीषु राजा को अत्यन्त बुद्धिमान् और पर्याप्त अनुभवी व्यक्तियों के साथ बैठकर विचार करना चाहिए ।

( १ ) 'राजा को चाहिए कि सलाह करते समय वह किसी को अवमानित न करे; सबकी बातों को ध्यानपूर्वक सुने; यहाँ तक कि बालक की भी सारगर्भित बात को ग्रहण करे ।'

( २ ) आचार्य पराशर के मतावलम्बी विद्वानों का कहना है कि 'आचार्य विशालाक्ष के उक्त कथन से मन्त्र का ज्ञान भले ही हो सकता है, मन्त्र की रक्षा नहीं । इसलिए राजा को जिस कार्य के लिए सलाह लेनी हो उस कार्य के समान ही दूसरे कार्य के सम्बन्ध में वह मन्त्रियों से पूछे । राजा किसी ऐतिहासिक घटना का हवाला देकर कहे कि अमुक कार्य इस ढंग से किया गया था; इसी कार्य को यदि इस ढंग से करना होता तो कैसे किया जाना चाहिए था । इसपर मन्त्री जो राय दें उसके अनुसार ही तत्समान अपने अभीष्ट कार्य को सम्पन्न करे । ऐसा करने से मन्त्र का ज्ञान भी हो जाता है और मन्त्र की रक्षा भी ।'

( ३ ) आचार्य पिशुन ( नारद ) इस मन्तव्य को नहीं मानते । उनकी स्थापना है 'क्योंकि इस तरह प्रकारान्तर से मन्त्रियों के सम्मुख किसी बात को रख देने से वे समझने लगते हैं कि राजा हमारी सलाह नहीं मानता और उसका हम पर विश्वास नहीं है । इसलिए वे पूर्वघटित एवं अघटित विषय पर लापरवाही से उत्तर देते हैं और उस बात को प्रकाशित भी कर देते हैं । यह तो मन्त्र के लिए बड़ा दोष है । इसलिए राजा को यही उचित है कि जो लोग जिन-जिन कार्यों पर नियुक्त एवं जिन-जिन विचारों के लिए उपयुक्त हैं उन्हीं के साथ वैसी सलाह करे । ऐसा करने से मन्त्रणा में अधिक परिमार्जन हो जाता है और उसकी सुरक्षा भी हो जाती है ।

४६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पहला अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । अनवस्था ह्येषा । मन्त्रिभिस्त्रिभिश्चतुर्भिर्वा सह मन्त्रयेत । मन्त्रयमाणो ह्येकेनार्थकृच्छ्रेषु निश्चयं नाधिगच्छेत् । एकश्च मन्त्री यथेष्टमनवग्रहश्चरति । द्वाभ्यां मन्त्रयमाणो द्वाभ्यां संहताभ्यामवगृह्यते, विगृहीताभ्यां विनाश्यते । त्रिषु चतुर्षु वा नैकान्तं कृच्छ्रेणोपपद्यते महादोषम् । उपपन्नं तु भवति । ततः परेषु कृच्छ्रेणार्थनिश्चयो गम्यते, मन्त्रो वा रक्ष्यते ।

(२) देशकालकार्यवशेन त्वेकेन सह द्वाभ्यामेको वा यथासामर्थ्यं मन्त्रयेत ।

(३) कर्मणामारम्भोपायः पुरुषद्रव्यसंपद् देशकालविभागः विनिपातप्रतीकारः कार्यसिद्धिरिति पञ्चाङ्गो मन्त्रः । तानेकैकशः पृच्छेत् समस्तांश्च । हेतुभिश्चैषां मतिप्रविवेकान् विद्यात् । अवाप्तार्थः कालं नातिक्रामयेत् । न दीर्घकालं मन्त्रयेत । न च तेषां पक्ष्यैर्येषामपकुर्यात् ।


