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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम · उक्तश्चायमर्थो यन्माध्यमिकादिवाग्व्यवहाराणां स्वरूपापलापो न शक्यत इति । अथ मन्यसे कथकवाग्व्यवहारं प्रति हेतुत्वात् प्रमाणादीनां सत्त्वम्, सत्त्वाच्चाभ्युपगमः, यत्सत् तदभ्युपगम्यते इति स्थितेरिति । मैवम्; कयापि नियमस्थित्या प्रवृत्तायां कथायां कथकवाग्व्यवहारं प्रति हेतुत्वात् प्रमाणादीनां सत्त्वं सत्त्वाच्चाभ्युपगमो भवता प्रसाध्यः । कथातः पूर्वं तत्त्वावधारणं वा परपराजयं वाऽभिलषद्भ्यां कथकाभ्यां यावता विनाऽभिलषितं न पर्यवस्यति, तावदनुगोढव्यम् । तच्च १व्यवहारनियमसमयबन्धादेव द्वाभ्यामपि ताभ्यां सम्भाव्यते इति व्यवहारनियमसमयमेव बध्नीतः । प्रमाणादि को न मानने पर निवृत्त हो जाती। परन्तु ऐसा नहीं होता, क्योंकि ऐसा मानें तो कारण के न होने से प्रमाणादि को न माननेवालों के वाग्व्यवहार के स्वरूप की ही निष्पत्ति, न होगी। यह बात तो हमने कह ही दी है कि माध्यमिकादि के वाग्व्यवहार के स्वरूप का अपलाप नहीं किया जा सकता। समर्थन —वाग्व्यवहार के हेतु होने से प्रमाणादि सत्य हैं और सत्य होने से स्वीकार के योग्य हैं, क्योंकि जो सत्य होते हैं वे माने जाते हैं, ऐसी लोक की स्थिति है। खण्डन—इस युक्ति से भी प्रमाणादि-स्वीकार सिद्ध हुआ, प्रस्तुत (प्रमाणादि- स्वीकार का शास्त्रार्थ-हेतुत्व) सिद्ध नहीं हुआ। किञ्च, आप किसी नियम से प्रवृत्त कथा में वाग्व्यवहारके कारण होने से प्रमाणादि के सत्यत्व को और सत्यत्व होने से प्रमाणादि के स्वीकार को साधेंगे। यदि ऐसा है तो जिस कथा में प्रमाणादि की सत्ता को सिद्ध करेंगे, उसीमें व्यभिचार होने से अथवा उसीके तुल्य अन्य कथा के भी निर्वाह होने से प्रमाणादि-स्वीकार कथा का हेतु सिद्ध नहीं हुआ। कथा के आरम्भ से पूर्व जितने के बिना तत्त्व-निश्चय या वादि-पराजयस्वरूप अभिलषित फल की सिद्धि न हो, उतना ही दोनों को मानना चाहिए। अभिलषित फल की सिद्धि (व्यवहार-नियम से समयबन्ध=प्रतिज्ञारूप बन्धन से ही) कथाप्रवृत्ति से हो सकती है। इससे दोनों व्यवहार-नियम से प्रतिज्ञारूप बन्धन को स्वीकार करते हैं। १ व्यवहारः = वाग्व्यवहारः शास्त्रार्थं इति यावत्, तस्य प्रयोजका नियमाः प्रमाणैर्व्यवहर्त- व्यमित्यादिरूपाः, तैः समयस्य = प्रतिज्ञायाः, 'इमान् नियमान् पालयिष्यामः' इत्यादिरूपायाः, बन्धनम् = करणम् ।

परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्त्व-खण्डन ६

स च 'प्रमाणेन तर्केण च व्यवहर्तव्यं वादिना । प्रतिवादिनाऽपि कथाङ्गतत्त्व- ज्ञानविपर्ययलिङ्गप्रतिज्ञाहान्याद्यन्यतम निग्रहस्थानं तस्य दर्शनीयम् । तद्व्युत्पादने प्रथमस्य भङ्गो व्यवहर्त्तव्यः । अन्यथा तु द्वितीयस्यैव । तादृशेतरौ जेतृतया व्यवहर्त्तव्यौ । प्रामाणिकः पक्षस्तात्त्विकतया व्यवहर्त्तव्यः' इत्यादिरूपः । अत एव व्यवहारनियमसमयबन्धेऽपि हेतुर्वक्तव्यः । तथा च सोऽपि कथायां प्रवृत्तायामभिधातुं युक्त इति प्रमाणसत्त्वहेत्वभिधानवत् प्रत्यवस्थानमनवकाशम् । द्वाभ्यामपि वादिभ्यां विचारप्रवृत्त्या अभिलष्यमाणतत्त्वव्यवस्थाजयमूलत्वेन व्यवहारनियमस्य स्वेच्छयैव परिगृहीतत्वात् । न चैवं प्रमाणानुपज्ञस्वेच्छामात्रपरिगृहीतमूलत्वात् मूलापरिशुद्धिसम्भवेन सर्वविचारविचार्यफलविप्लुवापत्तिः स्यात् , १अविद्याविद्यमानाऽनादिपारम्पर्या- यातस्य लोकव्युत्पत्तिगृहीतसंवादस्य च तस्य अन्यथाभावासम्भाव्यतालक्षणस्वतः- सिद्धपरिशुद्धित्वात् । वह समय-बन्ध निम्नलिखित रूप है—वादी को प्रमाण तथा तर्क से स्वपक्ष की सिद्धि करनी चाहिए और प्रतिवादी को कथाङ्ग तत्त्वज्ञान के विपर्यय ( अज्ञान वा अतत्त्वज्ञान ) के हेतुभूत प्रतिज्ञाहानि आदि निग्रहस्थान दिखलाने चाहिए । यदि प्रतिवादी निग्रह-स्थान का समर्थन कर सके, तो वादी की पराजय होगी और यदि न कर सके, तो उसकी पराजय होगी । पराजित से अन्य जेता कहलायेगा । प्रमाण- युक्त पक्ष यथार्थ माना जायगा । शंका—व्यवहार-नियम शास्त्रार्थ का कारण है, इसका साधन भी शास्त्रार्थ में ही होगा । तब तो जिस शास्त्रार्थ में उसकी सिद्धि होगी, उसीमें व्यभिचार होने तथा उसीके तुल्य अन्य शास्त्रार्थ का भी निर्वाह होने से व्यवहार-नियम भी शास्त्रार्थ का अङ्ग सिद्ध नहीं होगा । खंडन—विचार ( शास्त्रार्थ ) की प्रवृत्ति से अभिलषित तत्त्वज्ञान और विजयरूप फल का कारण होने से वादी और प्रतिवादी दोनों अपनी इच्छा से समय-बन्ध को कारण मान लेते हैं । शंका—जब आप समय-बन्ध को प्रमाण के बिना स्वेच्छामात्र से ही विचार या शास्त्रार्थ का कारण मान लेते हैं, तो उसका मूल परिशुद्ध ( प्रमाणसिद्ध ) नहीं रहा । फलतः शास्त्रार्थ, उससे विचारणीय तत्त्व और. फल ( विजयादि ) सिद्ध नहीं होंगे । तब तो वादी भी स्वेच्छा से यह नियम बना सकता है कि ' 'हुँ फट्' का उच्चारण भी १ अविद्यमानानादिपारम्पर्यायातस्येति विद्यासागरीसम्मतः पाठः । स एवानुसृतः ।

