कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
| ७२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ पहिला अधिकरण |
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ताभिरधिष्ठिता वा शिल्पिनः । आत्मचक्षुषि निवेश्य वस्त्रमाल्यं दद्युः; स्नानानुलेपनप्रघर्षचूर्णवासस्नानीयानि स्ववक्षोबाहुषु च । एतेन परस्मादागतं व्याख्यातम् । (१) कुशीलवाः शस्त्राग्निरसवर्जं नर्मयेयुः । आतोद्यानि चैषामन्तस्तिष्ठेयुः, अभ्वरथद्विपालङ्काराश्च । (२) मौलपुरुषाधिष्ठितं यानवाहनमारोहेत्; नावं चाप्तनाविकाधिष्ठिताम् । अन्यनौप्रतिबद्धां वातवेगवशां च नोपेयात् । उदकान्ते सैन्यमासीत । मत्स्यग्राहविशुद्धमवगाहेत । व्यालग्राहपरिशुद्धमुद्यानं गच्छेत् । (३) लुब्धकैः श्वगणिभिरपास्तस्तेनव्यालपराबाधभयं चललक्षपरिचयार्थं मृगारण्यं गच्छेत् । (४) आप्तशस्त्रग्राहाधिष्ठितः सिद्धतापसं पश्येत्; मन्त्रिपरिषदा सामन्तदूतम् । सन्नद्धोऽश्वं हस्तिनं रथं वाऽऽरूढः सन्नद्धमनीकं गच्छेत् ।
धोना और माला बनाना आदि कार्यों को दासियाँ ही करें, अथवा दासियों की देख-रेख में उस कार्य के जानकार लोग करें । दासियों को चाहिए कि अपनी आँखों से देखकर ही वे राजा को वस्त्रालंकरण पहिनावें । स्नान के समय उपयोग में लाई जाने वाली वस्तुओं, जैसे—उबटन, चंदन, सुगन्धित चूर्ण ( पाउडर ) तथा पटवास आदि को, दासियाँ पहिले अपनी छाती एवं बाँह पर लगाकर आजमा लें और तदनंतर राजा पर उनका प्रयोग करें । यही बात दूसरे स्थान से आई हुई वस्तुओं के संबंध में भी जान लेनी चाहिए ।
( १ ) खेल दिखाने वाले नट-नर्तक, हथियार, आग, विष आदि के अतिरिक्त दूसरे खेलों को ही राजा के सामने दर्शित करें । नट-नर्तकों के उपयोग में आने वाली सामग्री, जैसे—वादन, वस्त्र, घोड़े, अलंकरण आदि, राजमहल से ही दी जानी चाहिए ।
( २ ) विश्वस्त प्रधान पुरुष के साथ होने पर ही राजा पालकी तथा घोड़े आदि यान-वाहनों पर चढ़े । विश्वस्त नाविक के रहने पर ही नौका पर चढ़े । दूसरी नाव पर बंधी एवं वायु से चालित नाव पर वह कदापि न बैठे । राजा जब नौका-विहार करे तो, सुरक्षा के लिए, नदी के दोनों तटों पर सेना तैनात रहनी चाहिए । मछुओं द्वारा भलीभांति जाँच किए गए घाट पर ही वह स्नान करे । इसी प्रकार संपेरों द्वारा परिशोधित उद्यान में ही वह भ्रमण करे ।
( ३ ) चोर तथा व्याघ्र आदि से रहित, कुत्ते रखने वाले शिकारियों के साथ राजा, चलते हुए लक्ष्य पर निशाना साधने के उद्देश्य से जंगल में जाय ।
( ४ ) दर्शनार्थ आये हुए किसी सिद्ध या तपस्वी से मिलते समय राजा, अपने विश्वस्त सशस्त्र पुरुष को साथ ले ले । अपने मंत्रि-परिषद् के साथ ही वह सामंत
प्र० १६ : अ० २० ] आत्मरक्षा का प्रबन्ध ७३
(१) निर्याणेऽभियाने च राजमार्गमुभयतः कृतारक्षं दण्डिभिरपास्त- शस्त्रहस्तप्रव्रजितव्यङ्गं गच्छेत् । न पुरुषसम्बाधमवगाहेत । यात्रासमाजो- त्सवप्रवहणानि च दशवर्गिकाधिष्ठितानि गच्छेत् । (२) यथा च योगपुरुषैरन्यान् राजाऽधितिष्ठति । तथाऽयमन्यबाधेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥
इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे आत्मरक्षितकं विंशोऽध्यायः ।
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राजा के दूत से मिले । घोड़े, हाथी या रथ पर सवार युद्ध के लिए प्रस्थान करने वाली सेना का वह युद्धोचित कवच आदि पहिन कर सैनिक वेश में निरीक्षण करे ।
( १ ) बाहर जाते या बाहर से आते समय राजा, हाथ में दण्ड लिये रक्षकों द्वारा दोनों ओर से सुरक्षित मार्ग पर चले । ऐसा प्रबंध हो कि रास्ते भर में कहीं भी राजा को शस्त्ररहित पुरुष, संन्यासी या लूला-लंगड़ा, अपंग व्यक्ति न दिखाई दे । पुरुषों की भीड़ में भी वह कदापि न घुसे । किसी देवालय, सभा, उत्सव तथा पार्टी आदि में वह शामिल होने जाय तो कम से कम दस सिपाही तथा सेनानायक उसके साथ उपस्थित रहें ।
( २ ) विजय की इच्छा रखने वाला राजा जैसे अपने गुप्तचरों द्वारा दूसरों को कष्ट पहुँचाता है, उसी प्रकार दूसरों के द्वारा दिये गए कष्टों से भी वह अपनी रक्षा करे ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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(इस पृष्ठ पर छपा हुआ पाठ अत्यंत धुंधला / अस्पष्ट होने के कारण पठनीय नहीं है।)
दूसरा अधिकरण
दूसरा अधिकरण
अध्यक्ष-प्रचार
| प्रकरण १७ |
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| अध्याय १ |
जनपदनिवेशः