(१) आचार्य कौटिल्य उक्त मत से अपनी असहमति प्रकट करते हुए कहते हैं कि 'नारदमुनि की बताई हुई युक्तियों के अनुसार मन्त्र व्यवस्थित नहीं हो सकता । इसलिए तीन या चार मन्त्रियों को साथ बैठाकर राजा को मन्त्रणा करनी चाहिए । क्योंकि एक ही मन्त्री से सलाह करता हुआ राजा किसी कठिनतम कार्य के अड़ जाने पर उचित समाधान नहीं कर पाता और मन्त्री प्रतिद्वन्द्वी के रूप में मनमाना करने लगता है । दो मंत्रियों के साथ बैठकर भी वह सलाह करता है तो कोई असंभव नहीं कि वे दोनों मिलकर राजा को अपने वश में कर लें अथवा दोनों लड़ने लग जायें तो सारी मंत्रणा ही धूल में मिल जायगी । यदि तीन या चार मंत्री सलाहकार होंगे तो उस अवस्था से इस प्रकार के अनर्थकारी महान् दोष के उत्पन्न हो जाने की संभावना नहीं है । कोई भी दोष उसमें सहसा ही नहीं आ सकता है । यदि चार से अधिक मन्त्री हो जायँ तो कार्य का निश्चय करना कठिन हो जाता है और उस दशा में मन्त्र की सुरक्षा में भी सन्देह हो जाता है ।'

(२) इसलिए देश, काल और कार्य के अनुसार एक या दो मन्त्रियों के साथ भी राजा मन्त्रणा करे । अपनी विचार-शक्ति के अनुसार वह अकेला बैठकर कुछ कार्यों का स्वयं ही निर्णय करे ।

(३) मंत्र के पाँच अंग होते हैं : १. कार्यारंभ करने का उपाय, २. पुरुष तथा द्रव्य-संपत्ति, ३. देश-काल का विभाग, ४. विघ्न-प्रतीकार और ५. कार्यसिद्धि । मंत्र के विषय में राजा एक-एक मंत्री से अथवा एक साथ सभी मंत्रियों से परामर्श कर सकता है । मंत्रियों के भिन्न-भिन्न अभिप्रायों को वह युक्तियों के द्वारा समझे । भली-

प्र० १० : अ० १४ ] मंत्राधिकार ४७

(१) मन्त्रिपरिषदं द्वादशामात्यान् कुर्वीतेति मानवाः । (२) षोडशेति बार्हस्पत्याः । (३) विंशतिमित्यौशनसाः । (४) यथासामर्थ्यमिति कौटिल्यः । (५) ते ह्यस्य स्वपक्षं परपक्षं च चिन्तयेयुः । अकृतारम्भमारब्धानुष्ठानमनुष्ठितविशेषं नियोगसम्पदं च कर्मणां कुर्युः । आसन्नैः सह कार्याणि पश्येत् । अनासन्नैः सह पत्रसम्प्रेषणेन मन्त्रयेत । इन्द्रस्य हि मन्त्रिपरिषदृषीणां सहस्रम् । स तच्चक्षुः । तस्मादिमं द्व्यक्षं सहस्राक्षमाहुः । (६) आत्ययिके कार्ये मन्त्रिणो मन्त्रिपरिषदं चाहूय ब्रूयात् । तत्र यद् भूयिष्ठाः कार्यसिद्धिकरं वा ब्रूयुस्तत् कुर्यात् । कुर्वतश्चः—


भाँति समझ-बूझ जाने पर अविलंब ही वह अपने निश्चय को कार्यरूप में परिणत कर दे । किसी कार्य को अधिक समय तक विचारते रहना उचित नहीं है । जिन लोगों का कभी अपकार किया हो, उनके साथ या उनके सहयोगियों के साथ कभी भी मंत्रणा नहीं करनी चाहिए ।

( मन्त्रि-परिषद् का विचार )

( १ ) मनु के अनुयायी अर्थशास्त्रविदों का इस सम्बन्ध में कहना है कि 'मंत्रि-परिषद् में बारह अमात्यों की नियुक्ति की जानी चाहिए ।'

( २ ) वृहस्पति के अनुयायी विद्वान् 'सोलह मन्त्रियों' के पक्ष में हैं ।

( ३ ) शुक्राचार्य-पक्ष के आचार्य मन्त्रियों की संख्या 'बीस' रखना अधिक उपयुक्त समझते हैं ।

( ४ ) आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'कार्य करने वाले पुरुषों के सामर्थ्य के अनुसार ही उनकी संख्या नियत होनी चाहिए ।'