१२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रमाणानामनादाय न पर्यवस्यति । दूषणानां चास्तित्वेन भङ्गावधारणनियम- बन्धने साधनाङ्गव्याप्त्यादीनां सत्त्वेन तद्विषयस्य तत्त्वरूपताव्यवहारनियमनादौ च कण्ठोक्तमेव तस्य तस्य सत्त्वमङ्गीकृतमिति रिक्तमिदमुच्यते प्रमाणादीनां सत्तामनभ्युपगम्य कथारम्भः शक्यत इति । मैवम् ; एभिरपि बाधकैः कथायामारब्धायामेव अभिमतस्य प्रसाधनीयत्वे पूर्वोक्तबाधायां अनिस्तारात् । न च व्यवहारनियमस्य स्वेच्छास्वीकृतस्यैव प्रमाणादिसत्तास्वीकारपर्यवसायितया नायं दोषः स्यात् । यतः सत्ताज्ञानस्य तत्राङ्गत्वम् , नतु सत्तायाः । तत्र किं सत्तावगममात्रात् सत्ताऽभ्युपगम्येति मन्यसे, अबाधितात् तदवगमाद्वा ? न तावदाद्यः, मरुमरीचिकादौ जलरूपतासद्भावाभ्युपगमप्रसङ्गात् । द्वितीयेऽपि किं वादिप्रतिवादिमध्यस्थमात्रस्य तस्यापि कथाकालमात्र एव यह नियम-बन्ध भी नहीं हो सकता । ऐसे ही दूषण के रहने पर पराजय के अवधारण ( निश्चय ) रूप नियम में और साधनाङ्ग व्याप्ति के सत्त्व से साध्यसत्यत्वा- वधारणरूप नियम में प्रमाण-दूषण-व्याप्ति आदि के सत्त्व का साक्षात् कण्ठ से ही अङ्गीकार किया है । अतः प्रमाण आदि को न मानकर कथारम्भ हो सकता है, यह कथन युक्तिशून्य है । खंडन—इन बाधक युक्तियों से भी कथा का आरम्भ होने पर ही अभिलषित ( प्रमाणादि-स्वीकार की कथाङ्गता ) की सिद्धि हो जायगी । अतः पीछे कहे दोषों का निवारण नहीं हुआ । अर्थात् जिस कथा में प्रमाणादि-सत्ता सिद्ध हुई है, उसीमें व्यभिचार होने और वैसे ही अन्य कथा के भी निर्वाह होने से प्रमाणादि-स्वीकार कथाङ्ग नहीं है । समर्थन—हम किसी कथा में प्रमाणादि-स्वीकार की कथाङ्गता को सिद्ध नहीं करते; किन्तु अपनी इच्छा से स्वीकृत व्यवहार-नियम ही प्रमाणादि-स्वीकार में पर्यवसित ( प्राप्त ) हो जाता है, यह आपसे कहते हैं । खंडन—उक्त प्रकार से भी प्रमाणादि-सत्ता का ज्ञान ही कथाङ्ग हुआ, सत्ता नहीं । समर्थन—यदि प्रमाणादि-ज्ञान कथाङ्ग हुआ, तो उस ज्ञान का विषय होने से प्रमाणादि-सत्ता भी कथाङ्ग हो ही गयी । खंडन—आप प्रमाणादि-ज्ञानमात्र से प्रमाणादि को स्वीकार करते हैं या अबाधित प्रमाणादि के ज्ञान से ? इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि मरु-मरीचिका में जल का ज्ञान होने से उसका ( जल का ) भी स्वीकार करना

परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन १३ बाधितावगमाभावात् अथवा कस्यचिदपि कालान्तरेऽपि च बाधितबोधविरहात् ? नाद्यः, अतिप्रसङ्गात् । पुरुषत्रयावगतस्यापि एकक्षणावगतस्य पुरुषान्तरेण तेनापि क्षणान्तरे बहुलं बाध्यत्वदर्शनात् । न चासौ अर्थोऽसत्योऽपि द्वित्रादिपुरुषमात्र- पूर्वजाततत्प्रतीत्यनुरोधात् बाधदर्शने संजातेऽपि तथैव सन्नित्यभ्युपगम्यते । तस्माद् द्वितीयः पक्षः परिशिष्यते, यत्र सर्वप्रकारेण बाधितत्वं नास्ति तत्सदित्यभ्युपगन्तव्यम् । तदित्थं यदि नाम वादिप्रतिवादिमध्यस्थमात्रस्य दूषणादिसत्तावगमः कथा- कालमात्रे तैरबाध्यमानः कथाङ्गत्वेनाभ्युपेयते, तदा किमायातं सर्वप्रकाराबाधित- तत्सत्त्वावगमायत्ततत्सत्ताभ्युपगमकथाङ्गतानङ्गीकारस्य १ । कतिपयप्रतिपत्तृ-कतिपय- काल-तथात्वावगमादेव प्रायेण लौकिको व्यवहारः प्रतीयते, तादृशश्चायं सत्त्वागमः कथाङ्गम् । पड़ेगा । द्वितीय पक्ष में भी कथाकाल में केवल वादी, प्रतिवादी और मध्यस्थमात्र के अबाधित ज्ञान से या किसीके भी ( मनुष्यमात्र के ) बाधित ज्ञान के न होने से प्रमाणादि-सत्ता का स्वीकार करते हैं ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि तीन या चार पुरुषों द्वारा अभ्रान्त रूप से ज्ञात भी अन्य पुरुषों या दूसरे क्षण में उन्हीं द्वारा प्रायः बाधित रूप से ज्ञात देखा जाता है । बाध-ज्ञान होने पर भी तीन-चार पुरुषों की पहली प्रतीति के अनुरोध से असत्य वस्तु बाध-ज्ञान के पूर्वक्षण के तुल्य सत् नहीं मान सकते । तस्मात् द्वितीय पक्ष ही ठीक रहा । अर्थात् जहाँ सब प्रकार से बाध न हो, वह सत् है, यही स्वीकार करना चाहिए । तस्मात् इस रीति से यदि वादी, प्रतिवादी और मध्यस्थ के ही कथाकाल में बाध- बुद्धिरहित प्रमाणादि-स्वीकार को कथाङ्ग मान भी लें, तब भी सब काल में सब मनुष्यों का अबाधित ज्ञान न होने से प्रमाण, प्रमेय आदि का स्वीकार नहीं हो सकता १ निष्कर्ष यह है कि प्रमाण-प्रमेय की सत्ता परमार्थ नहीं है । क्योंकि उनमें सब प्रकार से अबाधितत्व-ज्ञान नहीं है। किन्तु व्यावहारिक सत्ता है। अतः वह परमार्थ में न होने से शून्यवादी और अद्वैतवादी आदि को अपसिद्धान्त दोष नहीं है तथा व्यवहार में प्रमाणादि के होने से शास्त्रार्थ का निर्वाह भी हो जाता है । प्रश्न—जो बात अन्त में कही गयी है, वह आरम्भ में ही क्यों न कही गयी ? उत्तर—ऐसा करने से यह पुस्तक प्राथमिक कक्षा में पाठ्य होती, शास्त्री एवं आचार्य में पाठ्य नहीं होती । छोटी-सी बात बड़ी कैसे बनती है, वादी विकल्प-जाल में फँसाकर निष्प्रतिभ कैसे किये जाते हैं, आदि शिक्षा देना ही इस तरह की रचना का लक्ष्य है ।

१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एतत्तदुच्यते—व्यावहारिकीं प्रमाणादिसत्तामादाय विचारारम्भ इति । तस्माद् यादृग्व्यवहारनियमः कृतः, तन्मर्यादा अनेन नोल्लंघितेति यद्वादिग्व्यवहारे मध्यस्थावगमः स विजयते; यस्य तु वचसि नैवं तस्यावगमस्तस्य पराजयः; यत्र वायुक्तनिग्रहसत्त्वावगमः स निगृहीतः; तदितरस्तु न तथेत्यादिनियम एव कथारम्भाय ग्राह्यः । अथ शून्यवाद्-विचारः अनेन नियमेन वक्तव्यमित्यस्य अयमर्थः—अनेन नियमेनोक्तमनेनेति मध्यस्थावगमस्य विषयीभवितव्यमिति। न च वाच्यमन्ततस्तदवगमस्यापि मनाङ्- भ्युपेयेति; तस्यापि सत्ताचिन्तायां तत्सत्तावगमान्तरस्यैव शरणत्वात् । अतः आकाश-पुष्पायमान उसको शास्त्रार्थ का हेतु न भी मानें तो हानि क्या है ? कुछ मनुष्यों के कुछ काल में अबाधित ज्ञान से ही प्रायः सभी लौकिक व्यवहार देखे जाते हैं । अर्थात् कुछ मनुष्यों के कुछ काल में अबाधित प्रमाणादि-ज्ञान ही कथाङ्ग हैं । इसलिए यह फलित हुआ कि व्यावहारिकी प्रमाणादि-सत्ता को मानकर विचार (कथा) का आरम्भ करना चाहिए । तस्मात् 'जैसा व्यवहार-नियम किया गया है, इसने उसकी मर्यादा (सीमा) का उल्लंघन नहीं किया, ऐसा जिस वादी के वाग्व्यवहार में मध्यस्थ को ज्ञान हो, वही विजय पाता है; जिस वादी के वचन (वाग्व्यापार) में मध्यस्थ को ऐसा ज्ञान न हो, वह पराजय पाता है; जिस वादी के वचन में मध्यस्थ को प्रतिवादी द्वारा उक्त निग्रहस्थान् का ज्ञान हो, वह पराजित होता है और जिस वादी के वचन में निग्रहस्थान का ज्ञान न हो, वह पराजित नहीं होता है- इत्यादि नियम ही कथारम्भ के लिए ग्राह्य हैं। शून्यवाद-विचार ज्ञातव्य है कि जैसे वेदान्ती प्रमाण, प्रमेय आदि सभी पदार्थों की प्रातिभासिक सत्ता मानते हैं—अर्थात् घट-पट आदि का भासना ही उनकी सत्ता है, इससे अन्य सत्य-सत्ता नहीं है—वैसे ही शून्यवादी भी सबको प्रातिभासिक मानते हैं। भेद इतना ही है कि वेदान्ती प्रतिभास को सत्य मानते हैं और शून्यवादी प्रतिभास की सत्ता भी प्रातिभासिक ही मानते हैं। उनका कहना है कि जैसे घटादि की सत्ता 'घटः' इत्याकारक ज्ञान ही है, वैसे ही 'घट:' इस ज्ञान की सत्ता भी 'ज्ञातो घट:' ज्ञान यह ही है, अन्य नहीं ।