(१) भूतपूर्वमभूतपूर्वं वा जनपदं परदेशापवाहनेन स्वदेशाभिष्यन्द-वमनेन वा निवेशयेत् । (२) शूद्रकर्षकप्रायं कुलशतावरं पञ्चशतकुलपरं ग्रामं क्रोशद्विक्रोश-सीमानमन्योन्यारक्षं निवेशयेत् । नदीशैलवनगृष्टिदरीसेतुबन्धशाल्मली-शमीक्षीरवृक्षानन्तेषु सीम्नां स्थापयेत् । (३) अष्टशतग्राम्या मध्ये स्थानीयं, चतुश्शतग्राम्या द्रोणमुखं, द्विशतग्राम्याः खार्वटिकं, दशग्रामीसङ्ग्रहेण सङ्ग्रहणं स्थापयेत् । (४) अन्तेष्वन्तपालदुर्गाणि, जनपदद्वाराण्यन्तपालाधिष्ठितानि स्थापयेत् । तेषामन्तराणि वागुरिकशबरपुलिन्दचण्डालारण्यचरा रक्षेयुः । (५) ऋत्विगाचार्यपुरोहितश्रोत्रियेभ्यो ब्रह्मदेयान्यदण्डकराण्यभि-
जनपदों की स्थापना
( १ ) राजा को चाहिए कि दूसरे देश के मनुष्य को बुलाकर अथवा अपनी देश की आबादी को बढ़ाकर वह पुराने या नये जनपद को बसाये ।
( २ ) प्रत्येक जनपद में कम से कम सौ घर और अधिक से अधिक पांच सौ घर वाले, ऐसे गाँव बसायें जायें जिसमें प्रायः शूद्र तथा किसान अधिक हों । एक गाँव दूसरे गाँव से कोस भर या दो कोस की दूरी से अधिक नहीं होना चाहिए, जिससे अवसर आने पर वे एक दूसरे की मदद कर सकें । नदी, पहाड़, जंगल, बेर के वृक्ष, खाई, तालाब, सेंमल के वृक्ष, शमी के वृक्ष और बरगद आदि के वृक्ष लगाकर उन बसाये हुए गाँवों की सीमा निर्धारित करे ।
( ३ ) आठ सौ गाँवों के बीच में एक स्थानीय; चार सौ गाँवों के समूह में एक द्रोणमुख; दो सौ गाँवों के बीच में एक कार्वटिक और दस गाँवों के समूह में संग्रहण नामक स्थानों की विशेष रूप से स्थापना करे ।
( ४ ) राज्य की सीमा पर अंतपाल नामक दुर्गरक्षक के संरक्षण में एक दुर्ग की भी स्थापना करे । जनपद की सीमा पर अंतपाल की अध्यक्षता में ही द्वारभूत स्थानों का भी निर्माण करे । उनके भीतरी भागों की रक्षा व्याध, शबर, पुलिन्द, चाण्डाल आदि वनचर जातियों के लोग करें ।
( ५ ) राजा को चाहिए कि वह ऋत्विक्, आचार्य, पुरोहित तथा श्रोत्रिय आदि ब्राह्मणों के लिए भूमिदान करे, किन्तु उनसे कर आदि न ले और उस भूमि को
७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
रूपदायकानि प्रयच्छेत् । अध्यक्षसङ्ख्यायकादिभ्यो गोपस्थानिकानीकस्थ-चिकित्साश्वदमकजङ्घाकरिकेभ्यश्च विक्रयाधानवर्जम् ।
(१) करदेभ्यः कृतक्षेत्राण्यैकपुरुषिकाणि प्रयच्छेत् । अकृतानि कर्तृभ्यो नादेयात् ।
(२) अकृषतामाच्छिद्यान्येभ्यः प्रयच्छेत् । ग्रामभृतकवैदेहका वा कृषेयुः । अकृषन्तोऽपहीनं दद्युः । धान्यपशुहिरण्यैश्चैनानुगृह्णीयात् । तान्यनु सुखेन दद्युः ।
(३) अनुग्रहपरिहारौ चैभ्यः कोशवृद्धिकरौ दद्यात् । कोशोपघातिकौ वर्जयेत् । अल्पकोशो हि राजा पौरजानपदानेव ग्रसते । निवेशसमकालं यथागतकं वा परिहारं दद्यात् । निवृत्तपरिहारान् पितेवानुगृह्णीयात् ।
वापिस भी न ले । इसी प्रकार विभागीय अध्यक्षों, संख्यायकों ( क्लर्कों ), गोपों ( दस-दस गाँवों के अधिकारियों ), स्थानिकों ( नगर के अधिकारियों ), अनीकस्थों ( हस्तिशिक्षकों ), वैद्यों, अश्वशिक्षकों और जंघाकरिकों ( दूर देश में जीविकोपार्जन करने वाले लोगों ) आदि अपने अधिकारियों, कर्मचारियों और प्रजाजनों के लिए भी राजा भूमि-दान करे । किन्तु इस प्रकार पायी हुई जमीन को बेचने या गिरवी रखने के लिए वर्जित कर दे ।
( १ ) खेती के उपयोगी जो भूमि लगान पर जिस भी किसान के नाम दर्ज की जाय, उसके मर जाने के बाद राजा को अधिकार है कि वह उस भूमि को मृतक किसान के पुत्र आदि को दे या न दे ।
( २ ) किंतु ऐसी ऊसर या बंजर जमीन जिसको किसान ने अपने श्रम से खेती योग्य बनाया है, राजा को चाहिए कि उसे कभी भी वापिस न ले, ऐसी जमीन पर किसानों को पूर्ण अधिकार प्राप्त होना चाहिए । यदि कोई किसान किसी खेती योग्य भूमि को बिना जोते-बोये परती ही डाले रहता है तो राजा को चाहिए कि ऐसे किसान से उस भूमि को छीन कर किसी जरूरतमंद दूसरे किसान को दे दे । ऐसे जरूरतमंद किसान के न मिलने पर गाँव का मुखिया या व्यापारी उस जमीन पर खेती करे । खेती करने की शर्त पर यदि कोई जमीन को ले और उसमें खेती न करे तो उससे उसका हर्जाना वसूल करना चाहिए । राजा को चाहिए कि वह अन्न, बीज, बैल और धन आदि देकर किसानों की सहायता करता रहे और किसानों को भी चाहिए कि फसल कट जाने पर सुविधानुसार धीरे-धीरे वे उधार ली हुई वस्तुओं को राजा को वापिस कर दें ।
( ३ ) किसानों की स्वास्थ्य-वृद्धि और रुग्णता-निवारण के लिए राजा उन्हें परिमित धन देता रहे, जिससे कि वे धन-धान्य की वृद्धि करके राजकोष को समृद्ध बनावें । किन्तु इस प्रकार की सहायता से यदि राजकोष को कोई हानि पहुँचे, तो
प्र० १७ : अ० १ ] जनपदों की स्थापना ७९
(१) आकरकर्मान्तद्रव्यहस्तिवनव्रजवणिक्पथप्रचारान्वारिस्थलपथपण्यपत्तनानि च निवेशयेत् ।
(२) सहोदकमाहार्योदकं वा सेतुं बन्धयेत् । अन्येषां वा बध्नतां भूमिमार्गवृक्षोपकरणानुग्रहं कुर्यात्; पुण्यस्थानारामाणां च सम्भूय सेतुबन्धादपक्रामतः कर्मकरबलीवर्दाः कर्म कुर्युः । व्ययकर्मणि च भागी स्यात् । न चांशं लभेत ।