( ५ ) वे निर्धारित मन्त्री विजिगीषु राजा के और उसके शत्रु राजा के सम्बन्ध में विचार करें । जो कार्य प्रारम्भ न किये गए हों उन्हें प्रारम्भ करायें; प्रारम्भ किये कार्यों को पूरा करावें और जो कार्य पूरे हो चुके हों उनमें आवश्यकतानुसार संशोधन-संमार्जन करें । निष्कर्ष यह कि विभागीय अध्यक्ष अपने-अपने कार्यों को अंत तक अधिकाधिक निपुणता से सम्पन्न करें । जो मन्त्री राजा के सन्निकट हों, उनको साथ लेकर राजा उनके कार्यों का स्वयं ही निरीक्षण करे । किन्तु जो दूर हों, उनसे पत्र द्वारा परामर्श करता रहे । इन्द्र की मन्त्रि-परिषद् में एक हजार ऋषि थे, जो कि उसके कार्यों के निर्देशक थे । इसीलिए तो दो नेत्रों वाले इन्द्र को हजार आँखों वाला ( सहस्राक्ष ) कहा गया है ।

( ६ ) अत्यावश्यक कार्य के आ जाने पर राजा, मन्त्रि-परिषद् का आयोजन कर

४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

(१) नास्य गुह्यं परे विद्युश्छिद्रं विद्यात् परस्य च ।
गूहेत् कूर्म इवाङ्गानि यत्स्याद् विवृतमात्मनः ॥
(२) यथा ह्यश्रोत्रियः श्राद्धं न सतां भोक्तुमर्हति ।
एवमश्रुतशास्त्रार्थो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे मन्त्राधिकारो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥

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उससे परामर्श करे । उनमें से बहुसमर्थित तथा शीघ्र ही कार्यसिद्धि कर देने वाली राय के अनुसार कार्य सम्पादन करे ।

( १ ) इस ढंग से कार्य करते हुए राजा के गुप्त रहस्यों को कोई बाहरी व्यक्ति नहीं जान पाता है, प्रत्युत वह दूसरों के दोषों की भी जान लेता है। राजा को चाहिए कि वह अपने गुप्त भावों को उसी प्रकार अपने मन में छिपाये रखे जिस प्रकार कि कछुआ अपने अंगों को छिपाये रखता है।

( २ ) जिस प्रकार वेदाध्ययन से शून्य ब्राह्मण किसी श्रेष्ठ पुरुष के यहाँ श्राद्ध नहीं कर सकता है, उसी प्रकार शास्त्रज्ञान से शून्य व्यक्ति मन्त्र को सुरक्षित नहीं रख पाता है।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में मन्त्राधिकार नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ११## दूतप्रणिधिः
अध्याय १५

(१) उद्धृतमन्त्रो दूतप्रणिधिः। अमात्यसम्पदोपेतो निसृष्टार्थः, पादगुणहीनः परिमितार्थः, अर्धगुणहीनः शासनहरः।

(२) सुप्रतिविहितयानवाहनपुरुषपरिवापः प्रतिष्ठेत। शासनमेवं वाच्यः परः, स वक्ष्यत्येवं, तस्येदं प्रतिवाक्यम्—एवमतिसन्धातव्यमित्यधीयानो गच्छेत्। अटव्यन्तपालपुरराष्ट्रमुख्यैश्च प्रतिसंसर्गं गच्छेत्। अनीकस्थानयुद्धप्रतिग्रहपसारभूमीरात्मनः परस्य चावेक्षेत। दुर्गराष्ट्रप्रमाणं सारवृत्तिगुप्तिच्छिद्राणि चोपलभेत। पराधिष्ठानमनुज्ञातः प्रविशेत्। शासनं च यथोक्तं ब्रूयात् प्राणाबाधेऽपि दृष्टे। परस्य वाचि वक्त्रे दृष्टचां च प्रसादं वाक्यपूजनमिष्टपरिप्रश्नं गुणकथासङ्गमासन्नमासनं सत्कार-


संदेश देकर राजदूतों को शत्रु-देश में भेजना

(१) गुप्त मंत्रणा के निश्चित हो जाने पर ही दूत को शत्रुदेश की ओर भेजना चाहिए। दूत तीन प्रकार के होते हैं : १. निसृष्टार्थ, २. परिमितार्थ और ३. शासनहर। अमात्य के पूर्वोक्त गुणों से सम्पन्न निसृष्टार्थ, उनमें एक चौथाई गुणहीन परिमितार्थ और आधा गुणहीन शासनहर कहलाता है।