परिच्छेद ] शून्यवाद-विचार १५ न चैवमनवस्था; तदनुसरणावश्यम्भावानङ्गीकारात् । 'एवं त्रिचतुरज्ञानजन्मतो नाधिका मतिः' इति न्यायात् । न चान्तिमासत्त्वे पूर्वप्रवाहासात्त्वापत्तिः, तथा च अवगममादायापि व्यवहरतो न निस्तार इति वाच्यम् । अस्तु एवं हि । तथापि त्रिचतुरज्ञानकक्षागवेषणमात्र- यहाँ संक्षेप से उनके मत का विचार करते हैं । इस वितण्डा-शास्त्रार्थ में शङ्का या खण्डनकर्ता नैयायिक हैं और समाधानकर्ता बौद्ध । शङ्का—प्रमाणादि-स्वीकार को शास्त्रार्थ का हेतु न मानने से लाभ क्या हुआ ? जब आपने व्यवहार-नियम को शास्त्रार्थ-हेतु मान लिया, तो इसीसे द्वैत सिद्ध हो गया । समाधान—हम व्यवहार-नियम की सत्ता भी प्रातिभासिक ( स्वप्न-पदार्थ के तुल्य प्रतिभासमात्र ) ही मानते हैं । अर्थात् 'इस नियम से कथन करना चाहिए' इस वाक्य का यह भाव है कि 'इस नियम से इसने कथन किया है' ऐसा मध्यस्थ को ज्ञान होना चाहिए । इससे द्वैत नहीं होगा । शङ्का—अन्ततः आपको समय-बन्ध के ज्ञान की सत्ता तो मान लेनी होगी ? समाधान—ज्ञान-सत्ता की चिन्ता होने पर ज्ञान का ज्ञान ही शरण है । अर्थात् ज्ञान की सत्ता भी प्रातिभासिक ही है । शंका—समय-बन्ध ( विषय ) की सत्ता के लिए ज्ञान और उस ज्ञान की सत्ता के लिए अन्य ज्ञान इस प्रकार अनवस्था१ हो जायगी ? समाधान—ज्ञान का ज्ञान अवश्य हो, ऐसा नियम नहीं है । 'तीन या चार ज्ञान से अधिक ज्ञान नहीं होते' यह भट्ट का न्याय है । अर्थात् 'अयं घटः', 'ज्ञातो घटः' इससे अधिक ज्ञानधारा अनुभवसिद्ध नहीं है । शंका—जिस अन्तिम ज्ञान का ज्ञान नहीं हुआ, उसकी प्रातिभासिक सत्ता न होने से समय-बन्ध ( विषय ) तक प्रवाह का असत्त्व हो जायगा ? समाधान—ऐसा ही हो क्या हानि है ? विचार से ऐसा ही सिद्ध होता है अर्थात् शून्यवाद ही ठीक है । शंका—ऐसा होने पर प्रातिभासिक सत्ता को मानकर भी व्यवहर्ता के व्यवहार का निर्वाह कैसे होगा ? समाधान—सबके शून्य होने पर भी तीन या चार ज्ञानों की कक्षा के गवेषणमात्र में विश्रान्त और पंचमादि कक्षा के अन्वेषण से रहित विचार से ही समय बाँधकर १ अवस्था = स्थिति, उसके अभाव को 'अनवस्था' कहते हैं । यह एक दोष है; कहीं भी विश्राम न होने से किसी वस्तु का निर्णय न हो पाना ही इसके दोषत्व का कारण है ।

असच्च उपपादकश्चेति व्याहतमिति चेन्न । सत् उपपादकमिति कुतो न व्याहतम् ? न हि सत् उपपादकम् असन्नेति क्वचिदावयोः सिद्धम् । ननु तदसत्त्वा- विशेषात् कार्यस्य अन्यदापि जन्मप्रसङ्गः ? न, कार्यस्याद्यसत्ताक्षण इवान्यदाऽपि सामग्र्यसत्त्वाविशेषात् तवापि किं नान्यदा कार्यजन्म ? अथ न मम तदानीन्तनं सामग्र्यसत्त्वं तदानीन्तनस्य कार्यजन्मनो नियामकम्, किन्तु ततः प्राक् सामग्रीसत्त्वं तथादर्शनात् ? तर्हि ममापि कालान्तरस्थमपि तदसत्त्वं तदातनकार्यजन्मनो नियामकं तथादर्शनादेव । मम तु तदव्यव- हितोत्तरत्वं तदा कार्यजन्मनो नियामकमिति चेन्न । समसमयत्वादागन्तुकत्वाच्च शङ्का—असत् उपपादक है, यह कथन व्याहत है ? समाधान¹—सत् उपपादक है, यह कथन व्याहत क्यों नहीं ? 'सत् उपपादक है, असत् नहीं' यह बात हम दोनों की किसी कथा ( शास्त्रार्थ ) में सिद्ध नहीं हुई है ।। शङ्का—यदि कारण असत् है, तो असत्त्व में कोई विशेषता तो है नहीं । फिर अन्य काल में भी कार्य क्यों नहीं होता ? समाधान²—कार्य के आद्यसत्ता-क्षण में जैसे सामग्री का असत्त्व है, वैसे द्वितीयादि क्षण में भी उसका असत्त्व है ही, असत्त्व में कोई विशेषता तो है नहीं । फिर तुम्हारे मत में द्वितीयादि क्षणों में कार्य की उत्पत्ति क्यों नहीं होती ? प्रतिबन्दी का परिहार—मेरे मत में कार्य के आद्यक्षण में विद्यमान सामग्री का असत्त्व आद्यक्षण में जायमान कार्य का नियामक नहीं है । किन्तु कार्य की उत्पत्ति से पूर्वक्षण में स्थित सामग्री का सत्त्व ही नियामक है, क्योंकि सामग्री से उत्तरक्षण में ही कार्य देखा जाता है । खंडन—तब तो मेरे मत में भी अन्य काल में भी स्थित कारण का असत्त्व उस काल में उत्पन्न कार्य की उत्पत्ति का नियामक होगा, क्योंकि उसी क्षण में, कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है । प्रतिबन्दी का परिहार—मेरे मत में कारण का अव्यवहितोत्तरत्व उस काल में कार्यजन्म का नियामक है । खण्डन—समय ( क्षण ) सम ( एक ) है । अर्थात् जो कार्योत्पत्तिक्षणत्व है, वही सामग्र्युत्तरक्षणत्व भी है । अतः एक में ही नियम्यनियामकभाव नहीं हो सकता । अथवा सामग्र्युत्तरक्षणत्व और कार्य- क्षणत्व दोनों का काल एक है, अतः वाम-दक्षिण शृङ्ग के तुल्य इनमें नियम्य- नियामकभाव नहीं हो सकता । किंवा समय ( सङ्केत ) की एकता है अर्थात्

  • १ यह समाधान प्रतिबन्दी उत्तर है । शङ्काकर्ता जिस दोष को अपने मत में दे, उसी दोष को उसके मत में देना और उसका समाधान न करना ही 'प्रतिबन्दी उत्तर' कहलाता है । २ यह भी प्रतिबन्दीरूप समाधान है ।