(३) मत्स्यप्लवहरितपण्यानां सेतुषु राजा स्वाम्यं गच्छेत् । दासाहितकबन्धूननुशृण्वतो राजा विनयं ग्राहयेत् । बालवृद्धव्याधितव्यसन्यनाथांश्च राजा बिभृयात्; स्त्रियमप्रजातां प्रजातायाश्च पुत्रान् ।
राजा उसको बन्द कर दे; क्योंकि कोष के कम हो जाने पर राजा, नगर और जनपद-निवासियो को सताने लगता है । किसी नये कुल को बसाये जाने के लिए प्रतिज्ञात धन राजा को अवश्य देना चाहिए । अथवा राजकोष की आय के अनुसार स्वास्थ्य-सुधार के लिए राजा धन अवश्य खर्च करता रहे । यदि नगर और जनपद-निवासी राजा के द्वारा स्वास्थ्य-सुधार के लिए खर्च किए गए धन को चुका दें, तो पिता के समान राजा उन पर अनुग्रह करे ।
( १ ) राजा को चाहिए कि वह आकर ( खान ) से उत्पन्न सोना-चांदी आदि के विक्रय-स्थान, चंदन आदि उत्तम काष्ठ के बाजार, हाथियों के जंगल, पशुओं की वृद्धि के स्थान, आयात-निर्यात के स्थान, जल-थल के मार्ग और बड़े-बड़े बाजारों या बड़ी-बड़ी मंडियों की भी व्यवस्था कराये ।
( २ ) भूमि की सिंचाई के लिए राजा को चाहिए कि नदियों पर बड़े-बड़े बांध बँधवाये, अथवा वर्षा ऋतु के जल को भी बड़े-बड़े जलाशयों में भरवा दे । यदि प्रजाजन ऐसा कार्य करना चाहते हैं तो राजा को चाहिए कि उन्हें जलाशय के लिए भूमि, नहर के लिए रास्ता और आवश्यकतानुसार लकड़ी आदि सामान देकर उनका उपकार करे । देवालय और बाग-बगीचे आदि के लिए भी राजा, प्रजा की भूमिदान आदि से सहायता करे । गाँव के जो मनुष्य अन्य आवश्यक कार्यों के आ जाने पर उस सहकारी उद्योग में सम्मिलित न हो सकें तो वे अपने स्थान पर नौकर तथा बैल भेज कर सहयोग दें । यदि वे ऐसा भी न कर सकें तो अनुपात के अनुसार उनसे उनके हिस्से का सारा खर्च लिया जाय और कार्य समाप्त होने पर न तो उन्हें उसका साझीदार समझा जाय और न ही उसका लाभ उठाने दिया जाय ।
( ३ ) इस प्रकार के बड़े-बड़े जलाशयों में उत्पन्न होने वाली मछली, प्लव पक्षी ( बतख की भाँति एक जलचर पक्षी ) और कमलदंड आदि व्यापार-योग्य वस्तुओं पर राजा का ही अधिकार रहे । यदि नौकर-चाकर, भाई, पुत्र, आदि अपने मालिक की आज्ञा का उल्लंघन करें तो राजा उन्हें उचित शिक्षा दे । राजा को चाहिए कि
८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [दूसरा अधिकरण
८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [दूसरा अधिकरण
(१) बालद्रव्यं ग्रामवृद्धा वर्धयेयुराव्यवहारप्रापणात्; देवद्रव्यं च । (२) अपत्यदारान् मातापितरौ भ्रातॄनप्राप्तव्यवहारान्भगिनीः कन्या विधवाश्चाबिभ्रतः शक्तिमतो द्वादशपणो दण्डोऽन्यत्र पतितेभ्यः; अन्यत्र मातुः । (३) पुत्रदारमप्रतिविधाय प्रव्रजतः पूर्वः साहसदण्डः; स्त्रियं च प्रव्राजयतः । लुप्तव्यवायः प्रव्रजेदापृच्छय धर्मस्थान्, अन्यथा नियम्येत । (४) वानप्रस्थादन्यः प्रव्रजितभावः, सजातादन्यः सङ्घः, सामुत्थायकादन्यः समयानुबन्धो वा नास्य जनपदमपिनिविशेत । (५) न च तत्रारामा विहारार्थाः शालाः स्युः । नटनर्तनगायन-
वह बालक, वृद्ध, व्याधिग्रस्त, विपत्तिपीड़ित और अनाथ व्यक्तियों का भरण-पोषण करे । संतानहीन ( बन्ध्या ) और पुत्रवती अनाथ स्त्रियों तथा उनके बच्चों की भी राजा रक्षा करे ।
(१) नाबालिग बच्चे की सम्पत्ति पर गाँव के वृद्ध पुरुषों का अधिकार रहे । उसको वे बढ़ाते रहें और बालिग हो जाने पर उसकी सम्पत्ति को उसे वापिस कर दें । इसी प्रकार देव-सम्पत्ति पर भी ग्राम-वृद्धों का ही अधिकार हो, जो कि उसकी वृद्धि में तत्पर रहें ।
(२) जब कोई पुरुष समर्थ होने पर भी, अपने लड़के-बच्चों, स्त्रियों, माता-पिता, नाबालिग भाई, अविवाहित तथा विधवा बहिन आदि का भरण-पोषण न करे तो राजा उसे बारह पणों (सोने का सिक्का) का दंड दे । किन्तु ये लड़के, स्त्री आदि यदि किसी कारण से पतित हो गए हों तो सम्बन्धी उनका भरण-पोषण करने के लिए बाध्य नहीं हैं । यह निषेध माता के सम्बन्ध में नहीं, माता यदि पतिता भी हो गई हो तो उसका भरण-पोषण और उसकी रक्षा करनी चाहिए ।
(३) पुत्र तथा स्त्री के जीवन-निर्वाह का उचित प्रबन्ध किये बिना ही यदि कोई पुरुष, संन्यास ग्रहण कर ले तो राजा को उसे प्रथम साहस दंड देना चाहिए । यही दंड उस पुरुष को भी दिया जाना चाहिए जो अपनी स्त्री को संन्यासिनी हो जाने को प्रेरित करे । जब मनुष्य के मैथुन-सम्बन्धी कामविकार शांत हो जांय तब उसे धर्माधिकारी पुरुषों की अनुमति लेकर संन्यास आश्रम में प्रवेश करना चाहिए, इस राज्य-नियम का उल्लङ्घन करने वाले व्यक्ति को कारागार में बंद कर दिया जाय ।
(४) वानप्रस्थ के अतिरिक्त कोई दूसरा संन्यासी जनपद में न रहना चाहिए, इसी प्रकार राजभक्त जनसंघ के अतिरिक्त तथा स्थानीय सहकारी संस्थाओं के अतिरिक्त कोई दूसरी संस्था या दूसरा संघ राज्य में न पनपने पावे, जो द्रोह या फूट फैलाने वाला सिद्ध हो ।