(२) पालकी आदि सवारी, घोड़े आदि वाहन, नौकर-चाकर और सोने-बिछाने आदि सामग्री की भली-भाँति व्यवस्था करके दूत को शत्रुदेश की ओर प्रस्थान करना चाहिये। दूत को पहिले ही से यह सोच-विचार कर लेना चाहिये कि 'मैं अपने स्वामी का सन्देश इस ढंग से कहूँगा; उसका यह उत्तर होगा तो मेरे प्रत्युत्तर की विधि इस प्रकार होगी; या किन-किन विधियों से उस शत्रु राजा को वश में करना होगा।' आदि-आदि। राजदूत को चाहिए कि वह शत्रुदेश के वनरक्षक, सीमारक्षक, नगरवासियों तथा जनपदवासियों से मित्रता गाँठे। साथ ही वह उभयपक्ष की सेनाओं के ठहरने योग्य युद्ध-भूमि और संयोग आने पर अपनी सेना के भाग सकने योग्य उपयुक्त स्थानों तथा रास्तों का भी निरीक्षण करे। साथ ही शत्रुपक्षी राजा के दुर्ग, उसके राज्य की सीमाएँ, आमदनी, उपज, आजीविका के साधन, राष्ट्ररक्षा के तरीके, वहाँ के गुप्त भेद एवं वहाँ की बुराइयों का पता लगाना भी दूत का ही कर्तव्य है। किसी शत्रु राजा के राज्य में प्रवेश करने से पूर्व दूत, उस राजा की आज्ञा प्राप्त कर ले। प्राणान्तक परिस्थिति के उपस्थित हो जाने पर भी वह अपने स्वामी का संदेश अविकल रूप में कहे। यदि शत्रु राजा की वाणी में, मुखमुद्रा में, दृष्टि में प्रसन्नता झलकती हो; वह दूत की बातों को आदरपूर्वक सुन रहा हो; दूत

४ कौ०

५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

मिष्टेषु स्मरणं विश्वासगमनं च लक्षयेत् तुष्टस्य । विपरीतमतुष्टस्य । तं ब्रूयात्—दूतमुखा वै राजानस्त्वं चान्ये च । तस्मादुद्यतेष्वपि शस्त्रेषु यथोक्तं वक्तारः तेषामन्तावसायिनोऽप्यवध्याः, किमङ्ग पुनर्ब्राह्मणाः । परस्यैतद् वाक्यमेष दूतधर्मः इति । (१) वसेदविसृष्टः; प्रपूजया नोत्सिक्तः; परेषु बलित्वं न मन्येत; वाक्यमनिष्टं सहेत; स्त्रियः पानं च वर्जयेत्; एकः शयीत; सुप्तमत्तयोर्हि भावज्ञानं दृष्टम् । कृत्यपक्षोपजापमकृत्यपक्षे गूढप्रणिधानं रागापरागौ भर्तरि रन्ध्रं च प्रकृतीनां तापसवैदेहकव्यञ्जनाभ्यामुपलभेत । तयोरन्तेवासिभिश्चिकित्सकपाषण्डव्यञ्जनोभयवेतनैर्वा, तेषामसम्भाषायां याचक-

को स्वेच्छया प्रश्न करने या अभीष्ट को प्रकट करने की स्वतन्त्रता हो; दूत के स्वामी राजा का कुशल-क्षेम तथा उसके गुणों के प्रति शत्रु राजा की उत्सुकता हो; दूत को वह आदरपूर्वक समीप ही बैठाये; राजकीय उत्सवों पर दूत को भी स्मरण करे और दूत के प्रत्येक कार्य पर शत्रु राजा का विश्वास हो; तो दूत को समझना चाहिए कि वह मुझ पर प्रसन्न है । यदि इसके विपरीत आचरण देखे, तो समझ ले कि शत्रु राजा उस पर रुष्ट है । इस प्रकार के रुष्ट हुए राजा से दूत कहे 'स्वामिन्, आप हों, अथवा दूसरे कोई भी राजा हों, दूत सभी का मुख होता है । उसी के माध्यम से राजा लोग पारस्परिक वार्ता-विनिमय करते हैं । इसलिए प्राणघातक स्थिति के आ जाने पर भी दूत सही संदेश ही निवेदित करते हैं । कोई चाण्डाल भी इस कार्य पर नियुक्त किया गया हो तो राजधर्म के अनुसार वह भी अवध्य है, उसी स्थान पर यदि ब्राह्मण हो तो उसके वध के सम्बन्ध में तो सोचा भी नहीं जा सकता है । दूसरे की कही हुई बात को ही दोहरा देना मात्र दूत का कार्य होता है ।'