१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अविशेषेण नियम्यनियामकव्यवस्थानुपपत्तेः । तस्माद् अन्यदास्थायाः सामग्र्याः तदा कार्यजन्मनियमोऽभ्युपेयस्तथादर्शनादित्येव वाच्यम् । तथा च समः समाधिः । तथापि कार्यजन्मकालस्य को विशेषः ? कार्यजन्मैव । अन्यथा यद् विशेषान्तरं तदपि विशेषान्तरवतः कालस्य स्यादित्यपर्यवसानमेव पर्यवस्येत् । तथापि तत्कालस्यानुगतं किं रूपमिति चेन्न । रूपान्तरवतोऽपि किं तदित्यस्यापि पर्य्यनुयोगस्यापत्तेः । 'सामग्र्युत्तरक्षणत्व और कार्यक्षणत्व दोनों शब्दों का घट, कलश शब्दों की तरह एक ही अर्थ है, अतः नियम्य-नियामकभाव नहीं हो सकता । या किसीसे अनियमित आकस्मिक सामग्री अपने उत्तरत्व से कार्य के जन्म का नियमन नहीं कर सकती । यदि सामग्री का नियामक अन्य सामग्री को मानें, तो उस नियामक का अन्य नियामक और उसका भी अन्य नियामक— इस रीति से अनवस्था हो जायगी । तस्मात् यही आप कहेंगे कि पूर्वक्षणवर्त्ती सामग्री ही उत्तरक्षणवर्ती कार्य-जन्म की नियामक होगी । क्योंकि सामग्री से उत्तरक्षण में कार्यजन्म देखा जाता है । तब तो समाधान तुल्य है, अर्थात् हम भी कह सकते हैं कि अन्य काल में स्थित भी कारण का असत्त्व उस काल में कार्यजन्म का नियामक है; क्योंकि उसी काल में कार्य-जन्म देखा जाता है । यहाँ यह न भूलना चाहिए कि शून्यवाद में एकमात्र ज्ञान असत् होता हुआ भी स्वविषय ( घटादि ) के व्यवहार का कारण है । अन्य कारण तो प्रातिभासिक सत्ता से युक्त होकर ही प्रातिभासिक कार्य के कारण हैं । स्वव्यवहार में तो ज्ञान भी प्रातिभासिक सत्तायुक्त ही कारण है, असत् नहीं । शङ्का—तब भी अन्य क्षणों से कार्य-जन्म के क्षणों में क्या भेद है ? समाधान—अन्य क्षणों में कार्य का जन्म नहीं होता, उसी क्षण होता है, यही अन्य क्षणों से कार्य-जन्मक्षण में विशेषता है । अन्यथा कार्यजन्म से अन्य 'सामग्र्यव्यवहितोत्तरत्वादि' कोई विशेषता कहें, तो वह भी अव्यावर्त्तक होने के कारण निर्विशेष काल में नहीं कहेंगे, किन्तु सामग्रीयुक्त काल में ही कहेंगे। इस रीति से उत्तरोत्तर सामग्री के आश्रयण में अनवस्था हो जायगी । शङ्का—तब भी कार्य-जन्म के काल का अनुगत रूप क्या है ? समाधान—कार्य-जन्म का सम्बन्ध ही काल का अनुगत रूप है। अन्यथा

परिच्छेद ] शून्यंवाद-विचार १६ किञ्च— 'अन्तर्भावितसत्त्व चेत् कारणं तदसत्ततः । नान्तर्भावितसत्त्वं चेत् कारणं तदसत्ततः ॥' तथा हि—अन्तर्भूतसत्त्वं यदि कारणत्वं तदा स्वविशिष्टे स्ववृत्तिरंशतः स्वाश्रय- त्वमापादयति । विशिष्टस्यार्थान्तरत्वेऽपि च स्वस्मिन् स्ववृत्तित्वव्यतिरेकवत् स्वविशिष्टे स्ववृत्तित्वव्यतिरेकनियमदर्शनात् । न सैव सत्ता तस्मिन्निति । अन्यस्या³ विशिष्टवृत्त्यभ्युपगमे तामनिवेश्य कारणत्वमभ्युपगन्तुः सर्वथैवासत्कारणं पर्यवस्यति । अपरापरसत्तानिवेशने चाऽपर्यवसानमेव । सामग्र्युत्तरत्वादि कुछ भी अन्य रूप मानें, तो उनका भी अनुगमक रूप क्या है, ऐसे उत्तरोत्तर प्रश्न होते रहने से अनवस्था हो जायगी । सद्वाद का खण्डन - किञ्च, यदि कारण सत्ता-सहित, यदि वा सत्ता-हीन । उभय पक्ष कारण असत्, जानो तुम मति-पीन ॥ देखिये, 'सत्-वादी सत्ता-विशिष्ट बीजादि को अंकुरादि का कारण कहेंगे अथवा सत्ता से उपलक्षित बीजादि को ? यहाँ प्रथम पक्ष में यह विकल्प होता है कि सत्ता- विशिष्ट में सत्ता रहती है या नहीं ? यदि नहीं, तो कारण असत् हीर हा । क्योंकि सत्ता के योग से ही वस्तु सत् होती है। यदि रहती है, तो 'विशिष्ट में रहनेवाला धर्म विशेषण में भी रहता है' इस नियम से आत्माश्रय² हो जायगा । यदि विशिष्ट को विशेषण-विशेष्य-सम्बन्ध से अतिरिक्त मानें, तब भी जैसे स्व में स्व-वृत्तित्व विरुद्ध है, वैसे ही स्व-विशिष्ट में भी स्व-वृत्तित्व विरुद्ध है, क्योंकि ऐसा कही देखने में नहीं आता । सद्वाद का समर्थन — वही सत्ता अपने से विशिष्ट में नहीं रहती, किन्तु अन्य सत्ता सत्ता-विशिष्ट कारण में रहती है । खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो प्रथम सत्ता कुछ कर न सकी, क्योंकि उसके वैशिष्ट्य से कारण सत् नहीं १ यहाँतक नैयायिक शून्यवाद पर आक्षेप करते रहे और शून्यवादी अपने मत का समर्थन । अब यहाँ से शून्यवादी सद्वाद का खण्डन करते हैं और नैयायिक सद्वाद का समर्थन । २ अपनी स्थिति या ज्ञान में अपना आश्रयण 'आत्माश्रय' है। इसके दोष होने का कारण 'भूतल में घट है' ऐसे प्रयोगों का होना और 'घट में घट है' ऐसे प्रयोगों का न होना है। ३ 'तस्या' इति विद्यासागर्यामधिकः पाठः ।

१. प्रथम परिच्छेद: अनिर्वचनीयता-सिद्धि, प्रमाण-लक्षण खण्डन एवं सत्ता-विमर्श

न च सत्ताभेदानन्त्यमस्त्येवेत्यपि पादप्रसारिका निस्ताराय । सत्ताभेदे हि सद्बुद्धिव्यवहारानुगम¹-समर्थनलंघिनः प्रथमापि सत्ता न स्यादिति वृद्धिमित्छतो मूलमपि ते नष्टमिति हा² कष्टतरम् । न च स्वरूपसत्तोपगमाय स्वस्ति, भिन्नानपि अनुगतबुद्ध्याधानपदेऽभिपिप्सता हुआ। रही द्वितीय सत्ता, उसका कारण-कोटि में निवेश है या नहीं ? यदि नहीं, तो असत् ही कारण रहा। क्योंकि जैसे धूम में विद्यमान भी कृष्णत्व हेतुदल में अनिविष्ट होने से हेतुता में अनुपयोगी है, वैसे ही प्रथम सत्ता से विशिष्ट कारण में विद्यमान भी द्वितीय सत्ता—कारणकोटि में निविष्ट न होने से—कारण के सत् होने में उपयोगी नहीं है। यदि द्वितीय सत्ता का कारण- कोटि में निवेश करें, तो यह विकल्प होता है कि द्वितीय सत्ता से विशिष्ट कारण में सत्ता है या नहीं ? यदि नहीं, तो कारण असत् ही रहा। यदि है, तो पूछा जा सकता है कि द्वितीय सत्ता से विशिष्ट में द्वितीय सत्ता ही रहती है अथवा प्रथम सत्ता या तृतीय सत्ता ? यदि द्वितीय सत्ता ही रहती है, तो आत्माश्रय, प्रथम सत्ता रहती है तो अन्योन्याश्रय³ और तृतीय सत्ता रहती हो, तो इस तरह अनन्त सत्ता मानने से अनवस्था होगी । समर्थन—⁴सत्ता में सत्ता इस प्रकार अनन्त सत्ताएँ इष्ट ही हैं अर्थात् अनुभवसिद्ध होने के कारण बीजांकुर के तुल्य यहाँ अनवस्था दोष नहीं है। खण्डन—इस तरह पैर फैलाने से भी निर्वाह नहीं होगा। क्योंकि अनन्त सत्ताएँ मानने पर 'सत्' इत्याकारक अनुगत प्रतीति प्रमाण न होने से प्रथम सत्ता भी सिद्ध नहीं हुई। शोक ! व्याज चाहनेवाले आपका मूल-धन भी नष्ट हुआ । समर्थन—हम जातिरूप सत्ता को नहीं, स्वरूपसत्ता को मानते हैं। अर्थात् घटादि स्वरूप से ही सत् हैं। अतएव अनवस्था दोष नहीं है। खण्डन— १ 'अनुगमननिबन्धने'ति विद्यासागरीपाठः । २ 'हा' विद्यासागर्यां इति नास्ति । ३ अन्योन्य की स्थिति या ज्ञान में अन्योन्य का आश्रय 'अन्योन्याश्रय' है । 'भूतल में घट है और उसी घट में वही भूतल है' ऐसा प्रयोग न होना ही इसके दोषत्व का कारण है । ४ यद्यपि इस शास्त्रार्थ में नैयायिक प्रतिवादी हैं और वे सत्ता में सत्ता अथवा स्वरूप- सत्ता को नहीं मानते । अतः उनके द्वारा ऐसी शंकाएं नहीं हो सकतीं । यदि वे ऐसी शंकाएँ करें, तो 'अपसिद्धान्त' कहकर ही उनका खण्डन उचित है । फिर भी खण्डनकार ने अपनी विद्वत्ता दिखलाने के लिए ही स्वयं शंका कर उनका खण्डन किया है ।