(५) गाँवों में कोई भी नाट्यगृह, विहार तथा क्रीडा-शालाएँ नहीं होनी
प्र० १७ : अ० १ ] जनपदों की स्थापना ८१
वादकवाग्जीवनकुशीलवा वा न कर्मविघ्नं कुर्युः। निराश्रयत्वाद् ग्रामाणां क्षेत्राभिरतत्वाच्च पुरुषाणां कोशविष्टद्रव्यधान्यरसवृद्धिर्भवतीति ।
(१) परचक्राटवीग्रस्तं व्याधिदुर्भिक्षपीडितम् । देशं परिहरेद्राजा व्ययक्रीडाश्च वारयेत् ॥ (२) दण्डविष्टिकराबाधैः रक्षेदुपहतां कृषिम् । स्तेनव्यालविषग्राहैर्व्याधिभिश्च पशुव्रजान् ॥ (३) वल्लभैः कार्मिकैः स्तेनैरन्तपालैश्च पीडितम् । शोधयेत्पशुसङ्घैश्च क्षीयमाणं वणिक्पथम् ॥ (४) एवं द्रव्यद्विपवनं सेतुबन्धमथाकरान् । रक्षेत्पूर्वकृतान्राजा नवांश्चाभिप्रवर्तयेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे जनपदनिवेशः प्रथमोऽध्यायः;
आदितः एकविंशः ॥
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चाहिए। नट, नर्तक, गायक, वादक, भाण और कुशीलव आदि गाँवों में अपना खेल दिखा कर कृषि आदि कार्यों में विघ्न उत्पन्न न करें। क्योंकि गाँवों में नाट्यशालाएँ आदि न होने से ग्रामवासी अपने-अपने कृषिकर्म में संलग्न रहते हैं, जिससे कि राज-कोष की अभिवृद्धि होती है और सारा देश धन-धान्य से समृद्ध होता है ।
( १ ) राजा को चाहिए कि वह शत्रुओं, जंगली लोगों, व्याधियों एवं दुर्भिक्षों से अपने देश को बचावे। वह उन क्रीडाओं का भी बहिष्कार कराये जो धन का अप-व्यय और विलासप्रियता को बढ़ाने वाली हों ।
( २ ) राजा को चाहिए कि दंड, विष्टि ( बेगार ), कर ( टैक्स ) आदि की बाधा से कृषि की रक्षा करे । इसी प्रकार चोर, हिंसक जंतु, विष-प्रयोग तथा अन्य कष्टों से भी किसानों के पशुओं की रक्षा करे ।
( ३ ) वल्लभ ( राजप्रिय ), कार्मिक ( राज-कर वसूल करने वाले ), चोर, अंतपाल ( सीमारक्षक ) और व्याघ्र आदि, राजपुरुषों, लुटरों एवं हिंसक जंतुओं से ग्रस्त व्यापार-मार्गों का भी राजा परिशोधन करे। अर्थात् अपने देश से इन सब आपत्तियों को दूर करे ।
( ४ ) इस प्रकार राजा प्रथम तो लकड़ी के जंगल, हाथियों के जंगल, सेतुबन्ध तथा खानों की रक्षा करे और तदुपरान्त आवश्यकतानुसार नये जंगल, सेतुबंध आदि का निर्माण करवाये।
अध्यक्ष-प्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में प्रथम अध्याय समास ।
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६ कौ०
प्रकरण १८ अध्याय २
भूमिच्छिद्र-विधानम्
(१) अकृष्यायां भूमौ पशुभ्यो विवीतानि प्रयच्छेत् । प्रदिष्टाभयस्थावरजङ्गमानि च ब्राह्मणेभ्यो ब्रह्मसोमारण्यानि, तपोवनानि च तपस्विभ्यो गोरुतपराणि प्रयच्छेत् । तावन्मात्रमेकद्वारं खातगुप्तं स्वादुफलगुल्मगुच्छमकण्टकिद्रुममुत्तानतोयाशयं दान्तमृगचतुष्पदं भग्ननखदंष्ट्रव्यालं मार्गायुकहस्तिहस्तिनीकलभं मृगवनं विहारार्थं राज्ञः कारयेत् । (२) सर्वातिथिभृगं प्रत्यन्ते चान्यन्मृगवनं भूमिवशेन वा निवेशयेत् । (३) कुप्यप्रदिष्टानां च द्रव्याणामेकैकशो वा वनं निवेशयेत्; द्रव्यवनकर्मान्तानटवीश्च द्रव्यवनापाश्रयाः । (४) प्रत्यन्ते हस्तिवनमटव्यारक्ष्यं निवेशयेत् । नागवनाध्यक्षः पार्वतं
ऊसर भूमि को उपयोगी बनाने का विधान
(१) ऊसर भूमि में पशुओं के लिए चरागाहें बनवानी चाहिए। जिस भूमि को वृक्ष-लता एवं मृग आदि के लिए छोड़ दिया गया हो, ऐसे दो कोस तक फैल हुए जंगल को वेदाध्यायी ब्राह्मणों को वेदाध्ययन एवं सोमयाग के लिए दे देना चाहिए; इसी प्रकार के तपोवनों को तपस्वियों के लिए दे देना चाहिए । ऐसे ही दो कोस परिमाण के मृगवन को राजा अपने विहार के लिए तैयार कराये । उस विहारवन के दो दरवाजे हों, उसके चारों ओर खुदी हुई खाई हो, उसमें स्वादिष्ट फल, लता, गुल्म एवं वृक्ष हों, वह काँटेदार पेड़ों से रहित हो, उसमें कम गहरे सरोवर हों, मनुष्यों से परिचित मृग हो, मृगया के लिए वहाँ ऐसे व्याघ्र, हाथी, हथिनौ तथा उनके बच्चे रखे गये हों, जिनके नख एवं दाँत न हों ।
(२) उसके ही समीप एक दूसरा मृगवन ऐसा तैयार कराया जाय, जिसमें देश-देशांतरों के जानवर लाकर रखे गये हों ।
(३) कुप्याध्यक्ष प्रकरण में निर्दिष्ट चंदन, पलाश, अशोक आदि लकड़ी के लिए अलग-अलग वन बसाये जाँय । लकड़ी के जंगलों की सम्पूर्ण व्यवस्था, जंगलों के अध्यक्ष तथा जंगलों पर जीवन बिताने वाले पुरुष करें ।
(४) जनपद की सीमा पर जंगल के अध्यक्षों के संरक्षण में एक हस्तिवन भी स्थापित करना चाहिए । हस्तिवन के अध्यक्षों को आवश्यक है कि वे स्वयं तथा
प्र० १८ : अ० २ ] भूमि को उपयोगी बनाने का विधान ८३
नादेयं सारसमानूपं च नागवनं विदितपर्यन्तप्रवेशनिष्कासनं नागवनपालैः पालयेत् । हस्तिघातिनं हन्युः । दन्तयुगं स्वयं मृतस्याहरतः सपादचतुष्पणो लाभः ।