( १ ) जब तक शत्रुराजा उसे अपने राज्य से जाने की आज्ञा न दे तब तक वह वहीं रहे । शत्रुराजा द्वारा प्राप्त सम्मान पर वह गर्व न करे । शत्रुओं के बीच रहता हुआ अपने को वह बलवान् न समझे । किसी के कुवाक्य को भी वह पी ले । स्त्री-प्रसंग और मद्यपान को वह सर्वथा त्याग दे । अपने स्थान में एकाकी ही शयन करे । मद्य पीने तथा दूसरों के साथ शयन करने से प्रमादवश या स्वप्नावस्था में मन के गुप्त रहस्यों के प्रकट हो जाने का भय बना रहता है । दूत को चाहिये कि वह शत्रु-देश के कृत्यपक्ष को फोड़ देने का कार्य तथा अकृत्यपक्ष को वश में कर देने का कार्य अपने गुप्तचरों द्वारा जाने । राजा और अमात्य आदि उच्चाधिकारियों का पारस्परिक राग-द्वेष तथा राजा की बुराइयों का भेद वह तापस, वैदेहक आदि गुप्तचरों के द्वारा अवगत करे । अथवा तापस, वैदेहक आदि के शिष्यों, चिकित्सक तथा पाखण्डो के वेश में रहने वाले गुप्तचरों या उभयवेतनभोगी गुप्तचरों के द्वारा वह शत्रुराजा के रहस्यों का पता करता रहे । यदि इन गुप्तचरों से भी काम बनता न देखे तो, भिक्षुक, मत्त, उन्मत्त तथा सोते में प्रलाप करने वाले व्यक्तियों के माध्यम से शत्रु के

प्र० ११ : अ० १५ ] राजदूतों को शत्रु-देश में भेजना ५१

मत्तोन्मत्तसुप्तप्रलापैः पुण्यस्थानदेवगृहचित्रलेख्यसंज्ञाभिर्वा चारमुपलभेत । उपलब्धस्योपजापमुपेयात् । परेण चोक्तः स्वासां प्रकृतीनां परिमाणं नाच-क्षीत । सर्वं वेद भवानिति ब्रूयात्, कार्यसिद्धिकरं वा । (१) कार्यस्य सिद्धावुपरुध्यमानस्तर्कयेत् । किं भर्तुर्मे व्यसनमासन्नं पश्यन्, स्वं वा व्यसनं प्रतिकर्तुकामः, पार्ष्णिग्राहासारवन्तः—कोपमाट-विकं वा समुत्थापयितुकामः, मित्रमाक्रन्दं वा व्यापादयितुकामः, स्वं वा परतो विग्रहमन्तःकोपमाटविकं वा प्रतिकर्तुकामः, संसिद्धं मे भर्तुर्यात्रा-कालमभिहन्तुकामः, सस्यकुप्यपण्यसङ्ग्रहं दुर्गकर्म बलसमुत्थानं वा कर्तु-कामः, स्वसैन्यानां वा व्यायामदेशकालावाकाङ्क्षमाणः, परिभवप्रमदाभ्यां वा, संसर्गानुबन्धार्थी वा मामुपरुणद्धीति ज्ञात्वा वसेदपसरेद्वा । प्रयोजन-


कार्यों का पता लगाता रहे । तीर्थस्थानों, देवालयों, गृहचित्रों तथा लिपिसंकेतों द्वारा भी वह वहाँ के वृत्तान्त जाने । ठीक-ठीक समाचार अवगत हो जाने पर वह तदनुसार भेदरूप उपायों का प्रयोग करे । दूत को चाहिए कि शत्रु के पूछे जाने पर भी वह अपने मन्त्रिपरिषद् का ठीक-ठीक परिचय न दे । 'आप तो सर्वज्ञ हैं' इतना कहकर बात को टाल दे । यदि इतना बताने पर भी शत्रुराजा को सन्तोष न हो तो उतना मात्र परिचय देना चाहिये, जितने से अपने कार्य की सिद्धि हो जाय ।