परिच्छेद ] शून्यवाद-विचार २१ त्वया हि जातिमात्राय जलाञ्जलिर्वितीर्येत । मा भूदनुगतिः स्वरूपसत्त्वस्येति वदन् तद्गर्भिणीं कारणतां कथमनुगमयिताऽसीति । किञ्च स्वरूपसत्त्वं स्वरूपाद् घटाद्यात्मनो नाधिकम्, असतोऽपि स्वरूपं स्वरूपमेव । न हि असन् घटादिर्न घटादिः; तथा सति ‘घटादिर्न’ इत्यपि न स्यात्, असतोऽघटादित्वात् । अथ सदपि सत्तामनन्तर्भाव्य कारणम्, तदानीमसपि तत्तथास्तु, सत्त्वासत्त्वयोः कारणकोट्यप्रवेशाविशेषात् । स्वरूपसत्ता प्रतिव्यक्ति भिन्न होने से ‘इदं सत्’, ‘इदं सत्’ इत्याकारक अनुगत प्रतीति न होगी । यदि अनेक में एक अनुगत रूप के न होने पर भी अनुगत प्रतीति मानी जाय, तो गौ आदि व्यक्तियों में गोत्वादि न मानने पर भी ‘गौः’ इत्याकारक अनुगत प्रतीति का निर्वाह होने लगेगा, फलतः इस तरह जातिमात्र को तिलाञ्जलि दे दी जायगी । समर्थन—सत्ता का सर्वत्र अनुगम न हो, स्वरूपभूत सत्ता प्रतिव्यक्ति भिन्न ही रहे, तब भी स्वरूपसत्ता से कारण तो सत् ही सिद्ध हुआ । खण्डन—स्वरूपसत्त्व प्रतिव्यक्ति भिन्न-भिन्न होने से उसमें घटित कारणत्व भी प्रतिव्यक्ति भिन्न-भिन्न हो जायगा । फिर कारणत्व का भी अनुगम कैसे करोगे ? किञ्च --- स्वरूपसत्त्व स्वरूप ( घटादि ) से अधिक तो है नहीं और असत् का स्वरूप भी स्वरूप ही है, क्योंकि असत् घटादि ‘घटादि नहीं हैं’ ऐसा नहीं है, किन्तु वे भी घटादि ही हैं । यदि असत् घटादि न होते, तो “घटादिर्न” यह प्रयोग भी न होता; क्योंकि निषेध किसका होगा ? जो वस्तु एकरूप से या एकदेश में रहती है, उसीका अन्य रूप से या अन्य देश में निषेध होता है । ‘असन् घटः’ यह प्रयोग भी नहीं होता, क्योंकि जब घट है नहीं, तो असत्त्व का विधान कहां होगा ? समर्थन—सत्ता कारण-कोटि में विशेषण नहीं, उपलक्षण है, यद्यपि घट का दण्ड कारण है, ऐसा ही कार्य-कारणभाव है, तब भी सत्ता के उपलक्षण होने से कारण सत् है । खण्डन—यदि ऐसा है, तो हम भी कह सकते हैं कि असत्ता का कारण-दल में प्रवेश न होने से कारण असत् है । क्योंकि सत्त्व- असत्त्व का कारणकोटि में निवेश न होनेपर दोनों मतों में कोई विशेषता न होने से कारण को असत् ही क्यों न मानें ? ।

२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथ सत्ता न कारणकोटिनिविष्टा, किन्तु कारणत्वं सत्त्वम्, नियतपूर्वसत्ता हि कारणतां मन्ये इति मन्यसे; तर्हि मत्पक्षेऽपि सैव कारणताऽस्तु । तर्हि कारणस्य सत्तामभ्युपगतवानसीति घट्टकुट्यां प्रभातमिति चेन्न । भावानवबोधात् । सत्तामसतीमभ्युपगच्छताऽपि सत्ता मयाऽभ्युपगतैव । अन्यथा काऽसौ असतीति । त्वमपि किं सत्तां तत्सत्तामन्तर्भाव्य कारणत्वमिच्छसि ? न त्वेवम्; पूर्ववत् क्वापि सत्तात्यागो वा अनवस्थायां वा पर्यवसानं स्यात् । असत्त्वाविशेषात् कारणनियमः कथं स्यादिति चेन्न । सत्त्वाविशेषेऽपि तुल्यत्वात् । समर्थन—सत्ता कारणता में उपलक्षणत्व या विशेषणत्व से प्रविष्ट नहीं है। कारणत्व ही सत्त्व है, क्योंकि नियत-पूर्व-सत्त्व को ही कारण मानते हैं। खण्डन —यदि ऐसा मानते हैं, तब हमारे मत में भी नियत-पूर्व-सत्त्व ही कारणत्व है। समर्थन—तब आपने कारण की सत्ता मान ली, इससे घट्ट-कुटी में प्रभात हुआ। अर्थात् राज-कर के भय से छिपे मनुष्य का दैववश तहसील में प्रभात होने से जैसी गति होती है, वसी ही आपकी गति हुई । सद्वाद खंडन—आपने मेरे भाव को नहीं जाना। सत्ता को असती मानने पर भी मैं उसे मानता ही हूँ। यदि सत्ता को न मानूँ, तो असत् किसे कहूँगा ? आप भी 'नियतपूर्व-सत्त्वरूप कारणत्व' में अन्य सत्ता को मानते हैं या नहीं ? यदि नहीं, तो असत् ही कारण हुआ ।. यदि मानते हैं, तो उस द्वितीय सत्ता को कारणत्व-दल में प्रविष्ट कर कारण मानते हैं या प्रवेश न कर ? यदि प्रवेश न कर, तो असत् ही कारण रहा। यदि प्रवेश कर, तो सत्ता में सत्ता और उसमें अन्य सत्ता, इस रीति से अनवस्था हो जायगी । यदि किसी सत्ता में सत्ता न मानें, तो जड़ ( मूल-कारण ) तक सब असत् ( सत्तारहित या मिथ्या ) ही हो जायगा । शङ्का—यदि कारण असत् है, तो असत्त्व में कोई अन्तर नहीं है। फिर 'घट का दण्ड कारण है, रासभ नहीं' यह नियम कैसे होगा ? समाधान—यदि कारण सत् हो, तब भी सत्त्व में कोई विशेषता नहीं रहती । दण्ड, रासभ सबकी सत्ता एक सी ही है। फिर तुम्हारे मत में भी 'दण्ड कारण है और रासभ नहीं' यह नियम कैसे होगा ?

परिच्छेद ] शून्यवाद-विचार २३ सत्त्वेऽस्त्यन्वयव्यतिरेकानुविधानं तस्य तज्जातीयस्य वा । त्वत्पक्षे तु असत्त्वा- विशेषाद् व्यतिरेकः । परं सोऽप्यनियतः, यदा कारणाभावस्तदा कार्याभावा- वश्यम्भावानभ्युपगमात्, नित्यासतः कारणस्यासत्त्व एव कदाचित्कार्योत्पादात् । अन्वयस्तु न क्वचिदपीति चेन्न । तुल्यत्वात् । अन्वयो नास्तीत्यभ्युपगच्छता- ऽप्यन्वयोपगमात् । अन्वयस्यापि सत्तान्तर्भावने कथितदोषापत्तेः । एतेन— ‘आशामोदकतृप्ता ये ये चोपार्जितमोदकाः । रस-वीर्य-विपाकादि तुल्यं तेषां प्रसज्यते ॥’ सद्वाद-समर्थन—सत्त्व-पक्ष में दण्ड या दण्डजातीय के साथ घट का यह अन्वय-व्यतिरेक है—‘जब दण्ड रहेगा, तब घट होगा और जब दण्ड का अभाव होगा, तब घट का भी अभाव होगा।’ यही अन्वय-व्यतिरेक घट के प्रति ‘दण्ड कारण है, रासभ नहीं’ इसमें नियामक है । तुम्हारे मत में केवल व्यतिरेक ( अभाव ) है और वह भी नियत नहीं, क्योंकि जब ‘कारण का अभाव हो, तो कार्य का अभाव अवश्य होगा’ ऐसा नहीं है, असत् कारण के अभाव में भी कभी कभी कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है । अन्वय तो कहीं भी नहीं है । खंडन—‘जहाँ दण्ड है, वहाँ घट है और जहाँ दण्डाभाव है, वहाँ घटाभाव है’ यह अन्वय-व्यतिरेक दोनों मतों में एक-सा है । क्योंकि असत्-वादी भी वस्तु को स्वरूप-सत् ( प्रातिभासिक ) मानते ही हैं । यदि स्वरूप से भी सत् न मानें, तो उनके मत में ‘असन् घट:’, ‘घटो न’ आदि व्यवहार ही न होगा । यह अलग बात है कि प्रमाण से परमार्थतः दण्डादि सिद्ध नहीं होते, पर व्यवहार में तो हैं ही । किञ्च, ‘अन्वय नहीं है’ यह कहनेवाले तुम्हें भी अन्वय अवश्य मानना पड़ेगा । क्योंकि यदि असत् का भी अन्वय न हो, तो निषेध किसका होगा ? समर्थन—सत् अन्वय ही कार्य-कारण-भाव का नियामक है और असत्-पक्ष में वह नहीं है । खंडन—तुम्हें ‘सत् अन्वय’ से क्या अभिप्रेत है—सत्ता से विशिष्ट या उपलक्षित अन्वय कार्य-कारण-भाव का नियामक है ? दोनों पक्ष बन नहीं सकते, कारण उक्त रीति से ( अन्तर्भावितसत्त्वं चेत्’ इस रीति से ) वे अयुक्त हैं । शङ्का— ‘आशा-मोदक विपणि के, मोदक से सममोद । चहिए तुम्हरे मलहि में, तुष्टि-पुष्टि अरु तोंद ॥’