(१) नागवनपाला हस्तिपकपादपाशिकसैमिकवनचरकपार्किकर्मिक-सखाहस्तिमूत्रपुरीषच्छन्नगन्धा भल्लातकीशाखाप्रतिच्छन्नाः पञ्चभिः सप्त-भिर्वा हस्तिबन्धकीभिः सह चरन्तः शय्यास्थानपद्याण्डकूलपातोद्देशेन हस्तिकुलपर्यग्रं विद्युः ।
(२) यूथचरमेकचरं निर्यूथं यूथपतिं हस्तिनं व्यालं मत्तं पोतं बद्ध-मुक्तं च निबन्धेन विद्युः । अनीकस्थप्रमाणैः प्रशस्तव्याञ्जनाचारान्हस्तिनो गृह्णीयुः । हस्तिप्रधानो हि विजयो राज्ञाम् । परानीकव्यूहदुर्गस्कन्धावार-प्रमर्दना ह्यतिप्रमाणशरीराः प्राणहरकर्माणो हस्तिन इति ।
अपने सहयोगी वनपालों के सहयोग से पर्वत, नदी, जलाशय तथा किसी जलमय स्थान से होकर हस्तिवनों के अंदर जाने वाले मार्गों की भली-भाँति देख-रेख रखे । हाथियों को मारने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्राणदण्ड की सजा मिलनी चाहिए । मृतक हाथी के दाँतों को उखाड़कर जो स्वयं ही राजपुरुषों के सुपुर्द कर दे, उसे सवा चार पण पुरस्कार स्वरूप दिया जाना चाहिए ।
( १ ) हस्तिवन के रक्षकों को चाहिए कि वे हस्तिपक ( महावत ), पादपाशिक ( हाथियों को जाल में फँसाने वाला ), सैमिक ( सीमारक्षक ) वनचरक ( जंगली मनुष्य ) और पारिकर्मिक ( हाथियों की परिचर्या में निपुण ) आदि पुरुषों को साथ लेकर जंगल में हाथियों के समूह का पता लगायें । अपने साथ वे हाथी के मल-मूत्र के गंध के समान किसी वस्तु को, हाथियों को वश में करने वाली पाँच-सात हथिनियों को भी साथ में लेकर और स्वयं को भल्लातकी ( भिलावे ) की शाखा में छिपाये हुए, हाथियों के पड़ाव, उनके पैरों के निशान, उनके मल-मूत्र त्यागने की जगह और उनके द्वारा गिराये गए नदी-कगारों आदि का सुराग लेकर हस्तिसमूहों का पता लगायें ।
( २ ) झुंड के साथ घूमने वाले, अकेले विचरण करने वाले, झुंड से फूटे हुए, झुंडप्रमुख, दुष्टप्रकृति, उन्मत्त, शिशुहस्ति, बंधनमुक्त आदि हाथियों से संबंधित जितने भी विवरण हैं, उनकी जानकारी, हस्तिवनरक्षक अपनी गणनापुस्तक ( स्टाकबुक ) से प्राप्त करें । हस्तिविद्या में निपुण पुरुषों के निर्देशानुसार श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त हाथियों को ही पकड़ना चाहिए, क्योंकि हाथी ही राजा की विजय के प्रधान साधन हैं । भारी भरकम हाथी ही शत्रुसेना, उसकी व्यूह-रचना, उसके दुर्ग तथा उसकी छावनियों को कुचलने वाले और उसके प्राणों तक को ले लेने वाले होते हैं ।
८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) कलिङ्गाङ्गगजाः श्रेष्ठाः प्राच्याश्चेति करूशजाः ।
दाशार्णाश्चापरान्ताश्च द्विपानां मध्यमा मताः ॥
(२) सौराष्ट्रकाः पाञ्चनदाः तेषां प्रत्यवरा स्मृताः ।
सर्वेषां कर्मणा वीर्यं जवस्तेजश्च वर्धते ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे भूमिच्छिद्रविधानं द्वितीयोऽध्यायः;
आदितो द्वाविंशः ॥
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( १ ) कलिंग, अंग और पूर्वीय करूश देश के हाथी सर्वोत्तम गिने जाते हैं । दशार्ण तथा पश्चिम देश के हाथी मध्यम माने जाते हैं ।
( २ ) गुजरात और पंजाब के हाथी अधम कहे जाते हैं । इस पर भी, प्रत्येक हाथी के बल, विक्रम, वेग और तेज का संवर्धन आदि उसको दी जाने वाली समुचित शिक्षा पर निर्भर है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में दूसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण १९ | # दुर्गविधानम् |
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| अध्याय ३ |
(१) चतुर्दिशं जनपदान्ते साम्परायिकं दैवकृतं दुर्गं कारयेत्; अन्तर्द्वीपं स्थलं वा निम्नावरुद्धमौदकं, प्रास्तरं गुहां वा पार्वतं, निरुदकस्तम्बमिरिणं वा धान्वनं, खञ्जनोदकं स्तम्भ गहनं वा वनदुर्गम् । तेषां नदीपर्वतदुर्गं जनपदारक्षस्थानं धान्वनवनदुर्गमटवीस्थानम् आपद्यपसारो वा । (२) जनपदमध्ये समुदयस्थानं स्थानीयं निवेशयेद् । वास्तुकप्रशस्ते देशे नदीसङ्गमे हृदस्य वा विशोषस्याङ्के सरसस्तटाकस्य वा वृत्तं दीर्घं चतुरश्रं वा वास्तुकवशेन प्रदक्षिणोदकं पण्यपुटभेदनमंसवारिपथाभ्यामुपेतम् । तस्य परिखास्तिस्रो दण्डान्तराः कारयेत् । चतुर्दश द्वादश दशेति
दुर्गों का निर्माण
(१) जनपद-सीमाओं की चारों दिशाओं में राजा युद्धोचित प्राकृतिक दुर्ग का निर्माण करवाये । दुर्ग चार प्रकार के हैं—१. औदक २. पार्वत ३. धान्वन और ४. वनदुर्ग । चारों ओर पानी से घिरा हुआ टापू के समान गहरे तालाबों से आवृत स्थल-प्रदेश औदकदुर्ग कहलाता है । बड़ी-बड़ी चट्टानों अथवा पर्वत की कन्दराओं के रूप में निर्मित दुर्ग पार्वतदुर्ग कहलाता है । जल तथा घास आदि से रहित अथवा सर्वथा ऊसर भूमि में निर्मित दुर्ग धान्वनदुर्ग है । इसी प्रकार चारों ओर दलदल से घिरा हुआ अथवा कांटेदार सघन झाड़ियों से परिवृत दुर्ग वनदुर्ग कहलाता है । इनमें औदक तथा पार्वतदुर्ग आपत्तिकाल में जनपद की रक्षा के उपयोग में लाये जाते हैं । धान्वन और वनदुर्ग वनपालों की रक्षा के लिए उपयोगी होते हैं । अथवा आपत्ति के समय इन दुर्गों में भागकर राजा भी अपनी रक्षा कर सकता है ।