( १ ) कार्य सिद्ध हो जाने पर भी यदि शत्रुराजा दूत को अपने ही यहाँ रोके रखना चाहता है, तो दूत को, राजा की इस अप्रत्याशित नीति के सम्बन्ध में गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए । उसको विचार करना चाहिए कि 'क्या शत्रु-राजा को मेरे स्वामी पर आनेवाली किसी सन्निकट विपत्ति का पता लग गया है । या कि वह मेरे जाने से पूर्व ही अपने किसी व्यसन का प्रतीकार करना चाहता है । अथवा वह पार्ष्णिग्राह (स्वामिराजा का शत्रु एवं शत्रुराजा का मित्र ) तथा आसार ( शत्रुराजा के मित्र का मित्र ) को मेरे स्वामी के विरोध में युद्ध करने के लिए तो नहीं उकसाना चाहता । या उसका इरादा मेरे स्वामी के अमात्य आदि को उससे कुपित करने का तो नहीं है । या कि वह किसी आटविक को भिड़ाने की साजिश तो नहीं रच रहा है । उसकी योजना ऐसी तो नहीं है कि वह मित्र ( स्वामिराजा के सम्मुख प्रदेश का मित्रराजा ) तथा आक्रंद ( स्वामिराजा के पृष्ठप्रदेश का मित्र राजा ) आदि मित्रराष्ट्रों के राजाओं को मरवाना चाहता हो । या अपने ऊपर किये गये आक्रमण का, अपने अमात्य आदि के कोप का तथा अपने आटविक का प्रतीकार तो नहीं करना चाहता है । या कि वह मेरे स्वामी के इस प्रस्तुत आक्रमण को टालने तथा रोकने का यत्न तो नहीं कर रहा है । अथवा वह युद्ध की तैयारी के लिए धातुसंग्रह, किलाबन्दी तथा सैन्य-संग्रह तो नहीं कर रहा है । या वह सैन्य-शिक्षण तथा उचित देश-काल की आकांक्षा में तो नहीं है । अथवा किसी प्रकार के तिरस्कार, प्रीति, विवाह-सम्बन्ध, दोष-वैमनस्य आदि के लिए तो वह मुझे नहीं रोक रहा है ।'

५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

मिष्टमवेक्षेत वा । शासनमनिष्टमुक्त्वा बन्धवधभयाद्विसृष्टोऽप्यपगच्छेत् । अन्यथा नियम्येत ।

(१) प्रेषणं सन्धिपालत्वं प्रतापो मित्रसङ्ग्रहः ।
उपजापः सुहृद्भेदो दण्डगूढातिसारणम् ॥
बन्धुरत्नापहरणं चारज्ञानं पराक्रमः ।
समाधिमोक्षो दूतस्य कर्म योगस्य चाश्रयः ॥

(२) स्वदूतैः कारयेदेतत् परदूतांश्च रक्षयेत् ।
प्रतिदूतापसर्पाभ्यां दृश्यादृश्यैश्च रक्षिभिः ॥

इति कौटिलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे दूतप्रणिधिर्नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥


इस प्रकार के रहस्यों, कारणों और उद्देश्यों के सम्बन्ध में दूत अच्छी तरह से छान-बीन करे । रोके जाने के कारणों का ठीक-ठीक पता लग जाने पर वह उचित समझे तो रुके अन्यथा वहाँ से चल दें। अपने स्वामी की अभीष्ट-सिद्धि लिये वह चाहे तो उसी नगर में रुककर, गुप्त पुरुषों के द्वारा राजा तक सूचनाएँ पहुँचा कर, उनका प्रतीकार करवावे । अपने स्वामी का ऐसा संदेश, जिसको सुनकर शत्रुराजा क्रोधित हो उठे, सुनाने पर, दूत को बिना अनुमति लिये ही वहाँ से कूच कर देना चाहिए अन्यथा उसका पकड़ा जाना निश्चित है ।