२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम इत्यस्यापि बाधकत्वमाशामोदकायते। सत्तान्तर्भावानन्तर्भावाभ्यां प्रत्यादेशात्, आशामोदकादिनाऽपि च रसवीर्य्यविपाकादिजननात् । तदसत्कथं कार्य्यं स्यादिति चेन्न । सत्तामन्तर्भाव्य कार्य्यत्वोपगमे कारणवत्कार्येऽपि उक्तदोषस्य, अनन्तर्भावे वाऽविशेषस्य पूर्व्वदावृत्तेः । तस्मात्— 'पूर्वसम्बन्धनियमे हेतुत्वे तुल्य एव नौ । हेतुतत्त्वबहिर्भूत-सत्त्वासत्त्वकथा वृथा ॥' अर्थात् जब सब • वस्तुएँ असत् (प्रातिभासिक) हैं, तो मनोमोदक और बाजार के मोदक से एक सा रस-वीर्य-विपाक होना चाहिए । समाधान—यह तर्क भी मनोमोदक के तुल्य आभास ही है। क्योंकि तर्क विपर्यय (अभाव) में पर्यवसायी हुआ करता है। यहाँ विपर्यय में इस प्रकार पर्यवसान होगा कि 'तुल्य रसादि दोनों से नहीं होता, अतः कारण सत् है।' परन्तु सत्-पक्ष का पूर्वोक्त युक्ति से खण्डन होने के कारण-विपर्यय में पर्यवसान नहीं बनता। सच तो यह है कि स्वप्न के मनोमोदक से भी जाग्रत्कालीन मोदक के समान ही रसादि देखा जाता है। इसी तरह गुञ्जा-पुञ्ज में कल्पित अग्नि से भी बानर की शीत-निवृत्ति देखी जाती है। अतः 'दोनों से तुल्य रसादि नहीं होता' यह कथन नहीं बनता। शङ्का—उत्पत्ति से पहले असत् घटादि में भी सत्ता-सम्बन्धरूप कार्यत्व रहता ही है। इससे कार्य असत् कैसे हो सकता है ? समाधान—यदि सत्ता के अन्तर्भाव से कार्यत्व मानें, तो कारण के तुल्य कार्य में भी उक्त दोष आयेगा। यदि सत्ता का कार्यत्व में अन्तर्भाव न मानें, तो सत्ता के अनन्तर्भाव से असत् ही कार्य क्यों न हो ? पूर्वोक्त युक्ति से सत्त्व कारण-कोटि में निविष्ट नहीं है। अतः दोनों मतों में नियत-सम्बन्धरूप हेतुत्व तुल्य है। फिर इस प्रसङ्ग में हेतुत्व से पृथग्भूत कारण के सत्त्व-असत्त्व का विचार व्यर्थ है। यदि कारणत्व के सत्त्व-असत्त्व का विचार ही करना हो, तो स्वतन्त्र रूप से ही करना चाहिए। पूर्व नियम से कार्य के, जो सो कारण यार । इस प्रसङ्ग में क्यों करो, कारण-सत्त्व-विचार ॥' १ पूर्वेण = कार्यपूर्वक्षणेन नियमेन, संबन्धः = वृत्तित्वम् । राजदन्तादित्वात् नियमशब्दस्य पूर्वनिपातः।

परिच्छेद ] शून्य॒वाद-विचार २५ आस्तां प्रतिबन्दिग्रहाऽऽग्रहः। कथं पुनरसतः कारणत्वमवसेयम्, प्राक्सत्त्व- नियमस्य विशेषस्यानभ्युपगमात्; असत्त्वस्य चाविशेषादिति चेन्न । 'इदमस्मा- नियतप्राक् सत्' इति बुद्ध्या विशेषात् । भ्रान्तैवं बुद्धिगोचरेऽतिप्रसङ्ग इति चेन्न । यादृश्या हि धिया त्रिचतुरकक्षा- बाधाऽनवबोधविश्रान्त्या वस्तुसत्त्वनिश्चयस्ते, तादृश्यैव विषयीकृतस्य ममापि कारणतानिश्चयः । केवलं ततः परास्वपि कक्षासु बाधात् पूर्वपूर्वभ्रान्तिसम्भवेन न तावता सत्त्वावधारणं वयं मन्यामह इति विशेषः । परदर्शनसिद्धान्तस्य भूरिकक्षाधाविनोऽपि ततः परकक्षाबाध्यमानत्वेन अतथाभावोपगमात् । अन्यथा एकदर्शनपरिशेषः स्यात् । शङ्का—प्रतिबन्दीरूप राहु का ग्रहण भले ही रहे, क्योंकि प्रतिबन्दी को वक्ष्यमाण रीति से आप दोष मानते नहीं। फिर असत् कारण होता है, यह कैसे जानें, क्योंकि कारण में नियत-प्राक्सत्त्वरूप विशेष तो आप मानते नहीं और असत्त्व में कोई विशेषता है नहीं । समाधान—'दण्ड घट से नियमतः प्राक्क्षण में रहता है' यह बुद्धि ही विशेष है । शङ्का—यदि बुद्धि ही विशेष है, तो 'रासभ घट से पूर्व है' इस बुद्धि से रासभ को कारण क्यों न मानें ? समाधान--तीन या चार ज्ञान की कक्षाओं में बाध के अदर्शन से विश्रान्त जैसी बुद्धि से तुम्हें वस्तु का निश्चय होता है, वैसी ही बुद्धि से हमें भी कारणता का ज्ञान होता है । भेद यही है कि तीन या चार कक्षाओं से अग्रिम कक्षाओं में बाध की सम्भावना से सम्भव है कि पूर्व-पूर्व ज्ञान भ्रम हो, इसलिए हम तीन-चार कक्षाओं में बाध न होने पर भी वस्तुसत्त्व का निश्चय नहीं करते । शङ्का—तीन-चार ज्ञान-कक्षाओं में बाध न होने से अनुमान से अग्रिम कक्षा में भी अबाध सिद्ध होगा । समाधान—यह नियम नहीं है कि जो तीन-चार कक्षाओं में अबाधित हो, वह अग्रिम कक्षाओं में अबाधित ही रहेगा। क्योंकि नैयायिक मीमांसकाभिमत शब्द-नित्यत्व-सिद्धान्त को, तीन चार ज्ञान-कक्षाओं में बाध न होने पर भी, अग्रिम कक्षा में बाधित मानते ही हैं। यदि तीन-चार कक्षाओं में अबाधित होने से किसी के सिद्धान्त को प्रामाणिक मानें; तो सब दर्शनों के सिद्धान्त आपाततः अबाधित होने से प्रामाणिक होने लगेंगे । फिर तो प्रामाणिकत्व- अप्रामाणिकत्वकृत दर्शनों के भेद भी न होंगे, सब दर्शन मिलकर एकदर्शन हो जायेंगे । ४