(२) राजा को चाहिए कि धनोत्पादन के मुख्य केन्द्र बड़े-बड़े स्थानीय नगरों का निर्माण करवाये । वास्तुविद्या के विद्वान् जिस प्रदेश को श्रेष्ठ बतायें, वहीं पर नगर बसाना चाहिए, अथवा किसी नदी के संगम पर, बड़े-बड़े तालाबों के किनारे, या कमलयुक्त जलाशयों के तट पर भी नगर बसाये जा सकते हैं । नगर का निर्माण संबंधित भूमि के अनुसार गोल, लंबा अथवा चौकोर, जैसा भी उचित हो, होना चाहिए । उसके चारों ओर छोटी-छोटी नहरों द्वारा पानी का प्रबन्ध अवश्य रहे । उसके इधर-उधर की भूमि में पैदा होने वाली बिक्री योग्य वस्तुओं का संग्रह तथा उनके विक्रय
८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
दण्डान् विस्तीर्णाः विस्तारादवगाधाः पादोनमर्धं वा त्रिभागमूला मूले चतुरश्राः पाषाणोपहिताः पाषाणेष्टकावद्धपार्श्वा वा तोयान्तिकीरागन्तु-तोयपूर्णा वा सपरवाहाः पद्मग्राहवतीः ।
(१) चतुर्दण्डावकृष्ट परिखायाः षड्दण्डोच्छ्रितमवरुद्धं तद्विगुण-विष्कम्भं खाताद्वप्रं कारयेत्; ऊर्ध्वचयं मञ्चपृष्ठं कुम्भकुक्षिकं वा हस्ति-भिर्गोभिश्च क्षुण्णं कण्टकिगुल्मविषवल्लीप्रतानवन्तम् । पांसुशेषेण वास्तु-च्छिद्रं वा पूरयेत् ।
(२) वप्रस्योपरि प्राकारं विष्कम्भद्विगुणोत्सेधमैष्टकं द्वादशहस्ता-दूर्ध्वमोजं युग्मं वा आचतुर्विंशतिहस्तादिति कारयेत् । रथचर्यासञ्चारं
का प्रबन्ध भी वहाँ होना चाहिए। नगर में आने-जाने के लिए जलमार्ग और स्थल-मार्ग दोनों की सुविधा होनी चाहिए। नगर के चारों ओर एक-एक दंड (चार हाथ) की दूरी पर तीन खाइयाँ खुदवानी चाहिए। वे खाइयाँ क्रमशः चौदह, बारह और दस दंड चौड़ी होनी चाहिए। जितनी वे चौड़ी हो उससे चौथाई अथवा आधी गहरी होनी चाहिए। अथवा चौड़ाई का तीसरा हिस्सा गहरी भी हो सकती है। उन खाइयों की तलहटी बराबर चौरस एवं मजबूत पत्थरों से बँधी हो। उनकी दीवारें पत्थर अथवा ईंटों से मजबूत बनी हुई हों। कहीं-कहीं खाइयाँ इतनी कम गहरी हों कि जहाँ से जल बाहर की ओर छलकने लगे अथवा किसी नदी के जल से इन्हें भरा जा सके। उनमें जल के निकलने का मार्ग अवश्य रहना चाहिए। कमल के फूल तथा घड़ियाल आदि जलचर भी उनमें रहें।
(१) खाई से चार दंड की दूरी पर छह दण्ड ऊँचा, सब ओर से मजबूत और ऊपर की चौड़ाई से दुगुनी नींव वाला एक बड़ा वप्र (प्राकार या फसील) बनवाया जाय। इसके बनवाने में वही मिट्टी काम में लाई जाय, जो खाई से खोदकर बाहर फेंकी गई है। प्राकार (वप्र) तीन प्रकार का होना चाहिए—१. ऊर्ध्वचय, २. मञ्चपृष्ठ और ३. कुम्भकुक्षिक, अर्थात् क्रमशः ऊपर पतला, नीचे चपटा और बीच में कुम्भाकार। इन प्राकारों को बनवाते समय, इनकी मिट्टी को हाथी और बैलों से अच्छी तरह रौंदवाना चाहिए, जिससे कि मिट्टी बैठकर मजबूत हो जाय। इनके चारों ओर कांटेदार विषैली झाड़ियाँ लगी होनी चाहिए। प्राकार बन जाने पर यदि मिट्टी बची रह जाय तो उसे उन्हीं गड्ढों में भर देना चाहिए, जहाँ से उसको खोदा गया है, अथवा उस अवशिष्ट मिट्टी से, प्राकार के जो छिद्र रह गए हों, उन्हें भरवा देना चाहिए।
(२) वप्र बन जाने पर उसके ऊपर दीवार बनवानी चाहिए। वह दीवार चौड़ाई से दुगुनी ऊँची हो, कम-से-कम बारह हाथ से लेकर चौदह, सोलह, अठारह
प्र० १९ : अ० ३ ] दुर्गों का निर्माण ८७
तालमूलमुरजकैः कपिशीर्षकैश्चाचिताग्रं पृथुशिलासंहितं वा शैलं कारयेत्; न त्वेव काष्ठमयम् । अग्निरवहितो हि तस्मिन्वसति । (१) विष्कम्भचतुरश्रमट्टालकमुत्सेधसमावक्षेपसोपानं कारयेत्, त्रिंशद्दण्डान्तरं च । (२) द्वयोरट्टालकयोर्मध्ये सहर्म्यद्वितलामध्यर्धायामां प्रतोलीं कारयेत् । (३) अट्टालकप्रतोलीमध्ये त्रिधानुष्काधिष्ठानं सापिधानच्छिद्रफलक-संहितमतीन्द्रकोशं कारयेत् । (४) अन्तरेषु द्विहस्तविष्कम्भं पार्श्वे चतुर्गुणायाममनुप्राकारम् अष्टहस्तायतं देवपथं कारयेत् । (५) दण्डान्तरा द्विदण्डान्तरा वाचार्याः कारयेद्; अग्राह्ये देशे प्रधावितिकां निष्कुहद्वारं च ।
सम संख्याओं में, अथवा पन्द्रह, सत्रह आदि विषम संख्याओं में, अधिक-से अधिक चौबीस हाथ तक ऊँची होनी चाहिए । प्राकार का ऊपरी भाग इतना चौड़ा होना चाहिए जिस पर एक रथ आसानी से चलाया जा सके । ताड़ वृक्ष की जड़ के समान, मृदंग बाजे के समान, बंदर की खोपड़ी के समान आकार वाले ईंट-पत्थरों की कंकरीटों से अथवा बड़े-बड़े शिलाखंडों से प्राकार का निर्माण करवाना चाहिए । लकड़ी का प्राकार कभी भी न बनवाना चाहिए, क्योंकि उसमें सदा आग लगने का भय बना रहता है ।
( १ ) प्राकार के आगे एक ऐसी अट्टालिका बनवाये जिसकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई प्राकार के बराबर हो । ऊँचाई के अनुपात से उस पर सीढ़ियाँ भी बनवानी चाहिए । ये अट्टालिकाएँ एक-दूसरी से तीस दंड की दूरी पर हों ।