( १ ) शत्रुप्रदेश में अपने स्वामी का संदेश लेकर जाना; शत्रुराजा का संदेश लाने के लिए जाना, सन्धिभाव को बनाये रखना, समय आने पर अपने पराक्रम को दिखाना, अधिक से अधिक मित्र बनाना, शत्रु के कृत्यपक्ष के पुरुषों को फोड़ देना, शत्रु के मित्रों को उससे विमुख कर देना, तीक्ष्ण, रसद आदि गुप्तचरों एवं अपनी सेना को भगा देना, शत्रु के बांधवों एवं रत्नों का अपहरण ( स्वायत्त ) कर लेना, शत्रु के देश में रहकर गुप्तचरों के कार्यों का निरीक्षण करना, समय आने पर पराक्रम दिखाना, सन्धि की चिरस्थिति के निमित्त जमानत-रूप में रखे हुए राजकुमार को मुक्त कराना और मारण, मोहन, उच्चाटन आदि का प्रयोग करना, ये सभी दूत के कार्य हैं ।

( २ ) राजा को चाहिये कि वह उपर्युक्त सभी कार्य दूतों के द्वारा करवाये और शत्रुओं के पीछे अपने दूतों या गुप्तचरों को लगाये रखे । अपने देश में तो वह शत्रुदूतों के कार्यों का पता प्रकट रूप से लगाये, किन्तु शत्रुदेश में उनकी सूचनायें गुप्तरूप से संग्रह करवाये ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में दूतप्रणिधि नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।

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| प्रकरण १२ | | | अध्याय १६ | राजपुत्ररक्षणम् |


(१) रक्षितो राजा राज्यं रक्षत्यासन्नेभ्यः परेभ्यश्च । पूर्वं दारेभ्यः पुत्रेभ्यश्च ।
(२) दाररक्षणं निशान्तप्रणिधौ वक्ष्यामः ।
(३) पुत्ररक्षणं जन्मप्रभृति राजपुत्रान् रक्षेत् । कर्कटकसधर्माणो हि जनकभक्षा राजपुत्राः ।
(४) तेषामजातस्नेहे पितर्युपांशुदण्डः श्रेयानिति भारद्वाजः ।
(५) नृशंसमदृष्टवधः क्षत्रविनाशश्चेति विशालाक्षः । तस्मादेकस्थानावरोधः श्रेयानिति ।
(६) अहिभयमेतदिति पाराशराः । कुमारो हि विक्रमभयान्मां पिता रुणद्धीति ज्ञात्वा तमेवाङ्के कुर्यात् । तस्मादन्तपालदुर्गे वासः श्रेयानिति ।


राजपुत्रों से राजा की रक्षा

( १ ) निकटवर्ती सम्बन्धियों तथा शत्रुओं से सुरक्षित राजा ही राज्य की रक्षा कर सकता है । राजा को चाहिये कि सर्वप्रथम वह अपनी रानियों और अपने पुत्रों से अपनी रक्षा का प्रबन्ध करे ।

( २ ) रानियों से किस प्रकार राजा को आत्मरक्षा करनी चाहिये, इसके उपाय आगे निशान्तप्रणिधि प्रकरण में बताये जायेंगे ।

( ३ ) अपने पुत्रों से आत्मरक्षा करने के लिए राजा को चाहिए कि वह जन्म से ही राजपुत्रों पर कड़ी निगरानी रखे, क्योंकि केकड़े की भाँति राजपुत्र भी अपने पिता के भक्षक होते हैं ।

( ४ ) इस सम्बन्ध में आचार्य भारद्वाज का कहना है कि 'यदि राजकुमारों में पितृभक्ति की भावना न दिखाई दे तो तो उनका चुपचाप वध कर डालना ही श्रेयस्कर है ।'

( ५ ) आचार्य विशालाक्ष इसको पापकर्म कहते हैं । उनका कथन है कि 'निरपराध बच्चों को इस प्रकार मरवा डालना घोर पाप और अतिक्रूरता है, इस प्रकार तो क्षत्रियवंश ही सर्वथा नष्ट हो जायगा । इसलिए यदि राजकुमारों में पितृभक्ति न दिखाई दे तो उन्हें किसी स्थान में कैद करके रखा जाना उचित है ।'

( ६ ) आचार्य पराशर के अनुयायी इसके भी विरुद्ध हैं । उनका अभिमत है कि 'यह तो सर्पभय के समान है । जैसे घर में घुसा हुआ साँप भयावह होता है,