२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एतेन—असत्त्वाविशेषेऽपि कथं कस्यचित्पक्षस्य त्रिचतुरकक्षाधावित्वाधावित्व- मास्तामित्यपि निरस्तम् । अनेवं बुद्धिविषयतादशायां को विशेष इति चेत्, यदा कदापि तादृशबुद्धि- विषयतैव । अन्यथा कथमन्यदातनतादृशबुद्धिविषयतया अन्यदा सत्त्वं स्यात् । तदा सत्त्वमन्यदास्थेन गृह्यत इति चेत्, अन्यकालिकमेव तर्हि तत् तदातनकारणत्वोपयोगीति समानम् । तदेतत् संवृतिसत्त्वमिति गीयते । असती सा न विशेषिका, सती सा नेष्टेत्यभिसन्धानेन संवृतिरपि सती शङ्का—यदि शुक्तिस्थ रजत और यथार्थ रजत दोनों की प्रातिभासिक सत्ता एक-सी है, तो शुक्ति-रजत झटिति बाधित होता है और यथार्थ रजत देर से, इस भेद में क्या हेतु है ? समाधान—यद्यपि आप अन्य दर्शनों के सिद्धान्तों और शुक्ति-रजत में एक-सी सत्ता मानते हैं; फिर भी जैसे अन्य सिद्धान्तों में बाधोदय देर से होता है, और शुक्ति-रजत में अतिशीघ्र, वैसे ही यहाँ भी जानिये । शङ्का—यदि कारण में वस्तुभूत 'नियत-प्राक्-सत्त्व' नहीं, किन्तु प्रातिभासिक है, तब जिस काल और जिस बीज में "इदम् अस्मात् नियत-प्राक्-सत्' यह बुद्धि नहीं है, उस काल या उस बीज में कारणत्व की व्यवस्था कैसे होगी ? समाधान— उस काल में भी रासभादि में जो 'इदम् अस्मात् नियतप्राक्-सत्' इस बुद्धि की विषयता के अभाव का अधिकरणत्व है, उसका अभाव ही व्यवस्थापक है । अथवा यदा- कदा (अन्य देश या काल में) या अन्य पुरुष में जायमान 'इदम् अस्मात् नियतप्राक् सत्' यह बुद्धि ही नियामक है। यदि अन्य काल की बुद्धि नियामक न हो, तो सद्वादी के मत में भी 'इदम् अस्मात् प्राक् आसीत्' इस बुद्धि से भूत दण्डादि में कारणत्व की व्यवस्था कैसे होगी ? शङ्का—सद्वादी के मत में कारण सत् है । अतः अन्य काल के ज्ञान से गृहीत होता है। खंडन—तब अन्य काल की बुद्धि ही वर्तमान कारणत्व-व्यवहार में उपयोगी (कारण) है। इसी को आचार्य लोग संवृतिसत्त्व' कहते हैं। ज्ञान अपने सत्त्व से विषय के असत्त्व (अभाव) का संवरण कर लेता है। अतएव ज्ञान को 'संवृति' और उसके सत्त्व को 'संवृतिसत्त्व' कहते हैं। शङ्का—असत् या मिथ्या संवृति व्यवहार का कारण नहीं हो सकती और शून्यवाद की हानि के भय से आप विज्ञान की सत मानेंगे नहीं। फिर व्यवहार

परिच्छेद ] शून्यवाद-विचार २७ नैवेति पृच्छन् प्रतिवक्तव्यः । विज्ञानं तावत् व्यवहारोपपादकतया द्वाभ्यामप्यनुमतम् । तस्यापि जिज्ञासायां त्रिचतुरकक्षाविश्रान्तगवेषणस्य यदि सत्तोपपन्ना भविष्यति, तदा सता तेनेदमुपपादितं भविष्यति । अथासत्ता तस्य पर्यवसास्यति, तदाऽसतैव तेनेदमुपपाद्यत इति स्वीकर्तव्यम् । असद्विषयेणैव भ्रमे विशिष्टतान्यवहारः । अविचार्यैव तावत्तस्य सदसत्त्वं विचार आरब्धव्यः । अन्यथा प्रथममेव मतिकर्दमे कथारम्भणमशक्यमापद्येत । स्वीकृतं च भवताऽपि भविष्यादादिविषये विज्ञाने विशिष्टव्यवहारनिदानत्वमसतो विषयस्य, कारणशक्तेश्च विशेषक- मसदेव कार्यम् । न च कालान्तरसम्बन्धिनी सत्ता तस्यैकत्र, अन्यत्र नान्यदाऽपीति वैधर्म्य- मेतयोरपीति वक्तव्यम्; विशिष्टव्यवहारप्रवृत्तिसमये द्वयोरप्यसत्त्वाविशेषात् । कैसे होगा ? समाधान--ज्ञान व्यवहार का कारण है, यह दोनों को इष्ट है । उसकी भी सत्ता की जिज्ञासा होने पर विचार होना चाहिए । विचार में तीन या चार कक्षाओं में सत्ता का अन्वेषण समाप्त होने पर यदि युक्ति से असत्ता निश्चित हो, तो व्यवहार की अन्यथानुपपत्ति से मानना पड़ेगा कि 'असत् ही ज्ञान व्यवहार का निमित्त है' । क्योंकि दृष्ट में कोई अनुपपत्ति की शंका नहीं होती । जैसे आपके मत में 'इदं रजतम्' इस भ्रमस्थल में असत् रजत ही 'रजतीयं ज्ञानम् इस व्यवहार का प्रयोजक है, वैसे ही मेरे मत में भी असत् विज्ञान ही व्यवहार-कारण है । अतः ज्ञान के सत्त्व का विचार न कर के ही कारण की सत्ता का विचार करना चाहिए । यदि नियम किया जाय कि ज्ञान की सत्ता के विचार के बिना विचार का आरम्भ नहीं हो सकता, तो ज्ञान के सत्त्व-असत्त्व के विचार का आरम्भ भी न होगा । क्योंकि यह भी विचार स्व से पूर्व स्व के न होने से ज्ञान के सत्त्व-असत्त्व-विचार- पूर्वक नहीं है । अर्थात् यदि ऐसा नियम करें, तो ज्ञानरूप कीचड़ में गौ के तुल्य फँस जाने से विचार का आरंभ असंभव हो जायगा । आप भी 'पुत्र होगा', 'बिजली चमक गयी' आदि भूत-भविष्यत्-विषयक ज्ञानस्थल में असत्-विषय को ही व्यवहार का कारण मानते हैं तथा असत् कार्य ही 'कार्यपूर्ववर्ति-कारणम्' यहाँ कारणत्व का निश्चायक होता है । शङ्का-सद्वादी के मत में अन्य काल में सत् घटादि ही ज्ञान के विषय होते हैं और असद्वादी के मत में घटादि अन्य काल में भी असत् हैं, यही दोनों मतों में विशेष है । समाधान - जिस काल में व्यवहार होता है, उस काल में असत्त्व

२८ सानुवाद-खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रयोजनानुपयुक्ते काले तस्य स्वरूपतोऽवस्थानं पाटच्चरलुण्ठिते वेश्मनि यामिक- जागरणावरत्तान्तमनुहरति । तथापि कालान्तरस्थित्या घटादिकं स्वरूपतः विशेषणतश्च व्यवच्छिन्नं तद्विज्ञानेन स्वभावबलाद् स्वविशेषणत्वेनोपादीयते । न त्वेवमन्यन्ताऽसद् भवितुमर्हति, तस्य स्वरूपतो विशेषणतश्चव्यवच्छिन्नतयाऽनंगीकारात् कुत्र स्वभावतो विज्ञानं सम्बन्धि निरूप्येत ? न; उक्तमत्राऽसतोऽपि तदेव स्वरूपं, तस्य नियतस्वरूपस्यैव नियत- विशेषणस्यैवासत्त्वात् । अन्यथाऽतिप्रसङ्गात्, भ्रान्तिविषयेण दत्तोत्तरत्वाच्च इत्यलमतिप्रपञ्चेन । स्वप्रकाश-वाद-विचार अपरे पुनः चेतसोऽपि शून्यताऽङ्गीकारे मनःप्रत्ययमनासादयन्तः सर्वमिदमस- देव विश्वमित्यभिधातुं सहसैवानुत्सहमाना मन्यन्ते— विज्ञानं तावत् दोनों मतों में एक-सा है । जिस काल में व्यवहार नहीं होता, उस काल में सत्त्व चोरों से घर लुट जाने पर पहरेवालों के जागने के तुल्य व्यर्थ है । शङ्का—व्यवहार-काल में दोनों मतों में एक-सा असत्त्व होने पर भी सद्वादी के मत में अन्य काल में घटादि के सत् होने से स्वरूप और विशेषण से युक्त घटादि हैं, अतः विज्ञान स्वभाव से उसे विषय करता है । किन्तु असद्वादी के मत में अत्यन्त याने कालान्तर में भी असत् घटादि विज्ञान के विषय कैसे हो सकते हैं, क्योंकि शून्यवाद में घटादि स्वरूप और विशेषण से युक्त नहीं हैं । फिर स्वभाव से विज्ञान का सम्बन्ध कहाँ होगा ? समाधान—मैंने इस विषय में कहा है कि असत् का स्वरूप भी स्वरूप ही है । अर्थात् नियत-स्वरूप और विशेषण से युक्त ही घटादि का असत्त्व है । यदि सर्वथा असत् मानें, तो 'घटः असन्, घटो न' इत्यादि प्रयोग भी न होंगे । 'इदं रजतम्' इस भ्रम का विषय असत् रजत ही जैसे रजतीयं ज्ञानम्' इस व्यवहार का कारण होता है, वैसे ही सब जगह असत् ही व्यवहार का कारण होता है । विद्वान् के लिए इतना ही बहुत है, अतः विस्तार व्यर्थ है । स्वप्रकाशवाद-विचार शून्यवाद खंडन—विज्ञान को शून्य मानने में सन्तोष न करनेवाले तथा सारे संसार को असत् कहने में उत्साहरहित वेदान्ताचार्य मानते हैं कि स्वप्रकाश अपने- १ 'घटः' ऐसा ज्ञान होने पर जैसे घट में सन्देह-विपर्ययादि नहीं होते, वैसे ही घटज्ञान