( २ ) दो अट्टालिकाओं के बीच, चौड़ाई से डेढ़गुना लम्बा प्रतोली नाम का एक घर बनवाना चाहिए, जिसकी दूसरी मंजिल में जनानखाना रहे ।
( ३ ) अट्टालिका और प्रतोली के बीच में इन्द्रकोष नामक एक विशिष्ट स्थान बनवाया जाय । वह इतना ही बड़ा हो जिसमें तीन धनुर्धारी संतरी आसानी से बैठ सकें । उसके आगे छिद्रयुक्त एक ऐसा तख्ता लगा रहना चाहिए, जिससे धनुर्धारी बाहर की वस्तु देख सकें और भीतर से ही निशाना बाँध सकें, किन्तु बाहर के लोग उन्हें न देख सकें ।
( ४ ) प्राकार के साथ ही एक ऐसा देवपथ ( गुप्तमार्ग या सुरंग ) बनवाना चाहिए जो अट्टालक, प्रतोली तथा इन्द्रकोष के बीच में दो हाथ चौड़ा और प्राकार के पास आठ हाथ चौड़ा हो ।
( ५ ) इसी प्रकार एक दंड या दो दंड की दूरी पर चार्या अर्थात् प्राकार आदि पर चढ़ने उतरने का स्थान बनवाना चाहिए । प्राकार के ऊपर ही जिस स्थान को
८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) बहिर्जानुभञ्जनीत्रिशूलप्रकरकूपकूटावपातकण्टकप्रतिसराहि-पृष्ठतालपत्रशृङ्गाटकश्वदंष्ट्रार्गलोपस्कन्दनपादुकाम्बरीषोदपानकैः छन्नपथं कारयेत् । (२) प्राकारमुभयतो मण्डपकमध्यर्धदण्डं कृत्वा प्रतोलीषट्तलान्तरं द्वारं निवेशयेत्; पञ्चदण्डादेकोत्तरवृद्ध्याष्टदण्डादिति चतुरश्रम् । द्विदण्डं वा । षड्भागमायामादधिकमष्टभागं वा । (३) पञ्चदशहस्तादेकोत्तरमष्टादशहस्तादिति तुलोत्सेधः । (४) स्तम्भस्य परिक्षेपाः षडायामा द्विगुणो निखातः चूलिकायाश्चतुर्भागः । (५) आदितलस्य पञ्च भागाः शाला वापी सीमागृहं च । दशभागिकौ
कोई न देख सके, प्रधावितिका तथा उसके पास ही निष्कुहद्वार भी बनवाने चाहिए। बाहर से छोड़े गये बाण आदि से सुरक्षित रहने के लिए छिपने योग्य आड़ को प्रधावितिका कहते हैं। उसमें निशाना मारने के लिए जो छिद्र बनाया जाता है, उसको निष्कुहद्वार कहा जाता है।
(१) प्राकार की बाहरी भूमि में शत्रुओं के घुटनों को तोड़ देने वाले खूंटे, त्रिशूल, अँधेरे गड्ढे, लौह-कंटक के ढेर, साँप के काँटे, ताड़पत्रों के समान बने हुए लोहे के जाल, तीन नोकवाले नुकीले काँटे, कुत्ते की दाढ़ के समान लोहे की तीक्ष्ण कीलें, बड़े-बड़े लट्ठे, कीचड़ से भरे हुए गढ़े, आग और जहरीले पानी के गढ़े आदि बनाकर दुर्ग के मार्ग को पाट देना चाहिए।
(२) जिस स्थान पर किले का दरवाजा बनवाना हो, वहाँ पहिले प्राकार के दोनों भागों में डेढ़ दण्ड लम्बा-चौड़ा मण्डप (चबूतरा) बनाया जाय। तदनन्तर उसके ऊपर प्रतोली के समान छह खम्भे खड़े करके द्वार का निर्माण करवाया जाय। द्वार का निर्माण पाँच दंड परिधि से करना चाहिए, और तदनन्तर एक-एक दंड बढ़ाते हुए अधिक से अधिक आठ दंड तक उसकी परिधि होनी चाहिए; अथवा, कुछ विद्वानों के मत से दरवाजा दो दंड का हो। या नीचे के आधार के परिमाण से छठा तथा आठवाँ हिस्सा अधिक ऊपर का दरवाजा बनवाया जाय।
(३) दरवाजे के खम्भों की ऊँचाई पन्द्रह हाथ से लेकर अठारह हाथ तक होनी चाहिए।
(४) खम्भों की मोटाई उसकी ऊँचाई से छठा हिस्सा होनी चाहिए। मोटाई से दुगुना भाग भूमि में गाड़ दिया जावे और चौथाई भाग खम्भे के ऊपर चूल के लिए छोड़ दिया जावे।
(५) प्रतोलीका के तीन तल्लों में से पहिले तल्ले के पाँच हिस्से किए जाँय।
प्र० १९ : अ० ३ ] दुर्गों का निर्माण ८९
समत्तवारणौ द्वौ प्रतिमञ्चौ अन्तरम् आणिः । हर्म्यं च समुच्छ्रायादर्धतलं स्थूणावबन्धश्च । आध्र्वास्तुकमुत्तमागारं त्रिभागान्तरं वा, इष्टकावबद्धपार्श्व, वामतः प्रदक्षिणसोपानं गूढभित्तिसोपानमितरतः । (१) द्विहस्तं तोरणशिरः, त्रिपञ्चभागिकौ द्वौ कवाटयोगौ, द्वौ द्वौ परिघौ, अरत्निरिन्द्रकीलः, पञ्चहस्तमणिद्वारं, चत्वारो हस्तिपरिघाः । (२) निवेशार्धं हस्तिनखः मुखसमः । संक्रमोऽसंहार्यो वा भूमिमयो वा निरुदके । (३) प्राकारसमं मुखमवस्थाप्य त्रिभागगोधामुखं गोपुरं कारयेत्; प्राकारमध्ये कृत्वा वापीं पुष्करिणीद्वारं, चतुःशालमध्यर्धान्तराणि कं
उनमें से बीच के हिस्से में बावड़ी बनवाई जाय, उसके दायें-बायें शाला और शाला के छोरों पर सीमागृह बनवाये जाँय । शाला के किनारों पर भी आमने-सामने छोटे-छोटे दो चबूतरे बनवाये जाँय जिन पर बुर्जे भी हों । शाला और सीमागृह के बीच में आणि ( एक छोटा दरवाजा ) होना चाहिए । मकान की दूसरी मंजिल की ऊँचाई पहिली मंजिल की ऊँचाई से आधी होनी चाहिए, उसकी छत के नीचे सहारे के लिए छोटे-छोटे खंभे भी होने चाहिए । मकान की तीसरी मंजिल को उत्तमागार कहते हैं, उसकी ऊँचाई डेढ़ दंड होनी चाहिए । उत्तमागार परिमाण द्वार का तृतीयांश होना चाहिए । उसके पार्श्व भाग पक्की ईंटों से मजबूत होने चाहिए । उसकी बाईं ओर घुमावदार सीढ़ियाँ और दाहिनी ओर गुप्त सीढ़ियाँ होनी चाहिए ।
( १ ) किले के दरवाजे का ऊपरी बुर्ज दो हाथ लम्बा होना चाहिए । दोनों फाटक तीन या पाँच तख्तों की पर्त के बने हों । किवाड़ों के पीछे दो-दो अर्गलाएँ होनी चाहिए । किवाड़ों को बन्द करने के लिए एक अरत्नी परिमाण ( एक हाथ ) की इन्द्रकील ( चटखनी ) होनी चाहिए । फाटक के बीच में पाँच हाथ का एक छोटा सा दरवाजा जुड़ा होना चाहिए । पूरा दरवाजा इतना बड़ा होना चाहिए कि जिसमें चार हाथी एक साथ प्रवेश कर सकें ।
( २ ) द्वार की ऊँचाई का आधा, हाथी के नाखून के आकार-प्रकार का, मजबूत लकड़ी का बना हुआ ऐसा मार्ग होना चाहिए जिससे यथा अवसर किले में टहला जा सके । जहाँ जल का अभाव हो वहाँ मिट्टी का ही मार्ग बनवाना चाहिए ।
( ३ ) प्राकार की ऊँचाई जितना किंतु उसके तृतीयांश जितना, गोह के मुँह के आकार का एक नगरद्वार भी बनवाना चाहिए । प्राकार के बीच में एक बावड़ी बनाकर उससे संबद्ध एक द्वार भी बनवाये । उस द्वार को पुष्करिणी कहते हैं । जिस दरवाजे के आसपास चार शालाएँ बनाई जाँय और उस दरवाजे में पुष्करिणी द्वार से ड्योढ़ा दरवाजा लगा हो । उसका नाम कुमारीपुरद्वार है । जो दरवाजा
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में तीसरा अध्याय समाप्त ।
९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
कुमारीपुरं, मुण्डहर्म्यं द्वितलं मुण्डकद्वारं, भूमिद्रव्यवशेन वा। त्रिभागा- धिकायामा भाण्डवाहिनीः कुल्याः कारयेत् । (१) तासु पाषाणकुद्दालकुठारीकाण्डकल्पनाः । मुसुण्डिमुद्गरा दण्डचक्रयन्त्रशतघ्नयः ॥ कार्याः कार्मारिकाः शूला वेधनाग्राश्च वेणवः । उष्ट्रग्रीव्योऽग्निसंयोगाः कुप्यकल्पे च यो विधिः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे दुर्गविधानं नाम तृतीयोध्यायः; आदितस्त्रयोविंशः ॥
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दुमंजिला हो एवं जिस पर कंगूरे आदि न लगे हों, उसे मुण्डकद्वार कहते हैं । इस प्रकार राजा अपनी भूमि और संपत्ति के अनुसार जैसा उचित समझे, कुछ परिवर्तन करके दरवाजों को बनवाये । किले के अन्दर की नहरें सामान्य नहरों से तिगुनी चौड़ी बनवाये, जिनके द्वारा हर प्रकार का सामान अन्दर और बाहर ले जाया-लाया जा सके ।
( १ ) पत्थर, कुदाली, कुल्हाड़ी, बाण, हाथियों का सामान, गदा, मुद्गर, लाठी, चक्र, मशीनें, तोपें, लोहारों के औजार, लोहे का बना सामान, नुकीले भाले, बाँस, ऊँट की गर्दन के आकार वाले हथियार, अग्निबाण आदि सामान नहर के द्वारा लाया और ले जाया जाता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में तीसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण २० | |
|---|---|
| अध्याय ४ | # दुर्गनिवेशः |
(१) त्रयः प्राचीना राजमार्गास्त्रय उदीचीना इति वास्तुविभागः। स द्वादशद्वारो युक्तोदकभूमिच्छन्नपथः। (२) चतुर्दण्डान्तरा रथ्याः। राजमार्गद्रोणमुखस्थानीयराष्ट्रविवीतपथाः संयानीयव्यूहश्मशानग्रामपथाश्चाष्टदण्डाः। चतुर्दण्डः सेतुवनपथः। द्विदण्डो हस्तिक्षेत्रपथः। पञ्चारत्नयो रथपथश्चत्वारः पशुपथो द्वौ क्षुद्रपशुमनुष्यपथः। (३) प्रवीरे वास्तुनि राजनिवेशश्चातुर्वर्ण्यसमाजीवे। वास्तुहृदयादुत्तरे नवभागे यथोक्तविधानमन्तःपुरं प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वा कारयेत्। तस्य
दुर्ग से संबंधित राजभवनों तथा नगर के प्रमुख स्थानों का निर्माण
( १ ) वास्तुविद्याविशेषज्ञों के निर्देशानुसार जिस भूमि को नगर-निर्माण के लिए चुना जाय उसमें पूरब से पश्चिम की ओर और उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाले तीन-तीन राजमार्ग हों। इन छह राजमार्गों में नगर-निर्माण या गृह-निर्माण की भूमि का विभाग करना चाहिए। चारों दिशाओं में कुल मिलाकर बारह द्वार हों, जिसमें जल, थल तथा गुप्त मार्ग बने हों।
( २ ) नगर में चार दण्ड ( २४ फीट ) चौड़ी रथ्याएँ ( छोटी गलियाँ ) हों। राजमार्ग, द्रोणमुख ( चार सौ गाँवों का मुख्य केन्द्र ), स्थानीय ( आठ सौ गाँवों का मुख्य केन्द्र ) राष्ट्र, चरागाह, संयानीय ( व्यापारी मंडियाँ ), सैनिक छावनियाँ, श्मशान और गाँवों की ओर जाने वाली सभी सड़कों की चौड़ाई आठ दण्ड ( १६ गज ) होनी चाहिये। जलाशयों तथा जंगलों की ओर जाने वाली सड़कों की चौड़ाई चार दंड होनी चाहिये। हाथियों के आने-जाने का मार्ग और खेतों को जाने वाला रास्ता दो दंड चौड़ा होना चाहिये। रथों के लिए पाँच अरत्नि ( ढाई गज ) और पशुओं के चलने का रास्ता दो गज चौड़ा होना चाहिये। मनुष्य तथा भेड़-बकरी आदि छोटे पशुओं के लिए एक गज चौड़ा रास्ता होना चाहिए।
( ३ ) नगर के सुदृढ़ भूमिभाग में राजभवनों का निर्माण कराना चाहिए; साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह भूमि चारों वर्णों की आजीविका के लिए