परिच्छेद ] स्वप्रकाशवाद-विचार २६ स्वप्रकाशं स्वत एव सिद्धस्वरूपम् । न खलु विज्ञाने सति जिज्ञासोरपि कस्यचित् जानामि न वेति संशयः, न जानामीति वा विपर्ययः, व्यतिरेकप्रमा वा । तेन जिज्ञासितस्य असत्त्वज्ञानव्यतिरेकप्रमाणांमभावसमुदायः स्वव्यापकं जिज्ञासि- तस्य प्रमितत्वमानयति । अन्यथा हि जिज्ञासितप्रमितत्वव्यतिरेकव्यापकं जिज्ञासितव्यतिरेकोल्लेखि ज्ञानमविदितजिज्ञासस्य स्यात् । अतः सर्वजनस्वात्म- संवेदनसिद्धमेवास्य बोधस्य स्वरूपम् । व्यवसायस्य अनुव्यवसायनियमान्न तत्र संशयादिरिति चेन्न । यत्रैवानुव्यवसाये ज्ञेयता नोपेया, तत्र जिज्ञासायामात्मधर्मिकं तत्संशयमारभ्य व्यवसायविषयपर्यन्तं संशयाक्रान्तेर्दुष्परिहरत्वात् । विषयिसद्भावसंशये तद्विषयेऽपि संशयस्य सम्भवात् । एवं त्रिचतुरसंवेदनकक्षानध्रौव्यनियमाभ्युपगमेऽपीति । आप ही सिद्ध स्वरूप-विज्ञान है। क्योंकि विज्ञान होने पर किसी जिज्ञासु को भी 'मैं जानता हूँ या नहीं' ऐसा सन्देह नहीं होता; ज्ञान में 'यह ज्ञान नहीं, इच्छा है' ऐसा भ्रम नहीं होता या 'मैं नहीं ही जानता' ऐसी अभाव-प्रमा ही नहीं होती है। इसलिए जिज्ञासित विज्ञान में सन्देह, मिथ्याज्ञान और व्यतिरेक-प्रमा के अभाव का समूह अपने व्यापक जिज्ञासित विषय की प्रमिति ( यथार्थ-ज्ञान ) का आक्षेप करेगा। यदि विज्ञान की प्रमिति न हो, तो विज्ञान के अभाव के व्यापक, जिज्ञासित विज्ञान के अभाव को विषय करनेवाला— ज्ञान ( सन्देहादि ) अवश्य होने चाहिए, किन्तु होते नहीं। इसलिए यह जानना चाहिए कि सब मनुष्यों के अपने ज्ञान से बोध का स्वरूप सिद्ध ही है। शून्यवाद समर्थन—व्यवसाय ( ज्ञान ) का अनुव्यवसाय ( द्वितीय ज्ञान ) होता है, इसीलिए ज्ञान में सन्देह आदि नहीं होते। खंडन—जिस ज्ञान का ज्ञान न हो, उसकी जिज्ञासा होने पर सन्देह आदि हो जायेंगे। ज्ञान में सन्देह होने पर प्रथम ज्ञान के विषय तक सन्देह हो जायगा। क्योंकि विषयी ( ज्ञान ) के सन्देह में भी सन्देहादि नहीं होते। इससे अनुमान होता है कि घट के साथ-साथ घट-ज्ञान भी ज्ञात होता है। अर्थात् सूर्य के तुल्य ज्ञान अपने विषय घटादि के साथ-साथ अपना भी प्रकाश करता है, अतः स्व-प्रकाश है। यदि ज्ञान को स्व-प्रकाश न मानें, तो सन्निकर्षादि कारण रहते जिज्ञासा होने पर घट-ज्ञान में सन्देहादि होने चाहिए, क्योंकि यह व्याप्ति है कि 'यत्र यत्र सन्निकर्षादिकारणसत्त्वे जिज्ञासायामज्ञातत्वं ,तत्र तत्र सन्देहादिः'। अतः स्वप्रकाश-विज्ञान के स्वतःसिद्ध होने से शून्यवाद ठीक नहीं, विज्ञानवाद ही ठीक है—यह वेदान्त-मत है। यहाँ संक्षेप से उस मत का विचार करते हैं।

३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम स्वप्रकाशे तु मानमेयभावव्यवस्थाया अभावादेव तदाश्रया दोषा निरवकाशाः। अन्यथा तु बोधस्वरूपमेव न सिद्ध्येत्, यदि हि विज्ञानं परतः सिद्ध्येत् तदाऽनवस्था स्यात् । न च वाच्यम्—अवश्यवेद्यताविस्तेर्नाभ्युपेयते, स्वार्थव्यवहारस्तु स्वरूपसत्तया प्रसूत इति क्वानवस्थेति ? यतस्तस्यां प्रमाणानु- पन्यासे स्वरूपसत्ताऽपि कुतः, यया व्यवहारोपपत्तिः । को ब्रूते सती मा वित्तिः ? असत्येव न कुतः ? सामान्यतो वित्तेस्तथात्वविधावपेक्षितसिद्ध्या यत्र विशेषरूपायां प्रमाणाऽ- प्रवृत्तिः, तदा तत्र सत्त्वसाधनासत्त्वेऽपि जिज्ञासायां सत्यां पश्चाद् व्यवहारमत्तैव वा अन्यद् वा प्रमाणमस्त्येवेति चेन्न ।। तस्यापि कथं सत्त्वमित्यनवस्था वा स्यात्, से विषय में सन्देह अवश्य होता है। इसी तरह जो वादी तीन या चार ज्ञान-प्रवाह का ज्ञान होना आवश्यक मानते हैं, उनके मत में भी सन्देह आदि दोष जानने चाहिए। प्रश्न—स्वप्रकाश मानने पर वही ज्ञान कर्म और क्रिया दोनों कैसे होगा, क्योंकि क्रिया-कर्मभाव और विषय-विषयीभाव भेद में होते हैं। उत्तर विज्ञानवाद में विज्ञान से पृथक् किसी भी बाह्य पदार्थ का स्वीकार न होने से विषय-विषयीभाव ही नहीं होता। यदि भेद में ही विषय-विषयीभाव मानें, तो विज्ञान सिद्ध ही न होगा यदि विज्ञान की सिद्धि अन्य विज्ञान से मानी जाय, तो अनवस्था हो जायगी । समर्थन—वित्ति (ज्ञान) का ज्ञान अवश्य हो, ऐसा नहीं मानते, किन्तु ज्ञान स्वरूपसत्ता से ही स्वविषय (घटादि) के व्यवहार का निमित्त होता है। इससे अनवस्था नहीं होती। खंडन—उस वित्ति में प्रमाण के न होने से उसकी स्वरूपसत्ता कैसे सिद्ध होगी, जिससे व्यवहार की प्रवृत्ति हो सके। कौन प्रमाण कहेगा कि वित्ति सत् है, वह असत् ही क्यों न हो ? समर्थन—व्यवहार में कारण होने से सामान्यरूपेण ज्ञान के सिद्ध होने पर व्यवहारकाल में जिस ज्ञान में प्रमाण नहीं है, उसमें भी पीछे जिज्ञासा होने पर विशेष-व्यवहार या स्मरण ही प्रमाण हो सकता है। खंडन—जिस सामान्य या विशेष व्यवहार से ज्ञान की सिद्धि होती है, उसकी सिद्धि भी ज्ञान के अधीन ही है तथा उस ज्ञान की सिद्धि भी अन्य ज्ञान के अधीन है, इस तरह अनवस्था हो जायगी। अथवा जिस ज्ञान का ज्ञान न होगा, उसकी असिद्धि से सभीकी असिद्धि हो जायगी और इस तरह अर्थ की असिद्धि तक, की आपत्ति आ जायगी। 'जो